श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1471–1480
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1471–1480
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इन्द्रियोंके संसर्गसे ही मनुष्य निःसंदेह दुर्गुण-दुराचार आदि दोषोंको प्राप्त होते हैं । उन्हीं इन्द्रियोंको अच्छी तरह वशमें कर लेनेपर उन्हें सर्वथा सिद्धि प्राप्त हो सकती है ॥ २१ ॥
षण्णामात्मनि नित्यानामैश्वर्यं योऽधिगच्छति ।
न स पापैः कुतोऽनर्थैर्युज्यते विजितेन्द्रियः ॥ २२ ॥
जो अपने शरीरमें ही सदा विद्यमान रहनेवाले मनसहित छहों इन्द्रियोंपर अधिकार पा लेता है वह जितेन्द्रिय पुरुष पापोंमें नहीं लगता । फिर पापजनित अनर्थोंसे तो उसका संयोग ही कैसे हो सकता है? ॥
रथःशरीरं पुरुषस्य दृष्ट- मात्मा नियन्तेन्द्रियाण्याहुरश्वान् ।
तैरप्रमत्तः कुशली सदश्व- र्दान्तैः सुखं याति रथीव धीरः ॥ २३ ॥
पुरुषका यह प्रत्यक्ष देखनेमें आनेवाला स्थूल शरीर रथ है । आत्मा ( बुद्धि ) सारथि है और इन्द्रियोंको अश्व बताया गया है । जैसे कुशल, सावधान एवं धीर रथी उत्तम घोड़ोंको अपने वशमें रखकर उनके द्वारा सुखपूर्वक मार्ग तै करता है, उसी प्रकार सावधान, धीर एवं साधन- कुशल पुरुष इन्द्रियोंको वशमें करके सुखसे जीवन- यात्रा पूर्ण करता है ॥ २३ ॥
षण्णामात्मनि युक्तानामिन्द्रियाणां प्रमाथिनाम् ।
यो धीरो धारयेद् रश्मीन् स स्यात् परमसारथिः ॥ २४ ॥
जो धीर पुरुष अपने शरीरमें नित्य विद्यमान छः प्रमथनशील इन्द्रियरूपी अश्वोंकी बागडोर सँभालता है, वही उत्तम सारथि हो सकता है ॥ २४ ॥
इन्द्रियाणां प्रसृष्टानां हयानामिव वर्त्मसु ।
धृतिं कुर्वीत सारथ्ये धृत्या तानि जयेद् ध्रुवम् ॥ २५ ॥
सड़कपर दौड़नेवाले घोड़ोंकी तरह विषयोंमें विचरनेवाली इन इन्द्रियोंको वशमें करनेके लिये धैर्यपूर्वक प्रयत्न करे । धैर्यपूर्वक उद्योग करनेवालेको उनपर अवश्य विजय प्राप्त होती है ॥ २५ ॥
इन्द्रियाणां विचरतां यन्मनोऽनु विधीयते ।
तदस्य हरते बुद्धिं नावं वायुरिवाम्भसि ॥ २६ ॥
जैसे जलमें चलनेवाली नावको वायु हर लेती है, वैसे ही विषयोंमें विचरती हुई इन्द्रियोंमेंसे मन जिस इन्द्रियके साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुषकी बुद्धिको हर लेती है ॥ २६ ॥
येषु विप्रतिपद्यन्ते षट्सु मोहात् फलागमम् ।
तेष्वध्यवसिताध्यायी विन्दते ध्यानजं फलम् ॥ २७ ॥
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सभी मनुष्य इन छः इन्द्रियोंके शब्द आदि विषयोंमें उनसे प्राप्त होनेवाले सुखरूप फल पानेके सम्बन्धमें मोहसे संशयमें पड़ जाते हैं। परंतु जो उनके दोषोंका अनुसंधान करनेवाला वीतराग पुरुष है, वह उनका निग्रह करके ध्यानजनित आनन्दका अनुभव करता है ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे एकादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें ब्राह्मण- व्याध- संवादविषयक दो सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २११ ॥
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द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः तीनों गुणोंके स्वरूप और फलका वर्णन मार्कण्डेय उवाच
एवं तु सूक्ष्मे कथिते धर्मव्याधेन भारत ।
ब्राह्मणः स पुनः सूक्ष्मं पप्रच्छ सुसमाहितः ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं- भारत! इस प्रकार धर्मव्याधके द्वारा सूक्ष्म तत्त्वका निरूपण होनेपर कौशिक ब्राह्मणने एकाग्रचित्त होकर पुनः एक सूक्ष्म प्रश्न उपस्थित किया ॥ १ ॥
ब्राह्मणउवाच
सत्त्वस्य रजसश्चैव तमसश्च यथातथम् ।
गुणांस्तत्त्वेन मे ब्रूहि यथावदिह पृच्छतः ॥ २ ॥
ब्राह्मण बोला – व्याध! मैं यहाँ यथोचितरूपसे एक प्रश्न उपस्थित करता हूँ । वह यह है कि सत्त्व, रज और तमका गुण ( स्वरूप) क्या है? यह मुझे यथार्थरूपसे बताओ ॥ २ ॥
व्याध उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
एषां गुणान् पृथक्त्वेन निबोध गदतो मम ॥ ३ ॥
धर्मव्याधने कहा — ब्रह्मन्! आप मुझसे जो बात पूछ रहे हैं, मैं अब उसे कहूँगा । सत्त्व, रज और तम — इन तीनोंके गुणोंका पृथक् - पृथक् वर्णन करता हूँ, सुनिये ॥ ३ ॥
मोहात्मकं तमस्तेषां रज एषां प्रवर्तकम् ।
प्रकाशबहुलत्वाच्च सत्त्वं ज्याय इहोच्यते ॥ ४ ॥
इन तीनों गुणोंमें जो तमोगुण है वह मोहात्मक — मोह उत्पन्न करनेवाला है । रजोगुण कर्मोंमें प्रवृत्त करनेवाला है । परंतु सत्त्वगुणमें प्रकाशकी बहुलता है, इसलिये वह सबसे श्रेष्ठ कहा जाता है ॥ ४ ॥
अविद्याबहुलो मूढः स्वप्नशीलो विचेतनः ।
दुर्हृषीकस्तमोध्वस्तः सक्रोधस्तामसोऽलसः ॥ ५ ॥
जिसमें अज्ञानकी बहुलता है, जो मूढ़ ( मोहग्रस्त ) और अचेत होकर सदा नींद लेता रहता है, जिसकी इन्द्रियाँ वशमें न होनेके कारण दूषित हैं, जो अविवेकी, क्रोधी और आलसी है, ऐसे मनुष्यको तमोगुणी जानना चाहिये ॥ ५ ॥
प्रवृत्तवाक्यो मन्त्री च यो नराग्रयोऽनसूयकः ।
विधित्समानो विप्रर्षे स्तब्धो मानी स राजसः ॥ ६ ॥
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ब्रह्मर्षे! जो प्रवृत्तिमार्गकी ही बातें करनेवाला, सलाह देनेमें कुशल और दूसरोंके गुणोंमें दोष न देखनेवाला है; जो सदा कुछ- न- कुछ करनेकी इच्छा रखता है, जिसमें कठोरता और अभिमानकी अधिकता है, वह मनुष्योंपर रोब जमानेवाला पुरुष रजोगुणी कहा गया है ॥ ६ ॥
प्रकाशबहुलो धीरो निर्विधित्सोऽनसूयकः ।
अक्रोधनो नरो धीमान् दान्तश्चैव स सात्त्विकः ॥ ७ ॥
जिसमें प्रकाश ( ज्ञान) -की बहुलता है, जो धीर और नये - नये कार्य आरम्भ करनेकी उत्सुकतासे रहित है, जिसमें दूसरोंके दोष देखनेकी प्रवृत्तिका अभाव है जो क्रोधशून्य, बुद्धिमान् और जितेन्द्रिय है, वह मनुष्य सात्त्विक माना जाता है ॥ ७ ॥
सात्त्विकस्त्वथ सम्बुद्धो लोकवृत्तेन क्लिश्यते ।
यदा बुध्यति बोद्धव्यं लोकवृत्तं जुगुप्सते ॥। ८ ॥
सात्त्विक पुरुष ज्ञानसम्पन्न हो रजोगुण और तमोगुणके कार्यभूत लौकिक व्यवहारमें पड़नेका कष्ट नहीं उठाता । वह जब जाननेयोग्य तत्त्वको जान लेता है, तब उसे सांसारिक व्यवहारसे ग्लानि हो जाती है ॥ ८ ॥
वैराग्यस्य च रूपं तु पूर्वमेव प्रवर्तते ।
मृदुर्भवत्यहङ्कारः प्रसीदत्यार्जवं च यत् ॥ ९ ॥
सात्त्विक पुरुषमें वैराग्यका लक्षण पहले ही प्रकट हो जाता है । उसका अहंकार ढीला पड़ जाता है और सरलता प्रकाशमें आने लगती है ॥ ९ ॥
ततोऽस्य सर्वद्वन्द्वानि प्रशाम्यन्ति परस्परम् ।
न चास्य संशयो नाम क्वचिद् भवति कश्चन ॥ १० ॥
तदनन्तर इसके राग- द्वेष आदि सम्पूर्ण द्वन्द्व परस्पर शान्त हो जाते हैं । इसके हृदयमें कभी कोई संशय नहीं उठता ॥ १० ॥
शूद्रयोनौ हि जातस्य सद्गुणानुपतिष्ठतः ।
वैश्यत्वं लभते ब्रह्मन् क्षत्रियत्वं तथैव च ॥ ११ ॥
ब्रह्मन्! शूद्रयोनिमें उत्पन्न मनुष्य भी यदि उत्तम गुणोंका आश्रय ले, तो वह वैश्य तथा क्षत्रियभावको प्राप्त कर लेता है ॥ ११ ॥
आर्जवे वर्तमानस्य ब्राह्मण्यमभिजायते ।
गुणास्ते कीर्तिताः सर्वे किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ १२ ॥
जो ‘ सरलता ' नामक गुणमें प्रतिष्ठित है, उसे ब्राह्मणत्व प्राप्त हो जाता है । ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने आपसे सम्पूर्ण गुणोंका वर्णन किया है, अब और क्या सुनना चाहते हैं? ॥ १२ ॥
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें ब्राह्मण- व्याध- संवादविषयक दोसौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१२ ॥
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त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः प्राणवायुकी स्थितिका वर्णन तथा परमात्म - साक्षात्कारके उपाय ब्राह्मणउवाच
पार्थिवं धातुमासाद्य शारीरोऽग्निः कथं भवेत् ।
अवकाशविशेषेण कथं वर्तयतेऽनिलः ॥ १ ॥
ब्राह्मणने पूछा – व्याध! शरीरमें रहनेवाला अग्निस्वरूप प्राण पार्थिव धातुका अवलम्बन करके कैसे रहता है? और प्राणवायु नाड़ियोंके मार्गविशेषके द्वारा किस प्रकार ( रस-रक्तादिका ) संचालन करता है? ॥ १ ॥
मार्कण्डेय उवाच
प्रश्नमेतं समुद्दिष्टं ब्राह्मणेन युधिष्ठिर ।
व्याधस्तु कथयामास ब्राह्मणाय महात्मने ॥ २ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! ब्राह्मणके द्वारा उपस्थित किये गये इस प्रश्नको सुनकर धर्मव्याधने उन महामना ब्राह्मणसे इस प्रकार कहा— ॥ २ ॥
व्याध उवाच
मूर्धानमाश्रितो वह्निः शरीरं परिपालयन् ।
प्राणो मूर्धनि चाग्नौ च वर्तमानो विचेष्टते ॥ ३ ॥
धर्मव्याध बोला — ब्रह्मन्! प्राणीके शरीरको सुरक्षित रखता हुआ अग्निस्वरूप उदान वायु मस्तकका आश्रय लेकर शरीरमें रहता है एवं मुख्य प्राण मस्तक और उदानवायु — इन दोनोंमें स्थित हुआ समस्त शरीरमें जीवनका संचार करता है ॥ ३ ॥
भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं प्राणे प्रतिष्ठितम् ।
श्रेष्ठं तदेव भूतानां ब्रह्मयोनिमुपास्महे ॥ ४ ॥
भूत, वर्तमान और भविष्य- सब कुछ प्राणके ही आश्रित है, वह प्राण ही समस्त भूतोंमें श्रेष्ठ है। अतः परब्रह्मसे उत्पन्न होनेवाले प्राणकी हम सब उपासना करते हैं३ ॥ ४ ॥
स जन्तुः सर्वभूतात्मा पुरुषः स सनातनः ।
महान् बुद्धिरहङ्कारो भूतानां विषयश्च सः ॥ ५ ॥
वह प्राण ही जीव है, वही समस्त प्राणियोंका आत्मा है, वही सनातन पुरुष है, महत्तत्त्व, बुद्धि और अहंकार तथा पाँचों भूतोंके कार्यरूप इन्द्रियाँ और उनके विषय सब
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कुछ वही है ( क्योंकि इस शरीरमें सबकी स्थिति उसीके आश्रित है और भविष्यमें मिलनेवाले शरीरमें जाना- आना भी इसीके आश्रित रहकर होता है । इसलिये यह प्राणकी स्तुति की गयी है )४ ॥ ५ ॥
( अव्यक्तं सत्त्वसंज्ञं च जीवः कालः स चैव हि ।
प्रकृतिः पुरुषश्चैव प्राण एव द्विजोत्तम ॥
जागर्ति स्वप्नकाले च स्वप्ने स्वप्नायते च सः । द्विजश्रेष्ठ! प्राण ही अव्यक्त, सत्त्व, जीव, काल, प्रकृति और पुरुष है । वही जाग्रत्-अवस्थामें जागता है । वही स्वप्नकालमें स्वप्न- जगत्का निर्माण करके स्वप्नावस्थाकी सारी चेष्टाएँ करता है ॥ जाग्रत्सु बलमाधत्ते चेष्टत्सु चेष्टयत्यपि ॥ तस्मिन् निरुद्धे विप्रेन्द्र मृत इत्यभिधीयते । त्यक्त्वा शरीरं भूतात्मा पुनरन्यत् प्रपद्यते ॥ ) वही जाग्रत्कालमें बलका आधान करता है और चेष्टाशील प्राणियोंमें चेष्टा उत्पन्न करता है । विप्रवर! उस प्राणका निरोध हो जानेपर ही प्रत्येक जीव मरा हुआ कहलाता है । भूतात्मा प्राण एक शरीरको छोड़कर फिर दूसरे शरीरमें प्रविष्ट हो जाता है ॥
एवं त्विह स सर्वत्र प्राणेन परिपाल्यते ।
पृष्ठतस्तु समानेन स्वां स्वां गतिमुपाश्रितः ॥ ६ ॥
इस प्रकार इस जगत्में सर्वत्र प्राणकी स्थिति है । प्राणके द्वारा ही सबका पालन होता है । पीछे वही प्राण जब समानवायु भावको प्राप्त होता है तब अपनी- अपनी पृथक् गतिका आश्रय लेता है ॥ ६ ॥
बस्तिमूलं गुदं चैव पावकं समुपाश्रितः ।
वहन् मूत्रं पूरीषं वाऽप्यपानः परिवर्तते ॥ ७ ॥
समानवायुके रूपमें जठराग्निका आश्रय ले वह प्राण जब मूत्राशय और गुदामें स्थित होता है, उस समय मल और मूत्रका भार वहन करनेके कारण वह अपानवायुके नामसे विख्यात हो संचरण करता है ॥ ७ ॥
प्रयत्ने कर्मणि बले स एष त्रिषु वर्तते ।
उदानमिति तं प्राहुरध्यात्मविदुषो जनाः ॥ ८ ॥
वही प्राण जब प्रयत्न ( काम करनेकी चेष्टा ), कर्म ( उत्क्षेपण और गमन आदि ) तथा बल ( बोझ उठानेकी शक्ति) – इन तीन विषयोंमें प्रवृत्त होता है, तब अध्यात्मवेत्ता मनुष्य उसे उदान कहते हैं ॥ ८ ॥
संधौ धौ संनिविष्टः सर्वेष्वपि तथानिलः ।
शरीरेषु मनुष्याणां व्यान इत्युपदिश्यते ॥ ९ ॥
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वही जब मनुष्य- शरीरके प्रत्येक संधिस्थलमें व्याप्त होकर रहता है, तब उसे व्यान कहते हैं ॥ ९ ॥
धातुष्वग्निस्तु विततः स तु वायुसमीरितः ।
रसान् धातूंश्च दोषांश्च वर्तयन् परिधावति ॥ १० ॥
त्वचा आदि सब धातुओंमें जठरानल व्याप्त है । वह प्राण आदि वायुओंसे प्रेरित होकर अन्न आदि रसों, त्वचा आदि धातुओं तथा पित्त आदि दोषोंको परिपक्व करता हुआ समूचे शरीरमें दौड़ा करता है ॥ १० ॥
प्राणानां संनिपातात् तु संनिपातः प्रजायते ।
ऊष्मा चाग्निरिति ज्ञेयो योऽन्नं पचति देहिनाम् ॥ ११ ॥
प्राण आदि वायुओंके परस्पर मिलनेसे एक संघर्ष उत्पन्न होता है, उससे प्रकट होनेवाले उत्तापको ही जठरानल समझना चाहिये । वही देहधारियोंके खाये हुए अन्नको पचाता है ॥ ११ ॥
समानोदानयोर्मध्ये प्राणापानौ समाहितौ ।
समर्थितस्त्वधिष्ठानं सम्यक् पचति पावकः ॥ १२ ॥
समान और उदान वायुओंके बीचमें प्राण और अपानवायुकी स्थिति है । उनके संघर्षसे उत्पन्न जठरानल अन्नको पचाता है और उसके रससे इस शरीरको भलीभाँति पुष्ट करता है * ॥ १२ ॥
अस्यापि पायुपर्यन्तस्तथा स्याद् गुदसंज्ञितः ।
स्रोतांसि तस्माज्जायन्ते सर्वप्राणेषु देहिनाम् ॥ १३ ॥
इस जठरानलका स्थान नाभिसे लेकर पायुतक है । इसीको ' गुदा ' कहते हैं । उस गुदासे देहधारियोंके समस्त प्राणोंमें स्रोत ( नाडीमार्ग) प्रकट होते हैं ॥ १३ ॥
अग्निवेगवहः प्राणो गुदान्ते प्रतिहन्यते ।
स ऊर्ध्वमागम्य पुनः समुत्क्षिपति पावकम् ॥ १४ ॥
गुदासे प्राण अग्निके वेगको लेकर गुदान्तमें टकराता है, फिर वहाँसे ऊपरको उठकर वह जठराग्निको भी ऊपर उठाता है ॥ १४ ॥
पक्वाशयस्त्वधो नाभ्यामूर्ध्वमामाशयः स्थितः ।
नाभिमध्ये शरीरस्य प्राणाः सर्वे प्रतिष्ठिताः ॥ १५ ॥
नाभिके नीचे पक्वाशय ( पके हुए भोजनका स्थान) है और ऊपर आमाशय ( कच्चे भोजनका स्थान ) है । शरीरमें स्थित समस्त प्राण नाभिमें ही प्रतिष्ठित हैं- वही उनका केन्द्रस्थान है ॥ १५ ॥
प्रवृत्ता हृदयात् सर्वे तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा ।
वहन्त्यन्नरसान् नाड्यो दशप्राणप्रचोदिताः ॥ १६ ॥
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नाड़ियाँ हृदयसे नीचे - ऊपर और इधर- उधर फैली हुई हैं । वे दस प्राणवायुओंसे प्रेरित हो शरीरके सब भागोंमें अन्नके रसोंको पहुँचाती रहती हैं ॥ १६ ॥
योगिनामेष मार्गस्तु येन गच्छन्ति तत् परम् ।
जितक्लमाः समा धीरा मूर्धन्यात्मानमादधुः ।
एवं सर्वेषु विततौ प्राणापानौ हि देहिषु ॥ १७ ॥
जिन्होंने समस्त क्लेशोंको जीत लिया है, जो समदर्शी और धीर हैं, जिन्होंने ( सुषुम्णा नाड़ीके द्वारा) अपने प्राणमय आत्माको मस्तक ( वर्ती सहस्रारचक्र ) - में ले जाकर स्थापित किया है, उन योगियोंके लिये यह ( मस्तकसे लेकर पायुतकका सुषुम्णामय ) मार्ग है, जिससे वे उस परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं । इस प्रकार समस्त जीवात्माओंके शरीरोंमें ये प्राणवायु और अपानवायु व्याप्त हैं ॥ १७ ॥
( तावग्निसहितौ ब्रह्मन् विद्धि वै प्राणमात्मनि । )
एकादशविकारात्मा कलासम्भारसम्भृतः ।
मूर्तिमन्तं हि तं विद्धि नित्यं योगजितात्मकम् ॥ १८ ॥
ब्रह्मन्! वे प्राण और अपान जठरानलके साथ रहते हैं । प्राणको आत्मामें स्थित जानिये । आत्मा एकादश इन्द्रियरूप विकारोंसे युक्त, षोडश* कलाओंके समूहसे सम्पन्न, शरीरको धारण करनेवाला तथा नित्य है । उसने योगबलसे मन- बुद्धिको अपने अधीन कर रखा है । इस प्रकार आत्माके सम्बन्धमें आपको जानना चाहिये ॥ १८ ॥
तस्मिन् यः संस्थितो ह्यग्निर्नित्यं स्थाल्यामिवाहितः ।
आत्मानं तं विजानीहि नित्यं योगजितात्मकम् ॥ १ ९ ॥
जैसे बटलोईमें आग रखी गयी हो, उसी प्रकार पूर्वोक्त कला- समूहरूप शरीरमें प्रकाशस्वरूप आत्मा सदा विद्यमान रहता है । आप उसे जानिये । वह नित्य तथा योगशक्तिसे मन- बुद्धिको अपने अधीन रखनेवाला है ॥ १ ९ ॥
देवो यः संस्थितस्तस्मिन्नब्बिन्दुरिव पुष्करे ।
क्षेत्रज्ञं तं विजानीहि नित्यं योगजितात्मकम् ॥ २० ॥
जैसे कमलके पत्तेपर पड़ी हुई जलकी बूँद निर्लिप्त होती है, उसी प्रकार ये आत्मदेव कलात्मक शरीरमें असंगभावसे स्थित हैं । वे ही क्षेत्रज्ञ हैं, आप उन्हें जानिये । वे योगसे अपने मन और बुद्धिपर अधिकार प्राप्त करनेवाले तथा नित्य हैं ॥ २० ॥
जीवात्मकानि जानीहि रजः सत्त्वं तमस्तथा ।
जीवमात्मगुणं विद्धि तथाऽऽत्मानं परात्मकम् ॥ २१ ॥
ब्रह्मन्! आप यह जान लें कि सत्त्वगुण (प्रकाश), रजोगुण (प्रवृत्ति ) और तमोगुण ( मोह ) —ये जीवात्मक हैं; अर्थात् जीवात्माके अन्तःकरणके विकार हैं, जीव आत्माका गुण ( सेवक ) है और आत्मा परमात्मस्वरूप है । भाव यह कि परमात्माको ही यहाँ आत्मा कहा गया है ॥ २१ ॥
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अचेतनं जीवगुणं वदन्ति स चेष्टते चेष्टयते च सर्वम् । ततः परं क्षेत्रविदो वदन्ति प्राकल्पयद् यो भुवनानि सप्त ॥ २२ ॥
शरीर- तत्त्वके ज्ञाता महात्मा पुरुष जड शरीर आदिको जीवका भोग्य बताते हैं । वह जीव शरीरके भीतर रहकर स्वयं चेष्टाशील होता है तथा शरीर और इन्द्रिय आदि सबको चेष्टाओंमें लगाता है । जिन्होंने सातों भुवनोंका निर्माण किया है, उन परमात्माको ज्ञानी पुरुष जीवात्मासे उत्कृष्ट बताते हैं ॥ २२ ॥
एवं सर्वेषु भूतेषु भूतात्मा सम्प्रकाशते ।
दृश्यते त्वग्रयया बुद्धया सूक्ष्मया ज्ञानवेदिभिः ॥ २३ ॥
इस प्रकार सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा परमेश्वर समस्त प्राणियोंके भीतर प्रकाशित हो रहे हैं । ज्ञानी महात्मा अपनी श्रेष्ठ एवं सूक्ष्म बुद्धिके द्वारा उन्हें देख पाते हैं ॥ २३ ॥
चित्तस्य हि प्रसादेन हन्ति कर्म शुभाशुभम् ।
प्रसन्नात्माऽऽत्मनि स्थित्वा सुखमानन्त्यमश्नुते ॥ २४ ॥
मनुष्य अपने चित्तकी पवित्रताके द्वारा ही समस्त शुभाशुभ कर्मोंको नष्ट (फल देनेमें असमर्थ) कर देता है । जिसका अन्तःकरण प्रसन्न ( पवित्र) है, वह अपने - आपमें ही स्थित होकर अक्षय सुख ( मोक्ष ) -का भागी होता है ॥ २४ ॥
लक्षणं तु प्रसादस्य यथा तृप्तः सुखं स्वपेत् ।
निवाते वा यथा दीपो दीप्येत् कुशलदीपितः ॥ २५ ॥
जैसे भोजन आदिसे तृप्त हुआ मनुष्य सुखसे सोता है और जैसे वायुरहित स्थानमें चतुर मनुष्यके द्वारा जलाया हुआ दीप निश्चलभावसे प्रकाशित होता है; ऐसा ही लक्षण चित्तकी पवित्रताका भी है ॥ २५ ॥
पूर्वरात्रे परे चैव युञ्जानः सततं मनः ।
लघ्वाहारो विशुद्धात्मा पश्यन्नात्मानमात्मनि ॥ २६ ॥
प्रदीप्तेनेव दीपेन मनोदीपेन पश्यति ।
दृष्ट्वाऽऽत्मानं निरात्मानं स तदा विप्रमुच्यते ॥ २७ ॥
मनुष्यको चाहिये कि वह हलका भोजन करे और अन्तःकरणको शुद्ध रखे । रातके पहले और पिछले पहरमें सदा अपना मन परमात्माके चिन्तनमें लगावे । जो इस प्रकार निरन्तर अपने हृदयमें परमात्माके साक्षात्कारका अभ्यास करता है, वह प्रज्वलित दीपकके समान प्रकाशित होनेवाले अपने मनोमय प्रदीपके द्वारा निराकार परमेश्वरका साक्षात्कार करके तत्काल मुक्त हो जाता है ॥ २६-२७ ॥
सर्वोपायैस्तु लोभस्य क्रोधस्य च विनिग्रहः ।
एतत् पवित्रं लोकानां तपो वै संक्रमो मतः ॥ २८ ॥