02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 151–160
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 151–160
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नरश्रेष्ठ! राजा शाल्वकी वह सेना सब प्रकारके आयुधोंसे सम्पन्न, सम्पूर्ण अस्त्र- शस्त्रोंके संचालनमें निपुण, रथ, हाथी और घोड़ोंसे भरी हुई तथा पैदल सिपाहियों और ध्वजा- पताकाओंसे व्याप्त थी । उसका प्रत्येक सैनिक हृष्ट- पुष्ट एवं बलवान् था । सबमें वीरोचित लक्षण दिखायी देते थे । उस सेनाके सिपाही विचित्र ध्वजा तथा कवच धारण करते थे । उनके रथ और धनुष भी विचित्र थे । कुरुनन्दन! द्वारकाके समीप उस सेनाको ठहराकर राजा शाल्वने उसे वेगपूर्वक द्वारकाकी ओर बढ़ाया; मानो पक्षिराज गरुड़ अपने लक्ष्यकी ओर उड़े जा रहे हों ॥ ५–७ ॥
तदापतन्तं संदृश्य बलं शाल्वपतेस्तदा ।
निर्याय योधयामासुः कुमारा वृष्णिनन्दनाः ॥ ८ ॥
शाल्वराजकी उस सेनाको आती देख उस समय वृष्णिकुलको आनन्दित करनेवाले कुमार नगरसे बाहर निकलकर युद्ध करने लगे ॥ ८ ॥
असहन्तोऽभियानं तच्छाल्वराजस्य कौरव ।
चारुदेष्णश्च साम्बश्च प्रद्युम्नश्च महारथः ॥ ९ ॥
ते रथैर्दंशिताः सर्वे विचित्राभरणध्वजाः ।
संसक्ताः शाल्वराजस्य बहुभिर्योधपुङ्गवैः ॥ १० ॥
कुरुनन्दन! शाल्वराजके उस आक्रमणको वे सहन न कर सके । चारुदेष्ण, साम्ब और महारथी प्रद्युम्न — ये सब कवच, विचित्र आभूषण तथा ध्वजा धारण करके रथोंपर बैठकर शाल्वराजके अनेक श्रेष्ठ योद्धाओंके साथ भिड़ गये ॥ ९ -१० ॥
गृहीत्वा कार्मुकं साम्बः शाल्वस्य सचिवं रणे ।
योधयामास संहृष्टः क्षेमवृद्धिं चमूपतिम् ॥ ११ ॥
हर्षमें भरे हुए साम्बने धनुष धारण करके शाल्वके मन्त्री तथा सेनापति क्षेमवृद्धिके साथ युद्ध किया ॥ ११ ॥
तस्य बाणमयं वर्षं जाम्बवत्याः सुतो महत् ।
मुमोच भरतश्रेष्ठ यथा वर्षं सहस्रदृक् ॥ १२ ॥
तद् बाणवर्षं तुमुलं विषेहे स चमूपतिः ।
क्षेमवृद्धिर्महाराज हिमवानिव निश्चलः ॥ १३ ॥
भरतश्रेष्ठ! जाम्बवतीकुमारने उसके ऊपर भारी बाणवर्षा की, मानो इन्द्र जलकी वर्षा कर रहे हों। महाराज! सेनापति क्षेमवृद्धिने साम्बकी उस भयंकर बाणवर्षाको हिमालयकी भाँति अविचल रहकर सहन किया ॥ १२-१३ ॥
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ततः साम्बाय राजेन्द्र क्षेमवृद्धिरपि स्वयम् ।
मुमोच मायाविहितं शरजालं महत्तरम् ॥ १४ ॥
राजेन्द्र! तदनन्तर क्षेमवृद्धिने स्वयं भी साम्बके ऊपर मायानिर्मित बाणोंकी भारी वर्षा प्रारम्भ की ॥ १४ ॥
ततो मायामयं जालं माययैव विदीर्य सः ।
साम्बः शरसहस्रेण रथमस्याभ्यवर्षत ॥ १५ ॥
साम्बने उस मायामय बाणजालको मायासे ही छिन्न -भिन्न करके क्षेमवृद्धिके रथपर सहस्रों बाणोंकी झड़ी लगा दी ॥ १५ ॥
ततः स विद्धः साम्बेन क्षेमवृद्धिश्चमूपतिः ।
अपायाज्जवनैरश्वैः साम्बबाणप्रपीडितः ॥ १६ ॥
साम्बने सेनापति क्षेमवृद्धिको अपने बाणोंसे घायल कर दिया । वह साम्बकी बाणवर्षासे पीड़ित हो शीघ्रगामी अश्वोंकी सहायतासे ( लड़ाईका मैदान छोड़कर) भाग गया ॥ १६ ॥
तस्मिन् विप्रद्रुते क्रूरे शाल्वस्याथ चमूपतौ ।
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वेगवान् नाम दैतेयः सुतं मेऽभ्यद्रवद् बली ॥ १७ ॥
शाल्वके क्रूर सेनापति क्षेमवृद्धिके भाग जाने पर वेगवान् नामक बलवान् दैत्यने मेरे पुत्रपर आक्रमण किया ॥ १७ ॥
अभिपन्नस्तु राजेन्द्र साम्बो वृष्णिकुलोद्वहः ।
वेगं वेगवतो राजंस्तस्थौ वीरो विधारयन् ॥ १८ ॥
राजेन्द्र! वृष्णिवंशका भार वहन करनेवाला वीर साम्ब वेगवान्के वेगको सहन करते हुए धैर्यपूर्वक उसका सामना करने लगा ॥ १८ ॥
स वेगवति कौन्तेय साम्बो वेगवतीं गदाम् ।
चिक्षेप तरसा वीरो व्याविद्धय सत्यविक्रमः ॥ १ ९ ॥
कुन्तीनन्दन! सत्यपराक्रमी वीर साम्बने अपनी वेगशालिनी गदाको बड़े वेगसे घुमाकर वेगवान् दैत्यके सिरपर दे मारा ॥ १ ९ ॥
तया त्वभिहतो राजन् वेगवान् न्यपतद् भुवि ।
वातरुग्ण इव क्षुण्णो जीर्णमूलो वनस्पतिः ॥ २० ॥
राजन्! उस गदासे आहत होकर वेगवान् इस प्रकार पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो जीर्ण हुई जड़वाला पुराना वृक्ष हवाके वेगसे टूटकर धराशायी हो गया हो ॥ २० ॥
तस्मिन् विनिहते वीरे गदानुन्ने महासुरे ।
प्रविश्य महतीं सेनां योधयामास मे सुतः ॥ २१ ॥
गदासे घायल हुए उस वीर महादैत्यके मारे जानेपर मेरा पुत्र साम्ब शाल्वकी विशाल सेनामें घुसकर युद्ध करने लगा ॥ २१ ॥
चारुदेष्णेन संसक्तो विविन्ध्यो नाम दानवः ।
महारथः समाज्ञातो महाराज महाधनुः ॥ २२ ॥
महाराज! चारुदेष्णके साथ महारथी एवं महान् धनुर्धर विविन्ध्य नामक दानव शाल्वकी आज्ञासे युद्ध कर रहा था ॥ २२ ॥
ततः सुतुमुलं युद्धं चारुदेष्णविविन्ध्ययोः ।
वृत्रवासवयो राजन् यथा पूर्वं तथाभवत् ॥ २३ ॥
राजन्! तदनन्तर चारुदेष्ण और विविन्ध्यमें वैसा ही भयंकर युद्ध होने लगा, जैसा पहले इन्द्र और वृत्रासुरमें हुआ था ॥ २३ ॥
अन्योन्यस्याभिसंक्रुद्धावन्योन्यं जघ्नतुः शरैः ।
विनदन्तौ महारावान् सिंहाविव महाबलौ ॥ २४ ॥
वे दोनों एक- दूसरेपर कुपित हो बाणोंसे परस्पर आघात कर रहे थे और महाबली सिंहोंकी भाँति जोर- जोरसे गर्जना करते थे ॥ २४ ॥
रौक्मिणेयस्ततो बाणमग्न्यर्कोपमवर्चसम् ।
अभिमन्त्र्य महास्त्रेण संदधे शत्रुनाशनम् ॥ २५ ॥
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तदनन्तर रुक्मिणीनन्दन चारुदेष्णने अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी शत्रुनाशक बाणको महान् ( दिव्य ) अस्त्रसे अभिमन्त्रित करके अपने धनुषपर संधान किया ॥ २५ ॥
स विविन्ध्याय सक्रोधः समाहूय महारथः ।
चिक्षेप मे सुतो राजन् स गतासुरथापतत् ॥ २६ ॥
राजन्! तत्पश्चात् मेरे उस महारथी पुत्रने क्रोधमें भरकर विविन्ध्यपर वह बाण चलाया । उसके लगते ही विविन्ध्य प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २६ ॥
विविन्ध्यं निहतं दृष्ट्वा तां च विक्षोभितां चमूम् ।
कामगेन स सौभेन शाल्वः पुनरुपागमत् ॥ २७ ॥
विविन्ध्यको मारा गया और सेनाको तहस - नहस हुई देख शाल्व इच्छानुसार चलनेवाले सौभ विमानद्वारा फिर वहाँ आया ॥ २७ ॥
ततो व्याकुलितं सर्वं द्वारकावासि तद् बलम् ।
दृष्ट्वा शाल्वं महाबाहो सौभस्थं नृपते तदा ॥ २८ ॥
महाबाहु नरेश्वर! उस समय सौभ विमानपर बैठे हुए शाल्वको देखकर द्वारकाकी सारी सेना भयसे व्याकुल हो उठी ॥ २८ ॥
ततो निर्याय कौरव्य अवस्थाप्य च तद् बलम् ।
आनर्तानां महाराज प्रद्युम्नो वाक्यमब्रवीत् ॥ २ ९ ॥
महाराज कुरुनन्दन! तब प्रद्युम्नने निकलकर आनर्तवासियोंकी उस सेनाको धीरज बँधाया और इस प्रकार कहा— ॥ २ ९ ॥
सर्वे भवन्तस्तिष्ठन्तु सर्वे पश्यन्तु मां युधि ।
निवारयन्तं संग्रामे बलात् सौभं सराजकम् ॥ ३० ॥
‘ यादवो! आप सब लोग ( चुपचाप) खड़े रहें और मेरे पराक्रमको देखें; मैं किस प्रकार युद्धमें राजा शाल्वके सहित सौभ विमानकी गतिको रोक देता हूँ ॥ ३० ॥
अहं सौभपतेः सेनामायसैर्भुजगैरिव ।
धनुर्भुजविनिर्मुक्तैर्नाशयाम्यद्य यादवाः ॥ ३१ ॥
‘ यदुवंशियो! मैं अपने धनुर्दण्डसे छूटे हुए लोहेके सर्पतुल्य बाणोंद्वारा सौभपति शाल्वकी सेनाको अभी नष्ट किये देता हूँ ' ॥ ३१ ॥
आश्वसध्वं न भीः कार्या सौभराडद्य नश्यति ।
मयाभिपन्नो दुष्टात्मा ससौभो विनशिष्यति ॥ ३२ ॥
' आप धैर्य धारण करें, भयभीत न हों, सौभराज अभी नष्ट हो रहा है । दुष्टात्मा शाल्व मेरा सामना होते ही सौभ विमानसहित नष्ट हो जायगा' ॥ ३२ ॥
एवं ब्रुवति संहृष्टे प्रद्युम्ने पाण्डुनन्दन ।
विष्ठितं तद् बलं वीर युयुधे च यथासुखम् ॥ ३३ ॥
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वीर पाण्डुनन्दन! हर्षमें भरे हुए प्रद्युम्नके ऐसा कहने पर वह सारी सेना स्थिर हो पूर्ववत् प्रसन्नता और उत्साहके साथ युद्ध करने लगी ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि सौभवधोपाख्याने षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें सौभवधोपाख्यानविषयक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥
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Gomias श्रीकृष्णके द्वारा द्रौपदीको आश्वासन
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सप्तदशोऽध्यायः प्रद्युम्न और शाल्वका घोर युद्ध वासुदेव उवाच
एवमुक्त्वा रौक्मिणेयो यादवान् भरतर्षभ ।
दंशितैर्हरिभिर्युक्तं रथमास्थाय काञ्चनम् ॥ १ ॥
उच्छ्रित्य मकरं केतुं व्यात्ताननमिवान्तकम् ।
उत्पतद्भिरिवाकाशं तैर्हयैरन्वयात् परान् ॥ २ ॥
विक्षिपन् नादयंश्चापि धनुः श्रेष्ठं महाबलः ।
तूणखड्गधरः शूरो बद्धगोधाङ्गुलित्रवान् ॥ ३ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं— भरतश्रेष्ठ! यादवोंसे ऐसा कहकर रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न एक सुवर्णमय रथपर आरूढ़ हुए, जिसमें बख्तर पहनाये हुए घोड़े जुते थे । उन्होंने अपनी मकरचिह्नित ध्वजाको ऊँचा किया, जो मुँह बाये हुए कालके समान प्रतीत होती थी । उनके रथके घोड़े ऐसे चलते थे, मानो आकाशमें उड़े जा रहे हों । ऐसे अश्वोंसे जुते हुए रथके द्वारा महाबली प्रद्युम्नने शत्रुओंपर आक्रमण किया। वे अपने श्रेष्ठ धनुषको बारंबार खींचकर उसकी टंकार फैलाते हुए आगे बढ़े । उन्होंने पीठपर तरकस और कमरमें तलवार बाँध ली थी । उनमें शौर्य भरा था और उन्होंने गोहके चमड़ेके बने हुए दस्ताने पहन रखे थे ॥ १– ३ ॥
स विद्युच्छुरितं चापं विहरन् वै तलात् तलम् ।
मोहयामास दैतेयान् सर्वान् सौभनिवासिनः ॥ ४ ॥
वे अपने धनुषको एक हाथसे दूसरे हाथमें ले लिया करते थे । उस समय वह धनुष बिजलीके समान चमक रहा था । उन्होंने उस धनुषके द्वारा सौभ विमानमें रहनेवाले समस्त दैत्योंको मूर्च्छित कर दिया ॥ ४ ॥
तस्य विक्षिपतश्चापं संदधानस्य चासकृत् ।
नान्तरं ददृशे कश्चिन्निघ्नतः शात्रवान् रणे ॥ ५ ॥
वे बारंबार धनुषको खींचते, उसपर बाण रखते और उसके द्वारा शत्रुसैनिकोंको युद्धमें मार डालते थे । उनकी उक्त क्रियाओंमें किसीको थोड़ा- सा भी अन्तर नहीं दिखायी देता था ॥ ५ ॥
मुखस्य वर्णो न विकल्पतेऽस्य चेलुश्च गात्राणि न चापि तस्य । सिंहोन्नतं चाप्यभिगर्जतोऽस्य शुश्राव लोकोऽद्भुतवीर्यमग्रयम् ॥ ६ ॥
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उनके मुखका रंग तनिक भी नहीं बदलता था । उनके अंग भी विचलित नहीं होते थे । सब ओर गर्जना करते हुए प्रद्युम्नका उत्तम एवं अद्भुत बल- पराक्रमका सूचक सिंहनाद सब लोगोंको सुनायी देता था ॥ ६ ॥
जलेचरः काञ्चनयष्टिसंस्थो व्यात्ताननः सर्वतिमिप्रमाथी । वित्रासयन् राजति वाहमुख्ये शाल्वस्य सेनाप्रमुखे ध्वजाग्रयः ॥ ७ ॥
शाल्वकी सेनाके ठीक सामने प्रद्युम्नके श्रेष्ठ रथपर उनकी उत्तम ध्वजा फहराती हुई शोभा पा रही थी । उस ध्वजाके सुवर्णमय दण्डके ऊपर सब तिमि नामक जल-जन्तुओंका प्रमथन करनेवाले मुँह बाये एक मगरमच्छका चिह्न था । वह शत्रुसैनिकोंको अत्यन्त भयभीत कर रहा था ॥ ७ ॥
ततस्तूर्णं विनिष्पत्य प्रद्युम्नः शत्रुकर्षणः ।
शाल्वमेवाभिदुद्राव विधित्सुः कलहं नृप ॥ ८ ॥
नरेश्वर! तदनन्तर शत्रुहन्ता प्रद्युम्न तुरंत आगे बढ़कर राजा शाल्वके साथ युद्ध करनेकी इच्छासे उसीकी ओर दौड़े ॥ ८ ॥
अभियानं तु वीरेण प्रद्युम्नेन महारणे ।
नामर्षयत संक्रुद्धः शाल्वः कुरुकुलोद्वह ॥ ९ ॥
कुरुकुलतिलक! उस महासंग्राममें वीर प्रद्युम्नके द्वारा किया हुआ वह आक्रमण क्रुद्ध हुआ राजा शाल्व न सह सका ॥ ९ ॥
स रोषमदमत्तो वै कामगादवरुह्य च ।
प्रद्युम्नं योधयामास शाल्वः परपुरंजयः ॥ १० ॥
शत्रुकी राजधानीपर विजय पानेवाले शाल्वने रोष एवं बलके मदसे उन्मत्त हो इच्छानुसार चलनेवाले विमानसे उतरकर प्रद्युम्नसे युद्ध आरम्भ किया ॥ १० ॥
तयोः सुतुमुलं युद्धं शाल्ववृष्णिप्रवीरयोः ।
समेता ददृशुर्लोका बलिवासवयोरिव ॥ ११ ॥
शाल्व तथा वृष्णिवंशी वीर प्रद्युम्नमें बलि और इन्द्रके समान घोर युद्ध होने लगा । उस समय सब लोग एकत्र होकर उन दोनोंका युद्ध देखने लगे ॥ ११ ॥
तस्य मायामयो वीर रथो हेमपरिष्कृतः ।
सपताकः सध्वजश्च सानुकर्षः स तूणवान् ॥ १२ ॥
वीर! शाल्वके पास सुवर्णभूषित मायामय रथ था । वह रथ ध्वजा, पताका, अनुकर्ष ( हरसा ) * और तरकससे युक्त था ॥ १२ ॥
स तं रथवरं श्रीमान् समारुह्य किल प्रभो ।
मुमोच बाणान् कौरव्य प्रद्युम्नाय महाबलः ॥ १३ ॥
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प्रभो कुरुनन्दन! श्रीमान् महाबली शाल्वने उस श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो प्रद्युम्नपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ की ॥ १३ ॥
ततो बाणमयं वर्षं व्यसृजत् तरसा रणे ।
प्रद्युम्नो भुजवेगेन शाल्वं सम्मोहयन्निव ॥ १४ ॥
तब प्रद्युम्न भी युद्धभूमिमें अपनी भुजाओंके वेगसे शाल्वको मोहित करते हुए - से उसके ऊपर शीघ्रतापूर्वक बाणोंकी बौछार करने लगे ॥ १४ ॥
स तैरभिहतः संख्ये नामर्षयत सौभराट् ।
शरान् दीप्ताग्निसंकाशान् मुमोच तनये मम ॥ १५ ॥
सौभ विमानका स्वामी राजा शाल्व युद्धमें प्रद्युम्नके बाणोंसे घायल होनेपर यह सहन नहीं कर सका-- अमर्षमें भर गया और मेरे पुत्रपर प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी बाण छोड़ने लगा ॥ १५ ॥
तमापतन्तं बाणौघं स चिच्छेद महाबलः ।
ततश्चान्याञ्छरान् दीप्तान् प्रचिक्षेप सुते मम ॥ १६ ॥
महाबली प्रद्युम्नने उन बाणोंको आते ही काट गिराया । तत्पश्चात् शाल्वने मेरे पुत्रपर और भी बहुत - से प्रज्वलित बाण छोड़े ॥ १६ ॥
स शाल्वबाणै राजेन्द्र विद्धो रुक्मिणिनन्दनः ।
मुमोच बाणं त्वरितो मर्मभेदिनमाहवे ॥ १७ ॥
राजेन्द्र! शाल्वके बाणोंसे घायल होकर रुक्मिणी-नन्दन प्रद्युम्नने तुरंत ही उस युद्धभूमिमें शाल्वपर एक ऐसा बाण चलाया, जो मर्मस्थलको विदीर्ण कर देनेवाला था ॥ १७ ॥
तस्य वर्म विभिद्याशु स बाणो मत्सुतेरितः ।
विव्याध हृदयं पत्री स मुमोह पपात च ॥ १८ ॥
मेरे पुत्रके चलाये हुए उस बाणने शाल्वके कवचको छेदकर उसके हृदयको बींध डाला । इससे वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ा ॥ १८ ॥
तस्मिन् निपतिते वीरे शाल्वराजे विचेतसि ।
सम्प्राद्रवन् दानवेन्द्रा दारयन्तो वसुंधराम् ॥ १ ९ ॥
वीर शाल्वराजके अचेत होकर गिर जानेपर उसकी सेनाके समस्त दानवराज पृथ्वीको विदीर्ण करके पातालमें पलायन कर गये ॥ १ ९ ॥
हाहाकृतमभूत् सैन्यं शाल्वस्य पृथिवीपते ।
नष्टसंज्ञे निपतिते तदा सौभपतौ नृपे ॥ २० ॥
पृथ्वीपते! उस समय सौभ विमानका स्वामी राजा शाल्व जब संज्ञाशून्य होकर धराशायी हो गया, तब उसकी समस्त सेनामें हाहाकार मच गया ॥ २० ॥
तत उत्थाय कौरव्य प्रतिलभ्य च चेतनाम् ।
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मुमोच बाणान् सहसा प्रद्युम्नाय महाबलः ॥ २१ ॥
कुरुश्रेष्ठ! तत्पश्चात् जब चेत हुआ, तब महाबली शाल्व सहसा उठकर प्रद्युम्नपर बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ २१ ॥
तैः स विद्धो महाबाहुः प्रद्युम्नः समरे स्थितः ।
जत्रुदेशे भृशं वीरो व्यवासीदद् रथे तदा ॥ २२ ॥
शाल्वके उन बाणोंद्वारा कण्ठके मूलभागमें गहरा आघात लगनेसे अत्यन्त घायल होकर समरमें स्थित महाबाहु वीर प्रद्युम्न उस समय रथपर मूर्च्छित हो गये ॥ २२ ॥
तं स विद्ध्वा महाराज शाल्वो रुक्मिणिनन्दनम् ।
ननाद सिंहनादं वै नादेनापूरयन् महीम् ॥ २३ ॥
महाराज! रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नको घायल करके शाल्व बड़े जोर- जोरसे सिंहनाद करने लगा । उसकी आवाजसे वहाँकी सारी पृथ्वी गूँज उठी ॥ २३ ॥
ततो मोहं समापन्ने तनये मम भारत ।
मुमोच बाणांस्त्वरितः पुनरन्यान् दुरासदान् ॥ २४ ॥
भारत! मेरे पुत्रके मूर्च्छित हो जानेपर भी शाल्वने उनपर और भी बहुत - से दुर्धर्ष बाण शीघ्रतापूर्वक छोड़े ॥ २४ ॥
स तैरभिहतो बाणैर्बहुभिस्तेन मोहितः ।
निश्चेष्टः कौरवश्रेष्ठ प्रद्युम्नोऽभूद् रणाजिरे ॥ २५ ॥
कौरवश्रेष्ठ! इस प्रकार बहुत- से बाणोंसे आहत होनेके कारण प्रद्युम्न उस रणांगणमें मूर्च्छित एवं निश्चेष्ट हो गये ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि सौभवधोपाख्याने सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें सौभवधोपाख्यानविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥
* रथके नीचे पहियेके ऊपर लगा रहनेवाला काष्ठ ।