श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1161–1170

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1161–1170

पृष्ठ 1161

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स्वर्गसे लेकर पृथ्वीतक एक सूत्रमें आबद्ध- सी होकर पृथ्वीपर सब ओर जलकी धाराएँ लगातार गिर रही थीं, जिन्होंने वहाँ मुझे मोहमें डाल दिया था ॥ ७ ॥

तत्रोपदिष्टमिन्द्रेण दिव्यमस्त्रं विशोषणम् ।

दीप्तं प्राहिणवं घोरमशुष्यत् तेन तज्जलम् ॥ ८ ॥

तब मैंने वहाँ देवराज इन्द्रके द्वारा प्राप्त हुए दिव्य विशोषणास्त्रका प्रयोग किया, जो

अत्यन्त तेजस्वी और भयंकर था । उससे वर्षाका वह सारा जल सूख गया ॥ ८ ॥

हतेऽश्मवर्षे च मया जलवर्षे च शोषिते ।

मुमुचुर्दानवा मायामग्निं वायुं च भारत ॥ ९ ॥

भारत! जब मैंने पत्थरोंकी वर्षा शान्त कर दी और पानीकी वर्षाको भी सोख लिया, तब दानवलोग मुझपर मायामय अग्नि और वायुका प्रयोग करने लगे ॥ ९ ॥

ततोऽहमग्निं व्यधमं सलिलास्त्रेण सर्वशः ।

शैलेन च महास्त्रेण वायोर्वेगमधारयम् ॥ १० ॥

फिर तो मैंने वारुणास्त्रसे वह सारी आग बुझा दी और महान् शैलास्त्रका प्रयोग करके मायामय वायुका वेग कुण्ठित कर दिया ॥ १० ॥

तस्यां प्रतिहतायां ते दानवा युद्धदुर्मदाः ।

प्राकुर्वन् विविधां मायां यौगपद्येन भारत ॥ ११ ॥

भारत! उस मायाका निवारण हो जानेपर वे रणोन्मत्त दानव एक ही समय अनेक प्रकारकी मायाका प्रयोग करने लगे ॥ ११ ॥

ततो वर्षं प्रादुरभूत् सुमहल्लोमहर्षणम् ।

अस्त्राणां घोररूपाणामग्नेर्वायोस्तथाश्मनाम् ॥ १२ ॥

फिर तो भयानक अस्त्रोंकी तथा अग्नि, वायु और पत्थरोंकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी जो रोंगटे खड़े कर देनेवाली थी ॥ १२ ॥

सा तु मायामयी वृष्टिः पीडयामास मां युधि ।

अथ घोरं तमस्तीव्रं प्रादुरासीत् समन्ततः ॥ १३ ॥

उस मायामयी वर्षाने युद्धमें मुझे बड़ी पीड़ा दी। तदनन्तर चारों ओर महाभयानक अन्धकार छा गया ॥ १३ ॥

तमसा संवृते लोके घोरेण परुषेण च ।

हरयो विमुखाश्चासन् प्रास्खलच्चापि मातलिः ॥ १४ ॥

घोर एवं दुःसह तिमिरराशिसे सम्पूर्ण लोकोंके आच्छादित हो जानेपर मेरे रथके घोड़े युद्धसे विमुख हो गये और मातलि भी लड़खड़ाने लगे ॥ १४ ॥

हस्ताद्धि रश्मयश्चास्य प्रतोदः प्रापतद् भुवि ।

असकृच्चाह मां भीतः क्यासीति भरतर्षभ ॥ १५ ॥

पृष्ठ 1162

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उनके हाथसे घोड़ोंके लगाम और चाबुक पृथ्वीपर गिर पड़े और वे भयभीत होकर बार- बार मुझसे पूछने लगे— ' भरतश्रेष्ठ अर्जुन! तुम कहाँ हो? ' ॥ १५ ॥

मां च भीराविशत् तीव्रा तस्मिन् विगतचेतसि ।

स च मां विगतज्ञानः संत्रस्तमिदमब्रवीत् ॥ १६ ॥

मातलिके बेसुध होनेपर मेरे मनमें भी अत्यन्त भय समा गया । तब सुध - बुध खोये हुए मातलिने मुझ भयभीत योद्धासे इस प्रकार कहा— ॥ १६ ॥

सुराणामसुराणां च संग्रामः सुमहानभूत् ।

अमृतार्थं पुरा पार्थ स च दृष्टो मयानघ ॥ १७ ॥

'निष्पाप कुन्तीकुमार! प्राचीन कालमें अमृतकी प्राप्तिके लिये देवताओं और दैत्योंमें अत्यन्त घोर संग्राम हुआ था, जिसे मैंने अपनी आँखों देखा है ॥ १७ ॥

शम्बरस्य वधे घोरः संग्रामः सुमहानभूत् ।

सारथ्यं देवराजस्य तत्रापि कृतवानहम् ॥ १८ ॥

‘ शम्बरासुरके वधके समय भी अत्यन्त भयानक युद्ध हुआ था । उसमें भी मैंने देवराज इन्द्रके सारथिका कार्य सँभाला था ॥ १८ ॥

तथैव वृत्रस्य वधे संगृहीता हया मया ।

वैरोचनेर्महायुद्धं दृष्टं चापि सुदारुणम् ॥ १ ९ ॥

‘ इसी प्रकार वृत्रासुरके वधके समय भी मैंने ही घोड़ोंकी बागडोर हाथमें ली थी ।

विरोचनकुमार बलिका अत्यन्त भयंकर महासंग्राम भी मेरा देखा हुआ है ॥ १ ९ ॥

एते मया महाघोराः संग्रामाः पर्युपासिताः ।

न चापि विगतज्ञानोऽभूतपूर्वोऽस्मि पाण्डव ॥ २० ॥

‘ ये बड़े -बड़े भयानक युद्ध मैंने देखे हैं, उनमें भाग लिया है, परंतु पाण्डुनन्दन! आजसे पहले कभी भी मैं इस प्रकार अचेत नहीं हुआ था ॥ २० ॥

पितामहेन संहारः प्रजानां विहितो ध्रुवम् ।

न हि युद्धमिदं युक्तमन्यत्र जगतः क्षयात् ॥ २१ ॥

‘ जान पड़ता है, विधाताने आज समस्त प्रजाका संहार निश्चित किया है, अवश्य ऐसी ही बात है । जगत्के संहारके अतिरिक्त अन्य समयमें ऐसे भयानक युद्धका होना सम्भव नहीं है ' ॥ २१ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।

मोहयिष्यन् दानवानामहं मायाबलं महत् ॥ २२ ॥

अब्रुवं मातलिं भीतं पश्य मे भुजयोर्बलम् ।

अस्त्राणां च प्रभावं वै धनुषो गाण्डिवस्य च ॥ २३ ॥

अद्यास्त्रमाययैतेषां मायामेतां सुदारुणाम् ।

विनिहन्मि तमश्चोग्रं मा भैः सूत स्थिरो भव ॥ २४ ॥

पृष्ठ 1163

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मातलिका यह वचन सुनकर मैंने स्वयं ही अपने- आपको सँभाला और दानवोंके उस महान् मायाबलका निवारण करते हुए भयभीत मातलिसे कहा - ' सूत! आप डरें मत । स्थिरतापूर्वक रथपर बैठे रहें और देखें, मेरी इन भुजाओंमें कितना बल है? मेरे गाण्डीव धनुष तथा अस्त्रोंका कैसा प्रभाव है? आज मैं अपने अस्त्रोंकी मायासे इन दानवोंकी इस भयंकर माया तथा घोर अन्धकारका विनाश किये देता हूँ' ॥ २२–२४ ॥

एवमुक्त्वाहमसृजमस्त्रमायां नराधिप ।

मोहनीं सर्वभूतानां हिताय त्रिदिवौकसाम् ॥ २५ ॥

नरेश्वर! ऐसा कहकर मैंने देवताओंके हितके लिये अस्त्रसम्बन्धिनी मायाकी सृष्टि की, जो समस्त प्राणियोंको मोहमें डालनेवाली थी ॥ २५ ॥

पीड्यमानासु मायासु तासु तास्वसुरोत्तमाः ।

पुनर्बहुविधा मायाः प्राकुर्वन्नमितौजसः ॥ २६ ॥

उससे असुरोंकी वे सारी मायाएँ नष्ट हो गयीं । तब उन अमित तेजस्वी दानवराजाओंने पुनः नाना प्रकारकी मायाएँ प्रकट कीं ॥ २६ ॥

पुनः प्रकाशमभवत् तमसा ग्रस्यते पुनः ।

भवत्यदर्शनो लोकः पुनरप्सु निमज्जति ॥ २७ ॥

इससे कभी तो प्रकाश छा जाता था और कभी सब कुछ अन्धकारमें विलीन हो जाता था । कभी सम्पूर्ण जगत् अदृश्य हो जाता और कभी जलमें डूब जाता था ॥ २७ ॥

सुसंगृहीतैर्हरिभिः प्रकाशे सति मातलिः ।

व्यचरत् स्वन्दनाग्रयेण संग्रामे लोमहर्षणो ॥ २८ ॥

तदनन्तर प्रकाश होनेपर मातलिने घोड़ोंको काबूमें करके अपने श्रेष्ठ रथके द्वारा उस रोमांचकारी संग्राममें विचरना प्रारम्भ किया ॥ २८ ॥

ततः पर्यपतन्नुग्रा निवातकवचा मयि ।

तानहं विवरं दृष्ट्वा प्राहिण्यं यमसादनम् ॥ २ ९ ॥

तब भयानक निवातकवच चारों ओरसे मेरे ऊपर टूट पड़े । उस समय मैंने अवसर देख-देखकर उन सबको यमलोक भेज दिया ॥ २ ९ ॥

वर्तमाने तथा युद्धे निवातकवचान्तके ।

नापश्यं सहसा सर्वान् दानवान् माययाऽऽवृतान् ॥ ३० ॥

वह युद्ध निवातकवचोंके लिये विनाशकारी था । अभी युद्ध हो ही रहा था कि सहसा

सारे दानव अन्तर्धानी मायासे छिप गये । अतः मैं किसीको भी देख न सका ॥ ३० ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि मायायुद्धे एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७१ ॥

पृष्ठ 1164

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इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें मायायुद्धविषयक एक सौ इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७१ ॥

* कोसोंमें ‘ अक्ष ' शब्दका अर्थ ' सर्प' भी मिलता है ।

पृष्ठ 1165

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द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः निवातकवचोंका संहार अर्जुनउवाच

अदृश्यमानास्ते दैत्या योधयन्ति स्म मायया ।

अदृश्येनास्त्रवीर्येण तानप्यहमयोधयम् ॥ १ ॥

अर्जुन बोले- राजन्! इस प्रकार अदृश्य रहकर ही वे दैत्य मायाद्वारा युद्ध करने लगे तथा मैं भी अपने अस्त्रोंकी अदृश्य शक्तिके द्वारा ही उनका सामना करने लगा ॥ १ ॥

गाण्डीवमुक्ता विशिखाः सम्यगस्त्रप्रचोदिताः ।

अच्छिन्दन्नुत्तमाङ्गानि यत्र यत्र स्म तेऽभवन् ॥ २ ॥

मेरे गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाण विधिवत् प्रयुक्त दिव्यास्त्रोंसे प्रेरित हो जहाँ - जहाँ वे दैत्य थे, वहीं जाकर उनके सिर काटने लगे ॥ २ ॥

ततो निवातकवचा वध्यमाना मया युधि ।

संहृत्य मायां सहसा प्राविशन् पुरमात्मनः ॥ ३ ॥

जब मैं इस प्रकार युद्धक्षेत्रमें उनका संहार करने लगा, तब वे निवातकवच दानव अपनी मायाको समेटकर सहसा नगरमें घुस गये ॥ ३ ॥

व्यपयातेषु दैत्येषु प्रादुर्भूते च दर्शने ।

अपश्यं दानवांस्तत्र हतान् शतसहस्रशः ॥ ४ ॥

दैत्योंके भाग जानेसे जब वहाँ सब कुछ स्पष्ट दिखायी देने लगा, तब मैंने देखा, लाखों दानव वहाँ मरे पड़े थे ॥ ४ ॥

विनिष्पिष्टानि तत्रैषां शस्त्राण्याभरणानि च ।

शतशः स्म प्रदृश्यन्ते गात्राणि कवचानि च ॥ ५ ॥

हयानां नान्तरं ह्यासीत् पदाद् विचलितुं पदम् ।

उत्पत्य सहसा तस्थुरन्तरिक्षगमास्ततः ॥ ६ ॥

उनके अस्त्र - शस्त्र और आभूषण भी पिसकर चूर्ण हो गये थे । दानवोंके शरीरों और कवचोंके सौ - सौ टुकड़े दिखायी देते थे । वहाँ दैत्योंकी इतनी लाशें पड़ी थी कि घोड़ोंके लिये एकके बाद दूसरा पैर रखनेके लिये कोई स्थान नहीं रह गया था । अतः वे अन्तरिक्षचारी अश्व वहाँसे सहसा उछलकर आकाशमें खड़े हो गये ॥ ५-६ ॥

ततो निवातकवचा व्योम संछाद्य केवलम् ।

अदृश्या ह्यत्यवर्तन्त विसृजन्तः शिलोच्चयान् ॥ ७ ॥

तदनन्तर निवातकवचोंने अदृश्यरूपसे ही आक्रमण किया और केवल आकाशको आच्छादित करके पत्थरोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1166

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अन्तर्भूमिगताश्चान्ये हयानां चरणान्यथ ।

व्यगृह्णन् दानवा घोरा रथचक्रे च भारत ॥ ८ ॥

भरतनन्दन! कुछ भयंकर दानवोंने, जो पृथ्वीके भीतर घुसे हुए थे, मेरे घोड़ोंके पैर तथा रथके पहिये पकड़ लिये ॥ ८ ॥

विनिगृह्य हरीनश्वान् रथं च मम युध्यतः ।

सर्वतो मामविध्यन्त सरथं धरणीधरैः ॥ ९ ॥

इस प्रकार युद्ध करते समय मेरे हरे रंगके घोड़ों तथा रथको पकड़कर उन दानवोंने रथसहित मेरे ऊपर सब ओरसे शिलाखण्डोंद्वारा प्रहार आरम्भ किया ॥ ९ ॥

पर्वतैरुपचीयद्भिः पतमानैस्तथापरैः ।

स देशो यत्र वर्ताम गुहेव समपद्यत ॥ १० ॥

नीचे पर्वतोंके ढेर लग रहे थे और ऊपरसे नयी - नयी चट्टानें पड़ रही थीं । इससे वह प्रदेश जहाँ हमलोग मौजूद थे, एक गुफाके समान बन गया ॥ १० ॥

पर्वतैश्छाद्यमानोऽहं निगृहीतैश्च वाजिभिः ।

अगच्छं परमामार्तिं मातलिस्तदलक्षयत् ॥ ११ ॥

एक ओर तो मैं शिलाखण्डोंसे आच्छादित हो रहा था, दूसरी ओर मेरे घोड़े पकड़ लिये जानेसे रथकी गति कुण्ठित हो गयी थी। इस विवशताकी दशामें मुझे बड़ी पीड़ा होने लगी, जिसे मातलिने जान लिया ॥ ११ ॥

लक्षयित्वा च मां भीतमिदं वचनमब्रवीत् ।

अर्जुनार्जुन मा भैस्त्वं वज्रमस्त्रमुदीरय ॥ १२ ॥

इस प्रकार मुझे भयभीत हुआ देख मातलिने कहा– ' अर्जुन! अर्जुन! तुम डरो मत ।

इस समय वज्रास्त्रका प्रयोग करो' ॥ १२ ॥

ततोऽहं तस्य तद् वाक्यं श्रुत्वा वज्रमुदीरयम् ।

देवराजस्य दयितं भीममस्त्रं नराधिप ॥ १३ ॥

महाराज! मातलिका वह वचन सुनकर मैंने देवराजके परम प्रिय तथा भयंकर अस्त्र वज्रका प्रयोग किया ॥ १३ ॥

अचलं स्थानमासाद्य गाण्डीवमनुमन्त्र्य च ।

अमुञ्चं वज्रसंस्पर्शानायसान् निशितान् शरान् ॥ १४ ॥

अविचल स्थानका आश्रय ले गाण्डीव धनुषको वज्रास्त्रसे अभिमन्त्रित करके मैंने लोहेके तीखे बाण छोड़े, जिनका स्पर्श वज्रके समान कठोर था ॥ १४ ॥

ततो मायाश्च ताः सर्वा निवातकवचांश्च तान् ।

ते वज्रचोदिता बाणा वज्रभूताः समाविशन् ॥ १५ ॥

तदनन्तर वज्रास्त्रसे प्रेरित हुए वे वज्रस्वरूप बाण पूर्वोक्त सारी मायाओं तथा निवातकवच दानवोंके भीतर घुस गये ॥ १५ ॥

पृष्ठ 1167

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ते वज्रवेगविहता दानवाः पर्वतोपमाः ।

इतरेतरमाश्लिष्य न्यपतन् पृथिवीतले ॥ १६ ॥

फिर तो वज्रके वेगसे मारे गये वे पर्वताकार दानव एक-दूसरेका आलिंगन करते हुए धराशायी हो गये ॥ १६ ॥

अन्तर्भूमौ च येऽगृह्णन् दानवा रथवाजिनः ।

अनुप्रविश्य तान् बाणाः प्राहिण्वन् यमसादनम् ॥ १७ ॥

पृथ्वीके भीतर घुसकर जिन दानवोंने मेरे रथके घोड़ोंको पकड़ रखा था, उनके शरीरमें भी घुसकर मेरे बाणोंने उन सबको यमलोक भेज दिया ॥ १७ ॥

हतैर्निवातकवचैर्निरस्तैः पर्वतोपमैः ।

समाच्छाद्यत देशः स विकीर्णैरिव पर्वतैः ॥ १८ ॥

वहाँ मरकर गिरे हुए पर्वताकार निवातकवच इधर - उधर बिखरे हुए पर्वतोंके समान जान पड़ते थे । वहाँका सारा प्रदेश उनकी लाशोंसे पट गया था ॥ १८ ॥

न हयानां क्षतिः काचिन्न रथस्य न मातलेः ।

मम चादृश्यत तदा तदद्भुतमिवाभवत् ॥ १ ९ ॥

उस समयके युद्धमें न तो घोड़ोंको कोई हानि पहुँची, न रथका ही कोई सामान टूटा, न मातलिको ही चोट लगी और न मेरे ही शरीरमें कोई आघात दिखायी दिया, यह एक अद्भुत-सी बात थी ॥ १ ९ ॥

ततो मां प्रहसन् राजन् मातलिः प्रत्यभाषत ।

नैतदर्जुन देवेषु त्वयि वीर्यं यदीक्ष्यते ॥ २० ॥

तब मातलिने हँसते हुए मुझसे कहा- ' अर्जुन! तुममें जो पराक्रम दिखायी देता है, वह देवताओंमें भी नहीं है ' ॥ २० ॥

हतेष्वसुरसंघेषु दारास्तेषां तु सर्वशः ।

प्राक्रोशन् नगरे तस्मिन् यथा शरदि सारसाः ॥ २१ ॥

उन असुरसमूहोंके मारे जानेपर उनकी सारी स्त्रियाँ उस नगरमें जोर- जोरसे करुण क्रन्दन करने लगीं, मानो शरत्कालमें सारस पक्षी बोल रहे हों ॥ २१ ॥

ततो मातलिना सार्धमहं तत् पुरमभ्ययाम् ।

त्रासयन् रथघोषेण निवातकवचस्त्रियः ॥ २२ ॥

तब मैं मातलिके साथ रथकी घर्घराहटसे निवातकवचोंकी स्त्रियोंको भयभीत करता हुआ उस दैत्य - नगरमें गया ॥ २२ ॥

तान् दृष्ट्वा दशसाहस्रान् मयूरसदृशान् हयान् ।

रथं च रविसंकाशं प्राद्रवन् गणशः स्त्रियः ॥ २३ ॥

मोरके समान सुन्दर उन दस हजार घोड़ोंको तथा सूर्यके समान तेजस्वी उस दिव्य रथको देखते ही झुंड - की-झुंड दानवस्त्रियाँ इधर- उधर भाग चलीं ॥ २३ ॥

पृष्ठ 1168

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ताभिराभरणैः शब्दस्त्रासिताभिः समीरितः ।

शिलानामिव शैलेषु पतन्तीनामभूत् तदा ॥ २४ ॥

उन डरी हुई निशाचरियोंके आभूषणोंके द्वारा उत्पन्न हुआ शब्द पर्वतोंपर पड़ती हुई शिलाओंके समान जान पड़ता था ॥ २४ ॥

वित्रस्ता दैत्यनार्यस्ताः स्वानि वेश्मान्यथाविशन् ।

बहुरत्नविचित्राणि शातकुम्भमयानि च ॥ २५ ॥

तत्पश्चात् वे भयभीत हुई दैत्यनारियाँ अपने - अपने घरोंमें घुस गयीं। उनके महल सोनेके बने हुए थे और अनेक प्रकारके रत्नोंसे उनकी विचित्र शोभा होती थी ॥ २५ ॥

तदद्भुताकारमहं दृष्ट्वा नगरमुत्तमम् ।

विशिष्टं देवनगरादपृच्छं मातलिं ततः ॥ २६ ॥

वह उत्तम एवं अद्भुत नगर देवपुरीसे भी श्रेष्ठ दिखायी देता था । तब उसे देखकर मैंने मातलिसे पूछा— ॥ २६ ॥

इदमेवंविधं कस्माद् देवा नावासयन्त्युत ।

पुरंदरपुराद्धीदं विशिष्टमिति लक्षये ॥ २७ ॥

‘ सारथे! देवतालोग ऐसा नगर क्यों नहीं बसाते हैं? यह नगर तो मुझे इन्द्रपुरीसे भी बढ़कर दिखायी देता है ' ॥ २७ ॥

मातलिरुवाच आसीदिदं पुरा पार्थ देवराजस्य नः पुरम् ततो निवातकवचैरितः प्रच्याविताः सुराः ॥ २८ ॥

मातलि बोले — पार्थ! पूर्वकालमें यह नगर हमारे देवराजके ही अधिकारमें था । फिर निवातकवचोंने आकर देवताओंको यहाँसे निकाल दिया ॥ २८ ॥

तपस्तप्त्वा महत् तीव्रं प्रसाद्य च पितामहम् इदं वृतं निवासाय देवेभ्यश्चाभयं युधि ॥ २ ९ ॥ उन्होंने अत्यन्त तीव्र तपस्या करके पितामह ब्रह्माजीको प्रसन्न किया और उनसे अपने रहनेके लिये यही नगर माँग लिया । साथ ही यह भी माँगा कि ' हमें युद्धमें देवताओंसे भय न हो ' ॥ २ ९ ॥ ततः शक्रेण भगवान् स्वयंभूरिति चोदितः विधत्तां भगवानन्तमात्मनो हितकाम्यया ॥ ३० ॥

तब इन्द्रने भगवान् ब्रह्माजीसे इस प्रकार निवेदन किया- ' प्रभो! अपने ( और हमारे ) हितके लिये आप ही इन दानवोंका अन्त कीजिये ' ॥ ३० ॥

तत उक्तो भगवता दिष्टमत्रेति भारत भवितान्तस्त्वमप्येषां देहेनान्येन शत्रुहन् ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 1169

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भरतनन्दन! उनके ऐसा कहनेपर भगवान् ब्रह्माने कहा- ' शत्रुदमन देवराज! इसमें दैवका यही विधान है कि तुम्हीं दूसरा शरीर धारण करके इन दानवोंका अन्त कर सकोगे ' ॥ ३१ ॥

तत एषां वधार्थाय शक्रोऽस्त्राणि ददौ तव न हि शक्याः सुरैर्हन्तुं य एते निहतास्त्वया ॥ ३२ ॥

( अर्जुन! तुम्हीं इन्द्रके दूसरे स्वरूप हो। ) इन दैत्योंके वधके लिये ही इन्द्रने तुम्हें दिव्यास्त्र प्रदान किये हैं । आज जो ये दानव तुम्हारे हाथों मारे गये हैं, इन्हें देवता नहीं मार सकते थे ॥ ३२ ॥

कालस्य परिणामेन ततस्त्वमिह भारत एषामन्तकरः प्राप्तस्तत् त्वया च कृतं तथा ॥ ३३ ॥

भारत! समयके फेरसे ही तुम इनका विनाश करनेके लिये यहाँ आ पहुँचे हो और तुमने जैसा दैवका विधान था, उसके अनुसार इनका संहार कर डाला है ॥ ३३ ॥

दानवानां विनाशाय अस्त्राणां परमं बलम् ग्राहितस्त्वं महेन्द्रेण पुरुषेन्द्र तदुत्तमम् ॥ ३४ ॥

पुरुषोत्तम! देवराज इन्द्रने इन दानवोंके विनाशके उद्देश्यसे ही तुम्हें परम उत्तम अस्त्रबलकी प्राप्ति करायी है ॥ ३४ ॥

अर्जुनउवाच ततः प्रशाम्य नगरं दानवांश्च निहत्य तान् पुनर्मातलिना सार्धमगच्छं देवसद्म तत् ॥ ३५ ॥

अर्जुन कहते हैं - महाराज! इस प्रकार उन दानवोंका संहार करके नगरमें शान्ति स्थापित करनेके पश्चात् मैं मातलिके साथ पुनः उस देवलोकको लौट आया ॥ ३५ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि निवातकवचयुद्धे द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें निवातकवचयुद्धविषयक एक सौ बहत्तरवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १७२ ॥

पृष्ठ 1170

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त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः अर्जुनद्वारा हिरण्यपुरवासी पौलोम तथा कालकेयोंका वध और इन्द्रद्वारा अर्जुनका अभिनन्दन अर्जुन उवाच निवर्तमानेन मया महद् दृष्टं ततोऽपरम् पुरं कामचरं दिव्यं पावकार्कसमप्रभम् ॥ १ ॥

अर्जुन बोले — राजन्! तत्पश्चात् लौटते समय मार्गमें मैंने एक दूसरा दिव्य एवं विशाल नगर देखा, जो अग्नि और सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था । वह अपने निवासियोंकी इच्छाके अनुसार सर्वत्र आ- जा सकता था ॥ १ ॥

रत्नद्रुममयैश्चित्रैः सुस्वरैश्च पतत्त्रिभिः पौलोमैः कालकजैश्च नित्यहृष्टै रधिष्ठितम् ॥ २ ॥

विचित्र रत्नमय वृक्ष और मधुर स्वरमें बोलनेवाले पक्षी उस नगरकी शोभा बढ़ाते थे ।

पौलोम और कालकञ्ज नामक दानव सदा प्रसन्नतापूर्वक वहाँ निवास करते थे ॥ २ ॥

गोपुराट्टालकोपेतं चतुर्द्वारं दुरासदम् सर्वरत्नमयं दिव्यमद्भुतोपमदर्शनम् ॥ ३ ॥

उस नगरमें ऊँचे - ऊँचे गोपुरोंसहित सुन्दर अट्टालिकायें सुशोभित थीं । उसमें चारों दिशाओंमें एक - एक करके चार फाटक लगे थे । शत्रुओंके लिये उस नगरमें प्रवेश पाना अत्यन्त कठिन था । सब प्रकारके रत्नोंसे निर्मित वह दिव्य नगर अद्भुत दिखायी देता था ॥ ३ ॥

द्रुमैः पुष्पफलोपेतैः सर्वरत्नमयैर्वृतम् तथा पतत्त्रिभिर्दिव्यैरुपेतं सुमनोहरैः ॥ ४ ॥

फल और फूलोंसे भरे हुए सर्वरत्नमय वृक्ष नगरको सब ओरसे घेरे हुए थे तथा वह नगर दिव्य एवं अत्यन्त मनोहर पक्षियोंसे युक्त था ॥ ४ ॥

असुरैर्नित्यमुदितैः शूलर्टिमुसलायुधैः चापमुद्गरहस्तैश्च स्रग्विभिः सर्वतो वृतम् ॥ ५ ॥

सदा प्रसन्न रहनेवाले बहुत- से असुर गलेमें सुन्दर माला धारण किये और हाथोंमें शूल, ऋष्टि, मुसल, धनुष तथा मुद्गर आदि अस्त्र- शस्त्र लिये सब ओरसे घेरकर उस नगरकी रक्षा करते थे ॥ ५ ॥

तदहं प्रेक्ष्य दैत्यानां पुरमद्भुतदर्शनम् अपृच्छं मातलिं राजन् किमिदं वर्ततेऽद्भुतम् ॥ ६ ॥