02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 1231–1240

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1231–1240

पृष्ठ 1231

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सिन्धवः शोभयांचक्रुः काननानि तपात्यये ॥ ६ ॥

वर्षा -ऋतुकी नदियाँ बड़े वेगसे छूटनेवाले शीघ्र- गामी बाणोंकी भाँति सनसनाती हुई चलती थीं । उनके जलमें हिलोरें उठती रहती थीं और वे कितने ही काननोंकी शोभा बढ़ाती थीं ॥ ६ ॥

नदतां काननान्तेषु श्रूयन्ते विविधाः स्वनाः ।

वृष्टिभिश्च्छाद्यमानानां वराहमृगपक्षिणाम् ॥ ७ ॥

वनके भीतर वर्षाकी बौछारोंसे भीगते और बोलते हुए वराह, मृग और पक्षियोंकी भाँति - भाँतिकी बोलियाँ सुनायी देती थीं ॥ ७ ॥

स्तोककाः शिखिनश्चैव पुंस्कोकिलगणैः सह ।

मत्ताः परिपतन्ति स्म दर्दुराश्चैव दर्पिताः ॥ ८ ॥

पपीहा और मोर नर- कोकिलोंके साथ आनन्दोन्मत्त होकर इधर- उधर उड़ने लगे और मेढक भी घमण्डमें आकर इधर- उधर कूदते और टर्र- टर्र करते थे ॥ ८ ॥

तथा बहुविधाकारा प्रावृण्मेघानुनादिता ।

अभ्यतीता शिवा तेषां चरतां मरुधन्वसु ॥ ९ ॥

पाण्डव अभी मरुप्रदेशमें ही विचरते थे, तभी मेघोंकी गर्जनासे गूँजती तथा अनेक प्रकारके रूप - रंग लिये प्रकट हुई मंगलमयी वर्षा ऋतु भी बीत गयी ॥ ९ ॥

क्रौञ्चहंससमाकीर्णा शरत् प्रमुदिताभवत् ।

रूढकक्षवनप्रस्था प्रसन्नजलनिम्नगा ॥ १० ॥

विमलाकाशनक्षत्रा शरत् तेषां शिवाभवत् ।

मृगद्विजसमाकीर्णा पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ ११ ॥

तत्पश्चात् आनन्दमयी शरद् ऋतुका शुभागमन हुआ । क्रौञ्च और हंस आदि पक्षी चारों ओर विचरने लगे । वनोंमें और पर्वतीय शिखरोंपर कास, कुश आदि बहुत बढ़ गये थे । नदियोंका जल स्वच्छ हो गया । आकाश निर्मल होनेसे नक्षत्रोंका आलोक और उज्ज्वल हो उठा । सब ओर मृग और पक्षी किलोल करने लगे । महात्मा पाण्डवोंके लिये यह शरद् -ऋतु अत्यन्त सुखदायिनी थी ॥ १०-११ ॥

दृश्यन्ते शान्तरजसः क्षपा जलदशीतलाः ।

ग्रहनक्षत्रसङ्घैश्च सोमेन च विराजिताः ॥ १२ ॥

उस समयकी रातें धूलरहित एवं निर्मल दिखायी देती थीं । बादलोंके समान उनमें शीतलता थी । ग्रहों और नक्षत्रोंके समुदाय तथा चन्द्रमा उनकी शोभा बढ़ाते थे ॥ १२ ॥

कुमुदैः पुण्डरीकैश्च शीतवारिधराः शिवाः ।

नदीः पुष्करिणीश्चैव ददृशुः समलंकृताः ॥ १३ ॥

पाण्डवोंने देखा, नदियाँ और पोखरियाँ कुमुदों तथा कमल- पुष्पोंसे अलंकृत हैं । उनमें शीतल जल भरा हुआ है और वे सबके लिये सुखदायिनी प्रतीत होती हैं ॥ १३ ॥

पृष्ठ 1232

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आकाशनीकाशतटां तीरवानीरसंकुलाम् ।

बभूव चरतां हर्षः पुण्यतीर्थां सरस्वतीम् ॥ १४ ॥

पावन तीर्थोंसे विभूषित सरस्वती नदीका तट आकाशके समान निर्मल दिखायी देता था । उसके दोनों किनारे बेंतकी लहलहाती हुई लताओंसे आच्छादित थे । वहाँ विचरते हुए पाण्डवोंको बड़ा आनन्द मिलता था ॥ १४ ॥

ते वै मुमुदिरे वीराः प्रसन्नसलिलां शिवाम् ।

पश्यन्तो दृढधन्वानः परिपूर्णां सरस्वतीम् ॥ १५ ॥

वीर पाण्डव सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले थे । उन्होंने स्वच्छ जलसे भरी हुई कल्याणमयी सरस्वतीका दर्शन करके बड़े आनन्दका अनुभव किया ॥ १५ ॥

तेषां पुण्यतमा रात्रिः पर्वसंधौ स्म शारदी ।

तत्रैव वसतामासीत् कार्तिकी जनमेजय ॥ १६ ॥

जनमेजय! उनके वहीं रहते समय पर्वकी संधि - वेलामें कार्तिककी शरत्पूर्णिमाकी परम पुण्यमयी रात्रि आयी ॥ १६ ॥

पुण्यकृद्भिर्महासत्त्वैस्तापसैः सह पाण्डवाः ।

तत् सर्वे भरतश्रेष्ठाः समूहुर्योगमुत्तमम् ॥ १७ ॥

उस समय भरतश्रेष्ठ पाण्डवोंने महान् सत्त्वगुणसे सम्पन्न, पुण्यात्मा, तपस्वी मुनियोंके साथ स्नान- दानादिके द्वारा उस उत्तम योगको पूर्णतः सफल बनाया ॥ १७ ॥

तमिस्राभ्युदये तस्मिन् धौम्येन सह पाण्डवाः ।

सूतैः पौरोगवैश्चैव काम्यकं प्रययुर्वनम् ॥ १८ ॥

फिर कृष्ण- पक्षका उदय होनेपर पाण्डवलोग धौम्य मुनि, सारथिगण तथा पाकशालाध्यक्षके साथ काम्यक - वनकी ओर चल दिये ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि काम्यकवनप्रवेशे द्वयशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८२ ॥

इस प्रकारश्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें काम्यकवनगमनविषयक एक सौ बयासीवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १८२ ॥

पृष्ठ 1233

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त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल- भोगका विवेचन वैशम्पायन उवाच

काम्यकं प्राप्य कौरव्य युधिष्ठिरपुरोगमाः ।

कृतातिथ्या मुनिगणैर्निषेदुः सह कृष्णया ॥ १ ॥

ततस्तान् परिविश्वस्तान् वसतः पाण्डुनन्दनान् ।

ब्राह्मणा बहवस्तत्र समन्तात् पर्यवारयन् ॥ २ ॥

अथाब्रवीद् द्विजः कश्चिदर्जुनस्य प्रियः सखा ।

स एष्यति महाबाहुर्वशी शौरिरुदारधीः ॥ ३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं – कुरुनन्दन जनमेजय! काम्यकवनमें पहुँचनेपर वहाँके मुनियोंने युधिष्ठिर आदि पाण्डवोंका यथोचित आदर- सत्कार किया। फिर वे द्रौपदीके साथ वहाँ रहने लगे । जब वे विश्वासपात्र पाण्डव वहाँ निवास करने लगे, तब बहुत - से ब्राह्मणोंने आकर सब ओरसे उन्हें घेर लिया ( और उन्हींके साथ रहने लगे ) । तदनन्तर एक दिन एक ब्राह्मण आया। उसने यह सूचना दी कि सबको वशमें रखनेवाले उदारबुद्धि महाबाहु भगवान् श्रीकृष्ण, जो अर्जुनके प्रिय सखा हैं, अभी यहाँ पधारेंगे ॥ १–३ ॥

विदिता हि हरेर्यूयमिहायाताः कुरूद्वहाः ।

सदा हि दर्शनाकाङ्क्षी श्रेयोऽन्वेषी च वो हरिः ॥ ४ ॥

कुरुश्रेष्ठ पाण्डवो! आपलोगोंका यहाँ आना भगवान् श्रीकृष्णको ज्ञात हो चुका है । वे सदा आपलोगोंको देखनेके लिये उत्सुक रहते हैं और आपके कल्याणकी बात सोचते रहते हैं ॥ ४ ॥

बहुवत्सरजीवी च मार्कण्डेयो महातपाः ।

स्वाध्यायतपसा युक्तः क्षिप्रं युष्मान् समेष्यति ॥ ५ ॥

एक शुभ समाचार और है, चिरंजीवी महातपस्वी मार्कण्डेय मुनि, जो स्वाध्याय और तपस्यामें संलग्न रहा करते हैं, शीघ्र ही आपलोगोंसे मिलेंगे ॥ ५ ॥

तथैव ब्रुवतस्तस्य प्रत्यदृश्यत केशवः ।

शैब्यसुग्रीवयुक्तेन रथेन रथिनां वरः ॥ ६ ॥

मघवानिव पौलोम्या सहितः सत्यभामया ।

उपायाद् देवकीपुत्रो दिदृक्षुः कुरुसत्तमान् ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1234

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ब्राह्मण इस प्रकारकी बातें कह ही रहा था कि शैब्य और सुग्रीव नामक अश्वोंसे जुते हुए रथद्वारा रथियोंमें श्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्ण आते हुए दिखायी दिये । जैसे शचीके साथ इन्द्र आये हों, उसी प्रकार सत्यभामाके साथ देवकीनन्दन श्रीहरि उन कुरुकुलशिरोमणि पाण्डवोंसे मिलने वहाँ आये ॥ ६-७ ॥

अवतीर्य रथात् कृष्णो धर्मराजं यथाविधि ।

ववन्दे मुदितो धीमान् भीमं च बलिनां वरम् ॥ ८ ॥

परम बुद्धिमान् श्रीकृष्णने रथसे उतरकर बड़ी प्रसन्नताके साथ धर्मराज युधिष्ठिर तथा बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमको विधिपूर्वक प्रणाम किया ॥ ८ ॥

पूजयामास धौम्यं च यमाभ्यामभिवादितः ।

परिष्वज्य गुडाकेशं द्रौपदीं पर्यसान्त्वयत् ॥ ९ ॥

स दृष्ट्वा फाल्गुनं वीरं चिरस्य प्रियमागतम् ।

पर्यष्वजत दाशार्हः पुनः पुनररिंदमः ॥ १० ॥

फिर धौम्य मुनिका पूजन किया । तत्पश्चात् नकुल सहदेवने आकर उनके चरणोंमें मस्तक झुकाये । इसके बाद निद्राविजयी अर्जुनको हृदयसे लगाकर श्रीकृष्णने द्रौपदीको भलीभाँति सान्त्वना दी । परमप्रिय वीरवर अर्जुनको दीर्घकालके बाद आया देख शत्रुदमन श्रीकृष्णने उन्हें बार - बार हृदयसे लगाया ॥ ९ -१० ॥

तथैव सत्यभामापि द्रौपदीं परिषस्वजे ।

पाण्डवानां प्रियां भार्यां कृष्णस्य महिषी प्रिया ॥ ११ ॥

इसी प्रकार श्रीकृष्णकी प्यारी रानी सत्यभामाने भी पाण्डवोंकी प्रिय पत्नी पांचालीका आलिंगन किया ॥ ११ ॥

पृष्ठ 1235

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ततस्ते पाण्डवाः सर्वे सभार्याः सपुरोहिताः ।

आनर्चुः पुण्डरीकाक्षं परिवव्रुश्च सर्वशः ॥ १२ ॥

तदनन्तर पत्नी और पुरोहितसहित समस्त पाण्डवोंने कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णका पूजन किया और सब - के - सब उन्हें घेरकर बैठ गये ॥ १२ ॥

कृष्णस्तु पार्थेन समेत्य विद्वान् धनंजयेनासुरतर्जनेन । बभौ यथा भूतपतिर्महात्मा समेत्य साक्षाद् भगवान् गुहेन ॥ १३ ॥

सर्वज्ञ भगवान् श्रीकृष्ण असुरोंको भयभीत करनेवाले कुन्तीनन्दन अर्जुनसे मिलकर उसी प्रकार सुशोभित हुए, जैसे परम महात्मा साक्षात् भगवान् भूतनाथ शंकर कार्तिकेयसे मिलकर शोभा पाते हैं ॥ १३ ॥

ततः समस्तानि किरीटमाली वनेषु वृत्तानि गदाग्रजाय । उक्त्वा यथावत् पुनरन्वपृच्छत् कथं सुभद्रा च स चाभिमन्युः ॥ १४ ॥

तदनन्तर किरीटधारी अर्जुनने गदके बड़े भाई भगवान् श्रीकृष्णको वनवासके सारे वृत्तान्त यथार्थरूपसे बताकर पुनः उनसे पूछा — ' सुभद्रा और अभिमन्यु कैसे हैं?' ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1236

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स पूजयित्वा मधुहा यथावत् पार्थं च कृष्णां च पुरोहितं च । उवाच राजानमभिप्रशंसन् युधिष्ठिरं तत्र सहोपविश्य ॥ १५ ॥

भगवान् मधुसूदनने अर्जुन, द्रौपदी तथा पुरोहित धौम्यका सम्मान करके सबके साथ बैठकर राजा युधिष्ठिरकी प्रशंसा करते हुए कहा— ॥ १५ ॥

धर्मः परः पाण्डव राज्यलाभात् तस्यार्थमाहुस्तप एव राजन् । सत्यार्जवाभ्यां चरता स्वधर्मं जितस्त्वयायं च परश्च लोकः ॥ १६ ॥

‘ राजन्! पाण्डुनन्दन! राज्यलाभकी अपेक्षा धर्म महान् है । धर्मकी वृद्धिके लिये तपको ही प्रधान साधन बताया गया है । आप सत्य और सरलता आदि सद्गुणोंके साथ-साथ स्वधर्मका पालन करते हैं, अतः आपने इस लोक और परलोक दोनोंको जीत लिया है ॥ १६ ॥

अधीतमग्रे चरता व्रतानि सम्यग् धनुर्वेदमवाप्यकृत्स्नम् । क्षात्रेण धर्मेण वसूनि लब्ध्वा सर्वे ह्यवाप्ताः क्रतवः पुराणाः ॥ १७ ॥

न ग्राम्यधर्मेषु रतिस्तवास्ति कामान्न किंचित् कुरुषे नरेन्द्र । न चार्थलोभात् प्रजहासि धर्मं तस्मात् प्रभावादसि धर्मराजः ॥ १८ ॥

' आपने सबसे पहले ब्रह्मचर्य आदि व्रतोंका पालन करते हुए सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन किया है । तत्पश्चात् सम्पूर्ण धनुर्वेदकी शिक्षा प्राप्त की है । इसके बाद क्षत्रिय - धर्मके अनुसार धनका उपार्जन करके समस्त प्राचीन यज्ञोंका अनुष्ठान किया है । नरेश्वर! जिसमें गँवारोंकी आसक्ति हुआ करती है, उस स्त्री- सम्बन्धी भोगमें आपका अनुराग नहीं है । आप कामनासे प्रेरित होकर कुछ नहीं करते हैं और धनके लोभसे धर्मका त्याग नहीं करते हैं । इसी प्रभावसे धर्मराज कहलाते हैं ॥ १७-१८ ॥ दानं च सत्यं च तपश्च राजन्

श्रद्धा च बुद्धिश्च क्षमा धृतिश्च ।

अवाप्य राष्ट्राणि वसूनि भोगा- नेषा परा पार्थ सदा रतिस्ते ॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 1237

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‘ राजन्! आपने राज्य, धन और भोगोंको पाकर भी सदा दान, सत्य, तप, º क्षमा तथा धृति— इन सद्गुणोंसे ही प्रेम किया है ॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 1238

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bryany वनमें पाण्डवोंसे श्रीकृष्ण सत्यभामाका मिलना यदा जनौघः कुरुजाङ्गलानां

पृष्ठ 1239

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कृष्णां सभायामवशामपश्यत् । अपेतधर्मव्यवहारवृत्तं सहेत तत् पाण्डव कस्त्वदन्यः ॥ २० ॥

‘ पाण्डुनन्दन! कुरुजांगलदेशकी जनताने द्यूतसभामें द्रौपदीको जिस विवश - अवस्थामें देखा था और उस समय उसके साथ जो पापपूर्ण बर्ताव किया गया था, उसे आपके सिवा दूसरा कौन सह सकता था? ॥ २० ॥

असंशयं सर्वसमृद्धकामः क्षिप्रं प्रजाः पालयितासि सम्यक् । इमे वयं निग्रहणे कुरूणां यदि प्रतिज्ञा भवतः समाप्ता ॥ २१ ॥

‘ धर्मराज! अब शीघ्र ही आपके सारे मनोरथ पूर्ण होंगे और आप राजसिंहासनपर आरूढ़ होकर न्यायपूर्वक प्रजाका पालन करेंगे, इसमें तनिक भी संशय नहीं है । यदि आपकी वनवासविषयक प्रतिज्ञा पूरी हो जाय, तो हम सब लोग आपके विरोधी कौरवोंको दण्ड देनेके लिये उद्यत हैं ' ॥ २१ ॥

धौम्यं च भीमं च युधिष्ठिरं च यमौ च कृष्णां च दशार्हसिंहः । उवाच दिष्ट्या भवतां शिवेन प्राप्तः किरीटी मुदितः कृतास्त्रः ॥ २२ ॥

तदनन्तर युदुकुलसिंह भगवान् श्रीकृष्णने धौम्य, युधिष्ठिर, भीमसेन, नकुल, सहदेव और द्रौपदीकी ओर देखते हुए कहा– ' सौभाग्यकी बात है कि आपलोगोंद्वारा की हुई मंगलकामनासे किरीटधारी अर्जुन अस्त्रविद्याके पारंगत विद्वान् होकर सानन्द लौट आये हैं ' ॥ २२ ॥

प्रोवाच कृष्णामपि याज्ञसेनीं दशार्हभर्ता सहितः सुहृद्भिः । दिष्ट्या समग्रासि धनंजयेन समागतेत्येवमुवाच कृष्णः ॥ २३ ॥

कृष्णे धनुर्वेदरतिप्रधाना- स्तवात्मजास्ते शिशवः सुशीलाः ।

सद्भिः सदैवाचरितं सुहृद्भि- श्चरन्ति पुत्रास्तव याज्ञसेनि ॥ २४ ॥

इसके बाद दशार्हकुलके स्वामी श्रीकृष्ण, जो अपने सुहृदों से घिरे हुए थे, यज्ञसेनकुमारी द्रौपदीसे बोले —–‘ कृष्णे! अर्जुनसे मिलकर तेरी सारी कामना सफल हो गयी, यह बड़े

पृष्ठ 1240

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1240 का मूल पृष्ठ
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आनन्दकी बात है । तेरे पुत्र बड़े सुशील हैं। धनुर्वेदमें उनका विशेष अनुराग है । वे अपने सुहृदोंसहित सत्पुरुषोंद्वारा आचरित सदाचार और धर्मका पालन करते हैं ॥ २३-२४ ॥ राज्येन राष्ट्रैश्च निमन्त्र्यमाणाः पित्रा च कृष्णे तव सोदरैश्च । न यज्ञसेनस्य न मातुलानां गृहेषु बाला रतिमाप्नुवन्ति ॥ २५ ॥

' कृष्णे! तुम्हारे पिता और भाइयोंने राज्य तथा राजकीय उपकरणों - यान- वाहन आदिकी सुविधा दिखाकर अनेक बार आमन्त्रित किया, तो भी तुम्हारे बच्चे अपने नाना यज्ञसेन और मामा धृष्टद्युम्न आदिके घरोंमें रहना पसंद नहीं करते हैं -वहाँ उनका मन नहीं लगता है ॥ २५ ॥

आनर्तमेवाभिमुखाः शिवेन गत्वा धनुर्वेदरतिप्रधानाः । तवात्मजा वृष्णिपुरं प्रविश्य न दैवतेभ्यः स्पृहयन्ति कृष्णे ॥ २६ ॥

'कृष्णे! उनका धनुर्वेदमें विशेष प्रेम है । वे आनर्त देशमें ही कुशलपूर्वक जाकर वृष्णिपुरी द्वारकामें रहते हैं । वहाँ रहकर उन्हें देवताओंके लोकमें भी जानेकी इच्छा नहीं होती ॥ २६ ॥

यथा त्वमेवार्हसि तेषु वृत्तं प्रयोक्तुमार्या च तथैव कुन्ती । तेष्वप्रमादेन तथा करोति तथैव भूयश्च तथा सुभद्रा ॥ २७ ॥

' उन बालकोंको तुम सदाचारकी जैसी शिक्षा दे सकती हो, आर्या कुन्ती भी उन्हें जैसा सदाचार सिखा सकती हैं, वैसी शिक्षा देनेकी योग्यता सुभद्रामें भी है । वह बड़ी सावधानीके साथ वैसी ही शिक्षा देकर उन सब बालकोंको सदाचारमें प्रतिष्ठित करती है ॥ २७ ॥

यथानिरुद्धस्य यथाभिमन्यो- र्यथा सुनीथस्य यथैव भानोः । तथा विनेता च गतिश्च कृष्णे तवात्मजानामपि रौक्मिणेयः ॥ २८ ॥

'कृष्णे । रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न जिस प्रकार अनिरुद्ध, अभिमन्यु, सुनीथ और भानुको धनुर्वेदकी शिक्षा देते हैं, उसी प्रकार वे तुम्हारे पुत्रोंके भी शिक्षक और संरक्षक हैं ॥ २८ ॥

गदासिचर्मग्रहणेषु शूरा- नस्त्रेषु शिक्षासु रथाश्वयाने । सम्यग् विनेता विनयत्यतन्द्र-