02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 1071–1080

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1071–1080

पृष्ठ 1071

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चकोरैः शतपत्रैश्च भृङ्गराजैस्तथा शुकैः ॥ ५२ ॥

कोकिलैः कलविङ्कैश्च हारितैर्जीवजीविकैः ।

प्रियकैश्चातकैश्चैव तथान्यैर्विविधैः खगैः ॥ ५३ ॥

श्रोत्ररम्यं सुमधुरं कूजद्भिश्चात्यधिष्ठितान् ।

सरांसि च मनोज्ञानि समन्ताज्जलचारिभिः ॥ ५४ ॥

कुमुदैः पुण्डरीकैश्च तथा कोकनदोत्पलैः ।

कह्लारैः कमलैश्चैव आचितानि समन्ततः ॥ ५५ ॥

कादम्बैश्चक्रवाकैश्च कुररैर्जलकुक्कुटैः ।

कारण्डवैः प्लवैर्हंसैर्बकैर्मद्गुभिरेव च ॥ ५६ ॥

एतैश्चान्यैश्च कीर्णानि समन्ताज्जलचारिभिः ।

हृष्टैस्तथा तामरसरसासवमदालसैः ॥ ५७ ॥

इन वृक्षोंपर निवास करनेवाले चकोर, मोर, भृंगराज, तोते, कोयल, कलविंक ( गौरैया-चिड़िया ), हारीत ( हारिल), चकवा, प्रियक, चातक तथा दूसरे नाना प्रकारके पक्षी, श्रवणसुखद मधुर शब्द बोल रहे थे । वहाँ चारों ओर जलचर जन्तुओंसे भरे हुए मनोहर सरोवर दृष्टिगोचर होते थे। जिनमें कुमुद, पुण्डरीक, कोकनद, उत्पल, कह्लार और कमल सब ओर व्याप्त थे । कादम्ब, चक्रवाक, कुरर, जलकुक्कुट, कारण्डव, प्लव, हंस, बक, मद्गु तथा अन्य कितने ही जलचर पक्षी कमलोंके मकरन्दका पान करके मदसे मतवाले और हर्षसे मुग्ध हुए उन सरोवरोंमें सब ओर फैले थे ॥ ५२–५७ ॥

पद्मोदरच्युतरजःकिंजल्कारुणरञ्जितैः ।

मञ्जुस्वरैर्मधुकरैर्विरुतान् कमलाकरान् ॥ ५८ ॥

कमलोंसे भरे हुए तालाबोंमें मीठे स्वरसे बोलनेवाले भ्रमरोंके शब्द गूँज रहे थे । वे भ्रमर कमलके भीतरसे निकली हुई रज तथा केसरोंसे लाल रंगमें रँगे - से जान पड़ते थे ॥ ५८ ॥

अपश्यंस्ते नरव्याघ्रा गन्धमादनसानुषु ।

तथैव पद्मषण्डैश्च मण्डितांश्च समन्ततः ॥ ५ ९ ॥

इस प्रकार वे नरश्रेष्ठ गन्धमादनके शिखरोंपर पद्मषण्डमण्डित तालाबोंको सब ओर देखते हुए आगे बढ़ रहे थे ॥ ५ ९ ॥

शिखण्डिनीभिः सहिताँल्लतामण्डलकेषु च ।

मेघतूर्यरवोद्दाममदनाकुलितान् भृशम् ॥ ६० ॥

कृत्वैव केकामधुरं संगीतं मधुरस्वरम् ।

चित्रान् कलापान् विस्तीर्य सविलासान् मदालसान् ॥ ६१ ॥

मयूरान् ददृशुर्हृष्टान् नृत्यतो वनलालसान् ।

कांश्चित् प्रियाभिःसहितान् रममाणान् कलापिनः ॥ ६२ ॥

वल्लीलतासंकटेषु कुटजेषु स्थितांस्तथा ।

पृष्ठ 1072

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कांश्चिच्च कुटजानां तु विटपेषूत्कटानिव ॥ ६३ ॥

कलापरुचिराटोपनिचितान् मुकुटानिव ।

विवरेषु तरूणां च रुचिरान् ददृशुश्च ते ॥ ६४ ॥

वहाँ लता- मण्डपोंमें मोरिनियोंके साथ नाचते हुए मोर दिखायी देते थे । जो मेघोंकी मृदंगतुल्य गम्भीर गर्जना सुनकर उद्दाम कामसे अत्यन्त उन्मत्त हो रहे थे । वे अपनी मधुर केकाध्वनिका विस्तार करके मीठे स्वरमें संगीतकी रचना करते थे और अपनी विचित्र पाँखें फैलाकर विलासयुक्त मदालसभावसे वनविहारके लिये उत्सुक हो प्रसन्नताके साथ नाच रहे थे । कुछ मोर लतावल्लरियोंसे व्याप्त कुटजवृक्षोंके कुञ्जोंमें स्थित हो अपनी प्यारी मोरिनियोंके साथ रमण करते थे और कुछ कुटजोंकी डालियोंपर मदमत्त होकर बैठे थे तथा अपनी सुन्दर पाँखोंके घटाटोपसे युक्त हो मुकुटके समान जान पड़ते थे । कितने ही सुन्दर

मोर वृक्षोंके कोटरोंमें बैठे थे । पाण्डवोंने उन सबको देखा ॥ ६०–६४ ॥

सिन्धुवारांस्तथोदारान् मन्मथस्येव तोमरान् ।

सुवर्णवर्णकुसुमान् गिरीणां शिखरेषु च ॥ ६५ ॥

पर्वतोंके शिखरोंपर अधिकाधिक संख्यामें सुनहरे कुसुमोंसे सुशोभित सुन्दर शेफालिकाके * ‘ पौधे दिखायी देते थे, जो कामदेवके तोमर नामक बाण से प्रतीत होते थे ॥ ६५ ॥

कर्णिकारान् विकसितान् कर्णपूरानिवोत्तमान् ।

तथापश्यन् कुरबकान् वनराजिषु पुष्यितान् ॥ ६६ ॥

कामवश्यौत्सुक्यकतन् कामस्येव शरोत्करान् ।

तथैव वनराजीनामुदारान् रचितानिव ॥ ६७ ॥

विराजमानांस्तेऽपश्यंस्तिलकांस्तिलकानिव ।

तथानङ्गशराकारान् सहकारान् मनोरमान् ॥ ६८ ॥

अपश्यन् भ्रमरारावान् मञ्जरीभिर्विराजितान् ।

हिरण्यसदृशैः पुष्पैर्दावाग्निसदृशैरपि ॥ ६ ९ ॥

लोहितैरञ्जनाभैश्च वैदूर्यसदृशैरपि ।

अतीव वृक्षा राजन्ते पुष्पिताः शैलसानुषु ॥ ७० ॥

खिले हुए कनेरके फूल उत्तम कर्णपूरके समान प्रतीत होते थे । इसी प्रकार वन- श्रेणियोंमें विकसित कुरबक नामक वृक्ष भी उन्होंने देखे, जो कामासक्त पुरुषोंको उत्कण्ठित करनेवाले कामदेवके बाणसमूहोंके समान जान पड़ते थे । इसी प्रकार उन्हें तिलकके वृक्ष दृष्टिगोचर हुए, जो वनश्रेणियोंके ललाटमें रचित सुन्दर तिलकके समान शोभा पा रहे थे । कहीं मनोहर मंजरियोंसे विभूषित मनोरम आम्रवृक्ष दीख पड़ते थे, जो कामदेवके बाणोंकी - सी आकृति धारण करते थे । उनकी डालियोंपर भौंरोंकी भीड़ गूँजती रहती थी । उन पर्वतोंके शिखरोंपर कितने ही ऐसे वृक्ष थे, जिनमें सुवर्णके समान सुन्दर

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महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1073 का मूल पृष्ठ
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पुष्प खिले थे । कुछ वृक्षोंके पुष्प देखनेमें दावानलका भ्रम उत्पन्न करते थे। किन्हीं वृक्षोंके फूल लाल, काले तथा वैदूर्यमणिके सदृश धूमिल थे । इस प्रकार पर्वतीय शिखरोंपर विभिन्न प्रकारके पुष्पोंसे विभूषित वृक्ष बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ ६६–७० ॥

तथा शालांस्तमालांश्च पाटलान् बकुलानपि ।

माला इव समासक्ताः शैलानां शिखरेषु च ॥ ७१ ॥

इसी तरह शाल, तमाल, पाटल और बकुल आदि वृक्ष उन शैलशिखरोंपर धारण की हुई मालाकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ ७१ ॥

विमलस्फाटिकाभानि पाण्डुरच्छदनैर्द्विजैः ।

कलहंसैरुपेतानि सारसाभिरुतानि च ॥ ७२ ॥

सरांसिबहुशः पार्थाः पश्यन्तः शैलसानुषु ।

पद्मोत्पलविमिश्राणि सुखशीतजलानि च ॥ ७३ ॥

पाण्डवोंने पर्वतीय शिखरोंपर बहुत से ऐसे सरोवर देखे, जो निर्मल स्फटिकमणिके समान सुशोभित थे । उनमें सफेद पाँखवाले पक्षी कलहंस आदि विचरते तथा सारस कलरव करते थे । कमल और उत्पल- पुष्पोंसे संयुक्त उन सरोवरोंमें सुखद एवं शीतल जल भरा था ॥ ७२-७३ ॥

एवं क्रमेण ते वीरा वीक्षमाणाः समन्ततः ।

गन्धवन्त्यथ माल्यानि रसवन्ति फलानि च ॥ ७४ ॥

सरांसि च मनोज्ञानि वृक्षांश्चातिमनोरमान् ।

विविशुः पाण्डवाः सर्वे विस्मयोत्फुल्ललोचनाः ॥ ७५ ॥

इस प्रकार वे वीर पाण्डव चारों ओर सुगन्धित पुष्पमालाएँ, सरस फल, मनोहर सरोवर और मनोरम वृक्षावलियोंको क्रमशः देखते हुए गन्धमादन पर्वतके वनमें प्रविष्ट हुए । वहाँ पहुँचनेपर उन सबकी आँखें आश्चर्यसे खिल उठीं ॥ ७४-७५ ॥

कमलोत्पलकह्लारपुण्डरीकसुगन्धिना ।

सेव्यमाना वने तस्मिन् सुखस्पर्शेन वायुना ॥ ७६ ॥

उस समय कमल, उत्पल, कह्लार और पुण्डरीककी सुन्दर गन्ध लिये मन्द मधुर वायु उस वनमें मानो उन्हें व्यजन डुलाती थी ॥ ७६ ॥

ततो युधिष्ठिरो भीममाहेदं प्रीतिमद् वचः ।

अहो श्रीमदिदं भीम गन्धमादनकाननम् ॥ ७७ ॥

तदनन्तर युधिष्ठिरने भीमसेनसे प्रसन्नतापूर्ण यह बात कही - ' भीम! यह गन्धमादन-कानन कितना सुन्दर और कैसा अद्भुत है? ॥ ७७ ॥

वने ह्यस्मिन् मनोरम्ये दिव्याः काननजा द्रुमाः ।

लताश्च विविधाकाराः पत्रपुष्पफलोपगाः ॥ ७८ ॥

पृष्ठ 1074

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‘ इस मनोरम वनके वृक्ष और नाना प्रकारकी लताएँ दिव्य हैं । इन सबमें पत्र, पुष्प और फलोंकी बहुतायत है ॥ ७८ ॥

भान्त्येते पुष्पविकचाः पुंस्कोकिलकुलाकुलाः ।

नात्र कण्टकिनः केचिन्न च विद्यन्त्यपुष्पिताः ॥ ७ ९ ॥

‘ ये सभी वृक्ष फूलोंसे लदे हैं । कोकिल- कुलसे अलंकृत हैं । इस वनमें कोई भी वृक्ष ऐसे नहीं हैं, जिनमें काँटे हों और जो खिले न हों ॥ ७९ ॥

स्निग्धपत्रफला वृक्षा गन्धमादनसानुषु ।

भ्रमरारावमधुरा नलिनीः फुल्लपङ्कजाः ॥ ८० ॥

गन्धमादनके शिखरोंपर जितने वृक्ष हैं, उन सबके पत्र और फल चिकने हैं । सभी भ्रमरोंके मधुर गुंजारवसे मनोहर जान पड़ते हैं । यहाँके सरोवरोंमें कमल खिले हुए हैं ॥ ८० ॥

विलोड्यमानाः पश्येमाः करिभिः सकरेणुभिः ।

पश्येमां नलिनीं चान्यां कमलोत्पलमालिनीम् ॥ ८१ ॥

स्रग्धरां विग्रहवतीं साक्षाच्छ्रियमिवापराम् ।

नानाकुसुमगन्धाढ्यास्तस्येमाः काननोत्तमे ॥ ८२ ॥

उपगीयमाना भ्रमरै राजन्ते वनराजयः ।

पश्य भीम शुभान् देशान् देवाक्रीडान् समन्ततः ॥ ८३ ॥

‘ देखो, हथिनियोंसहित हाथी इन तालाबोंमें घुसकर इन्हें मथे डालते हैं और इस दूसरी पुष्करिणीपर दृष्टिपात करो, जो कमल और उत्पलकी मालाओंसे अलंकृत है । यह कमलमालाधारिणी साक्षात् दूसरी लक्ष्मीके समान मानो साकार विग्रह धारण करके प्रकट हुई है । गन्धमादनके इस उत्तम वनमें नाना प्रकारके कुसुमोंकी सुगन्धसे सुवासित ये छोटी-छोटी वनश्रेणियाँ भ्रमरोंके गीतोंसे मुखरित हो कैसी शोभा पा रही हैं? भीमसेन! देखो, यहाँके सुन्दर प्रदेशोंमें चारों ओर देवताओंकी क्रीडास्थली है ॥ ८१-८३ ॥

अमानुषगतिं प्राप्ताः संसिद्धाः स्म वृकोदर ।

लताभिः पुष्पिताग्राभिः पुष्पिताः पादपोत्तमाः ॥ ८४ ॥

संश्लिष्टाः पार्थ शोभन्ते गन्धमादनसानुषु । ' वृकोदर! हमलोग ऐसे स्थानपर आ गये हैं, जो मानवोंके लिये अगम्य है । जान पड़ता है हम सिद्ध हो गये हैं । कुन्तीनन्दन! गन्धमादनके शिखरोंपर ये फूलोंसे भरे हुए उत्तम वृक्ष इन पुष्पित लताओंसे अलंकृत होकर कैसी शोभा पा रहे हैं? ॥ ८४ ॥

शिखण्डिनीभिश्चरतां सहितानां शिखण्डिनाम् ॥ ८५ ॥

नदतां शृणु निर्घोषं भीम पर्वतसानुषु । ‘ भीम! इन पर्वतशिखरोंपर मोरिनियोंके साथ विचरते बोलते हुए मोरोंका यह मधुर केकारव तो सुनो ॥ ८५३ ॥

पृष्ठ 1075

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चकोराः शतपत्राश्च मत्तकोकिलसारिकाः ॥ ८६ ॥

पत्रिणः पुष्पितानेतान् संपतन्ति महाद्रुमान् । ‘ ये चकोर, शतपत्र, मदोन्मत्त कोकिल और सारिका आदि पक्षी इन पुष्पमण्डित विशाल वृक्षोंकी ओर कैसे उड़े जा रहे हैं? ॥ ८६३ ॥

रक्तपीतारुणाः पार्थ पादपाग्रगताः खगाः ॥ ८७ ॥

परस्परमुदीक्षन्ते बहवो जीवजीवकाः । ‘ पार्थ! वृक्षोंकी ऊँची शिखाओंपर बैठे हुए लाल, गुलाबी और पीले रंगके चकोर पक्षी एक - दूसरेकी ओर देख रहे हैं ॥ ८७३ ॥

हरितारुणवर्णानां शाद्वलानां समीपतः ॥ ८८ ॥

सारसाः प्रतिदृश्यन्ते शैलप्रस्रवणेष्वपि । उधर हरी और लाल घासोंके समीप पर्वतीय झरनोंके पास सारस दिखायी देते हैं ॥ ८८ ॥

वदन्ति मधुरा वाचः सर्वभूतमनोरमाः ॥ ८ ९ ॥ भृङ्गराजोपचक्राश्च लोहपृष्ठाः पतत्त्रिणः । ‘ भृंगराज, उपचक्र ( चक्रवाक ) और लोहपृष्ठ ( कंक ) नामक पक्षी ऐसी मीठी बोली बोलते हैं, जो समस्त प्राणियोंके मनको मोह लेती है ॥ ८ ९ ३ ॥ चतुर्विषाणाः पद्माभाः कुञ्जराः सकरेणवः ॥ ९० ॥

एते वैदूर्यवर्णाभं क्षोभयन्ति महत् सरः । ' इधर देखो, ये कमलके समान कान्तिवाले गजराज, जिनके चार दाँत शोभा पा रहे हैं, हथिनियोंके साथ आकर वैदूर्यमणिके समान सुशोभित इस महान् सरोवरको मथे डालते हैं ॥ ९० ३ ॥ बहुतालसमुत्सेधाः शैलशृङ्गपरिच्युताः ॥ ९ १ ॥ नानाप्रस्रवणेभ्यश्च वारिधाराः पतन्ति च । ‘ अनेक झरनोंसे जलकी धाराएँ गिर रही हैं। जिनकी ऊँचाई कई ताड़के बराबर है और ये पर्वतके सर्वोच्च शिखरसे नीचे गिरती हैं ॥ ९ १३ ॥ भास्कराभाः प्रभाभिश्च शारदाभ्रघनोपमाः ॥ ९ २ ॥

शोभयन्ति महाशैलं नानारजतधातवः ।

क्वचिदञ्जनवर्णाभाः क्वचित् काञ्चनसन्निभाः ॥ ९ ३ ॥

‘ नाना प्रकारके रजतमय धातु इस महान् पर्वतकी शोभा बढ़ा रहे हैं । इनमेंसे कुछ तो अपनी प्रभाओंसे भगवान् भास्करके समान प्रकाशित होते हैं और कुछ शरद्- ऋतुके श्वेत बादलोंके समान सुशोभित हो रहे हैं । कहीं काजलके समान काले और सुवर्णके समान पीले रंगके धातु दीख पड़ते हैं ॥ ९ २ - ९ ३ ॥

पृष्ठ 1076

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1076 का मूल पृष्ठ
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धातवो हरितालस्य क्वचिद्धिङ्गुलकस्य च ।

मनःशिलागुहाश्चैव सन्ध्याभ्रनिकरोपमाः ॥ ९ ४ ॥

' कहीं हरितालसम्बन्धी धातु हैं और कहीं हिंगुलसम्बन्धी । कहीं मैनसिलकी गुफाएँ हैं, जो संध्याकालीन लाल बादलोंके समान जान पड़ती हैं ॥ ९ ४ ॥

शशलोहितवर्णाभाः क्वचिद्गैरिकधातवः ।

सितासिताभ्रप्रतिमा बालसूर्यसमप्रभाः ॥ ९ ५ ॥

' कहीं गेरु नामक धातु हैं, जिनकी कान्ति लाल खरगोशके समान दिखायी देती है । कोई धातु श्वेत बादलोंके समान हैं, तो कोई काले मेघोंके समान । कोई प्रातःकालके सूर्यकी भाँति लाल रंगके हैं ॥ ९ ५ ॥

एते बहुविधाः शैलं शोभयन्ति महाप्रभाः ।

गन्धर्वाः सह कान्ताभिर्यथोक्तं वृषपर्वणा ॥ ९ ६ ॥

दृश्यन्ते शैलशृङ्गेषु पार्थ किम्पुरुषैः सह । ‘ ये नाना प्रकारकी परम कान्तिमान् धातु समूचे शैलकी शोभा बढाती हैं । पार्थ! जिस प्रकार वृषपर्वाने कहा था उसी प्रकार इन पर्वतीय शिखरोंपर अपनी प्रेयसी अप्सराओं तथा किम्पुरुषोंके साथ गन्धर्व दृष्टिगोचर होते हैं ॥ ९ ६३ ॥ गीतानां समतालानां तथा साम्नां च निःस्वनः ॥ ९ ७ ॥

श्रूयते बहुधा भीम सर्वभूतमनोहरः ।

महागङ्गामुदीक्षस्व पुण्यां देवनदीं शुभाम् ॥ ९ ८ ॥

‘ भीमसेन! यहाँ सम तालसे गाते हुए गीतों तथा साममन्त्रोंका विविध स्वर सुनायी पड़ता है, जो सम्पूर्ण भूतोंके चित्तको आकर्षित करनेवाला है । यह परम पवित्र एवं कल्याणमयी देवनदी महागंगा हैं, इनका दर्शन करो ॥

कलहंसगणैर्जुष्टामृषिकिन्नरसेविताम् ।

धातुभिश्च सरिद्भिश्च किन्नरैर्मृगपक्षिभिः ॥ ९९ ॥

गन्धर्वैरप्सरोभिश्च काननैश्च मनोरमैः ।

व्यालैश्च विविधाकारैः शतशीर्षैः समन्ततः ॥ १०० ॥

उपेतं पश्य कौन्तेय शैलराजमरिन्दम । ‘ यहाँ हंसोंके समुदाय निवास करते हैं तथा ऋषि एवं किन्नरगण सदा इन ( गंगाजी ))-का-सेवन करते हैं । शत्रुदमन भीम! भाँति- भाँतिके धातुओं, नदियों, किन्नरों, मृगों, पक्षियों, गन्धर्वों, अप्सराओं, मनोरम काननों तथा सौ मस्तकवाले भाँति- भाँतिके सर्पोंसे सम्पन्न इस पर्वतराजका दर्शन करो ' ॥ ९९ -१००३ ॥ वैशम्पायन उवाच ते प्रीतमनसः शूराः प्राप्ता गतिमनुत्तमाम् ॥ १०१ ॥

पृष्ठ 1077

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1077 का मूल पृष्ठ
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वैशम्पायनजी कहते हैं - इस प्रकार वे शूरवीर पाण्डव हर्षपूर्ण हृदयसे अपने परम उत्तम लक्ष्य स्थानको पहुँच गये ॥ १०१ ॥

नातृप्यन् पर्वतेन्द्रस्य दर्शनेन परन्तपाः ।

उपेतमथ माल्यैश्च फलवद्भिश्च पादपैः ॥ १०२ ॥

आर्ष्टिषेणस्य राजर्षेराश्रमं ददृशुस्तदा । गिरिराज गन्धमादनका दर्शन करनेसे उन्हें तृप्ति नहीं होती थी । तदनन्तर परंतप पाण्डवोंने पुष्पमालाओं तथा फलवान् वृक्षोंसे सम्पन्न राजर्षि आर्ष्टिषेणका आश्रम देखा ॥ १०२ ॥

ततस्ते तिग्मतपसं कृशं धमनिसंततम् ।

पारगं सर्वधर्माणामार्ष्टिषेणमुपागमन् ॥ १०३ ॥

फिर वे कठोर तपस्वी दुर्बलकाय तथा नस- नाड़ियोंसे ही व्याप्त राजर्षि आर्ष्टिषेणके समीप गये, जो सम्पूर्ण धर्मोके पारंगत विद्वान् थे ॥ १०३ ॥

इति श्रीमहाभारते आरण्यके पर्वणि यक्षयुद्धपर्वणि गन्धमादनप्रवेशे अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत यक्षयुद्धपर्वमें गन्धमादनप्रवेशविषयक एक सौ अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५८ ॥

* सिन्धुवार शब्दका अर्थ आचार्य नीलकण्ठने कमल माना है। आधुनिक कोषकारोंने ' सिन्धुवार ' को शेफालिका या निर्गुण्डीका पर्याय माना है । उसके फूल मंजरीके आकारमें केसरिया रंगके होते हैं, अतः तोमरसे उनकी उपमा ठीक बैठती है । इसीलिये यहाँ शेफालिका अर्थ लिया गया ।

पृष्ठ 1078

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1078 का मूल पृष्ठ
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एकोनषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः प्रश्नके रूपमें आर्ष्टिषेणका युधिष्ठिरके प्रति उपदेश वैशम्पायन उवाच

युधिष्ठिरस्तमासाद्य तपसा दग्धकिल्बिषम् ।

अभ्यवादयत प्रीतः शिरसा नाम कीर्तयन् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! राजर्षि आर्ष्टिषेणने तपस्याद्वारा अपने सारे पाप दग्ध कर दिये थे । राजा युधिष्ठिरने उनके पास जाकर बड़ी प्रसन्नताके साथ अपना नाम बताते हुए उनके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया ॥ १ ॥

ततः कृष्णा च भीमश्च यमौ च सुतपस्विनौ ।

शिरोभिः प्राप्य राजर्षिं परिवार्योपतस्थिरे ॥ २ ॥

तदनन्तर द्रौपदी, भीमसेन और परम तपस्वी नकुल सहदेव – ये सभी मस्तक झुकाकर उन राजर्षिको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ॥ २ ॥

तथैव धौम्यो धर्मज्ञः पाण्डवानां पुरोहितः ।

यथान्यायमुपाक्रान्तस्तमृषिं संशितव्रतम् ॥ ३ ॥

उसी प्रकार पाण्डवोंके पुरोहित धर्मज्ञ धौम्यजी कठोर व्रतका पालन करनेवाले राजर्षि आर्ष्टिषेणके पास यथोचित शिष्टाचारके साथ उपस्थित हुए ॥ ३ ॥

अन्वजानात् स धर्मज्ञो मुनिर्दिव्येन चक्षुषा ।

पाण्डोः पुत्रान् कुरुश्रेष्ठानास्यतामिति चाब्रवीत् ॥ ४ ॥

उन धर्मज्ञ मुनि आर्ष्टिषेणने अपनी दिव्यदृष्टिसे कुरुश्रेष्ठ पाण्डवोंको जान लिया और कहा, ‘ आप सब लोग बैठें ' ॥ ४ ॥

कुरूणामृषभं पार्थं पूजयित्वा महातपाः ।

सह भ्रातृभिरासीनं पर्यपृच्छदनामयम् ॥ ५ ॥

महातपस्वी आर्ष्टिषेणने भाइयोंसहित कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरका यथोचित आदर- सत्कार किया और जब वे बैठ गये, तब उनसे कुशल- समाचार पूछा- ॥ ५ ॥

नानृते कुरुषे भावं कच्चिद् धर्मे प्रवर्तसे ।

मातापित्रोश्च ते वृत्तिः कच्चित् पार्थ न सीदति ॥ ६ ॥

' कुन्तीनन्दन! कभी झूठकी ओर तो तुम्हारा मन नहीं जाता? तुम धर्ममें लगे रहते हो न? माता-- पिताके प्रति जो तुम्हारी सेवावृत्ति होनी चाहिये, वह है न? उसमें शिथिलता तो नहीं आयी है? ॥ ६ ॥

कच्चित् ते गुरवः सर्वे वृद्धा वैद्याश्च पूजिताः ।

कच्चिन्न कुरुषे भावं पार्थ पापेषु कर्मसु ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1079

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1079 का मूल पृष्ठ
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‘ क्या तुमने समस्त गुरुजनों, बड़े - बूढ़ों और विद्वानोंका सदा समादर किया है? पार्थ! कभी पापकर्मोंमें तो तुम्हारी रुचि नहीं होती? ॥ ७ ॥

सुकृतं प्रतिकर्तुं च कच्चिद्धातुं च दुष्कृतम् ।

यथान्यायं कुरुश्रेष्ठ जानासि न विकत्थसे ॥ ८ ॥

' कुरुश्रेष्ठ! क्या तुम अपने उपकारीको उसके उपकारका यथोचित बदला देना जानते हो? क्या तुम्हें अपना अपकार करनेवाले मनुष्यकी उपेक्षा कर देनेकी कला का ज्ञान है? तुम अपनी बड़ाई तो नहीं करते? ॥ ८ ॥

यथार्हं मानिताः कच्चित् त्वया नन्दन्ति साधवः ।

वनेष्वपि वसन् कच्चिद् धर्ममेवानुवर्तसे ॥ ९ ॥

‘ क्या तुमसे यथायोग्य सम्मानित होकर साधु पुरुष तुमपर प्रसन्न रहते हैं? क्या तुम वनमें रहते हुए भी सदा धर्मका ही अनुसरण करते हो? ॥ ९ ॥

कच्चिद् धौम्यस्त्वदाचारैर्न पार्थ परितप्यते ।

दानधर्मतपः शौचैरार्जवेन तितिक्षया ॥ १० ॥

पितृपैतामहं वृत्तं कच्चित् पार्थानुवर्तसे ।

कच्चिद् राजर्षियातेन पथा गच्छसि पाण्डव ॥ ११ ॥

‘ पार्थ! तुम्हारे आचार- व्यवहारसे पुरोहित धौम्यजीको क्लेश तो नहीं पहुँचता है? कुन्तीनन्दन! क्या तुम दान, धर्म, तप, शौच, सरलता और क्षमा आदिके द्वारा अपने बाप-दादोंके आचार- व्यवहारका अनुसरण करते हो? पाण्डुनन्दन! प्राचीन राजर्षि जिस मार्गसे गये हैं, उसीपर तुम भी चलते हो न? ॥ १०-११ ॥

स्वे स्वे किल कुले जाते पुत्रे नप्तरि वा पुनः ।

पितरः पितृलोकस्थाः शोचन्ति च हसन्ति च ॥ १२ ॥

किं तस्य दुष्कृतेऽस्माभिः सम्प्राप्तव्यं भविष्यति ।

किं चास्य सुकृतेऽस्माभिः प्राप्तव्यमिति शोभनम् ॥ १३ ॥

‘ कहते हैं, जब- जब अपने - अपने कुलमें पुत्र अथवा नातीका जन्म होता है, तब - तब पितृलोकमें रहनेवाले पितर शोकमग्न होते हैं और हँसते भी हैं। शोक तो उन्हें यह सोचकर होता है कि ' क्या हमें इसके पापमें हिस्सा बँटाना पड़ेगा? ' और हँसते इसलिये हैं कि ' क्या हमें इसके पुण्यका कुछ भाग मिलेगा? यदि ऐसा हो तो बड़ी अच्छी बात है ' ॥ १२-१३ ॥

पिता माता तथैवाग्निर्गुरुरात्मा च पञ्चमः ।

यस्यैते पूजिताः पार्थ तस्या लोकावुभौ जितौ ॥ १४ ॥

‘ पार्थ! जिसके द्वारा पिता, माता, अग्नि, गुरु और आत्मा- इन पाँचोंका आदर होता है, वह यह लोक और परलोक दोनोंको जीत लेता है ' ॥ १४ ॥

युधिष्ठिर उवाच

पृष्ठ 1080

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भगवन्नार्य माहैतद् यथावद् धर्मनिश्चयम् ।

यथाशक्ति यथान्यायं क्रियते विधिवन्मया ॥ १५ ॥

युधिष्ठिरने कहा — भगवन्! आर्यचरण! आपने मुझे यह धर्मका निचोड़ बताया है । मैं अपनी शक्तिके अनुसार यथोचित रीतिसे विधिपूर्वक इसका पालन करता हूँ ॥ १५ ॥

आर्ष्टिषेण उवाच

अब्भक्षा वायुभक्षाश्च प्लवमाना विहायसा ।

जुषन्ते पर्वतश्रेष्ठमृषयः पर्वसंधिषु ॥ १६ ॥

आर्ष्टिषेण बोले- पार्थ! पर्वोंकी संधिवेलामें ( पूर्णिमा तथा प्रतिपदाकी संधिमें ) बहुत- से ऋषिगण आकाशमार्गसे उड़ते हुए आते हैं और इस श्रेष्ठ पर्वतका सेवन करते हैं । उनमें से कितने तो केवल जल पीकर जीवन निर्वाह करते हैं और कितने केवल वायु पीकर रहते हैं ॥ १६ ॥

कामिनः सह कान्ताभिः परस्परमनुव्रताः ।

दृश्यन्ते शैलशृङ्गस्था यथा किम्पुरुषा नृप ॥ १७ ॥

राजन्! कितने ही किम्पुरुष- जातिके कामी अपनी कामिनियोंके साथ परस्पर अनुरक्तभावसे यहाँ क्रीडाके लिये आते हैं और पर्वतके शिखरोंपर घूमते दिखायी देते हैं ॥ १७ ॥

अरजांसि च वासांसि वसानाः कौशिकानि च ।

दृश्यन्ते बहवः पार्थ गन्धर्वाप्सरसां गणाः ॥ १८ ॥

कुन्तीकुमार! गन्धर्वों और अप्सराओंके बहुत -से गण यहाँ देखनेमें आते हैं, उनमेंसे कितने ही स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और कितने ही रेशमी वस्त्रोंसे सुशोभित होते हैं ॥ १८ ॥

विद्याधरगणाश्चैव स्रग्विणः प्रियदर्शनाः ।

महोरगगणांश्चैव सुपर्णाश्चोरगादयः ॥ १ ९ ॥

विद्याधरोंके गण भी सुन्दर फूलोंके हार पहने अत्यन्त मनोहर दिखायी देते हैं । इनके सिवा बड़े - बड़े नागगण, सुपर्णजातीय पक्षी तथा सर्प आदि भी दृष्टिगोचर होते हैं ॥ १ ९ ॥

अस्य चोपरि शैलस्य श्रूयते पर्वसंधिषु ।

भेरीपणवशङ्खानां मृदङ्गानां च निःस्वनः ॥ २० ॥

पर्वोंकी संधि- बेलामें इस पर्वतके ऊपर भेरी, पणव, शंख और मृदंगोंकी ध्वनि सुनायी देती है ॥ २० ॥

इहस्थैरेव तत् सर्वं श्रोतव्यं भरतर्षभाः ।

न कार्या वः कथंचित् स्यात् तत्राभिगमने मतिः ॥ २१ ॥