श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1081–1090

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1081–1090

पृष्ठ 1081

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1081 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

भरतकुलभूषण पाण्डवो! तुम्हें यहीं रहकर वह सब कुछ देखना या सुनना चाहिये ।

वहाँ पर्वतके ऊपर जानेका विचार तुम्हें किसी प्रकार भी नहीं करना चाहिये ॥ २१ ॥

न चाप्यतः परं शक्यं गन्तुं भरतसत्तमाः ।

विहारो ह्यत्र देवानाममानुषगतिस्तु सा ॥ २२ ॥

भरतश्रेष्ठ! इससे आगे जाना असम्भव है। वहाँ देवताओंकी विहारस्थली है । वहाँ मनुष्योंकी गति नहीं हो सकती ॥ २२ ॥

ईषच्चपलकर्माणं मनुष्यमिह भारत ।

द्विषन्ति सर्वभूतानि ताडयन्ति च राक्षसाः ॥ २३ ॥

भारत! यहाँ थोड़ी - सी भी चपलता करनेवाले मनुष्यसे सब प्राणी द्वेष करते हैं तथा राक्षसलोग उसपर प्रहार कर बैठते हैं ॥ २३ ॥

अस्यातिक्रम्य शिखरं कैलासस्य युधिष्ठिर ।

गतिः परमसिद्धानां देवर्षीणां प्रकाशते ॥ २४ ॥

युधिष्ठिर! इस कैलासके शिखरको लाँघ जानेपर परम सिद्ध देवर्षियोंकी गति प्रकाशित होती है ॥ २४ ॥

चापलादिह गच्छन्तं पार्थ यानमितः परम् ।

अयःशूलादिभिर्ध्नन्ति राक्षसाः शत्रुसूदन ॥ २५ ॥

शत्रुसूदन पार्थ! चपलतावश इससे आगेके मार्गपर जानेवाले मनुष्यको राक्षसगण लोहेके शूल आदिसे मारते हैं ॥ २५ ॥

अप्सरोभिः परिवृतः समृद्धया नरवाहनः ।

इह वैश्रवणस्तात पर्वसंधिषु दृश्यते ॥ २६ ॥

तात! पर्वोंकी संधिके समय यहाँ मनुष्योंपर सवार होनेवाले कुबेर अप्सराओंसे घिरकर अपने•अतुल वैभवके साथ दिखायी देते हैं ॥ २६ ॥

शिखरस्थं समासीनमधिपं यक्षरक्षसाम् ।

प्रेक्षन्ते सर्वभूतानि भानुमन्तमिवोदितम् ॥ २७ ॥

यक्षों तथा राक्षसोंके अधिपति कुबेर जब इस कैलाशशिखरपर विराजमान होते हैं, उस समय उदित हुए सूर्यकी भाँति शोभा पाते हैं । उस अवसरपर सब प्राणी उनका दर्शन करते हैं ॥ २७ ॥

देवदानवसिद्धानां तथा वैश्रवणस्य च ।

गिरेः शिखरमूद्यानमिदं भरतसत्तम ॥ २८ ॥

भरतश्रेष्ठ! पर्वतका यह शिखर देवताओं, दानवों, सिद्धों तथा कुबेरका क्रीड़ा- कानन है ॥ २८ ॥

उपासीनस्य धनदं तुम्बुरोः पर्वसंधिषु ।

गीतसामस्वनस्तात श्रूयते गन्धमादने ॥ २ ९ ॥

पृष्ठ 1082

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1082 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तात! पर्वसंधिके समय गन्धमादन पर्वतपर कुबेरकी सेवामें उपस्थित हुए तुम्बुरु गन्धर्वके साम - गानका स्वर स्पष्ट सुनायी पड़ता है ॥ २ ९ ॥

एतदेवंविधं चित्रमिह तात युधिष्ठिर ।

प्रेक्षन्ते सर्वभूतानि बहुशः पर्वसंधिषु ॥ ३० ॥

तात युधिष्ठिर! इस प्रकार पर्वसंधिकालमें सब प्राणी यहाँ अनेक बार ऐसे - ऐसे अद्भुत दृश्योंका दर्शन करते हैं ॥

भुञ्जाना मुनिभोज्यानि रसवन्ति फलानि च ।

वसध्वं पाण्डवश्रेष्ठा यावदर्जुनदर्शनात् ॥ ३१ ॥

श्रेष्ठ पाण्डवो! जबतक तुम्हारी अर्जुनसे भेंट न हो, तबतक मुनियोंके भोजन करनेयोग्य सरस फलोंका उपभोग करते हुए तुम सब लोग यहाँ ( सानन्द ) निवास करो ॥ ३१ ॥

न तात चपलैर्भाव्यमिह प्राप्तैः कथंचन ।

उषित्वेह यथाकामं यथाश्रद्धं विहृत्य च ।

ततः शस्त्रजितां तात पृथिवीं पालयिष्यसि ॥ ३२ ॥

तात! यहाँ आनेवाले लोगोंको किसी प्रकार चपल नहीं होना चाहिये । तुम यहाँ अपनी इच्छाके अनुसार रहकर और श्रद्धाके अनुसार घूम- फिरकर लौट जाओगे और शस्त्रोंद्वारा जीती हुई पृथ्वीका पालन करोगे ॥ ३२ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि यक्षयुद्धपर्वणि आर्ष्टिषेणयुधिष्ठिरसंवादे एकोनषष्ट्यधिकशततमोऽध्याय ॥ १५ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत यक्षयुद्धपर्वमें आर्ष्टिषेण युधिष्ठिरसंवादविषयक एक सौउनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५९ ॥

पृष्ठ 1083

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1083 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः पाण्डवोंका आर्ष्टिषेणके आश्रमपर निवास, द्रौपदीके अनुरोधसे भीमसेनका पर्वतके शिखरपर जाना और यक्षों तथा राक्षसोंसे युद्ध करके मणिमान्का वध करना जनमेजय उवाच

आर्ष्टिषेणाश्रमे तस्मिन् मम पूर्वपितामहाः ।

पाण्डोः पुत्रा महात्मानः सर्वे दिव्यपराक्रमाः ॥ १ ॥

कियन्तं कालमवसन् पर्वते गन्धमादने ।

किं च चक्रुर्महावीर्याः सर्वेऽतिबलपौरुषाः ॥ २ ॥

जनमेजयने पूछा—ब्रह्मन्! गन्धमादन पर्वतपर आर्ष्टिषेणके आश्रममें मेरे समस्त पूर्वपितामह दिव्य पराक्रमी महामना पाण्डव कितने समयतक रहे? वे सभी महान् पराक्रमी

और अत्यन्त बल - पौरुषसे सम्पन्न थे । वहाँ रहकर उन्होंने क्या किया? ॥ १-२ ॥

कानि चाभ्यवहार्याणि तत्र तेषां महात्मनाम् ।

वसतां लोकवीराणामासंस्तद् ब्रूहि सत्तम ॥ ३ ॥

साधुशिरोमणे! वहाँ निवास करते समय विश्वविख्यात वीर महामना पाण्डवोंके भोज्य पदार्थ क्या थे? यह बतानेकी कृपा करें ॥ ३ ॥

विस्तरेण च मे शंस भीमसेनपराक्रमम् ।

यत् यच्चक्रे महाबाहुस्तस्मिन् हैमवते गिरौ ॥ ४ ॥

आप मुझसे भीमसेनका पराक्रम विस्तारपूर्वक बतावें । उन महाबाहुने हिमालय पर्वतके शिखरपर रहते समय कौन - कौन- सा कार्य किया था? ॥ ४ ॥

न खल्वासीत् पुनर्युद्धं तस्य यक्षैर्द्विजोत्तम ।

कच्चित् समागमस्तेषामासीद् वैश्रवणस्य च ॥ ५ ॥

द्विजश्रेष्ठ! उनका यक्षोंके साथ फिर कोई युद्ध हुआ था या नहीं। क्या कुबेरके साथ कभी उनकी भेंट हुई थी? ॥ ५ ॥

तत्र ह्यायाति धनद आर्ष्टिषेणो यथाब्रवीत् ।

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण तपोधन ॥ ६ ॥

न हि मे शृण्वतस्तृप्तिरस्ति तेषां विचेष्टितम् । क्योंकि आर्ष्टिषेणने जैसा बताया था, उसके अनुसार वहाँ कुबेर अवश्य आते रहे होंगे । तपोधन! मैं यह सब विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ; क्योंकि पाण्डवोंका चरित्र सुननेसे मुझे तृप्ति नहीं होती ॥ ६३ ॥

पृष्ठ 1084

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1084 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वैशम्पायन उवाच एतदात्महितं श्रुत्वा तस्याप्रतिमतेजसः ॥ ७ ॥

शासनं सततं चक्रुस्तथैव भरतर्षभाः । वैशम्पायनजीने कहा- राजन्! अप्रतिम तेजस्वी आर्ष्टिषेणका यह अपने लिये हितकर वचन सुनकर भरतकुल भूषण पाण्डवोंने सदा उनके आदेशका उसी प्रकार पालन किया ॥ ७३ ॥

भुञ्जाना मुनिभोज्यानि रसवन्ति फलानि च ॥ ८ ॥

मेध्यानि हिमवत्पृष्ठे मधूनि विविधानि च ।

एवं ते न्यवसंस्तत्र पाण्डवा भरतर्षभाः ॥ ९ ॥

वे हिमालयके शिखरपर निवास करते हुए मुनियोंके खानेयोग्य सरस फलोंका और नाना प्रकारके पवित्र ( बिना हिंसाके प्राप्त) मधुका भी भोजन करते थे । इस प्रकार भरतश्रेष्ठ पाण्डव वहाँ निवास करते थे ॥ ८ - ९ ॥

तथा निवसतां तेषां पञ्चमं वर्षमभ्यगात् ।

शृण्वतां लोमशोक्तानि वाक्यानि विविधान्युत ॥ १० ॥

वहाँ निवास करते हुए उनका पाँचवाँ वर्ष बीत गया । उन दिनों वे लोमशजीकी कही हुई नाना प्रकारकी कथाएँ सुना करते थे ॥ १० ॥

कृत्यकाल उपस्थास्य इति चोक्त्वा घटोत्कचः ।

राक्षसैः सह सर्वैश्च पूर्वमेव गतः प्रभो ॥ ११ ॥

राजन्! घटोत्कच यह कहकर कि ' मैं आवश्यकताके समय स्वयं उपस्थित हो जाऊँगा ’ सब राक्षसोंके साथ पहले ही चला गया था ॥ ११ ॥

आर्ष्टिषेणाश्रमे तेषां वसतां वै महात्मनाम् ।

अगच्छन् बहवो मासाः पश्यतां महदद्भुतम् ॥ १२ ॥

आर्ष्टिषेणके आश्रममें रहकर अत्यन्त अद्भुत दृश्योंका अवलोकन करते हुए महामना पाण्डवोंके अनेक मास व्यतीत हो गये ॥ १२ ॥

तैस्तत्र विहरद्भिश्च रममाणैश्च पाण्डवैः ।

प्रीतिमन्तो महाभागा मुनयश्चारणास्तथा ॥ १३ ॥

वहाँ रहकर क्रीडा- विहार करते हुए उन पाण्डवोंसे महाभाग मुनि और चारण बहुत प्रसन्न थे ॥ १३ ॥

आजग्मुः पाण्डवान् द्रष्टुं शुद्धात्मानो यतव्रताः ।

ते तैः सह कथां चक्रुर्दिव्यां भरतसत्तमाः ॥ १४ ॥

उनका अन्तःकरण शुद्ध था और वे संयम-नियमके साथ उत्तम व्रतका पालन करनेवाले थे । एक दिन वे सभी पाण्डवोंसे मिलनेके लिये आये । भरतशिरोमणि पाण्डवोंने

पृष्ठ 1085

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1085 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

उनके साथ दिव्य चर्चाएँ कीं ॥ १४ ॥

ततः कतिपयाहस्य महाह्रदनिवासिनम् ।

ऋद्धिमन्तं महानागं सुपर्णः सहसाऽऽहरत् ॥ १५ ॥

तदनन्तर कुछ दिनोंके बाद एक महान् जलाशयमें निवास करनेवाले महानाग ऋद्धिमान्को गरुडने सहसा झपाटा मारकर पकड़ लिया ॥ १५ ॥

प्राकम्पत महाशैलः प्रामृद्यन्त महाद्रुमाः ।

ददृशुः सर्वभूतानि पाण्डवाश्च तदद्भुतम् ॥ १६ ॥

उस समय वह महान् पर्वत हिलने लगा । बड़े - बड़े वृक्ष मिट्टीमें मिल गये । वहाँके समस्त प्राणियों तथा पाण्डवोंने उस अद्भुत घटनाको प्रत्यक्ष देखा ॥ १६ ॥

ततः शैलोत्तमस्याग्रात् पाण्डवान् प्रति मारुतः ।

अवहत् सर्वमाल्यानि गन्धवन्ति शुभानि च ॥ १७ ॥

तत्पश्चात् उस उत्तम पर्वतके शिखरसे पाण्डवोंकी ओर हवाका एक झोंका आया, जिसने वहाँ सब प्रकारके सुगन्धित पुष्पोंकी बनी हुई बहुत- सी सुन्दर मालाएँ लाकर बिखेर दीं ॥ १७ ॥

तत्र पुष्पाणि दिव्यानि सुहृद्भिः सह पाण्डवाः ।

ददृशुः पञ्चवर्णानि द्रौपदी च यशस्विनी ॥ १८ ॥

पाण्डवोंने अपने सुहृदोंके साथ जाकर उन मालाओंमें गूंथे हुए दिव्य पुष्प देखे, जो पाँच रंगके थे । यशस्विनी द्रौपदीने भी उन फूलोंको देखा था ॥ १८ ॥

भीमसेनं ततः कृष्णा काले वचनमब्रवीत् ।

विविक्ते पर्वतोद्देशे सुखासीनं महाभुजम् ॥ १ ९ ॥

तदनन्तर उसने समय पाकर पर्वतके एकान्त प्रदेशमें सुखपूर्वक बैठे हुए महाबाहु भीमसेनसे कहाप— ॥ १ ९ ॥

सुपर्णानिलवेगेन श्वसनेन महाचलात् ।

पञ्चवर्णानि पात्यन्ते पुष्पाणि भरतर्षभ ॥ २० ॥

प्रत्यक्षं सर्वभूतानां नदीमश्वरथां प्रति ।

खाण्डवे सत्यसंधेन भ्रात्रा तव महात्मना ॥ २१ ॥

गन्धर्वोरगरक्षांसि वासवश्च निवारितः ।

हता मायाविनश्चग्रा धनुः प्राप्तं च गाण्डिवम् ॥ २२ ॥

‘ भरतश्रेष्ठ! गरुडके पंखसे उठी हुई वायुके वेगसे उस दिन उस महान् पर्वतसे जो पाँच रंगके फूल अश्वरथा नदीके तटपर गिराये गये थे, उन्हें सब प्राणियोंने प्रत्यक्ष देखा । मुझे याद है, खाण्डव वनमें तुम्हारे महामना भाई सत्यप्रतिज्ञ अर्जुनने गन्धर्वों, नागों, राक्षसों तथा देवराज इन्द्रको भी युद्धमें आगे बढ़नेसे रोक दिया था । बहुत - से भयंकर मायावी राक्षस उनके हाथों मारे गये और उन्होंने गाण्डीव नामक धनुष भी प्राप्त कर लिया ॥ २०-२२ ॥

पृष्ठ 1086

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1086 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तवापि सुमहत् तेजो महद् बाहुबलं च ते ।

अविषह्यमनाधृष्यं शक्रतुल्यपराक्रम ॥ २३ ॥

‘ आर्यपुत्र! तुम्हारा पराक्रम भी इन्द्रके ही समान है । तुम्हारा तेज और बाहुबल भी महान् है । वह दूसरोंके लिये दुःसह एवं दुर्धर्ष है ॥ २३ ॥

त्वद्बाहुबलवेगेन त्रासिताः सर्वराक्षसाः ।

हित्वा शैलं प्रपद्यन्तां भीमसेन दिशो दश ॥ २४ ॥

' भीमसेन! मैं चाहती हूँ कि तुम्हारे बाहुबलके वेगसे थर्राकर सम्पूर्ण राक्षस इस पर्वतको छोड़ दें और दसों दिशाओंकी शरण लें ॥ २४ ॥

ततः शैलोत्तमस्याग्रं चित्रमाल्यधरं शिवम् ।

व्यपेतभयसम्मोहाः पश्यन्तु सुहृदस्तव ॥ २५ ॥

एवं प्रणिहितं भीम चिरात् प्रभृति मे मनः ।

द्रष्टुमिच्छामि शैलाग्रं त्वद्बाहुबलपालिता ॥ २६ ॥

‘ तत्पश्चात् विचित्र मालाधारी एवं शिवस्वरूप इस उत्तम शैल- शिखरको तुम्हारे सब सुहृद् भय और मोहसे रहित होकर देखें । भीम! दीर्धकालसे मैं अपने मनमें यही सोच ही रही हूँ । मैं तुम्हारे बाहुबलसे सुरक्षित हो इस शैल-शिखरका दर्शन करना चाहती हूँ' ॥ २५-२६ ॥

ततः क्षिप्तमिवात्मानं द्रौपद्या स परंतपः ।

नामृष्यत महाबाहुः प्रहारमिव सद्भवः ॥ २७ ॥

द्रौपदीकी यह बात सुनकर परंतप महाबाहु भीमसेनने इसे अपने ऊपर आक्षेप हुआ— सा समझा । जैसे अच्छा बैल अपने ऊपर चाबुककी मार नहीं सह सकता, उसी प्रकार यह आक्षेप उनसे नहीं सहा गया ॥

सिंहर्षभगतिः श्रीमानुदारः कनकप्रभः ।

मनस्वी बलवान् दृप्तो मानी शूरश्च पाण्डवः ॥ २८ ॥

उनकी चाल श्रेष्ठ सिंहके समान थी । वे सुन्दर, उदार और कनकके समान कान्तिमान् थे । पाण्डुनन्दन भीम मनस्वी, बलवान्, अभिमानी, मानी और शूरवीर थे ॥ २८ ॥

लोहिताक्षः पृथुव्यंसो मत्तवारणविक्रमः ।

सिंहदंष्ट्रो बृहत्स्कन्धः शालपोत इवोद्गतः ॥ २ ९ ॥

उनकी आँखें लाल थीं । दोनों कंधे हृष्ट- पुष्ट थे । उनका पराक्रम मतवाले गजराजके समान था । दाँत सिंहकी दाढ़ोंकी समानता करते थे । कंधे विशाल थे । वे शालवृक्षकी भाँति ऊँचे जान पड़ते थे ॥ २ ९ ॥

महात्मा चारुसर्वाङ्गः कम्बुग्रीवो महाभुजः ।

रुक्मपृष्ठं धनुः खड्गं तूर्णाश्चापि परामृशत् ॥ ३० ॥

पृष्ठ 1087

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1087 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

उनका हृदय महान् था, सभी अंग मनोहर जान पड़ते थे, ग्रीवा शंखके समान थी और भुजाएँ बड़ी - बड़ी थीं । वे सुवर्णकी पीठवाले धुनष, खड्ग तथा तरकसपर बार- बार हाथ फेरते थे ॥ ३० ॥

स केसरीव चोत्सिक्तः प्रभिन्न इव वारणः ।

व्यपेतभयसम्मोहः शैलमभ्यपतद् बली ॥ ३१ ॥

बलवान् भीमसेन मदोन्मत्त सिंह और मदकी धारा बहानेवाले गजराजकी भाँति भय और मोहसे रहित हो उस पर्वतपर चढ़ने लगे ॥ ३१ ॥

तं मृगेन्द्रमिवायान्तं प्रभिन्नमिव वारणम् ।

ददृशुः सर्वभूतानि बाणकार्मुकधारिणम् ॥ ३२ ॥

मदवर्षी कुंजर और मृगराजकी भाँति आते हुए धनुष - बाणधारी भीमसेनको उस समय सब भूतोंने देखा ॥ ३२ ॥

द्रौपद्या वर्धयन् हर्षं गदामादाय पाण्डवः ।

व्यपेतभयसम्मोहः शैलराजं समाश्रितः ॥ ३३ ॥

पाण्डुनन्दन भीम गदा हाथमें लेकर द्रौपदीका हर्ष बढ़ाते हुए भय और घबराहट छोड़कर उस पर्वतराजपर चढ़ गये ॥ ३३ ॥

न ग्लानिर्न च कातर्यं न वैक्लव्यं न मत्सरः ।

कदाचिज्जुषते पार्थमात्मजं मातरिश्वनः ॥ ३४ ॥

वायु- पुत्र कुन्तीकुमार भीमसेनको कभी ग्लानि, कातरता, व्याकुलता और मत्सरता आदि भाव नहीं छूते थे ॥ ३४ ॥

तदेकायनमासाद्य विषमं भीमदर्शनम् ।

बहुतालोच्छ्रयं शृङ्गमारुरोह महाबलः ॥ ३५ ॥

वह पर्वत ऊँची- नीची भूमियोंसे युक्त और देखनेमें भयंकर था । उसकी ऊँचाई कई ताड़ोंके बराबर थी और उसपर चढ़नेके लिये एक ही मार्ग था, तो भी महाबली भीमसेन उसके शिखरपर चढ़ गये ॥ ३५ ॥

सकिन्नरमहानागमुनिगन्धर्वराक्षसान् ।

हर्षयन् पर्वतस्याग्रमारुह्य स महाबलः ॥ ३६ ॥

पर्वतके शिखरपर आरूढ़ हो महाबली भीम किन्नर, महानाग, मुनि, गन्धर्व तथा राक्षसोंका हर्ष बढ़ाने लगे ॥ ३६ ॥

ततो वैश्रवणावासं ददर्श भरतर्षभः ।

काञ्चनैः स्फाटिकैश्चैव वेश्मभिः समलंकृतम् ॥ ३७ ॥

तदनन्तर भरतश्रेष्ठ भीमसेनने कुबेरका निवासस्थान देखा, जो सुवर्ण और स्फटिकमणिके बने हुए भवनोंसे विभूषित था ॥ ३७ ॥

प्राकारेण परिक्षिप्तं सौवर्णेन समन्ततः ।

पृष्ठ 1088

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1088 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सर्वरत्नद्युतिमता सर्वोद्यानवता तथा ॥ ३८ ॥

शैलादभ्युच्छ्रयवता चयाट्टालकशोभिना ।

द्वारतोरणनिर्व्यूहध्वजसंवाहशोभिना ॥ ३ ९ ॥

उसके चारों ओर सोनेकी चहारदीवारी बनी थी । उसमें सब प्रकारके रत्न जड़े होनेसे उनकी प्रभा फैलती रहती थी । चहारदीवारीके सब ओर सुन्दर बगीचे थे । उस चहारदीवारीकी ऊँचाई पर्वतसे भी अधिक थी । बहुतसे भवनों और अट्टालिकाओंसे उसकी बड़ी शोभा हो रही थी । द्वार, तोरण ( गोपुर), बुर्ज और ध्वजसमुदाय उसकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ ३८-३९ ॥

विलासिनीभिरत्यर्थं नृत्यन्तीभिः समन्ततः ।

वायुना धूयमानाभिः पताकाभिरलंकृतम् ॥ ४० ॥

उस भवनमें सब ओर कितनी ही विलासिनी अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं और हवासे फहराती हुई पताकाएँ उस भवनका अलंकार बनी हुई थीं ॥ ४० ॥

धनुष्कोटिमवष्टभ्य वक्रभावेन बाहुना ।

पश्यमानः स खेदेन द्रविणाधिपतेः पुरम् ॥ ४१ ॥

अपनी तिरछी की हुई बाहुसे धनुषकी नोकको स्थिर करके भीमसेन उस धनाध्यक्ष कुबेरके नगरको बड़े खेदके साथ देख रहे थे ॥ ४१ ॥

मोदयन् सर्वभूतानि गन्धमादनसम्भवः ।

सर्वगन्धवहस्तत्र मारुतः सुसुखो ववौ ॥ ४२ ॥

गन्धमादनसे उठी हुई वायु सम्पूर्ण सुगन्धकी राशि लेकर समस्त प्राणियोंको आनन्दित करती हुई सुखद मन्द गतिसे बह रही थी ॥ ४२ ॥

चित्रा विविधवर्णाभाश्चित्रमञ्जरिधारिणः ।

अचिन्त्या विविधास्तत्र द्रुमाः परमशोभिनः ॥ ४३ ॥

रत्नजालपरिक्षिप्तं चित्रमाल्यविभूषितम् ।

राक्षसाधिपतेः स्थानं ददृशे भरतर्षभः ॥ ४४ ॥

वहाँके अत्यन्त शोभाशाली विविध वृक्ष नाना प्रकारकी कान्तिसे प्रकाशित हो रहे थे । उनकी मञ्जरियाँ विचित्र दिखायी देती थीं । वे सब - के - सब अद्भुत और अकथनीय जान पड़ते थे । भरतश्रेष्ठ भीमने राक्षसराज कुबेरके उस स्थानको रत्नोंके समुदायसे सुशोभित तथा विचित्र मालाओंसे विभूषित देखा ॥ ४३-४४ ॥

गदाखड्गधनुष्पाणिः समभित्यक्तजीवितः ।

भीमसेनो महाबाहुस्तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥ ४५ ॥

ततः शङ्खमुपाध्मासीद् द्विषतां लोमहर्षणम् ।

ज्याघोषतलशब्दं च कृत्वा भूतान्यमोहयत् ॥ ४६ ॥

पृष्ठ 1089

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1089 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

उनके हाथमें गदा, खड्ग और धनुष शोभा पा रहे थे । उन्होंने अपने जीवनका मोह सर्वथा छोड़ दिया था । वे माहबाहु भीमसेन वहाँ पर्वतकी भाँति अविचल - भावसे कुछ देर खड़े रहे । तत्पश्चात् उन्होंने बड़े जोरसे शंख बजाया, जिसकी आवाज शत्रुओंके रोंगटे खड़े कर देनेवाली थी । फिर धनुषकी टंकार करके समस्त प्राणियोंको मोहित कर दिया ॥ ४५-४६ ॥

ततः प्रहृष्टरोमाणस्तं शब्दमभिदुद्रुवुः ।

यक्षराक्षसगन्धर्वाः पाण्डवस्य समीपतः ॥ ४७ ॥

तब यक्ष, राक्षस और गन्धर्व रोमाञ्चित होकर उस शब्दको लक्ष्य करके पाण्डुनन्दन भीमसेनके समीप दौड़े आये ॥ ४७ ॥

गदापरिघनिस्त्रिंशशूलशक्तिपरश्वधाः ।

प्रगृहीता व्यरोचन्त यक्षराक्षसबाहुभिः ॥ ४८ ॥

उस समय गदा, परिघ, खड्ग, शूल, शक्ति और फरसे आदि अस्त्र- शस्त्र उन यक्षों तथा राक्षसोंके हाथोंमें आकर बड़ी चमक पैदा कर रहे थे ॥ ४८ ॥

ततः प्रववृते युद्धं तेषां तस्य च भारत ।

तैः प्रयुक्तान् महामायैः शूलशक्तिपरश्वधान् ॥ ४९ ॥

भल्लैर्भीमः प्रचिच्छेद भीमवेगतरैस्ततः ।

अन्तरिक्षगतानां च भूमिष्टानां च गर्जताम् ॥ ५० ॥

शरैर्विव्याध गात्राणि राक्षसानां महाबलः ।

सा लोहितमहावृष्टिरभ्यवर्षन्महाबलम् ॥ ५१ ॥

गदापरिघपाणीनां रक्षसां कायसम्भवाः ।

कायेभ्यः प्रच्युता धारा राक्षसानां समन्ततः ॥ ५२ ॥

भारत! तदनन्तर उन यक्षों और गन्धर्वोंका भीमसेनके साथ युद्ध प्रारम्भ हो गया । वे यक्ष और राक्षस बड़े मायावी थे । उनके चलाये हुए शूल, शक्ति और फरसोंको भीमसेनने भयानक वेगशाली भल्ल नामक बाणोंद्वारा काट गिराया । वे राक्षस आकाशमें उड़कर तथा भूतलपर खड़े होकर जोर- जोरसे गर्जना कर रहे थे । महाबली भीमने बाणोंकी झड़ी लगाकर उनके शरीरोंको अच्छी प्रकार छेद डाला । गदा और परिघ हाथमें लिये हुए राक्षसोंके शरीरसे महाबली भीमपर खूनकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी तथा चारों ओर राक्षसोंके शरीरसे रक्तकी कितनी ही धाराएँ बह चलीं ॥ ४ ९ -५२ ॥

भीमबाहुबलोत्सृष्टैरायुधैर्यक्षरक्षसाम् ।

विनिकृत्तानि दृश्यन्ते शरीराणि शिरांसि च ॥ ५३ ॥

भीमके बाहुबलसे छूटे हुए अस्त्र- शस्त्रोंद्वारा यक्षों तथा राक्षसोंके शरीर और सिर कटे दिखायी दे रहे थे ॥ प्रच्छाद्यमानं रक्षोभिः पाण्डवं प्रियदर्शनम् ।

पृष्ठ 1090

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1090 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

ददृशुः सर्वभूतानि सूर्यमभ्रगणैरिव ॥ ५४ ॥

जैसे बादल सूर्यको ढक लेते हैं, उसी प्रकार प्रियदर्शन पाण्डुपुत्र भीमको राक्षस ढक लेते हैं, यह सब प्राणियोंने प्रत्यक्ष देखा ॥ ५४ ॥

स रश्मिभिरिवादित्यः शरैररिनिघातिभिः ।

सर्वानार्च्छन्महाबाहुर्बलवान् सत्यविक्रमः ॥ ५५ ॥

तब सत्यपराक्रमी बलवान् महाबाहु भीमसेनने अपने शत्रुनाशक बाणोंद्वारा समस्त शत्रुओंको उसी प्रकार ढक लिया, जैसे सूर्य अपनी किरणोंसे संसारको ढक लेते हैं ॥ ५५ ॥

अभितर्जयमानाश्च रुवन्तश्च महारवान् ।

न मोहं भीमसेनस्य ददृशुः सर्वराक्षसाः ॥ ५६ ॥

सब ओरसे गर्जन - तर्जन करते हुए तथा बड़ी भयानक आवाजसे चिग्घाड़ते हुए सब राक्षसोंने भीमसेनके चित्तमें तनिक भी घबराहट नहीं देखी ॥ ५६ ॥

यक्षा विकृतसर्वाङ्गा भीमसेनभयार्दिताः ।

भीममार्तस्वरं चक्रुर्विप्रकीर्णमहायुधाः ॥ ५७ ॥

जिनके सारे अंग विकृत एवं विकराल थे, वे यक्ष भीमसेनके भयसे पीड़ित हो अपने बड़े - बड़े आयुधोंको इधर- उधर फेंककर भयंकर आर्तनाद करने लगे ॥ ५७ ॥

उत्सृज्य ते गदाशूलानसिशक्तिपरश्वधान् ।

दक्षिणां दिशमाजग्मुस्त्रसिता दृढधन्वना ॥ ५८ ॥

सुदृढ़ धनुषवाले भीमसेनसे आतंकित हो वे यक्ष - राक्षस आदि योद्धा गदा, शूल, खड्ग, शक्ति तथा परशु आदि अस्त्रोंको वहीं छोड़कर दक्षिणदिशाकी ओर भाग गये ॥ ५८ ॥

तत्र शूलगदापाणिर्व्यूढोरस्को महाभुजः ।

सखा वैश्रवणस्यासीन्मणिमान्नाम राक्षसः ॥ ५ ९ ॥

वहाँ कुबेरके सखा राक्षसप्रवर मणिमान् भी मौजूद थे । उनके हाथोंमें त्रिशूल और गदा शोभा पा रही थी उनकी छाती चौड़ी और बाँहें विशाल थीं ॥ ५ ९ ॥

अदर्शयदधीकारं पौरुषं च महाबलः ।

स तान् दृष्ट्वा परावृत्तान् स्मयमान इवाब्रवीत् ॥ ६० ॥

उन महाबली वीरने वहाँ अपने अधिकार और पौरुष दोनोंको प्रकट किया । उस समय -अपने सैनिकोंको रणसे विमुख होते देख वे मुसकराते हुए उनसे बोले – ॥ ६० ॥

एकेन बहवः सङ्ख्ये मानुषेण पराजिताः ।

प्राप्य वैश्रवणावासं किं वक्ष्यथ धनेश्वरम् ॥ ६१ ॥

' अरे! तुम बहुत बड़ी संख्यामें होकर भी आज एक मनुष्यद्वारा युद्धमें पराजित हो गये । ' कुबेरभवनमें धनाध्यक्षके पास जाकर क्या कहोगे? ' ॥ ६१ ॥

एवमाभाष्य तान् सर्वानभ्यवर्तत राक्षसः ।