02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 1461–1470
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1461–1470
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सन्ति ह्यागमविज्ञानाः शिष्टाः शास्त्रे विचक्षणाः ।
स्वधर्मेण क्रिया लोके कर्मणः सोऽप्यसंकरः ॥ ४५ ॥
संसारमें बहुत - से वेदवेत्ता और शास्त्रविचक्षण शिष्ट पुरुष विद्यमान हैं, उनके उपदेशके अनुसार स्वधर्मके पालनपूर्वक प्रत्येक कार्य करना चाहिये, इससे कर्मोंका संकर नहीं हो पाता ॥ ४५ । |
प्राज्ञो धर्मेण रमते धर्मं चैवोपजीवति ।
तस्माद् धर्मादवाप्तेन धनेन द्विजसत्तम ॥ ४६ ॥
तस्यैव सिञ्चते मूलं गुणान् पश्यति तत्र वै । द्विजश्रेष्ठ! बुद्धिमान् पुरुष धर्मसे ही आनन्द मानता है, धर्मका ही आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करता है और धर्मसे ही उपलब्ध किये हुए धनसे धनका ही मूल सींचता है, अर्थात्
धर्मका पालन करता है । वह धर्ममें ही गुण देखता है ॥ ४६३ ॥
धर्मात्मा भवति ह्येवं चित्तं चास्य प्रसीदति ॥ ४७ ॥
स मित्रजनसंतुष्ट इह प्रेत्य च नन्दति । इस प्रकार वह धर्मात्मा होता है, उसका अन्तःकरण निर्मल हो जाता है तथा मित्रजनोंसे संतुष्ट होकर वह इहलोक और परलोकमें भी आनन्दित होता है ॥ ४७ ॥
शब्दं स्पर्शं तथा रूपं गन्धानिष्टांश्च सत्तम ॥ ४८ ॥
प्रभुत्वं लभते चापि धर्मस्यैतत् फलं विदुः । सज्जनशिरोमणे! धर्मात्मा पुरुष शब्द, स्पर्श, रूप और प्रिय गन्ध — सभी प्रकारके विषय तथा प्रभुत्व भी प्राप्त करता है । उसकी यह स्थिति धर्मका ही फल मानी गयी है ॥ ४८३ ॥
धर्मस्य च फलं लब्ध्वा न तृप्यति महाद्विज ॥ ४ ९ ॥ अतृप्यमाणो निर्वेदमापेदे ज्ञानचक्षुषा । द्विजोत्तम! कोई- कोई धर्मके फलरूपसे सांसारिक सुखको पाकर संतुष्ट नहीं होता । वह ज्ञानदृष्टिके कारण विषयभोगके सुखसे तृप्ति- लाभ न करके निर्वेद ( वैराग्य ) -को प्राप्त होता है ॥ ४ ९ ॥ प्रज्ञाचक्षुर्नर इह दोषं नैवानुरुध्यते ॥ ५० ॥
विरज्यति यथाकामं न च धर्मं विमुञ्चति ।
इस जगत्में ज्ञानदृष्टिसे सम्पन्न पुरुष राग-द्वेष आदि दोषोंका अनुसरण नहीं करता ।
उसे यथेष्ट वैराग्य होता है तथा वह कभी धर्मका त्याग नहीं करता है ॥
सर्वत्यागे च यतते दृष्ट्वा लोकं क्षयात्मकम् ॥ ५१ ॥
ततो मोक्षे प्रयतते नानुपायादुपायतः ।
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सम्पूर्ण जगत्को नश्वर समझकर वह सबको त्यागनेका प्रयत्न करता है । तत्पश्चात् उचित उपायसे मोक्षके लिये सचेष्ट होता है । अनुपाय ( प्रारब्ध आदि ) -का अवलम्बन करके बैठ नहीं रहता ॥ ५१ ॥
एवं निर्वेदमादत्ते पापं कर्म जहाति च ॥ ५२ ॥
धार्मिकश्चापि भवति मोक्षं च लभते परम् । इस प्रकार वह वैराग्यको अपनाता और पापकर्मको छोड़ता जाता है । फिर सर्वथा धर्मात्मा हो जाता और अन्तमें परम मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ ५२ ॥
तपो निःश्रेयसं जन्तोस्तस्य मूलं शमो दमः ॥ ५३ ॥
तेन सर्वानवाप्नोति कामान् यान् मनसेच्छति । जीवके कल्याणका साधन है तप और उसका मूल है शम ( मनोनिग्रह ) तथा दम ( इन्द्रियसंयम ) । मनुष्य मनके द्वारा जिन- जिन अभीष्ट पदार्थोंको पाना चाहता है उन सबको वह उस तपके द्वारा प्राप्त कर लेता है ॥ ५३३ ॥
इन्द्रियाणां निरोधेन सत्येन च दमेन च ।
ब्रह्मणः पदमाप्नोति यत् परं द्विजसत्तम ॥ ५४ ॥
द्विजश्रेष्ठ! इन्द्रियसंयम, सत्यभाषण और मनोनिग्रह -इनके द्वारा मनुष्य ब्रह्मके परमपदको प्राप्त कर लेता है ॥ ब्राह्मणउवाच
इन्द्रियाणि तु यान्याहुः कानि तानि यतव्रत ।
निग्रहश्च कथं कार्यो निग्रहस्य च किं फलम् ॥ ५५ ॥
ब्राह्मणने पूछा- उत्तम व्रतका पालन करनेवाले व्याध! जिन्हें इन्द्रिय कहते हैं, वे कौन- कौन हैं? उनका निग्रह कैसे करना चाहिये? और उस निग्रहका फल क्या है? ॥ ५५ ॥
कथं च फलमाप्नोति तेषां धर्मभृतां वर ।
एतदिच्छामि तत्त्वेन धर्मं ज्ञातुं निबोध मे ॥ ५६ ॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ व्याध! उन इन्द्रियोंके निग्रहका फल कैसे प्राप्त होता है? मैं इस
इन्द्रिय - निग्रहरूपी धर्मको यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ । तुम मुझे समझाओ ॥ ५६ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे नवाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २० ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमेंब्राह्मण-व्याध- संवादविषयक दो सौ नौवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २० ९ ॥
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* कर्णपर्वके उनहत्तरवें अध्यायमें छियालीसवेंसे तिरपनवें श्लोकोंमें एक कथा आती है । कौशिक नामका एक तपस्वी ब्राह्मण था । उसने यह व्रत ले लिया कि ' मैं सदा सत्य बोलूँगा । ' एक दिन कुछ लोग लुटेरोंके भयसे छिपनेके लिये उसके आश्रमके पासके वनमें घुस गये । खोज करते हुए लुटेरोंने सत्यवादी कौशिकसे पूछा । उनके पूछनेपर कौशिकने सच्ची बात कह । पता लग जानेपर उन निर्दयी डाकुओंने उन लोगोंको पकड़कर मार डाला । इस प्रकार सत्य बोलनेके कारण लोगोंकी हिंसा हो जानेसे उस पापके फलस्वरूप कौशिकको नरक जाना पड़ा । * धर्मकी गति सूक्ष्म होनेके कारण देखनेमें विपरीतता दीखती है; किंतु वास्तवमें वह पूर्वकृत कर्मोंका फल है ।
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दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः विषयसेवनसे हानि, सत्संगसे लाभ और ब्राह्मी विद्याका वर्णन मार्कण्डेय उवाच
एवमुक्तस्तु विप्रेण धर्मव्याधो युधिष्ठिर ।
प्रत्युवाच यथा विप्रं तच्छृणुष्व नराधिप ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजा युधिष्ठिर! ब्राह्मणके इस प्रकार पूछनेपर धर्मव्याधने उसे जैसा उत्तर दिया था, वह सब सुनाता हूँ, सुनो ॥ १ ॥
व्याधउवाच
विज्ञानार्थं मनुष्याणां मनः पूर्वं प्रवर्तते ।
तत् प्राप्य कामं भजते क्रोधं च द्विजसत्तम ॥ २ ॥
धर्मव्याधने कहा— द्विजश्रेष्ठ! इन्द्रियोंद्वारा किसी विषयका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये सबसे पहले मनुष्योंका मन प्रवृत्त होता है । उस विषयको प्राप्त कर लेनेपर मनका उसके प्रति राग या द्वेष हो जाता है ॥ २ ॥
ततस्तदर्थं यतते कर्म चारभते महत् ।
इष्टानां रूपगन्धानामभ्यासं च निषेवते ॥ ३ ॥
जब किसी विषयमें राग होता है, तब मनुष्य उसे पानेके लिये प्रयत्नशील होता है और उसके लिये बड़े - बड़े कार्योंका आरम्भ करता है । जब वे अभीष्ट रूप, गन्ध आदि विषय प्राप्त हो जाते हैं, तब वह उनका बारंबार सेवन करता है ॥ ३ ॥
ततो रागः प्रभवति द्वेषश्च तदनन्तरम् ।
ततो लोभः प्रभवति मोहश्च तदनन्तरम् ॥ ४ ॥
उनके सेवनसे विषयोंके प्रति उत्कट राग प्रकट होता है । फिर उसकी प्रतिकूलतामें द्वेष होता है; द्वेषके अनन्तर अभीष्ट वस्तुके प्रति लोभका प्रादुर्भाव होता है । तत्पश्चात् बुद्धिपर मोह छा जाता है ॥ ४ ॥
ततो लोभाभिभूतस्य रागद्वेषहतस्य च ।
न धर्मे जायते बुद्धिर्व्याजाद् धर्मं करोति च ॥ ५ ॥
इस प्रकार लोभसे आक्रान्त और राग- द्वेषसे पीड़ित मनुष्यकी बुद्धि धर्ममें नहीं लगती । यदि वह धर्म करता भी है तो कोई बहाना लेकर ॥ ५ ॥
व्याजेन चरते धर्ममर्थं व्याजेन रोचते ।
व्याजेन सिध्यमानेषु धनेषु द्विजसत्तम ॥ ६ ॥
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तत्रैव रमते बुद्धिस्ततः पापं चिकीर्षति । जो किसी बहानेसे धर्माचरण करता है, वह वास्तवमें धर्मकी आड़ लेकर धन चाहता है । द्विजश्रेष्ठ! जब धर्मके बहानेसे धनकी प्राप्ति होने लगती है, तब उसकी बुद्धि उसीमें रम जाती है और उसके मनमें पापकी इच्छा जाग उठती है ॥ ६३ ॥
सुहृद्भिर्वार्यमाणश्च पण्डितैश्च द्विजोत्तम ॥ ७ ॥
उत्तरं श्रुतिसम्बद्धं ब्रवीत्यश्रुतियोजितम् । विप्रवर! जब उसे हितैषी मित्र तथा विद्वान् पुरुष ऐसा करनेसे रोकते हैं, तब वह उसके समर्थनमें अशास्त्रीय उत्तर देते हुए भी उसे वेद प्रतिपादित बताता है ॥ ७३ ॥
अधर्मस्त्रिविधस्तस्य वर्तते रागदोषजः ॥ ८ ॥
पापं चिन्तयते चैव ब्रवीति च करोति च ।
तस्याधर्मप्रवृत्तस्य गुणा नश्यन्ति साधवः ॥ ९ ॥
रागरूपी दोषके कारण उसके द्वारा तीन प्रकारके अधर्म होने लगते हैं - १. वह मनसे पापका चिन्तन करता है, २. वाणीसे पापकी ही बात बोलता है और ३. क्रियाद्वारा भी पापका ही आचरण करता है । इस प्रकार अधर्ममें लग जानेपर उसके सभी अच्छे गुण नष्ट हो जाते हैं ॥ ८ - ९ ॥
एकशीलैश्च मित्रत्वं भजन्ते पापकर्मिणः ।
स तेन दुःखमाप्नोति परत्र च विपद्यते ॥ १० ॥
वह अपने ही - जैसे स्वभाववाले पापपरायण मनुष्योंसे मित्रता स्थापित कर लेता है । उस पापसे इस लोकमें तो दुःख होता ही है, परलोकमें भी उसे बड़ी विपत्ति भोगनी पड़ती है ॥ १० ॥
पापात्मा भवति ह्येवं धर्मलाभं तु मे शृणु ।
यस्त्वेतान् प्रज्ञया दोषान् पूर्वमेवानुपश्यति ॥ ११ ॥
कुशलः सुखदुःखेषु साधूंश्चाप्युपसेवते ।
तस्य साधुसमारम्भाद् बुद्धिर्धर्मेषु राजते ॥ १२ ॥
इस प्रकार मनुष्य पापात्मा हो जाता है । अब धर्मकी प्राप्ति कैसे होती है, इसको मुझसे सुनो । जो दुःख और सुखके विवेचनमें कुशल है वह अपनी बुद्धि इन विषयसम्बन्धी दोषोंको पहले ही समझ लेता है । अतः उनसे दूर हटकर श्रेष्ठ पुरुषोंका संग करता है और उस श्रेष्ठसंगसे उसकी बुद्धि धर्ममें लग जाती है ॥ ११-१२ ॥ ब्राह्मणउवाच
ब्रवीषि सूनृतं धर्म्यं यस्य वक्ता न विद्यते ।
दिव्यप्रभावः सुमहानृषिरेव मतोऽसि मे ॥ १३ ॥
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ब्राह्मण बोला -धर्मव्याध! तुम धर्मके विषयमें बड़ी मधुर और प्रिय बातें कह रहे हो । इन बातोंको बतानेवाला दूसरा कोई नहीं है । मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि तुम कोई दिव्य प्रभावसे सम्पन्न महान् ऋषि ही हो ॥ १३ ॥
व्याधउवाच
ब्राह्मणा वै महाभागाः पितरोऽग्रभुजः सदा ।
तेषां सर्वात्मना कार्यं प्रियं लोके मनीषिणा ॥ १४ ॥
धर्मव्याधने कहा — ब्रह्मन्! महाभाग ब्राह्मण और पितर ये सदा प्रथम भोजनके अधिकारी माने गये हैं । अतः बुद्धिमान् पुरुषको इस लोकमें सब प्रकारसे उनका प्रिय करना चाहिये ॥ १४ ॥
यत् तेषां च प्रियं तत् ते वक्ष्यामि द्विजसत्तम ।
नमस्कृत्वा ब्राह्मणेभ्यो बाह्मीं विद्यां निबोध मे ॥ १५ ॥
विप्रवर! उन ब्राह्मणोंको नमस्कार करके उनके लिये जो प्रिय वस्तु है, उसका वर्णन करता हूँ । तुम मुझसे ब्राह्मी विद्या श्रवण करो ॥ १५ ॥
इदं विश्वं जगत् सर्वमजय्यं चापि सर्वशः ।
महाभूतात्मकं ब्रह्म नातः परतरं भवेत् ॥ १६ ॥
पञ्चमहाभूतोंसे बना हुआ यह सम्पूर्ण चराचर जगत् सब प्रकारसे अजेय ब्रह्मस्वरूप है । ब्रह्मसे उत्कृष्ट दूसरी कोई वस्तु नहीं है ॥ १६ ॥
महाभूतानि खं वायुरग्निरापस्तथा च भूः ।
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च तद्गुणाः ॥ १७ ॥
आकाश, वायु अग्नि, जल तथा पृथिवी —ये पाँच महाभूत हैं तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध — ये क्रमशः उनके विशेष गुण हैं ॥ १७ ॥
तेषामपि गुणाः सर्वे गुणवृत्तिः परस्परम् ।
पूर्वपूर्वगुणाः सर्वे क्रमशो गुणिषु त्रिषु ॥ १८ ॥
उन शब्द आदि गुणोंके भी अनेक गुण- भेद हैं, क्योंकि इन गुणोंका परस्पर संक्रमण भी देखा जाता है । पहले - पहलेके सभी गुण क्रमशः बादवाले तीन गुणवान् भूतों ( अग्नि, जल और पृथ्वी ) -में उपलब्ध होते हैं, अर्थात् अग्निमें शब्द, स्पर्श और रूप; जलमें शब्द, स्पर्श, रूप और रस तथा पृथ्वीमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध पाये जाते हैं ॥ १८ ॥
षष्ठस्तु चेतना नाम मन इत्यभिधीयते ।
सप्तमी तु भवेद् बुद्धिरहंकारस्ततः परम् ॥ १ ९ ॥
इन पाँच भूतोंके अतिरिक्त छठा तत्त्व है चित्त; इसीको मन कहते हैं । सातवाँ तत्त्व बुद्धि है और उसके बाद आठवाँ अहंकार है ॥ १ ९ ॥ इन्द्रियाणि च पञ्चात्मा रजः सत्त्वं तमस्तथा ।
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इत्येष सप्तदशको राशिरव्यक्तसंज्ञकः ॥ २० ॥
इनके सिवा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, प्राण और सत्त्व, रज, तम- इन सत्रह तत्त्वोंका समूह अव्यक्त कहलाता है ॥ २० ॥
सर्वैरिहेन्द्रियार्थैस्तु व्यक्ताव्यक्तैः सुसंवृतैः ।
चतुर्विंशक इत्येष व्यक्ताव्यक्तमयो गुणः ।
एतत् ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ २१ ॥
पाँच ज्ञानेन्द्रियों तथा मन और बुद्धिके जो व्यक्त और अव्यक्त विषय हैं, जो बुद्धिरूपी गुहामें छिपे रहते हैं, उन्हें सम्मिलित करनेसे चौबीस तत्त्व होते हैं । इन तत्त्वोंका समुदाय ही व्यक्त और अव्यक्तरूप गुण है । ( यह सब का सब ब्रह्मस्वरूप है। ) ब्राह्मण! इस प्रकार ये सब बातें मैंने तुम्हें बतायी हैं, अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणमाहात्म्ये दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमेंब्राह्मणमाहात्म्यविषयक दो सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१० ॥
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एकादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः पञ्चमहाभूतोंके गुणोंका और इन्द्रियनिग्रहका वर्णन मार्कण्डेय उवाच
एवमुक्तः स विप्रस्तु धर्मव्याधेन भारत ।
कथामकथयद् भूयो मनसः प्रीतिवर्धनीम् ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं- भरतनन्दन! धर्मव्याधके इस प्रकार उपदेश देनेपर कौशिक ब्राह्मणने पुनः मनकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाली वार्ता प्रारम्भ की ॥ १ ॥
ब्राह्मणउवाच
महाभूतानि यान्याहुः पञ्च धर्मभृतां वर ।
एकैकस्य गुणान् सम्यक् पञ्चानामपि मे वद ॥ २ ॥
ब्राह्मण बोला - धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ व्याध! जो पाँच महाभूत कहे जाते हैं, उन पाँचोंमेंसे प्रत्येकके गुणोंका मुझसे भलीभाँति वर्णन करो ॥ २ ॥
व्याध उवाच
भूमिरापस्तथा ज्योतिर्वायुराकाशमेव च ।
गुणोत्तराणि सर्वाणि तेषां वक्ष्यामि ते गुणान् ॥ ३ ॥
धर्मव्याधने कहा—ब्रह्मन्! पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश – ये सब पूर्व-पूर्ववाले तत्त्व अपनेसे उत्तर- उत्तरवालोंके गुणोंसे युक्त हैं । मैं उनके गुणोंका वर्णन करता ॥ ३ ॥
भूमिः पञ्चगुणा ब्रह्मन्नुदकं च चतुर्गुणम् ।
गुणास्त्रयस्तेजसि च त्रयश्चाकाशवातयोः ॥ ४ ॥
विप्रवर! पृथ्वीमें पाँच गुण हैं, जल चार गुणोंसे युक्त है, तेजमें तीन गुण होते हैं, वायुमें दो और आकाशमें एक गुण है ॥ ४ ॥
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः ।
एते गुणाः पञ्च भूमेः सर्वेभ्यो गुणवत्तरा ॥ ५ ॥
शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध - ये भूमिके पाँच गुण हैं। इस प्रकार भूमि अन्य सब भूतों की अपेक्षा अधिक गुणवती है ॥ ५ ॥
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसश्चापि द्विजोत्तम ।
अपामेते गुणा ब्रह्मन् कीर्तितास्तव सुव्रत ॥ ६ ॥
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द्विजश्रेष्ठ! शब्द, स्पर्श, रूप और रस – ये चार जलके गुण हैं । उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण! इनका वर्णन पहले भी आपसे किया गया है ॥ ६ ॥
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च तेजसोऽथ गुणास्त्रयः ।
शब्दः स्पर्शश्च वायौ तु शब्दश्चाकाश एव तु ॥ ७ ॥
शब्द, स्पर्श तथा रूप- ये तेजके तीन गुण हैं, शब्द और स्पर्श- ये दो गुण वायुके हैं तथा आकाशमें एक ही गुण है - शब्द ॥ ७ ॥
एते पञ्चदश ब्रह्मन् गुणा भूतेषु पञ्चसु ।
वर्तन्ते सर्वभूतेषु येषु लोकाः प्रतिष्ठिताः ॥ ८ ॥
ब्रह्मन्! इस प्रकार पाँचों भूतोंमें ये पंद्रह गुण बताये गये हैं । इन्हींमें सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित हैं ॥ ८ ॥
अन्योन्यं नातिवर्तन्ते सम्यक् च भवति द्विज ।
यदा तु विषमं भावमाचरन्ति चराचराः ॥ ९ ॥
तदा देही देहमन्यं व्यतिरोहति कालतः ।
आनुपूर्व्या विनश्यन्ति जायन्ते चानुपूर्वशः ॥ १० ॥
विप्रवर! ये पाँच भूत एक- दूसरेके बिना नहीं रह सकते। परस्पर मिलकर ही भलीभाँति प्रकाशित होते हैं । जिस समय व्यक्त और अव्यक्त पाँचों भूत विषम- भावको प्राप्त होते हैं, उस समय यह जीव कालकी प्रेरणासे अपने संकल्पानुसार दूसरे शरीरको प्राप्त हो जाता है । ये पाँचों भूत मृत्युकालमें प्रतिलोमक्रमसे विलीन हो जाते हैं और उत्पत्तिकालमें अनुलोमक्रमसे उत्पन्न होते हैं ॥ ९ -१० ॥
तत्र तत्र हि दृश्यन्ते धातवः पाञ्चभौतिकाः ।
यैरावृतमिदं सर्वं जगत् स्थावरजङ्गमम् ॥ ११ ॥
विभिन्न शरीरोंमें जितने रक्त आदि धातु दिखायी देते हैं, वे सब पाँच भूतोंके ही परिणाम हैं, जिनसे यह समस्त चराचर जगत् व्याप्त है ॥ ११ ॥
इन्द्रियैः सृज्यते यद् यत् तत् तद् व्यक्तमिति स्मृतम् ।
तदव्यक्तमिति ज्ञेयं लिङ्गग्राह्यमतीन्द्रियम् ॥ १२ ॥
बाह्य इन्द्रियोंसे जिस - जिसका संसर्ग होता है, वह वह व्यक्त माना गया है; परंतु जो विषय इन्द्रियग्राह्य नहीं है, केवल अनुमानसे जाना जाता है, उसे अव्यक्त समझना चाहिये ॥ १२ ॥
यथास्वं ग्राहकाण्येषां शब्दादीनामिमानि तु इन्द्रियाणि यदा देही धारयन्निव तप्यते ॥ १३ ॥
अपने -अपने विषयोंका अतिक्रमण न करके इन शब्द आदि विषयोंको ग्रहण करनेवाली इन इन्द्रियोंको जब आत्मा अपने वशमें करता है, तब मानो वह तपस्या करता है ॥ १३ ॥
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लोके विततमात्मानं लोकं चात्मनि पश्यति ।
परावरज्ञो यः शक्तः स तु भूतानि पश्यति ॥ १४ ॥
वह सम्पूर्ण लोकोंमें अपनेको व्याप्त और अपनेमें सम्पूर्ण लोकोंको स्थित देखता है । इस प्रकार जो निर्गुण ब्रह्मको जाननेवाला समर्थ ज्ञानी पुरुष है, वह सम्पूर्ण भूतोंको आत्मरूपसे देखता है ॥ १४ ॥
पश्यतः सर्वभूतानि सर्वावस्थासु सर्वदा ।
ब्रह्मभूतस्य संयोगो नाशुभेनोपपद्यते ॥ १५ ॥
सब अवस्थाओंमें सदा समस्त भूतोंको आत्मरूपसे देखनेवाले उस ब्रह्मस्वरूप ज्ञानीका कभी भी अशुभ कर्मोंसे सम्पर्क होना सम्भव नहीं है ॥ १५ ॥
अज्ञानमूलं तं क्लेशमतिवृत्तस्य पौरुषम् ।
लोकवृत्तिप्रकाशेन ज्ञानमार्गेण गम्यते ॥ १६ ॥
उस ( पूर्वोक्त ) अज्ञानजनित क्लेशसे जो पार हो गया है, उस महापुरुषका प्रभाव उसके द्वारा की जानेवाली लौकिक चेष्टाओंसे ज्ञानमार्गके द्वारा जाना जा सकता है ॥ १६ ॥
अनादिनिधनं जन्तुमात्मयोनिं सदाव्ययम् ।
अनौपम्यममूर्तं च भगवानाह बुद्धिमान् ॥ १७ ॥
बुद्धिमान् भगवान् ब्रह्माने ( अपने निःश्वासभूत वेदोंके द्वारा ) मुक्त जीवको आदि-अन्तसे रहित, स्वयम्भू, अविकारी, अनुपम तथा निराकार बताया है ॥ १७ ॥
तपोमूलमिदं सर्वं यन्मां विप्रानुपृच्छसि इन्द्रियाण्येव संयम्य तपो भवति नान्यथा ॥ १८ ॥
विप्रवर! आप मुझसे जो कुछ पूछते हैं, उसके उत्तरमें मैं यह बता रहा हूँ कि इस सबका मूल तप है । इन्द्रियोंका संयम करनेसे ही वह तपस्या सम्पन्न होती है, और किसी प्रकारसे नहीं ॥ १८ ॥
इन्द्रियाण्येव तत् सर्वं यत् स्वर्गनरकावुभौ ।
निगृहीतविसृष्टानि स्वर्गाय नरकाय च ॥ १ ९ ॥
स्वर्ग और नरक आदि जो कुछ भी है, वह सब इन्द्रियाँ ही हैं, अर्थात् इन्द्रियाँ ही उनकी कारण हैं । वशमें की हुई इन्द्रियाँ स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाली हैं और जिन्हें विषयोंकी ओर खुला छोड़ दिया गया है, वे इन्द्रियाँ नरकमें डालनेवाली हैं ॥ १ ९ ॥
एष योगविधिः कृत्स्नो यावदिन्द्रियधारणम् ।
एतन्मूलं हि तपसः कृत्स्नस्य नरकस्य च ॥ २० ॥
योगका सम्पूर्णरूपसे अनुष्ठान यही है कि मनसहित समस्त इन्द्रियोंको काबूमें रखा जाय । यही सारी तपस्याका मूल है, और इन्द्रियोंको वशमें न रखना ही नरकका हेतु है ॥
इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन दोषमार्च्छन्त्यसंशयम् ।
संनियम्य तु तान्येव ततः सिद्धिं समाप्नुयात् ॥ २१ ॥