श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 161–170

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 161–170

पृष्ठ 161

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अष्टादशोऽध्यायः मूर्च्छावस्थामें सारथिके द्वारा रणभूमिसे बाहर लाये जानेपर प्रद्युम्नका अनुताप और इसके लिये सारथिको उपालम्भ देना वासुदेव उवाच

शाल्वबाणार्दिते तस्मिन् प्रद्युम्ने बलिनां वरे ।

वृष्णयो भग्नसंकल्पा विव्यथुः पृतनागताः ॥ १ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं - बलवानोंमें श्रेष्ठ प्रद्युम्न जब शाल्वके बाणोंसे पीड़ित हो ( मूर्च्छित हो ) गये, तब सेनामें आये हुए वृष्णिवंशी वीरोंका उत्साह भंग हो गया । उन सबको बड़ा दुःख हुआ ॥ १ ॥

हाहाकृतमभूत् सर्वं वृष्ण्यन्धकबलं ततः ।

प्रद्युम्ने मोहिते राजन् परे च मुदिता भृशम् ॥ २ ॥

राजन्! प्रद्युम्नके मोहित होनेपर वृष्णि और अन्धकवंशकी सारी सेनामें हाहाकार मच गया और शत्रुलोग अत्यन्त प्रसन्नतासे खिल उठे ॥ २ ॥

तं तथा मोहितं दृष्ट्वा सारथिर्जवनैर्हयैः ।

रणादपाहरत् तूर्णं शिक्षितो दारुकिस्तदा ॥ ३ ॥

दारुकका पुत्र प्रद्युम्नका सुशिक्षित सारथि था । वह प्रद्युम्नको इस प्रकार मूर्च्छित देख वेगशाली अश्वोंद्वारा उन्हें तुरंत रणभूमिसे बाहर ले गया ॥ ३ ॥

नातिदूरापयाते तु रथे रथवरप्रणुत् ।

धनुर्गृहीत्वा यन्तारं लब्धसंज्ञोऽब्रवीदिदम् ॥ ४ ॥

अभी वह रथ अधिक दूर नहीं जाने पाया था, तभी बड़े- बड़े रथियोंको परास्त करनेवाले प्रद्युम्न सचेत हो गये और हाथमें धनुष लेकर सारथिसे इस प्रकार बोले ॥ ४ ॥

सौते किं ते व्यवसितं कस्माद् यासि पराङ्मुखः ।

नैष वृष्णिप्रवीराणामाहवे धर्म उच्यते ॥ ५ ॥

' सूतपुत्र! आज तूने क्या सोचा है? क्यों युद्धसे मुँह मोड़कर भागा जा रहा है? युद्धसे पलायन करना वृष्णिवंशी वीरोंका धर्म नहीं है ॥ ५ ॥

कच्चित् सौते न ते मोहः शाल्वं दृष्ट्वा महाहवे ।

विषादो वा रणं दृष्ट्वा ब्रूहि मे त्वं यथातथम् ॥ ६ ॥

पृष्ठ 162

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‘ सूतनन्दन! इस महासंग्राममें राजा शाल्वको देखकर तुझे मोह तो नहीं हो गया है? अथवा युद्ध देखकर तुझे विषाद तो नहीं होता है? मुझसे ठीक -ठीक बता ( तेरे इस प्रकार भागनेका क्या कारण है? ) ' ॥ ६ ॥

सौतिरुवाच

जानार्दने न मे मोहो नापि मां भयमाविशत् ।

अतिभारं तु ते मन्ये शाल्वं केशवनन्दन ॥ ७ ॥

सूतपुत्रने कहा – जनार्दनकुमार! न मुझे मोह हुआ है और न मेरे मनमें भय ही समाया है । केशवनन्दन! मुझे ऐसा मालूम होता है कि यह राजा शाल्व आपके लिये अत्यन्त भार-सा हो रहा है ॥ ७ ॥

सोऽपयामि शनैर्वीर बलवानेष पापकृत् ।

मोहितश्च रणे शूरो रक्ष्यः सारथिना रथी ॥ ८ ॥

वीरवर! मैं धीरे - धीरे रणभूमिसे दूर इसलिये जा रहा हूँ कि यह पापी शाल्व बड़ा बलवान् है । सारथिका यह धर्म है कि यदि शूरवीर रथी संग्राममें मूर्च्छित हो जाय तो वह किसी प्रकार उसके प्राणोंकी रक्षा करे ॥ ८ ॥

आयुष्मंस्त्वं मया नित्यं रक्षितव्यस्त्वयाप्यहम् ।

रक्षितव्यो रथी नित्यमिति कृत्वापयाम्यहम् ॥ ९ ॥

आयुष्मन्! मुझे आपकी और आपको मेरी सदा रक्षा करनी चाहिये । रथी सारथिके द्वारा सदा रक्षणीय है, इस कर्तव्यका विचार करके ही मैं रणभूमिसे लौट रहा हूँ ॥ ९ ॥

एकश्चासि महाबाहो बहवश्चापि दानवाः ।

न समं रौक्मिणेयाहं रणे मत्वापयामि वै ॥ १० ॥

महाबाहो! आप अकेले हैं और इन दानवोंकी संख्या बहुत है । रुक्मिणीनन्दन! इस युद्धमें इतने विपक्षियोंका सामना करना अकेले आपके लिये कठिन है; यह सोचकर ही मैं युद्धसे हट रहा हूँ ॥ १० ॥

एवं ब्रुवति सूते तु तदा मकरकेतुमान् ।

उवाच सूतं कौरव्य निवर्तय रथं पुनः ॥ ११ ॥

दारुकात्मज मैवं त्वं पुनः कार्षीः कथंचन ।

व्यपयानं रणात् सौते जीवतो मम कर्हिचित् ॥ १२ ॥

कुरुनन्दन! सूतके ऐसा कहनेपर मकरध्वज प्रद्युम्नने उससे कहा– ' दारुककुमार! तू रथको पुनः युद्धभूमिकी ओर लौटा ले चल । सूतपुत्र! आजसे फिर कभी किसी प्रकार भी मेरे जीते - जी रथको रणभूमिसे न लौटाना ॥ ११-१२ ॥

न स वृष्णिकुले जातो यो वै त्यजति संगरम् ।

यो वा निपतितं हन्ति तवास्मीति च वादिनम् ॥ १३ ॥

पृष्ठ 163

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' वृष्णिवंशमें ऐसा कोई ( वीर पुरुष ) नहीं पैदा हुआ है, जो युद्ध छोड़कर भाग जाय अथवा गिरे हुएको तथा ' मैं आपका हूँ' यह कहनेवालेको मारे ॥ १३ ॥

तथा स्त्रियं च यो हन्ति बालं वृद्धं तथैव च ।

विरथं विप्रकीर्णं च भग्नशस्त्रायुधं तथा ॥ १४ ॥

' इसी प्रकार स्त्री, बालक, वृद्ध, रथहीन, अपने पक्षसे बिछुड़े हुए तथा जिसके अस्त्र-शस्त्र नष्ट हो गये हों, ऐसे लोगोंपर जो हथियार उठाता हो, ऐसा मनुष्य भी वृष्णिकुलमें नहीं उत्पन्न हुआ है ॥ १४ ॥

त्वं च सूतकुले जातो विनीतः सूतकर्मणि ।

धर्मज्ञश्चासि वृष्णीनामाहवेष्वपि दारुके ॥ १५ ॥

‘दारुककुमार! तू सूतकुलमें उत्पन्न होनेके साथ ही सूतकर्मकी अच्छी तरह शिक्षा पा चुका है । वृष्णिवंशी वीरोंका युद्धमें क्या धर्म है, यह भी भली- भाँति जानता है ॥ १५ ॥

स जानंश्चरितं कृत्स्नं वृष्णीनां पृतनामुखे ।

अपयानं पुनः सौते मैवं कार्षीः कथंचन ॥ १६ ॥

' सूतनन्दन! युद्धके मुहानेपर डटे हुए वृष्णिकुलके वीरोंका सम्पूर्ण चरित्र तुझसे अज्ञात नहीं है; अतः तू फिर कभी किसी तरह भी युद्धसे न लौटना ॥ १६ ॥

अपयातं हतं पृष्ठे भ्रान्तं रणपलायितम् ।

गदाग्रजो दुराधर्षः किं मां वक्ष्यति माधवः ॥ १७ ॥

' युद्धसे लौटने या भ्रान्तचित्त होकर भागनेपर जब मेरी पीठमें शत्रुके बाणोंका आघात लगा हो, उस समय किसीसे परास्त न होनेवाले मेरे पिता गदाग्रज भगवान् माधव मुझसे क्या कहेंगे? ॥ १७ ॥

केशवस्याग्रजो वापि नीलवासा मदोत्कटः ।

किं वक्ष्यति महाबाहुर्बलदेवः समागतः ॥ १८ ॥

' अथवा पिताजीके बड़े भाई नीलाम्बरधारी मदोत्कट महाबाहु बलरामजी जब यहाँ पधारेंगे, तब वे मुझसे क्या कहेंगे? ॥ १८ ॥

किं वक्ष्यति शिनेर्नप्ता नरसिंहो महाधनुः ।

अपयातं रणात् सूत साम्बश्च समितिंजयः ॥ १ ९ ॥

'सूत! युद्धसे भागनेपर मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी महाधनुर्धर सात्यकि तथा समरविजयी साम्ब मुझसे क्या कहेंगे? ॥ १ ९ ॥

चारुदेष्णश्च दुर्धर्षस्तथैव गदसारणौ ।

अक्रूरश्च महाबाहुः किं मां वक्ष्यति सारथे ॥ २० ॥

‘ सारथे! दुर्धर्ष वीर चारुदेष्ण, गद, सारण और महाबाहु अक्रूर मुझसे क्या कहेंगे? ॥ २० ॥

शूरं सम्भावितं शान्तं नित्यं पुरुषमानिनम् ।

पृष्ठ 164

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स्त्रियश्च वृष्णिवीराणां किं मां वक्ष्यन्ति संहताः ॥ २१ ॥

' मैं शूरवीर, सम्भावित ( सम्मानित ), शान्तस्वभाव तथा सदा अपनेको वीर पुरुष माननेवाला समझा जाता हूँ। ( युद्धसे भागनेपर) मुझे देखकर झुंड -की-झुंड एकत्र हुई वृष्णिवीरोंकी स्त्रियाँ मुझे क्या कहेंगी? ॥ २१ ॥

प्रद्युम्नोऽयमुपायाति भीतस्त्यक्त्वा महाहवम् ।

धिगेनमिति वक्ष्यन्ति न तु वक्ष्यन्ति साध्विति ॥ २२ ॥

‘ सब लोग यही कहेंगे— ' यह प्रद्युम्न भयभीत हो महान् संग्राम छोड़कर भागा आ रहा है; इसे धिक्कार है। ' उस अवस्थामें किसीके मुखसे मेरे लिये अच्छे शब्द नहीं निकलेंगे ॥ २२ ॥

धिग्वाचा परिहासोऽपि मम वा मद्विधस्य वा ।

मृत्युनाभ्यधिकः सौते स त्वं मा व्यपयाः पुनः ॥ २३ ॥

‘ सूतकुमार! मेरे अथवा मेरे - जैसे किसी भी पुरुषके लिये धिक्कारयुक्त वाणीद्वारा कोई परिहास भी कर दे तो वह मृत्युसे भी अधिक कष्ट देनेवाला है; अतः तू फिर कभी युद्ध छोड़कर न भागना ॥ २३ ॥

भारं हि मयि संन्यस्य यातो मधुनिहा हरिः ।

यज्ञं भारतसिंहस्य न हि शक्योऽद्य मर्षितुम् ॥ २४ ॥

' मेरे पिता मधुसूदन भगवान् श्रीहरि यहाँकी रक्षाका सारा भार मुझपर रखकर भरतवंशशिरोमणि धर्मराज युधिष्ठिरके यज्ञमें गये हैं । ( आज मुझसे जो अपराध हो गया है, ) इसे वे कभी क्षमा नहीं कर सकेंगे ॥ २४ ॥

कृतवर्मा मया वीरो निर्यास्यन्नेव वारितः ।

शाल्वं निवारयिष्येऽहं तिष्ठ त्वमिति सूतज ॥ २५ ॥

' सूतपुत्र! वीर कृतवर्मा शाल्वका सामना करनेके लिये पुरीसे बाहर आ रहे थे; किंतु मैंने उन्हें रोक दिया और कहा - ' आप यहीं रहिये । मैं शाल्वको परास्त करूँगा' ॥ २५ ॥

स च सम्भावयन् मां वै निवृत्तो हृदिकात्मजः ।

तं समेत्य रणं त्यक्त्वा किं वक्ष्यामि महारथम् ॥ २६ ॥

'कृतवर्मा मुझे इस कार्यके लिये समर्थ जानकर युद्धसे निवृत्त हो गये । आज युद्ध छोड़कर जब मैं उन महारथी वीरसे मिलूँगा, तब उन्हें क्या जवाब दूँगा? ॥ २६ ॥

उपयान्तं दुराधर्षं शङ्खचक्रगदाधरम् ।

पुरुषं पुण्डरीकाक्षं किं वक्ष्यामि महाभुजम् ॥ २७ ॥

‘ शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले कमलनयन महाबाहु एवं अजेय वीर भगवान् पुरुषोत्तम जब यहाँ मेरे निकट पदार्पण करेंगे, उस समय मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा? ॥ २७ ॥

सात्यकिं बलदेवं च ये चान्येऽन्धकवृष्णयः ।

मया स्पर्धन्ति सततं किं नु वक्ष्यामि तानहम् ॥ २८ ॥

पृष्ठ 165

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‘ सात्यकिसे, बलरामजीसे तथा अन्धक और वृष्णिवंशके अन्य वीरोंसे, जो सदा मुझसे स्पर्धा रखते हैं, मैं क्या कहूँगा? ॥ २८ ॥

त्यक्त्वा रणमिमं सौते पृष्ठतोऽभ्याहतः शरैः ।

त्वयापनीतो विवशो न जीवेयं कथंचन ॥ २ ९ ॥

'सूतपुत्र! तेरे द्वारा रणसे दूर लाया हुआ मैं इस युद्धको छोड़कर और पीठपर बाणोंकी चोट खाकर विवशतापूर्ण जीवन किसी प्रकार भी नहीं धारण करूँगा ॥ २ ९ ॥

निवर्त रथेनाशु पुनर्दारुकनन्दन ।

न चैतदेवं कर्तव्यमथापत्सु कथंचन ॥ ३० ॥

‘दारुकनन्दन! अतः तू शीघ्र ही रथके द्वारा पुनः संग्रामभूमिकी ओर लौट । आजसे मुझपर आपत्ति आनेपर भी तू किसी तरह ऐसा बर्ताव न करना ॥ ३० ॥

न जीवितमहं सौते बहु मन्ये कथंचन ।

अपयातो रणाद् भीतः पृष्ठतोऽभ्याहतः शरैः ॥ ३१ ॥

' सूतपुत्र! पीठपर बाणोंकी चोट खाकर भयभीत हो युद्धसे भागनेवालेके जीवनको मैं किसी प्रकार भी अधिक आदर नहीं देता ॥ ३१ ॥

कदापि सूतपुत्र त्वं जानीषे मां भयार्दितम् ।

अपयातं रणं हित्वा यथा कापुरुषं तथा ॥ ३२ ॥

' सूतपुत्र! क्या तू मुझे कायरोंकी तरह भयसे पीड़ित और युद्ध छोड़कर भागा हुआ समझता है? ॥ ३२ ॥

न युक्तं भवता त्यक्तुं संग्रामं दारुकात्मज ।

मयि युद्धार्थिनि भृशं स त्वं याहि यतो रणम् ॥ ३३ ॥

'दारुककुमार! तुझे संग्रामभूमिका परित्याग करना कदापि उचित नहीं था । विशेषतः उस अवस्थामें, जब कि मैं युद्धकी अभिलाषा रखता था । अतः जहाँ युद्ध हो रहा है, वहाँ चल' ॥ ३३ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि सौभवधोपाख्याने अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमेंसौभवधोपाख्यानविषयक अठारहवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥

पृष्ठ 166

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एकोनविंशोऽध्यायः प्रद्युम्नके द्वारा शाल्वकी पराजय वासुदेव उवाच

एवमुक्तस्तु कौन्तेय सूतपुत्रस्ततोऽब्रवीत् ।

प्रद्युम्नं बलिनां श्रेष्ठं मधुरं श्लक्ष्णमञ्जसा ॥ १ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं – कुन्तीनन्दन! प्रद्युम्नके ऐसा कहनेपर सूतपुत्रने शीघ्र ही बलवानोंमें श्रेष्ठ प्रद्युम्नसे थोड़े शब्दोंमें मधुरतापूर्वक कहा – ॥ १ ॥

न मे भयं रौक्मिणेय संग्रामे यच्छतो हयान् ।

युद्धज्ञोऽस्मि च वृष्णीनां नात्र किंचिदतोऽन्यथा ॥ २ ॥

‘ रुक्मिणीनन्दन! संग्रामभूमिमें घोड़ोंकी बागडोर सँभालते हुए मुझे तनिक भी भय नहीं होता । मैं वृष्णिवंशियोंके युद्धधर्मको भी जानता हूँ । आपने जो कुछ कहा है, उसमें कुछ भी अन्यथा नहीं है ॥ २ ॥

आयुष्मन्नुपदेशस्तु सारथ्ये वर्ततां स्मृतः ।

सर्वार्थेषु रथी रक्ष्यस्त्वं चापि भृशपीडितः ॥ ३ ॥

‘ आयुष्मन्! मैंने तो सारथ्यमें तत्पर रहनेवाले लोगोंके इस उपदेशका स्मरण किया था कि सभी दशाओंमें रथीकी रक्षा करनी चाहिये । उस समय आप भी अधिक पीड़ित थे ॥ ३ ॥

त्वं हि शाल्वप्रयुक्तेन शरेणाभिहतो भृशम् ।

कश्मलाभिहतो वीर ततोऽहमपयातवान् ॥ ४ ॥

‘ वीर! शाल्वके चलाये हुए बाणोंसे अधिक घायल होनेके कारण आपको मूर्च्छा आ गयी थी, इसीलिये मैं आपको लेकर रणभूमिसे हटा था ॥ ४ ॥

स त्वं सात्वतमुख्याद्य लब्धसंज्ञो यदृच्छया ।

पश्य मे हयसंयाने शिक्षां केशवनन्दन ॥ ५ ॥

‘ सात्वतवीरोंमें प्रधान केशवनन्दन! अब दैवेच्छासे आप सचेत हो गये हैं, अतः घोड़े हाँकनेकी कलामें मुझे कैसी उत्तम शिक्षा मिली है, उसे देखिये ॥ ५ ॥

दारुकेणाहमुत्पन्नो यथावच्चैव शिक्षितः ।

वीतभीः प्रविशाम्येतां शाल्वस्य प्रथितां चमूम् ॥ ६ ॥

‘ मैं दारुकका पुत्र हूँ और उन्होंने ही मुझे सारथ्यकर्मकी यथावत् शिक्षा दी है । देखिये! अब मैं निर्भय होकर राजा शाल्वकी इस विख्यात सेनामें प्रवेश करता हूँ' ॥ ६ ॥

वासुदेव उवाच

पृष्ठ 167

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एवमुक्त्वा ततो वीर हयान् संचोद्य संगरे ।

रश्मिभिस्तु समुद्यम्य जवेनाभ्यपतत् तदा ॥ ७ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं - वीरवर! ऐसा कहकर उस सूतपुत्रने घोड़ोंकी बागडोर हाथमें लेकर उन्हें युद्धभूमिकी ओर हाँका और शीघ्रतापूर्वक वहाँ जा पहुँचा ॥ ७ ॥

मण्डलानि विचित्राणि यमकानीतराणि च ।

सव्यानि च विचित्राणि दक्षिणानि च सर्वशः ॥ ८ ॥

उसने समान- असमान और वाम-दक्षिण आदि सब प्रकारकी विचित्र मण्डलाकार गति रथका संचालन किया ॥ ८ ॥

प्रतोदेनाहता राजन् रश्मिभिश्च समुद्यताः ।

उत्पतन्त इवाकाशे व्यचरंस्ते हयोत्तमाः ॥ ९ ॥

राजन्! वे श्रेष्ठ घोड़े चाबुककी मार खाकर बागडोर हिलानेसे तीव्र गतिसे दौड़ने लगे, मानो आकाशमें उड़ रहे हों ॥ ९ ॥

ते हस्तलाघवोपेतं विज्ञाय नृप दारुकिम् ।

दह्यमाना इव तदा नास्पृशंश्चरणैर्महीम् ॥ १० ॥

महाराज! दारुकपुत्रके हस्तलाघवको समझकर वे घोड़े प्रज्वलित अग्निकी भाँति दमकते हुए इस प्रकार जा रहे थे, मानो अपने पैरोंसे पृथ्वीका स्पर्श भी न कर रहे हों ॥ १० ॥

सोऽपसव्यां चमूं तस्य शाल्वस्य भरतर्षभ ।

चकार नातियत्नेन तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ११ ॥

भरतकुलभूषण! दारुकके पुत्रने अनायास ही शाल्वकी उस सेनाको अपसव्य ( दाहिने ) कर दिया । यह एक अद्भुत बात हुई ॥ ११ ॥

अमृष्यमाणोऽपसव्यं प्रद्युम्नेन च सौभराट् ।

यन्तारमस्य सहसा त्रिभिर्बाणैः समार्दयत् ॥ १२ ॥

सौभराज शाल्व प्रद्युम्नके द्वारा अपनी सेनाका अपसव्य किया जाना न सह सका ।

उसने सहसा तीन बाण चलाकर प्रद्युम्नके सारथिको घायल कर दिया ॥ १२ ॥

दारुकस्य सुतस्तत्र बाणवेगमचिन्तयन् ।

भूय एव महाबाहो प्रययावपसव्यतः ॥ १३ ॥

ततो बाणान् बहुविधान् पुनरेव स सौभराट् ।

मुमोच तनये वीर मम रुक्मिणिनन्दने ॥ १४ ॥

तानप्राप्ताञ्छितैर्बाणैश्चिच्छेद परवीरहा ।

रौक्मिणेयः स्मितं कृत्वा दर्शयन् हस्तलाघवम् ॥ १५ ॥

छिन्नान् दृष्ट्वा तु तान् बाणान् प्रद्युम्नेन च सौभराट् ।

आसुरीं दारुणीं मायामास्थाय व्यसृजच्छरान् ॥ १६ ॥

पृष्ठ 168

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महाबाहो! परंतु दारुककुमारने वहाँ बाणोंके वेगपूर्वक प्रहारकी कोई चिन्ता न करते हुए शाल्वकी सेनाको अपसव्य ( दाहिने ) करते हुए ही रथको आगे बढ़ाया । वीरवर! तब सौभराज शाल्वने पुनः मेरे पुत्र रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नपर अनेक प्रकारके बाण चलाये । शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए शाल्वके बाणोंको अपने पास आनेसे पहले ही तीक्ष्ण बाणोंसे मुसकराकर काट देते थे । प्रद्युम्नके द्वारा अपने बाणोंको छिन्न -भिन्न होते देख सौभराजने भयंकर आसुरी मायाका सहारा लेकर बहुत - से बाण बरसाये ॥ १३–१६ ॥

प्रयुज्यमानमाज्ञाय दैतेयास्त्रं महाबलम् ।

ब्रह्मास्त्रेणान्तराच्छित्त्वा मुमोचान्यान् पतत्रिणः ॥ १७ ॥

प्रद्युम्नने शाल्वको अति शक्तिशाली दैत्यास्त्रका प्रयोग करता जानकर ब्रह्मास्त्रके द्वारा उसे बीचमें ही काट डाला और अन्य बहुत - से बाण बरसाये ॥ १७ ॥

ते तदस्त्रं विधूयाशु विव्यधू रुधिराशनाः ।

शिरस्युरसि वक्त्रे च स मुमोह पपात च ॥ १८ ॥

वे सभी बाण शत्रुओंका रक्त पीनेवाले थे । उन बाणोंने शाल्वके अस्त्रोंका नाश करके उसके मस्तक, छाती और मुखको बींध डाला, जिससे वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ा ॥ १८ ॥

तस्मिन् निपतिते क्षुद्रे शाल्वे बाणप्रपीडिते ।

रौक्मिणेयो परं बाणं संदधे शत्रुनाशनम् ॥ १ ९ ॥

क्षुद्र स्वभाववाले राजा शाल्वके बाणविद्ध होकर गिर जानेपर रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नने अपने धनुषपर एक उत्तम बाणका संधान किया, जो शत्रुका नाश कर देनेवाला था ॥ १ ९ ॥ तमर्चितं सर्वदशार्हपूगै- राशीविषाग्निज्वलनप्रकाशम् । दृष्ट्वा शरं ज्यामभिनीयमानं बभूव हाहाकृतमन्तरिक्षम् ॥ २० ॥

वह बाण समस्त यादवसमुदायके द्वारा सम्मानित, विषैले सर्पके समान विषाक्त तथा प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशमान था । उस बाणको प्रत्यंचापर रखा जाता हुआ देख अन्तरिक्षलोकमें हाहाकार मच गया ॥ २० ॥

ततो देवगणाः सर्वे सेन्द्राः सहधनेश्वराः ।

नारदं प्रेषयामासुः श्वसनं च मनोजवम् ॥ २१ ॥

तब इन्द्र और कुबेरसहित सम्पूर्ण देवताओंने देवर्षि नारद तथा मनके समान वेगवाले वायुदेवको भेजा ॥ २१ ॥

तौ रौक्मिणेयमागम्य वचोऽब्रूतां दिवौकसाम् ।

पृष्ठ 169

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नैष वध्यस्त्वया वीर शाल्वराजः कथंचन ॥ २२ ॥

उन दोनोंने रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नके पास आकर देवताओंका यह संदेश सुनाया —‘वीरवर! यह राजा शाल्व युद्धमें कदापि तुम्हारा वध्य नहीं है ' ॥ २२ ॥

संहरस्व पुनर्बाणमवध्योऽयं त्वया रणे ।

एतस्य च शरस्याजौ नावध्योऽस्ति पुमान् क्वचित् ॥ २३ ॥

' तुम अपने इस बाणको फिरसे लौटा लो; क्योंकि यह शाल्व तुम्हारे द्वारा अवध्य है । तुम्हारे इस बाणका प्रयोग होनेपर युद्धमें कोई भी पुरुष बिना मरे नहीं रह सकता ॥ २३ ॥

मृत्युरस्य महाबाहो रणे देवकिनन्दनः ।

कृष्णः संकल्पितो धात्रा तन्मिथ्या न भवेदिति ॥ २४ ॥

‘ महाबाहो! विधाताने युद्धमें देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके हाथसे ही इसकी मृत्यु निश्चित की है । उनका वह संकल्प मिथ्या नहीं होना चाहिये' ॥ २४ ॥

ततः परमसंहृष्टः प्रद्युम्नः शरमुत्तमम् ।

संजहार धनुःश्रेष्ठात् तूणे चैव न्यवेशयत् ॥ २५ ॥

यह सुनकर प्रद्युम्न बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने अपने श्रेष्ठ धनुषसे उस उत्तम बाणको उतार लिया और पुनः तरकसमें रख दिया ॥ २५ ॥

तत उत्थाय राजेन्द्र शाल्वः परमदुर्मनाः ।

व्यपायात् सबलस्तूर्णं प्रद्युम्नशरपीडितः ॥ २६ ॥

राजेन्द्र! तदनन्तर शाल्व उठकर अत्यन्त दुःखितचित्त हो प्रद्युम्नके बाणोंसे पीड़ित होनेके कारण अपनी सेनाके साथ तुरंत भाग गया ॥ २६ ॥

स द्वारकां परित्यज्य क्रूरो वृष्णिभिरार्दितः ।

सौभमास्थाय राजेन्द्र दिवमाचक्रमे तदा ॥ २७ ॥

महाराज! उस समय वृष्णिवंशियोंसे पीड़ित हो क्रूर स्वभाववाला शाल्व द्वारकाको छोड़कर अपने सौभ नामक विमानका आश्रय ले आकाशमें जा पहुँचा ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि सौभवधोपाख्याने एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें सौभवधोपाख्यानविषयक उन्नीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 170

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विंशोऽध्यायः श्रीकृष्ण और शाल्वका भीषण युद्ध वासुदेव उवाच

आनर्तनगरं मुक्तं ततोऽहमगमं तदा ।

महाक्रतौ राजसूये निवृत्ते नृपते तव ॥ १ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं - राजन्! आपका राजसूय महायज्ञ समाप्त होनेपर मैं शाल्वसे विमुक्त आनर्तनगर ( द्वारका ) - में गया ॥ १ ॥

अपश्यं द्वारकां चाहं महाराज हतत्विषम् ।

निःस्वाध्यायवषट्कारां निर्भूषणवरस्त्रियम् ॥ २ ॥

महाराज! मैंने वहाँ पहुँचकर देखा, द्वारका श्रीहीन हो रही है । वहाँ न तो स्वाध्याय होता है, न वषट्कार । वह पुरी आभूषणोंसे रहित सुन्दरी नारीकी भाँति उदास लग रही थी ॥ २ ॥

अनभिज्ञेयरूपाणि द्वारकोपवनानि च ।

दृष्ट्वा शङ्कोपपन्नोऽहमपृच्छं हृदिकात्मजम् ॥ ३ ॥

द्वारकाके वन- उपवन तो ऐसे हो रहे थे, मानो पहचाने ही न जाते हों । यह सब देखकर मेरे मनमें बड़ी शंका हुई और मैंने कृतवर्मासे पूछा— ॥ ३ ॥

अस्वस्थनरनारीकमिदं वृष्णिकुलं भृशम् ।

किमिदं नरशार्दूल श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ ४ ॥

‘नरश्रेष्ठ! इस वृष्णिवंशके प्रायः सभी स्त्री - पुरुष अस्वस्थ दिखायी देते हैं, इसका क्या कारण है? यह मैं ठीक- ठीक सुनना चाहता हूँ' ॥ ४ ॥

एवमुक्तः स तु मया विस्तरेणेदमब्रवीत् ।

रोधं मोक्षं च शाल्वेन हार्दिक्यो राजसत्तम ॥ ५ ॥

नृपश्रेष्ठ! मेरे इस प्रकार पूछनेपर कृतवर्माने शाल्वके द्वारकापुरीपर घेरा डालने और फिर छोड़कर भाग जानेका सब समाचार विस्तारपूर्वक कह सुनाया ॥ ५ ॥

ततोऽहं भरतश्रेष्ठ श्रुत्वा सर्वमशेषतः ।

विनाशे शाल्वराजस्य तदैवाकरवं मतिम् ॥ ६ ॥

भरतवंशशिरोमणे! यह सब वृत्तान्त पूर्णरूपसे सुनकर मैंने शाल्वराजके विनाशका पूर्ण निश्चय कर लिया ॥ ६ ॥

ततोऽहं भरतश्रेष्ठ समाश्वास्य पुरे जनम् ।

राजानमाहुकं चैव तथैवानकदुन्दुभिम् ॥ ७ ॥

सर्वान् वृष्णिप्रवीरांश्च हर्षयन्नब्रुवं तदा ।