श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1331–1340
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1331–1340
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किमत्र प्रयोजनं वर्तते इत्यथाब्रुवंस्ताः स्त्रियः ॥ १६ ॥
' यहाँ तुम्हारा क्या काम है? ' उनके ऐसा पूछनेपर उन स्त्रियोंने कहा- ॥ १६ ॥
अपूर्वमिव पश्याम उदकं नात्र नीयत इत्यथामात्योऽनुदकं वनं कारयित्वोदारवृक्षं बहुपुष्य - फलमूलं तस्य मध्ये मुक्ताजालमयीं पार्श्वे वापीं गूढां सुधासलिललिप्तां स रहस्युपगम्य राजान - मब्रवीत् ॥ १७ ॥
' हमें यहाँ एक अद्भुत- सी बात दिखायी देती है । महाराजके अन्तःपुरमें पानी नहीं जाने पाता है । ( हमलोग इसीकी चौकसी करती हैं । ) ' उनकी यह बात सुनकर प्रधान मन्त्रीने एक बाग लगवाया, जिसमें प्रत्यक्षरूपसे कोई जलाशय नहीं था । उसमें बड़े सुन्दर और ऊँचे-ऊँचे वृक्ष लगवाये गये थे । वहाँ फल-फूल और कन्द-मूलकी भी बहुतायत थी । उस उपवनके मध्यभागमें एक किनारेकी ओर सुधाके समान स्वच्छ जलसे भरी हुई एक बावली भी बनवायी थी, जो मोतियोंके जालसे निर्मित थी । उस बावलीको ( लताओंद्वारा ) बाहरसे ढक दिया गया था । उस उद्यानके तैयार हो जानेपर मन्त्रीने किसी दिन राजासे मिलकर कहा— ॥ १७ ॥
वनमिदमुदारकं साध्वत्र रम्यतामिति ॥ १८ ॥
'महाराज! यह वन बहुत सुन्दर है, आप इसमें भलीभाँति विहार करें ' ॥ १८ ॥
स तस्य वचनात् तयैव सह देव्या तद् वनं प्राविशत् । स कदाचित् तस्मिन् कानने रम्ये तयैव सह व्यवाहरदथ क्षुत्तृष्णार्दितः श्रान्तोऽतिमुक्त - कागारमपश्यत् ॥ १ ९ ॥ ' मन्त्रीके कहनेसे राजाने उसी नवविवाहिता रानीके साथ उस वनमें प्रवेश किया । एक दिन महाराज परीक्षित् उस रमणीय उद्यानमें अपनी उसी प्रियतमाके साथ विहार कर रहे थे । विहार करते - करते जब वे थक गये और भूख- प्याससे बहुत पीड़ित हो गये, तब उन्हें वासन्ती लताद्वारा निर्मित एक मनोहर मण्डप दिखायी दिया ॥ १ ९ ॥ तत् प्रविश्य राजा सह प्रियया सुधाकृतां विमलां सलिलपूर्णां वापीमपश्यत् ॥ २० ॥
‘ उस मण्डपमें प्रियासहित प्रवेश करके राजाने सुधाके समान स्वच्छ जलसे परिपूर्ण वह बावली देखी ॥ २० ॥
दृष्ट्वैव च तां तस्याश्च तीरे सहैव तया देव्याऽवातिष्ठत् ॥ २१ ॥
‘ उसे देखकर वे अपनी रानीके साथ उसीके तटपर खड़े हुए ॥ २१ ॥
अथ तां देवीं स राजाब्रवीत् साध्ववतर वापीसलिलमिति । सा तद्वचः श्रुत्वावतीर्य वापीं न्यमज्जन्न पुनरुदमज्जत् ॥ २२ ॥
‘ उस समय राजाने उस रानीसे कहा– ' देवि! सावधानीके साथ इस बावलीके जलमें उतरो । ' राजाकी यह बात सुनकर उसने बावलीमें घुसकर गोता लगाया और फिर बाहर नहीं निकली ॥ २२ ॥
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तां स मृगयमाणो राजा नापश्यद् वापीमथ निःस्राव्य मण्डूकं श्वभ्रमुखे दृष्ट्वा क्रुद्ध आज्ञापयामास स राजा ॥ २३ ॥
स मां सर्वत्र मण्डूकवधः क्रियतामिति यो मयार्थी मृतमण्डूकोपायनमादायोपतिष्ठेदिति ॥ २४ ॥
‘ राजाने उस वापीमें रानीकी बहुत खोज की, परंतु वह कहीं दिखायी न दी । तब उन्होंने बावलीका सारा जल निकलवा दिया । इसके बाद एक बिलके मुँहपर कोई मेढक दीख पड़ा । इससे राजाको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने आज्ञा दे दी कि ' सर्वत्र मेढकोंका वध किया जाय । जो मुझसे मिलना चाहे, वह मरे हुए मेढकका ही उपहार लेकर मेरे पास आवे ' ॥ २३-२४ ॥ अथ मण्डूकवधे घोरे क्रियमाणे दिक्षु सर्वासु मण्डूकान् भयमाविवेश I। ते भीता मण्डूकराज्ञे यथावृत्तं न्यवेदयन् ॥ २५ ॥
‘ इस आज्ञाके अनुसार चारों ओर मेढकोंका भयंकर संहार आरम्भ हो गया । इससे सब दिशाओंके मेढकोंके मनमें भय समा गया । वे डरकर मण्डूकराजके पास गये और उनसे सब वृत्तान्त ठीक- ठीक बता दिया ॥ २५ ॥
ततो मण्डूकराट् तापसवेषधारी राजानमभ्य -गच्छदुपेत्य चैनमुवाच ॥ २६ ॥
‘ तब मण्डूकराज तपस्वीका वेष धारण करके राजाके पास गया और निकट पहुँचकर उससे इस प्रकार बोला– ॥ २६ ॥
मा राजन् क्रोधवशं गमः प्रसादं कुरु नार्हसि मण्डूकानामनपराधिनां वधं कर्तुमिति । श्लोकौ चात्र भवतः— ॥ २७ ॥
' राजन्! आप क्रोधके वशीभूत न हों । हमपर कृपा करें । निरपराध मेढकोंका वध न करावें । ' इस विषयमें ये दो श्लोक भी प्रसिद्ध हैं— ॥ २७ ॥
मा मण्डूकान् जिघांस त्वं कोपं संधारयाच्युत । प्रक्षीयते धनोद्रेको जनानामविजानताम् ॥ २८ ॥
अच्युत! आप मेढकोंको मारनेकी इच्छा न करें। अपने क्रोधको रोकें; क्योंकि अविवेकसे काम लेनेवाले मनुष्योंके धनकी वृद्धि नष्ट हो जाती है ॥ २८ ॥
प्रतिजानीहि नैतांस्त्वं प्राप्य क्रोधं विमोक्ष्यसि । अंल कृत्वा तवाधर्मं मण्डूकैः किं हतैर्हि ते ॥ २ ९ ॥ 'प्रतिज्ञा करें कि इन मेढकोंको पाकर आप क्रोध नहीं करेंगे; यह अधर्म करनेसे आपको क्या लाभ है? मण्डूकोंकी हत्यासे आपको क्या मिलेगा? ' ॥ २ ९ ॥
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तमेवंवादिनमिष्टजनशोकपरीतात्मा राजा - थोवाच ॥ ३० ॥
राजाका हृदय अपनी प्यारी रानीके विनाशके शोकसे दग्ध हो रहा था । उन्होंने उपर्युक्त बातें कहनेवाले मण्डूकराजसे कहा— ॥ ३० ॥
न हि क्षम्यते तन्मया हनिष्याम्येतानेतैर्दुरात्मभिः प्रिया मे भक्षिता सर्वथैव मे वध्या मण्डूका नार्हसि विद्वन् मामुपरोद्धुमिति ॥ ३१ ॥
' मैं क्षमा नहीं कर सकता। इन मेढकोंको अवश्य मारूँगा । इन दुरात्माओंने मेरी प्रियतमाको खा लिया है । अतः ये मेढक मेरे लिये सर्वथा वध्य ही हैं । विद्वन्! आप मुझे उनके वधसे न रोकें ' ॥ ३१ ॥
स तद् वाक्यमुपलभ्य व्यथितेन्द्रियमनाः प्रोवाच प्रसीद राजन्नहमायुर्नाम मण्डूकराजो मम सा दुहिता सुशोभना नाम । तस्या हि दौः शील्यमेतद् बहवस्तया राजानो विप्रलब्धाः पूर्वा इति ॥ ३२ ॥
' राजाकी बात सुनकर मण्डूकराजका मन और इन्द्रियाँ व्यथित हो उठीं । वह बोला —'महाराज! प्रसन्न होइये । मेरा नाम आयु है । मैं मेढकोंका राजा हूँ। जिसे आप अपनी प्रियतमा कहते हैं, वह मेरी ही पुत्री है । उसका नाम सुशोभना है । वह आपको छोड़कर चली
गयी, यह उसकी दुष्टता है । उसने पहले भी बहुत- से राजाओंको धोखा दिया है ' ॥ ३२ ॥
तमब्रवीद् राजा तया समर्थी सा मे दीयतामिति ॥ ३३ ॥
तब राजाने मण्डूकराजसे कहा- ' मैं तुम्हारी उस पुत्रीको चाहता हूँ, उसे मुझे समर्पित कर दो ' ॥ ३३ ॥
अथैनां राजे पितादादब्रवीच्चैनामेनं राजानं शुश्रूषस्वेति ॥ ३४ ॥
स एवमुक्त्वा दुहितरं क्रुद्धः शशाप यस्मात् त्वया राजानो विप्रलब्धा बहवस्तस्मादब्रह्मण्यानि तवापत्यानि भविष्यन्त्यानृतिकत्वात् तवेति ॥ ३५ ॥
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तपस्वीके वेशमें मण्डूकराजका राजाको आश्वासन ययातिसे ब्राह्मणकी याचना
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‘ तब पिता मण्डूकराजने अपनी पुत्री सुशोभना महाराज परीक्षित्को समर्पित कर दी और उससे कहा — ‘ बेटी! सदा राजाकी सेवा करती रहना । ' ऐसा कहकर मण्डूकराजने जब अपनी पुत्रीके अपराधको याद किया, तब उसे क्रोध हो आया और उसने उसे शाप देते हुए कहा — ‘ अरी! तूने बहुत- से राजाओंको धोखा दिया है, इसलिये तेरी संतानें ब्राह्मणविरोधी होंगी; क्योंकि तू बड़ी झूठी है' ॥ ३४-३५ ॥ स च राजा तामुपलभ्य तस्यां सुरतगुण- निबद्धहृदयो लोकत्रयैश्वर्यमिवोपलभ्य -हर्षेण बाष्प कलया वाचा प्रणिपत्याभिपूज्य मण्डूकराजमब्रवीद- नुगृहीतोऽस्मीति ॥ ३६ ॥
‘ सुशोभनाके रतिकलासम्बन्धी गुणोंने राजाके मनको बाँध लिया था । वे उसे पाकर ऐसे प्रसन्न हुए, मानो उन्हें तीनों लोकोंका राज्य मिल गया हो । उन्होंने आनन्दके आँसू बहाते हुए मण्डूकराजको प्रणाम किया और उसका यथोचित सत्कार करते हुए हर्षगद्गद वाणीमें कहा — ‘ मण्डूकराज! तुमने मुझपर बड़ी कृपा की है ' ॥ स च मण्डूकराजो दुहितरमनुज्ञाप्य यथागतमगच्छत् ॥ ३७ ॥
‘तत्पश्चात् कन्यासे विदा लेकर मण्डूकराज जैसे आया था, वैसे ही अपने स्थानको चला गया ॥ ३७ ॥
अथ कस्यचित् कालस्य तस्यां कुमारास्त्रय - स्तस्य राज्ञः सम्बभूवुः शलो दलो बलश्चेति । तत- स्तेषां ज्येष्ठं शलं समये पिता राज्येऽभिषिच्य तपसि धृतात्मा वनं जगाम ॥ ३८ ॥
‘ कुछ कालके पश्चात् सुशोभनाके गर्भसे राजा परीक्षित्के तीन पुत्र हुए- शल, दल और बल । इनमें शल सबसे बड़ा था । समय आनेपर पिताने शलका राज्याभिषेक करके स्वयं तपस्यामें मन लगाये तपोवनको प्रस्थान किया ॥ ३८ ॥
अथ कदाचिच्छलो मृगयामनुचरन् मृगमासाद्य रथेनान्वधावत् ॥ ३ ९ ॥ सूतं चोवाच शीघ्रं मां वहस्वेति स तथोक्तः सूतो राजानमब्रवीत् ॥ ४० ॥
न क्रियतामनुबन्धो नैष शक्यस्त्वया मृगोऽयं ग्रहीतुं यद्यपि ते रथे युक्तौ वाम्यौ स्यातामिति । ततोऽब्रवीद् राजा सूतमाचक्ष्व मे वाम्यौ हन्मि च त्वामिति । स एवमुक्तो राजभयभीतः सूतो वामदेव - शापभीतश्च सन् नाचख्यौ राज्ञे । ततः पुनः स राजा खड्गमुद्यम्य शीघ्रं कथयस्वेति तमाह हनिष्ये त्वामिति । स तदाऽऽह राजभयभीतः सूतो वामदेवस्याश्वौ वाम्यौ मनोजवाविति । ४१ ॥ 'तदनन्तर एक दिन महाराज शल शिकार खेलनेके लिये वनको गये । वहाँ उन्होंने एक हिंसक पशुको सामने पाकर रथके द्वारा ही उसका पीछा किया और सारथिसे कहा — ‘ शीघ्र मुझे मृगके निकट पहुँचाओ' । उनके ऐसा कहनेपर सारथि बोला - ' महाराज! आप इस पशुको पकड़नेका आग्रह न करें । यह आपकी पकड़में नहीं आ सकता । यदि आपके रथमें दोनों वाम्य घोड़े जुते होते, तब आप इसे पकड़ लेते । ' यह सुनकर राजाने सूतसे पूछा
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- ' सारथे! बताओ, वाम्य घोड़े कौन हैं, अन्यथा मैं तुम्हें अभी मार डालूँगा । ' राजाके ऐसा कहनेपर सारथि भयसे काँप उठा । उधर घोड़ोंका परिचय देनेपर उसे वामदेव ऋषिके शापका भी डर था । अतः उसने राजासे कुछ नहीं कहा । तब राजाने पुनः तलवार उठाकर कहा — ' अरे! शीघ्र बता, नहीं तो तुझे अभी मार डालूँगा । ' तब उसने राजाके भयसे त्रस्त होकर कहा — ‘ महाराज! वामदेव मुनिके पास दो घोड़े हैं जिन्हें ' वाम्य ' कहते हैं । वे मनके समान वेगशाली हैं ' ॥ ३ ९ —४१ ॥ अथैनमेवं ब्रुवाणमब्रवीद् राजा वामदेवाश्रमं प्रयाहीति स गत्वा वामदेवाश्रमं तमृषिमब्रवीत् ॥ ४२ ॥
' सारथिके ऐसा कहनेपर राजाने उसे आज्ञा दी, 'चलो वामदेवके आश्रमपर । ' वामदेवके आश्रमपर पहुँचकर राजाने उन महर्षिसे कहा— ॥ ४२ ॥
भगवन् मृगो मे विद्धः पलायते सम्भावयितुमर्हसि वाम्यौ दातुमिति । तमब्रवीदृषिर्ददानि ते वाम्यौ कृतकार्येण भवता ममैव वाम्यौ निर्यात्यौ क्षिप्रमिति । स च तावश्वौ प्रतिगृह्यानुज्ञाप्य ऋषिं प्रायाद् वामीप्रयुक्तेन रथेन मृगं प्रतिगच्छंश्चाब्रवीत् सूतमश्वरत्नाविमावयोग्यौ ब्राह्मणानां नैतौ प्रतिदेयौ वामदेवायेत्युक्त्वा मृगमवाप्य स्वनगरमेत्याश्वावन्तःपुरेऽस्थापयत् ॥ ४३ ॥
‘ भगवन्! मेरे बाणोंसे घायल हुआ हिंसक पशु भागा जा रहा है । आप अपने वाम्य अश्व मुझे देनेकी कृपा करें । ' तब महर्षिने कहा- ' मैं तुम्हें वाम्य अश्व दिये देता हूँ । परंतु जब तुम्हारा कार्य सिद्ध हो जाय, तब तुम शीघ्र ही ये दोनों अश्व मुझे ही लौटा देना । ' राजाने दोनों अश्व पाकर ऋषिकी आज्ञा ले वहाँसे प्रस्थान किया । वामी घोड़ोंसे जुते हुए रथके द्वारा हिंसक पशुका पीछा करते हुए वे सारथिसे बोले – ' सूत! ये दोनों अश्वरत्न ब्राह्मणोंके पास रहने योग्य नहीं । अतः इन्हें वामदेवके पास लौटानेकी आवश्यकता नहीं है । ' ऐसा कहकर राजा हिंसक पशुको साथ ले अपनी राजधानीको चल दिये । वहाँ पहुँचकर उन्होंने उन दोनों अश्वोंको अन्तःपुरमें बाँध दिया ॥ ४३ ॥
अथर्षिश्चिन्तयामास तरुणो राजपुत्रः कल्याणं पत्रमासाद्य रमते न प्रतिनिर्यातयत्यहो कष्टमिति ॥ ४४ ॥
उधर वामदेव मुनि मन- ही- मन इस प्रकार चिन्ता करने लगे – ' अहो! वह तरुण राजकुमार मेरे अच्छे घोड़ोंको लेकर मौज कर रहा है, उन्हें लौटानेका नाम ही नहीं लेता है । यह तो बड़े कष्टकी बात है! ' ॥ ४४ ॥
स मनसा विचिन्त्य मासि पूर्णे शिष्यमब्रवीत् ॥ ४५ ॥
गच्छात्रेय राजानं ब्रूहि यदि पर्याप्तं निर्यातयो- पाध्यायवाम्याविति । स गत्वैवं तं राजानमब्रवीत् तं राजा प्रत्युवाच राज्ञामेतद्वाहनमनर्हा ब्राह्मणा रत्नानामेवंविधानां किं ब्राह्मणानामश्वैः कार्यं साधु गम्यताम् ॥ ४६ ॥
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‘ मन- ही- मन सोच - विचार करते हुए जब एक मास पूरा हो गया, तब वे अपने शिष्यसे बोले — ‘ आत्रेय! जाकर राजासे कहो कि यदि काम पूरा हो गया हो तो गुरुजीके दोनों वाम्य अश्व लौटा दीजिये । ' शिष्यने जाकर राजासे यही बात दुहरायी । तब राजाने उसे उत्तर देते हुए कहा— ‘ यह सवारी राजाओंके योग्य है । ब्राह्मणोंको ऐसे रत्न रखनेका अधिकार नहीं है । भला, ब्राह्मणोंको घोड़े लेकर क्या करना है? अब आप सकुशल पधारिये ' ॥ ४५-४६ ॥ स गत्वैतदुपाध्यायायाचष्ट तच्छ्रुत्वा वचनमप्रियं वामदेवः क्रोधपरीतात्मा स्वयमेव राजानभिगम्या-श्वार्थमचोदयन्न चाददद् राजा ॥ ४७ ॥
‘ शिष्यने लौटकर ये सारी बातें उपाध्यायसे कहीं । वह अप्रिय वचन सुनकर वामदेव मन-ही-म-मन क्रोधसे जल उठे और स्वयं ही उस राजाके पास जाकर उन्हें घोड़े लौटा देनेके लिये कहा । परंतु राजाने वे घोड़े नहीं दिये ' ॥ ४७ ॥
वामदेव उवाच प्रयच्छ वाम्यौ मम पार्थिव त्वं
कृतं हि ते कार्यमाभ्यामशक्यम् ।
मा त्वा वधीद् वरुणो घोरपाशै- ब्रह्मक्षत्रस्यान्तरे वर्तमानम् ॥ ४८ ॥
तब वामदेवने कहा- राजन्! मेरे वाम्य अश्वोंको अब मुझे लौटा दो । निश्चय ही उन घोड़ोंद्वारा तुम्हारा असाध्य कार्य पूरा हो गया है। इस समय तुम ब्राह्मण और क्षत्रियके बीचमें विद्यमान हो । कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी असत्यवादिताके कारण राजा वरुण तुम्हें अपने भयंकर पाशोंसे बाँध लें ॥ ४८ ॥
राजोवाच अनड्वाहौ सुव्रतौ साधु दान्ता- वेतद् विप्राणां वाहनं वामदेव । ताभ्यां याहि त्वं तत्र कामो महर्षे छन्दांसि वै त्वादृशं संवहन्ति ॥ ४ ९ ॥ राजा बोले — वामदेवजी! ये दो अच्छे स्वभावके सीखे - सिखाये हृष्ट -पुष्ट बैल हैं, जो गाड़ी खींच सकते हैं; ये ही ब्राह्मणोंके लिये उचित वाहन हो सकते हैं । अतः महर्षे! इन्हींको गाड़ीमें जोतकर आप जहाँ चाहें जायँ। आप जैसे महात्माका भार तो वेदमन्त्र ही वहन करते हैं ॥ ४ ९ ॥ वामदेव उवाच छन्दांसि वै मादृशं संवहन्ति
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लोकेऽमुष्मिन् पार्थिव यानि सन्ति । अस्मिंस्तु लोके मम यानमेत- दस्मद्विधानामपरेषां च राजन् ॥ ५० ॥
वामदेवने कहा — राजन्! इसमें संदेह नहीं कि हम जैसे लोगोंके लिये वेदके मन्त्र ही वाहनका काम देते हैं । परंतु वे परलोकमें ही उपलब्ध होते हैं । इस लोकमें तो हम - जैसे लोगोंके तथा दूसरोंके लिये भी ये अश्व ही वाहन होते हैं ॥ ५० ॥
राजोवाच चत्वारस्त्वां वा गर्दभाः संवहन्तु श्रेष्ठाश्वतर्यो हरयो वातरंहाः । तैस्त्वं याहि क्षत्रियस्यैष वाहो ममैव वाम्यौ न तवैतौ हि विद्धि ॥ ५१ ॥
राजाने कहा— ब्रह्मन्! तब चार गधे, अच्छी जातिकी खच्चरियाँ या वायुके समान वेगशाली दूसरे घोड़े आपकी सवारीके लिये प्रस्तुत हो सकते हैं । इन्हीं वाहनोंद्वारा आप यात्रा करें । यह वाहन, जिसे आप माँगने आये हैं, क्षत्रिय नरेशके ही योग्य हैं । इसलिये आप यह समझ लें कि ये वाम्य अश्व मेरे ही हैं, आपके नहीं ॥ ५१ ॥
वामदेव उवाच घोरं व्रतं ब्राह्मणस्यैतदाहु- रेतद् राजन् यदिहाजीवमानः । अयस्मया घोररूपा महान्त- श्चत्वारो वा यातुधानाः सुरौद्राः । मया प्रयुक्तास्त्वद्वधमीप्समाना वहन्तु त्वां शितशूलाश्चतुर्धा ॥ ५२ ॥
वामदेव बोले — राजन्! तुम ब्राह्मणोंके इस धनको हड़पकर जो अपने उपयोगमें लाना चाहते हो, यह बड़ा भयंकर कर्म कहा गया है । यदि मेरे घोड़े वापस न दोगे तो मेरी आज्ञा पाकर विकराल रूपधारी तथा लौह- शरीरवाले अत्यन्त भयंकर चार बड़े - बड़े राक्षस हाथोंमें तीखे त्रिशूल लिये तुम्हारे वधकी इच्छासे टूट पड़ेंगे और तुम्हारे शरीरके चार टुकड़े करके उठा ले जायँगे ॥ ५२ ॥
राजोवाच ये त्वां विदुर्ब्राह्मणं वामदेव वाचा हन्तुं मनसा कर्मणा वा । ते त्वां सशिष्यमिह पातयन्तु
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मद्वाक्यनुन्नाः शितशूलासिहस्ताः ॥ ५३ ॥
राजाने कहा — वामदेवजी! आप ब्राह्मण हैं तो भी मन, वाणी एवं क्रियाद्वारा मुझे मारनेको उद्यत हैं, इसका पता हमारे जिन सेवकोंको चल गया है, वे मेरी आज्ञा पाते ही हाथोंमें तीखे त्रिशूल तथा तलवार लेकर शिष्योंसहित आपको पहले ही यहाँ मार गिरावेंगे ॥ ५३ ॥
वामदेवउवाच ममैतौ वाम्यौ प्रतिगृह्य राजन् पुनर्ददानीति प्रपद्य मे त्वम् । प्रयच्छ शीघ्रं मम वाम्यौ त्वमश्वौ यद्यात्मानं जीवितुं ते क्षमं स्यात् ॥ ५४ ॥
वामदेव बोले — राजन्! तुमने जब ये मेरे दोनों घोड़े लिये थे, उस समय यह प्रतिज्ञा की थी मैं इन्हें पुनः लौटा दूँगा । ऐसी दशामें यदि अपने - आपको तुम जीवित रखना चाहते हो तो मेरे दोनों वाम्यसंज्ञक घोड़े वापस दे दो ॥ ५४ ॥
राजोवाच न ब्राह्मणेभ्यो मृगया प्रसूता न त्वानुशास्म्यद्यप्रभृति ह्यसत्यम् । तवैवाज्ञां सम्प्रणिधाय सर्वां तथा ब्रह्मन् पुण्यलोकं लभेयम् ॥ ५५ ॥
राजा बोले — ब्रह्मन्! ( ये घोड़े शिकारके उपयोग में आने योग्य हैं और) ब्राह्मणोंके लिये शिकार खेलनेकी विधि नहीं है । यद्यपि आप मिथ्यावादी हैं, तो भी मैं आपको दण्ड नहीं दूँगा और आजसे आपके सारे आदेशोंका पालन करूँगा, जिससे मुझे पुण्यलोककी प्राप्ति हो ( परन्तु ये घोड़े आपको नहीं मिल सकते ) ॥ ५५ ॥
वामदेव उवाच नानुयोगा ब्राह्मणानां भवन्ति
वाचा राजन् मनसा कर्मणा वा ।
यस्त्वेवं ब्रह्म तपसान्वेति विद्वां- स्तेन श्रेष्ठो भवति हि जीवमानः ॥ ५६ ॥
वामदेवने कहा — राजन्! मन, वाणी अथवा क्रियाद्वारा कोई भी अनुशासन या दण्ड ब्राह्मणोंपर लागू नहीं हो सकता । जो इस प्रकार जानकर कष्टसहनपूर्वक ब्राह्मणकी सेवा करता है; वह उस ब्राह्मणसेवारूप कर्मसे ही श्रेष्ठ होता और जीवित रहता है ॥ ५६ ॥
मार्कण्डेय उवाच
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एवमुक्ते वामदेवेन राजन् समुत्तस्थू राक्षसा घोररूपाः । तैः शूलहस्तैर्वध्यमानः स राजा प्रोवाचेदं वाक्यमुच्चैस्तदानीम् ॥ ५७ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! वामदेवकी यह बात पूर्ण होते ही विकराल रूपधारी चार राक्षस वहाँ प्रकट हो गये । उनके हाथमें त्रिशूल थे । जब वे राजापर चोट करने लगे, तब राजाने उच्च स्वरसे यह बात कही- ॥ ५७ ॥
इक्ष्वाकवो यदि वा मां त्यजेयु- विधेया मे यदि चेमे विशोऽपि । नोत्स्रक्ष्येऽहं वामदेवस्य वाम्यौ नैवंविधा धर्मशीला भवन्ति ॥ ५८ ॥
‘ यदि ये इक्ष्वाकुवंशके लोग तथा मेरे आज्ञापालक प्रजावर्गके मनुष्य भी मेरा त्याग कर दें, तो भी मैं वामदेवके इन वाम्य संज्ञक घोड़ोंको कदापि नहीं दूँगा; क्योंकि इनके - जैसे लोग धर्मात्मा नहीं होते हैं ' ॥ ५८ ॥
एवं ब्रुवन्नेव स यातुधानै- तो जगामाशु महीं क्षितीशः ।
ततो विदित्वा नृपतिं निपातित- मिक्ष्वाकवो वै दलमभ्यषिञ्चन् ॥ ५ ९ ॥
ऐसा कहते ही राजा शल उन राक्षसोंसे मारे जाकर तुरंत धराशायी हो गये । इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रियोंको जब यह मालूम हुआ कि राजा मार गिराये गये, तब उन्होंने उनके छोटे भाई दलका राज्याभिषेक कर दिया ॥ ५ ९ ॥ राज्ये तदा तत्र गत्वा स विप्रः
प्रोवाचेदं वचनं वामदेवः ।
दलं राजानं ब्राह्मणानां हि देय- मेवं राजन् सर्वधर्मेषु दृष्टम् ॥ ६० ॥
तब पुनः उस राज्यमें जाकर विप्रवर वामदेवने राजा दलसे यह बात कही — ' महाराज! ब्राह्मणोंकी वस्तु उन्हें दे दी जाय, यह बात सभी धर्मोंमें देखी गयी है ॥ ६० ॥
बिभेषि चेत् त्वमधर्मान्नरेन्द्र प्रयच्छ मे शीघ्रमेवाद्य वाम्यौ । एतच्छ्रुत्वा वामदेवस्य वाक्यं स पार्थिवः सूतमुवाच रोषात् ॥ ६१ ॥
‘ नरेन्द्र! यदि तुम अधर्मसे डरते हो तो मुझे अभी शीघ्रतापूर्वक मेरे वाम्य अश्वोंको लौटा दो । ' वामदेवकी यह बात सुनकर राजाने रोषपूर्वक अपने सारथिसे कहा— ॥ ६१ ॥