02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 1451–1460
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1451–1460
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इनके सिवा और भी बहुत- से जीवोंका वध वे करते रहते हैं । इस विषयमें आप क्या समझते हैं? ॥
धान्यबीजानि यान्याहुर्व्रह्यादीनि द्विजोत्तम ।
सर्वाण्येतानि जीवानि तत्र किं प्रतिभाति ते ॥ १५ ॥
‘द्विजश्रेष्ठ! धान आदि जितने अन्नके बीज हैं, वे सब- के -सब जीव ही हैं; अतः इस विषयमें आप क्या समझते हैं? ॥ १५ ॥
अध्याक्रम्य पशूंश्चापि घ्नन्ति वै भक्षयन्ति च ।
वृक्षांस्तथौषधीश्चापि छिन्दन्ति पुरुषा द्विज ॥ १६ ॥
जीवा हि बहवो ब्रह्मन् वृक्षेषु च फलेषु च ।
उदके बहवश्चापि तत्र किं प्रतिभाति ते ॥ १७ ॥
' विप्रवर! कितने ही मनुष्य पशुओंपर आक्रमण करके उन्हे मारते और खाते हैं । वृक्षों तथा ओषधियों ( अन्तके पौधों ) को काटते हैं । वृक्षों और फलोंमें भी बहुत - से जीव रहते हैं । जलमें भी नाना प्रकारके जीव रहते हैं । ब्रह्मन्! उनके विषयमें आप क्या समझते हैं? ॥ १६-१७ ॥
सर्वं व्याप्तमिदं ब्रह्मन् प्राणिभिः प्राणिजीवनैः ।
मत्स्यान् ग्रसन्ते मत्स्याश्च तत्र किं प्रतिभाति ते ॥ १८ ॥
'जीवोंसे ही जीवन - निर्वाह करनेवाले जीवोंद्वारा यह सारा जगत् व्याप्त है । मत्स्य
मत्स्योंतकको अपना ग्रास बना लेते हैं । उनके विषयमें आप क्या समझते हैं? ॥ १८ ॥
सत्त्वैः सत्त्वानि जीवन्ति बहुधा द्विजसत्तम ।
प्राणिनोऽन्योन्यभक्षाश्च तत्र किं प्रतिभाति ते ॥ १ ९ ॥
'द्विजश्रेष्ठ! बहुधा जीव जीवोंसे ही जीवन धारण करते हैं और प्राणी स्वयं ही एक-दूसरेको अपना आहार बना लेते हैं । उनके विषयमें आप क्या समझते हैं? ॥ १ ९ ॥
चङ्क्रम्यमाणा जीवांश्च धरणीसंश्रितान् बहून् ।
पद्भयां घ्नन्ति नरा विप्र तत्र किं प्रतिभाति ते ॥ २० ॥
' मनुष्य चलते- फिरते समय धरतीके बहुत - से जीव- जन्तुओंको (असावधानीपूर्वक ) पैरोंसे मार देते हैं । ब्रह्मन्! उनके विषयमें आप क्या समझते हैं? ॥ २० ॥
उपविष्टाः शयानाश्च घ्नन्ति जीवाननेकशः ।
ज्ञानविज्ञानवन्तश्च तत्र किं प्रतिभाति ते ॥ २१ ॥
‘ ज्ञान-विज्ञानसम्पन्न पुरुष भी ( अनजानमें ) बैठते - सोते समय अनेक जीवोंकी हिंसा कर बैठते हैं । उनके विषयमें आप क्या समझते हैं? ॥ २१ ॥
जीवैर्ग्रस्तमिदं सर्वमाकाशं पृथिवी तथा ।
अविज्ञानाच्च हिंसन्ति तत्र किं प्रतिभाति ते ॥ २२ ॥
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‘ आकाशसे लेकर पृथ्वीतक यह सारा जगत् जीवोंसे भरा हुआ है । कितने ही मनुष्य
अनजानमें भी जीवहिंसा करते हैं । इस विषयमें आप क्या समझते हैं? ॥ २२ ॥
अहिंसेति यदुक्तं हि पुरुषैर्विस्मितैः पुरा ।
के न हिंसन्ति जीवान् वै लोकेऽस्मिन् द्विजसत्तम ।
बहु संचित्य इति वै नास्ति कश्चिदहिंसकः ॥ २३ ॥
‘ पूर्वकालके अभिमानशून्य श्रेष्ठ पुरुषोंने जो अहिंसाका उपदेश किया है ( उसका तत्त्व समझना चाहिये; क्योंकि ) द्विजश्रेष्ठ! (स्थूल दृष्टिसे देखा जाय तो ) इस संसारमें कौन जीवहिंसा नहीं करते हैं? बहुत सोच - विचारकर मैं इस निश्चयपर पहुँचा हूँ कि कोई भी ( क्रियाशील मनुष्य ) अहिंसक नहीं है ॥ २३ ॥
अहिंसायां तु निरता यतयो द्विजसत्तम ।
कुर्वन्त्येव हि हिंसां ते यत्नादल्पतरा भवेत् ॥ २४ ॥
‘ द्विजश्रेष्ठ! यतिलोग अहिंसा- धर्मके पालनमें तत्पर होते हैं, परंतु वे भी हिंसा कर ही डालते हैं ( अर्थात् उनके द्वारा भी हिंसा हो ही जाती है ) । अवश्य ही यत्नपूर्वक चेष्टा करनेसे हिंसाकी मात्रा बहुत कम हो सकती है ॥ २४ ॥
आलक्ष्याश्चैव पुरुषाः कुले जाता महागुणाः ।
महाघोराणि कर्माणि कृत्वा लज्जन्ति वै द्विज ॥ २५ ॥
‘ब्रह्मन्! उत्तम कुलमें उत्पन्न, परम सद्गुणसम्पन्न और श्रेष्ठ माने जानेवाले पुरुष भी अत्यन्त भयानक कर्म करके लज्जाका अनुभव करते ही हैं ॥ २५ ॥
सुहृदः सुहृदोऽन्यांश्च दुर्हृदश्चापि दुर्हृदः ।
सम्यक् प्रवृत्तान् पुरुषान् न सम्यगनुपश्यतः ॥ २६ ॥
' मित्र दूसरे मित्रोंको और शत्रु अपने शत्रुओंको, वे अच्छे कर्ममें लगे हुए हों तो भी अच्छी दृष्टिसे नहीं देखते ॥ २६ ॥
समृद्धैश्च न नन्दन्ति बान्धवा बान्धवैरपि ।
गुरूंश्चैव विनिन्दन्ति मूढाः पण्डितमानिनः ॥ २७ ॥
' बन्धु - बान्धव अपने समृद्धिशाली बान्धवोंसे भी प्रसन्न नहीं रहते । अपनेको पण्डित माननेवाले मूढ़ मनुष्य गुरुजनोंकी भी निन्दा करते हैं ॥ २७ ॥
बहु लोके विपर्यस्तं दृश्यते द्विजसत्तम ।
धर्मयुक्तमधर्मं च तत्र किं प्रतिभाति ते ॥ २८ ॥
‘द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार जगत्में अनेक उलटी बातें दिखायी देती हैं । अधर्म भी धर्मसे
युक्त प्रतीत होता है । इस विषयमें आप क्या समझते हैं? ॥ २८ ॥
वक्तुं बहुविधं शक्यं धर्माधर्मेषु कर्मसु ।
स्वकर्मनिरतो यो हि स यशः प्राप्नुयान्महत् ॥ २ ९ ॥
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‘ धर्म और अधर्मसम्बन्धी कार्योंके विषयमें और भी बहुत - सी बातें कही जा सकती हैं । अतएव जो अपने कुलोचित कर्ममें लगा हुआ है, वही महान् यशका भागी होता है ' ॥ २ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि पतिव्रतोपाख्याने ब्राह्मणव्याधसंवादे अष्टाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०८ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें पतिव्रतोपाख्यानके प्रसंगमेंब्राह्मणव्याधसंवादविषयक दो सौ आठवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २०८ ॥
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नवाधिकद्विशततमोऽध्यायः धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन मार्कण्डेय उवाच
धर्मव्याधस्तु निपुणं पुनरेव युधिष्ठिर ।
विप्रर्षभमुवाचेदं सर्वधर्मभृतां वर ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - सम्पूर्ण धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! तदनन्तर धर्मव्याधने विप्रवर कौशिकसे पुनः कुशलतापूर्वक कहना आरम्भ किया ॥ १ ॥
व्याधउवाच
श्रुतिप्रमाणो धर्मोऽयमिति वृद्धानुशासनम् ।
सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य बहुशाखा ह्यनन्तिका ॥ २ ॥
व्याध बोला — वृद्ध पुरुषोंका कहना है कि ' धर्मके विषयमें केवल वेद ही प्रमाण है । ' यह ठीक है, तो भी धर्मकी गति बड़ी सूक्ष्म है । उसके अनन्त भेद और अनेक शाखाएँ हैं ॥ २ ॥
प्राणान्तिके विवाहे च वक्तव्यमनृतं भवेत् ।
अनृतेन भवेत् सत्यं सत्येनैवानृतं भवेत् ॥ ३ ॥
( वेदके अनुसार सत्य धर्म और असत्य अधर्म हैं, परंतु ) यदि किसीके प्राणोंपर संकट आ जाय अथवा कन्या आदिका विवाह तै करना हो तो ऐसे अवसरोंपर प्राणरक्षा आदिके झूठलिये बोलनेकी आवश्यकता पड़ जाय तो वहाँ असत्यसे ही सत्यका फल मिलता है । इसके विपरीत ( यदि सत्यभाषणसे किसीके प्राणोंपर संकट आ गया, तो वहाँ) सत्यसे ही असत्यका फल प्राप्त होता है ॥ ३ ॥
यद् भूतहितमत्यन्तं तत् सत्यमिति धारणा ।
विपर्ययकृतोऽधर्मः पश्य धर्मस्य सूक्ष्मताम् ॥ ४ ॥
जिससे परिणाममें प्राणियोंका अत्यन्त हित होता हो, वह वास्तवमें सत्य है । इसके विपरीत जिससे किसीका अहित होता हो या दूसरोंके प्राण जाते हों, वह देखनेमें सत्य होनेपर भी वास्तवमें असत्य एवं अधर्म है* । इस प्रकार विचार करके देखिये, धर्मकी गति कितनी सूक्ष्म है ॥ ४ ॥
यत् करोत्यशुभं कर्म शुभं वा यदि सत्तम ।
अवश्यं तत् समाप्नोति पुरुषो नात्र संशयः ॥ ५ ॥
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सज्जनशिरोमणे! मनुष्य जो शुभ या अशुभ कार्य करता है, उसका फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ५ ॥
विषमां च दशां प्राप्तो देवान् गर्हति वै भृशम् आत्मनः कर्मदोषाणि न विजानात्यपण्डितः ॥ ६ ॥
मूर्ख मानव संकटकी दशामें पड़नेपर देवताओंको बहुत कोसता है, उनकी भरपेट निन्दा करता है; किंतु वह यह नहीं समझता कि यह अपने ही कर्मोंका दोषावह परिणाम है ॥ ६ ॥
मूढो नैकृतिकश्चापि चपलश्च द्विजोत्तम ।
सुखदुःखविपर्यासान् सदा समुपपद्यते ॥ ७ ॥
नैनं प्रज्ञा सुनीतं वा त्रायते नैव पौरुषम् । द्विजश्रेष्ठ! मूर्ख, शठ और चंचल चित्तवाला मनुष्य सदा ही भ्रमवश सुखमें दुःख और दुःखमें सुखबुद्धि कर लेता है । उस समय बुद्धि, उत्तम नीति ( शिक्षा ) तथा पुरुषार्थ भी उसकी रक्षा नहीं कर पाते ॥ ७३ ॥
योऽयमिच्छेद् यथा कामं तं तं कामं स आप्नुयात् ॥ ८ ॥
यदि स्यादपराधीनं पौरुषस्य क्रियाफलम् । यदि पुरुषार्थजनित कर्मका फल पराधीन न होता तो जिसकी जो इच्छा होती, उसीको वह प्राप्त कर लेता ॥ ८३ ॥
संयताश्चापि दक्षाश्च मतिमन्तश्च मानवाः ॥ ९ ॥
दृश्यन्ते निष्फलाः सन्तः प्रहीणाः सर्वकर्मभिः । किंतु बड़े - बड़े संयमी, कार्यकुशल और बुद्धिमान् मनुष्य भी अपना काम करते - करते थक जाते हैं तो भी वे इच्छानुसार फलकी प्राप्तिसे वंचित ही देखे जाते हैं ॥ ९ ३ ॥ भूतानामपरः कश्चिद्धिंसायां सततोत्थितः ॥ १० ॥
वञ्चनायां च लोकस्य स सुखी जीवते सदा । तथा दूसरा मनुष्य, जो निरन्तर जीवोंकी हिंसाके लिये उद्यत रहता है और सदा लोगोंको ठगनेमें ही लगा रहता है, वह सुखपूर्वक जीवन बिताता देखा जाता है ॥ १०३ ॥
अचेष्टमपि चासीनं श्रीः कंचिदुपतिष्ठति ॥ ११ ॥
कश्चित् कर्माणि कुर्वन् हि न प्राप्यमधिगच्छति । कोई बिना उद्योग किये चुपचाप बैठा रहता है और लक्ष्मी उसकी सेवामें उपस्थित हो जाती है और कोई सदा काम करते रहनेपर भी अपने उचित वेतनसे भी वञ्चित रह जाता है ( ऐसा देखा जाता है ) ॥ ११३ ॥
देवानिष्ट्वा तपस्तप्त्वा कृपणैः पुत्रगृद्धिभिः ॥ १२ ॥
दशमासधृता गर्भे जायन्ते कुलपांसनाः ।
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कितने ही दीन मनुष्य पुत्रकी कामना रखकर देवताओंको पूजते और कठिन तपस्या करते हैं, तो भी उनके द्वारा गर्भमें स्थापित तथा दस मासतक माताके उदरमें पालित होकर जो पुत्र'पैदा होते हैं वे कुलांगार निकल जाते हैं * ॥ १२३ ॥
अपरे धनधान्यैश्च भोगैश्च पितृसंचितैः ॥ १३ ॥
विपुलैरभिजायन्ते लब्धास्तैरेव मङ्गलैः । और दूसरे बहुत- से ऐसे भी हैं जो अपने पिताके द्वारा जोड़कर रखे हुए धन- धान्य तथा भोग - विलासके प्रचुर साधनोंके साथ पैदा होते हैं और उनकी प्राप्ति भी उन्हीं मांगलिक कृत्योंके अनुष्ठानसे होती है ॥ १३३ ॥
कर्मजा हि मनुष्याणां रोगा नास्त्यत्र संशयः ॥ १४ ॥
आधिभिश्चैव बाध्यन्ते व्याधैः क्षुद्रमृगा इव । इसमें संदेह नहीं कि मनुष्योंके जो रोग होते हैं, वे उनके कर्मोंके ही फल हैं । जैसे बहेलिये छोटे मृगोंको पीड़ा देते हैं, उसी प्रकार वे रोग और आधि- व्याधियाँ जीवोंको पीड़ा देती रहती हैं ॥ १४३ ॥
ते चापि कुशलैर्वैद्यैर्निपुणैः सम्भृतौषधैः ॥ १५ ॥
व्याधयो विनिवार्यन्ते मृगा व्याधैरिव द्विज । ब्रह्मन्! ( उनका भोग पूरा होनेपर) ओषधियोंका संग्रह करनेवाले चिकित्साकुशल चतुर चिकित्सक उन रोगव्याधियोंका उसी प्रकार निवारण कर देते हैं, जैसे व्याध मृगोंको भगा देते हैं ॥ १५३ ॥
येषामस्ति च भोक्तव्यं ग्रहणीदोषपीडिताः ॥ १६ ॥
न शक्नुवन्ति ते भोक्तुं पश्य धर्मभृतां वर । धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ कौशिक! देखो, जिनके यहाँ भोजनका भण्डार भरा पड़ा है, उन्हें प्रायः संग्रहणी सता रही है, वे उसका उपभोग नहीं कर पाते ॥ १६३ ॥
अपरे बाहुबलिनः क्लिश्यन्ते बहवो जनाः ॥ १७ ॥
दुःखेन चाधिगच्छन्ति भोजनं द्विजसत्तम । विप्रवर! दूसरे बहुत - से ऐसे मनुष्य हैं, जिनकी भुजाओंमें बल है - जो स्वस्थ और अन्नको पचानेमें समर्थ हैं, परंतु उन्हें बड़ी कठिनाईसे भोजन मिल पाता है — वे सदा ही अन्नका कष्ट भोगते रहते हैं ॥ १७३ ॥
इति लोकमनाक्रन्दं मोहशोकपरिप्लुतम् ॥ १८ ॥
स्रोतसासकृदाक्षिप्तं ह्रियमाणं बलीयसा । इस प्रकार यह संसार असहाय तथा मोह, शोकमें डूबा हुआ है । कर्मोंके अत्यन्त प्रबल प्रवाहमें पड़कर बार- बार उसकी आधि- व्याधिरूपी तरंगोंके थपेड़े सहता और विवश होकर इधर - से - उधर बहता रहता है ॥ १८३ ॥
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न म्रियेयुर्न जीर्येयुः सर्वे स्युः सार्वकामिकाः ॥ १ ९ ॥ नाप्रियं प्रतिपश्येयुर्वशित्वं यदि वै भवेत् । यदि जीव अपने वशमें होते तो वे न मरते और न बूढ़े ही होते । सभी सब तरहकी
मनचाही वस्तुओंको प्राप्त कर लेते । किसीको अप्रिय घटना नहीं देखनी पड़ती ॥ १ ९ ॥
उपर्युपरि लोकस्य सर्वो गन्तुं समीहते ।
यतते च यथाशक्ति न च तद् वर्तते तथा ॥ २० ॥
सब लोग सारे जगत्के ऊपर- ऊपर जानेकी इच्छा रखते हैं - सभी सबसे ऊँचा होना चाहते हैं और उसके लिये वे यथाशक्ति प्रयत्न भी करते हैं परंतु ( सभी जगह ) वैसा होता नहीं है ॥ २० ॥
बहवः सम्प्रदृश्यन्ते तुल्यनक्षत्रमङ्गलाः ।
महच्च फलवैषम्यं दृश्यते कर्मसंधिषु ॥ २१ ॥
बहुत - से ऐसे मनुष्य देखे जाते हैं, जिनका जन्म एक ही नक्षत्रमें हुआ है और जिनके लिये मंगल कृत्य भी समानरूपसे ही किये गये हैं, परंतु विभिन्न प्रकारके कर्मोंका संग्रह होनेके कारण उन्हें प्राप्त होनेवाले फलमें महान् अन्तर दृष्टिगोचर होता है ॥ २१ ॥
न केचिदीशते ब्रह्मन् स्वयंग्राह्यस्य सत्तम ।
कर्मणा प्राक् कृतानां वै इह सिद्धिः प्रदृश्यते ॥ २२ ॥
ब्रह्मन्! साधुशिरोमणे! कोई अपने हाथमें आयी हुई वस्तुका भी उपयोग करनेमें समर्थ नहीं है । इस जगत्में पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मोंके ही फलकी प्राप्ति देखी जाती है ॥ २२ ॥
यथाश्रुतिरियं ब्रह्मन् जीवः किल सनातनः ।
शरीरमध्रुवं लोके सर्वेषां प्राणिनामिह ॥ २३ ॥
विप्रवर! श्रुतिके अनुसार यह जीवात्मा निश्चय ही सनातन है और इस संसारमें समस्त प्राणियोंका शरीर नश्वर है ॥ २३ ॥
वध्यमाने शरीरे तु देहनाशो भवत्युत ।
जीवः सङ्क्रमतेऽन्यत्र कर्मबन्धनिबन्धनः ॥ २४ ॥
शरीरपर आघात करनेसे उस शरीरका नाश तो हो जाता है; किंतु अविनाशी जीव नहीं मरता । वह कर्मोंके बन्धनमें बँधकर फिर दूसरे शरीरमें प्रवेश कर जाता है ॥ ब्राह्मणउवाच
कथं धर्मविदां श्रेष्ठ जीवो भवति शाश्वतः ।
एतदिच्छाम्यहं ज्ञातुं तत्त्वेन वदतां वर ॥ २५ ॥
ब्राह्मणने पूछा — धर्मज्ञों तथा वक्ताओंमें श्रेष्ठ व्याध! जीव सनातन कैसे है? मैं इस विषयको यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ ॥ २५ ॥
व्याधउवाच
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न जीवनाशोऽस्ति हि देहभेदे मिथ्यैतदाहुम्रियते किलेति । जीवस्तु देहान्तरितः प्रयाति दशार्धतैवास्य शरीरभेदः ॥ २६ ॥
धर्मव्याधने कहा — ब्रह्मन्! देहका नाश होनेपर जीवका नाश नहीं होता । मनुष्योंका यह कथन कि ‘ जीव मरता है ' मिथ्या ही है, किंतु जीव तो इस शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरमें चला जाता है । शरीरके पाँचों तत्त्वोंका पृथक् - पृथक् पाँच भूतोंमें मिल जाना ही उसका नाश कहलाता है ॥ २६ ॥
अन्यो हि नाश्नाति कृतं हि कर्म मनुष्यलोके मनुजस्य कश्चित् । यत् तेन किंचिद्धि कृतं हि कर्म तदश्नुते नास्ति कृतस्य नाशः ॥ २७ ॥
इस मानवलोकमें मनुष्यके किये हुए कर्मको ( उस कर्ताके सिवा) दूसरा कोई नहीं भोगता है । उसके द्वारा जो कुछ ही कर्म किया गया है, उसे वह स्वयं ही भोगेगा । किये हुए कर्मोंका कभी नाश नहीं होता ॥ सुपुण्यशीला हि भवन्ति पुण्या
नराधमाः पापकृतो भवन्ति ।
नरोऽनुयातस्त्विह कर्मभिः स्वै- स्ततः समुत्पद्यति भावितस्तैः ॥ २८ ॥
पुण्यात्मा मनुष्य पुण्यकर्मोंका अनुष्ठान करते हैं और नीच मनुष्य पापमें प्रवृत्त होते हैं । यहाँ अपने किये हुए कर्म मनुष्यका अनुसरण करते हैं और उनसे प्रभावित होकर वह दूसरा जन्म धारण करता है ॥ २८ ॥
ब्राह्मणउवाच
कथं सम्भवते योनौ कथं वा पुण्यपापयोः ।
जातीः पुण्यास्त्वपुण्याश्च कथं गच्छति सत्तम ॥ २ ९ ॥
ब्राह्मणने पूछा — सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ! जीव दूसरी योनिमें कैसे जन्म लेता है, पाप और पुण्यसे उसका सम्बन्ध किस प्रकार होता है तथा उसे पुण्ययोनि और पापयोनिकी प्राप्ति कैसे होती है? ॥ २ ९ ॥ व्याध उवाच
गर्भाधानसमायुक्तं कर्मेदं सम्प्रदृश्यते ।
समासेनतु ते क्षिप्रं प्रवक्ष्यामि द्विजोत्तम ॥ ३० ॥
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व्याधने कहा – विप्रवर! गर्भाधान आदि संस्कार- सम्बंधी ग्रन्थोंद्वारा यह प्रतिपादन किया गया है ' कि यह जो कुछ भी दृष्टिगोचर हो रहा है, सब कर्मोंका ही परिणाम है । ' अतः किस कर्मसे कहाँ जन्म होता है? इस विषयका मैं तुमसे संक्षिप्त वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ ३० ॥
यथा सम्भृतसम्भारः पुनरेव प्रजायते ।
शुभकृच्छुभयोनीषु पापकृत् पापयोनिषु ॥ ३१ ॥
जीव कर्मबीजोंका संग्रह करके जिस प्रकार पुनः जन्म ग्रहण करता है, वह बताया जा रहा है । शुभकर्म करनेवाला मनुष्य शुभ योनियोंमें और पापकर्म करनेवाला पापयोनियोंमें जन्म लेता है ॥ ३१ ॥
शुभैः प्रयोगैर्देवत्वं व्यामिश्रैर्मानुषो भवेत् ।
मोहनीयैर्वियोनीषु त्वधोगामी च किल्बिषी ॥ ३२ ॥
शुभकर्मोंके संयोगसे जीवको देवत्वकी प्राप्ति होती है । शुभ और अशुभ दोनोंके सम्मिश्रणसे उसका मनुष्य- योनिमें जन्म होता है । मोहमें डालनेवाले तामस कर्मोंके आचरणसे जीव पशु, पक्षी आदिकी योनिमें जन्म ग्रहण करता है और जिसने केवल पापका ही संचय किया है, वह नरकगामी होता है ॥ ३२ ॥
जातिमृत्युजरादुःखैः सततं समभिद्रुतः ।
संसारे पच्यमानश्च दोषैरात्मकृतैर्नरः ॥ ३३ ॥
मनुष्य अपने ही किये हुए अपराधोंके कारण जन्म- मृत्यु और जरासम्बन्धी दुःखोंसे सदा पीडित हो बारंबार संसारमें पचता रहता है ॥ ३३ ॥
तिर्यग्योनिसहस्राणि गत्वा नरकमेव च ।
जीवाः सम्परिवर्तन्ते कर्मबन्धनिबन्धनाः ॥ ३४ ॥
कर्मबन्धनमें बँधे हुए ( पापी ) जीव सहस्रों प्रकारकी तिर्यक् योनियों तथा नरकोंमें चक्कर लगाया करते हैं ॥ ३४ ॥
जन्तुस्तु कर्मभिस्तैस्तैः स्वकृतैः प्रेत्य दुःखितः ।
तदुःखप्रतिघातार्थमपुण्यां योनिमाप्नुते ॥ ३५ ॥
प्रत्येक जीव अपने किये हुए कर्मोसे ही मृत्युके पश्चात् दुःख भोगता है और उस दुःखका भोग करनेके लिये ही वह ( चाण्डालादि ) पापयोनिमें जन्म लेता है ॥
ततः कर्म समादत्ते पुनरन्यं नवं बहु ।
पच्यते तु पुनस्तेन भुक्त्वापथ्यमिवातुरः ॥ ३६ ॥
वहाँ फिर नये - नये बहुत- से पापकर्म कर डालता है, जिसके कारण कुपथ्य खा लेनेवाले रोगीकी भाँति उसे नाना प्रकारके कष्ट भोगने पड़ते हैं ॥ ३६ ॥
अजस्रमेव दुःखार्तोऽदुःखितः सुखसंज्ञितः ।
ततोऽनिवृत्तबन्धत्वात् कर्मणामुदयादपि ॥ ३७ ॥
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परिक्रामति संसारे चक्रवद् बहुवेदनः । इस प्रकार वह यद्यपि निरन्तर दुःख ही भोगता रहता है, तथापि अपनेको दुःखी नहीं मानता । इस दुःखको ही वह सुखकी संज्ञा दे देता है । जबतक बन्धनमें डालनेवाले कर्मोंका भोग पूरा नहीं होता और नये - नये कर्म बनते रहते हैं तबतक अनेक प्रकारके कष्टोंको सहन करता हुआ वह चक्रकी तरह इस संसारमें चक्कर लगाता रहता है ॥ ३७३३ ॥
स चेन्निवृत्तबन्धस्तु विशुद्धश्चापि कर्मभिः ॥ ३८ ॥
तपोयोगसमारम्भं कुरुते द्विजसत्तम ।
कर्मभिर्बहुभिश्चापि लोकानश्नाति मानवः ॥ ३ ९ ॥
द्विजश्रेष्ठ! जब बन्धनकारक कर्मोंका भोग पूरा हो जाता है और सत्कर्मोंके द्वारा मनुष्यमें शुद्धि आ जाती है, तब वह तप और योगका आरम्भ करता है । अतः बहुत- से शुभकर्मोंके फलस्वरूप उसे उत्तम लोकोंका भोग प्राप्त होता है ॥ ३८-३९ ॥
स चेन्निवृत्तबन्धस्तु विशुद्धश्चापि कर्मभिः ।
प्राप्नोति सुकृताँल्लोकान् यत्र गत्वा न शोचति ॥ ४० ॥
इस प्रकार बन्धनरहित तथा शुद्ध हुआ मनुष्य अपने पुण्य कर्मोंके प्रभावसे पुण्यलोक प्राप्त करता है, जहाँ जाकर कोई भी शोक नहीं करता है ॥ ४० ॥
पापं कुर्वन् पापवृत्तः पापस्यान्तं न गच्छति ।
तस्मात् पुण्यं यतेत् कर्तुं वर्जयीत च पापकम् ॥ ४१ ॥
पाप करनेवाले मनुष्यको पापकी आदत हो जाती है, फिर उसके पापका अन्त नहीं होता । अतः मनुष्यको चाहिये कि वह पुण्य कर्म करनेका ही प्रयत्न करे और पापको सर्वथा त्याग दे ॥ ४१ ॥
अनसूयुः कृतज्ञश्च कल्याणानि च सेवते ।
सुखानि धर्ममर्थं च स्वर्गं च लभते नरः ॥ ४२ ॥
पुण्यात्मा मनुष्य दोषदृष्टिसे रहित और कृतज्ञ होकर कल्याणकारी कर्मोंका सेवन करता है तथा उसे सुख, धर्म, अर्थ एवं स्वर्गकी प्राप्ति होती है ॥ ४२ ॥
संस्कृतस्य च दान्तस्य नियतस्य यतात्मनः ।
प्राज्ञस्यानन्तरा वृत्तिरिह लोके परत्र च ॥ ४३ ॥
जो संस्कारसम्पन्न, जितेन्द्रिय, शौचाचारपरायण और मनको काबूमें रखनेवाला है, उस बुद्धिमान् पुरुषको इहलोक और परलोकमें भी सुखकी प्राप्ति होती है ॥
सतां धर्मेण वर्तेत क्रियां शिष्टवदाचरेत् ।
असंक्लेशेन लोकस्य वृत्तिं लिप्सेत वै द्विज ॥ ४४ ॥
ब्रह्मन्! अतः मनुष्यको चाहिये कि वह सत्पुरुषोंके धर्मका पालन करे, शिष्ट पुरुषोंके समान बर्ताव करे और जगत्में किसी भी प्राणीको कष्ट दिये बिना जिससे जीवन -निर्वाह हो सके — ऐसी आजीविका प्राप्त करनेकी इच्छा करे ॥ ४४ ॥