श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1041–1050

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1041–1050

पृष्ठ 1041

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व्यगाहत महाबाहुर्नलिनीं तां महाबलः ॥ १३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! सभी राक्षसोंसे ऐसा कहकर अमर्षमें भरे हुए महाबली महाबाहु भीमसेन उस सरोवरमें प्रवेश करने लगे ॥ १३ ॥

ततः स राक्षसैर्वाचा प्रतिषिद्धः प्रतापवान् ।

मा मैवमिति सक्रोधैर्भर्त्सयद्भिः समन्ततः ॥ १४ ॥

उस समय क्रोधमें भरे राक्षस चारों ओरसे प्रतापी भीमको फटकारते हुए वाणीद्वारा रोकने लगे- ' नहीं - नहीं, ऐसा न करो ' ॥ १४ ॥

कदर्थीकृत्य तु स तान् राक्षसान् भीमविक्रमः ।

व्यगाहत महातेजास्ते तं सर्वे न्यवारयन् ॥ १५ ॥

परंतु भयंकर पराक्रमी महातेजस्वी भीम उन सब राक्षसोंकी अवहेलना करके उस जलाशयमें उतर ही गये । यह देख सब राक्षस उन्हें रोकनेकी चेष्टा करते हुए चिल्ला उठे -- ॥ १५ ॥

गृह्णीत बध्नीत विकर्ततेमं पचाम खादाम च भीमसेनम् । क्रुद्धा ब्रुवन्तोऽभिययुर्द्रुतं ते शस्त्राणि चोद्यम्य विवृत्तनेत्राः ॥ १६ ॥

‘ अरे! इसे पकड़ो, बाँध लो, काट डालो, हम सब लोग इस भीमको पकायेंगे और खा जायँगे । ' क्रोधपूर्वक उपर्युक्त बातें कहते और आँखें फाड़-फाड़कर देखते हुए वे सभी राक्षस शस्त्र उठाकर तुरंत उनकी ओर दौड़े ॥ १६ ॥

ततः स गुर्वीं यमदण्डकल्पां महागदां काञ्चनपट्टनद्धाम् । प्रगृह्य तानभ्यपतत् तरस्वी ततोऽब्रवीत् तिष्ठ तिष्ठतेति ॥ १७ ॥

तब भीमसेनने यमदण्डके समान विशाल और भारी गदा उठा ली, जिसपर सोनेका पत्र मढ़ा हुआ था । उसे लेकर वे बड़े वेगसे उन राक्षसोंपर टूट पड़े और ललकारते हुए बोले -' खड़े रहो, खड़े रहो ' ॥ १७ ॥

पृष्ठ 1042

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ते तं तदा तोमरपट्टिशाद्यै- र्व्याविद्धशस्त्रैः सहसा निपेतुः । जिघांसवः क्रोधवशाः सुभीमा भीमं समन्तात् परिवव्रुरुग्राः ॥ १८ ॥

वातेन कुन्त्यां बलवान् सुजातः शूरस्तरस्वी द्विषतां निहन्ता । सत्ये च धर्मे च रतः सदैव पराक्रमे शत्रुभिरप्रधृष्यः ॥ १ ९ ॥ यह देख वे भयंकर क्रोधवश नामक राक्षस भीमसेनको मार डालनेकी इच्छासे शत्रुओंके शस्त्रोंको नष्ट कर देनेवाले तोमर, पट्टिश आदि आयुधोंको लेकर सहसा उनकी ओर दौड़े और उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये । वे सब--के - सब बड़े उग्र स्वभावके थे । इधर भीमसेन कुन्तीदेवीके गर्भसे वायु देवताके द्वारा उत्पन्न होनेके कारण बड़े बलवान्, शूरवीर, वेगशाली एवं शत्रुओंका वध करनेमें समर्थ थे । वे सदा ही सत्य एवं धर्ममें रत थे । पराक्रमी तो वे ऐसे थे कि अनेक शत्रु मिलकर भी उन्हें परास्त नहीं कर सकते थे ॥ १८-१९ ॥ तेषां स मार्गान् विविधान् महात्मा विहत्य शस्त्राणि च शात्रवाणाम् ।

पृष्ठ 1043

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यथा प्रवीरान् निजघान भीमः परं शतं पुष्करिणीसमीपे ॥ २० ॥

महामना भीमने शत्रुओंके भाँति- भाँतिके पैंतरों तथा अस्त्र - शस्त्रोंको विफल करके उनके सौसे भी अधिक प्रमुख वीरोंको उस सरोवरके समीप मार गिराया ॥ २० ॥

ते तस्य वीर्यं च बलं च दृष्ट्वा विद्याबलं बाहुबलं तथैव । अशक्नुवन्तः सहितं समन्ताद् द्रुतं प्रवीराः सहसा निवृत्ताः ॥ २१ ॥

भीमसेनका पराक्रम, शारीरिक बल, विद्याबल और बाहुबल देखकर वे वीर राक्षस एक साथ संगठित होकर भी उनका वेग सहनेमें असमर्थ हो गये और सहसा सब ओरसे युद्ध छोड़कर निवृत्त हो गये ॥ २१ ॥

विदीर्यमाणास्तत एव तूर्ण- माकाशमास्थाय विमूढसंज्ञाः । कैलासशृङ्गाण्यभिदुद्रुवुस्ते भीमार्दिताः क्रोधवशाः प्रभग्नाः ॥ २२ ॥

भीमसेनकी मारसे क्षत -विक्षत एवं पीड़ित हो वे क्रोधवश नामक राक्षस अपनी सुध-बुध खो बैठे थे । अतः उनके पाँव उखड़ गये और वे तुरंत वहाँसे आकाशमें उड़कर कैलासके शिखरोंपर भाग गये ॥ २२ ॥

स शक्रवद् दानवदैत्यसङ्घान् विक्रम्य जित्वा च रणेऽरिसङ्घान् । विगाह्य तां पुष्करिणीं जितारिः कामाय जग्राह ततोऽम्बुजानि ॥ २३ ॥

शत्रुविजयी भीम इन्द्रकी भाँति पराक्रम करके दानव और दैत्योंके दलको युद्धमें हराकर उस सरोवरमें प्रविष्ट हो इच्छानुसार कमलोंका संग्रह करने लगे ॥ २३ ॥

ततः स पीत्वामृतकल्पमम्भो भूयो बभूवोत्तमवीर्यतेजाः । उत्पाट्य जग्राह च सोऽम्बुजानि सौगन्धिकान्युत्तमगन्धवन्ति ॥ २४ ॥

तदनन्तर उस सरोवरका अमृतके समान मधुर जल पीकर वे पुनः उत्तम बल और तेजसे सम्पन्न हो गये और श्रेष्ठ सुगन्धसे युक्त सौगन्धिक कमलोंको उखाड़- उखाड़कर संगृहीत करने लगे ॥ २४ ॥

ततस्तु ते क्रोधवशाः समेत्य धनेश्वरं भीमबलप्रणुन्नाः ।

पृष्ठ 1044

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भीमस्य वीर्यं च बलं च संख्ये यथावदाचख्युरतीव भीताः ॥ २५ ॥

तब भीमसेनके बलसे पीड़ित और अत्यन्त भयभीत हुए क्रोधवशोंने धनाध्यक्ष कुबेरके पास जाकर युद्धमें भीमके बल और पराक्रमका यथावत् वृत्तान्त कह सुनाया ॥ २५ ॥

तेषां वचस्तत् तु निशम्य देवः प्रहस्य रक्षांसि ततोऽभ्युवाच । गृह्णातु भीमो जलजानि कामात् कृष्णानिमित्तं विदितं ममैतत् ॥ २६ ॥

उनकी बातें सुनकर देवप्रवर कुबेरने हँसकर उन राक्षसोंसे कहा - ' मुझे यह मालूम है ।

भीमसेनको द्रौपदीके लिये इच्छानुसार कमल ले लेने दो ' ॥ २६ ॥

ततोऽभ्यनुज्ञाप्य धनेश्वरं ते जग्मुः कुरूणां प्रवरं विरोषाः । भीमं च तस्यां ददृशुर्नलिन्यां यथोपजोषं विहरन्तमेकम् ॥ २७ ॥

तब धनाध्यक्षकी आज्ञा पाकर वे राक्षस रोषरहित हो कुरुप्रवर भीमके पास गये और उन्हें अकेले ही उस सरोवरमें इच्छानुसार विहार करते देखा ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौगन्धिकाहरणे चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५४ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें सौगन्धिकाहरणविषयक एक सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५४ ॥

पृष्ठ 1045

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पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः भयंकर उत्पात देखकर युधिष्ठिर आदिकी चिन्ता और सबका गन्धमादन पर्वतपर सौगन्धिकवनमें भीमसेनके पास पहुँचना वैशम्पायन उवाच

ततस्तानि महार्हाणि दिव्यानि भरतर्षभ ।

बहूनि बहुरूपाणि विरजांसि समाददे ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— भरतश्रेष्ठ, तदनन्तर भीमसेनने अनेक प्रकारके बहुमूल्य, दिव्य और निर्मल बहुत से सौगन्धिक कमल संगृहीत कर लिये ॥ १ ॥

ततो वायुर्महान् शीघ्रो नीचैः शर्करकर्षणः ।

प्रादुरासीत् खरस्पर्शः संग्राममभिचोदयन् ॥ २ ॥

इसी समय गन्धमादन पर्वतपर तीव्र वेगसे बड़े जोरकी आँधी उठी, जो नीचे कंकड़-बालूकी वर्षा करनेवाली थी । उसका स्पर्श तीक्ष्ण था । वह किसी भारी संग्रामकी सूचना देनेवाली थी ॥ २ ॥

पपात महती चोल्का सनिर्घाता महाभया ।

निष्प्रभश्चाभवत् सूर्यश्छन्नरश्मिस्तमोवृतः ॥ ३ ॥

वज्रकी गड़गड़ाहटके साथ अत्यन्त भयदायक भारी उल्कापात होने लगा । सूर्य

अन्धकारसे आवृत हो प्रभाशून्य हो गये । उनकी किरणें आच्छादित हो गयीं ॥ ३ ॥

निर्घातश्चाभवद् भीमो भीमे विक्रममास्थिते ।

चचाल पृथिवी चापि पांसुवर्षं पपात च ॥ ४ ॥

जिस समय भीम राक्षसोंके साथ युद्धमें भारी पराक्रम दिखा रहे थे, उस समय पृथ्वी हिलने लगी, आकाशमें भीषण गर्जना होने लगी और धूलकी वर्षा आरम्भ हो गयी ॥ ४ ॥

सलोहिता दिशश्चासन् खरवाचो मृगद्विजाः ।

तमोवृतमभूत् सर्वं न प्राज्ञायत किंचन ॥ ५ ॥

सम्पूर्ण दिशाएँ लाल हो गयी, मृग और पक्षी कठोर शब्द करने लगे, सारा जगत् अन्धकारसे आच्छन्न हो गया और किसीको कुछ भी सूझ नहीं पड़ता था ॥ ५ ॥

अन्ये च बहवो भीमा उत्पातास्तत्र जज्ञिरे ।

तदद्भुतमभिप्रेक्ष्य धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ६ ॥

उवाच वदतां श्रेष्ठः कोऽस्मानभिभविष्यति ।

सज्जीभवत भद्रं वः पाण्डवा युद्धदुर्मदाः ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1046

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यथारूपाणि पश्यामि स्वभ्यग्रो नः पराक्रमः ।

एवमुक्त्वा ततो राजा वीक्षाञ्चक्रे समन्ततः ॥ ८ ॥

इसके सिवा और भी बहुत- से भयानक उत्पात वहाँ प्रकट होने लगे । यह अद्भुत घटना देखकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ धर्मपुत्र युधिष्ठिरने कहा - ' कौन हम लोगोंको पराजित कर सकेगा? रणोन्मत्त पाण्डवो! तुम्हारा भला हो, तुम युद्धके लिये तैयार हो जाओ । मैं जैसे लक्षण देख रहा हूँ, उससे पता लगता है कि हमारे लिये पराक्रम दिखानेका समय अत्यन्त निकट आ गया है । ' ऐसा कहकर राजा युधिष्ठिरने चारों ओर दृष्टिपात किया ॥ ६–८ ॥

अपश्यमानो भीमं तु धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।

ततः कृष्णां यमौ चापि समीपस्थावरिंदमः ॥ ९ ॥

पप्रच्छ भ्रातरं भीमं भीमकर्माणमाहवे ।

कच्चित् क्व भीमः पाञ्चालि किंचित् कृत्यं चिकीर्षति ॥ १० ॥

जब भीम नहीं दिखायी दिये, तब शत्रुदमन धर्मनन्दन युधिष्ठिरने द्रौपदी तथा पास ही बैठे हुए नकुल-सहदेवसे अपने भाई भीमके सम्बन्धमें, जो रणभूमिमें भयानक कर्म करनेवाले थे, पूछा —‘ पांचाल - राजकुमारी! भीमसेन कहाँ है? क्या वे कोई काम करना चाहते हैं? ॥ ९ -१० ॥

कृतवानपि वा वीरः साहसं साहसप्रियः ।

इमे ह्यकस्मादुत्पाता महासमरदर्शनाः ॥ ११ ॥

‘ अथवा साहसप्रेमी वीरवर भीमने कोई साहसका कार्य तो नहीं कर डाला? यह अकस्मात् प्रकट हुए उत्पात महान् युद्धके सूचक हैं ॥ ११ ॥

दर्शयन्तो भयं तीव्रं प्रादुर्भूताः समन्ततः ।

तं तथावादिनं कृष्णा प्रत्युवाच मनस्विनी ।

प्रिया प्रियं चिकीर्षन्ती महिषी चारुहासिनी ॥ १२ ॥

' ये चारों ओर तीव्र भयका प्रदर्शन करते हुए प्रकट हो रहे हैं । ' धर्मराज युधिष्ठिरको ऐसी बातें करते देख मनोहर मुसकानवाली मनस्विनी महारानी पतिप्रिया द्रौपदीने उनका प्रिय करनेकी इच्छासे इस प्रकार उत्तर दिया ॥ द्रौपद्युवाच

यत् तत् सौगन्धिकं राजन्नाहृतं मातरिश्वना ।

तन्मया भीमसेनस्य प्रीतयाद्योपपादितम् ॥ १३ ॥

अपि चोक्तो मया वीरो यदि पश्येर्बहून्यपि ।

तानि सर्वाण्युपादाय शीघ्रमागम्यतामिति ॥ १४ ॥

द्रौपदी बोली - राजन्! आज जो सौगन्धिक पुष्प वायु उड़ा लायी थी, उसे मैंने प्रसन्नतापूर्वक भीमसेनको दिया और उन वीरशिरोमणिसे यह भी कहा कि ‘ यदि इसी

पृष्ठ 1047

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तरहके बहुत-से पुष्प तुम्हें दिखायी दें, तो उन सबको लेकर शीघ्र यहाँ लौट आना' ॥ १३-१४ ॥ स तु नूनं महाबाहुः प्रियार्थं मम पाण्डवः प्रागुदीचीं दिशं राजंस्तान्याहर्तुमितो गतः ॥ १५ ॥

महाराज! मालूम होता है कि वे महाबाहु पाण्डुकुमार निश्चय ही मेरा प्रिय करनेके लिये उन्हीं फूलोंको लानेके निमित्त यहाँसे पूर्वोत्तर दिशाको गये हैं ॥ १५ ॥

उक्तस्त्वेवं तया राजा यमाविदमथाब्रवीत् ।

गच्छाम सहितास्तूर्णं येन यातो वृकोदरः ॥ १६ ॥

द्रौपदीके ऐसा कहनेपर राजा युधिष्ठिरने नकुल सहदेवसे इस प्रकार कहा — ' अब हम लोग भी एक साथ शीघ्र ही उस मार्गपर चलें ' जिससे भीमसेन गये हैं ॥ १६ ॥

वहन्तु राक्षसा विप्रान् यथाश्रान्तान् यथाकृशान् ।

त्वमप्यमरसंकाश वह कृष्णां घटोत्कच ॥ १७ ॥

‘ देवताओंके समान तेजस्वी घटोत्कच! तुम्हारे साथी राक्षस लोग इन ब्राह्मणोंको, जो जैसे थके और दुर्बल हों, उसके अनुसार कंधेपर बिठाकर ले चलें और तुम भी द्रौपदीको ले चलो ॥ १७ ॥

व्यक्तं दूरमितो भीमः प्रविष्ट इति मे मतिः ।

चिरं च तस्य कालोऽयं स च वायुसमो जवे ॥ १८ ॥

तरस्वी वैनतेयस्य सदृशो भुवि लंघने ।

उत्पतेदपि चाकाशं निपतेच्च यथेच्छकम् ॥ १ ९ ॥

‘ यह स्पष्ट जान पड़ता है कि भीमसेन यहाँसे बहुत दूर चले गये हैं, मेरा यही विश्वास है । क्योंकि उनको गये बहुत समय हो गया है तथा वे वेगमें वायुके समान हैं और इस पृथ्वीको लाँघनेमें गरुड़के समान शीघ्रगामी हैं । वे आकाशमें छलाँग मार सकते हैं और इच्छानुसार कहीं भी कूद सकते हैं ॥ १८-१९ ॥

तमन्वियाम भवतां प्रभावाद् रजनीचराः ।

पुरा स नापराध्नोति सिद्धानां ब्रह्मवादिनाम् ॥ २० ॥

‘ निशाचरो! भीमसेन ब्रह्मवादी सिद्धोंका कुछ अपराध न कर पावें, इसके पहले ही तुम्हारे प्रभावसे हम उन्हें ढूँढ़ निकालें' ॥ २० ॥

तथेत्युक्त्वा तु ते सर्वे हैडिम्बप्रमुखास्तदा ।

उद्देशज्ञाः कुबेरस्य नलिन्या भरतर्षभ ॥ २१ ॥

आदाय पाण्डवांश्चैव तांश्च विप्राननेकशः ।

लोमशेनैव सहिताः प्रययुः प्रीतमानसाः ॥ २२ ॥

जनमेजय! तब कुबेरके उस सरोवरका पता जाननेवाले उन घटोत्कच आदि सब राक्षसोंने ‘ तथास्तु ' कहकर पाण्डवों तथा उन अनेकानेक ब्राह्मणोंको कंधेपर बैठाकर

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लोमशजीके साथ वहाँसे प्रसन्नतापूर्वक प्रस्थान किया ॥ २१-२२ ॥ ते सर्वे त्वरिता गत्वा ददृशुः शुभकाननाम् पद्मसौगन्धिकवतीं नलिनीं सुमनोरमाम् ॥ २३ ॥

उन सबने शीघ्रतापूर्वक जाकर सुन्दर वनस्थली से सुशोभित वह अत्यन्त मनोरम सरोवर देखा, जिसमें सौगन्धिक कमल थे ॥ २३ ॥

तं च भीमं महात्मानं तस्यास्तीरे मनस्विनम् ।

ददृशुर्निहतांश्चैव यक्षांश्च विपुलेक्षणान् ॥ २४ ॥

भिन्नकायाक्षिबाहूरून् संचूर्णितशिरोधरान् ।

तं च भीमं महात्मानं तस्यास्तीरे व्यवस्थितम् ॥ २५ ॥

उसके तटपर मनस्वी महामना भीमको तथा उनके द्वारा मारे गये बड़े - बड़े नेत्रोंवाले यक्षोंको भी देखा — जिनके शरीर, नेत्र, भुजाएँ और जाँघें छिन्न-भिन्न हो गयी थीं, गर्दन कुचल दी गयी थी, महात्मा भीम उस सरोवरके तटपर खड़े थे ॥ २४-२५ ॥

सक्रोधं स्तब्धनयनं संदष्टदशनच्छदम् ।

उद्यम्य च गदां दोर्भ्यां नदीतीरेष्ववस्थितम् ॥ २६ ॥

उनका क्रोध शान्त नहीं हुआ था । उनकी आँखें स्तब्ध हो रही थीं । वे दोनों हाथोंसे गदा उठाये और दाँतोंसे ओठ दबाये नदीके तटपर खड़े थे ॥ २६ ॥

प्रजासंक्षेपसमये दण्डहस्तमिवान्तकम् ।

तं दृष्ट्वा धर्मराजस्तु परिष्वज्य पुनः पुनः ॥ २७ ॥

उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता था, मानो प्रजाके संहारकालमें दण्ड हाथमें लिये यमराज खड़े हों । भीमसेनको उस अवस्थामें देखकर धर्मराजने उन्हें बार-बार हृदयसे लगाया ॥ २७ ॥

उवाच श्लक्ष्णया वाचा कौन्तेय किमिदं कृतम् ।

साहसं बत भद्रं ते देवानामथ चाप्रियम् ॥ २८ ॥

और मधुर वाणीमें कहा -' कुन्तीनन्दन! यह तुमने क्या कर डाला? तुम्हारा कल्याण हो । खेदके साथ कहना पड़ता है कि तुम्हारा यह कार्य साहसपूर्ण है और देवताओंके लिये अप्रिय है ॥ २८ ॥

पुनरेवं न कर्तव्यं मम चेदिच्छसि प्रियम् ।

अनुशिष्य तु कौन्तेयं पद्मानि परिगृह्य च ॥ २ ९ ॥

तस्यामेव नलिन्यां तु विजहुरमरोपमाः ।

एतस्मिन्नेव काले तु प्रगृहीतशिलायुधाः ॥ ३० ॥

प्रादुरासन् महाकायास्तस्योद्यानस्य रक्षिणः ।

ते दृष्ट्वा धर्मराजानं महर्षिं चापि लोमशम् ॥ ३१ ॥

नकुलं सहदेवं च तथान्यान् ब्राह्मणर्षभान् ।

पृष्ठ 1049

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विनयेन नताः सर्वे प्रणिपत्य च भारत ॥ ३२ ॥

सान्त्विता धर्मराजेन प्रसेदुः क्षणदाचराः ।

विदिताश्च कुबेरस्य तत्र ते कुरुपुङ्गवाः ॥ ३३ ॥

ऊषुर्नातिचिरं कालं रममाणाः कुरूद्वहाः ।

प्रतीक्षमाणा बीभत्सुं गन्धमादनसानुषु ॥ ३४ ॥

' यदि मेरा प्रिय करना चाहते हो तो फिर ऐसा काम न करना । ' भीमसेनको ऐसा उपदेश देकर उन्होंने पूर्वोक्त सौगन्धिक कमल ले लिये और वे देवोपम पाण्डव उसी सरोवरके तटपर इधर- उधर भ्रमण करने लगे । इसी समय शिलाओंको आयुधरूपमें ग्रहण किये, बहुत- से विशालकाय उद्यानरक्षक वहाँ प्रकट हो गये । भारत! उन्होंने धर्मराज युधिष्ठिर, महर्षि लोमश, नकुल सहदेव तथा अन्यान्य श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको विनयपूर्वक नतमस्तक होकर प्रणाम किया । फिर धर्मराज युधिष्ठिरने उन्हें सान्त्वना दी । इससे वे निशाचर ( राक्षस ) प्रसन्न हो गये । तदनन्तर वे कुरुप्रवर पाण्डव धनाध्यक्ष कुबेरकी जानकारीमें कुछ कालतक वहाँ आनन्दपूर्वक टिके रहे और गन्धमादन पर्वतके शिखरोंपर अर्जुनके आगमनकी प्रतीक्षा करते रहे ॥ २ ९ -३४ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौगन्धिकाहरणे पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें सौगन्धिकाहरणविषयक एक सौ पचपनवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १५५ ॥

पृष्ठ 1050

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षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः पाण्डवोंका आकाशवाणीके आदेशसे पुन: नर- नारायणाश्रममें लौटना वैशम्पायन उवाच

तस्मिन् निवसमानोऽथ धर्मराजो युधिष्ठिरः ।

कृष्णया सहितान् भ्रातॄनित्युवाच सहद्विजान् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! उस सौगन्धिक सरोवरके तटपर निवास करते हुए धर्मराज युधिष्ठिरने एक दिन ब्राह्मणों तथा द्रौपदीसहित अपने भाइयोंसे इस प्रकार कहा ॥ १ ॥

दृष्टानि तीर्थान्यस्माभिः पुण्यानि च शिवानि च ।

मनसो ह्लादनीयानि वनानि च पृथक् पृथक् ॥ २ ॥

'हम लोगोंने अनेक पुण्यदायक एवं कल्याण- स्वरूप तीर्थोंके दर्शन किये । मनको आह्लाद प्रदान करनेवाले भिन्न -भिन्न वनोंका भी अवलोकन किया ॥ २ ॥

देवैः पूर्वं विचीर्णानि मुनिभिश्च महात्मभिः ।

यथाक्रमविशेषेण द्विजैः सम्पूजितानि च ॥ ३ ॥

‘ वे तीर्थ और वन ऐसे थे, जहाँ पूर्वकालमें देवता और महात्मा, मुनि विचरण कर चुके हैं तथा क्रमशः अनेक द्विजोंने उनका समादर किया है ॥ ३ ॥

ऋषीणां पूर्वचरितं तथा कर्म विचेष्टितम् ।

राजर्षीणां च चरितं कथाश्च विविधाः शुभाः ॥ ४ ॥

शृण्वानास्तत्र तत्र स्म आश्रमेषु शिवेषु च ।

अभिषेकं द्विजैः सार्धं कृतवन्तो विशेषतः ॥ ५ ॥

‘ हमने ऋषियोंके पूर्वचरित्र, कर्म और चेष्टाओंकी कथा सुनी है। राजर्षियोंके भी चरित्र और भाँति - भाँतिकी शुभ कथाएँ सुनते हुए मंगलमय आश्रमोंमें विशेषतः ब्राह्मणोंके साथ तीर्थस्नान किया है ॥ ४-५ ॥

अर्चिताः सततं देवाः पुष्पैरद्भिः सदा च वः ।

यथालब्धैर्मूलफलैः पितरश्चापि तर्पिताः ॥६ ॥

' हमने सदा फूल और जलसे देवताओंकी पूजा की है और यथाप्राप्त फल- मूलसे पितरोंको भी तृप्त किया है ॥ ६ ॥

पर्वतेषु च रम्येषु सर्वेषु च सरस्सु च ।

उदधौ च महापुण्ये सूपस्पृष्टं महात्मभिः ॥ ७ ॥