02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 1491–1500
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1491–1500
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पञ्चदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः धर्मव्याधका कौशिक ब्राह्मणको माता - पिताकी सेवाका उपदेश देकर अपने पूर्वजन्मकी कथा कहते हुए व्याध होनेका कारण बताना मार्कण्डेय उवाच
गुरुं निवेद्य विप्राय ती मातापितरावुभौ ।
पुनरेव स धर्मात्मा व्याधो ब्राह्मणमब्रवीत् ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! इस प्रकार धर्मात्मा व्याधने कौशिक ब्राह्मणको अपने माता- पितारूप दोनों गुरुजनोंका दर्शन कराकर पुनः उससे इस प्रकार कहा ॥ १ ॥
प्रवृत्तचक्षुर्जातोऽस्मि सम्पश्य तपसो बलम् ।
यदर्थमुक्तोऽसि तया गच्छ त्वं मिथिलामिति ॥ २ ॥
पतिशुश्रूषपरया दान्तया सत्यशीलया ।
मिथिलायां वसेद् व्याधः स ते धर्मान् प्रवक्ष्यति ॥ ३ ॥
‘ ब्राह्मण! ' माता - पिताकी सेवा ही मेरी तपस्या है । इस तपस्याका प्रभाव देखिये । मुझे दिव्य - दृष्टि प्राप्त हो गयी है, जिसके कारण उस पतिव्रता देवीने जो सदा पतिकी ही सेवामें संलग्न रहनेवाली, जितेन्द्रिय तथा सत्य एवं सदाचारमें तत्पर है, आपको यह कहकर यहाँ भेजा था कि ‘ आप मिथिलापुरीको जाइये । वहाँ एक व्याध रहता है । वह आपको सब धर्मोंका उपदेश करेगा ' ॥ २-३ ॥ ब्राह्मणउवाच
पतिव्रतायाः सत्यायाः शीलाढ्याया यतव्रत ।
संस्मृत्य वाक्यं धर्मज्ञ गुणवानसि मे मतः ॥ ४ ॥
ब्राह्मण बोला - उत्तम व्रतका पालन करनेवाले धर्मज्ञ व्याध! उस सत्यपरायणा और सुशीला पतिव्रता- देवीके वचनोंका स्मरण करके मुझे यह दृढ़ विश्वास हो गया है कि तुम उत्तम गुणोंसे सम्पन्न हो ॥ ४ ॥
व्याधउवाच
यत् तदा त्वं द्विजश्रेष्ठ तयोक्तो मां प्रति प्रभो ।
दृष्टमेव तया सम्यगेकपत्न्या न संशयः ॥ ५ ॥
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धर्मव्याधने कहा –द्विजश्रेष्ठ! प्रभो! उस पतिव्रता देवीने पहले आपसे मेरे विषयमें जो कुछ कहा है, वह सब ठीक है । इसमें संदेह नहीं कि उसने पातिव्रत्यके प्रभावसे सब कुछ प्रत्यक्ष देखा है ॥ ५ ॥
त्वदनुग्रहबुद्धया तु विप्रैतद् दर्शितं मया ।
वाक्यं च शृणु मे तात यत् ते वक्ष्ये हितं द्विज ॥ ६ ॥
विप्रवर! आपपर अनुग्रह करनेके विचारसे ही मैंने ये सब बातें आपके सामने रखी हैं । तात! आप मेरी बात सुनिये । ब्रह्मन्! आपके लिये जो हितकर है वही बात बताऊँगा ॥ ६ ॥
त्वया विनिकृता माता पिता च द्विजसत्तम ।
अनिसृष्टोऽसि निष्क्रान्तो गृहात् ताभ्यामनिन्दित ॥ ७ ॥
वेदोच्चारणकार्यार्थमयुक्तं तत् त्वया कृतम् ।
तव शोकेन वृद्धौ तावन्धीभूतौ तपस्विनौ ॥ ८ ॥
द्विजश्रेष्ठ! आपने माता-T- पिताकी उपेक्षा की है । वेदाध्ययन करनेके लिये उन दोनोंकी आज्ञा लिये बिना ही आप घरसे निकल पड़े हैं । अनिन्द्य ब्राह्मण! यह आपके द्वारा अनुचित कार्य हुआ है । आपके शोकसे ये दोनों बूढ़े एवं तपस्वी माता - पिता अन्धे हो गये हैं ॥
तौ प्रसादयितुं गच्छ मा त्वां धर्मोऽत्यगादयम् ।
तपस्वी त्वं महात्मा च धर्मे च निरतः सदा ॥ ९ ॥
आप उन्हें प्रसन्न करनेके लिये घर जाइये । ऐसा करनेसे आपका धर्म नष्ट नहीं होगा ।
आप तपस्वी, महात्मा तथा निरन्तर धर्ममें तत्पर रहनेवाले हैं ॥ ९ ॥
सर्वमेतदपार्थं ते क्षिप्रं तौ सम्प्रसादय ।
श्रद्दधस्व मम ब्रह्मन् नान्यथा कर्तुमर्हसि ।
गम्यतामद्य विप्रर्षे श्रेयस्ते कथयाम्यहम् ॥ १० ॥
परंतु माता - पिताको संतुष्ट न करनेके कारण आपका यह सारा धर्म और व्रत व्यर्थ हो गया है । अतः शीघ्र जाकर उन दोनोंको प्रसन्न कीजिये । ब्रह्मन्! मेरी बातपर श्रद्धा कीजिये । इसके विपरीत कुछ न कीजिये । ब्रह्मर्षे! आप अपने घर जाइये और माता - पिताकी सेवा कीजिये । यह मैं आपके लिये परम कल्याणकी बात बता रहा हूँ ॥ १० ॥
ब्राह्मणउवाच
यदेतदुक्तं भवता सर्वं सत्यमसंशयम् ।
प्रीतोऽस्मि तव भद्रं ते धर्माचारगुणान्वित ॥ ११ ॥
ब्राह्मण बोला — धर्म, सदाचार और सद्गुणोंसे सम्पन्न व्याध! आपका भला हो ।
आपनेयह जो कुछ बताया है, सब निःसंदेह सत्य है । मैं आपपर बहुत प्रसन्न हूँ ॥ ११ ॥
व्याध उवाच
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दैवतप्रतिमो हि त्वं यस्त्वं धर्ममनुव्रतः ।
पुराणं शाश्वतं दिव्यं दुष्प्राप्यमकृतात्मभिः ॥ १२ ॥
धर्मव्याधने कहा – विप्रवर! आप देवताओंके समान हैं; क्योंकि आपने उस धर्ममें मन लगाया है, जो पुरातन, सनातन, दिव्य तथा मनको न जीतनेवाले पुरुषोंके लिये दुर्लभ है ॥ १२ ॥
मातापित्रोः सकाशं हि गत्वा त्वं द्विजसत्तम ।
अतन्द्रितः कुरु क्षिप्रं मातापित्रोर्हि पूजनम् ।
अतः परमहं धर्मं नान्यं पश्यामि कंचन ॥ १३ ॥
द्विजश्रेष्ठ! आप माता- पिताके पास जाकर आलस्यरहित हो शीघ्र ही उनकी सेवामें लग जाइये । मैं इससे बढ़कर और कोई धर्म नहीं देखता ॥ १३ ॥
ब्राह्मणउवाच
इहाहमागतो दिष्ट्या दिष्ट्या मे सङ्गतं त्वया ।
ईदृशा दुर्लभा लोके नरा धर्मप्रदर्शकाः ॥ १४ ॥
ब्राह्मण बोला — नरश्रेष्ठ! मेरा बड़ा भाग्य था, जो यहाँ आया और सौभाग्यसे ही मुझे आपका संग प्राप्त हो गया । संसारमें आपप--जैसे धर्मका मार्ग दिखानेवाले मनुष्य दुर्लभ हैं ॥ १४ ॥
एको नरसहस्रेषु धर्मविद् विद्यते न वा ।
प्रीतोऽस्मि तव सत्येन भद्रं ते पुरुषर्षभ ॥ १५ ॥
हजारों मनुष्योंमेंसे कोई एक भी धर्मके तत्त्वको जाननेवाला है या नहीं -यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता । पुरुषर्षभ! आपका कल्याण हो । आज मैं आपके सत्यके कारण आपपर बहुत प्रसन्न हूँ ॥ १५ ॥
पतमानोऽद्य नरके भवतास्मि समुद्धृतः भवितव्यमथैवं च यद् दृष्टोऽसि मयानघ ॥ १६ ॥
अनघ! मैं नरकमें गिर रहा था । आज आपने मेरा उद्धार कर दिया । इस प्रकार जब मुझे आपका दर्शन मिल गया, तब निश्चय ही आपके उपदेशके अनुसार भविष्यमें सब कुछ होगा ॥ १६ ॥
राजा ययातिर्दोहित्रैः पतितस्तारितो यथा ।
सद्भिः पुरुषशार्दूल तथाहं भवता द्विजः ॥ १७ ॥
राजा ययाति स्वर्गसे गिर गये थे; परंतु उनके उत्तम स्वभाववाले दौहित्रों ( पुत्रीके पुत्रों ) - ने पुनः उनका उद्धार कर दिया - वे पूर्ववत् स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित हो गये । पुरुषसिंह! इसी प्रकार आपने भी आज मुझ ब्राह्मणको नरकमें गिरनेसे बचाया है ॥ १७ ॥
मातापितृभ्यां शुश्रूषां करिष्ये वचनात् तव ।
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नाकृतात्मा वेदयति धर्माधर्मविनिश्चयम् ॥ १८ ॥
मैं आपके कहनेके अनुसार माता- पिताकी सेवा करूँगा । जिसका अन्तःकरण शुद्ध नहीं है, वह धर्म - अधर्मके निर्णयको बतला नहीं सकता ॥ १८ ॥
दुर्ज्ञेयः शाश्वतो धर्मः शूद्रयोनौ हि वर्तते ।
न त्वां शूद्रमहं मन्ये भवितव्यं हि कारणम् ॥ १ ९ ॥
आश्चर्य है कि यह सनातन धर्म, जिसके स्वरूपको समझना अत्यन्त कठिन है, शूद्रयोनिके मनुष्यमें भी विद्यमान है । मैं आपको शूद्र नहीं मानता । आपका जो शूद्रयोनिमें जन्म हो गया है, इसका कोई विशेष कारण होना चाहिये ॥ १ ९ ॥ येन कर्मविशेषेण प्राप्तेयं शूद्रता त्वया ।
एतदिच्छामि विज्ञातुं तत्त्वेन हि महामते ।
कामया ब्रूहि मे सर्वं सत्येन प्रयतात्मना ॥ २० ॥
महामते! जिस विशेष कर्मके कारण आपको यह शूद्रयोनि प्राप्त हुई है, उसे मैं यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ । आप सत्य और पवित्र अन्तःकरणके विश्वासके अनुसार स्वेच्छापूर्वक मुझे सब कुछ बताइये ॥ २० ॥
व्याध उवाच
अनतिक्रमणीया वै ब्राह्मणा मे द्विजोत्तम ।
शृणु सर्वमिदं वृत्तं पूर्वदेहे ममानघ । २१ ॥
धर्मव्याधने कहा – विप्रवर! मुझे ब्राह्मणोंका अपराध कभी नहीं करना चाहिये । अनघ! मेरे पूर्वजन्मके शरीरद्वारा जो घटना घटित हुई है, वह सब बताता हूँ, सुनिये ॥ २१ ॥
अहं हि ब्राह्मणः पूर्वमासं द्विजवरात्मजः ।
वेदाध्यायी सुकुशलो वेदाङ्गानां च पारगः ॥ २२ ॥
मैं पूर्वजन्ममें एक श्रेष्ठ ब्राह्मणका पुत्र और वेदाध्ययनपरायण ब्राह्मण था । वेदांगोंका
पारंगत विद्वान् माना जाता था । मैं विद्याध्ययनमें अत्यन्त कुशल था ॥
आत्मदोषकृतैर्ब्रह्मन्नवस्थामाप्तवानिमाम् ।
कश्चिद् राजा मम सखा धनुर्वेदपरायणः ॥ २३ ॥
संसर्गाद् धनुषि श्रेष्ठस्ततोऽहमभवं द्विज । ब्राह्मण! अपने ही दोषोंके कारण मुझे इस दुरवस्थामें आना पड़ा है । पूर्वजन्ममें जब मैं ब्राह्मण था, एक धनुर्वेद - परायण राजाके साथ मेरी मित्रता हो गयी थी । उनके संसर्गसे मैं धनुर्वेदकी शिक्षा लेने लगा और धनुष चलानेकी कलामें मैंने श्रेष्ठ योग्यता प्राप्त कर ली ॥ २३ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु मृगयां निर्गतो नृपः ॥ २४ ॥
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सहितो योधमुख्यैश्च मन्त्रिभिश्च सुसंवृतः ।
ततोऽभ्यहन् मृगांस्तत्र सुबहूनाश्रमं प्रति ॥ २५ ॥
ब्रह्मन्! इसी समय राजा अपने मन्त्रियों तथा प्रधान योद्धाओंके साथ शिकार खेलनेके लिये निकले । उन्होंने एक ऋषिके आश्रमके निकट बहुत- से हिंसक पशुओंका वध किया ॥ २४-२५ ॥
अथ क्षिप्तः शरो घोरो मयापि द्विजसत्तम ।
ताडितश्च ऋषिस्तेन शरेणानतपर्वणा ॥ २६ ॥
द्विजश्रेष्ठ! तदनन्तर मैंने भी एक भयानक बाण छोड़ा । उसकी गाँठ कुछ झुकी हुई थी ।
उस बाणसे एक ऋषि मारे गये ॥ २६ ॥
भूमौ निपतितो ब्रह्मन्नुवाच प्रतिनादयन् ।
नापराध्याम्यहं किंचित् केन पापमिदं कृतम् ॥ २७ ॥
ब्रह्मन्! बाण लगते ही वे मुनि पृथिवीपर गिर पड़े और अपने आर्तनादसे उस वन्य प्रदेशको गुँजाते हुए बोले, ' आह! मैं तो किसीका कोई अपराध नहीं करता हूँ । फिर किसने यह पापकर्म कर डाला? ' ॥ २७ ॥
मन्वानस्तं मृगं चाहं सम्प्राप्तः सहसा प्रभो ।
अपश्यं तमृषिं विद्धं शरेणानतपर्वणा ॥ २८ ॥
प्रभो! मैंने उन्हें हिंसक पशु समझकर बाण मारा था । अतः सहसा उनके पास जा पहुँचा । वहाँ जाकर देखा कि झुकी हुई गाँठवाले उस बाणसे एक ऋषि घायल होकर धरतीपर पड़े हैं ॥ २८ ॥
अकार्यकरणाच्चापि भृशं मे व्यथितं मनः ।
तमुग्रतपसं विप्रं निष्टनन्तं महीतले ॥ २ ९ ॥
यह न करनेयोग्य पाप कर डालनेके कारण मेरे मनमें उस समय बड़ी पीड़ा हुई । वे उग्र तपस्वी ब्राह्मण उस समय धरतीपर पड़े - पड़े कराह रहे थे ॥ २ ९ ॥
अजानता कृतमिदं मयेत्यहमथाब्रुवम् ।
क्षन्तुमर्हसि मे सर्वमिति चोक्तो मया मुनिः ॥ ३० ॥
मैंने साहस करके उन मुनीश्वरसे कहा- ' भगवन्! अनजानमें मेरे द्वारा यह अपराध बन गया है । अतः आप यह सब क्षमा कर दें ' ॥ ३० ॥
ततः प्रत्यब्रवीद् वाक्यमृषिर्मां क्रोधमूर्च्छितः ।
व्याधस्त्वं भविता क्रूर शूद्रयोनाविति द्विज ॥ ३१ ॥
मेरी बात सुनकर ऋषि क्रोधसे व्याकुल हो गये और उत्तर देते हुए बोले — ' निर्दयी ब्राह्मण! तू शूद्रयोनिमें जन्म लेकर व्याध होगा' ॥ ३१ ॥
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे पञ्चदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१५ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमेंब्राह्मण- व्याधसंवादविषयक दो सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१५ ॥
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षोडशाधिकद्विशततमोऽध्यायः कौशिक - धर्मव्याध - संवादका उपसंहार तथा कौशिकका अपने घरको प्रस्थान व्याध उवाच
एवं शप्तोऽहमृषिणा तदा द्विजवरोत्तम ।
अभिप्रसादयमृषिं गिरा त्राहीति मां तदा ॥ १ ॥
अजानता मयाकार्यमिदमद्य कृतं मुने ।
क्षन्तुमर्हसि तत् सर्वं प्रसीद भगवन्निति ॥ २ ॥
धर्मव्याध कहता है- विप्रवर! जब इस प्रकार ऋषिने मुझे शाप दे दिया, तब मैंने कहा— ' भगवन्! मेरी रक्षा कीजिये -मुझे उबारिये । मुने! मैंने अनजानमें यह आज अनुचित काम कर डाला है । मेरा सब अपराध क्षमा कीजिये और मुझपर प्रसन्न हो जाइये । ’ ऐसा कहकर उन्हें प्रसन्न करनेकी चेष्टा की ॥ १-२ ॥ ऋषिरुवाच
नान्यथा भविता शाप एवमेतदसंशयम् ।
आनृशंस्यात् त्वहं किञ्चित् कर्तानुग्रहमद्य ते ॥ ३ ॥
ऋषिने कहा — यह शाप टल नहीं सकता । ऐसा होकर ही रहेगा, इसमें संशय नहीं है ।
परंतु मेरा स्वभाव क्रूर नहीं है, इसलिये मैं तुझपर आज कुछ अनुग्रह करता हूँ ॥ ३ ॥
शूद्रयोन्यां वर्तमानो धर्मज्ञो हि भविष्यसि ।
मातापित्रोश्च शुश्रूषां करिष्यसि न संशयः ॥ ४ ॥
तू शूद्रयोनिमें रहकर धर्मज्ञ होगा और माता - पिताकी सेवा करेगा । इसमें तनिक भी संदेहके लिये स्थान नहीं है ॥ ४ ॥
तया शुश्रूषया सिद्धिं महत्त्वं समवाप्स्यसि ।
जातिस्मरश्च भविता स्वर्गं चैव गमिष्यसि ॥ ५ ॥
उस सेवासे तुझे सिद्धि और महत्ता प्राप्त होगी । तू पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण रखनेवाला होगा और अन्तमें स्वर्गलोकमें जायगा ॥ ५ ॥
शापक्षये तु निर्वृत्ते भवितासि पुनर्द्विजः ।
एवं शप्तः पुरा तेन ऋषिणास्म्युग्रतेजसा ॥ ६ ॥
शापका निवारण हो जानेपर तू फिर ब्राह्मण होगा । इस प्रकार उन उग्र तेजस्वी महर्षिने पूर्वकालमें मुझे शाप दिया था ॥ ६ ॥
प्रसादश्च कृतस्तेन ममैव द्विपदां वर ।
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शरं चोद्धृतवानस्मि तस्य वै द्विजसत्तम ॥ ७ ॥
आश्रमं च मया नीतो न च प्राणैर्व्ययुज्यत । नरश्रेष्ठ! फिर उन्होंने ही मेरे ऊपर अनुग्रह किया । द्विजश्रेष्ठ! तदनन्तर मैंने उनके शरीरसे बाण निकाला और उन्हें उनके आश्रमपर पहुँचा दिया । परंतु उनके प्राण नहीं गये ॥ ७३ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं यथा मम पुराभवत् ॥ ८ ॥
अभितश्चापि गन्तव्यं मया स्वर्गं द्विजोत्तम ॥ ९ ॥
विप्रवर! पूर्वजन्ममें मेरे ऊपर जो कुछ बीता था, वह सब मैंने आपसे कह सुनाया । अब इस जीवनके पश्चात् मुझे स्वर्गलोकमें जाना है ॥ ८ - ९ ॥ ब्राह्मणउवाच
एवमेतानि पुरुषा दुःखानि च सुखानि च ।
आप्नुवन्ति महाबुद्धे नोत्कण्ठां कर्तुमर्हसि ॥ १० ॥
ब्राह्मण बोला — महामते! मनुष्य इसी प्रकार दुःख और सुख पाते रहते हैं । इसके लिये आपको चिन्ता नहीं करनी चाहिये ॥ १० ॥
दुष्करं हि कृतं कर्म जानता जातिमात्मनः ।
लोकवृत्तान्ततत्त्वज्ञ नित्यं धर्मपरायणः ॥ ११ ॥
जिसके फलस्वरूप आपको अपने पूर्वजन्मकी बातोंका ज्ञान बना हुआ है, वह पिता-माताकी सेवारूप कर्म दूसरोंके लिये दुष्कर है; किंतु आपने उसे सम्पन्न कर लिया है । आप लोकवृत्तान्तका तत्त्व जानते हैं और सदा धर्ममें तत्पर रहते हैं ॥ ११ ॥
कर्मदोषश्च वै विद्वन्नात्मजातिकृतेन ते ।
कञ्चित् कालमुष्यतां वै ततोऽसि भविता द्विजः ॥ १२ ॥
विद्वन्! आपको जो यह कर्मदोष ( दूषित कर्म ) प्राप्त हुआ है, वह आपके पूर्वजन्मके कर्मका फल है । इस जन्मके नहीं । अतः कुछ कालतक और इसी रूपमें रहें । फिर आप ब्राह्मण हो जायँगे ॥ १२ ॥
साम्प्रतं च मतो मेऽसि ब्राह्मणो नात्र संशयः ।
ब्राह्मणः पतनीयेषु वर्तमानो विकर्मसु ॥ १३ ॥
दाम्भिको दुष्कृतः प्रायः शूद्रेण सदृशो भवेत् । मैं तो अभी आपको ब्राह्मण मानता हूँ । आपके ब्राह्मण होनेमें संदेह नहीं है । जो ब्राह्मण होकर भी पतनके गर्तमें गिरानेवाले पापकर्मोंमें फँसा हुआ है और प्रायः दुष्कर्मपरायण तथा पाखंडी है, वह शूद्रके समान है ॥ १३३ ॥
यस्तु शूद्रो दमे सत्ये धर्मे च सततोत्थितः ॥ १४ ॥
तं ब्राह्मणमहं मन्ये वृत्तेन हि भवेद् द्विजः ।
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इसके विपरीत जो शूद्र होकर भी ( शम ) दम, सत्य तथा धर्मका पालन करनेके लिये सदा उद्यत रहता है, उसे मैं ब्राह्मण ही मानता हूँ; क्योंकि मनुष्य सदाचारसे ही द्विज होता है ॥ १४३ ॥
कर्मदोषेण विषमां गतिमाप्नोति दारुणाम् ॥ १५ ॥
क्षीणदोषमहं मन्ये चाभितस्त्वां नरोत्तम । कर्मदोषसे ही मनुष्य विषम एवं भयंकर दुर्गतिमें पड़ जाता है । परंतु नरश्रेष्ठ! मैं तो समझता हूँ कि आपके सारे कर्मदोष सर्वथा नष्ट हो गये हैं ॥ १५३ ॥
कर्तुमर्हसि नोत्कण्ठां त्वद्विधा ह्यविषादिनः ।
लोकवृत्तानुवृत्तज्ञा नित्यं धर्मपरायणाः ॥ १६ ॥
अतः आपको अपने विषयमें किसी प्रकारकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये । आपके जैसे ज्ञानी पुरुष, जो लोकवृत्तान्तके अनुवर्तनका रहस्य जाननेवाले तथा नित्य धर्मपरायण हैं, कभी विषादग्रस्त नहीं होते हैं ॥ १६ ॥
व्याधउवाच
प्रज्ञया मानसं दुःखं हन्याच्छारीरमौषधैः ।
एतद् विज्ञानसामर्थ्यं न बालैः समतामियात् ॥ १७ ॥
धर्मव्याधने कहा —ज्ञानी पुरुष शारीरिक कष्टका औषधसेवनद्वारा नाश करे और विवेकशील बुद्धिद्वारा मानसिक दुःखको नष्ट करे । यही ज्ञानकी शक्ति है। बुद्धिमान् मनुष्यको बालकोंके समान शोक या विलाप नहीं करना चाहिये ॥ १७ ॥
अनिष्टसम्प्रयोगाच्च विप्रयोगात् प्रियस्य च ।
मनुष्या मानसैर्दुःखैर्युज्यन्ते चाल्पबुद्धयः ॥ १८ ॥
मन्दबुद्धि मनुष्य ही अप्रिय वस्तुके संयोग और प्रिय वस्तुके वियोगमें मानसिक दुःखसे दुःखी होते हैं ॥ १८ ॥
गुणैर्भूतानि युज्यन्ते वियुज्यन्ते तथैव च ।
सर्वाणि नैतदेकस्य शोकस्थानं हि विद्यते ॥ १ ९ ॥
सभी प्राणी तीनों गुणोंके कार्यभूत विभिन्न वस्तु आदिसे जिस प्रकार संयुक्त होते हैं, वैसे ही वियुक्त भी होते रहते हैं । अतः किसी एकका संयोग और किसी एकका वियोग वास्तवमें शोकका कारण नहीं है ॥ १ ९ ॥
अनिष्टं चान्वितं पश्यंस्तथा क्षिप्रं विरज्यते ।
ततश्च प्रतिकुर्वन्ति यदि पश्यन्त्युपक्रमात् ॥ २० ॥
यदि किसी कार्यमें अनिष्टका संयोग दिखायी देता है तो मनुष्य शीघ्र ही उससे निवृत्त हो जाता है । और यदि आरम्भ होनेसे पहले ही उस अनिष्टका पता लग जाता है तो लोग उसके प्रतीकारका उपाय करने लगते हैं ॥ २० ॥
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शोचतो न भवेत् किंचित् केवलं परितप्यते ।
परित्यजन्ति ये दुःखं सुखं वाप्युभयं नराः ॥ २१ ॥
त एव सुखमेधन्ते ज्ञानतृप्ता मनीषिणः ।
असंतोषपरा मूढाः संतोषं यान्ति पण्डिताः ॥ २२ ॥
केवल शोक करनेसे कुछ नहीं होता, संतापमात्र ही हाथ लगता है। जो ज्ञानतृप्त मनीषी मानव सुख और दुःख दोनोंका परित्याग कर देते हैं, वे ही सुखी होते हैं । मूढ़ मनुष्य असंतोषी होते हैं और ज्ञानवानोंको संतोष प्राप्त होता है ॥ २१-२२ ॥
असंतोषस्य नास्त्यन्तस्तुष्टिस्तु परमं सुखम् ।
न शोचन्ति गताध्वानः पश्यन्तः परमां गतिम् ॥ २३ ॥
असंतोषका अन्त नहीं है, अतः संतोष ही परम सुख है । जिन्होंने ज्ञानमार्गको पार करके परमात्माका साक्षात्कार कर लिया है, वे कभी शोकमें नहीं पड़ते हैं ॥
न विषादे मनः कार्यं विषादो विषमुत्तमम् ।
मारयत्यकृतप्रज्ञं बालं क्रुद्ध इवोरगः ॥ २४ ॥
मनको विषादकी ओर न जाने दे । विषाद उग्र विष है । वह क्रोधमें भरे हुए सर्पकी भाँति विवेकहीन अज्ञानी मनुष्यको मार डालता है ॥ २४ ॥
यं विषादोऽभिभवति विक्रमे समुपस्थिते ।
तेजसा तस्य हीनस्य पुरुषार्थो न विद्यते ॥ २५ ॥
पराक्रमका अवसर उपस्थित होनेपर जिसे विषाद घेर लेता है, उस तेजोहीन पुरुषका कोई पुरुषार्थ सिद्ध नहीं होता ॥ २५ ॥
अवश्यं क्रियमाणस्य कर्मणो दृश्यते फलम् ।
न हि निर्वेदमागम्य किंचित् प्राप्नोति शोभनम् ॥ २६ ॥
किये जानेवाले कर्मका फल अवश्य दृष्टिगोचर होता है । केवल खिन्न होकर बैठ रहनेसे कोई अच्छा परिणाम हाथ नहीं लगता ॥ २६ ॥
अथाप्युपायं पश्येत दुःखस्य परिमोक्षणे ।
अशोचन्नारभेतैवं मुक्तश्चाव्यसनी भवेत् ॥ २७ ॥
अतः दुःखसे छूटनेके उपायको अवश्य देखे । शोक और विषादमें न पड़कर आवश्यक कार्य आरम्भ कर दे । इस प्रकार प्रयत्न करनेसे मनुष्य निश्चय ही दुःखसे छूट जाता है और फिर किसी संकट या व्यसनमें नहीं फँसता ॥ २७ ॥
भूतेष्वभावं संचिन्त्य ये तु बुद्धेः परं गताः ।
न शोचन्ति कृतप्रज्ञाः पश्यन्तः परमां गतिम् ॥ २८ ॥
संसारके सभी पदार्थ अनित्य हैं, ऐसा सोचकर जो बुद्धिसे पार होकर परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो गये हैं वे ज्ञानी महापुरुष परमात्माका साक्षात्कार करते हुए कभी शोकमें नहीं पड़ते ॥ २८ ॥