श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1481–1490
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1481–1490
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सम्पूर्ण उपायोंसे लोभ और क्रोधकी वृत्तियोंको दबाना चाहिए । संसारमें यही पवित्र तप है और यही सबके लिये भवसागरसे पार उतारनेवाला सेतु माना गया है ॥ २८ ॥
नित्यं क्रोधात् तपो रक्षेद् धर्मं रक्षेच्च मत्सरात् ।
विद्यां मानापमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः ॥ २ ९ ॥
सदा तपको क्रोधसे, धर्मको द्वेषसे, विद्याको मान- अपमानसे और अपने - आपको प्रमादसे बचाना चाहिये ॥ २ ९ ॥
आनृशंस्यं परो धर्मः क्षमा च परमं बलम् ।
आत्मज्ञानं परं ज्ञानं सत्यं व्रतपरं व्रतम् ॥ ३० ॥
क्रूरताका अभाव ( दया ) सबसे महान् धर्म है, क्षमा सबसे बड़ा बल है, सत्य सबसे उत्तम व्रत है और परमात्माके तत्त्वका ज्ञान ही सर्वोत्तम ज्ञान है ॥ ३० ॥
सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यं ज्ञानं हितं भवेत् ।
यद् भूतहितमत्यन्तं तद् वै सत्यं परं मतम् ॥ ३१ ॥
सत्य बोलना सदा कल्याणकारी है । यथार्थ ज्ञान ही हितकारक होता है । जिससे प्राणियोंका अत्यन्त हित होता हो उसे ही उत्तम सत्य माना गया है ॥ ३१ ॥
यस्य सर्वे समारम्भा निराशीर्बन्धनाः सदा ।
त्यागे यस्य हुतं सर्वं स त्यागी स च बुद्धिमान् ॥ ३२ ॥
जिसके सम्पूर्ण आयोजन कभी कामनाओंसे बँधे हुए नहीं होते तथा जिसने त्यागकी आगमें अपना सर्वस्व होम दिया है वही त्यागी और बुद्धिमान् है ॥ ३२ ॥
यतो न गुरुरप्येनं श्रावयेदुपपादयेत् ।
तं विद्याद् ब्रह्मणो योगं वियोगं योगसंज्ञितम् ॥ ३३ ॥
इसलिये दृश्य संसारसे वियोग करानेवाले और योग नामसे कहे जानेवाले इस ब्रह्मयोगको स्वयं जानना और सम्पादन करना चाहिये । गुरुको भी उचित है कि वह इसे अपात्र शिष्यके प्रति न सुनावे ॥ ३३ ॥
न हिंस्यात् सर्वभूतानि मैत्रायणगतश्चरेत् ।
नेदं जीवितमासाद्य वैरं कुर्वीत केनचित् ॥ ३४ ॥
किसी प्राणीकी हिंसा न करे । सबमें मित्रभाव रखते हुए विचरे। इस दुर्लभ मनुष्य-जीवनको पाकर किसीके साथ वैर न करे ॥ ३४ ॥
आकिञ्चन्यं सुसंतोषो निराशित्वमचापलम् ।
एतदेव परं ज्ञानं सदात्मज्ञानमुत्तमम् ॥ ३५ ॥
कुछ भी संग्रह न रखना, सभी दशाओंमें अत्यन्त संतुष्ट रहना तथा कामना और लोलुपताको त्याग देना -यही परम ज्ञान है और यही सत्यस्वरूप उत्तम आत्मज्ञान है ॥ ३५ ॥
परिग्रहं परित्यज्य भवेद् बुद्धया यतव्रतः ।
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अशोकं स्थानमाश्रित्य निश्चलं प्रेत्य चेह च ॥ ३६ ॥
इहलोक और परलोकके समस्त भोगोंका एवं सब प्रकारके संग्रहका त्याग करके शोकरहित निश्चल परमधामको लक्ष्य बनाकर बुद्धिके द्वारा मन और इन्द्रियोंका संयम करे ॥ ३६ ॥
तपोनित्येन दान्तेन मुनिना संयतात्मना ।
अजितं जेतुकामेन भाव्यं सङ्गेष्वसङ्गिना ॥ ३७ ॥
जो जितेन्द्रिय है, जिसने मनपर अधिकार प्राप्त कर लिया है तथा जो अजित पदको जीतनेकी इच्छा करता है, नित्य तपस्यामें संलग्न रहनेवाले उस मुनिको आसक्ति- जनक भोगोंसे अलग — अनासक्त रहना चाहिये ॥ ३७ ॥
गुणागुणमनासङ्गमेककार्यमनन्तरम् ।
एतत् तद् ब्रह्मणो वृत्तमाहुरेकपदं सुखम् ॥ ३८ ॥
में रहता हुआ भी गुणोंसे रहित है, जो सर्वथा संगसे रहित है तथा जो एकमात्र अन्तरात्माके द्वारा ही साध्य है, जिसकी उपलब्धिमें अविद्याके सिवा और कोई व्यवधान नहीं है, वही ब्रह्मका अद्वितीय नित्य सिद्ध पद है और वही ( निरतिशय) सुख है ॥ ३८ ॥
परित्यजति यो दुःखं सुखं चाप्युभयं नरः ।
ब्रह्म प्राप्नोति सोऽत्यन्तमसङ्गेन च गच्छति ॥ ३ ९ ॥
जो मनुष्य दुःख और सुख दोनोंको त्याग देता है, वही अनन्त ब्रह्मपदको प्राप्त होता है । अनासक्तिके द्वारा भी उसी पदकी प्राप्ति होती है ॥ ३ ९ ॥
यथाश्रुतमिदं सर्वं समासेन द्विजोत्तम ।
एतत् ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ४० ॥
द्विजश्रेष्ठ! मैंने यह सब जैसा सुना है, वैसा सब का सब थोड़े में आपसे कह सुनाया है । अब आप और क्या सुनना चाहते हैं? ॥ ४० ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१३ ॥
इस प्रकारश्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें ब्राह्मणव्याधसंवादविषयक दो सौ तेरहवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २१३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३३श्लोक मिलाकर कुल ४३३ श्लोक हैं ) १. देखिये प्रश्नोपनिषद् प्रश्न ३ मन्त्र ९ । २. देखिये प्रश्नोपनिषद् २।२, ३ और उसके आगेका प्रकरण । ३. देखिये प्रश्नोपनिषद् ३।३ तथा २।७ । ४. प्राणकी स्तुतिका वर्णन अथर्ववेदमें और प्रश्नोपनिषद्में बहुत आया है ।
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* तात्पर्य यह है कि हृदयमें रहनेवाला प्राण, नाभिमें रहनेवाले समानसे जाकर मिलता है । इसी तरह गुदामें रहनेवाला अपान कंठवर्ती उदानसे जा मिलता है, इस दशामें प्राण, अपान और समानका नाभिमें संघर्ष होनेसे जो अग्नि उत्पन्न होती है, उसे ही ‘ जठरानल ' नाम दिया गया है । वही इस शरीरमें अन्नको पचाकर उसके रससे शरीरको पुष्ट करता है । *• प्राण, श्रद्धा, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक तथा नाम - ये सोलह कलाएँ हैं ( देखिये प्रश्नोपनिषद् ६।४ ) ।
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चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः माता - पिताकी सेवाका दिग्दर्शन मार्कण्डेय उवाच
एवं संकथिते कृत्स्ने मोक्षधर्मे युधिष्ठिर ।
दृढप्रीतमना विप्रो धर्मव्याधमुवाच ह ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! धर्मव्याधने जब इस प्रकार पूर्णरूपसे मोक्ष-धर्मका वर्णन किया, तब कौशिक ब्राह्मण अत्यन्त प्रसन्न होकर उससे यों बोला ॥ १ ॥
न्याययुक्तमिदं सर्वं भवता परिकीर्तितम् ।
न तेऽस्त्यविदितं किंचिद् धर्मेष्विह हि दृश्यते ॥ २ ॥
' तात! तुमने मुझसे जो कुछ कहा, यह सब न्याययुक्त है । मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि यहाँ धर्मके विषयमें कोई ऐसी बात नहीं दिखायी देती जो तुम्हें ज्ञात न हो ' ॥ २ ॥
व्याध उवाच
प्रत्यक्षं मम यो धर्मस्तं च पश्य द्विजोत्तम ।
येन सिद्धिरियं प्राप्ता मया ब्राह्मणपुङ्गव ॥ ३ ॥
धर्मव्याधने कहा – विप्रवर! अब मेरा जो प्रत्यक्ष धर्म है, जिसके प्रभावसे मुझे यह सिद्धि प्राप्त हुई है, ब्राह्मणश्रेष्ठ! उसका भी दर्शन कर लीजिये ॥ ३ ॥
उत्तिष्ठ भगवन् क्षिप्रं प्रविश्याभ्यन्तरं गृहम् ।
द्रष्टुमर्हसि धर्मज्ञ मातरं पितरं च मे ॥ ४ ॥
भगवन्! आप धर्मके ज्ञाता हैं, उठिये और शीघ्र घरके भीतर चलकर मेरे माता-T-पिताका दर्शन कीजिये ॥ ४ ॥
मार्कण्डेय उवाच
इत्युक्तः स प्रविश्याथ ददर्श परमार्चितम् ।
सौधं हृद्यं चतुःशालमतीव च मनोरमम् ॥ ५ ॥
देवतागृहसंकाशं दैवतैश्च सुपूजितम् ।
शयनासनसम्बाधं गन्धैश्च परमैर्युतम् ॥ ६ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं -धर्मव्याधके ऐसा कहनेपर कौशिक ब्राह्मणने भीतर प्रवेश करके देखा — एक बहुत सुन्दर साफ - सुथरा घर था, उसकी दीवारोंपर चूनेसे सफेदी की हुई थी । उसमें चार कमरे थे, वह भवन बहुत प्रिय और मनको लुभा लेनेवाला था, ऐसा जान पड़ता था, मानो देवताओंका निवासस्थान हो । देवता भी उसका आदर करते थे । एक ओर
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सोनेके लिये शय्या बिछी थी और दूसरी ओर बैठनेके लिये आसन रखे गये थे । वहाँ धूप और चन्दन, केसर आदिकी उत्तम गन्ध फैल रही थी ॥ ५-६ ॥ तत्र शुक्लाम्बरधरौ पितरावस्य पूजितौ ।
कृताहारी तु संतुष्टावुपविष्टौ वरासने ।
धर्मव्याधस्तु तौ दृष्ट्वा पादेषु शिरसापतत् ॥ ७ ॥
एक सुन्दर आसनपर धर्मव्याधके माता- पिता भोजन करके संतुष्ट हो बैठे हुए थे । उस दोनोंके शरीरपर श्वेत वस्त्र शोभा पा रहे थे और पुष्प, चन्दन आदिसे उनकी पूजा की गयी थी । धर्मव्याधने उन दोनोंको देखते ही चरणोंमें मस्तक रख दिया और पृथ्वीपर पड़कर साष्टांग प्रणाम किया ॥ ७ ॥
वृद्धावूचतुः
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ धर्मज्ञ धर्मस्त्वामभिरक्षतु ।
प्रीतौ स्वस्तव शौचेन दीर्घमायुरवाप्नुहि ॥ ८ ॥
तब बूढ़े माता- पिताने ( स्नेहपूर्वक ) कहा – बेटा! उठो! उठो! तुम धर्मके जानकार हो, धर्म तुम्हारी सब ओरसे रक्षा करे । हम दोनों तुम्हारे शुद्ध आचार- विचार तथा सेवासे
बहुत प्रसन्न हैं । तुम्हारी आयु बड़ी हो ॥ ८ ॥
गतिमिष्टां तपो ज्ञानं मेधां च परमां गतः ।
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सत्पुत्रेण त्वया पुत्र नित्यं काले सुपूजितौ ॥ ९ ॥
तुमने उत्तम गति, तप, ज्ञान और श्रेष्ठ बुद्धि प्राप्त की है, बेटा! तुम सुपुत्र हो । त्य नियमपूर्वक समयानुसार हमारा पूजन - आदर- सत्कार किया है ॥ ९ ॥
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16 कौशिक ब्राह्मण और माता - पिताके भक्त धर्मव्याध ( सुखमावां वसावोऽत्र देवलोकगताविव)
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न तेऽन्यद् दैवतं किंचिद् दैवतेष्वपि वर्तते ।
प्रयतत्वाद् द्विजातीनां दमेनासि समन्वितः ॥ १० ॥
हम इस घरमें इस प्रकार सुखसे रहते हैं मानो देवलोकमें पहुँच गये हों । देवताओंमें भी तुम्हारे लिये हम दोनोंके सिवा और कोई देवता नहीं है । तुम हमें ही देवता मानते हो । अपने मनको पवित्र एवं संयममें रखनेके कारण तुम द्विजोचित शम- दमसे सम्पन्न हो ॥ १० ॥
पितुः पितामहा ये च तथैव प्रपितामहाः ।
प्रीतास्ते सततं पुत्र दमेनावां च पूजया ॥ ११ ॥
वत्स! मेरे पिताके पितामह और प्रपितामह आदि सभी तुम्हारे इन्द्रियसंयमसे सदा प्रसन्न रहते हैं । हम दोनों भी तुम्हारे द्वारा की हुई पूजा - सेवासे बहुत संतुष्ट हैं ॥ ११ ॥
मनसा कर्मणा वाचा शुश्रूषा नैव हीयते ।
न चान्या हि तथा बुद्धिर्दृश्यते साम्प्रतं तव ॥ १२ ॥
तुम मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी हम दोनोंकी सेवा नहीं छोड़ते । इस समय भी तुम्हारा विचार इसके प्रतिकूल नहीं दिखायी देता ॥ १२ ॥
जामदग्न्येन रामेण यथा वृद्धौ सुपूजितौ ।
तथा त्वया कृतं सर्वं तद्विशिष्टं च पुत्रक ॥ १३ ॥
बेटा! जमदग्निनन्दन परशुरामने जिस प्रकार अपने वृद्ध माता - पिताकी सेवा - पूजा की थी, उसी प्रकार तथा उससे भी बढ़कर तुमने हमारी सब सेवाएँ की हैं ॥ १३ ॥
ततस्तं ब्राह्मणं ताभ्यां धर्मव्याधो न्यवेदयत् ।
तौ स्वागतेन तं विप्रमर्चयामासतुस्तदा ॥ १४ ॥
तदनन्तर धर्मव्याधने अपने माता- पिताको उस कौशिक ब्राह्मणका परिचय दिया । तब उन दोनोंने भी स्वागतपूर्वक ब्राह्मणका पूजन किया ॥ १४ ॥
प्रतिपूज्य च तां पूजां द्विजः पप्रच्छ तावुभौ ।
सुपुत्राभ्यां सभृत्याभ्यां कच्चिद् वां कुशलं गृहे ॥ १५ ॥
अनामयं च वां कच्चित् सदैवेह शरीरयोः । ब्राह्मणने उनके द्वारा की हुई पूजाको स्वीकार करके कृतज्ञता प्रकट की और उनसे पूछा- ' आप दोनों इस घरमें अपने सुयोग्य पुत्र तथा सेवकोंके साथ सकुशल तो हैं न? आप दोनों शरीरसे भी सदा नीरोग रहते हैं न? ' ॥ १५३ ॥
वृद्धावूचतुः
कुशलं नौ गृहे विप्र भृत्यवर्गे च सर्वशः ।
कच्चित् त्वमप्यविघ्नेन सम्प्राप्तो भगवन्निति ॥ १६ ॥
उन वृद्धोंने उत्तर दिया- ब्रह्मन्! इस घरमें हम दोनों सकुशल हैं । हमारे सेवक तथा कुटुम्बके लोग भी कुशलसे हैं। भगवन्! अपना समाचार कहें, आप यहाँ सकुशल पहुँच गये
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न? किसी विघ्न - बाधाका सामना तो नहीं करना पड़ा? ॥ १६ ॥
मार्कण्डेय उवाच
बाढमित्येव तौ विप्रः प्रत्युवाच मुदान्वितः ।
धर्मव्याधो निरीक्ष्याथ ततस्तं वाक्यमब्रवीत् ॥ १७ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! तब कौशिक ब्राह्मणने उन्हें प्रसन्नतापूर्वक उत्तर दिया– 'हाँ, मुझे कोई कष्ट नहीं हुआ । ' तदनन्तर धर्मव्याधने अपने पिता - माताकी ओर देखते हुए कौशिक ब्राह्मणसे कहा ॥ १७ ॥
व्याध उवाच
पिता माता च भगवन्नेतौ मद्दैवतं परम् ।
यद् दैवतेभ्यः कर्तव्यं तदेताभ्यां करोम्यहम् ॥ १८ ॥
धर्मव्याध बोला — भगवन्! ये माता- पिता ही मेरे प्रधान देवता हैं । जो कुछ देवताओंके लिये करना चाहिये, वह मैं इन्हीं दोनोंके लिये करता हूँ ॥ १८ ॥
त्रयस्त्रिंशद् यथा देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः ।
सम्पूज्याः सर्वलोकस्य तथा वृद्धाविमौ मम ॥ १ ९ ॥
जैसे समस्त संसारके लिये इन्द्र आदि तैंतीस* देवता पूजनीय हैं, उसी प्रकार मेरे लिये ये दोनों बूढ़े माता - पिता ही आराधनीय हैं ॥ १ ९ ॥
उपाहारानाहरन्तो देवतानां यथा द्विजाः ।
कुर्वन्ति तद्वदेताभ्यां करोम्यहमतन्द्रितः ॥ २० ॥
द्विजलोग देवताओंके लिये जैसे नाना प्रकारके उपहार समर्पण करते हैं, उसी प्रकार मैं
इनके लिये करता हूँ । इनकी सेवामें मुझे आलस्य नहीं होता ॥ २० ॥
एतौ मे परमं ब्रह्मन् पिता माता च दैवतम् ।
एतौ पुष्पैः फलै रत्नैस्तोषयामि सदा द्विज ॥ २१ ॥
ब्रह्मन्! ये माता- पिता ही मेरे सर्वश्रेष्ठ देवता हैं । मैं सदा फूल, फल तथा रत्नोंसे इन्हींको संतुष्ट करता हूँ ॥ २१ ॥
एतावेवाग्नयो मह्यं यान् वदन्ति मनीषिणः ।
यज्ञा वेदाश्च चत्वारः सर्वमेतौ मम द्विज ॥ २२ ॥
विप्रवर! जिन्हें विद्वान् लोग ' अग्नि' कहते हैं, वे मेरे लिये ये ही हैं । चारों वेद और यज्ञ सब कुछ मेरे लिये ये माता-पिता ही हैं ॥ २२ ॥
एतदर्थं मम प्राणा भार्या पुत्रः सुहृज्जनः ।
सपुत्रदारः शुश्रूषां नित्यमेव करोम्यहम् ॥ २३ ॥
मेरे प्राण, स्त्री, पुत्र, और सुहृद् सब इन्हींकी सेवाके लिये हैं । मैं स्त्री और पुत्रोंके साथ प्रतिदिन इन्हींकी शुश्रूषामें लगा रहता हूँ ॥ २३ ॥
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स्वयं च स्नापयाम्येतौ तथा पादौ प्रधावये ।
आहारं च प्रयच्छामि स्वयं च द्विजसत्तम ॥ २४ ॥
द्विजश्रेष्ठ! मैं स्वयं ही इन्हें नहलाता हूँ, इनके चरण धोता हूँ और स्वयं ही भोजन परोसकर इन्हें जिमाता हूँ ॥ २४ ॥
अनुकूलं तथा वच्मि विप्रियं परिवर्जये ।
अधर्मेणापि संयुक्तं प्रियमाभ्यां करोम्यहम् ॥ २५ ॥
मैं वही बात बोलता हूँ, जो इनके मनके अनुकूल हो, जो इन्हें प्रिय न लगे, ऐसी बात मुँहसे कभी नहीं निकालता । इनको पसंद हो, तो मैं अधर्मयुक्त कार्य भी कर सकता हूँ ॥ २५ ॥
धर्ममेव गुरुं ज्ञात्वा करोमि द्विजसत्तम ।
अतन्द्रितः सदा विप्र शुश्रूषां वै करोम्यहम् ॥ २६ ॥
विप्रवर! इस प्रकार माता - पिताकी सेवारूप धर्मको ही महान् मानकर मैं उसका पालन करता हूँ । ब्रह्मन्! आलस्य छोड़कर मैं सदा इन्हीं दोनोंकी सेवामें लगा रहता हूँ ॥ २६ ॥
पञ्चैव गुरवो ब्रह्मन् पुरुषस्य बुभूषतः ।
पिता माताग्निरात्मा च गुरुश्च द्विजसत्तम ॥ २७ ॥
ब्राह्मणश्रेष्ठ! उन्नति चाहनेवाले पुरुषके पाँच ही गुरु हैं – पिता, माता, अग्नि, परमात्मा तथा गुरु ॥ २७ ॥
एतेषु यस्तु वर्तेत सम्यगेव द्विजोत्तम ।
भवेयुरग्नयस्तस्य परिचीर्णास्तु नित्यशः ।
गार्हस्थ्ये वर्तमानस्य एष धर्मः सनातनः ॥ २८ ॥
द्विजश्रेष्ठ! जो इन सबके प्रति उत्तम बर्ताव करेगा, उस गृहस्थ- धर्मका पालन करनेवालेके द्वारा सदा सब अग्नियोंकी सेवा सम्पन्न होती रहेगी । यही सनातन धर्म है ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१४ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमेंब्राह्मण-व्याध- संवादविषयक दो सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१४ ॥
आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, इन्द्र और प्रजापति- ये तैंतीस देवता हैं ।