02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 1261–1270
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1261–1270
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मुनियोंके सामने खड़े होकर जब वे दोनों इस प्रकार विवाद कर रहे थे, उस समय उन्हें देखकर जिनका यज्ञमें पहलेसे वरण हो चुका था, वे ब्राह्मण पूछने लगे — ' ये दोनों कैसे लड़ रहे हैं? ॥ १ ९ ॥ प्रवेशः केन दत्तोऽयमुभयोर्वैन्यसंसदि उच्चैः समभिभाषन्तौ केन कार्येण धिष्ठितौ ॥ २० ॥
ततः परमधर्मात्मा काश्यपः सर्वधर्मवित् ।
विवादिनावनुप्राप्तौ तावुभौ प्रत्यवेदयत् ॥ २१ ॥
‘ किसने इन दोनोंको महाराज पृथुके यज्ञमण्डपमें घुसने दिया है? ये दोनों जोर- जोरसे बातें करते और झगड़ते यहाँ किस कामसे खड़े हैं? ' उस समय परम धर्मात्मा एवं सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता कणादने सब सदस्योंको बताया कि ये दोनों किसी विषयको लेकर परस्पर विवाद कर रहे हैं और उसीके निर्णयके लिये यहाँ आये हैं ' ॥
अथाब्रवीत् सदस्यांस्तु गौतमो मुनिसत्तमान् ।
आवयोर्व्याहृतं प्रश्नं शृणुत द्विजसत्तमाः ॥ २२ ॥
वैन्यं विधातेत्याहात्रिरत्र नौ संशयो महान् ।
श्रुत्वैव तु महात्मानो मुनयोऽभ्यद्रवन् द्रुतम् ॥ २३ ॥
सनत्कुमारं धर्मज्ञं संशयच्छेदनाय वै ।
स च तेषां वचः श्रुत्वा यथातत्त्वं महातपाः ।
प्रत्युवाचाथ तानेवं धर्मार्थसहितं वचः ॥ २४ ॥
तब गौतमने सदस्यरूपसे बैठे हुए उन श्रेष्ठ मुनियोंसे कहा- ' श्रेष्ठ ब्राह्मणो! हम दोनोंके प्रश्नको आपलोग सुनें। अत्रिने राजा पृथुको विधाता कहा है । इस बातको लेकर हम दोनोंमें महान् संशय एवं विवाद उपस्थित हो गया है । ' यह सुनकर वे महात्मा मुनि उक्त संशयका निवारण करनेके लिये तुरंत ही धर्मज्ञ सनत्कुमारजीके पास दौड़े गये । उन महातपस्वीने इनकी सब बातें यथार्थरूपसे सुनकर उनसे यह धर्म एवं अर्थयुक्त वचन कहा – ॥ २२–२४ ॥ सनत्कुमार उवाच
ब्रह्म क्षत्रेण सहितं क्षत्रं च ब्रह्मणा सह ।
संयुक्तौ दहतः शत्रून् वनानीवाग्निमारुतौ ॥ २५ ॥
राजा वै प्रथितो धर्मः प्रजानां पतिरेव च ।
स एव शक्रः शुक्रश्च स धाता च बृहस्पतिः ॥ २६ ॥
सनत्कुमार बोले— ब्राह्मण क्षत्रियसे और क्षत्रिय ब्राह्मणसे संयुक्त हो जायँ तो वे दोनों मिलकर शत्रुओंको उसी प्रकार दग्ध कर डालते हैं, जैसे अग्नि और वायु परस्पर सहयोगी
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होकर कितने ही वनोंको भस्म कर डालते हैं । राजा धर्मरूपसे विख्यात है । वही प्रजापति, इन्द्र, शुक्राचार्य, धाता और बृहस्पति भी है ॥ २५-२६ ॥
प्रजापतिर्विराट् सम्राट् क्षत्रियो भूपतिर्नृपः ।
य एभिः स्तूयते शब्दैः कस्तं नार्चितुमर्हति ॥ २७ ॥
पुरायोनिर्युधाजिच्च अभिया मुदितो भवः ।
स्वर्णेता सहजिद् बभ्रुरिति राजाभिधीयते ॥ २८ ॥
सत्ययोनिः पुराविच्च सत्यधर्मप्रवर्तकः ।
अधर्मादृषयो भीता बलं क्षत्रे समादधन् ॥ २ ९ ॥
जिस राजाकी प्रजापति, विराट्, सम्राट्, क्षत्रिय, भूपति, नृप आदि शब्दोंद्वारा स्तुति की जाती है, उसकी पूजा कौन नहीं करेगा? पुरायोनि ( प्रथम कारण ), युधाजित् ( संग्रामविजयी ), अभिया (रक्षाके लिये सर्वत्र गमन करनेवाला ), मुदित ( प्रसन्न ), भव ( ईश्वर ), स्वर्णेता ( स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला), सहजित् ( तत्काल विजय करनेवाला ) तथा बभ्रु ( विष्णु ) – इन नामोंद्वारा राजाका वर्णन किया जाता है । राजा सत्यका कारण, प्राचीन बातोंको जाननेवाला तथा सत्यधर्ममें प्रवृत्ति करानेवाला है । अधर्मसे डरे हुए ऋषियोंने अपना ब्राह्मबल भी क्षत्रियोंमें स्थापित कर दिया था ॥ २७–२९ ॥
आदित्यो दिवि देवेषु तमो नुदति तेजसा ।
तथैव नृपतिर्भूमावधर्मान्नुदते भृशम् ॥ ३० ॥
जैसे देवलोकमें सूर्य अपने तेजसे सम्पूर्ण अन्धकारका नाश करता है, उसी प्रकार राजा इस पृथ्वीपर रहकर अधर्मोंको सर्वथा हटा देता है ॥ ३० ॥
ततो राज्ञः प्रधानत्वं शास्त्रप्रामाण्यदर्शनात् ।
उत्तरः सिद्धयते पक्षो येन राजेति भाषितम् ॥ ३१ ॥
अतः शास्त्र- प्रमाणपर दृष्टिपात करनेसे राजाकी प्रधानता सूचित होती है । इसलिये जिसने राजाको प्रजापति बतलाया है, उसीका पक्ष उत्कृष्ट सिद्ध होता है ॥ ३१ ॥
मार्कण्डेय उवाच
ततः स राजा संहृष्टः सिद्धे पक्षे महामनाः ।
तमत्रिमब्रवीत् प्रीतः पूर्वं येनाभिसंस्तुतः ॥ ३२ ॥
यस्मात् पूर्वं मनुष्येषु ज्यायांसं मामिहाब्रवीः ।
सर्वदेवैश्च विप्रर्षे सम्मितं श्रेष्ठमेव च ॥ ३३ ॥
तस्मात् तेऽहं प्रदास्यामि विविधं वसु भूरि च ।
दासीसहस्रं श्यामानां सुवस्त्राणामलंकृतम् ॥ ३४ ॥
दशकोटीर्हिरण्यस्य रुक्मभारांस्तथा दश ।
एतद् ददामि विप्रर्षे सर्वज्ञस्त्वं मतो हि मे ॥ ३५ ॥
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मार्कण्डेयजी कहते हैं - तदनन्तर एक पक्षकी उत्कृष्टता सिद्ध हो जानेपर महामना राजा पृथु बड़े प्रसन्न हुए और जिन्होंने उनकी पहले स्तुति की थी, उन अत्रिमुनिसे इस प्रकार बोले— ' ब्रह्मर्षे! आपने यहाँ मुझे मनुष्योंमें प्रथम ( भूपाल ), श्रेष्ठ, ज्येष्ठ तथा सम्पूर्ण देवताओंके समान बताया है, इसलिये मैं आपको प्रचुरमात्रामें नाना प्रकारके रत्न और धन दूँगा, सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे विभूषित सहस्रों युवती दासियाँ अर्पित करूँगा तथा दस करोड़ स्वर्णमुद्रा और दस भार सोना भी दूँगा । विप्रर्षे! ये सब वस्तुएँ आपको अभी दे रहा हूँ, मैं समझता हूँ, आप सर्वज्ञ हैं' ॥ ३२–३५ ॥
तदत्रिर्न्यायतः सर्वं प्रतिगृह्याभिसत्कृतः ।
प्रत्युज्जगाम तेजस्वी गृहानेव माहतपाः ॥ ३६ ॥
तब महान् तपस्वी और तेजस्वी अत्रि मुनि राजासे समादृत हो न्यायपूर्वक मिले हुए उस सम्पूर्ण धनको लेकर अपने घरको चले गये ॥ ३६ ॥
प्रदाय च धनं प्रीतः पुत्रेभ्यः प्रयतात्मवान् ।
तपः समभिसंधाय वनमेवान्वपद्यत ॥ ३७ ॥
फिर मनपर संयम रखनेवाले वे महामुनि पुत्रोंको प्रसन्नतापूर्वक वह सारा धन बाँटकर तपस्याका शुभ संकल्प मनमें लेकर वनमें ही चले गये ॥ ३७ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणमाहात्म्ये पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें ब्राह्मणमाहात्म्यविषयक एक सौ पचासीवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १८५ ॥
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षडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः तार्क्ष्यमुनि और सरस्वतीका संवाद मार्कण्डेय उवाच
अत्रैव च सरस्वत्या गीतं परपुरंजय ।
पृष्टया मुनिना वीर शृणु तार्येण धीमता ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - शत्रुओंकी राजधानी- पर विजय पानेवाले पाण्डुनन्दन! इसी विषयमें परम बुद्धिमान् तार्क्ष्य मुनिने सरस्वतीदेवीसे कुछ प्रश्न किया था, उसके उत्तरमें सरस्वतीदेवीने जो कुछ कहा था, वह तुम्हें सुनाता हूँ, सुनो ॥ १ ॥
तार्क्ष्यउवाच किं नु श्रेयः पुरुषस्येह भद्रे कथं कुर्वन् न च्यवते स्वधर्मात् । आचक्ष्व मे चारुसर्वाङ्गि कुर्यां त्वया शिष्टो न च्यवेयं स्वधर्मात् ॥ २ ॥
तार्क्ष्यने पूछा — भद्रे! इस संसारमें मनुष्यका कल्याण करनेवाली वस्तु क्या है? किस प्रकार आचरण करनेवाला पुरुष अपने धर्मसे भ्रष्ट नहीं होता है? सर्वांगसुन्दरी देवि! तुम मुझसे इसका वर्णन करो । मैं तुम्हारी आज्ञाका पालन करूँगा । मुझे विश्वास है कि तुमसे उपदेश ग्रहण करके मैं अपने धर्मसे गिर नहीं सकता ॥ २ ॥
कथं वाग्निं जुहुयां पूजये वा कस्मिन् काले केन धर्मो न नश्येत् । एतत् सर्वं सुभगे प्रब्रवीहि यथा लोकान् विरजाः संचरेयम् ॥ ३ ॥
मैं कैसे और किस समय अग्निमें हवन अथवा उसका पूजन करूँ? क्या करनेसे धर्मका नाश नहीं होता है? सुभगे! तुम ये सारी बातें मुझसे बताओ। जिससे मैं रजोगुणरहित होकर सम्पूर्ण लोकोंमें विचरण करूँ ॥ ३ ॥
मार्कण्डेय उवाच एवं पृष्टा प्रीतियुक्तेन तेन शुश्रूषुमीक्ष्योत्तमबुद्धियुक्तम् । तार्क्ष्यं विप्रं धर्मयुक्तं हितं च सरस्वती वाक्यमिदं बभाषे ॥ ४ ॥
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मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! उनके इस प्रकार प्रेमपूर्वक पूछनेपर सरस्वतीदेवीने ब्रह्मर्षि तार्क्ष्यको धर्मात्मा, उत्तम बुद्धिसे युक्त एवं श्रवणके लिये उत्सुक देखकर उनसे यह हितकर वचन कहा— ॥ ४ ॥
सरस्वत्युवाच यो ब्रह्म जानाति यथाप्रदेशं स्वाध्यायनित्यः शुचिरप्रमत्तः । सवै पारं देवलोकस्य गन्ता सहामरैः प्राप्नुयात् प्रीतियोगम् ॥ ५ ॥
सरस्वती बोली – मुने! जो प्रमाद छोड़कर पवित्र भावसे नित्य स्वाध्याय करता है और अर्चि आदि मार्गोंसे प्राप्त होनेयोग्य सगुण ब्रह्मको जान लेता है, वह देवलोकसे उठकर ब्रह्मलोकमें जाता है और देवताओंके साथ प्रेमसम्बन्ध स्थापित कर लेता है ॥ ५ ॥
तत्र स्म रम्या विपुला विशोकाः सुपुष्पिताः पुष्करिण्यः सुपुण्याः । अकर्दमा मीनवत्यः सुतीर्था हिरण्मयैरावृताः पुण्डरीकैः ॥ ६ ॥
वहाँ सुन्दर, विशाल, शोकरहित, अत्यन्त पवित्र तथा सुन्दर पुष्पोंसे सुशोभित छोटे-छोटे सरोवर हैं । उनमें कीचड़का नाम नहीं है। उनमें मछलियाँ निवास करती हैं । उन सरोवरोंमें उतरनेके लिये मनोहर सीढ़ियाँ बनी हुई हैं और वे सभी सरोवर सुवर्णमय कमल-पुष्पोंसे आच्छादित रहते हैं ॥ ६ ॥
तासां तीरेष्वासते पुण्यभाजो
महीयमानाः पृथगप्सरोभिः ।
सुपुण्यगन्धाभिरलंकृताभि- हिरण्यवर्णाभिरतीव हृष्टाः ॥ ७ ॥
उनके तटोंपर पूजनीय पुण्यात्मा पुरुष पृथक् - पृथक् अप्सराओंके साथ सानन्द प्रतिष्ठित होते हैं । वे अप्सराएँ अत्यन्त पवित्र सुगन्धसे सुवासित, विविध आभूषणोंसे विभूषित तथा स्वर्णकी - सी कान्तिसे प्रकाशित होती हैं ॥ ७ ॥
परं लोकं गोप्रदास्त्वाप्नुवन्ति दत्त्वानड्वाहं सूर्यलोकं व्रजन्ति । वासो दत्त्वा चान्द्रमसं तु लोकं दत्त्वा हिरण्यममरत्वमेति ॥ ८ ॥
गोदान करनेवाले मनुष्य उत्तम लोकमें जाते हैं। छकड़े ढोनेवाले बलवान् बैलोंका दान करनेसे दाताओंको सूर्यलोककी प्राप्ति होती है । वस्त्रदानसे चन्द्रलोक और सुवर्णदानसे
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अमरत्वकी प्राप्ति होती है ॥ ८ ॥
धेनुं दत्त्वा सुप्रभां सुप्रदोहां
कल्याणवत्सामपलायिनीं च ।
यावन्ति रोमाणि भवन्ति तस्या- स्तावद् वर्षाण्यासते देवलोके ॥ ९ ॥
जो अच्छे रंगकी हो, सुगमतासे दूध दुहा लेती हो, सुन्दर बछड़े देनेवाली हो और बन्धन तुड़ाकर भागनेवाली न हो, ऐसी गौका जो लोग दान करते हैं, वे गौके शरीरमें जितने रोएँ हों, उतने वर्षतक देवलोकमें निवास करते हैं ॥ ९ ॥
अनड्वाहं सुव्रतं यो ददाति हलस्य वोढारमनन्तवीर्यम् । धुरन्धरं बलवन्तं युवानं प्राप्नोति लोकान् दश धेनुदस्य ॥ १० ॥
जो मनुष्य अच्छे स्वभाववाले, अत्यन्त शक्तिशाली, हल खींचनेवाले, गाड़ीका बोझ ढोनेमें समर्थ, बलवान् और तरुण अवस्थावाले बैलका दान करता है, वह धेनुदान करनेवाले पुरुषसे दसगुने पुण्यलोक प्राप्त करता है ॥ १० ॥
ददाति यो वै कपिलां सचैलां कांस्योपदोहां द्रविणैरुत्तरीयैः । तैस्तैर्गुणैः कामदुहाथ भूत्वा नरं प्रदातारमुपैति सा गौः ॥ ११ ॥
जो काँसेकी दोहनी, वस्त्र, उत्तरकालिक दक्षिणाद्रव्यके साथ कपिला गौका दान करता है, उसकी दी हुई वह गौ उन- उन गुणोंके साथ कामधेनु बनकर परलोकमें दाताके पास पहुँच जाती है ॥ ११ ॥
यावन्ति रोमाणि भवन्ति धेन्वा-
स्तावत् फलं भवति गोप्रदाने ।
पुत्रांश्च पौत्रांश्च कुलं च सर्व- मासप्तमं तारयते परत्र ॥ १२ ॥
उस धेनुके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक दाता गोदानके पुण्य- फलका उपभोग करता है । साथ ही वह गौ परलोकमें दाताके पुत्रों, पौत्रों एवं सात पीढ़ीतकके समूचे कुलका उद्धार करती है ॥ १२ ॥
सदक्षिणां काञ्चनचारुशृङ्गीं कांस्योपदोहां द्रविणैरुत्तरीयैः । धेनुं तिलानां ददतो द्विजाय लोका वसूनां सुलभा भवन्ति ॥ १३ ॥
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स्वकर्मभिर्दानवसंनिरुद्धे तीव्रान्धकारे नरके सम्पतन्तम् । महार्णवे नौरिव वातयुक्ता दानं गवां तारयते परत्र ॥ १४ ॥
जो सोनेके बने हुए सुन्दर सींग, काँसके दुग्धपात्र, द्रव्य तथा ओढ़नेके वस्त्र और दक्षिणासहित तिलकी धेनुका ब्राह्मणको दान करता है, उसके लिये वसुओंके लोक सुलभ हो जाते हैं । जैसे महासागरमें डूबते हुए मनुष्यको अनुकूल वायुके सहयोगसे चलनेवाली नाव बचा लेती है, उसी प्रकार जो अपने कर्मों द्वारा काम, क्रोध आदि दानवोंसे घिरे हुए घोर अज्ञानान्धकारसे परिपूर्ण नरकमें गिर रहा है, उसे गोदानजनित पुण्य परलोकमें उबार लेता है ॥ १३-१४ ॥ यो ब्राह्मदेयां तु ददाति कन्यां भूमिप्रदानं च करोति विप्रे । ददाति दानं विधिना च यश्च स लोकमाप्नोति पुरंदरस्य ॥ १५ ॥
जो ब्राह्म विवाहकी विधिसे दान करनेयोग्य कन्याका ( श्रेष्ठ वरको ) दान करता है, ब्राह्मणको भूदान देता है और विधिपूर्वक अन्यान्य वस्तुओंका दान सम्पन्न करता है, वह इन्द्रलोकमें जाता है ॥ १५ ॥
यः सप्त वर्षाणि जुहोति तार्क्ष्य हव्यं त्वग्नौ नियतः साधुशीलः । सप्तावरान् सप्त पूर्वान् पुनाति पितामहानात्मना कर्मभिः स्वैः ॥ १६ ॥
तार्क्ष्य! जो सदाचारी पुरुष संयम- नियमका पालन करते हुए सात वर्षोंतक अग्निमें आहुति देता है, वह अपने सत्कर्मोंद्वारा अपने साथ ही सात पीढ़ीतककी भावी संतानोंको और सात पीढ़ी पूर्वतकके पितामहोंको भी पवित्र कर देता है ॥ १६ ॥
तार्क्ष्यउवाच किमग्निहोत्रस्य व्रतं पुराण- माचक्ष्व मे पृच्छतश्चानुरूपे । त्वयानुशिष्टोऽहमिहाद्य विद्यां यदग्निहोत्रस्य व्रतं पुराणम् ॥ १७ ॥
तार्क्ष्यने पूछा — मनोहर रूपवाली देवि! मैं पूछता हूँ कि अग्निहोत्रका प्राचीन नियम क्या है? यह बताओ । तुम्हारे उपदेश करनेपर आज मुझे यहाँ अग्निहोत्रके प्राचीन नियमका ज्ञान हो जाय ॥ १७ ॥
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सरस्वत्युवाच न चाशुचिर्नाप्यनिर्णिक्तपाणि- र्नाब्रह्मविज्जुहुयान्नाविपश्चित् । बुभुत्सवः शुचिकामा हि देवा नाश्रद्दधानाद्धि हविर्जुषन्ति ॥ १८ ॥
सरस्वतीने कहा — मुने! जो अपवित्र है, जिसने हाथ - पैर ( भी ) नहीं धोये हैं, जो वेदके ज्ञानसे वञ्चित है, जिसे वेदार्थका कोई अनुभव नहीं है, ऐसे पुरुषको अग्निमें आहुति नहीं देनी चाहिये । देवता दूसरोंके मनोभावको जाननेकी इच्छा रखते हैं, वे पवित्रता चाहते हैं, अतः श्रद्धाहीन मनुष्यके दिये हुए हविष्यको ग्रहण नहीं करते हैं ॥ १८ ॥
नाश्रोत्रियं देवहव्ये नियुञ्ज्या- मोघं पुरा सिञ्चति तादृशो हि । अपूर्वमश्रोत्रियमाह तार्क्ष्य न वै तादृग् जुहुयादग्निहोत्रम् ॥ १ ९ ॥ वेद- मन्त्रोंका ज्ञान न रखनेवाले पुरुषको देवताओंके लिये हविष्य प्रदान करनेके कार्यमें नियुक्त न करे; क्योंकि वैसा मनुष्य जो हवन करता है, वह व्यर्थ हो जाता है । तार्क्ष्य!
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अश्रोत्रिय पुरुषको वेदमें अपूर्व ( कुलशीलसे अपरिचित ) कहा गया है* । अतः वैसा पुरुष अग्निहोत्रका अधिकारी नहीं है ॥ १ ९ ॥ कृशाश्च ये जुह्वति श्रद्दधानाः सत्यव्रता हुतशिष्टाशिनश्च । गवां लोकं प्राप्य ते पुण्यगन्धं पश्यन्ति देवं परमं चापि सत्यम् ॥ २० ॥
जो तपसे कृश हो सत्य व्रतका पालन करते हुए प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक हवन करते हैं और हवनसे बचे हुए अन्नका भोजन करते हैं, वे पवित्र सुगन्धसे भरे हुए गौओंके लोकमें जाते हैं और वहाँ परम सत्य परमात्माका दर्शन करते हैं ॥ २० ॥
तार्क्ष्यउवाच क्षेत्रज्ञभूतां परलोकभावे कर्मोदये बुद्धिमतिप्रविष्टाम् । प्रज्ञां च देवीं सुभगे विमृश्य पृच्छामि त्वां का ह्यसि चारुरूपे ॥ २१ ॥
तार्क्ष्यने पूछा – सुन्दर रूपवाली सौभाग्यशालिनी देवि! तुम आत्मस्वरूपा हो तथा परलोकके विषयमें एवं कर्म- फलके विचारमें प्रविष्ट हुई अत्यन्त उत्कृष्ट बुद्धि हो । प्रज्ञा देवी भी तुम्हीं हो । तुम्हींको इन दोनों रूपोंमें जानकर मैं पूछता हूँ, बताओ, वास्तवमें तुम क्या हो? ॥ सरस्वत्युवाच अग्निहोत्रादहमभ्यागतास्मि विप्रर्षभाणां संशयच्छेदनाय । त्वत्संयोगादहमेतमब्रुवं भावे स्थिता तथ्यमर्थं यथावत् ॥ २२ ॥
सरस्वती बोली- मुने! मैं [विद्यारूपा सरस्वती हूँ और] श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके अग्निहोत्रसे यहाँ तुम्हारे संशयका निवारण करनेके लिये आयी हूँ। ( तुम श्रद्धालु हो) तुम्हारा सांनिध्य पाकर ही मैंने यहाँ ये पूर्वोक्त सत्य बातें यथार्थरूपसे बतायी हैं; क्योंकि आन्तरिक श्रद्धाभावमें ही मेरी स्थिति है ॥ २२ ॥
तार्क्ष्यउवाच न हि त्वया सदृशी काचिदस्ति विभ्राजसे ह्यतिमात्रं यथा श्रीः । रूपं च ते दिव्यमनन्तकान्ति
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प्रज्ञां च देवीं सुभगे बिभर्षि ॥ २३ ॥
तार्क्ष्यने पूछा — सुभगे! तुम्हारी - जैसी दूसरी कोई नारी नहीं है । तुम साक्षात् लक्ष्मीजीकी भाँति अत्यन्त प्रकाशमान दिखायी देती हो। तुम्हारा यह परम कान्तिमान् स्वरूप अत्यन्त दिव्य है । साथ ही तुम दिव्य प्रज्ञा भी धारण करती हो ( इसका क्या कारण है? ) ॥ २३ ॥
सरस्वत्युवाच श्रेष्ठानि यानि द्विपदां वरिष्ठ यज्ञेषु विद्वन्नुपपादयन्ति । तैरेव चाहं सम्प्रवृद्धा भवामि चाप्यायिता रूपवती च विप्र ॥ २४ ॥
सरस्वती बोली – नरश्रेष्ठ! विद्वन्! याज्ञिकलोग यज्ञोंमें जो श्रेष्ठ कार्य करते हैं अथवा श्रेष्ठ वस्तुओंका संकलन करते हैं, उन्हींसे मेरी पुष्टि तथा तृप्ति होती है और विप्रवर! उन्हींसे मैं रूपवती होती हूँ ॥ २४ ॥
यच्चापि द्रव्यमुपयुज्यते ह वानस्पत्यमायसं पार्थिवं वा । दिव्येन रूपेण च प्रज्ञया च तेनैव सिद्धिरिति विद्धि विद्वन् ॥ २५ ॥
विद्वन्! उन यज्ञोंमें जो समिधा स्रुवा आदि वृक्षसे उत्पन्न होनेवाली वस्तुएँ, सुवर्ण आदि तैजस वस्तुएँ तथा व्रीहि आदि पार्थिव वस्तुएँ उपयोगमें लायी जाती हैं, उन्हींके द्वारा दिव्य रूप तथा प्रज्ञासे सम्पन्न मेरे स्वरूपकी पुष्टि होती है, यह बात तुम अच्छी तरह समझ लो ॥ २५ ॥
तार्क्ष्यउवाच इदं श्रेयः परमं मन्यमाना व्यायच्छन्ते मुनयः सम्प्रतीताः । आचक्ष्व मे तं परमं विशोकं मोक्षं परं यं प्रविशन्ति धीराः । सांख्या योगा परमं यं विदन्ति परं पुराणं तमहं न वेद्मि ॥ २६ ॥
तार्क्ष्यने पूछा — देवि! जिसे परम कल्याणस्वरूप मानते हुए मुनिजन अत्यन्त विश्वासपूर्वक इन्द्रियों आदिका निग्रह करते हैं तथा जिस परम मोक्ष- स्वरूपमें धीर पुरुष प्रवेश करते हैं, उस शोकरहित परम मोक्षपदका वर्णन करो; क्योंकि जिस परम मोक्षपदको सांख्ययोगी और कर्मयोगी जानते हैं, उस सनातन मोक्ष-तत्त्वको मैं नही जानता ॥ २६ ॥