श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1501–1510
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1501–1510
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न शोचामि च वै विद्वन् कालाकाङ्क्षी स्थितो ह्यहम् ।
एतैर्निदर्शनैर्ब्रह्मन् नावसीदामि सत्तम ॥ २ ९ ॥
विद्वन्! मैं अन्तकालकी प्रतीक्षा करता हूँ । अतः कभी शोकमग्न नहीं होता । सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण! उपर्युक्त विचारोंका मनन करते रहने से मुझे कभी दुःख या अनुत्साह नहीं होता ॥ २ ९ ॥ ब्राह्मणउवाच
कृतप्रज्ञोऽसि मेधावी बुद्धिर्हि विपुला तव ।
नाहं भवन्तं शोचामि ज्ञानतृप्तोऽसि धर्मवित् ॥ ३० ॥
ब्राह्मण बोला— धर्मव्याध! आप ज्ञानी और बुद्धिमान् हैं । आपकी बुद्धि विशाल है । आप धर्मके तत्त्वको जानते हैं और ज्ञानानन्दसे तृप्त रहते हैं । अतः मैं आपके लिये शोक नहीं करता ॥ ३० ॥
आपृच्छे त्वां स्वस्ति तेऽस्तु धर्मस्त्वां परिरक्षतु ।
अप्रमादस्तु कर्तव्यो धर्मे धर्मभृतां वर ॥ ३१ ॥
अब मैं जानेके लिये आपकी अनुमति चाहता हूँ । आपका कल्याण हो और धर्म सदा आपकी रक्षा करे । धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ व्याध! आप धर्माचरणमें कभी प्रमाद न करें ॥ ३१ ॥
मार्कण्डेय उवाच
बाढमित्येव तं व्याधः कृताञ्जलिरुवाच ह ।
प्रदक्षिणमथो कृत्वा प्रस्थितो द्विजसत्तमः ॥ ३२ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं- युधिष्ठिर! कौशिक ब्राह्मणकी बात सुनकर धर्मव्याधने हाथ जोड़कर कहा – ' बहुत अच्छा! अब आप अपने घरको पधारें । ' तदनन्तर विप्रवर कौशिक धर्मव्याधकी परिक्रमा करके वहाँसे चल दिया ॥ ३२ ॥
स तु गत्वा द्विजः सर्वां शुश्रूषां कृतवांस्तदा ।
मातापितृभ्यां वृद्धाभ्यां यथान्यायं सुशंसितः ॥ ३३ ॥
घर जाकर उस ब्राह्मणने अपने माता -पिताकी सब प्रकारकी सेवा- शुश्रूषा की और उन बूढ़े माता- पिताने प्रसन्न होकर उसकी यथायोग्य प्रशंसा की ॥ ३३ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं निखिलेन युधिष्ठिर ।
पृष्टवानसि यं तात धर्मं धर्मभृतां वर ॥ ३४ ॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तात युधिष्ठिर! तुमने जो प्रश्न किया था, उसके अनुसार मैंने ये सब बातें कह सुनायीं ॥
पतिव्रताया माहात्म्यं ब्राह्मणस्य च सत्तम ।
मातापित्रोश्च शुश्रूषा धर्मव्याधेन कीर्तिता ॥ ३५ ॥
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साधुश्रेष्ठ! पतिव्रताका माहात्म्य और धर्मव्याधके द्वारा ब्राह्मणसे कही हुई माता-पिताकी सेवा आदिकी बातें बता दीं ॥ ३५ ॥
युधिष्ठिरउवाच
अत्यद्भुतमिदं ब्रह्मन् धर्माख्यानमनुत्तमम् ।
सर्वधर्मविदां श्रेष्ठ कथितं मुनिसत्तम ॥ ३६ ॥
युधिष्ठिर बोले — ब्रह्मन्! आपने धर्मके विषयमें यह अत्यन्त अद्भुत और उत्तम उपाख्यान सुनाया है । मुनिवर! आप समस्त धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ हैं ॥ ३६ ॥
सुखश्रव्यतया विद्वन् मुहूर्त इव मे गतः ।
न हि तृप्तोऽस्मि भगवन् शृण्वानो धर्ममुत्तमम् ॥ ३७ ॥
विद्वन! यह कथा सुननेमें इतनी सुखद थी कि मेरा बहुत-सा समय भी दो घड़ीके समान बीत गया । भगवन्! आपके मुखसे यह धर्मकी उत्तम कथा सुनते - सुनते मुझे तृप्ति ही नहीं हो रही है ॥ ३७ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे षोडशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१६ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें ब्राह्मण- व्याधसंवादविषयक दो सौ सोलहवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २१६ ॥
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सप्तदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः अग्निका अंगिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार करना तथा अंगिरासे बृहस्पतिकी उत्पत्ति वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वेमां धर्मसंयुक्तां धर्मराजः कथां शुभाम् ।
पुनः पप्रच्छ तमृषिं मार्कण्डेयमिदं तदा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! यह धर्मयुक्त शुभ कथा सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने उन मार्कण्डेयमुनिसे पुनः इस प्रकार प्रश्न किया ॥ १ ॥
युधिष्ठिरउवाच
कथमग्निर्वनं यातः कथं चाप्यङ्गिराः पुरा ।
नष्टेऽग्नौ हव्यमवहदग्निर्भूत्वा महाद्युतिः ॥ २ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- मुने! पूर्वकालमें अग्निदेवने किस कारणसे जलमें प्रवेश किया था? और अग्निके अदृश्य हो जानेपर महातेजस्वी अंगिरा ऋषिने किस प्रकार अग्नि होकर देवताओंके लिये हविष्य पहुँचानेका कार्य किया? ॥ २ ॥
अग्निर्यदा त्वेक एव बहुत्वं चास्य कर्मसु ।
दृश्यते भगवन् सर्वमेतदिच्छामि वेदितुम् ॥ ३ ॥
भगवन्! जब अग्निदेव एक ही हैं, तब विभिन्न कर्मोंमें उनके अनेक रूप क्यों दिखायी देते हैं? मैं यह सब कुछ जानना चाहता हूँ ॥ ३ ॥
कुमारश्च यथोत्पन्नो यथा चाग्नेः सुतोऽभवत् ।
यथा रुद्राच्च सम्भूतो गङ्गायां कृत्तिकासु च ॥ ४ ॥
कुमार कार्तिकेयकी उत्पत्ति कैसे हुई? वे अग्निके पुत्र कैसे हुए? भगवान् शंकरने तथा गंगादेवी और कृत्तिकाओंसे उनका जन्म कैसे सम्भव हुआ? ॥ ४ ॥
एतदिच्छाम्यहं त्वत्तः श्रीतुं भार्गवसत्तम ।
कौतूहलसमाविष्टो याथातथ्यं महामुने ॥ ५ ॥
भृगुकुलतिलक महामुने! मैं आपके मुखसे यह सब वृत्तान्त यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ, इसके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है ॥ ५ ॥
मार्कण्डेय उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
यथा क्रुद्धो हुतवहस्तपस्तप्तुं वनं गतः ॥ ६ ॥
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मार्कण्डेयजीने कहा- राजन्! इस विषयमें जानकार लोग उस प्राचीन इतिहासको दुहराया करते हैं, जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि किस प्रकार अग्निदेव कुपित हो तपस्याके लिये जलमें प्रविष्ट हुए थे? ॥ ६ ॥
यथा च भगवानग्निः स्वयमेवाङ्गिराऽभवत् ।
संतापयंश्च प्रभया नाशयंस्तिमिराणि च ॥ ७ ॥
कैसे स्वयं महर्षि अंगिरा ही भगवान् अग्नि बन गये और अपनी प्रभासे अन्धकारका निवारण करते हुए जगत्को ताप देने लगे? ॥ ७ ॥
पुराङ्गिरा महाबाहो चचार तप उत्तमम् ।
आश्रमस्थो महाभागो हव्यवाहं विशेषयन् ।
तथा स भूत्वा तु तदा जगत् सर्वं व्यकाशयत् ॥ ८ ॥
महाबाहो! प्राचीन कालकी बात है, महाभाग अंगिरा ऋषि अपने आश्रममें ही रहकर उत्तम तपस्या करने लगे । वे अग्निसे भी अधिक तेजस्वी होनेके लिये यत्नशील थे । अपने उद्देश्यमें सफल होकर वे सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करने लगे ॥ ८ ॥
तपश्चरंस्तु हुतभुक् संतप्तस्तस्य तेजसा ।
भृशं ग्लानश्च तेजस्वी न च किंचित् प्रजज्ञिवान् ॥ ९ ॥
उन्हीं दिनों अग्निदेव भी तपस्या कर रहे थे । वे तेजस्वी होकर भी अंगिराके तेजसे संतप्त हो अत्यन्त मलिन पड़ गये । परंतु इसका कारण क्या है? यह कुछ भी उनकी समझमें नहीं आया ॥ ९ ॥
अथ संचिन्तयामास भगवान् हव्यवाहनः ।
अन्योऽग्निरिह लोकानां ब्रह्मणा सम्प्रकल्पितः ॥ १० ॥
तब भगवान् अग्निने यह सोचा- ' हो न हो, ब्रह्माजीने इस जगत् के लिये किसी दूसरे अग्निदेवताका निर्माण कर लिया है ' ॥ १० ॥
अग्नित्वं विप्रणष्टं हि तप्यमानस्य मे तपः ।
कथमग्निः पुनरहं भवेयमिति चिन्त्य सः ॥ ११ ॥
अपश्यदग्निवल्लोकांस्तापयन्तं महामुनिम् । ‘ जान पड़ता है, तपस्यामें लग जानेसे मेरा अग्नित्व नष्ट हो गया । अब मैं पुनः किस प्रकार अग्नि हो सकता हूँ? ' यह विचार करते हुए उन्होंने देखा कि महामुनि अंगिरा अग्निकी ही भाँति प्रकाशित हो सम्पूर्ण जगत्को ताप दे रहे ॥ ११३ ॥
सोपासर्पच्छनैर्भीतस्तमुवाच तदाङ्गिराः ॥ १२ ॥
शीघ्रमेव भवस्वाग्निस्त्वं पुनर्लोकभावनः ।
विज्ञातश्चासि लोकेषु त्रिषु संस्थानचारिषु ॥ १३ ॥
यह देख वे डरते - डरते धीरेसे उनके पास गये । उस समय उनसे अंगिरा मुनिने कहा – ' देव! आप पुनः शीघ्र ही लोकभावन अग्निके पदपर प्रतिष्ठित हो जाइये; क्योंकि तीनों
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लोकों तथा स्थावर- जंगम प्राणियोंमें आपकी प्रसिद्धि है ॥ १२-१३ ॥
त्वमग्निः प्रथमं सृष्टो ब्रह्मणा तिमिरापहः ।
स्वस्थानं प्रतिपद्यस्व शीघ्रमेव तमोनुद ॥ १४ ॥
'ब्रह्माजीने आपको ही अन्धकारनाशक प्रथम अग्निके रूपमें उत्पन्न किया है ।
तिमिरपुञ्जको दूर भगानेवाले देवता! आप शीघ्र ही अपना स्थान ग्रहण कीजिये ' ॥ १४ ॥
अग्निरुवाच
नष्टकीर्तिरहं लोके भवान् जातो हुताशनः ।
भवन्तमेव ज्ञास्यन्ति पावकं न तु मां जनाः ॥ १५ ॥
अग्निदेव बोले — मुने! संसारमें मेरी कीर्ति नष्ट हो गयी है । अब आप ही अग्निके पदपर प्रतिष्ठित हैं । आपको ही लोग अग्नि समझेंगे, आपके सामने मुझे कोई अग्नि नहीं मानेगा ॥ १५ ॥
निक्षिपाम्यहमग्नित्वं त्वमग्निः प्रथमो भव ।
भविष्यामि द्वितीयोऽहें प्राजापत्यक एव च ॥ १६ ॥
मैं अपना अग्नित्व आपमें ही रख देता हूँ, आप ही प्रथम अग्निके पदपर प्रतिष्ठित होइये । मैं द्वितीय प्राजापत्य नामक अग्नि होऊँगा ॥ १६ ॥
अंगिरा उवाच
कुरु पुण्यं प्रजास्वर्ग्यं भवाग्निस्तिमिरापहः ।
मां च देव कुरुष्वाग्ने प्रथमं पुत्रमञ्जसा ॥ १७ ॥
अङ्गिराने कहा — अग्निदेव! आप प्रजाको स्वर्गलोककी प्राप्ति करानेवाला पुण्यकर्म ( देवताओंके पास हविष्य पहुँचानेका कार्य ) सम्पन्न कीजिये और स्वयं ही अन्धकारनिवारक अग्निपदपर प्रतिष्ठित होइये; साथ ही मुझे अपना पहला पुत्र स्वीकार कर लीजिये ॥ १७ ॥
मार्कण्डेय उवाच
तच्छ्रुत्वाङ्गिरसो वाक्यं जातवेदास्तथाकरोत् ।
राजन् बृहस्पतिर्नाम तस्याप्यङ्गिरसः सुतः ॥ १८ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! अंगिराका यह वचन सुनकर अग्निदेवने वैसा ही किया। उन्हें अपना प्रथम पुत्र मान लिया । फिर अंगिराके भी बृहस्पति नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १८ ॥
ज्ञात्वा प्रथमजं तं तु वह्नेराङ्गिरसं सुतम् ।
उपेत्य देवाः पप्रच्छुः कारणं तत्र भारत ॥ १९ ॥
भरतनन्दन! अंगिराको अग्निदेवका प्रथम पुत्र जानकर सब देवता उनके पास आये और इसका कारण पूछने लगे ॥ १ ९ ॥
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स तु पृष्टस्तदा देवैस्ततः कारणमब्रवीत् ।
प्रत्यगृह्णंस्तु देवाश्च तद् वचोऽङ्गिरसस्तदा ॥ २० ॥
देवताओंके पूछनेपर अंगिराने उन्हें कारण बताया और देवताओंने अंगिराके उस कथनपर विश्वास करके उसे यथार्थ माना ॥ २० ॥
तत्र नानाविधानग्नीन् प्रवक्ष्यामि महाप्रभान् ।
कर्मभिर्बहुभिः ख्यातान् नानार्थान् ब्राह्मणेष्विह ॥ २१ ॥
अब मैं महान् कान्तिमान् विविध अग्नियोंका, जो ब्राह्मणग्रंथोक्त विधि- वाक्योंमें अनेक कर्मोंद्वारा विभिन्न प्रयोजनोंकी सिद्धिके लिये विख्यात हैं, वर्णन करूँगा ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आङ्गिरसे सप्तदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१७ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें अंगिरसके प्रसंगमें दो सौसत्रहवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २१७ ॥
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अष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः अंगिराकी संततिका वर्णन मार्कण्डेय उवाच
ब्रह्मणो यस्तृतीयस्तु पुत्रः कुरुकुलोद्वह ।
तस्याभवत् सुभा भार्या प्रजास्तस्यां च मे शृणु ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं- कुरुकुलधुरन्धर युधिष्ठिर! ब्रह्माजीके जो तीसरे पुत्र अंगिरा हैं, उनकी पत्नीका नाम सुभा है । उसके गर्भसे जो संतानें उत्पन्न हुईं, उनका वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ १ ॥
बृहत्कीर्तिर्बृहज्ज्योतिर्बृहद्ब्रह्मा बृहन्मनाः ।
बृहन्मन्त्रो बृहद्भासस्तथा राजन् बृहस्पतिः ॥ २ ॥
राजन्! बृहत्कीर्ति, बृहज्ज्योति, बृहद्ब्रह्मा, बृहन्मना, बृहन्मन्त्र, बृहद्भास तथा बृहस्पति ( ये अंगिरासे सुभाके सात पुत्र हुए) ॥ २ ॥
प्रजासु तासु सर्वासु रूपेणाप्रतिमाभवत् ।
देवी भानुमती नाम प्रथमाङ्गिरसः सुता ॥ ३ ॥
अंगिराकी प्रथम पुत्रीका नाम देवी भानुमती है । वह उनकी संतानोंमें सबसे अधिक रूपवती है; उसके रूपकी कहीं तुलना ही नहीं है ( भानु अर्थात् सूर्यसे युक्त होनेके कारण यह दिनकी अभिमानिनी है ) ॥ ३ ॥
भूतानामेव सर्वेषां यस्यां रागस्तदाभवत् ।
रागाद्रागेति यामाहुर्द्वितीयाङ्गिरसः सुता ॥ ४ ॥
अंगिरा मुनिकी दूसरी कन्या ' रागा' नामसे विख्यात है । उसपर समस्त प्राणियोंका विशेष अनुराग प्रकट हुआ था । इसीलिये उसका ऐसा नाम प्रसिद्ध हुआ । ( यह रात्रिकी अभिमानिनी है ) ॥ ४ ॥
यां कपर्दिसुतामाहुर्दृश्यादृश्येति देहिनः ।
तनुत्वात् सा सिनीवाली तृतीयाङ्गिरसः सुता ॥ ५ ॥
अंगिराकी तीसरी पुत्री ' सिनीवाली ' (चतुर्दशीयुक्ता अमावास्या) है जो अत्यन्त कृश होनेके कारण कभी दीखती है और कभी नहीं दीखती; इसीलिये लोग उसे ‘ दृश्यादृश्या ’ कहते हैं । भगवान् रुद्र उसे ललाटमें धारण करते हैं, इस कारण उसे सब लोग ‘ रूद्रसुता, भी कहते हैं ॥ ५ ॥
पश्यत्यर्चिष्मती भाभिर्हविर्भिश्च हविष्मती ।
षष्ठीमङ्गिरसः कन्यां पुण्यामाहुर्महिष्मतीम् ॥ ६ ॥
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उनकी चौथी पुत्री ‘ अर्चिष्मती ' है, ( यही पूर्ण चन्द्रमासे युक्त होनेके कारण शुद्ध पौर्णमासी कही जाती है ) इसकी प्रभासे लोग रातमें भी सब वस्तुओंको स्पष्ट देखते हैं । पाँचवीं कन्या ‘ हविष्मती' ( प्रतिपद्युक्ता पूर्णिमा ' राका ' ) है, जिसके सांनिध्यमें हविष्यद्वारा देवताओंका यजन किया जाता है । अंगिरा मुनिकी जो छठी पुण्यात्मा कन्या है, उसे ' महिष्मती' कहते हैं ( यही चतुर्दशीयुक्ता पूर्णिमा है, जिसे ' अनुमति' भी कहते हैं ) ॥ ६ ॥
महामखेष्वाङ्गिरसी दीप्तिमत्सु महामते ।
महामतीति विख्याता सप्तमी कथ्यते सुता ॥ ७ ॥
महामते! जो दीप्तिशाली सोमयाग आदि महायज्ञोंमें प्रकाशित होनेके कारण ‘ महामती ’ नामसे विख्यात है, वह (प्रतिपद्युक्त अमावास्या ) अंगिरा मुनिकी सातवीं पुत्री कहलाती है ॥ ७ ॥
यां तु दृष्ट्वा भगवतीं जनः कुहुकुहायते ।
एकानंशेति तामाहुः कुहूमङ्गिरसः सुताम् ॥ ८ ॥
जिस भगवती अमाको देखकर लोग ' कुहु कुहु ' ध्वनि कर उठते (चकित हो जाते ) हैं, अंगिरा मुनिकी वह आठवीं पुत्री ' कुहू ' नामसे विख्यात है । उसमें चन्द्रमाकी एकमात्र कला
अत्यन्त सूक्ष्म अंशसे शेष रहती है । ( यही शुद्ध अमावस्या है ) ॥ ८ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि अङ्गिरसोपाख्याने अष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१८ ॥
इसप्रकारश्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें अंगिरसोपाख्यानविषयक दो सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१८ ॥
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एकोनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः बृहस्पतिकी संततिका वर्णन मार्कण्डेय उवाच
बृहस्पतेश्चान्द्रमसी भार्याऽऽसीद् या यशस्विनी ।
अग्नीन् साजनयत् पुण्यान् षडेकां चापि पुत्रिकाम् ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! बृहस्पतिजीकी जो यशस्विनी पत्नी चान्द्रमसी ( तारा ) नामसे विख्यात थी, उसने पुत्ररूपमें छः पवित्र अग्नियोंको तथा एक पुत्रीको भी जन्म दिया ॥ ||
आहुतिष्वेव यस्याग्नेर्हविषाद्यं विधीयते ।
सोऽग्निर्बृहस्पतेः पुत्रः शंयुर्नाम महाव्रतः ॥ २ ॥
(दर्श- पौर्णमास आदिमें ) प्रधान आहुतियोंको देते समय जिस अग्निके लिये सर्वप्रथम घीकी आहुति दी जाती है, वह महान् व्रतधारी अग्नि ही बृहस्पतिका ' शंयु' नामसे विख्यात ( प्रथम ) पुत्र है ॥ २ ॥
चातुर्मास्येषु यस्येष्टमश्वमेधेऽग्रजः प्रभुः ।
दीप्तो ज्वालैरनेकाभैरग्निरेकोऽथ वीर्यवान् ॥ ३ ॥
चातुर्मास्य - सम्बन्धी यज्ञोंमें तथा अश्वमेध यज्ञमें जिसका पूजन होता है, जो सर्वप्रथम उत्पन्न होनेवाला और सर्वसमर्थ है तथा जो अनेक वर्णकी ज्वालाओंसे प्रज्वलित है, वह अद्वितीय शक्तिशाली अग्नि ही शंयु है ॥ ३ ॥
शंयोरप्रतिमा भार्या सत्या सत्याथ धर्मजा ।
अग्निस्तस्य सुतो दीप्तस्तिस्रः कन्याश्च सुव्रताः ॥ ४ ॥
शंयुकी पत्नीका नाम था सत्या । वह धर्मकी पुत्री थी । उसके रूप और गुणोंकी कहीं तुलना नहीं थी। वह सदा सत्यके पालनमें तत्पर रहती थी । उसके गर्भसे शंयुके एक अग्निस्वरूप पुत्र तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाली तीन कन्याएँ हुईं ॥ ४ ॥
प्रथमेनाज्यभागेन पूज्यते योऽग्निरध्वरे ।
अग्निस्तस्य भरद्वाजः प्रथमः पुत्र उच्यते ॥ ५ ॥
यज्ञमें प्रथम आज्यभागके द्वारा जिस अग्निकी पूजा की जाती है, वही शंयुका ज्येष्ठ पुत्र ' भरद्वाज ' नामक अग्नि बताया जाता है ॥ ५ ॥
पौर्णमासेषु सर्वेषु हविषाऽऽज्यं स्रुवोद्यतम् ।
भरतो नामतः सोऽग्निर्द्वितीयः शंयुतः सुतः ॥ ६ ॥
समस्त पौर्णमास यागोंमें स्रुवासे हविष्यके साथ घी उठाकर जिसके लिये ‘ प्रथम आघार' अर्पित किया जाता है, वह ' भरत' ( ऊर्ज ) नामक अग्नि शंयुका द्वितीय पुत्र है
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( इसका जन्म शंयुकी दूसरी स्त्रीके गर्भसे हुआ था ) ॥ ६ ॥
तिस्रः कन्या भवन्त्यन्या यासां स भरतः पतिः ।
भरतस्तु सुतस्तस्य भरत्येका च पुत्रिका ॥ ७ ॥
शंयुके तीन कन्याएँ और हुईं, जिनका बड़ा भाई भरत ही पालन करता था । भरत ( ऊर्ज ) -के ‘ भरत ' नामवाला ही एक पुत्र तथा ' भरती' नामकी एक कन्या हुई ॥ ७ ॥
भरतो भरतस्याग्नेः पावकस्तु प्रजापतेः ।
महानत्यर्थमहितस्तथा भरतसत्तम ॥ ८ ॥
सबका भरण- पोषण करनेवाले प्रजापति भरत नामक अग्निसे ' पावक' की उत्पत्ति हुई । भरतश्रेष्ठ! वह अत्यन्त महनीय ( पूज्य) होनेके कारण ' महान्' कहा गया है ॥ ८ ॥
भरद्वाजस्य भार्या तु वीरा वीरस्य पिण्डदा ।
प्राहुराज्येन तस्येज्यां सोमस्येव द्विजाः शनैः ॥ ९ ॥
शंयुके पहले पुत्र भरद्वाजकी पत्नीका नाम ' वीरा ' था, जिसने वीर नामक पुत्रको शरीर प्रदान किया । ब्राह्मणोंने सोमकी ही भाँति वीरकी भी आज्यभागसे पूजा बतायी है । इनके लिये आहुति देते समय मन्त्रका उपांशु उच्चारण किया जाता है ॥ ९ ॥
हविषा यो द्वितीयेन सोमेन सह युज्यते ।
रथप्रभू रथध्वानः कुम्भरेताः स उच्यते ॥ १० ॥
सोमदेवताके साथ इन्हींको द्वितीय आज्यभाग प्राप्त होता है । इन्हें 'रथप्रभु ', ‘ रथध्वान ’ और ‘ कुम्भरेता ' भी कहते हैं ॥ १० ॥
सरय्वां जनयत् सिद्धिं भानुं भाभिः समावृणोत् ।
आग्नेयमानयन् नित्यमाह्वाने ह्येष सूयते ॥ ११ ॥
वीरने ‘ सरयू’ नामवाली पत्नीके गर्भसे ' सिद्धि' नामक पुत्रको जन्म दिया । सिद्धिने अपनी प्रभासे सूर्यको भी आच्छादित कर लिया । सूर्यके आच्छादित हो जानेपर उसने अग्निदेवता- सम्बन्धी यज्ञका अनुष्ठान किया । आह्वान - मन्त्र ( अग्निमग्न आवह इत्यादि ) - में इस सिद्धि नामक अग्निकी ही स्तुति की जाती है ॥ ११ ॥
यस्तु न च्यवते नित्यं यशसा वर्चसा श्रिया ।
अग्निर्निश्चयवनो नाम पृथिवीं स्तौति केवलम् ॥ १२ ॥
बृहस्पतिके ( दूसरे) पुत्रका नाम 'निश्चयवन ' है । ये यश, वर्चस् ( तेज ) और कान्तिसे
कभी च्युत नहीं होते हैं । निश्चयवन अग्नि केवल पृथ्वीकी स्तुति करते हैं ॥
विपाप्मा कलुषैर्मुक्तो विशुद्धश्चार्चिषा ज्वलन् ।
विपापोऽग्निः सुतस्तस्य सत्यः समयधर्मकृत् ॥ १३ ॥
वे निष्पाप, निर्मल, विशुद्ध तथा तेजःपुञ्जसे प्रकाशित हैं । उनका पुत्र ‘ सत्य नामक अग्नि है; सत्य भी निष्पाप तथा कालधर्मके प्रवर्तक हैं ॥ १३ ॥