श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1441–1450
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1441–1450
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ष्ट हो जाता है ॥ ४५ ॥
कर्म चैतदसाधूनां वृजिनानामसाधुवत् ।
न धर्मोऽस्तीति मन्वानाः शुचीनवहसन्ति ये ॥ ४६ ॥
अश्रद्दधाना धर्मस्य ते नश्यन्ति न संशयः ।
महादृतिरिवाध्मातः पापो भवति नित्यदा ॥ ४७ ॥
यह ( दूसरोंका अहित करना) तो दुराचारीकी भाँति दुर्व्यसनोंमें आसक्त हुए पापी पुरुषोंका ही कार्य है । ‘ धर्म कोई चीज नहीं है ' ऐसा मानकर जो शुद्ध आचार- विचारवाले श्रेष्ठ पुरुषोंकी हँसी उड़ाते हैं, वे धर्मपर अश्रद्धा रखनेवाले मनुष्य निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं । पापी मनुष्य लुहारकी बड़ी धौंकनीके समान सदा ऊपरसे फूले दिखायी देते हैं ( परंतु वास्तवमें सारहीन होते हैं ) ॥ ४६-४७ ॥ ( साधुः सन्नतिमानेव सर्वत्र द्विजसत्तम । )
मूढानामवलिप्तानामसारं भावितं भवेत् ।
दर्शयत्यन्तरात्मा तं दिवा रूपमिवांशुमान् ॥ ४८ ॥
द्विजश्रेष्ठ! उत्तम पुरुष सर्वत्र विनयशील ही होता है । अहंकारी मूढ़ मनुष्योंकी सोची हुई प्रत्येक बात निःसार होती है । जैसे सूर्य दिनके रूपको प्रकट कर देता है, उसी प्रकार मूर्खोंकी अन्तरात्मा ही उनके यथार्थ स्वरूपका दर्शन करा देती है ॥ ४८ ॥
न लोके राजते मूर्खः केवलात्मप्रशंसया ।
अपि चेह श्रिया हीनः कृतविद्यः प्रकाशते ॥ ४ ९ ॥
मूर्ख मनुष्य केवल अपनी प्रशंसाके बलसे जगत् में प्रतिष्ठा नहीं पाता है, विद्वान् पुरुष कान्तिहीन हो तो भी संसारमें उसकी ख्माति बढ़ जाती है ॥ ४ ९ ॥
अब्रुवन् कस्यचिन्निन्दामात्मपूजामवर्णयन् ।
न कश्चिद् गुणसम्पन्नः प्रकाशो भुवि दृश्यते ॥ ५० ॥
किसी दूसरेकी निन्दा न करे, अपनी मान-प्रतिष्ठाकी प्रशंसा न करे, कोई भी गुणवान् पुरुष पर निन्दा और आत्मप्रशंसाका त्याग किये बिना इस भूमण्डलमें सम्मानित हुआ हो, यह नहीं देखा जाता है ॥ ५० ॥
विकर्मणा तप्यमानः पापाद् विपरिमुच्यते ।
न तत् कुर्यां पुनरिति द्वितीयात् परिमुच्यते ॥ ५१ ॥
जो मनुष्य पापकर्म बन जानेपर सच्चे हृदयसे पश्चात्ताप करता है, वह उस पापसे छूट जाता है तथा ‘ फिर कभी ऐसा कर्म नहीं करूँगा' ऐसा दृढ़ निश्चय कर लेनेपर वह भविष्यमें होनेवाले दूसरे पापसे भी बच जाता है ॥ ५१ ॥
कर्मणा येन तेनेह पापाद् द्विजवरोत्तम ।
एवं श्रुतिरियं ब्रह्मन् धर्मेषु प्रतिदृश्यते ॥ ५२ ॥
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विप्रवर! शास्त्रविहित (जप, तप, यज्ञ, दान आदि) किसी भी कर्मका निष्कामभावसे आचरण करनेपर पापसे छुटकारा मिल सकता है। ब्रह्मन्! धर्मके विषयमें ऐसी श्रुति देखी जाती है ॥ ५२ ॥
पापान्यबुद्ध्वेह पुरा कृ प्राग् धर्मशीलोऽपि विहन्ति पश्चात् । धर्मो राजन् नुदते पूरुषाणां यत् कुर्वते पापमिह प्रमादात् ॥ ५३ ॥
पहलेका धर्मशील पुरुष भी यदि अनजानमें यहाँ कोई पाप कर बैठे तो वह पीछे ( निष्काम पुण्यकर्मद्वारा) उस पापको नष्ट कर देता है । राजन्! मनुष्योंका धर्म ही यहाँ प्रमादवश किये हुए उनके पापोंको दूर कर देता है ॥ ५३ ॥
पापं कृत्वा हि मन्येत नाहमस्मीति पूरुषः ।
तं तु देवाः प्रपश्यन्ति स्वस्यैवान्तरपूरुषः ॥ ५४ ॥
जो मनुष्य पाप करके भी यह मानता है कि ' मैं पापी नहीं हूँ। ' वह भूल करता है; क्योंकि देवता उसे और उसके पापको देखते हैं तथा उसीके भीतर बैठा हुआ परमात्मा भी देखता ही है ॥ ५४ ॥
चिकीर्षेदेव कल्याणं श्रद्दधानोऽनसूयकः ।
वसनस्येव छिद्राणि साधूनां विवृणोति यः ॥ ५५ ॥
( अपश्यन्नात्मनो दोषान् स पापः प्रेत्य नश्यति ॥ ) श्रद्धालु मनुष्य दूसरोंके दोष देखना छोड़कर सदा सबके हितकी ही इच्छा करे । जो पापी अपने दोषोंकी ओरसे आँखें बंद करके सदा दूसरे श्रेष्ठ पुरुषोंके दोषोंको ही कपड़ेके छेदोंकी भाँति अधिकाधिक प्रकट करता और बढ़ाता है, वह मृत्युके पश्चात् नष्ट हो जाता है —परलोकमें उसे कोई सुख नहीं मिलता है ॥ ५५ ॥
पापं चेत् पुरुषः कृत्वा कल्याणमभिपद्यते ।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो महाभ्रेणेव चन्द्रमाः ॥ ५६ ॥
यदि मनुष्य पाप करके भी कल्याणकारी कर्ममें लग जाता है, तो वह महामेघसे मुत्ह हुए चन्द्रमाकी भाँति सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ५६ ॥
यथाऽऽदित्यः समुद्यन् वै तमः पूर्वं व्यपोहति ।
एवं कल्याणमातिष्ठन् सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५७ ॥
जैसे सूर्य उदय होनेपर पहलेके अन्धकारको नष्ट कर देते हैं, उसी प्रकार कल्याणकारी शुभ कर्मका निष्कामभावसे अनुष्ठान करनेवाला पुरुष सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥ ५७ ॥
पापानां विद्धयधिष्ठानं लोभमेव द्विजोत्तम ।
लुब्धाः पापं व्यवस्यन्ति नरा नातिबहुश्रुताः ॥ ५८ ॥
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विप्रवर! लोभको ही पापोंका घर समझो । जिन्होंने अधिकतर शास्त्रोंका श्रवण नहीं किया है, वे लोभी मनुष्य ही पाप करनेका विचार रखते हैं ॥ ५८ ॥
अधर्मा धर्मरूपेण तृणैः कूपा इवावृताः ।
तेषां दमः पवित्राणि प्रलापा धर्मसंश्रिताः ।
सर्वं हि विद्यते तेषु शिष्टाचारः सुदुर्लभः ॥ ५ ९ ॥
तिनकेसे ढके हुए कुओंकी भाँति धर्मकी आड़में कितने ही अधर्म चल रहे हैं । धर्मात्माके वेशमें रहनेवाले इन अधार्मिक मनुष्योंमें इन्द्रिय- संयम, पवित्रता और धर्मसम्बन्धी चर्चा आदि सभी गुण तो होते हैं, परंतु उनमें शिष्टाचार ( श्रेष्ठ पुरुषोंका- सा आचार- व्यवहार) अत्यन्त दुर्लभ है ॥ ५ ९ ॥ मार्कण्डेय उवाच
स तु विप्रो महाप्राज्ञो धर्मव्याधमपृच्छत ।
शिष्टाचारं कथमहं विद्यामिति नरोत्तम ॥ ६० ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! तदनन्तर परम बुद्धिमान् कौशिकने धर्मव्याधसे पूछा — ' नरश्रेष्ठ! मुझे शिष्टाचारका ज्ञान कैसे हो? ॥ ६० ॥
एतदिच्छामि भद्रं ते श्रोतुं धर्मभृतां वर ।
त्वत्तो महामते व्याध तद् ब्रवीहि यथातथम् ॥ ६१ ॥
‘ धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महामते व्याध! तुम्हारा भला हो, मैं ये सब बातें तुमसे सुनना चाहता हूँ । अतः यथार्थ रूपसे इनका वर्णन करो ' ॥ ६१ ॥
व्याधउवाच
यज्ञो दानं तपो वेदाः सत्यं च द्विजसत्तम ।
पञ्चैतानि पवित्राणि शिष्टाचारेषु सर्वदा ॥ ६२ ॥
व्याधने कहा —द्विजश्रेष्ठ! यज्ञ, दान, तपस्या, वेदोंका स्वाध्याय और सत्यभाषण — ये पाँच पवित्र वस्तुएँ शिष्ट पुरुषोंके आचार- व्यवहारमें सदा देखी गयी हैं ॥ ६२ ॥
कामक्रोधौ वशे कृत्वा दम्भं लोभमनार्जवम् ।
धर्ममित्येव संतुष्टास्ते शिष्टाः शिष्टसम्मताः ॥ ६३ ॥
जो काम, क्रोध, लोभ, दम्भ और कुटिलताको वशमें करके केवल धर्मको ही अपनाकर संतुष्ट रहते हैं, वे शिष्ट कहलाते हैं और उन्हींका शिष्ट पुरुष आदर करते हैं ॥ ६३ ॥
न तेषां विद्यतेऽवृत्तं यज्ञस्वाध्यायशीलिनाम् ।
आचारपालनं चैव द्वितीयं शिष्टलक्षणम् ॥ ६४ ॥
वे निरन्तर यज्ञ और स्वाध्यायमें लगे रहते हैं । उनमें स्वेच्छाचार नहीं होता । सदाचारका पालन शिष्ट पुरुषोंका दूसरा लक्षण है ॥ ६४ ॥
गुरुशुश्रूषणं सत्यमक्रोधो दानमेव च ।
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एतच्चतुष्टयं ब्रह्मन् शिष्टाचारेषु नित्यदा ॥ ६५ ॥
ब्रह्मन्! शिष्टाचारी पुरुषोंमें गुरुकी सेवा, सत्य भाषण, क्रोधका अभाव तथा दान — ये चार सद्गुण सदा रहते हैं ॥ ६५ ॥
शिष्टाचारे मनः कृत्वा प्रतिष्ठाप्य च सर्वशः ।
यामयं लभते वृत्तिं सा न शक्या ह्यतोऽन्यथा ॥ ६६ ॥
मनुष्य शिष्ट पुरुषोंके उपर्युक्त आचारमें मनको सब प्रकारसे स्थापित करके जिस उत्तम स्थितिको प्राप्त करता है उसकी उपलब्धि और किसी प्रकारसे नहीं हो सकती ॥ ६६ ॥
वेदस्योपनिषत् सत्यं सत्यस्योपनिषद् दमः ।
दमस्योपनिषत् त्यागः शिष्टाचारेषु नित्यदा ॥ ६७ ॥
वेदका सार है सत्य, सत्यका सार है इन्द्रिय - संयम और इन्द्रिय - सयंमका सार है त्याग । यह त्याग शिष्ट पुरुषोंके आचारमें सदा विद्यमान रहता है ॥ ६७ ॥
ये तु धर्मानसूयन्ते बुद्धिमोहान्विता नराः ।
अपथा गच्छतां तेषामनुयाता च पीड्यते ॥ ६८ ॥
जो मनुष्य बुद्धिमोहसे युक्त होकर धर्ममें दोष देखते हैं वे स्वयं तो कुमार्गगामी होते ही हैं, उनके पीछे चलनेवाला मनुष्य भी कष्ट पाता है ॥ ६८ ॥
ये तु शिष्टाः सुनियताः श्रुतित्यागपरायणाः ।
धर्मपन्थानमारूढाः सत्यधर्मपरायणाः ॥ ६ ९ ॥
जो शिष्ट हैं वे सदा ही नियमित जीवन व्यतीत करते हैं, वेदोंके स्वाध्यायमें तत्पर और त्यागी होते हैं । धर्मके मार्गपर ही चलते हैं और सत्यधर्मको ही अपना परम आश्रय मानते हैं ॥ ६९ ॥
नियच्छन्ति परां बुद्धिं शिष्टाचारान्विता जनाः ।
उपाध्यायमते युक्ताः स्थित्या धर्मार्थदर्शिनः ॥ ७० ॥
शिष्टाचारपरायण मनुष्य अपनी उत्तम बुद्धिको भी संयममें रखते हैं, गुरुके सिद्धान्तके अनुसार चलते हैं और मर्यादामें स्थित होकर धर्म और अर्थपर दृष्टि रखते हैं ॥
नास्तिकान् भिन्नमर्यादान् क्रूरान् पापमतौ स्थितान् ।
त्यज तान् ज्ञानमाश्रित्य धार्मिकानुपसेव्य च ॥ ७१ ॥
इसलिये तुम नास्तिक, धर्मकी मर्यादा भंग करनेवाले, क्रूर तथा पापपूर्ण विचार रखनेवाले पुरुषोंका साथ छोड़ दो और ज्ञानका आश्रय लेकर धर्मात्मा पुरुषोंकी सेवामें रहो ॥ ७१ ॥
कामलोभग्रहाकीर्णां पञ्चेन्द्रियजलां नदीम् ।
नावं धृतिमयीं कृत्वा जन्मदुर्गाणि संतर ॥ ७२ ॥
यह शरीर एक नदी है । पाँच इन्द्रियाँ इसमें जल हैं । काम और लोभरूपी मगर इसके भीतर भरे पड़े हैं । जन्म और मृत्युके दुर्गम प्रदेशमें यह नदी बह रही है । तुम धैर्यकी नावपर
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बैठो और इसके दुर्गम स्थानों -जन्म आदि क्लेशोंको पार कर जाओ ॥ ७२ ॥
क्रमेण संचितो धर्मो बुद्धियोगमयो महान् ।
शिष्टाचारे भवेत् साधू रागः शूक्लेव वाससि ॥ ७३ ॥
जैसे कोई भी रंग सफेद कपड़ेपर ही अच्छी तरह खिलता है, उसी प्रकार शिष्टाचारका पालन करनेवाले पुरुषमें ही क्रमशः संचित किया हुआ बुद्धियोगमय महान् धर्म भलीभाँति प्रकाशित होता है ॥ ७३ ॥
अहिंसा सत्यवचनं सर्वभूतहितं परम् ।
अहिंसा परमो धर्मः स च सत्ये प्रतिष्ठितः ।
सत्ये कृत्वा प्रतिष्ठां तु प्रवर्तन्ते प्रवृत्तयः ॥ ७४ ॥
अहिंसा और सत्यभाषण- ये समस्त प्राणियोंके लिये अत्यन्त हितकर हैं । अहिंसा सबसे महान् धर्म है, परंतु वह सत्यमें ही प्रतिष्ठित है । सत्यके ही आधारपर श्रेष्ठ पुरुषोंके सभी कार्य आरम्भ होते हैं ॥ ७४ ॥
सत्यमेव गरीयस्तु शिष्टाचारनिषेवितम् ।
आचारश्च सतां धर्मः संतश्चाचारलक्षणाः ॥ ७५ ॥
अतः शिष्ट पुरुषोंके आचारमें गृहीत सत्य ही सबसे अधिक गौरवकी वस्तु है । सदाचार
ही श्रेष्ठ पुरुषोंका धर्म है । सदाचारसे ही संतोंकी पहचान होती है ॥ ७५ ॥
यो यथाप्रकृतिर्जन्तुः स स्वां प्रकृतिमश्नुते ।
पापात्मा क्रोधकामादीन् दोषानाप्नोत्यनात्मवान् ॥ ७६ ॥
जिस जीवकी जैसी प्रकृति होती है, वह अपनी प्रकृतिका ही अनुसरण करता है । अपने मनको वशमें न रखनेवाला पापात्मा पुरुष ही काम, क्रोध आदि दोषोंको प्राप्त होता है ॥ ७६ ॥
आरम्भोन्याययुक्तो यः स हि धर्म इति स्मृतः ।
अनाचारस्त्वधर्मेति एतच्छिष्टानुशासनम् ॥ ७७ ॥
' जो आरम्भ न्याययुक्त हो, वही धर्म कहा गया है । इसके विपरीत जो अनाचार है, वह अधर्म है ’ — ऐसा शिष्ट पुरुषोंका कथन है ॥ ७७ ॥
अक्रुद्धयन्तोऽनसूयन्तो निरहङ्कारमत्सराः ।
ऋजवः शमसम्पनाः शिष्टाचारा भवन्ति ते ॥ ७८ ॥
जिनमें क्रोधका अभाव है, जो दूसरोंके दोष नहीं देखते, जिनमें अहंकार और ईर्ष्याका अभाव है, जो सरल तथा मनोनिग्रहसे सम्पन्न हैं, वे शिष्टाचारी कहलाते हैं ॥ ७८ ॥
त्रैविद्यवृद्धाः शुचयो वृत्तवन्तो मनस्विनः ।
गुरुशुश्रूषवो दान्ताः शिष्टाचारा भवन्त्युत ॥ ७९ ॥
‘ जो तीनों वेदोंके विद्वानोंमें श्रेष्ठ, पवित्र, सदाचारी, मनस्वी, गुरुसेवक और जितेन्द्रिय हैं, वे शिष्टाचारी कहे जाते हैं ॥ ७ ९ ॥
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तेषामहीनसत्त्वानां दुष्कराचारकर्मणाम् ।
स्वैः कर्मभिः सत्कृतानां घोरत्वं सम्प्रणश्यति ॥ ८० ॥
जो सत्त्वगुणसे सम्पन्न हैं, जिनके आचार और कर्म पापियोंके लिये कठिन हैं तथा जो संसारमें अपने सत्कर्मोंके द्वारा सत्कृत हैं, उनके हिंसा आदि दोष स्वतः नष्ट हो जाते हैं ॥ ८० ॥
तं सदाचारमाश्चर्यं पुराणं शाश्वतं ध्रुवम् ।
धर्मं धर्मेण पश्यन्तः स्वर्ग यान्ति मनीषिणः ॥ ८१ ॥
जिसका श्रेष्ठ पुरुषोंने पालन किया है, जो अनादि, सनातन और नित्य है, उस धर्मको धर्मदृष्टिसे ही देखनेवाले मनीषी पुरुष स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ ८१ ॥
आस्तिका मानहीनाश्च द्विजातिजनपूजकाः ।
श्रुतवृत्तोपसम्पन्नाः सन्तः स्वर्गनिवासिनः ॥ ८२ ॥
जो आस्तिक, अहंकारशून्य, ब्राह्मणोंका समादर करनेवाले, विद्वान् और सदाचारसे सम्पन्न हैं, वे श्रेष्ठ पुरुष स्वर्गमें निवास करते हैं ॥ ८२ ॥
वेदोक्तः परमो धर्मो धर्मशास्त्रेषु चापरः । शिष्टाचारश्च शिष्टानां त्रिविधं धर्मलक्षणम् । जिसका वेदोंमें वर्णन है, वह धर्मका पहला लक्षण है । धर्मशास्त्रोंमें जिसका प्रतिपादन किया गया है, वह धर्मका दूसरा लक्षण है और शिष्टाचार धर्मका तीसरा लक्षण है । इस प्रकार शिष्ट पुरुषोंने धर्मके तीन लक्षण स्वीकार किये हैं ॥ ८२३ ॥
धारणं चापि विद्यानां तीर्थानामवगाहनम् ॥ ८३ ॥
क्षमा सत्यार्जवं शौचं सतामाचारदर्शनम् । सब विद्याओंका अध्ययन, सब तीर्थोंमें स्नान, क्षमा, सत्य, सरलता और शौच ( पवित्रता) —ये श्रेष्ठ पुरुषोंके आचारको लक्षित करानेवाले हैं ॥ ८३३ ॥
सर्वभूतदयावन्तो अहिंसानिरताः सदा ॥ ८४ ॥
परुषं च न भाषन्ते सदा सन्तो द्विजप्रियाः । जो समस्त प्राणियोंपर दया करते, सदा अहिंसा - धर्मके पालनमें तत्पर रहते और कभी किसीसे कटु वचन नहीं बोलते, ऐसे संत सदा समस्त द्विजोंके प्रिय होते हैं ॥ ८४३ ॥
शुभानामशुभानां च कर्मणां फलसंचये ॥ ८५ ॥
विपाकमभिजानन्ति ते शिष्टाः शिष्टसम्मताः । जो शुभ और अशुभ कर्मोंके फलसंचयसे सम्बन्ध रखनेवाले परिणामको जानते हैं, वे शिष्ट कहे गये है और शिष्ट पुरुषोंमें उनका समादर होता है ॥ ८५३ ॥
न्यायोपेता गुणोपेताः सर्वलोकहितैषिणः ॥ ८६ ॥
सन्तः स्वर्गजितः शुक्ला: संनिविष्टाश्च सत्पथे ।
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जो न्यायपरायण, सद्गुणसम्पन्न, सब लोगोंका हित चाहनेवाले, हिंसारहित और सन्मार्गपर चलनेवाले हैं, वे श्रेष्ठ पुरुष स्वर्गलोकपर विजय पाते हैं ॥ ८६३ ॥
दातारः संविभक्तारो दीनानुग्रहकारिणः ॥ ८७ ॥
सर्वपूज्याः श्रुतधनास्तथैव च तपस्विनः ।
सर्वभूतदयावन्तस्ते शिष्टाः शिष्टसम्मताः ॥ ८८ ॥
जो सबको दान देनेवाले, अपने कुटुम्बीजनोंमें प्रत्येक वस्तुको समानरूपसे बाँटकर उसका उपयोग करनेवाले, दीनजनोंपर कृपाभाव बनाये रखनेवाले, शास्त्रज्ञानके धनी, सबके लिये समादरणीय, तपस्वी और समस्त प्राणियोंके प्रति दयालु हैं, वे श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा सम्मानित शिष्ट कहे गये हैं ॥ ८७-८८ ॥
दानशिष्टाः सुखाँल्लोकानाप्नुवन्तीह च श्रियम् ।
पीडया च कलत्रस्य भृत्यानां च समाहिताः ॥ ८ ९ ॥
अतिशक्त्या प्रयच्छन्ति सन्तः सद्भिः समागताः ।
लोकयात्रां च पश्यन्तो धर्ममात्महितानि च ॥ ९ ० ॥
जो दानसे अवशिष्ट वस्तुका उपयोग करनेवाले हैं, वे श्रेष्ठ पुरुष इस लोकमें सम्पत्ति और परलोकमें सुखमय लोक प्राप्त करते हैं । शिष्ट पुरुषोंके पास जब उत्तम पुरुष कुछ माँगनेके लिये पधारते हैं, उस समय वे अपनी स्त्री तथा कुटुम्बी जनोंको कष्ट देकर सभी मनोयोगपूर्वक अपनी शक्तिसे अधिक दान देते हैं । न्यायपूर्वक लोकयात्राका निर्वाह कैसे हो? धर्मकी रक्षा और आत्माका कल्याण किस प्रकार हो? इन्हीं बातोंकी ओर उनकी दृष्टि रहती है ॥ ८ ९ - ९ ० ॥
एवं सन्तो वर्तमानास्त्वेधन्ते शाश्वतीः समाः ।
अहिंसा सत्यवचनमानृशंस्यमथार्जवम् ॥ ९ १ ॥
अद्रोहो नाभिमानश्च ह्रीस्तितिक्षा दमः शमः ।
धीमन्तो धृतिमन्तश्च भूतानामनुकम्पकाः ॥ ९ २ ॥
अकामद्वेषसंयुक्तास्ते सन्तो लोकसाक्षिणः । ऐसा बर्ताव करनेवाले संत पुरुष अनन्त कालतक उन्नतिकी ओर अग्रसर होते रहते हैं । जो अहिंसा, सत्यभाषण, कोमलता, सरलता, अद्रोह, अहंकारका त्याग, लज्जा, क्षमा, शम, दम– इन गुणोंसे युक्त बुद्धिमान, धैर्यवान् समस्त प्राणियोंपर अनुग्रह करनेवाले तथा राग-द्वेषसे रहित हैं, वे संत सम्पूर्ण लोकोंके लिये प्रमाणभूत हैं ॥ त्रीण्येव तु पदान्याहुः सतां व्रतमनुत्तमम् ॥ ९ ३ ॥ न चैव द्रुह्येद् दद्याच्च सत्यं चैव सदा वदेत् । श्रेष्ठ पुरुष तीन ही पद बताते हैं - किसीसे द्रोह न करे, दान करे और सदा सत्य ही बोले । यह श्रेष्ठ पुरुषोंका सर्वोत्तम व्रत है ॥ ९ ३३ ॥ सर्वत्र च दयावन्तः सन्तः करुणवेदिनः ॥ ९ ४ ॥
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गच्छन्तीह सुसंतुष्टा धर्मपन्थानमुत्तमम् ।
शिष्टाचारा महात्मानो येषां धर्मः सुनिश्चितः ॥ ९ ५ ॥
जो सर्वत्र दया करते हैं, जिनके हृदयमें करुणाकी अनुभूति होती है, वे श्रेष्ठ पुरुष इस लोकमें अत्यन्त संतुष्ट रहकर धर्मके उत्तम पथपर चलते हैं । जिन्होंने धर्मको अपनाये रखनेका दृढ़ निश्चय कर लिया है, वे ही महात्मा सदाचारी हैं ॥ ९ ४ - ९ ५ ॥
अनसूया क्षमा शान्तिः संतोषः प्रियवादिता ।
कामक्रोधपरित्यागः शिष्टाचारनिषेवणम् ॥ ९ ६ ॥
कर्म च श्रुतसम्पन्नं सतां मार्गमनुत्तमम् । दोषदृष्टिका अभाव, क्षमा, शान्ति, संतोष, प्रियभाषण और काम- क्रोधका त्याग, शिष्टाचारका सेवन और शास्त्रके अनुकूल कर्म करना - यह श्रेष्ठ पुरुषोंका अति उत्तम मार्ग है ॥ ९ ६३ ॥ शिष्टाचारं निषेवन्ते नित्यं धर्ममनुव्रताः ॥ ९ ७ ॥
प्रज्ञाप्रासादमारुह्य मुच्यन्ते महतो भयात् ।
प्रेक्षन्तो लोकवृत्तानि विविधानि द्विजोत्तम ॥ ९ ८ ॥
अतिपुण्यानि पापानि तानि द्विजवरोत्तम । द्विजश्रेष्ठ! जो धर्मात्मा पुरुष सदा शिष्टाचारका सेवन करते हैं और प्रज्ञारूपी प्रासादपर आरूढ़ हो भाँति- भाँतिके लोकचरित्रोंका निरीक्षण तथा अत्यन्त पुण्य एवं पापकर्मोंकी समीक्षा करते हैं, वे महान् भयसे मुक्त हो जाते हैं ॥ ९ ७- ९ ८३ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं यथाप्रज्ञं यथाश्रुतम् ।
शिष्टाचारगुणं ब्रह्मन् पुरस्कृत्य द्विजर्षभ ॥ ९९ ॥
ब्रह्मन्! विप्रवर! इस प्रकार शिष्टाचारके गुणोंके सम्बन्धमें मैंने जैसा जाना और सुना है, वह सब आपसे कह सुनाया है ॥ ९९ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे सप्ताधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें ब्राह्मणव्याधसंवादविषयक दो सौ सातवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २०७ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ श्लोक मिलाकर कुल १००३ श्लोक हैं )
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अष्टाधिकद्विशततमोऽध्यायः धर्मव्याधद्वारा हिंसा और अहिंसाका विवेचन मार्कण्डेय उवाच
स तु विप्रमथोवाच धर्मव्याधो युधिष्ठिर ।
यदहमाचरे कर्म घोरमेतदसंशयम् ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! तदनन्तर धर्मव्याधने कौशिक ब्राह्मणसे कहा -' मैं जो यह मांस बेचनेका व्यवसाय कर रहा हूँ, वास्तवमें यह अत्यन्त घोर कर्म है, इसमें संशय नहीं है ॥ १ ॥
विधिस्तु बलवान् ब्रह्मन् दुस्तरं हि पुरा कृतम् ।
पुरा कृतस्य पापस्य कर्मदोषो भवत्ययम् ॥ २ ॥
दोषस्यैतस्य वै ब्रह्मन् विघाते यत्नवानहम् । ‘किंतु ब्रह्मन्! दैव बलवान् है । पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मका ही नाम दैव है । उससे पार पाना बहुत कठिन है । यह जो कर्मदोषजनित व्याधके घर जन्म हुआ है, यह मेरे पूर्वजन्ममें किये हुए पापका ही फल है । ब्रह्मन्! मैं इस दोषके निवारणके लिये प्रयत्नशील हूँ ॥ २३ || विधिना हि हते पूर्वं निमित्तं घातको भवेत् ॥ ३ ॥
‘ क्योंकि विधाताके द्वारा पहलेसे ही जीवकी मृत्यु निश्चित की जाती है; किंतु घातक ( कसाई अथवा व्याध ) उसमें निमित्त बन जाता है अर्थात् जो स्वेच्छासे ज्ञानपूर्वक जीवहिंसा करता है, वह घातक व्यर्थ ही निमित्त बनकर दोषका भागी होता है ॥ ३ ॥
निमित्तभूता हि वयं कर्मणोऽस्य द्विजोत्तम ।
येषां हतानां मांसानि विक्रीणामीह वै द्विज ॥ ४ ॥
तेषामपि भवेद् धर्म उपयोगे न भक्षणे ।
देवतातिथिभृत्यानां पितॄणां चापि पूजनम् ॥ ५ ॥
‘द्विजश्रेष्ठ! इस कार्यमें हम निमित्तमात्र हैं । ब्रह्मन्! मैं जिन मारे गये प्राणियोंका मांस बेचता हूँ, उनके जीते - जी यदि उनका सदुपयोग किया जाता तो बड़ा धर्म होता । मांस-भक्षणमें तो धर्मका नाम भी नहीं है ( उलटे महान् अधर्म होता है ) । देवता, अतिथि, भरणीय कुटुम्बीजन और पितरोंका पूजन ( आदर- सत्कार) अवश्य धर्म है ॥ ४-५ ॥
ओषध्यो वीरुधश्चैव पशवो मृगपक्षिणः ।
अनादिभूता भूतानामित्यपि श्रूयते श्रुतिः ॥ ६ ॥
ओषधियाँ, अन्न, तृण, लता, पशु, मृग और पक्षी आदि सभी वस्तुएँ सम्पूर्ण प्राणियोंके अनादि - कालसे उपयोगमें आती रहती हैं- ऐसी श्रुति भी सुनी जाती है ॥ ६ ॥
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आत्ममांसप्रसादेन शिबिरौशीनरो नृपः ।
स्वर्गं सुदुर्गमं प्राप्तः क्षमावान् द्विजसत्तम ॥ ७ ॥
द्विजश्रेष्ठ! उशीनरके पुत्र क्षमाशील ( और दयालु) राजा शिबिने (एक भूखे बाजको कबूतरके बदले ) अपने शरीरका मांस अर्पित कर दिया था और उसीके प्रसादसे उन्हें परम दुर्लभ स्वर्गलोककी प्राप्ति हुई थी ॥ ७ ॥
स्वधर्म इति कृत्वा तु न त्यजामि द्विजोत्तम ।
पुरा कृतमिति ज्ञात्वा जीवाम्येतेन कर्मणा ॥ ८ ॥
‘ विप्रवर! मैं अपना स्वधर्म समझकर यह धंधा नहीं छोड़ रहा हूँ । पहलेसे मेरे पूर्वज यही करते आये हैं, ऐसा समझकर मैं इसी कर्मसे जीवन- निर्वाह करता हूँ ॥ ८ ॥
स्वकर्म त्यजतो ब्रह्मन्नधर्म इह दृश्यते ।
स्वकर्मनिरतो यस्तु धर्मः स इति निश्चयः ॥ ९ ॥
‘ब्रह्मन्! अपने कर्मका परित्याग करनेवालेको यहाँ अधर्मकी प्राप्ति देखी जाती है । जो अपने कर्ममें तत्पर है, उसीका बर्ताव धर्मपूर्ण है, ऐसा सिद्धान्त है ॥ ९ ॥
पूर्वं हि विहितं कर्म देहिनं न विमुञ्चति ।
धात्रा विधिरयं दृष्टो बहुधा कर्मनिर्णये ॥ १० ॥
' पहलेका किया हुआ कर्म देहधारी मनुष्यको नहीं छोड़ता है। बहुधा कर्मका निर्णय करते समय विधाताने इसी विधिको अपने सामने रखा है ॥ १० ॥
द्रष्टव्या तु भवेत् प्रज्ञा क्रूरे कर्मणि वर्तता ।
कथं कर्म शुभं कुर्यां कथं मुच्ये पराभवात् ॥ ११ ॥
'जो क्रूर कर्ममें लगा हुआ है, उसे सदा यह सोचते रहना चाहिये कि ' मैं कैसे शुभ कर्म करूँ और किस प्रकार इस निन्दित कर्मसे छुटकारा पाऊँ' ॥ ११ ॥
कर्मणस्तस्य घोरस्य बहुधा निर्णयो भवेत् ।
दाने च सत्यवाक्ये च गुरुशुश्रूषणे तथा ॥ १२ ॥
द्विजातिपूजने चाहं धर्मे च निरतः सदा ।
अभिमानातिवादाभ्यां निवृत्तोऽस्मि द्विजोत्तम ॥ १३ ॥
‘ बार- बार ऐसा करनेसे उस घोर कर्मसे छूटनेके विषयमें कोई निश्चित उपाय प्राप्त हो जाता है । द्विजश्रेष्ठ! मैं दान, सत्यभाषण, गुरुसेवा, ब्राह्मणपूजन तथा धर्मपालनमें सदा तत्पर रहकर अभिमान और अतिवादसे दूर रहता हूँ ॥ १२-१३ ॥ कृषिं साध्विति मन्यन्ते तत्र हिंसा परा स्मृता ।
कर्षन्तो लाङ्गलैः पुंसो घ्नन्ति भूमिशयान् बहून् ।
जीवानन्यांश्च बहुशस्तत्र किं प्रतिभाति ते ॥ १४ ॥
कुछ लोग खेतीको उत्तम मानते हैं, परंतु उसमें भी बहुत बड़ी हिंसा होती है । हल चलानेवाले मनुष्य धरतीके भीतर शयन करनेवाले बहुत- से प्राणियोंकी हत्या कर डालते हैं ।