02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 1251–1260
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1251–1260
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इह वैकस्य नामुत्र अमुत्रैकस्य नो इह ।
इह वामुत्र चैकस्य नामुत्रैकस्य नो इह ॥ ८८ ॥
वक्ताओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! मनुष्यलोकमें मैं जिसे परम कल्याणकी बात समझता हूँ, उसके विषयमें यह उदाहरण सुनो । कोई मनुष्य इस लोकमें ही परम सुख पाता है, परलोकमें नहीं । किसीको परलोकमें ही परम कल्याणकी प्राप्ति होती है, इस लोकमें नहीं । किसीको इहलोक और परलोक दोनोंमें परम श्रेयकी प्राप्ति होती है; तथा किसीको न तो परलोकमें उत्तम सुख मिलता है और न इस लोकमें ही ॥ ८७-८८ ॥ धनानि येषां विपुलानि सन्ति नित्यं रमन्ते सुविभूषिताङ्गाः । तेषामयं शत्रुवरघ्न लोको नासौ सदा देहसुखे रतानाम् ॥ ८ ९ ॥ जिनके पास बहुत धन होता है, वे अपने शरीरको हर तरहसे सजाकर नित्य विषयोंमें रमण करते अर्थात् विषय-सुख भोगते हैं । शुत्रुसूदन! सदा अपने शरीरके ही सुखमें आसक्त हुए उन मनुष्योंको केवल इसी लोकमें सुख मिलता है, परलोकमें उनके लिये सुखका सर्वथा अभाव है ॥ ८ ९ ॥ ये योगयुक्तास्तपसि प्रसक्ताः
स्वाध्यायशीला जरयन्ति देहान् ।
जितेन्द्रियाः प्राणिवधे निवृत्ता- स्तेषामसौ नायमरिघ्न लोकः ॥ ९ ० ॥
शत्रुसूदन! जो लोग इस लोकमें योगसाधन करते हैं, तपस्यामें संलग्न होते हैं और स्वाध्यायमें तत्पर रहते हैं तथा इस प्रकार प्राणियोंकी हिंसासे दूर रहकर इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए ( तपस्याद्वारा ) अपने शरीरको दुर्बल कर देते हैं, उनके लिये इस लोकमें सुख नहीं है । वे परलोकमें ही परम कल्याणके भागी होते हैं ॥ ९ ० ॥ ये धर्ममेव प्रथमं चरन्ति धर्मेण लब्ध्वा च धनानि काले । दारानवाप्य क्रतुभिर्यजन्ते तेषामयं चैव परश्च लोकः ॥ ९ १ ॥ जो लोग कर्तव्य- बुद्धिसे पहले धर्मका ही आचरण करते हैं और उस धर्मसे ही ( न्याययुक्त ) धनका उपार्जन कर यथासमय स्त्रीसे विवाह करके उसके साथ यज्ञ- याग और ईश्वरभक्ति आदिका अनुष्ठान करते हैं, उनके लिये इहलोक और परलोक दोनों ही सुखद हैं ॥ ९ १ ॥ ये नैव विद्यां न तपो न दानं न चापि मूढाः प्रजने यतन्ति ।
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न चानुगच्छन्ति सुखानि भोगां- स्तेषामयं नैव परश्च लोकः ॥ ९ २ ॥ मूढ़ विद्यालये, न तपके लिये और न दानके लिये ही प्रयत्न करते हैं एवं न धर्मपूर्वक संतानोत्पादनके लिये ही यत्नशील होते हैं, वे न तो सुख पाते हैं और न भोग ही भोगते हैं । उनके लिये न तो इस लोकमें सुख है और न परलोकमें ॥ ९ २ ॥ सर्वे भवन्तस्त्वतिवीर्यसत्त्वा दिव्यौजसः संहननोपपन्नाः । लोकादमुष्मादवनिं प्रपन्नाः स्वधीतविद्याः सुरकार्यहेतोः ॥ ९ ३ ॥ राजा युधिष्ठिर! तुम सब लोग बड़े पराक्रमी और धैर्यवान् हो । तुममें अलौकिक ओज भरा है । तुम सुदृढ़ शरीरसे सम्पन्न हो और देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये परलोकसे इस पृथिवीपर अवतीर्ण हुए हो । यही कारण है कि तुमने सभी उत्तम विद्याएँ सीख ली हैं ॥ ९ ३ ॥ कृत्वैव कर्माणि महान्ति शूरा- स्तपोदमाचारविहारशीलाः । देवानृषीन् प्रेतगणांश्च सर्वान् संतर्पयित्वा विधिना परेण ॥ ९ ४ ॥ स्वर्गं परं पुण्यकृतो निवासं क्रमेण सम्प्राप्स्यथ कर्मभिः स्वैः । मा भूद् विशङ्का तव कौरवेन्द्र दृष्ट्वाऽऽत्मनः क्लेशमिमं सुखार्हम् ॥ ९ ५ ॥ तुम सभी शूर- वीर तथा तपस्या, इन्द्रियसंयम और उत्तम आचार- व्यवहारमें सदा ही तत्पर रहनेवाले हो । अतः ( इस संसारमें बड़े - बड़े महत्त्वपूर्ण कार्य करके ) देवताओं, ऋषियों और समस्त पितरोंको उत्तम विधिसे तृप्त करोगे । तत्पश्चात् अपने सत्कर्मोंके फलस्वरूप तुम सब लोग क्रमसे पुण्यात्माओंके निवास स्थान परम स्वर्गलोकको चले जाओगे । इसीलिये कौरवराज! तुम ( अपने वर्तमान कष्टको देखकर) मनमें किसी प्रकारकी शंकाको स्थान न दो । यह क्लेश तो तुम्हारे भावी सुखका ही सूचक है ॥ ९ ४- ९ ५ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें एक सौ तिरासीवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १८३ ॥
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चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः तपस्वी तथा स्वधर्मपरायण ब्राह्मणोंका माहात्म्य वैशम्पायन उवाच
मार्कण्डेयं महात्मानमूचुः पाण्डुसुतास्तदा ।
माहात्म्यं द्विजमुख्यानां श्रोतुमिच्छाम कथ्यताम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! उस समय पाण्डुपुत्रोंने महात्मा मार्कण्डेयजीसे कहा – ' मुने! हम श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका माहात्म्य सुनना चाहते हैं, आप उसका वर्णन कीजिये ' ॥ १ ॥
एवमुक्तः स भगवान् मार्कण्डेयो महातपाः ।
उवाच सुमहातेजाः सर्वशास्त्रविशारदः ॥ २ ॥
उनके ऐसा कहनेपर महातपस्वी, महान् तेजस्वी और सम्पूर्ण शास्त्रोंके निपुण विद्वान् भगवान् मार्कण्डेयने इस प्रकार कहा ॥ २ ॥
मार्कण्डेय उवाच
हैहयानां कुलकरो राजा परपुरंजयः ।
कुमारो रूपसम्पन्नो मृगयां व्यचरद् बली ॥ ३ ॥
मार्कण्डेयजी बोले - हैहयवंशी क्षत्रियोंकी वंशपरम्पराको बढ़ानेवाला राजा परपुरंजय, जो अभी कुमारावस्थामें था, बड़ा ही सुन्दर और बलवान् था, एक दिन वनमें हिंसक पशुओंको मारनेके लिये गया ॥ ३ ॥
चरमाणस्तु सोऽरण्ये तृणवीरुत्समावृते ।
कृष्णाजिनोत्तरासङ्गं ददर्श मुनिमन्तिके ॥ ४ ॥
तृण और लताओंसे भरे हुए उस वनमें घूमते - घूमते उस राजकुमारने एक मुनिको देखा, जो काले हिंसक पशुके चर्मकी ओढ़नी ओढ़े थोड़ी ही दूरपर बैठे थे ॥ ४ ॥
स तेन निहतोऽरण्ये मन्यमानेन वै मृगम् ।
व्यथितः कर्म तत् कृत्वा शोकोपहतचेतनः ॥ ५ ॥
राजकुमारने उन्हें हिंसक पशु ही समझा और उस वनमें अपने बाणोंसे उन्हें मार डाला ।
अज्ञानवश यह पापकर्म करके वह राजकुमार व्यथित हो शोकसे मूर्च्छित हो गया ॥ ५ ॥
जगाम हैहयानां वै सकाशं प्रथितात्मनाम् ।
राज्ञां राजीवनेत्रोऽसौ कुमारः पृथिवीपतिः ।
तेषां च तद् यथावृत्तं कथयामास वै तदा ॥ ६ ॥
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तत्पश्चात् होशमें आकर वह सुविख्यात हैहयवंशी राजाओंके पास गया । वहाँ पृथ्वीका पालन करनेवाले उस कमलनयन राजकुमारने उन सबके सामने इस दुर्घटनाका यथावत् समाचार कहा ॥ ६ ॥
तं चापि हिंसितं तात मुनिं मूलफलाशिनम् ।
श्रुत्वा दृष्ट्वा च ते तत्र बभूवुर्दीनमानसाः ॥ ७ ॥
तात! फल- मूलका आहार करनेवाले एक मुनिकी हिंसा हो गयी, यह सुनकर और देखकर वे सभी क्षत्रिय मन- ही- मन बहुत दुःखी हुए ॥ ७ ॥
कस्यायमिति ते सर्वे मार्गमाणास्ततस्ततः ।
जग्मुश्चारिष्टनेम्नोऽथ तार्क्ष्यस्याश्रममञ्जसा ॥ ८ ॥
फिर वे सब - के - सब जहाँ- तहाँ यह पता लगाते हुए कि ये मुनि किसके पुत्र हैं, शीघ्र ही कश्यप - नन्दन अरिष्टनेमिके आश्रमपर गये ॥ ८ ॥
तेऽभिवाद्य महात्मानं तं मुनिं नियतव्रतम् ।
तस्थुः सर्वे स तु मुनिस्तेषां पूजामथाहरत् ॥ ९ ॥
वहाँ नियमपूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले उन महात्मा मुनिको प्रणाम करके वे सब खड़े हो गये । तब मुनिने उनके लिये अर्घ्य आदि पूजन- सामग्री अर्पित की ॥ ९ ॥
ते तमूचुर्महात्मानं न वयं सत्क्रियां मुने ।
त्वत्तोऽर्हाः कर्मदोषेण ब्राह्मणो हिंसितो हि नः ॥ १० ॥
यह देखकर उन्होंने उन महात्मासे कहा – ' मुने! हम अपने दूषित कर्मके कारण आपसे सत्कार पानेयोग्य नहीं रह गये हैं । हमसे एक ब्राह्मणकी हत्या हो गयी है ' ॥ १० ॥
तानब्रवीत् स विप्रर्षिः कथं वो ब्राह्मणो हतः ।
क्व चासौ ब्रूत सहिताः पश्यध्वं मे तपोबलम् ॥ ११ ॥
यह सुनकर उन ब्रह्मर्षिने कहा - ' आपलोगोंसे ब्राह्मणकी हत्या कैसे हुई? और वह मरा हुआ ब्राह्मण कहाँ है? बताइये । फिर सब लोग एक साथ मेरी तपस्याका बल देखियेगा' ॥ ११ ॥
ते तु तत् सर्वमखिलमाख्यायास्मै यथातथम् ।
नापश्यंस्तमृषिं तत्र गतासुं ते समागताः ॥ १२ ॥
उनके इस प्रकार पूछनेपर क्षत्रियोंने मुनिके वधका सारा समाचार उनसे ठीक-ठीक
कह सुनाया और उन्हें साथ लेकर सभी उस स्थानपर आये जहाँ मुनिकी हत्या हुई थी ।
किंतु उन्होंने वहाँ मरे हुए मुनिकी लाश नहीं देखी ॥ १२ ॥
अन्वेषमाणाः सव्रीडाः स्वप्नवद्गतचेतनाः ।
तानब्रवीत् तत्र मुनिस्तार्क्ष्यः परपुरंजय ॥ १३ ॥
स्यादयं ब्राह्मणः सोऽथ युष्माभिर्यो विनाशितः ।
पुत्रो ह्ययं मम नृपास्तपोबलसमन्वितः ॥ १४ ॥
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फिर तो वे लज्जित होकर इधर - उधर उसकी खोज करने लगे । स्वप्नकी भाँति उनकी चेतना लुप्त- सी हो गयी । तब मुनिवर अरिष्टनेमिने उनसे कहा – ' परपुरंजय! तुम लोगोंने जिसे मार डाला था, वह यही ब्राह्मण तो नहीं है? राजाओ! यह मेरा तपोबलसम्पन्न पुत्र है ' ॥ १३-१४ ॥
ते च दृष्ट्वैव तमृषिं विस्मयं परमं गताः ।
महदाश्चर्यमिति वै ते ब्रुवाणा महीपते ॥ १५ ॥
राजन्! उन महर्षिको जीवित हुआ देख वे सभी क्षत्रिय बड़े विस्मित हुए और कहने लगे ' यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है ' ॥ १५ ॥
मृतो ह्ययमुपानीतः कथं जीवितमाप्तवान् ।
किमेतत् तपसो वीर्यं येनायं जीवितः पुनः ॥ १६ ॥
' ये मरे हुए मुनि यहाँ कैसे लाये गये और किस प्रकार इन्हें जीवन मिला? क्या यह तपस्याकी ही शक्ति है, जिससे फिर ये जीवित हो गये? ॥ १६ ॥
श्रोतुमिच्छामहे विप्र यदि श्रोतव्यमित्युत ।
स तानुवाच नास्माकं मृत्युः प्रभवते नृपाः ॥ १७ ॥
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'ब्रह्मन्! हम यह सब रहस्य सुनना चाहते हैं । यदि सुननेयोग्य हो तो कहिये ' । तब महर्षिने उन क्षत्रियोंसे कहा— ' राजाओ! हम लोगोंपर मृत्युका वश नहीं चलता' ॥ १७ ॥
कारणं वः प्रवक्ष्यामि हेतुयोगसमासतः ।
( मृत्युः प्रभवने येन नास्माकं नृपसत्तमाः ।
शुद्धाचारा अनलसाः संध्योपासनतत्पराः ॥
शुद्धान्नाः शुद्धसुधना ब्रह्मचर्यव्रतान्विताः । )
सत्यमेवाभिजानीमो नानृते कुर्महे मनः ।
स्वधर्ममनुतिष्ठामस्तस्मान्मृत्युभयं न नः ॥ १८ ॥
‘ इसका क्या कारण है? यह मैं तर्क और युक्तिके साथ संक्षेपसे बता रहा हूँ । श्रेष्ठ नृपतिगण! हमलोगोंपर मृत्युका प्रभाव क्यों नहीं पड़ता - यह बताते हैं, सुनिये — हम शुद्ध आचार- विचारसे रहते हैं, आलस्यसे रहित हैं, प्रतिदिन संध्योपासनके परायण रहते हैं, शुद्ध अन्न खाते हैं और शुद्ध रीतिसे न्यायपूर्वक धनोपार्जन करते हैं; यही नहीं हमलोग सदा ब्रह्मचर्यव्रतके पालनमें लगे रहते हैं । हमलोग केवल सत्यको ही जानते हैं । कभी झूठमें मन नहीं लगाते और सदा अपने धर्मका पालन करते रहते हैं । इसलिये हमें मृत्युसे भय नहीं है ॥ १८ ॥
यद् ब्राह्मणानां कुशलं तदेषां कथयामहे ।
नैषां दुश्चरितं ब्रूमस्तस्मान्मृत्युभयं न नः ॥ १ ९ ॥
अतिथीनन्नपानेन भृत्यानत्यशनेन च ।
सम्भोज्य शेषमश्नीमस्तस्मान्मृत्युभयं न नः ॥ २० ॥
' ब्राह्मणोंके जो शुभ कर्म हैं, उन्हींकी हम चर्चा करते हैं । उनके दोषोंका बखान नहीं करते हैं । इसलिये हमें मृत्युसे भय नहीं है । हम अतिथियोंको अन्न और जलसे तृप्त करते हैं । हमारे ऊपर जिनके भरण- पोषणका भार है, उन्हें हम पूरा भोजन देते हैं और उन्हें भोजन करानेसे बचा हुआ अन्न हम स्वयं भोजन करते हैं, अतः हमें मृत्युसे भय नहीं है ॥ १ ९ -२० ॥ शान्ता दान्ताः क्षमाशीलास्तीर्थदानपरायणाः ।
पुण्यदेशनिवासाच्च तस्मान्मृत्युभयं न नः ।
तेजस्विदेशवासाच्च तस्मान्मृत्युभयं न नः ॥ २१ ॥
'हम सदा शम, दम, क्षमा, तीर्थ सेवन और दानमें तत्पर रहनेवाले हैं तथा पवित्र देशमें निवास करते हैं । इसलिये भी हमें मृत्युसे भय नहीं है । इतना ही नहीं हमलोग तेजस्वी पुरुषोंके देशमें निवास करते हैं अर्थात् सत्पुरुषोंके समीप रहा करते हैं । इस कारणसे भी हमें मृत्युसे भय नहीं होता है ॥ २१ ॥
एतद् वै लेशमात्रं वः समाख्यातं विमत्सराः ।
गच्छध्वं सहिताः सर्वे न पापाद् भयमस्ति वः ॥ २२ ॥
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‘ ईर्ष्यारहित राजाओ! ये सब बातें मैंने तुम्हें संक्षेपसे सुनायी हैं । अब तुम सब लोग एक साथ यहाँसे जाओ, तुम्हें ब्रह्महत्याके पापसे भय नहीं रहा' ॥ २२ ॥
एवमस्त्विति ते सर्वे प्रतिपूज्य महामुनिम् ।
स्वदेशमगमन् हृष्टा राजानो भरतर्षभ ॥ २३ ॥
भरतश्रेष्ठ! यह सुनकर उन हैहयवंशी क्षत्रियोंने ' एवमस्तु ' कहकर महामुनि अरिष्टनेमिका सम्मान एवं पूजन किया और प्रसन्न होकर अपने स्थानको चले गये ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणमाहात्म्यकथने चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८४ ॥
इस प्रकारश्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें ब्राह्मणमाहात्म्यवर्णनविषयक एक सौ चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८४ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ श्लोक मिलाकर कुल २४३ श्लोक हैं ) P
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पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ब्राह्मणकी महिमाके विषयमें अत्रिमुनि तथा राजा पृथुकी प्रशंसा मार्कण्डेय उवाच
भूय एव महाभाग्यं ब्राह्मणानां निबोध मे ।
वैन्यो नामेह राजर्षिरश्वमेधाय दीक्षितः ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं-राजन्! ब्राह्मणोंका और भी माहात्म्य मुझसे सुनो । पूर्वकालमें वेनके पुत्र राजर्षि पृथुने, जो यहाँ वैन्यके नामसे प्रसिद्ध थे, किसी समय अश्वमेधयज्ञकी दीक्षा ली ॥ १ ॥
तमत्रिर्गन्तुमारेभे वित्तार्थमिति नः श्रुतम् ।
भूयोऽर्थं नानुरुध्यत् स धर्मव्यक्तिनिदर्शनात् ॥ २ ॥
उन दिनों महात्मा अत्रिने धन माँगनेकी इच्छासे उनके पास जानेका विचार किया, यह बात हमारे सुननेमें आयी है; परंतु ऐसा करनेसे उनको अपना धर्मात्मापन प्रकट करना पड़ता । इसलिये फिर उन्होंने धनके लिये अनुरोध नहीं किया ॥ २ ॥
स विचिन्त्य महातेजा वनमेवान्वरोचयत् ।
धर्मपत्नीं समाहूय पुत्रांश्चेदमुवाच ह ॥ ३ ॥
महातेजस्वी अत्रिने मन- ही-मन कुछ सोच- विचारकर ( तपस्याके लिये ) वनमें ही जानेका निश्चय किया और अपनी धर्मपत्नी तथा पुत्रोंको बुलाकर इस प्रकार कहा - ॥ ३ ॥
प्राप्स्यामः फलमत्यन्तं बहुलं निरुपद्रवम् ।
अरण्यगमनं क्षिप्रं रोचतां वो गुणाधिकम् ॥ ४ ॥
‘ हमलोग वनमें रहकर ( तपद्वारा ) धर्मका बहुत अधिक उपद्रवशून्य फल पा सकते हैं । अतः शीघ्र वनमें चलनेका विचार तुम सब लोगोंको रुचिकर होना चाहिये; क्योंकि ग्राम्य-जीवनकी अपेक्षा वनमें रहना अधिक लाभप्रद है ' ॥ ४ ॥
तं भार्या प्रत्युवाचाथ धर्ममेवानुतन्वती ।
वैन्यं गत्वा महात्मानमर्थयस्व धनं बहु ॥ ५ ॥
अत्रिकी पत्नी भी धर्मका ही अनुसरण करनेवाली थी । उसने यज्ञ-यागादिके रूपमें धर्मके ही विस्तारपर दृष्टि रखकर पतिको उत्तर दिया- ' प्राणनाथ! आप धर्मात्मा राजा वैन्यके पास जाकर अधिक धनकी याचना कीजिये ॥ ५ ॥
स ते दास्यति राजर्षिर्यजमानोऽर्थितो धनम् ।
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तत आदाय विप्रर्षे प्रतिगृह्य धनं बहु ॥ ६ ॥
भृत्यान् सुतान् संविभज्य ततो व्रज यथेप्सितम् ।
एष वै परमो धर्मो धर्मविद्भिरुदाहृतः ॥ ७ ॥
‘ वे राजर्षि इन दिनों यज्ञ कर रहे हैं, अतः इस अवसरपर यदि आप उनसे माँगेंगे तो वे आपको अधिक धन देंगे । ब्रह्मर्षे! वहाँसे प्रचुर धन लाकर भरण- पोषण करनेयोग्य इन पुत्रोंको बाँट दीजिये; फिर इच्छानुसार वनको चलिये । धर्मज्ञ महात्माओंने यही परम धर्म बताया है ' ॥ ६-७ ॥ अत्रिरुवाच
कथितो मे महाभागे गौतमेन महात्मना ।
वैन्यो धर्मार्थसंयुक्तः सत्यव्रतसमन्वितः ॥ ८ ॥
अत्रि बोले- महाभागे! महात्मा गौतमने मुझसे कहा है कि ' वेनपुत्र राजा पृथु धर्म
और अर्थके साधनमें संलग्न रहते हैं । वे सत्यव्रती हैं ' ॥ ८ ॥
द्वेष्टारः किंतु नः सन्ति वसन्तस्तत्र वै द्विजाः ।
यथा मे गौतमः प्राह ततो न व्यवसाम्यहम् ॥ ९ ॥
परंतु एक बात विचारणीय है । वहाँ उनके यज्ञमें जितने ब्राह्मण रहते हैं, वे सभी मुझसे द्वेष रखते हैं, यही बात गौतमने भी कही है । इसीलिये मैं वहाँ जानेका विचार नहीं कर रहा ॥ ९ ॥
तत्र स्म वाचं कल्याणीं धर्मकामार्थसंहिताम् ।
मयोक्तामन्यथा ब्रूयुस्ततस्ते वै निरर्थिकाम् ॥ १० ॥
यदि मैं वहाँ जाकर धर्म, अर्थ और कामसे युता कल्याणमयी वाणी भी बोलूँगा तो वे उसे धर्म और अर्थके विपरीत ही बतायेंगे; निरर्थक सिद्ध करेंगे ॥ १० ॥
गमिष्यामि महाप्राज्ञे रोचते मे वचस्तव ।
गाश्च मे दास्यते वैन्यः प्रभूतं चार्थसंचयम् ॥ ११ ॥
तथापि महाप्राज्ञे! मैं वहाँ अवश्य जाऊँगा, मुझे तुम्हारी बात ठीक जँचती है । राजा पृथु मुझे बहुत - सी गौएँ तो देंगे ही, पर्याप्त धन भी देंगे ॥ ११ ॥
एवमुक्त्वा जगामाशु वैन्ययज्ञं महातपाः ।
गत्वा च यज्ञायतनमत्रिस्तुष्टाव तं नृपम् ॥ १२ ॥
वाक्यैर्मङ्गलसंयुक्तैः पूजयानोऽब्रवीद् वचः । ऐसा कहकर महातपस्वी अत्रि शीघ्र ही राजा पृथुके यज्ञमें गये । यज्ञमण्डपमें पहुँचकर उन्होंने उस राजाका मांगलिक वचनोंद्वारा स्तवन किया और उनका समादर करते हुए इस प्रकार कहा ॥ १२३ ॥
अत्रिरुवाच
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राजन् धन्यस्त्वमीशश्च भुवि त्वं प्रथमो नृपः ॥ १३ ॥
अत्रि बोले — राजन्! तुम इस भूतलके सर्वप्रथम राजा हो; अतः धन्य हो, सब प्रकारके ऐश्वर्यसे सम्पन्न हो ॥ १३ ॥
स्तुवन्ति त्वां मुनिगणास्त्वदन्यो नास्ति धर्मवित् ।
तमब्रवीदृषिः क्रुद्धो वचनं वै महातपाः ॥ १४ ॥
महर्षिगण तुम्हारी स्तुति करते हैं । तुम्हारे सिवा दूसरा कोई नरेश धर्मका ज्ञाता नहीं है । उनकी यह बात सुनकर महातपस्वी गौतम मुनिने कुपित होकर कहा ॥ १४ ॥
गौतम उवाच
मैवमत्रे पुनर्ब्रया न ते प्रज्ञा समाहिता ।
अत्र नः प्रथमं स्थाता महेन्द्रो वै प्रजापतिः ॥ १५ ॥
गौतम बोलें— अत्रे! फिर कभी ऐसी बात मुँहसे न निकालना । तुम्हारी बुद्धि एकाग्र नहीं है । यहाँ हमारे प्रथम प्रजापतिके रूपमें साक्षात् इन्द्र उपस्थित हैं ॥ १५ ॥
अथात्रिरपि राजेन्द्र गौतमं प्रत्यभाषत ।
अयमेव विधाता हि यथैवेन्द्रः प्रजापतिः ।
त्वमेव मुह्यसे मोहान्न प्रज्ञानं तवास्ति ह ॥ १६ ॥
राजेन्द्र! तब अत्रिने भी गौतमको उत्तर देते हुए कहा – ' मुने! ये पृथु ही विधाता हैं, ये ही प्रजापति इन्द्रके समान हैं । तुम्हीं मोहसे मोहित हो रहे हो; तुम्हें उत्तम बुद्धि नहीं प्राप्त है ' ॥ १६ ॥
गौतम उवाच
जानामि नाहं मुह्यामि त्वमेवात्र विमुह्यते ।
स्तौषि त्वं दर्शनप्रेप्सू राजानं जनसंसदि ॥ १७ ॥
गौतम बोले — मैं नहीं मोहमें पड़ा हूँ, तुम्हीं यहाँ आकर मोहित हो रहे हो । मैं खूब समझता हूँ, तुम राजासे मिलनेकी इच्छा लेकर ही भरी सभामें स्वार्थवश उनकी स्तुति कर रहे हो ॥ १७ ॥
न वेत्थ परमं धर्मं न चावैषि प्रयोजनम् ।
बालस्त्वमसि मूढश्च वृद्धः केनापि हेतुना ॥ १८ ॥
उत्तम धर्मका तुम्हें बिलकुल ज्ञान नहीं है । तुम धर्मका प्रयोजन भी नहीं समझते हो । मेरी दृष्टिमें तुम मूढ हो, बालक हो; किसी विशेष कारणसे बूढ़े बने हुए हो अर्थात् केवल अवस्थासे बूढ़े हो ॥ १८ ॥
विवदन्तौ तथा तौ तु मुनीनां दर्शने स्थितौ ।
ये तस्य यज्ञे संवृत्तास्तेऽपृच्छन्त कथं त्विमौ ॥ १ ९ ॥