श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1241–1250
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1241–1250
पृष्ठ 1241
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
स्तांश्चाभिमन्युः सततं कुमारः ॥ २ ९ ॥ 'शिक्षा देनेमें निपुण और आलस्यरहित कुमार अभिमन्यु तुम्हारे शूर- वीर पुत्रोंको गदा और ढाल - तलवारके दाँव- पेंच सिखाते हैं । अन्यान्य अस्त्रोंकी भी शिक्षा देते हैं । साथ ही रथ चलाने और घोड़े हाँकनेकी कला भी सिखाते हैं । वे सदा उनकी शिक्षा-दीक्षामें संलग्न रहते हैं ॥ २ ९ ॥ स चापि सम्यक् प्रणिधाय शिक्षां शस्त्राणि चैषां विधिवत् प्रदाय । तवात्मजानां च तथाभिमन्योः पराक्रमैस्तुष्यति रौक्मिणेयः ॥ ३० ॥
‘ अस्त्र- शस्त्रोंके प्रयोगकी उत्तम शिक्षा दे उनके लिये उन्होंने विधिपूर्वक नाना प्रकारके शस्त्र भी दे रक्खे हैं । तुम्हारे पुत्रों और अभिमन्युके पराक्रम देखकर रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न बहुत संतुष्ट रहते हैं ॥ ३० ॥
यदा विहारं प्रसमीक्षमाणाः प्रयान्ति पुत्रास्तव याज्ञसेनि । एकैकमेषामनुयान्ति तत्र रथाश्च यानानि च दन्तिनश्च ॥ ३१ ॥
‘याज्ञसेनी! तुम्हारे पुत्र जब नगरकी शोभा देखनेके लिये घूमने निकलते हैं, उस समय उनमेंसे प्रत्येकके लिये रथ, घोड़े, हाथी और पालकी आदि सवारियाँ पीछे - पीछे जाती हैं ' ॥ ३१ ॥
अथाब्रवीद् धर्मराजं तु कृष्णो
दशार्हयोधाः कुकुरान्धकाश्च ।
एते निदेशं तव पालयन्त- स्तिष्ठन्तु यत्रेच्छसि तत्र राजन् ॥ ३२ ॥
तत्पश्चात् भगवान् श्रीकृष्णने धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा- ' राजन्! दशार्ह, कुकुर और अंधकवंशके योद्धा जहाँ आप चाहें, वहीं आपकी आज्ञाका पालन करते हुए खड़े रह सकते हैं ॥ ३२ ॥
आवर्ततां कार्मुकवेगवाता हलायुधप्रग्रहणा मधूनाम् । सेना तवार्थेषु नरेन्द्र यत्ता ससादिपत्त्यश्वरथा सनागा ॥ ३३ ॥
' नरेन्द्र! जिसके धनुषका वेग वायुवेगके समान हैं, हल धारण करनेवाले बलरामजी जिसके सेनापति हैं, वह सवारोंसहित हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकोंसे भरी हुई मथुरा-
पृष्ठ 1242
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रान्तवासी गोपोंकी चतुरंगिणी सेना सदा युद्धके लिये संनद्ध हो आपकी अभीष्ट - सिद्धिके लिये निरन्तर तत्पर रहती है ॥ ३३ ॥
प्रस्थाप्यतां पाण्डव धार्तराष्ट्रः सुयोधनः पापकृतां वरिष्ठः । स सानुबन्धः ससुहृद्गणश्च भौमस्य सौभाधिपतेश्च मार्गम् ॥ ३४ ॥
पाण्डुनन्दन! अब आप पापात्माओंके शिरोमणि धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनको उसके सुहृदों और सम्बन्धियों - सहित उसी मार्गपर भेज दीजिये, जहाँ भौमासुर और शाल्व गये हैं ॥ ३४ ॥
कामं तथा तिष्ठ नरेन्द्र तस्मिन् यथा कृतस्ते समयः सभायाम् । दाशार्हयोधैस्तु हतारियोधं प्रतीक्षतां नागपुरं भवन्तम् ॥ ३५ ॥
'महाराज! आप चाहें तो सभामें जो प्रतिज्ञा आपने की है, उसीके पालनमें लगे रहें । यदि आपकी आज्ञा हो तो यदुवंशी योद्धा आपके समस्त शत्रुओंको मार डालें और हस्तिनापुर नगर आपके शुभागमनकी प्रतीक्षा करता रहे ॥ ३५ ॥
व्यपेतमन्युर्व्यपनीतपाप्मा विहृत्य यत्रेच्छसि तत्र कामम् । ततः प्रसिद्धं प्रथमं विशोकः प्रपत्स्यसे नागपुरं सुराष्ट्रम् ॥ ३६ ॥
‘ राजन्! आप क्रोध, दीनता और दुःखसे दूर रहकर जहाँ -जहाँ आपकी इच्छा हो वहाँ-वहाँ घूम लीजिये । तत्पश्चात् शोकरहित हो अपनी प्रसिद्ध और उत्तम राजधानी हस्तिनापुरमें प्रवेश कीजियेगा ' ॥ ३६ ॥
ततस्तदाज्ञाय मतं महात्मा यथावदुक्तं पुरुषोत्तमेन । प्रशस्य विप्रेक्ष्य च धर्मराजः कृताञ्जलिः केशवमित्युवाच ॥ ३७ ॥
पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णने अपना मत अच्छी तरह व्यक्त कर दिया था । उसे जानकर महात्मा धर्मराजने भगवान् केशवकी भूरि- भूरि प्रशंसा की और हाथ जोड़कर उनकी ओर देखते हुए कहा— ॥ ३७ ॥
असंशयं केशव पाण्डवानां भवान् गतिस्त्वच्छरणा हि पार्थाः । कालोदये तच्च ततश्च भूयः
पृष्ठ 1243
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
कर्ता भवान् कर्म न संशयोऽस्ति ॥ ३८ ॥
' केशव! इसमें संदेह नहीं कि आप ही पाण्डवोंके अवलम्ब हैं । कुन्तीके हम सभी पुत्र आपकी ही शरणमें हैं । जब समय आयेगा, तब आप पुनः अपने इस कथनके अनुसार सब कार्य करेंगे, इसमें संदेह नहीं है ॥ ३८ ॥
यथाप्रतिज्ञं विहृतश्च कालः सर्वाः समा द्वादश निर्जनेषु । अज्ञातचर्यां विधिवत् समाप्य भवद्गताः केशव पाण्डवेयाः ॥ ३ ९ ॥ एषैव बुद्धिर्जुषतां सदा त्वां सत्ये स्थिताः केशव पाण्डवेयाः । सदानधर्माः सजनाः सदाराः सबान्धवास्त्वच्छरणा हि पार्थाः ॥ ४० ॥
‘ भगवन्! हमने अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार बारह वर्षोंका सारा समय निर्जन वनोंमें घूमकर बिता दिया है । अब अज्ञातवासकी अवधि भी विधिपूर्वक पूर्ण कर लेनेपर हम समस्त पाण्डव आपकी आज्ञाके अधीन हो जायँगे । नाथ! आपकी भी बुद्धि सदा ऐसी ही बनी रहे । ये पाण्डव सदा सत्यके पालनमें संलग्न रहे हैं । प्रभो! दान - धर्मसे युक्त हम सभी कुन्तीपुत्र सेवक, परिजन, स्त्री, पुत्र तथा बन्धु बान्धवोंसहित केवल आपकी ही शरणमें हैं' ॥ ३ ९ -४० ॥ वैशम्पायन उवाच
तथा वदति वार्ष्णेये धर्मराजे च भारत ।
अथ पश्चात् तपोवृद्धो बहुवर्षसहस्रधृक् ॥ ४१ ॥
प्रत्यदृश्यत धर्मात्मा मार्कण्डेयो महातपाः ।
अजरश्चामरश्चैव रूपौदार्यगुणान्वितः ॥ ४२ ॥
व्यदृश्यत तथा युक्तो यथा स्यात् पञ्चविंशकः । वैशम्पायनजी कहते हैं - भारत! भगवान् श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिर जब इस प्रकार बातें कर रहे थे, उसी समय अनेक सहस्र वर्षोंकी अवस्थावाले तपोवृद्ध धर्मात्मा महातपस्वी मार्कण्डेय मुनि आते दिखायी दिये । वे रूप और उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न तथा अजर- अमर थे । वैसे बड़े - बूढ़े होनेपर भी वे ऐसे दिखायी दे रहे थे, मानो पच्चीस वर्षकी अवस्थाके तरुण हों ॥ तमागतमृषिं वृद्धं बहुवर्षसहस्रिणम् ॥ ४३ ॥
आनर्चुर्ब्राह्मणाः सर्वे कृष्णश्च सह पाण्डवैः । तमर्चितं सुविश्वस्तमासीनमृषिसत्तमम् ।
पृष्ठ 1244
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ब्राह्मणानां मतेनाह पाण्डवानां च केशवः ॥ ४४ ॥
हजारों वर्षोंकी अवस्थावाले उन वृद्ध महर्षिके पधारनेपर पाण्डवोंसहित भगवान् श्रीकृष्ण तथा समस्त ब्राह्मणोंने उनका पूजन किया । पूजित होनेपर जब वे अत्यन्त विश्वास करनेयोग्य मुनिश्रेष्ठ आसनपर विराजमान हो गये, तब वहाँ आये हुए ब्राह्मणों और पाण्डवोंकी सम्मतिसे भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार कहा ॥ श्रीकृष्ण उवाच
शुश्रूषवः पाण्डवास्ते ब्राह्मणाश्च समागताः ।
द्रौपदी सत्यभामा च तथाहं परमं वचः ॥ ४५ ॥
पुरावृत्ताः कथाः पुण्याः सदाचारान् सनातनान् ।
राज्ञां स्त्रीणामृषीणां च मार्कण्डेय विचक्ष्व नः ॥ ४६ ॥
श्रीकृष्ण बोले – मार्कण्डेयजी! आपके उपदेश सुननेकी इच्छासे यहाँ पाण्डवोंके साथ- साथ बहुत - से ब्राह्मण भी पधारे हुए हैं । द्रौपदी, सत्यभामा तथा मैं, सब लोग आपकी उत्तम वाणीका रसास्वादन करना चाहते हैं । आप प्राचीनकालके नरेशों, नारियों तथा महर्षियोंकी पुरातन पुण्य कथाएँ सुनाइये और हमलोगोंसे सनातन सदाचारका वर्णन कीजिये ॥ ४५-४६ ॥ वैशम्पायन उवाच
तेषु तत्रोपविष्टेषु देवर्षिरपि नारदः ।
आजगाम विशुद्धात्मा पाण्डवानवलोककः ॥ ४७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! वे सब लोग वहाँ बैठे ही थे कि विशुद्ध अन्तःकरणवाले देवर्षि नारद भी पाण्डवोंसे मिलनेके लिये वहाँ आये ॥ ४७ ॥
तमप्यथ महात्मानं सर्वे ते पुरुषर्षभाः ।
पाद्यार्घ्यभ्यां यथान्यायमुपतस्थुर्मनीषिणः ॥ ४८ ॥
तब उन सभी श्रेष्ठ मनीषी पुरुषोंने उन महात्मा नारदजीको भी पाद्य आदि देकर उनका यथायोग्य सत्कार किया ॥ ४८ ॥
पृष्ठ 1245
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
नारदस्त्वथ देवर्षिर्ज्ञात्वा तांस्तु कृतक्षणान् ।
मार्कण्डेयस्य वदतस्तां कथामन्वमोदत ॥ ४ ९ ॥
तब देवर्षि नारदने उन सबको कथा सुननेके लिये अवसर निकालकर तैयार हुआ जान वक्ता मार्कण्डेय मुनिकी उस कथा सुननेके विचारका अनुमोदन किया ॥ ४ ९ ॥
उवाच चैनं कालज्ञः स्मयन्निव सनातनः ।
ब्रह्मर्षे कथ्यतां यत् ते पाण्डवेषु विवक्षितम् ॥ ५० ॥
उस समय उपर्युक्त अवसरके ज्ञाता सनातन भगवान् श्रीकृष्णने मार्कण्डेयजीसे मुसकराते हुए कहा— ' महर्षे! आप पाण्डवोंसे जो कुछ कहना चाहते थे, वह कहिये ' ॥ ५० ॥
एवमुक्तः प्रत्युवाच मार्कण्डेयो महातपाः ।
क्षणं कुरुध्वं विपुलमाख्यातव्यं भविष्यति ॥ ५१ ॥
उनके ऐसा कहनेपर महातपस्वी मार्कण्डेय मुनिने कहा - ' पाण्डवो! तुम सब लोग क्षणभरके लिये चुप हो जाओ; क्योंकि मुझे तुमसे बहुत कुछ कहना है ' ॥ ५१ ॥
एवमुक्ताः क्षणं चक्रुः पाण्डवाः सह तैर्द्विजैः ।
मध्यन्दिने यथाऽऽदित्यं प्रेक्षन्तस्ते महामुनिम् ॥ ५२ ॥
पृष्ठ 1246
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
उनके इस प्रकार आज्ञा देनेपर उन ब्राह्मणोंसहित पाण्डव मध्याह्नकालके सूर्यकी भाँति तेजस्वी उन महामुनिको देखते हुए उनके वक्तव्यको सुननेके लिये चुप हो गये ॥ ५२ ॥
वैशम्पायन उवाच
तं विवक्षन्तमालक्ष्य कुरुराजो महामुनिम् ।
कथासंजननार्थाय चोदयामास पाण्डवः ॥ ५३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! महामुनि मार्कण्डेयजीको बोलनेके लिये उद्यत देख कुरुराज पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरने कथा प्रारम्भ करनेके लिये इस प्रकार प्रेरित किया ॥ ५३ ॥
भवान् दैवतदैत्यानामृषीणां च महात्मनाम् ।
राजर्षीणां च सर्वेषां चरितज्ञः पुरातनः ॥ ५४ ॥
' महामुने! आप देवताओं, दैत्यों, ऋषियों, महात्माओं तथा समस्त राजर्षियोंके चरित्रोंको जाननेवाले प्राचीन महर्षि हैं ॥ ५४ ॥
सेव्यश्चोपासतिव्यश्च मतो नः कङ्क्षितश्चिरम् ।
अयं च देवकीपुत्रः प्राप्तोऽस्मानवलोककः ॥ ५५ ॥
' हमारे मनमें दीर्घकालसे यह इच्छा थी कि हमें आपकी ये सेवा और सत्संगका शुभ अवसर मिले । ये देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण भी हमसे मिलनेके लिये यहाँ पधारे हैं ॥ ५५ ॥
भवत्येव हि मे बुद्धिर्दृष्ट्वाऽऽत्मानं सुखाच्च्युतम् ।
धार्तराष्ट्रांश्च दुर्वृत्तानृध्यतः प्रेक्ष्य सर्वशः ॥ ५६ ॥
‘ ब्रह्मन्! जब मैं अपनेको सुखसे वञ्चित पाता हूँ और दुराचारी धृतराष्ट्रपुत्रोंको सब प्रकारसे समृद्धिशाली होते देखता हूँ, तब स्वभावतः ही मेरे मनमें एक विचार उठता है ॥ ५६ ॥
कर्मणः पुरुषः कर्ता शुभस्याप्यशुभस्य वा ।
स फलं तदुपाश्नाति कथं कर्ता स्विदीश्वरः ॥ ५७ ॥
कुतो वा सुखदुःखेषु नृणां ब्रह्मविदां वर ।
इह वा कृतमन्वेति परदेहेऽथ वा पुनः ॥ ५८ ॥
' मैं सोचता हूँ, शुभ और अशुभ कर्म करनेवाला जो पुरुष है, वह अपने उन कर्मोंका फल कैसे भोगता है तथा ईश्वर उन कर्मफलोंका रचयिता कैसे होता है? ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ मुनीश्वर! सुख और दुःखकी प्राप्ति करानेवाले कर्मोंमें मनुष्योंकी प्रवृत्ति कैसे होती है? मनुष्यका किया कर्म इस लोकमें ही उसका अनुसरण करता है अथवा पारलौकिक शरीरमें भी ॥ ५७-५८ ॥ देही च देहं संत्यज्य मृग्यमाणः शुभाशुभैः ।
पृष्ठ 1247
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
कथं संयुज्यते प्रेत्य इह वा द्विजसत्तम ॥ ५ ९ ॥ ‘ द्विजश्रेष्ठ! देहधारी जीव अपने शरीरका त्याग करके जब परलोकमें चला जाता है, तब उसके शुभ और अशुभ कर्म उसको कैसे प्राप्त करते हैं और इहलोक और परलोकमें जीवका उन कर्मोंके फलसे किस प्रकार संयोग होता है? ॥ ५ ९ ॥
ऐहलौकिकमेवेह उताहो पारलौकिकम् ।
क्व च कर्माणि तिष्ठन्ति जन्तोः प्रेतस्य भार्गव ॥ ६० ॥
‘ भृगुनन्दन! कर्मोंका फल इसी लोकमें प्राप्त होता है या परलोकमें? प्राणीकी मृत्यु हो जानेपर उसके कर्म कहाँ रहते हैं? ' ॥ ६० ॥
मार्कण्डेय उवाच
त्वद्युक्तोऽयमनुप्रश्नो यथावद् वदतां वर ।
विदितं वेदितव्यं ते स्थित्यर्थं त्वं तु पृच्छसि ॥ ६१ ॥
मार्कण्डेयजी बोले – वक्ताओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! तुम्हारा यह प्रश्न यथार्थ और युक्तिसंगत है । तुम्हें जाननेयोग्य सभी बातोंका ज्ञान है, तो भी तुम केवल लोक- मर्यादाकी रक्षाके लिये यह प्रश्न उपस्थित करते हो ॥ ६१ ॥
अत्र ते कथयिष्यामि तदिहैकमनाः शृणु ।
यथेहामुत्र च नरः सुखदुःखमुपाश्नुते ॥ ६२ ॥
मनुष्य इहलोक या परलोकमें जिस प्रकार सुख और दुःख भोगता है, इसके विषयमें
तुम्हें अपना विचार बताऊँगा। तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ ६२ ॥
निर्मलानि शरीराणि विशुद्धानि शरीरिणाम् ।
ससर्ज धर्मतन्त्राणि पूर्वोत्पन्नः प्रजापतिः ॥ ६३ ॥
सर्वप्रथम प्रजापति ब्रह्माजी उत्पन्न हुए । उन्होंने जीवोंके लिये निर्मल तथा विशुद्ध शरीर बनाये । साथ ही धर्मका ज्ञान करानेवाले धर्मशास्त्रोंको प्रकट किया ॥
अमोघफलसंकल्पाः सुव्रताः सत्यवादिनः ।
ब्रह्मभूता नराः पुण्याः पुराणाः कुरुसत्तम ॥ ६४ ॥
उस समयके सब मनुष्य उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तथा सत्यवादी थे । उनका अभीष्ट फलविषयक संकल्प कभी व्यर्थ नहीं होता था । कुरुश्रेष्ठ! वे सभी मनुष्य ब्रह्मस्वरूप, पुण्यात्मा और चिरजीवी थे ॥ ६४ ॥
सर्वे देवैः समायान्ति स्वच्छन्देन नभस्तलम् ।
ततश्च पुनरायान्ति सर्वे स्वच्छन्दचारिणः ॥ ६५ ॥
स्वच्छन्दमरणाश्चासन् नराः स्वच्छन्दचारिणः ।
अल्पबाधा निरातङ्गाः सिद्धार्था निरुपद्रवाः ॥ ६६ ॥
पृष्ठ 1248
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सभी स्वच्छन्दतापूर्वक आकाशमार्गसे उड़कर देवताओंसे मिलने जाते और स्वच्छन्दचारी होनेके कारण इच्छा होते ही पुनः वहाँसे लौट आते थे । वे अपनी इच्छा होनेपर ही मरते और इच्छाके अनुसार ही जीवित रहते थे । स्वतन्त्रतापूर्वक सर्वत्र विचरण करते थे । उनके मार्गमें बाधाएँ बहुत कम आती थीं । उन्हें कोई भय नहीं होता था । वे उपद्रवशून्य तथा पूर्णकाम थे ॥ ६५-६६ ॥
द्रष्टारो देवसङ्घानामृषीणां च महात्मनाम् ।
प्रत्यक्षाः सर्वधर्माणां दान्ता विगतमत्सराः ॥ ६७ ॥
देवताओं तथा महात्मा ऋषियोंके समुदायका उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन होता था । वे सभी धर्मोंको प्रत्यक्ष करनेवाले, जितेन्द्रिय तथा ईर्ष्यासे रहित होते थे ॥ ६७ ॥
आसन् वर्षसहस्रीयास्तथा पुत्रसहस्रिणः ।
उनकी आयु हजारों वर्षोंकी होती थी और वे हजार- हजार पुत्र उत्पन्न करते थे ॥ ६७३
ततः कालान्तरेऽन्यस्मिन् पृथिवीतलचारिणः ॥ ६८ ॥
कामक्रोधाभिभूतास्ते मायाव्याजोपजीविनः ।
लोभमोहाभिभूताश्च त्यक्ता देहैस्ततो नराः ॥ ६ ९ ॥
तदनन्तर कुछ कालके पश्चात् भूतलपर विचरनेवाले मनुष्य काम और क्रोधके वशीभूत हो गये । वे छल - कपट और दम्भसे जीविका चलाने लगे । उनके मनको लोभ और मोहने दबा लिया । इन दोषोंके कारण उन्हें इच्छा न होते हुए भी अपना शरीर त्यागनेके लिये विवश होना पड़ा ॥ ६८-६९ ॥
अशुभैः कर्मभिः पापास्तिर्यनिरयगामिनः ।
संसारेषु विचित्रेषु पच्यमानाः पुनःपुनः ॥ ७० ॥
वे पापपरायण हो अपने अशुभ कर्मोंके फलस्वरूप पशु -पक्षी आदिकी योनियोंमें जाने और नरकमें गिरने लगे । विचित्र सांसारिक योनियोंमें बारंबार जन्म लेकर दुःखसे संतप्त होने लगे ॥ ७० ॥
मोघेष्टा मोघसंकल्पा मोघज्ञाना विचेतसः ।
सर्वाभिशङ्किनश्चैव संवृत्ताः क्लेशदायिनः ॥ ७१ ॥
उनकी कामनाएँ, उनके संकल्प और उनके ज्ञान सभी निष्फल थे । उनकी स्मरण- शक्ति क्षीण हो गयी थी । वे सभी परस्पर संदेह करते हुए एक- दूसरेके लिये क्लेशदायक बन गये ॥ ७१ ॥
अशुभैः कर्मभिश्चापि प्रायशः परिचिह्निताः ।
दौष्कुल्या व्याधिबहुला दुरात्मानोऽप्रतापिनः ॥ ७२ ॥
उनके शरीरमें प्रायः उनके अशुभ कर्मोंके चिह्न ( कोढ़ आदि) प्रकट होने लगे । कोई अधम कुलमें जन्म लेते, कोई बहुत - से रोगोंके शिकार बने रहते और कोई दुष्ट स्वभावके हो
पृष्ठ 1249
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
जाते थे । उनमेंसे कोई भी प्रतापी नहीं होता था ॥ ७२ ॥
भवन्त्यल्पायुषः पापा रौद्रकर्मफलोदयाः ।
नाथन्तः सर्वकामानां नास्तिका भिन्नचेतसः ॥ ७३ ॥
इस प्रकार पापकर्मोंमें प्रवृत्त होनेवाले पापियोंकी आयु उनके कर्मानुसार बहुत कम हो गयी । उनके पापकर्मोंके भयंकर फल प्रकट होने लगे । वे अपनी सभी अभीष्ट वस्तुओंके लिये दूसरोंके सामने हाथ फैलाकर याचना करने लगे। कितने ही नास्तिक और विचलितचित्त हो गये ॥ ७३ ॥
जन्तोः प्रेतस्य कौन्तेय गतिः स्वैरिह कर्मभिः ।
प्राज्ञस्य हीनबुद्धेश्च कर्मकोशः क्व तिष्ठति ॥ ७४ ॥
क्वस्थस्तत् समुपाश्नाति सुकृतं यदि वेतरत् ।
इति ते दर्शनं यच्च तत्राप्यनुनयं शृणु ॥ ७५ ॥
कुन्तीनन्दन! इस संसारमें मृत्युके पश्चात् जीवकी गति उनके अपने - अपने कर्मोंके अनुसार ही होती है । परंतु मरनेके बाद ज्ञानी और अज्ञानीकी कर्मराशि कहाँ रहती है? कहाँ रहकर वह पुण्य अथवा पापका फल भोगता है? इस दृष्टिसे जो तुमने प्रश्न किया है, उसके उत्तरमें मैं सिद्धान्त बता रहा हूँ, सुनो ॥ ७४-७५ ॥
अयमादिशरीरेण देवसृष्टेन मानवः ।
शुभानामशुभानां च कुरुते संचयं महत् ॥ ७६ ॥
आयुषोऽन्ते प्रहायेदं क्षीणप्रायं कलेवरम् ।
सम्भवत्येव युगपद् योनौ नास्त्यन्तराभवः ॥ ७७ ॥
यह मनुष्य ईश्वरके रचे हुए पूर्वशरीरके द्वारा (अन्तःकरणमें) शुभ और अशुभ कर्मोंकी बहुत बड़ी राशि संचित कर लेता है । फिर आयु पूरी होनेपर वह इस जरा - जर्जर स्थूल शरीरका त्याग करके उसी क्षण किसी दूसरी योनि ( शरीर ) - में प्रकट होता है । एक शरीरको छोड़ने और दूसरेको ग्रहण करनेके बीचमें क्षणभरके लिये भी वह असंसारी नहीं होता ॥ ७६-७७ ॥
तत्रास्य स्वकृतं कर्म छायेवानुगतं सदा ।
फलत्यथ सुखार्हो वा दुःखार्हो वाथ जायते ॥ ७८ ॥
कृतान्तविधिसंयुक्तः स जन्तुर्लक्षणैः शुभैः ।
अशुभैर्वा निरादानो लक्ष्यते ज्ञानदृष्टिभिः ॥ ७ ९ ॥
वहाँ दूसरे स्थूल शरीरमें उसके पूर्वजन्मका किया हुआ कर्म छायाकी भाँति सदा उसके पीछे लगा रहता और यथासमय अपना फल देता है । इसलिये जीव सुख अथवा दुःख भोगनेके योग्य होकर जन्म लेता है । यमराजके विधान ( पुण्य और पापके फल - भोग) -में नियुक्त हुआ जीव अपने शुभ अथवा अशुभ लक्षणोंद्वारा अपनेको मिले हुए सुख अथवा
पृष्ठ 1250
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
दुःखका निवारण करनेमें असमर्थ है । यह बात ज्ञान - दृष्टिवाले महात्मा पुरुषोंद्वारा देखी जाती है ॥ ७८-७९ ॥
एषा तावदबुद्धीनां गतिरुक्ता युधिष्ठिर ।
अतः परं ज्ञानवतां निबोध गतिमुत्तमाम् ॥ ८० ॥
युधिष्ठिर! यह तत्त्वज्ञानशून्य मूढ़ मनुष्योंकी स्वर्ग- नरकरूप गति बतायी गयी है । अब इसके बाद विवेकी पुरुषोंको प्राप्त होनेवाली उत्तम गतिका वर्णन सुनो ॥ ८० ॥
मनुष्यास्तप्ततपसः सर्वागमपरायणाः ।
स्थिरव्रताः सत्यपरा गुरुशुश्रूषणे रताः ॥ ८१ ॥
सुशीलाः शुक्लजातीयाः क्षान्ता दान्ताः सुतेजसः ।
शुचियोन्यन्तरगताः प्रायशः शुभलक्षणाः ॥ ८२ ॥
ज्ञानी मनुष्य तपस्वी, सम्पूर्ण शास्त्रोंके स्वाध्यायमें तत्पर, स्थिरतापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले, सत्यपरायण, गुरुसेवामें संलग्न, सुशील, शुक्ताजातीय ( सात्त्विक ), क्षमाशील, जितेन्द्रिय और अत्यन्त तेजस्वी होते हैं । वे शुद्ध योनिमें जन्म लेते और प्रायः शुभ लक्षणोंसे सुशोभित होते हैं ॥ ८१-८२ ॥
जितेन्द्रियत्वाद् वशिनः शुक्लत्वान्मन्दरोगिणः ।
अल्पाबाधपरित्रासाद् भवन्ति निरुपद्रवाः ॥ ८३ ॥
च्यवन्तं जायमानं च गर्भस्थं चैव सर्वशः ।
स्वमात्मानं परं चैव बुध्यन्ते ज्ञानचक्षुषा ॥ ८४ ॥
जितेन्द्रिय होनेके कारण वे मनको वशमें रखते हैं और सात्त्विक अन्तःकरणके होनेके कारण नीरोग होते हैं । दुःख और त्रासके क्षीण होनेके कारण वे उपद्रवरहित होते हैं । विवेकी पुरुष गर्भसे गिरते, जन्म लेते अथवा गर्भमें ही रहते समय भी ज्ञानदृष्टिसे अपने - आपका और परमात्माका सर्वथा यथार्थ अनुभव करते हैं ॥ ८३-८४ ॥
ऋषयस्ते महात्मानः प्रत्यक्षागमबुद्धयः ।
कर्मभूमिमिमां प्राप्य पुनर्यान्ति सुरालयम् ॥ ८५ ॥
लौकिक तथा शास्त्रीय ज्ञानको प्रत्यक्ष करनेवाले वे महामना ऋषि इस कर्मभूमिमें आकर फिर देवलोकमें चले जाते हैं ॥ ८५ ॥
किंचिद् दैवाद्धठात् किंचित् किंचिदेव स्वकर्मभिः ।
प्राप्नुवन्ति नरा राजन् मा तेऽस्त्वन्या विचारणा ॥ ८६ ॥
राजन्! विवेकी मनुष्य कर्मोंका कुछ फल प्रारब्धवश प्राप्त करते हैं, कुछ कर्मोंका फल हठात् प्राप्त होता है और कुछ कर्मोंका फल अपने उद्योगसे ही प्राप्त होता है । इस विषयमें तुम्हें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ ८६ ॥
इमामत्रोपमां चापि निबोध वदतां वर ।
मनुष्यलोके यच्छ्रेयः परं मन्ये युधिष्ठिर ॥ ८७ ॥