02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 1151–1160
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1151–1160
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एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः अर्जुनका पातालमें प्रवेश और निवातकवचोंके साथ युद्धारम्भ अर्जुनउवाच
ततोऽहं स्तूयमानस्तु तत्र तत्र महर्षिभिः ।
अपश्यमुदधिं भीममपां पतिमथाव्ययम् ॥ १ ॥
फेनवत्यः प्रकीर्णाश्च संहताश्च समुत्थिताः ।
ऊर्मयश्चात्र दृश्यन्ते वल्गन्त इव पर्वताः ॥ २ ॥
अर्जुन बोले — राजन्! तदनन्तर मार्गमें जहाँ -तहाँ महर्षियोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए मैंने जलके स्वामी समुद्रके पास पहुँचकर उसका निरीक्षण किया । वह देखनेमें अत्यन्त भयंकर था । उसका पानी कभी घटता- बढ़ता नहीं है । उसमें फेनसे मिली हुई पहाड़ोंके समान ऊँची - ऊँची लहरें उठकर नृत्य करती -सी दिखायी दे रही थीं । वे कभी इधर - उधर फैल जाती और कभी आपसमें टकरा जाती थीं ॥ १-२ ॥ नावः सहस्रशस्तत्र रत्नपूर्णाः समन्ततः ।
नभसीव विमानानि विचरन्त्यो विरेजिरे ।
तिमिङ्गिलाः कच्छपाश्च तथा तिमितिमिङ्गिलाः ॥ ३ ॥
मकराश्चात्र दृश्यन्ते जले मग्ना इवाद्रयः ।
शङ्खानां च सहस्राणि मग्नान्यप्सु समन्ततः ॥ ४ ॥
वहाँ सब ओर रत्नोंसे भरी हुई हजारों नावें चल रही थीं, जो आकाशमें विचरते हुए विमानोंकी - सी शोभा पाती थीं तथा तिमिंगिल, तिमितिमिंगिल, कछुए और मगर पानीमें डूबे हुए पर्वतोंके समान दृष्टिगोचर होते थे । सहस्रों शंख सब ओर जलमें निमग्न थे ॥ ३-४ ॥
दृश्यन्ते स्म यथा रात्रौ तारास्तन्वभ्रसंवृताः ।
तथा सहस्रशस्तत्र रत्नसङ्घाः प्लवन्त्युत ॥ ५ ॥
जैसे रातमें झीने बादलोंके आवरणसे सहस्रों तारे चमकते दिखायी देते हैं, उसी प्रकार समुद्रके जलमें स्थित हजारों रत्नसमूह तैरते हुए- से प्रतीत हो रहे थे ॥ ५ ॥
वायुश्च घूर्णते भीमस्तदद्भुतमिवाभवत् ।
तमुदीक्ष्य महावेगं सर्वाम्भोनिधिमुत्तमम् ॥ ६ ॥
अपश्यं दानवाकीर्णं तद् दैत्यपुरमन्तिकात् ।
तत्रैव मातलिस्तूर्णं निपत्य पृथिवीतले ॥ ७ ॥
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रथं तं तु समाश्लिष्यः प्राद्रवद् रथयोगवित् ।
त्रासयन् रथघोषेण तत् पुरं समुपाद्रवत् ॥ ८ ॥
औरोंकी तो बात ही क्या है, वहाँ भयानक वायु भी पथ- भ्रान्तकी भाँति भटकने लगती है । वायुका वह चक्कर काटना अद्भुत- सा प्रतीत हो रहा था । इस प्रकार अत्यन्त वेगशाली जलराशि महासागरको देखकर उसके पास ही मैंने दानवोंसे भरा हुआ वह दैत्यनगर भी देखा । रथ- संचालनमें कुशल सारथि मातलि तुरंत वहाँ पहुँचकर पातालमें उतरे तथा रथपर सावधानीसे बैठकर आगे बढ़े । उन्होंने रथकी घर्घराहटसे सबको भयभीत करते हुए उस दैत्यपुरकी ओर धावा किया ॥ ६-८ ॥
रथघोषं तु तं श्रुत्वा स्तनयित्नोरिवाम्बरे ।
मन्वाना देवराजं मामाविग्ना दानवाभवन् ॥ ९ ॥
आकाशमें होनेवाली मेघ गर्जनाके समान उस रथका शब्द सुनकर दानवलोग मुझे देवराज इन्द्र समझकर भयसे अत्यन्त व्याकुल हो उठे ॥ ९ ॥
सर्वे सम्भ्रान्तमनसः शरचापधराः स्थिताः ।
तथासिशूलपरशुगदामुसलपाणयः ॥ १० ॥
सभी मन- ही -मन घबरा गये । सभी अपने हाथोंमें धनुष - बाण, तलवार, शूल, फरसा, गदा और मुसल आदि अस्त्र- शस्त्र लेकर खड़े हो गये ॥ १० ॥
ततो द्वाराणि पिदधुर्दानवास्त्रस्तचेतसः ।
संविधाय पुरे रक्षां न स्म कश्चन दृश्यते ॥ ११ ॥
दानवोंके मनमें आतंक छा गया था । इसलिये उन्होंने नगरकी रक्षाका प्रबन्ध करके
सारे दरवाजे बंद कर लिये । नगरके बाहर कोई भी दिखायी नहीं देता था ॥ ११ ॥
ततः शङ्खमुपादाय देवदत्तं महास्वनम् ।
परमां मुदमाश्रित्य प्राधमं तं शनैरहम् ॥ १२ ॥
तब मैंने बड़ी भयंकर ध्वनि करनेवाले देवदत्त नामक शंखको हाथमें लेकर अत्यन्त प्रसन्न हो धीरे - धीरे उसे बजाया ॥ १२ ॥
स तु शब्दो दिवं स्तब्ध्वा प्रतिशब्दमजीजनत् ।
वित्रेसुश्च निलिल्युश्च भूतानि सुमहान्त्यपि ॥ १३ ॥
वह शंखनाद स्वर्गलोकसे टकराकर प्रतिध्वनि उत्पन्न करने लगा । उसकी आवाज सुनकर बड़े - बड़े प्राणी भी भयभीत हो इधर- उधर छिप गये ॥ १३ ॥
ततो निवातकवचाः सर्व एव स्वलंकृताः ।
दंशिता विविधैस्त्राणैर्विचित्रायुधपाणयः ॥ १४ ॥
आयसैश्च महाशूलैर्गदाभिर्मुसलैरपि ।
पट्टिशैः करवालैश्च रथचक्रैश्च भारत ॥ १५ ॥
शतघ्नीभिर्भुशुण्डीभिः खड्गैश्चित्रैः स्वलंकृतैः ।
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प्रगृहीतैर्दितेः पुत्राः प्रादुरासन् सहस्रशः ॥ १६ ॥
भारत! तदनन्तर निवातकवचनामक सभी दैत्य आभूषणोंसे विभूषित हो भाँति-भाँतिके कवच धारण किये, हाथोंमें विचित्र आयुध लिये, लोहेके बने हुए बड़े - बड़े शूल, गदा, मुसल, पट्टिश, करवाल, रथ- चक्र, शतघ्नी ( तोप ), भुशुण्डि ( बंदूक ) तथा रत्नजटित विचित्र खड्ग आदि लेकर सहस्रोंकी संख्यामें नगरसे बाहर आये ॥ १४–१६ ॥
ततो विचार्य बहुशो रथमार्गेषु तान् हयान् ।
प्राचोदयत् समे देशो मातलिर्भरतर्षभ ॥ १७ ॥
तेन तेषां प्रणुन्नानामाशुत्वाच्छीघ्रगामिनाम् ।
नान्वपश्यं तदा किंचित् तन्मेऽद्भुतमिवाभवत् ॥ १८ ॥
भरतश्रेष्ठ! उस समय मातलिने बहुत सोच- विचारकर समतल प्रदेशमें रथ जानेयोग्य मार्गोंपर अपने उन घोड़ोंको हाँका । उसके हाँकनेपर उन शीघ्रगामी अश्वोंकी चाल इतनी
तेज हो गयी कि मुझे उस समय कुछ भी दिखायी नहीं देता था । यह एक अद्भुत बात थी ॥
ततस्ते दानवास्तत्र वादित्राणि सहस्रशः ।
विकृतस्वररूपाणि भृशं सर्वाण्यनादयन् ॥ १ ९ ॥
तदनन्तर उन दानवोंने वहाँ भीषण स्वर और विकराल आकृतिवाले विभिन्न प्रकारके सहस्रों बाजे जोर- जोर से बजाने आरम्भ किये ॥ १ ९ ॥
तेन शब्देन सहसा समुद्रे पर्वतोपमाः ।
आप्लवन्त गतैः सत्त्वैर्मत्स्याः शतसहस्रशः ॥ २० ॥
वाद्योंकी उस तुमुल - ध्वनिसे सहसा समुद्रके लाखों बड़े - बड़े पर्वताकार मत्स्य मर गये और उनकी लाशें पानीके ऊपर तैरने लगीं ॥ २० ॥
ततो वेगेन महता दानवा मामुपाद्रवन् ।
विमुञ्चन्तः शितान् बाणान् शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २१ ॥
तत्पश्चात् उन सब दानवोंने सैकड़ों और हजारों तीखे बाणोंकी वर्षा करते हुए बड़े वेगसे मुझपर आक्रमण किया ॥ २१ ॥
स सम्प्रहारस्तुमुलस्तेषां च मम भारत ।
अवर्तत महाघोरो निवातकवचान्तकः ॥ २२ ॥
भारत! तब उन दानवोंका और मेरा महाभयंकर तुमुल संग्राम आरम्भ हो गया, जो निवातकवचोंके लिये विनाशकारी सिद्ध हुआ ॥ २२ ॥
ततो देवर्षयश्चैव तथान्ये च महर्षयः ।
ब्रह्मर्षयश्च सिद्धाश्च समाजग्मुर्महामृधे ॥ २३ ॥
ते वै मामनुरूपाभिर्मधुराभिर्जयैषिणः ।
अस्तुवन् मुनयो वाग्भिर्यथेन्द्रं तारकामये ॥ २४ ॥
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उस समय बहुत - से देवर्षि तथा अन्य महर्षि एवं ब्रह्मर्षि और सिद्धगण उस महायुद्धमें (देखनेके लिये ) आये । वे सब- के - सब मेरी विजय चाहते थे । अतः उन्होंने जैसे तारकामय संग्रामके अवसरपर इन्द्रकी स्तुति की थी, उसी प्रकार अनुकूल एवं मधुर वचनोंद्वारा मेरा भी स्तवन किया ॥ २३-२४ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि युद्धारम्भे एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें युद्धारम्भविषयक एक सौ उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६९ ॥
3. एक विशेष प्रकारके मत्स्यका नाम ' तिमि ' है, जो उसे निगल जाता है, उस महामत्स्यको ' तिमिंगिल' कहते हैं । २. जो तिमिंगलको भी निगल जाता है, उस महामहामत्स्यका नाम ' तिमितिमिंगिल ' है । ३. नीलकण्ठी टीकामें लिखा है कि पृथ्वीमें उतरकर निम्नस्थलमें गये हुए रथके चक्केको दृढ़तापूर्वक पकड़कर ऊँचा किया ।
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सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः अर्जुन और निवातकवचोंका युद्ध अर्जुनउवाच
ततो निवातकवचाः सर्वे वेगेन भारत ।
अभ्यद्रवन् मां सहिताः प्रगृहीतायुधा रणे ॥ १ ॥
अर्जुन बोले- भारत! तदनन्तर सारे निवातकवच संगठित हो हाथोंमें अस्त्र- शस्त्र लिये युद्धभूमिमें वेगपूर्वक मेरे ऊपर टूट पड़े ॥ १ ॥
आच्छाद्य रथपन्थानमुत्क्रोशन्तो महारथाः ।
आवृत्य सर्वतस्ते मां शरवर्षैरवाकिरन् ॥ २ ॥
ततोऽपरे महावीर्याः शूलपट्टिशपाणयः ।
शूलानि च भुशुण्डीश्च मुमुचुर्दानवा मयि ॥ ३ ॥
उन महारथी दानवोंने मेरे रथका मार्ग रोककर भीषण गर्जना करते हुए मुझे सब ओरसे घेर लिया और मुझपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी । फिर कुछ अन्य महापराक्रमी दानव शूल और पट्टिश आदि हाथोंमें लिये मेरे सामने आये और मुझपर शूल तथा भुशुण्डियोंका प्रहार करने लगे ॥ २-३ ॥
तच्छूलवर्षं सुमहद् गदाशक्तिसमाकुलम् ।
अनिशं सृज्यमानं तैरपतन्मद्रथोपरि ॥ ४ ॥
अन्ये मामभ्यधावन्त निवातकवचा युधि ।
शितशस्त्रायुधा रौद्राः कालरूपाः प्रहारिणः ॥ ५ ॥
दानवोंद्वारा की गयी वह शूलोंकी बड़ी भारी वर्षा निरन्तर मेरे रथपर होने लगी । उसके साथ ही गदा और शक्तियोंका भी प्रहार हो रहा था । कुछ दूसरे निवातकवच हाथोंमें तीखे अस्त्र- शस्त्र लिये उस युद्धके मैदानमें मेरी और दौड़े । वे प्रहार करनेमें कुशल थे । उनकी आकृति बड़ी भयंकर थी और देखनेमें वे कालरूप जान पड़ते थे ॥ ४-५ ॥
तानहं विविधैर्बाणैर्वेगवद्भिरजिह्मगैः ।
गाण्डीवमुक्तैरभ्यघ्नमेकैकं दशभिर्मृधे ॥ ६ ॥
तब मैंने उनमेंसे एक- एकको युद्धमें गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए सीधे जानेवाले विविध प्रकारके दस - दस वेगवान् वाणोंद्वारा बींध डाला ॥ ६ ॥
ते कृता विमुखाः सर्वे मत्प्रयुक्तैः शिलाशितैः ।
तो मातलिना तूर्णं हयास्ते सम्प्रचोदिताः ॥ ७ ॥
मेरे छोड़े हुए बाण पत्थरपर तेज किये हुए थे । उनकी मार खाकर सभी दानव युद्धभूमिसे भाग चले । तब मातलि उस रथके घोड़ोंको तुरंत ही तीव्र वेगसे हाँका ॥ ७ ॥
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मार्गान् बहुविधांस्तत्र विचेरुर्वातरंहसः ।
सुसंयता मातलिना प्रामथ्नन्त दितेः सुतान् ॥ ८ ॥
सारथिसे प्रेरित होकर वे अश्व नाना प्रकारकी चालें दिखाते हुए वायुके समान वेगसे चलने लगे । मातलिने उन्हें अच्छी तरह काबूमें कर रखा था । उन सबने वहाँ दितिके पुत्रोंको रौंद डाला ॥ ८ ॥
शतं शतास्ते हरयस्तस्मिन् युक्ता महारथे ।
शान्ता मातलिना यत्ता व्यचरन्नल्पका इव ॥ ९ ॥
अर्जुनके उस विशाल रथमें दस हजार घोड़े जुते हुए थे, तो भी मातलिने उन्हें इस प्रकार वशमें कर रखा था कि वे अल्पसंख्यक अश्वोंकी भाँति शान्तभावसे विचरते थे ॥ ९ ॥
तेषां चरणपातेन रथनेमिस्वनेन च ।
मम बाणनिपातैश्च हतास्ते शतशोऽसुराः ॥ १० ॥
उन घोड़ोंके पैरोंकी मार पड़नेसे, रथके पहियेकी घर्घराहट होनेसे तथा मेरे बाणोंकी चोट खानेसे सैकड़ों दैत्य मर गये ॥ १० ॥
गतासवस्तथैवान्ये प्रगृहीतशरासनाः ।
हतसारथयस्तत्र व्यकृष्यन्त तुरंगमैः ॥ ११ ॥
इसी प्रकार वहाँ दूसरे बहुत - से असुर हाथमें धनुष - बाण लिये प्राणरहित हो गये थे और उनके सारथि भी मारे गये थे, उस दशामें सारथिशून्य घोड़े उनके निर्जीव शरीरको खींचे लिये जाते थे ॥ ११ ॥
ते दिशो विदिशः सर्वे प्रतिरुध्य प्रहारिणः ।
अभ्यघ्नन् विविधैः शस्त्रैस्ततो मे व्यथितं मनः ॥ १२ ॥
तब वे समस्त दानव सारी दिशाओं और विदिशाओंको रोककर भाँति- भाँतिके अस्त्र-शास्त्रोंद्वारा मुझपर घातक प्रहार करने लगे । इससे मेरे मनमें बड़ी व्यथा हुई ॥ १२ ॥
ततोऽहं मातलेर्वीर्यमपश्यं परमाद्भुतम् ।
अश्वांस्तथा वेगवतो यदयत्नादधारयत् ॥ १३ ॥
उस समय मैंने मातलिकी अत्यन्त अद्भुत शक्ति देखी । उन्होंने वैसे वेगशाली अश्वोंको बिना किसी प्रयासके ही काबू कर लिया ॥ १३ ॥
ततोऽहं लघुभिश्चित्रैरस्त्रैस्तानसुरान् रणे ।
चिच्छेद सायुधान् राजन् शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १४ ॥
एवं मे चरतस्तत्र सर्वयत्नेन शत्रुहन् ।
प्रीतिमानभवद् वीरो मातलिः शक्रसारथिः ॥ १५ ॥
राजन्! तब मैंने उस रणभूमिने अस्त्र- शस्त्रधारी सैकड़ों तथा सहस्रों असुरोंको विचित्र एवं शीघ्रगामी बाणोंद्वारा मार गिराया । शत्रुदमन नरेश! इस प्रकार पूर्ण प्रयत्नपूर्वक युद्धमें
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विचरते हुए मेरे ऊपर इन्द्रसारथि वीरवर मातलि बड़े प्रसन्न हुए ॥ १४-१५ ॥
बध्यमानास्ततस्तैस्तु हयैस्तेन रथेन च ।
अगमन् प्रक्षयं केचिन्न्यवर्तन्त तथा परे ॥ १६ ॥
मेरे उन घोड़ों तथा उस दिव्य रथसे कुचल जानेके कारण भी कितने ही दानव मारे गये और बहुत - से युद्ध छोड़कर भाग गये ॥ १६ ॥
स्पर्धमाना इवास्माभिर्निवातकवचा रणे ।
शरवर्षैः शरार्तं मां महद्भिः प्रत्यवारयन् ॥ १७ ॥
ततोऽहं लघुभिश्चित्रैर्ब्रह्मास्त्रपरिमन्त्रितैः ।
व्यधमं सायकैराशु शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १८ ॥
निवातकवचोंने संग्राममें हमलोगोंसे होड़- सी लगा रखी थी । मैं बाणोंके आघातसे पीड़ित था, तो भी उन्होंने बड़ी भारी बाणवर्षा करके मेरी प्रगतिको रोकने की चेष्टा की । तबमैंने अद्भुत और शीघ्रगामी बाणोंको ब्रह्मास्त्रसे अभिमन्त्रित करके चलाया और उनके द्वारा शीघ्र ही सैकड़ों तथा हजारों दानवोंका संहार करने लगा ॥ १७-१८ ॥
ततः सम्पीड्यनास्ते क्रोधाविष्टा महारथाः ।
अपीडयन् मां सहिताः शरशूलासिवृष्टिभिः ॥ १ ९ ॥
तदनन्तर मेरे बाणोंसे पीड़ित होकर वे महारथी दैत्य क्रोधसे आग- बबूला हो उठे और एक साथ संगठित हो खड्ग, शूल तथा बाणोंकी वर्षाद्वारा मुझे घायल करने लगे ॥ १ ९ ॥
ततोऽहमस्त्रमातिष्ठं परमं तिग्मतैजसम् ।
दयितं देवराजस्य माधवं नाम भारत ॥ २० ॥
भारत! यह देख मैंने देवराज इन्द्रके परम प्रिय माधव नामक प्रचण्ड तेजस्वी अस्त्रका आश्रय लिया ॥ २० ॥
ततः खड्गांस्त्रिशूलांश्च तोमरांश्च सहस्रशः ।
अस्त्रवीर्येण शतधा तैर्मुक्तानहमच्छिदम् ॥ २१ ॥
तब उस अस्त्रके प्रभावसे मैंने दैत्योंके चलाये हुए सहस्रों खड्ग, त्रिशूल और तोमरोंके सौ - सौ टुकड़े कर डाले ॥ २१ ॥
छित्त्वा प्रहरणान्येषां ततस्तानपि सर्वशः ।
प्रत्यविध्यमहं रोषाद् दशभिर्दशभिः शरैः ॥ २२ ॥
तत्पश्चात् दानवोंके समस्त अस्त्र - शस्त्रोंका उच्छेद करके मैंने रोषवश उन सबको भी दस- दस बाणोंसे घायल करके बदला चुकाया ॥ २२ ॥
गाण्डीवाद्धि तदा संख्ये यथा भ्रमरपङ्क्तयः ।
निष्पतन्ति महाबाणास्तन्मातलिरपूजयत् ॥ २३ ॥
उस समय मेरे गाण्डीव धनुषसे बड़े - बड़े बाण उस युद्ध भूमिमें इस प्रकार छूटते थे, मानो वृक्षसे झुंड - के - झुंड भौंरे उड़ रहे हों । मातलिने मेरे इस कार्यकी बड़ी प्रशंसा
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की ॥ २३ ॥
तेषामपि तु बाणास्ते तन्मातलिरपूजयत् ।
अवाकिरन् मां बलवत् तानहं व्यधमं शरैः ॥ २४ ॥
तदनन्तर उन दानवोंके भी बाण मेरे ऊपर जोर - जोरसे गिरने लगे । मातलिने उनकी उस बाण- वर्षाकी भी सराहना की। फिर मैंने अपने बाणोंद्वारा शत्रुओंके उन सब बाणोंको छिन्न-भिन्न कर डाला ॥ २४ ॥
वध्यमानास्ततस्ते तु निवातकवचाः पुनः ।
शरवर्षैर्महद्भिर्मा समन्तात् पर्यवारयन् ॥ २५ ॥
इस प्रकार मार खाते और मरते रहनेपर भी निवातकवचोंने पुनः भारी बाण - वर्षाके द्वारा मुझे सब ओरसे घेर लिया ॥ २५ ॥
शरवेगान्निहत्याहमस्त्रैरस्त्रविघातिभिः ।
ज्वलद्भिः परमैः शीघ्रैस्तानविध्यं सहस्रशः ॥ २६ ॥
तब मैंने अस्त्र - विनाशक अस्त्रोंद्वारा उनकी बाणवर्षाके वेगको शान्त करके अत्यन्त शीघ्रगामी एवं प्रज्वलित बाणोंद्वारा सहस्रों दैत्योंको घायल कर दिया ॥ २६ ॥
तेषां छिन्नानि गात्राणि विसृजन्ति स्म शोणितम् ।
प्रावृषीवाभिवृष्टानि शृङ्गाण्यथ धराभृताम् ॥ २७ ॥
उनके कटे हुए अंग उसी प्रकार रक्तकी धारा बहाते थे, जैसे वर्षा ऋतुमें वृष्टिके जलसे भीगे हुए पर्वतोंके शिखर ( गेरू आदि धातुओंसे मिश्रित ) जलकी धारा बहाते हैं ॥ २७ ॥
इन्द्राशनिसमस्पर्शेर्वेगवद्भिरजिह्मगैः ।
मद्बाणैर्वध्यमानास्ते समुद्विग्नाः स्म दानवाः ॥ २८ ॥
मेरे बाणोंका स्पर्श इन्द्रके वज्रके समान था । वे बड़े वेगसे छूटते और सीधे जाकर शत्रुको अपना निशाना बनाते थे । उनकी चोट खाकर वे समस्त दानव भयसे व्याकुल हो उठे ॥ २८ ॥
शतधा भिन्नदेहास्ते क्षीणप्रहरणौजसः ।
ततो निवातकवचा मामयुध्यन्त मायया ॥ २ ९ ॥
उन दैत्योंके शरीरके सौ- सौ टुकड़े हो गये थे । उनके अस्त्र- शस्त्र कट गये और उत्साह नष्ट हो गया था । ऐसी अवस्थामें निवातकवचोंने मेरे साथ माया- युद्ध आरम्भ कर दिया ॥ २ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें एक सौ सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७० ||
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Fut F2I CL) Kos Fas
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एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः दानवोंके मायामय युद्धका वर्णन अर्जुनउवाच
ततोऽश्मवर्षं सुमहत् प्रादुरासीत् समन्ततः ।
नगमात्रैः शिलाखण्डैस्तन्मां दृढमपीडयत् ॥ १ ॥
अर्जुन बोले- महाराज! तदनन्तर चारों ओरसे पत्थरोंकी बड़ी भारी वर्षा आरम्भ हो गयी। वृक्षोंके बराबर ऊँचे शिलाखण्ड रणभूमिमें गिरने लगे, इससे मुझे बड़ी पीड़ा हुई ॥ १ ॥
तदहं वज्रसंकाशैर्महेन्द्रास्त्रप्रचोदितैः ।
अचूर्णयं वेगवद्भिः शरजालैर्महाहवे ॥ २ ॥
तब मैंने महेन्द्रास्त्रसे अभिमन्त्रित वज्रतुल्य वेगवान् बाणोंद्वारा उस महासमरमें गिरनेवाले समस्त शिला- खण्डोंको चूर- चूर कर दिया ॥ २ ॥
चूर्ण्यमानेऽश्मवर्षे तु पावकः समजायत ।
तत्राश्मचूर्णान्यपतन् पावकप्रकरा इव ॥ ३ ॥
पत्थरोंकी वर्षाके चूर्ण होते ही सब ओर आग प्रकट हो गयी । फिर तो वहाँ आगकी चिनगारियोंके समूहकी भाँति पत्थरका चूर्ण पड़ने लगा ॥ ३ ॥
ततोऽश्मवर्षे विहते जलवर्षं महत्तरम् ।
धाराभिरक्षमात्राभिः प्रादुरासीन्ममान्तिके ॥ ४ ॥
तदनन्तर मेरे बाणोंसे वह पत्थरोंकी वर्षा शान्त होनेपर महत्तर जल- वृष्टि आरम्भ हो गयी । मेरे पासही सर्पोंके * समान मोटी जलधाराएँ गिरने लगीं ॥ ४ ॥
नभसः प्रच्युता धारास्तिग्मवीर्याः सहस्रशः ।
आवृण्वन् सर्वतो व्योम दिशश्चोपदिशस्तथा ॥ ५ ॥
आकाशसे प्रचण्ड शक्तिशालिनी सहस्रों धाराएँ बरसने लगीं, जिन्होंने न केवल आकाशको ही, अपितु सम्पूर्ण दिशाओं और उपदिशाओंको भी सब ओरसे ढक लिया ॥ ५ ॥
धाराणां च निपातेन वायोर्विस्फूर्जितेन च ।
गर्जितेन च दैत्यानां न प्राज्ञायत किंचन ॥ ६ ॥
धाराओंकी वर्षा, हवाके झकोरों और दैत्योंकी गर्जनासे कुछ भी जान नहीं पड़ता था ॥ ६ ॥
धारा दिवि च सम्बद्धा वसुधायां च सर्वशः ।
व्यामोहयन्त मां तत्र निपतन्त्योऽनिशं भुवि ॥ ७ ॥