श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1141–1150

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1141–1150

पृष्ठ 1141

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' मेरी आज्ञासे मातलि तुम्हें स्वर्गमें पहुँचा देगा । पाण्डवश्रेष्ठ! यहाँ रहकर जो तुम अत्यन्त दुष्कर तप कर रहे हो, इसके कारण देवताओं तथा महात्मा मुनियोंमें तुम्हारी ख्याति बहुत बढ़ गयी है ' ॥ २३ ॥

ततोऽहमब्रुवं शक्रं प्रसीद भगवन् मम ।

आचार्यं वरयेयं त्वामस्त्रार्थं त्रिदशेश्वर ॥ २४ ॥

तब मैंने देवराज इन्द्रसे कहा- ' भगवन्! आप मुझपर प्रसन्न होइये । देवेश्वर! मैं अस्त्रविद्याकी प्राप्तिके लिये आपको अपना आचार्य बनाता हूँ' ॥ २४ ॥

इन्द्र उवाच

क्रूरकर्मास्त्रवित् तात भविष्यसि परंतप ।

यदर्थमस्त्राणीप्सुस्त्वं तं कामं पाण्डवाप्नुहि ॥ २५ ॥

इन्द्रने कहा — परंतप तात अर्जुन! दिव्य अस्त्र- शस्त्रोंका ज्ञान प्राप्त कर लेनेपर तुम भयंकर कर्म करने लगोगे । अतः पाण्डुनन्दन! मेरी इच्छा है कि तुम जिसके लिये अस्त्रोंकी शिक्षा प्राप्त करना चाहते हो, तुम्हारा वह उद्देश्य पूर्ण हो ॥ २५ ॥

ततोऽहमब्रुवं नाहं दिव्यान्यस्त्राणि शत्रुहन् ।

मानुषेषु प्रयोक्ष्यामि विनास्त्रप्रतिघातनात् ॥ २६ ॥

यह सुनकर मैंने उत्तर दिया– ' शत्रुघाती देवेश्वर! मैं शत्रुओं द्वारा प्रयुक्त दिव्यास्त्रोंका निवारण करनेके सिवा अन्य किसी अवसरपर मनुष्योंके ऊपर दिव्यास्त्रोंका प्रयोग नहीं करूँगा ॥ २६ ॥

तानि दिव्यानि मेऽस्त्राणि प्रयच्छ विबुधाधिप ।

लोकांश्चास्त्रजितान् पश्चाल्लभेयं सुरपुङ्गव ॥ २७ ॥

‘ देवराज! सुरश्रेष्ठ! आप मुझे वे दिव्य अस्त्र प्रदान करें । अस्त्रविद्या सीखनेके पश्चात् मैं उन्हीं अस्त्रोंके द्वारा जीते हुए लोकोंपर अधिकार प्राप्त करना चाहता हूँ' ॥ २७ ॥

इन्द्र उवाच

परीक्षार्थं मयैतत् ते वाक्यमुक्तं धनंजय ।

ममात्मजस्य वचनं सूपपन्नमिदं तव II २८ ॥

इन्द्र बोले — धनंजय! मैंने तुम्हारी परीक्षा लेनेके लिये उपर्युक्त बात कही थी । तुमने जो अस्त्रविद्याके प्रति अत्यन्त उत्सुकता प्रकट की है, वह तुम्हारे जैसे मेरे पुत्रके अनुरूप ही है ॥ २८ ॥

शिक्ष मे भवनं गत्वा सर्वाण्यस्त्राणि भारत ।

वायोरग्नेर्वसुभ्योऽपि वरुणात् समरुद्गणात् ॥ २ ९ ॥

साध्यं पैतामहं चैव गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।

वैष्णवानि च सर्वाणि नैर्ऋतानि तथैव च ॥ ३० ॥

पृष्ठ 1142

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मद्गतानि च जानीहि सर्वास्त्राणि कुरुद्वह ।

एवमुक्त्वा तु मां शक्रस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ३१ ॥

भारत! तुम मेरे भवनमें चलकर सम्पूर्ण अस्त्रोंकी शिक्षा प्राप्त करो । कुरुश्रेष्ठ! वायु, अग्नि, वसु, वरुण, मरुद्गण, साध्यगण, ब्रह्मा, गन्धर्वगण, नाग, राक्षस, विष्णु तथा निरृतिके और स्वयं मेरे भी सम्पूर्ण अस्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करो, मुझसे ऐसा कहकर इन्द्र वहीं अन्तर्धान हो गये ॥

अथापश्यं हरियुजं रथमैन्द्रमुपस्थितम् ।

दिव्यं मायामयं पुण्यं यत्तं मातलिना नृप ॥ ३२ ॥

तदनन्तर थोड़ी ही देरमें मुझे हरे रंगके घोड़ोंसे जुता हुआ देवराज इन्द्रका रथ वहाँ उपस्थित दिखायी दिया। राजन्! वह दिव्य मायामय पवित्र रथ मातलिके द्वारा नियन्त्रित था ॥ ३२ ॥

लोकपालेषु यातेषु मामुवाचाथ मातलिः ।

द्रष्टुमिच्छति शक्रस्त्वां देवराजो महाद्युते ॥ ३३ ॥

जब सभी लोकपाल चले गये, तब मातलिने मुझसे कहा - ' महातेजस्वी वीर! देवराज इन्द्र तुमसे मिलना चाहते हैं ॥ ३३ ॥

संसिद्धयस्व महाबाहो कुरु कार्यमनन्तरम् ।

पश्य पुण्यकृताँल्लोकान् सशरीरो दिवं व्रज ॥ ३४ ॥

' महाबाहो! तुम उनसे मिलकर कृतार्थ होओ और अब आवश्यक कार्य करो । इसी शरीरसे देवलोकमें चलो तथा पुण्यात्मा पुरुषोंके लोकोंका दर्शन करो ॥ ३४ ॥

देवराजः सहस्राक्षस्त्वां दिदृक्षति भारत ।

इत्युक्तोऽहं मातलिना गिरिमामन्त्र्य शैशिरम् ॥ ३५ ॥

प्रदक्षिणमुपावृत्य समारोहं रथोत्तमम् । ‘ भरतनन्दन! सहस्र नेत्रोंवाले देवराज इन्द्र तुम्हें देखना चाहते हैं । ' मातलिके ऐसा कहनेपर मैं हिमालयसे आज्ञा ले रथकी परिक्रमा करके उस श्रेष्ठ रथमें सवार हुआ ॥ ३५३ ||

पृष्ठ 1143

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चोदयामास स हयान् मनोमारुतरंहसः ॥ ३६ ॥

मातलिर्हयतत्त्वज्ञो यथावद् भूरिदक्षिणः । मातलि अश्वसंचालनकी कलाके मर्मज्ञ थे । सारथिके कार्यमें अत्यन्त कुशल थे । उन्होंने मन तथा वायुके समान वेगशाली अश्वोंको यथोचित रीतिसे आगे बढ़ाया ॥ ३६ ॥

अवैक्षत च मे वक्त्रं स्थितस्याथ स सारथिः ॥ ३७ ॥

तथा भ्रान्ते रथे राजन् विस्मितश्चेदमब्रवीत् । राजन्! उस समय देवसारथि मातलिने आकाशमें चक्कर लगाते हुए रथपर स्थिरतापूर्वक बैठे हुए मेरे मुखकी ओर दृष्टिपात किया और आश्चर्यचकित होकर कहा ॥ ३७ ॥

अत्यद्भुतमिदं त्वद्य विचित्रं प्रतिभाति मे ॥ ३८ ॥

यदास्थितो रथं दिव्यं पदान्न चलितः पदम् । ‘ भरतश्रेष्ठ! आज मुझे यह बड़ी विचित्र और अद्भुत बात दिखायी दे रही है कि इस दिव्य रथपर बैठकर तुम अपने स्थानसे तनिक भी हिल-डुल नहीं रहे हो ॥ ३८३ ॥

देवराजोऽपि हि मया नित्यमत्रोपलक्षितः ॥ ३ ९ ॥

विचलन् प्रथमोत्पाते हयानां भरतर्षभ ।

त्वं पुनः स्थित एवात्र रथे भ्रान्ते कुरूद्वह ॥ ४० ॥

पृष्ठ 1144

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‘ कुरुकुलभूषण भरतश्रेष्ठ! जब घोड़े पहली बार उड़ान भरते हैं ' उस समय मैंने सदा यह देखा है कि देवराज इन्द्र भी विचलित हुए बिना नहीं रह पाते, परंतु तुम चक्कर काटते हुए रथपर भी स्थिरभावसे बैठे हो ॥ ३ ९ -४० ॥

अतिक्रमिदं सर्वं तवेति प्रतिभाति मे ।

इत्युक्त्वाऽऽकाशमाविश्य मातलिर्विबुधालयान् ॥ ४१ ॥

दर्शयामास मे राजन् विमानानि च भारत ।

स रथो हरिभिर्युक्तो ह्यूर्ध्वमाचक्रमे ततः ॥ ४२ ॥

' कुरुश्रेष्ठ! तुम्हारी ये सब बातें मुझे इन्द्रसे भी बढ़कर प्रतीत हो रही हैं । ' भरतकुलभूषण नरेश! ऐसा कहकर मातलिने अन्तरिक्षलोकमें प्रविष्ट होकर मुझे देवताओंके घरों और विमानोंका दर्शन कराया, फिर हरे रंगके घोड़ोंसे जुता हुआ वह रथ वहाँसे भी ऊपरकी ओर बढ़ चला ॥ ४१-४२ ॥

ऋषयो देवताश्चैव पूजयन्ति नरोत्तम ।

ततः कामगमाँल्लोकानपश्यं वै सुरर्षिणाम् ॥ ४३ ॥

नरश्रेष्ठ! ऋषि और देवता भी उस रथका समादर करते थे । तदनन्तर मैंने देवर्षियोंके अनेक समुदायोंका दर्शन किया, जो अपनी इच्छाके अनुसार सर्वत्र जानेकी शक्ति रखते हैं ॥ ४३ ॥

गन्धर्वाप्सरसां चैव प्रभावममितौजसाम् ।

नन्दनादीनि देवानां वनान्युपवनानि च ॥ ४४ ॥

दर्शयामास मे शीघ्रं मातलिः शक्रसारथिः ।

ततः शक्रस्य भवनमपश्यममरावतीम् ॥ ४५ ॥

दिव्यैः कामफलैर्वृक्षै रत्नैश्च समलङ्कृताम् ।

न तत्र सूर्यस्तपति न शीतोष्णे न च क्लमः ॥ ४६ ॥

अमित तेजस्वी गन्धर्वों और अप्सराओंका प्रभाव भी मुझे प्रत्यक्ष दिखायी दिया । फिर इन्द्रसारथि मातलिने मुझे शीघ्र ही देवताओंके नन्दन आदि वन और उपवन दिखाये । तत्पश्चात् मैंने अमरावतीपुरी तथा इन्द्रभवनका दर्शन किया । वह पुरी इच्छानुसार फल देनेवाले दिव्य वृक्षों तथा रत्नोंसे सुशोभित थी । वहाँ सूर्यका ताप नहीं होता, सर्दी या गर्मीका कष्ट नहीं रहता और न किसी को थकावट ही होती है ॥ ४४–४६ ॥

न बाधते तत्र रजस्तत्रास्ति न जरा नृप ।

न तत्र शोको दैन्यं वा दौर्बल्यं चोपलक्ष्यते ॥ ४७ ॥

नरेश्वर! वहाँ रजोगुणजनित विकार नहीं सताते, बुढ़ापा नहीं आता; शोक, दीनता और दुर्बलताका दर्शन नहीं होता ॥ ४७ ॥

दिवौकसां महाराज न ग्लानिररिमर्दन ।

न क्रोधलोभौ तत्रास्तां सुरादीनां विशाम्पते ॥ ४८ ॥

पृष्ठ 1145

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महाराज! शत्रुसूदन! स्वर्गवासी देवताओंको कभी ग्लानि नहीं होती । उनमें क्रोध और लोभका भी अभाव होता है ॥ ४८ ॥

नित्यतुष्टाश्च ते राजन् प्राणिनः सुरवेश्मनि ।

नित्यपुष्पफलास्तत्र पादपा हरितच्छदाः ॥ ४ ९ ॥

राजन्! स्वर्गमें निवास करनेवाले प्राणी सदा संतुष्ट रहते हैं । वहाँके वृक्ष सर्वदा फल-फूलसे सम्पन्न और हरे पत्तोंसे सुशोभित रहते हैं ॥ ४ ९ ॥

पुष्करिण्यश्च विविधाः पद्मसौगन्धिकायुताः ।

शीतस्तत्र ववौ वायुः सुगन्धी जीवनः शुचिः ॥ ५० ॥

वहाँ सहस्रों सौगन्धिक कमलोंसे अलंकृत नाना प्रकारके सरोवर शोभा पाते हैं और शीतल, पवित्र, सुगन्धित एवं नवजीवनदायक वायु सदा बहती रहती है ॥ ५० ॥

सर्वरत्नविचित्रा च भूमिः पुष्पविभूषिता ।

मृगद्विजाश्च बहवो रुचिरा मधुरस्वराः ॥ ५१ ॥

विमानगामिनश्चात्र दृश्यन्ते बहवोऽम्बरे ।

ततोऽपश्यं वसून् रुद्रान् साध्यांश्च समरुद्गणान् ॥ ५२ ॥

आदित्यानश्विनौ चैव तान् सर्वान् प्रत्यपूजयम् ।

मां वीर्येण यशसा तेजसा च बलेन च ॥ ५३ ॥

अस्त्रैश्चाप्यन्वजानन्त संग्रामे विजयेन च । वहाँकी भूमि सब प्रकारके रत्नोंसे विचित्र शोभा धारण करती है और ( सब ओर बिखरे हुए ) पुष्प उस भूमिके लिये आभूषणका काम देते हैं। स्वर्गलोकमें बहुत - से मनोहर पशु और पक्षी देखे जाते हैं, जिनकी बोली बड़ी मधुर प्रतीत होती है । वहाँ अनेक देवता आकाशमें विमानोंपर विचरते दिखायी देते हैं । तदनन्तर मुझे वसु, रुद्र, साध्य, मरुद्गण, आदित्य और अश्विनीकुमारोंके दर्शन हुए । मैंने उन सबके आगे मस्तक झुकाकर उनका सम्मान किया । उन सबने मुझे पराक्रमी, यशस्वी, तेजस्वी, बलवान्, अस्त्रवेत्ता और संग्राम- विजयी होनेका आशीर्वाद दिया ॥ ५१–५३ ॥ प्रविश्य तां पुरीं दिव्यां देवगन्धर्वपूजिताम् ॥ ५४ ॥

देवराजं सहस्राक्षमुपातिष्ठं कृताञ्जलिः ।

ददावर्धासनं प्रीतः शक्रो मे ददतां वरः ॥ ५५ ॥

तत्पश्चात् देव- गन्धर्वपूजित दिव्य अमरावतीपुरीमें प्रवेश करके मैंने हाथ जोड़कर सहस्र नेत्रोंवाले देवराज इन्द्रको प्रणाम किया। दाताओंमें श्रेष्ठ देवराज इन्द्रने प्रसन्न होकर मुझे अपने आधे सिंहासनपर स्थान दिया ॥ ५४-५५ ॥

बहुमानाच्च गात्राणि पस्पर्श मम वासवः ।

तत्राहं देवगन्धर्वैः सहितो भूरिदक्षिण ॥ ५६ ॥

अस्त्रार्थमवसं स्वर्गे शिक्षाणोऽस्त्राणि भारत ।

पृष्ठ 1146

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विश्वावसोश्च वै पुत्रश्चित्रसेनोऽभवत् सखा ॥ ५७ ॥

इतना ही नहीं, उन्होंने बड़े आदरके साथ मेरे अंगोंपर हाथ फेरा । यज्ञोंमें पूरी दक्षिणा देनेवाले भरतश्रेष्ठ! उस स्वर्गलोकमें देवताओं और गन्धर्वोंके साथ अस्त्रविद्याकी प्राप्तिके लिये रहने लगा और प्रतिदिन अस्त्रोंका अभ्यास करने लगा । उस समय गन्धर्वराज विश्वावसुके पुत्र चित्रसेनके साथ मेरी मैत्री हो गयी थी ॥ ५६-५७ ॥

स च गान्धर्वमखिलं ग्राहयामास मां नृप ।

तत्राहमवसं राजन् गृहीतास्त्रः सुपूजितः ॥ ५८ ॥

सुखं शक्रस्य भवने सर्वकामसमन्वितः ।

शृण्वन् वै गीतशब्दं च तूर्यशब्दं च पुष्कलम् ।

पश्यंश्चाप्सरसः श्रेष्ठा नृत्यन्तीर्भरतर्षभ ॥ ५ ९ ॥

नरेश्वर! उन्होंने मुझे सम्पूर्ण गान्धर्ववेद ( संगीत-विद्या )-का अध्ययन कराया । राजन्! वहाँ इन्द्रभवनमें अस्त्र - शस्त्रोंकी शिक्षा ग्रहण करते हुए मैं बड़े सम्मान और सुखसे रहने लगा । वहाँ सभी मनोवांछित पदार्थ मेरे लिये सुलभ थे । भरतश्रेष्ठ! मैं वहाँ कभी मनोहर गीत सुनता, कभी पर्याप्तरूपसे दिव्य वाद्योंका आनन्द लेता और कभी- कभी श्रेष्ठ अप्सराओंका नृत्य भी देख लेता था ॥

तत् सर्वमनवज्ञाय तथ्यं विज्ञाय भारत ।

अत्यर्थं प्रतिगृह्याहमस्त्रेष्वेव व्यवस्थितः ॥ ६० ॥

भारत! इन समस्त सुख - सुविधाओंकी अवहेलना न करते हुए उन्हें स्वीकार करके भी मैं इनके असली रूपको जानकर- इनकी निःसारताको भलीभाँति समझकर अधिकतर अस्त्रोंके अभ्यासमें ही संलग्न रहता था । ( गीत आदिमें कभी आसक्त नहीं हुआ ) ॥ ६० ॥

ततोऽतुष्यत् सहस्राक्षस्तेन कामेन मे विभुः ।

एवं मे वसतो राजन्नेष कालोत्यगाद् दिवि ॥ ६१ ॥

अस्त्रविद्याकी ओर मेरी ऐसी अभिरुचि होनेसे सहसनेत्रधारी भगवान् इन्द्र मुझपर बहुत संतुष्ट रहते थे । राजन्! इस प्रकार स्वर्गमें रहकर मेरा यह समय सुखपूर्वक बीतने लगा ॥ ६१ ॥

कृतास्त्रमतिविश्वस्तमथ मां हरिवाहनः ।

संस्पृश्य मूर्ध्नि पाणिभ्यामिदं वचनमब्रवीत् ॥ ६२ ॥

धीरे- धीरे मैं अस्त्रविद्यामें निपुण हो गया। मेरी विज्ञतापर सबको अधिक विश्वास था । एक दिन भगवान् इन्द्रने अपने दोनों हाथोंसे मेरे मस्तकका स्पर्श करते हुए मुझसे इस प्रकार कहा- ॥ ६२ ॥

न त्वमद्य युधा जेतुं शक्यः सुरगणैरपि ।

किं पुनर्मानुषे लोके मानुषैरकृतात्मभिः ॥ ६३ ॥

पृष्ठ 1147

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' अर्जुन! अब तुम्हें युद्धमें देवता भी परास्त नहीं कर सकते । फिर मर्त्यलोकमें रहनेवाले बेचारे असंयमी मनुष्योंकी तो बात ही क्या है? ॥ ६३ ॥

अप्रमेयोऽप्रधृष्यश्च युद्धेष्वप्रतिमस्तथा ।

अजेयस्त्वं हि संग्रामे सर्वैरपि सुरासुरैः ।

अथाब्रवीत् पुनर्देवः सम्प्रहृष्टतनूरुहः ॥ ६४ ॥

' तुम युद्धमें अप्रमेय, अजेय और अनुपम हो । संग्रामभूमिमें सम्पूर्ण देवता और असुर भी तुम्हें पराजित नहीं कर सकते । ' इतना कहते- कहते देवराजके शरीरमें रोमांच हो आया । तदनन्तर वे फिर बोले— ॥ ६४ ॥

अस्त्रयुद्धे समो वीर न ते कश्चिद् भविष्यति ।

अप्रमत्तः सदा दक्षः सत्यवादी जितेन्द्रियः ॥ ६५ ॥

ब्रह्मण्यश्चास्त्रविच्चासि शूरश्चासि कुरूद्वह ।

अस्त्राणि समवाप्तानि त्वया दश च पञ्त च ॥ ६६ ॥

पञ्चभिर्विधिभिः पार्थ विद्यते न त्वया समः ।

प्रयोगमुपसंहारमावृत्तिं च धनंजय ॥ ६७ ॥

प्रायश्चित्तं च वेत्थ त्वं प्रतीघातं च सर्वशः ।

ततो गुर्वर्थकालोऽयं समुत्पन्नः परंतप ॥ ६८ ॥

‘ वीर! अस्त्र- युद्धमें तुम्हारा सामना कर सके, ऐसा कोई योद्धा नहीं होगा । कुरुश्रेष्ठ! तुम सर्वदा सावधान रहते हो, प्रत्येक कार्यमें कुशल हो, जितेन्द्रिय, सत्यवादी और ब्राह्मणभक्त हो; तुम्हें अस्त्र- शस्त्रोंका ज्ञान है और तुम अद्भुत शौर्यसे सम्पन्न हो । पार्थ! तुमने पाँच विधियोंसहित पंद्रह अस्त्र प्राप्त किये हैं, अतः इस भूतलपर तुम्हारे - जैसा शूर दूसरा कोई नहीं है । परंतप धनंजय! प्रयोग, उपसंहार, आवृत्ति, प्रायश्चित्त और प्रतिघात —ये अस्त्रोंकी पाँच विधियाँ हैं; तुम इन सबका पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर चुके हो । अतः अब गुरुदक्षिणा देनेका समय आ गया है ॥ ६५—६८ ॥

प्रतिजानीष्व तं कर्तुं ततो वेत्स्याम्यहं परम् ।

ततोऽहमब्रुवं राजन् देवराजमिदं वचः ॥ ६ ९ ॥

विषह्यं यन्मया कर्तुं कृतमेव निबोध तत् ।

ततो मामब्रवीद् राजन् प्रहसन् बलवृत्रहा ॥ ७० ॥

' तुम उसे देनेकी प्रतिज्ञा करो, तब मैं अपने महान् कार्यको तुम्हें बताऊँगा। ' राजन्! यह सुनकर मैंने देवराजसे कहा-' भगवन्! जो कुछ मैं कर सकता हूँ, उसे किया हुआ ही समझिये । ' नरेश्वर! तब बल और वृत्रासुरके शत्रु इन्द्रने मुझसे हँसते हुए कहा ॥ ६ ९ -७० ॥

नाविषह्यं तवाद्यास्ति त्रिषु लोकेषु किंचन ।

निवातकवचा नाम दानवा मम शत्रवः ॥ ७१ ॥

पृष्ठ 1148

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' वीरवर! तीनों लोकोंमें ऐसा कोई कार्य नहीं है, जो तुम्हारे लिये असाध्य हो ।

निवातकवच नामक दानव मेरे शत्रु हैं ॥ ७१ ॥

समुद्रकुक्षिमाश्रित्य दुर्गे प्रतिवसन्त्युत ।

तिस्रः कोट्यः समाख्यातास्तुल्यरूपबलप्रभाः ॥ ७२ ॥

तांस्तत्र हि कौन्तेय गुर्वर्थस्ते भविष्यति ।

ततो मातलिसंयुक्तं मयूरसमरोमभिः ॥ ७३ ॥

हयैरुपेतं प्रादान्मे रथं दिव्यं महाप्रभम् ।

बबन्ध चैव मे मूर्ध्नि किरीटमिदमुत्तमम् ॥ ७४ ॥

‘ वे समुद्रके भीतर दुर्गम स्थानका आश्रय लेकर रहते हैं । उनकी संख्या तीन करोड़ बतायी जाती है और उन सभीके रूप, बल और तेज एक समान हैं । कुन्तीनन्दन! तुम उन दानवोंका संहार कर डालो । इतने से ही तुम्हारी गुरु- दक्षिणा पूरी हो जायगी । ' ऐसा कहकर इन्द्रने मुझे एक अत्यन्त कान्तिमान् दिव्य रथ प्रदान किया, जिसे मातलि जोतकर लाये थे । उसमें मयूरोंके समान रोमवाले घोड़े जुते हुए थे । रथ आ जानेपर देवराजने यह उत्तम किरीट मेरे मस्तकपर बाँध दिया ॥ ७२–७४ ॥

स्वरूपसदृशं चैव प्रादादङ्गविभूषणम् ।

अभेद्यं कवचं चेदं स्पर्शरूपवदुत्तमम् ॥ ७५ ॥

फिर उन्होंने मेरे स्वरूपके अनुरूप प्रत्येक अंगमें आभूषण पहना दिये । इसके बाद यह अभेद्य उत्तम कवच धारण कराया, जिसका स्पर्श तथा रूप मनोहर है ॥

अजरां ज्यामिमां चापि गाण्डीवे समयोजयत् ।

ततः प्रायामहं तेन स्यन्दनेन विराजता ॥ ७६ ॥

येनाजयद् देवपतिर्बलिं वैरोचनिं पुरा ।

ततो देवाः सर्व एव तेन घोषेण बोधिताः ॥ ७७ ॥

मन्वाना देवराजं मां समाजग्मुर्विशाम्पते ।

दृष्ट्वा च मामपृच्छन्त किं करिष्यसि फाल्गुन ॥ ७८ ॥

तत्पश्चात् मेरे गाण्डीव धनुषमें उन्होंने यह अटूट प्रत्यञ्चा जोड़ दी । इस प्रकार युद्धकी सामग्रियोंसे सम्पन्न होकर उस तेजस्वी रथके द्वारा मैं संग्रामके लिये प्रस्थित हुआ, जिसपर आरूढ़ होकर पूर्वकालमें देवराजने विरोचनकुमार बलिको परास्त किया था । महाराज! तब उस रथकी घर्घराहटसे सजग हो सब देवता मुझे देवराज समझकर मेरे पास आये और मुझे देखकर पूछने लगे — ‘ अर्जुन! तुम क्या करनेकी तैयारीमें हो? ' ॥ ७६–७८ ॥

पृष्ठ 1149

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तानब्रुवं यथाभूतमिदं कर्तास्मि संयुगे ।

निवातकवचानां तु प्रस्थितं मां वधैषिणम् ॥ ७ ९ ॥

निबोधत महाभागाः शिवं चाशास्त मेऽनघाः ।

ततो वाग्भिः प्रशस्ताभिस्त्रिदशाः पृथिवीपते ।

तुष्टुबुर्मां प्रसन्नास्ते यथा देवं पुरंदरम् ॥ ८० ॥

तब मैंने उनसे सब बातें बताकर कहा - ' मैं युद्धमें यही करने जा रहा हूँ । आपको यह ज्ञात होना चाहिये कि मैं निवातकवच नामक दानवोंके वधकी इच्छासे प्रस्थित हुआ हूँ । अतः निष्पाप एवं महाभाग देवताओ! आप मुझे ऐसा आशीर्वाद दें, जिससे मेरा मंगल हो । ' राजन्! तब वे देवतालोग प्रसन्न हो देवराज इन्द्रकी भाँति श्रेष्ठ एवं मधुर वाणीद्वारा मेरी स्तुति करते हुए बोले- ॥ ७ ९-८० ॥

रथेनानेन मघवा जितवान् शम्बरं युधि ।

नमुचिं बलवृत्रौ च प्रह्लादनरकावपि ॥ ८१ ॥

इस रथके द्वारा इन्द्रने युद्धमें शम्बरासुरपर विजय पायी है । नमुचि, बल, वृत्र, प्रह्लाद और नरकासुरको परास्त किया है ॥ ८१ ॥

बहूनि च सहस्राणि प्रयतान्यर्बुदान्यपि ।

रथेनानेन दैत्यानां जितवान् मघवा युधि ॥ ८२ ॥

पृष्ठ 1150

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‘ इनके सिवा अन्य बहुत - से दैत्योंको भी इस रथके द्वारा पराजित किया है, जिनकी संख्या सहस्रों, लाखों और अरबोंतक पुहँच गयी है ॥ ८२ ॥

त्वमप्यनेन कौन्तेय निवातकवचान् रणे ।

विजेता युधि विक्रम्य पुरेव मघवा वशी ॥ ८३ ॥

‘ कुन्तीनन्दन! जैसे पूर्वकालमें सबको वशमें करनेवाले इन्द्रने असुरोंपर विजय पायी थी, उसी प्रकार तुम भी इस रथके द्वारा युद्धमें पराक्रम करके निवातकवचोंको परास्त करोगे ॥ ८३ ॥

अयं च शंखप्रवरो येन जेतासि दानवान् ।

अनेन विजिता लोकाः शक्रेणापि महात्मना ॥ ८४ ॥

‘ यह श्रेष्ठ शंख है, जिसे बजानेसे तुम्हें दानवोंपर विजय प्राप्त हो सकती है । महामना इन्द्रने भी इसके द्वारा सम्पूर्ण लोकोंपर विजय पायी है ' ॥ ८४ ॥

प्रदीयमानं देवैस्तं देवदत्तं जलोद्भवम् ।

प्रत्यगृह्णं जयायैनं स्तूयमानस्तदामरैः ॥ ८५ ॥

स शङ्खी कवची बाणी प्रगृहीतशरासनः ।

दानवालयमत्युग्रं प्रयातोऽस्मि युयुत्सया ॥ ८६ ॥

वही यह शंख है, जिसे मैंने अपनी विजयके लिये ग्रहण किया था । देवताओंने उसे दिया था, इसलिये इसका नाम देवदत्त है । शंख लेकर देवताओंके मुखसे अपनी स्तुति सुनता हुआ मैं कवच, बाण तथा धनुषसे सज्जित हो युद्धकी इच्छासे अत्यन्त भयंकर दानवोंके नगरकी ओर चल दिया ॥ ८५-८६ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वण्यर्जुनवाक्ये अष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनवाक्यविषयक एक सौ अड़सठवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १६८ ॥

संजीवित करनेकी विद्याको प्रायश्चित्त कहते हैं । १. निर्दोष प्राणीका वध जाय, तो उसे पुनः २. शत्रुके अस्त्रसे पराभवको प्राप्त हुए अपने अस्त्रको पुनः शक्तिशाली बनाना प्रतिघात कहलाता है ।