श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1061–1070
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1061–1070
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इष्टेन च शपे राजन् सूदयिष्यामि राक्षसम् ॥ ५५ ॥
फिर वे युधिष्ठिरसे बोले - ' महाराज! मैं अपनी, सब भाइयोंकी, धर्मकी, पुण्य कर्मों तथा यज्ञकी शपथ खाकर कहता हूँ, इस राक्षसको अवश्य मार डालूँगा ॥ ५५ ॥
इत्येवमुक्त्वा तौ वीरौ स्पर्धमानौ परस्परम् ।
बाहुभ्यां समसज्जेतामुभी रक्षोवृकोदरौ ॥ ५६ ॥
ऐसा कहकर वे दोनों वीर राक्षस और भीम एक- दूसरे से स्पर्धा रखते हुए बाँहोंसे बाँहें मिलाकर गुथ गये ॥ ५६ ॥
तयोरासीत् सम्प्रहारः क्रुद्धयोर्भीमरक्षसोः ।
अमृष्यमाणयोः सङ्ख्ये देवदानवयोरिव ॥ ५७ ॥
भीमसेन तथा राक्षस दोनोंमें देवताओं और दानवोंके समान युद्ध होने लगा । दोनों ही रोष और अमर्षमें भरकर एक- दूसरेपर प्रहार करने लगे ॥ ५७ ॥
आरुज्यारुज्य तौ वृक्षानन्योन्यमभिजघ्नतुः ।
जीमूताविव गर्जन्तौ निनदन्तौ महाबलौ ॥ ५८ ॥
दोनोंका बल महान् था। वे गर्जते हुए दो मेघोंकी भाँति सिंहनाद करके वृक्षोंको तोड़-तोड़कर परस्पर चोट करते थे ॥ ५८
बभञ्जतुर्महावृक्षानूरुभिर्बलिनां वरौ ।
अन्योन्येनाभिसंरब्धौ परस्परवधैषिणौ ॥ ५ ९ ॥
बलवानोंमें श्रेष्ठ वे दोनों वीर अपनी जाँघोंके धक्केसे बड़े - बड़े वृक्षोंको तोड़ डालते थे और परस्पर कुपित हो एक- दूसरेको मार डालनेकी इच्छा रखते थे ॥ ५९ ॥
तद् वृक्षयुद्धमभवन्महीरुहविनाशनम् ।
बालिसुग्रीवयोर्भ्रात्रोः पुरा स्त्रीकाङ्क्षिणोर्यथा ॥ ६० ॥
जैसे पूर्वकालमें स्त्रीकी इच्छावाले दो भाई बालि और सुग्रीवमें भयंकर संग्राम हुआ था, उसी प्रकार भीमसेन और राक्षसमें होने लगा । उन दोनोंका वह वृक्षयुद्ध उस वनके वृक्षसमूहोंके लिये महान् विनाशकारी सिद्ध हुआ ॥ ६० ॥
आविध्याविध्य तौ वृक्षान् मुहूर्तमितरेतरम् ।
ताडयामासतुरुभौ विनदन्तौ मुहुर्मुहुः ॥ ६१ ॥
वे दोनों बड़े - बड़े वृक्षोंको हिला -हिलाकर बार- बार विकट गर्जना करते हुए दो घड़ीतक एक- दूसरेपर प्रहार करते रहे ॥ ६१ ॥
तस्मिन् देशे यदा वृक्षाः सर्व एव निपातिताः ।
पुञ्जीकृताश्च शतशः परस्परवधेप्सया ॥ ६२ ॥
ततः शिलाः समादाय मुहूर्तमिव भारत ।
महाभ्रैरिव शैलेन्द्रौ युयुधाते महाबलौ ॥ ६३ ॥
शिलाभिरुग्ररूपाभिर्बृहतीभिः परस्परम् ।
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वज्रैरिव महावेगैराजघ्नतुरमर्षणी ॥ ६४ ॥
भारत! जब उस प्रदेशके सारे वृक्ष गिरा दिये गये, तब एक-दूसरेका वध करनेकी इच्छासे उन महाबली वीरोंने वहाँ ढेर- की- ढेर पड़ी हुई सैकड़ों शिलाएँ लेकर दो घड़ीतक इस प्रकार युद्ध किया, मानो दो पर्वतराज बड़े - बड़े मेघखण्डोंद्वारा परस्पर युद्ध कर रहे हों । वहाँकी शिलाएँ विशाल और अत्यन्त भयंकर थीं । वे देखनेमें महान् वेगशाली वज्रोंके समान जान पड़ती थीं । अमर्षमें भरे हुए वे दोनों योद्धा उन्हीं शिलाओंद्वारा एक- दूसरेको मारने लगे ॥ ६२–६४ ॥
अभिद्रुत्य च भूयस्तावन्योन्यं बलदर्पितौ ।
भुजाभ्यां परिगृह्याथ चकर्षाते गजाविव ॥ ६५ ॥
तत्पश्चात् अपने - अपने बलके घमंडमें भरे हुए वे दोनों वीर एक दूसरेकी ओर झपटकर पुनः अपनी भुजाओंसे कसते हुए विपक्षीको उसी प्रकार खींचने लगे, जैसे दो गजराज परस्पर भिड़कर एक - दूसरेको खींच रहे हों ॥ ६५ ॥
मुष्टिभिश्च महाघोरैरन्योन्यमभिजघ्नतुः ।
ततः कटकटाशब्दो बभूव सुमहात्मनोः ॥ ६६ ॥
अपने अत्यन्त भयानक मुक्कोंद्वारा वे परस्पर चोट करने लगे । तब उन दोनों महाकाय वीरोंमें जोर - जोरसे कटकटानेकी आवाज होने लगी ॥ ६६ ॥
ततः संहृत्य मुष्टिं तु पञ्चशीर्षमिवोरगम् ।
वेगेनाभ्यहनद् भीमो राक्षसस्य शिरोधराम् ॥ ६७ ॥
तदनन्तर भीमसेनने पाँच सिरवाले सर्पकी भाँति अपने पाँच अंगुलियोंसे युक्त हाथकी मुट्ठी बाँधकर उसे राक्षसकी गर्दनपर बड़े वेगसे दे मारा ॥ ६७ ॥
ततः श्रान्तं तु तद् रक्षो भीमसेनभुजाहतम् ।
सुपरिश्रान्तमालक्ष्य भीमसेनोऽभ्यवर्तत ॥ ६८ ॥
भीमसेनकी भुजाओंके आघातसे वह राक्षस थक गया था । तदनन्तर उसे अधिक थका हुआ देख भीमसेन आगे बढ़ते गये ॥ ६८ ॥
तत एनं महाबाहुर्बाहुभ्याममरोपमः ।
समुत्क्षिप्य बलाद् भीमो विनिष्पिष्य महीतले ॥ ६ ९ ॥
तत्पश्चात् देवताओंके समान तेजस्वी महाबाहु भीमसेनने उस राक्षसको दोनों भुजाओंसे बलपूर्वक उठा लिया और उसे पृथ्वीपर पटककर पीस डाला ॥ ६ ९ ॥
तस्य गात्राणि सर्वाणि चूर्णयामास पाण्डवः ।
अरत्निना चाभिहत्य शिरः कायादपाहरत् ॥ ७० ॥
उस समय पाण्डुनन्दन भीमने उसके सारे अंगोंको दबाकर चूर- चूर कर दिया और थप्पड़ मारकर उसके सिरको धड़से अलग कर दिया ॥ ७० ॥
संदष्टौष्ठं विवृत्ताक्षं फलं वृक्षादिव च्युतम् ।
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जटासुरस्य तु शिरो भीमसेनबलाद्धतम् ॥ ७१ ॥
भीमसेनके बलसे कटकर अलग हुआ जटासुरका वह सिर वृक्षसे टूटकर गिरे हुए फलके समान जान पड़ता था । उसका ओठ दाँतोंसे दबा हुआ था और आँखें बहुत फैली हुई थीं ॥ ७१ ॥
पपात रुधिरादिग्धं संदष्टदशनच्छदम् ।
तं निहत्य महेष्वासो युधिष्ठिरमुपागमत् ।
स्तूयमानो द्विजाग्रयैस्तु मरुद्भिरिव वासवः ॥ ७२ ॥
दाँतोंसे दबे हुए ओठवाला वह मस्तक खूनसे लथपथ होकर गिर पड़ा था । इस प्रकार जटासुरको मारकर महान् धनुर्धर भीमसेन युधिष्ठिरके पास आये । उस समय श्रेष्ठ द्विज उनकी भूरि- भूरि प्रशंसा कर रहे थे, मानो मरुद्गण देवराज इन्द्रके गुण गा रहे हों ॥ ७२ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि जटासुरवधपर्वणि सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५७ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत जटासुरवधपर्वमें एक सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५७ ॥
॥ समाप्तं जटासुरवधपर्व ॥
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( यक्षयुद्धपर्व) अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः नर- नारायण - आश्रमसे वृषपर्वाके यहाँ होते हुए राजर्षि आर्ष्टिषेणके आश्रमपर जाना वैशम्पायन उवाच
निहते राक्षसे तस्मिन् पुनर्नारायणाश्रमम् ।
अभ्येत्य राजा कौन्तेयो निवासमकरोत् प्रभुः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - उस राक्षसके मारे जानेपर कुन्तीकुमार शक्तिशाली राजा युधिष्ठिर पुनः नर- नारायण आश्रममें आकर रहने लगे ॥ १ ॥
स समानीय तान् सर्वान् भ्रातॄनित्यब्रवीद् वचः ।
द्रौपद्या सहितान् काले संस्मरन् भ्रातरं जयम् ॥ २ ॥
एक दिन उन्होंने द्रौपदीसहित सब भाइयोंको एकत्र करके अपने प्रियबन्धु अर्जुनका स्मरण करते हुए कहा— ॥ २ ॥
समाश्चतस्रोऽभिगताः शिवेन चरतां वने ।
कृतोद्देशः स बीभत्सुः पञ्चमीमभितः समाम् ॥ ३ ॥
‘ हमलोगोंको कुशलपूर्वक वनमें विचरते हुए चार वर्ष हो गये । अर्जुनने यह संकेत किया था कि मैं पाँचवें वर्षमें लौट आऊँगा ॥ ३ ॥
प्राप्य पर्वतराजानं श्वेतं शिखरिणां वरम् ।
पुष्पितैर्द्रुमषण्डैश्च मत्तकोकिलषट्पदैः ॥ ४ ॥
मयूरैश्चातकैश्चापि नित्योत्सवविभूषितम् ।
व्याघ्रैर्वराहैर्महिषैर्गवयैर्हरिणैस्तथा ॥ ५ ॥
श्वापदैर्व्यालरूपैश्च रुरुभिश्च निषेवितम् ।
फुल्लैः सहस्रपत्रैश्च शतपत्रैस्तथोत्पलैः ॥ ६ ॥
प्रफुल्लैः कमलैश्चैव तथा नीलोत्पलैरपि ।
महापुण्यं पवित्रं च सुरासुरनिषेवितम् ॥ ७ ॥
‘ पर्वतोंमें श्रेष्ठ गिरिराज कैलासपर आकर अर्जुनसे मिलनेके शुभ अवसरकी प्रतीक्षामें हमने यहाँ डेरा डाला है । ( क्योंकि वहीं मिलनेका उनकी ओरसे संकेत प्राप्त हुआ था । ) वह श्वेत कैलास-शिखर पुष्पित वृक्षावलियोंसे सुशोभित है । वहाँ मतवाले कोकिलोंकी काकली,
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भ्रमरोंके गुंजारव तथा मोर और पपीहोंकी मीठी वाणीसे नित्य उत्सव-सा होता रहता है, जो उस पर्वतकी शोभाको बढ़ा देता है । वहाँ व्याघ्र, वराह, महिष, गवय, हरिण, हिंसक जन्तु, सर्प तथा रुरुमृग निवास करते हैं । खिले हुए सहस्रदल, शतदल, उत्पल, प्रफुल्ल कमल तथा नीलोत्पल आदिसे उस पर्वतकी रमणीयता और भी बढ़ गयी है । वह परम पुण्यमय और पवित्र है । देवता और असुर दोनों ही उसका सेवन करते हैं ॥ ४–७ ॥
तत्रापि च कृतोद्देशः समागमदिदृक्षुभिः ।
कृतश्च समयस्तेन पार्थेनामिततेजसा ॥ ८ ॥
पञ्चवर्षाणि वत्स्यामि विद्यार्थीति पुरा मयि । ‘ अमिततेजस्वी अर्जुनने वहाँ भी अपना आगमन देखनेके लिये उत्सुक हुए हमलोगोंके साथ संकेतपूर्वक यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं अस्त्रविद्याका अध्ययन करनेके लिये पाँच वर्षोंतक देवलोकमें निवास करूँगा ॥ अत्र गाण्डीवधन्वानमवाप्तास्त्रमरिन्दमम् ॥ ९ ॥
देवलोकादिमं लोकं द्रक्ष्यामः पुनरागतम् ।
इत्युक्त्वा ब्राह्मणान् सर्वानामन्त्रयत पाण्डवः ॥ १० ॥
'शत्रुओंका दमन करनेवाले गाण्डीवधारी अर्जुन अस्त्रविद्या प्राप्त करके पुनः देवलोकसे इस मनुष्यलोकमें आनेवाले हैं । हमलोग शीघ्र ही उनसे मिलेंगे' ऐसा कहकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने सब ब्राह्मणोंको आमन्त्रित किया ॥ ९ -१० ॥
कारणं चैव तत् तेषामाचचक्षे तपस्विनाम् ।
तानुग्रतपसः प्रीतान् कृत्वा पार्थाः प्रदक्षिणाम् ॥ ११ ॥
और उन तपस्वियोंके सामने उन्हें बुला भेजनेका कारण बताया । उन कठोर तपस्वियोंको प्रसन्न करके कुन्तीकुमारोंने उनकी परिक्रमा की ॥ ११ ॥
ब्राह्मणास्तेऽन्वमोदन्त शिवेन कुशलेन च ।
सुखोदर्कमिमं क्लेशमचिराद् भरतर्षभ ॥ १२ ॥
तब उन ब्राह्मणोंने कुशल- मंगलके साथ उन सबके अभीष्ट मनोरथकी पूर्तिका अनुमोदन किया और कहा -' भरतश्रेष्ठ! आजका यह क्लेश शीघ्र ही सुखद भविष्यके रूपमें परिणत हो जायगा ॥ १२ ॥
क्षत्रधर्मेण धर्मज्ञ तीर्त्वा गां पालयिष्यसि ।
तत् तु राजा वचस्तेषां प्रतिगृह्य तपस्विनाम् ॥ १३ ॥
प्रतस्थे सह विप्रैस्तैर्भ्रातृभिश्च परन्तपः ।
राक्षसैरनुयातो वै लोमशेनाभिरक्षितः ॥ १४ ॥
‘ धर्मज्ञ! तुम क्षत्रियधर्मके अनुसार इस संकटसे पार होकर सारी पृथ्वीका पालन करोगे । ' राजा युधिष्ठिरने उन तपस्वी ब्राह्मणोंका यह आशीर्वाद शिरोधार्य किया और वे परंतप नरेश उन ब्राह्मणों तथा भाइयोंके साथ वहाँसे प्रस्थित हुए । घटोत्कच आदि राक्षस
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भी उनकी सेवाके लिये पीछे -पीछे चले । राजा युधिष्ठिर महर्षि लोमशके द्वारा सर्वथा सुरक्षित थे ॥ १३-१४ ॥
क्वचित् पद्भयां ततोऽगच्छद् राक्षसैरुह्यते क्वचित् ।
तत्र तत्र महातेजा भ्रातृभिः सह सुव्रतः ॥ १५ ॥
उत्तम व्रतका पालन करनेवाले वे महातेजस्वी भूपाल कहीं तो भाइयोंसहित पैदल चलते और कहीं राक्षसलोग उन्हें पीठपर बैठाकर ले जाते थे । इस प्रकार वे अनेक स्थानोंमें गये ॥ १५ ॥
ततो युधिष्ठिरो राजा बहून् क्लेशान् विचिन्तयन् ।
सिंहव्याघ्रगजाकीर्णामुदीचीं प्रययौ दिशम् ॥ १६ ॥
तदनन्तर राजा युधिष्ठिर अनेक क्लेशोंका चिन्तन करते हुए सिंह, व्याघ्र और हाथियोंसे भरी हुई उत्तर दिशाकी ओर चल दिये ॥ १६ ॥
अवेक्षमाणः कैलासं मैनाकं चैव पर्वतम् ।
गन्धमादनपादांश्च श्वेतं चापि शिलोच्चयम् ॥ १७ ॥
उपर्युपरि शैलस्य बह्वीश्च सरितः शिवाः ।
पृष्ठं हिमवतः पुण्यं ययौ सप्तदशेऽहनि ॥ १८ ॥
कैलास, मैनाकपर्वत, गन्धमादनकी घाटियों और श्वेत (हिमालय) पर्वतका दर्शन करते हुए उन्होंने पर्वतमालाओंके ऊपर- ऊपर बहुत - सी कल्याणमयी सरिताएँ देखीं तथा सत्रहवें दिन वे हिमालयके एक पावन पृष्ठभागपर जा पहुँचे ॥ १७-१८ ॥
ददृशुः पाण्डवा राजन् गन्धमादनमन्तिकात् ।
पृष्ठे हिमवतः पुण्ये नानाद्रुमलतावृते ॥ १ ९ ॥
सलिलावर्तसंजातैः पुष्पितैश्च महीरुहैः ।
समावृतं पुण्यतममाश्रमं वृषपर्वणः ॥ २० ॥
तमुपागम्य राजर्षिं धर्मात्मानमरिन्दमाः ।
पाण्डवा वृषपर्वाणमवन्दन्त गतक्लमाः ॥ २१ ॥
राजन्! वहाँ पाण्डवोंने गन्धमादन पर्वतका निकटसे दर्शन किया । हिमालयका वह पावन पृष्ठभाग नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे आवृत था। वहाँ जलके आवर्तोंसे सींचकर उत्पन्न हुए फूलवाले वृक्षोंसे घिरा हुआ वृषपर्वाका परम पवित्र आश्रम था । शत्रुदमन पाण्डवोंने उन धर्मात्मा राजर्षि वृषपर्वाके पास जाकर क्लेशरहित हो उन्हें प्रणाम किया ॥ १ ९ –२१ ॥
अभ्यनन्दत् स राजर्षिः पुत्रवद् भरतर्षभान् ।
पूजिताश्चावसंस्तत्र सप्तरात्रमरिन्दमाः ॥ २२ ॥
उन राजर्षिने भरतकुलभूषण पाण्डवोंका पुत्रके समान अभिनन्दन किया और उनसे सम्मानित होकर वे शत्रुदमन पाण्डव वहाँ सात रात ठहरे रहे ॥ २२ ॥
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अष्टमेऽहनि सम्प्राप्ते तमृषिं लोकविश्रुतम् ।
आमन्त्र्य वृषपर्वाणं प्रस्थानं प्रत्यरोचयन् ॥ २३ ॥
आठवें दिन उन विश्वविख्यात राजर्षि वृषपर्वाकी आज्ञा ले उन्होंने वहाँसे प्रस्थान करनेका विचार किया ॥ २३ ॥
एकैकशश्च तान् विप्रान् निवेद्य वृषपर्वणि ।
न्यासभूतान् यथाकालं बन्धूनिव सुसत्कृतान् ॥ २४ ॥
पारिबर्हं च तं शेषं परिदाय महात्मने ।
ततस्ते यज्ञपात्राणि रत्नान्याभरणानि च ॥ २५ ॥
न्यदधुः पाण्डवा राजन्नाश्रमे वृषपर्वणः । अपने साथ आये हुए ब्राह्मणोंको उन्होंने एक-एक करके वृषपर्वाके यहाँ धरोहरकी भाँति सौंपा । उन सबका पाण्डवोंने समय- समयपर सगे बन्धुकी भाँति सत्कार किया था । ब्राह्मणोंको सौंपनेके पश्चात् पाण्डवोंने अपनी शेष सामग्री भी उन्हीं महामनाको दे दी । तदनन्तर पाण्डुपुत्रोंने वृषपर्वाके ही आश्रममें अपने यज्ञपात्र तथा रत्नमय आभूषण भी रख दिये ॥ २४-२५३ ॥ अतीतानागते विद्वान् कुशलः सर्वधर्मवित् ॥ २६ ॥
अन्वशासत् स धर्मज्ञः पुत्रवद् भरतर्षभान् ।
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तेऽनुज्ञाता महात्मानः प्रययुर्दिशमुत्तराम् ॥ २७ ॥
वृषपर्वा भूत और भविष्यके ज्ञाता, कार्यकुशल और सम्पूर्ण धर्मोंके मर्मज्ञ थे । उन धर्मज्ञ नरेशने भरतश्रेष्ठ पाण्डवोंको पुत्रकी भाँति उपदेश दिया । उनकी आज्ञा पाकर महामना पाण्डव उत्तरदिशाकी ओर चले ॥ २६-२७ ॥
तान् प्रस्थितानभ्यगच्छद् वृषपर्वा महीपतिः ।
उपन्यस्य महातेजा विप्रेभ्यः पाण्डवांस्तदा ॥ २८ ॥
अनुसंसार्य कौन्तेयानाशीर्भिरभिनन्द्य च ।
वृषपर्वा निववृते पन्थानमुपदिश्य च ॥ २ ९ ॥
उस समय उनके प्रस्थान करनेपर महातेजस्वी राजर्षि वृषपर्वाने पाण्डवोंको ( उस देशके जानकार अन्य) ब्राह्मणोंके सुपुर्द कर दिया और कुछ दूर पीछे - पीछे जाकर उन कुन्तीकुमारोंको आशीर्वाद देकर प्रसन्न किया। तत्पश्चात् उन्हें रास्ता बताकर वृषपर्वा लौट आये ॥ २८-२९ ॥
नानामृगगणैर्जुष्टं कौन्तेयः सत्यविक्रमः ।
पदातिर्भ्रातृभिः सार्धं प्रातिष्ठत युधिष्ठिरः ॥ ३० ॥
फिर सत्यपराक्रमी कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ पैदल ही ( वृषपर्वाके बताये हुए मार्गपर) चले, जो अनेक जातिके मृगोंके झुंडोंसे भरा हुआ था ॥ ३० ॥
नानाद्रुमनिरोधेषु वसन्तः शैलसानुषु ।
पर्वतं विविशुः श्वेतं चतुर्थेऽहनि पाण्डवाः ॥ ३१ ॥
महाभ्रघनसंकाशं सलिलोपहितं शुभम् ।
मणिकाञ्चनरूप्यस्य शिलानां च समुच्चयम् ॥ ३२ ॥
( रूपं हिमवतः प्रस्थं बहुकन्दरनिर्झरम् । शिलाविभङ्गविकटं लतापादपसंकुलम् ॥ )
ते समासाद्य पन्थानं यथोक्तं वृषपर्वणा ।
अनुसस्रुर्यथोद्देशं पश्यन्तो विविधान्नगान् ॥ ३३ ॥
वे सभी पाण्डव नाना प्रकारके वृक्षोंसे हरे- भरे पर्वतीय शिखरोंपर डेरा डालते हुए चौथे दिन श्वेत ( हिमालय ) पर्वतपर जा पहुँचे, जो महामेघके समान शोभा पाता था । वह सुन्दर शैल शीतल सलिलराशिसे सम्पन्न था और मणि सुवर्ण, रजत तथा शिलाखण्डोंका समुदायरूप था । हिमालयका वह रमणीय प्रदेश अनेकानेक कन्दराओं और निर्झरोंसे सुशोभित शिलाखण्डोंके कारण दुर्गम तथा लताओं और वृक्षोंसे व्याप्त था । पाण्डव वृषपर्वाके बताये हुए मार्गका आश्रय ले नाना प्रकारके वृक्षोंका अवलोकन करते हुए अपने अभीष्ट स्थानकी ओर अग्रसर हो रहे थे ॥ ३१–३३ ॥
उपर्युपरि शैलस्य गुहाः परमदुर्गमाः ।
सुदुर्गमांस्ते सुबहून् सुखेनैवाभिचक्रमुः ॥ ३४ ॥
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धौम्यः कृष्णा च पार्थाश्च लोमशश्च महानृषिः ।
अगच्छन् सहितास्तत्र न कश्चिदवहीयते ॥ ३५ ॥
उस पर्वतके ऊपर बहुत - सी अत्यन्त दुर्गम गुफाएँ थीं और अनेक दुर्गम्य प्रदेश थे । पाण्डव उन सबको सुखपूर्वक लाँघकर आगे बढ़ गये । पुरोहित धौम्य, द्रौपदी, चारों पाण्डव
तथा महर्षि लोमश — ये सब लोग एक साथ चल रहे थे । कोई पीछे नहीं छूटता था ॥
ते मृगद्विजसंघुष्टं नानाद्रुमलतायुतम् ।
शाखामृगगणैश्चैव सेवितं सुमनोरमम् ॥ ३६ ॥
पुण्यं पद्मसरोयुक्तं सपल्वलमहावनम् ।
उपतस्थुर्महाभागा माल्यवन्तं महागिरिम् ॥ ३७ ॥
आगे बढ़ते हुए वे महाभाग पाण्डव पुण्यमय माल्यवान् नामक महान् पर्वतपर जा पहुँचे, जो अनेक प्रकारके वृक्षों और लताओंसे सुशोभित तथा अत्यन्त मनोरम था । वहाँ मृगोंके झुंड विचरते और भाँति- भाँतिके पक्षी कलरव कर रहे थे । बहुत- से वानर भी उस पर्वतका सेवन करते थे । उसके शिखरपर कमलमण्डित सरोवर, छोटे-छोटे• जलकुण्ड और विशाल वन थे ॥ ३६-३७ ॥
ततः किम्पुरुषावासं सिद्धचारणसेवितम् ।
ददृशुर्हृष्टरोमाणः पर्वतं गन्धमादनम् ॥ ३८ ॥
वहाँसे उन्हें गन्धमादन पर्वत दिखायी दिया, जो किम्पुरुषोंका निवासस्थान है । सिद्ध और चारण उसका सेवन करते हैं । उसे देखकर पाण्डवोंका रोम - रोम हर्षसे खिल उठा ॥ ३८ ॥
विद्याधरानुचरितं किन्नरीभिस्तथैव च ।
गजसङ्घमावासं सिंहव्याघ्रगणायुतम् ॥ ३ ९ ॥
उस पर्वतपर विद्याधर विहार करते थे । किन्नरियाँ क्रीड़ा करती थीं । झुंड- के - झुंड हाथी, सिंह और व्याघ्र निवास करते थे ॥ ३ ९ ॥
शरभोन्नादसंघुष्टं नानामृगनिषेवितम् ।
ते गन्धमादनवनं तन्नन्दनवनोपमम् ॥ ४० ॥
मुदिताः पाण्डुतनया मनोहृदयनन्दनम् ।
विविशुः क्रमशो वीराः शरण्यं शुभकाननम् ॥ ४१ ॥
शरभोंके सिंहनादसे वह पर्वत गूँजता रहता था । नाना प्रकारके मृग वहाँ निवास करते थे । गन्धमादन पर्वतका वह वन नन्दनवनके समान मन और हृदयको आनन्द देनेवाला था । वे वीर पाण्डुकुमार बड़े प्रसन्न होकर क्रमशः उस सुन्दर काननमें प्रविष्ट हुए, जो सबको शरण देनेवाला था ॥ ४०-४१ ॥
द्रौपदीसहिता वीरास्तैश्च विप्रैर्महात्मभिः ।
शृण्वन्तः प्रीतिजननान् वल्गून् मदकलाञ्छुभान् ॥ ४२ ॥
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श्रोत्ररम्यान् सुमधुराञ्छब्दान् खगमुखेरितान् ।
सर्वर्तुफलभाराढ्यान् सर्वर्तुकुसुमोज्ज्वलान् ॥ ४३ ॥
पश्यन्तः पादपांश्चापि फलभारावनामितान् ।
आम्रानाम्रातकान् भव्यान् नारिकेलान् सतिन्दुकान् ॥ ४४ ॥
मुञ्जातकांस्तथाञ्जीरान् दाडिमान् बीजपूरकान् ।
पनसाँल्लकुचान् मोचान् खर्जूरानम्लवेतसान् ॥ ४५ ॥
पारावतांस्तथा क्षौद्रान् नीपांश्चापि मनोरमान् ।
बिल्वान् कपित्थाञ्जम्बूंश्च काश्मरीर्बदरीस्तथा ॥ ४६ ॥
प्लक्षानुदुम्बरबटानश्वत्थान् क्षीरिकांस्तथा ।
भल्लातकानामलकीर्हरीतकबिभीतकान् ॥ ४७ ॥
इङ्गुदान् करमर्दाश्च तिन्दुकांश्च महाफलान् ।
एतानन्यांश्च विविधान् गन्धमादनसानुषु ॥ ४८ ॥
फलैरमृतकल्पैस्तानाचितान् स्वादुभिस्तरून् ।
तथैव चम्पकाशोकान् केतकान् बकुलांस्तथा ॥ ४ ९ ॥
पुन्नागान् सप्तपर्णांश्च कर्णिकारान् सकेतकान् ।
पाटलान् कुटजान् रम्यान् मन्दारेन्दीवरांस्तथा ॥ ५० ॥
पारिजातान् कोविदारान् देवदारुद्रुमांस्तथा ।
शालांस्तालांस्तमालांश्च पिप्पलान् हिङ्गुकांस्तथा ॥ ५१ ॥
शाल्मलीः किंशुकाशोकाञ्छिंशपाः सरलांस्तथा । उनके साथ द्रौपदी तथा पूर्वोक्त महामना ब्राह्मण भी थे । वे सब लोग विहंगोंके मुखसे निकले हुए अत्यन्त मधुर सुन्दर, श्रवण- सुखद मादक एवं मोदजनक शुभ शब्द सुनते हुए तथा सभी ऋतुओंके पुष्पों और फलोंसे सुशोभित एवं उनके भारसे झुके वृक्षोंको देखते हुए आगे बढ़ रहे थे । आम, आमड़ा, भव्य नारियल, तेंदू, मुंजातक, अंजीर, अनार, नीबू, कटहल, लकुच ( बड़हर ), मोच ( केला), खजूर, अम्लवेंत, पारावत, क्षौद्र, सुन्दर कदम्ब, बेल, कैथ, जामुन, गम्भारी, बेर, पाकड़, गूलर, बरगद, पीपल, पिंड खजूर, भिलावा, आँवला, हर्रे, बहेड़ा, इंगुद, करौंदा तथा बड़े -बड़े फलवाले तिंदुक- ये और दूसरे भी नाना प्रकारके वृक्ष गन्धमादनके शिखरोंपर लहलहा रहे थे, जो अमृतके समान स्वादिष्ट फलोंसे लदे हुए थे । ( इन सबको देखते हुए पाण्डवलोग आगे बढ़ने लगे । ) इसी प्रकार चम्पा, अशोक, केतकी, बकुल ( मौलशिरी ), पुन्नाग ( सुल्ताना चंपा ), सप्तपर्ण (छितवन ), कनेर, केवड़ा, पाटल ( पाड़रि या गुलाब ), कुटज, सुन्दर मन्दार, इन्दीवर ( नीलकमल ), पारिजात, कोविदार, देवदारु, शाल, ताल, तमाल, पिप्पल, हिंगुक ( हींगका वृक्ष), सेमल, पलाश, अशोक, शीशम तथा सरल आदि वृक्षोंको देखते हुए पाण्डवलोग अग्रसर हो रहे थे ॥ ४२ –५२३ ॥