श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 141–150
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 141–150
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चतुर्दशोऽध्यायः द्यूतके समय न पहुँचनेमें श्रीकृष्णके द्वारा शाल्वके साथ युद्ध करने और सौभविमानसहित उसे नष्ट करनेका संक्षिप्त वर्णन युधिष्ठिर उवाच
असांनिध्यं कथं कृष्ण तवासीद् वृष्णिनन्दन ।
क्व चासीद् विप्रवासस्ते किं चाकार्षीः प्रवासतः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा- वृष्णिकुलको आनन्दित करनेवाले श्रीकृष्ण! जब यहाँ द्यूतक्रीडाका आयोजन हो रहा था, उस समय तुम द्वारकामें क्यों अनुपस्थित रहे? उन दिनों तुम्हारा निवास कहाँ था और उस प्रवासके द्वारा तुमने कौन- सा कार्य सिद्ध किया? ॥ १ ॥
श्रीकृष्णउवाच
शाल्वस्य नगरं सौभं गतोऽहं भरतर्षभ ।
निहन्तुं कौरवश्रेष्ठ तत्र मे शृणु कारणम् ॥ २ ॥
महातेजा महाबाहुर्यः स राजा महायशाः ।
दमघोषात्मजो वीरः शिशुपालो मया हतः ॥ ३ ॥
यज्ञे ते भरतश्रेष्ठ राजसूयेऽर्हणां प्रति ।
स रोषवशमापन्नो नामृष्यत दुरात्मवान् ॥ ४ ॥
श्रुत्वा तं निहतं शाल्वस्तीव्ररोषसमन्वितः ।
उपायाद् द्वारकां शून्यामिहस्थे मयि भारत ॥ ५ ॥
श्रीकृष्णने कहा— भरतवंशशिरोमणे! कुरुकुलभूषण! मैं उन दिनों शाल्वके सौभ नामक नगराकार विमानको नष्ट करनेके लिये गया हुआ था । इसका क्या कारण था, वह बतलाता हूँ, सुनिये । भरतश्रेष्ठ! आपके राजसूययज्ञमें अग्रपूजाके प्रश्नको लेकर जो क्रोधके वशीभूत हो इस कार्यको नहीं सह सका था और इसीलिये जिस दुरात्मा, महातेजस्वी, महाबाहु एवं महायशस्वी दमघोषनन्दन वीर राजा शिशुपालको मैंने मार डाला था; उसकी मृत्युका समाचार सुनकर शाल्व प्रचण्ड रोषसे भर गया । भारत! मैं तो यहाँ हस्तिनापुरमें था और वह हमलोगोंसे सूनी द्वारकापुरीमें जा पहुँचा ॥ २–५ ॥
स तत्र योधितो राजन् कुमारैर्वृष्णिपुङ्गवैः ।
आगतः कामगं सौभमारुह्यैव नृशंसवत् ॥ ६ ॥
राजन्! वहाँ वृष्णिवंशके श्रेष्ठ कुमारोंने उसके साथ युद्ध किया । वह इच्छानुसार चलनेवाले सौभ नामक विमानपर बैठकर आया और क्रूर मनुष्यकी भाँति यादवोंकी हत्या
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करने लगा ॥ ६ ॥
ततो वृष्णिप्रवीरांस्तान् बालान् हत्वा बहुंस्तदा ।
पुरोद्यानानि सर्वाणि भेदयामास दुर्मतिः ॥ ७ ॥
उस खोटी बुद्धिवाले शाल्वने वृष्णिवंशके बहुतेरे बालकोंका वध करके नगरके सब बगीचोंको उजाड़ डाला ॥ ७ ॥
उक्तवांश्च महाबाहो क्वासौ वृष्णिकुलाधमः ।
वासुदेवः स मन्दात्मा वसुदेवसुतो गतः ॥ ८ ॥
महाबाहो! उसने यादवोंसे पूछा-' वह वृष्णिकुलका कलंक मन्दात्मा वसुदेवपुत्र वासुदेव कहाँ है? ॥ ८ ॥
तस्य युद्धार्थिनो दर्पं युद्धे नाशयितास्म्यहम् ।
आनर्ताः सत्यमाख्यात तत्र गन्तास्मि यत्र सः ॥ ९ ॥
तं हत्वा विनिवर्तिष्ये कंसकेशिनिषूदनम् ।
अहत्वा न निवर्तिष्ये सत्येनायुधमालभे ॥ १० ॥
' उसे युद्धकी बड़ी इच्छा रहती है, आज उसके घमंडको मैं चूर कर दूँगा । आनर्तनिवासियो! सच- सच बतला दो । वह कहाँ है? जहाँ होगा, वहीं जाऊँगा और कंस तथा केशीका संहार करनेवाले उस कृष्णको मारकर ही लौटूंगा । मैं अपने अस्त्र- शस्त्रोंको छूकर सत्यकी सौगन्ध खाता हूँ कि अब कृष्णको मारे बिना नहीं लौटूंगा ' ॥ ९ -१० ॥
क्वासौ क्वासाविति पुनस्तत्र तत्र प्रधावति ।
मया किल रणे योद्धुं काङ्क्षमाणः स सौभराट् ॥ ११ ॥
सौभविमानका स्वामी शाल्व संग्रामभूमिमें मेरे साथ युद्धकी इच्छा रखकर चारों ओर दौड़ता और सबसे यही पूछता था कि ' वह कहाँ है, कहाँ है? ' ॥ ११ ॥
अद्य तं पापकर्माणं क्षुद्रं विश्वासघातिनम् ।
शिशुपालवधामर्षाद् गमयिष्ये यमक्षयम् ॥ १२ ॥
मम पापस्वभावेन भ्राता येन निपातितः ।
शिशुपालो महीपालस्तं वधिष्ये महीपते ॥ १३ ॥
राजन्! साथ ही वह यह भी कहता था कि ' आज उस नीच पापाचारी और विश्वासघाती कृष्णको शिशुपालवधके अमर्षके कारण मैं यमलोक भेज दूँगा । उस पापीने मेरे भाई राजा शिशुपालको मार गिराया है, अतः मैं भी उसका वध करूँगा ॥ १२-१३ ॥
भ्राता बालश्च राजा च न च संग्राममूर्धनि ।
प्रमत्तश्च हतो वीरस्तं हनिष्ये जनार्दनम् ॥ १४ ॥
‘ मेरा भाई शिशुपाल अभी छोटी अवस्थाका था, दूसरे वह राजा था, तीसरे युद्धके मुहाने पर खड़ा नहीं था, चौथे असावधान था, ऐसी दशामें उस वीरकी जिसने हत्या की है, उस जनार्दनको मैं अवश्य मारूँगा ' ॥ १४ ॥
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एवमादि महाराज विलप्य दिवमास्थितः कामगेन स सौभेन क्षिप्त्वा मां कुरुनन्दन ॥ १५ ॥
कुरुनन्दन! महाराज! इस प्रकार शिशुपालके लिये विलाप करके मुझपर आक्षेप करता हुआ वह इच्छानुसार चलनेवाले सौभ विमानद्वारा आकाशमें ठहरा हुआ था ॥ १५ ॥
तमश्रौषमहं गत्वा यथावृत्तः स दुर्मतिः ।
मयि कौरव्य दुष्टात्मा मार्तिकावतको नृपः ॥ १६ ॥
कुरुश्रेष्ठ! यहाँसे द्वारका जानेपर मैंने, मार्तिकावतक देशके निवासी दुष्टात्मा एवं दुर्बुद्धि राजा शाल्वने मेरे प्रति जो दुष्टतापूर्ण बर्ताव किया था ( आक्षेपपूर्ण बातें कही थीं ), वह सब कुछ सुना ॥ १६ ॥
ततोऽहमपि कौरव्य रोषव्याकुलमानसः ।
निश्चित्य मनसा राजन् वधायास्य मनो दधे ॥ १७ ॥
कुरुनन्दन! तब मेरा मन भी रोषसे व्याकुल हो उठा । राजन्! फिर मन- ही- मन कुछ निश्चय करके मैंने शाल्वके वधका विचार किया ॥ १७ ॥
आनर्तेषु विमर्दं च क्षेपं चात्मनि कौरव ।
प्रवृद्धमवलेपं च तस्य दुष्कृतकर्मणः ॥ १८ ॥
ततः सौभवधायाहं प्रतस्थे पृथिवीपते ।
समया सागरावर्ते दृष्ट आसीत् परीप्सता ॥ १ ९ ॥
कुरुप्रवर! पृथ्वीपते! उसने आनर्त देशमें जो महान् संहार मचा रखा था, वह मुझपर जो आक्षेप करता था तथा उस पापाचारीका घमंड जो बहुत बढ़ गया था, वह सब सोचकर मैं सौभनगरका नाश करनेके लिये प्रस्थित हुआ । मैंने सब ओर उसकी खोज की तो वह मुझे समुद्रके एक द्वीपमें दिखायी दिया ॥ १८-१९ ॥
ततः प्रध्माप्य जलजं पाञ्चजन्यमहं नृप ।
आहूय शाल्वं समरे युद्धाय समवस्थितः ॥ २० ॥
नरेश्वर! तदनन्तर मैंने पाञ्चजन्य शंख बजाकर शाल्वको समरभूमिमें बुलाया और स्वयं भी युद्धके लिये उपस्थित हुआ ॥ २० ॥
तन्मुहूर्तमभूद् युद्धं तत्र मे दानवैः सह ।
वशीभूताश्च मे सर्वे भूतले च निपातिताः ॥ २१ ॥
वहाँ सौभनिवासी दानवोंके साथ दो घड़ीतक मेरा युद्ध हुआ और मैंने सबको वशमें करके पृथ्वीपर मार गिराया ॥ २१ ॥
एतत् कार्यं महाबाहो येनाहं नागमं तदा ।
श्रुत्वैव हास्तिनपुरं द्यूतं चाविनयोत्थितम् ।
द्रुतमागतवान् युष्मान् द्रष्टुकामः सुदुःखितान् ॥ २२ ॥
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महाबाहो! यही कार्य उपस्थित हो गया था, जिससे मैं उस समय न आ सका । लौटनेपर ज्यों ही सुना कि हस्तिनापुरमें दुर्योधनकी उद्दण्डताके कारण जूआ खेला गया (और पाण्डव उसमें सब कुछ हारकर वनको चले गये ); तब अत्यन्त दुःखमें पड़े हुए आपलोगोंको देखनेके लिये मैं तुरंत यहाँ चला आया ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि सौभवधोपाख्याने चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें सौभवधोपाख्यानविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४ ॥
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पञ्चदशोऽध्यायः सौभनाशकी विस्तृत कथाके प्रसंगमें द्वारकामें युद्धसम्बन्धी रक्षात्मक तैयारियोंका वर्णन युधिष्ठिर उवाच
वासुदेव महाबाहो विस्तरेण महामते ।
सौभस्य वधमाचक्ष्व न हि तृप्यामि कथ्यतः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा - महाबाहो! वसुदेवनन्दन! महामते! तुम सौभ विमानके नष्ट होनेका समाचार विस्तारपूर्वक कहो । मैं तुम्हारे मुखसे इस प्रसंगको सुनते - सुनते तृप्त नहीं हो रहा हूँ ॥ १ ॥
वासुदेव उवाच
हतं श्रुत्वा महाबाहो मया श्रौतश्रवं नृप ।
उपायाद् भरतश्रेष्ठ शाल्वो द्वारवतीं पुरीम् ॥ २ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण बोले- महाबाहो! नरेश्वर! भरतश्रेष्ठ! श्रुतश्रवा* के पुत्र शिशुपालके मारे जानेका समाचार सुनकर शाल्वने द्वारकापुरीपर चढ़ाई की ॥ २ ॥
अरुन्धत्तां सुदुष्टात्मा सर्वतः पाण्डुनन्दन ।
शाल्वो वैहायसं चापि तत् पुरं व्यूह्य विष्ठितः ॥ ३ ॥
पाण्डुनन्दन! उस दुष्टात्मा शाल्वने सेनाद्वारा द्वारकापुरीको सब ओरसे घेर लिया था । वह स्वयं आकाशचारी विमान सौभपर व्यूहरचनापूर्वक विराजमान हो रहा था ॥ ३ ॥
तत्रस्थोऽथ महीपालो योधयामास तां पुरीम् ।
अभिसारेण सर्वेण तत्र युद्धमवर्तत ॥ ४ ॥
उसीपर रहकर राजा शाल्व द्वारकापुरीके लोगोंसे युद्ध करता था । वहाँ भारी युद्ध छिड़ा हुआ था और उसमें सभी दिशाओंसे अस्त्र- शस्त्रोंके प्रहार हो रहे थे ॥ ४ ॥
पुरी समन्ताद् विहिता सपताका सतोरणा ।
सचक्रा सहुडा चैव सयन्त्रखनका तथा ॥ ५ ॥
द्वारकापुरीमें सब ओर पताकाएँ फहरा रही थीं । ऊँचे- ऊँचे गोपुर वहाँ चारों दिशाओंमें सुशोभित थे । जगह -जगह सैनिकोंके समुदाय युद्धके लिये प्रस्तुत थे । सैनिकोंके आत्मरक्षापूर्वक युद्धकी सुविधाके लिये स्थान - स्थानपर बुर्ज बने हुए थे । युद्धोपयोगी यन्त्र वहाँ बैठाये गये थे; तथा सुरंगद्वारा नये- नये मार्ग निकालनेके काममें भी बहुत - से लोग जुटे हुए थे ॥ ५ ॥
सोपशल्यप्रतोलीका साट्टाट्टालकगोपुरा ।
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सचक्रग्रहणी चैव सोल्कालातावपोथिका ॥ ६ ॥
सड़कोंपर लोहेके विषाक्त काँटे अदृश्यरूपसे बिछाये गये थे । अट्टालिकाओं और गोपुरोंमें पर्याप्त अन्नका संग्रह किया गया था । शत्रुपक्षके प्रहारोंको रोकनेके लिये जगह-जगह मोर्चेबन्दी की गयी थी । शत्रुओंके चलाये हुए जलते गोले और अलात ( प्रज्वलित लौहमय अस्त्र) -को भी विफल करके नीचे गिरा देनेवाली शक्तियाँ सुसज्जित थीं ॥ ६ ॥
सोष्ट्रिका भरतश्रेष्ठ सभेरीपणवानका ।
सतोमराङ्कुशा राजन् सशतघ्नीकलाङ्गला ॥ ७ ॥
सभुशुण्ड्यश्मगुडका सायुधा सपरश्वधा ।
लोहचर्मवती चापि साग्निः सगुडशृङ्गिका ॥ ८ ॥
अस्त्रोंसे भरे हुए मिट्टी और चमड़ेके असंख्य पात्र रखे गये थे । भरतश्रेष्ठ! ढोल, नगारे और मृदंग आदि जुझाऊ बाजे भी बज रहे थे । राजन्! तोमर, अंकुश, शतघ्नी, लांगल, भुशुण्डी, पत्थरके गोले, अन्यान्य अस्त्र- शस्त्र, फरसे, बहुत- सी सुदृढ़ ढालें और गोला-बारूदसे भरी हुई तोपें यथास्थान तैयार रखी गयी थीं ॥ ७-८ ॥
शास्त्रदृष्टेन विधिना सुयुक्ता भरतर्षभ ।
रथैरनेकैर्विविधैर्गदसाम्बोद्धवादिभिः ॥ ९ ॥
पुरुषैः कुरुशार्दूल समर्थैः प्रतिवारणे ।
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अतिख्यातकुलैर्वीरैर्दृष्टवीर्यैश्च संयुगे ॥ १० ॥
मध्यमेन च गुल्मेन रक्षिभिः सा सुरक्षिता ।
उत्क्षिप्तगुल्मैश्च तथा हयैश्च सपताकिभिः ॥ ११ ॥
आघोषितं च नगरे न पातव्या सुरेति वै ।
प्रमादं परिरक्षद्भिरुग्रसेनोद्धवादिभिः ॥ १२ ॥
भरतकुलभूषण! शास्त्रोक्त विधिसे द्वारकापुरीको रक्षाके सभी उत्तम उपायोंसे सम्पन्न किया गया था । कुरुश्रेष्ठ! शत्रुओंका सामना करनेमें समर्थ गद, साम्ब और उद्धव आदि अनेक वीर पुरुष नाना प्रकारके बहुसंख्यक रथोंद्वारा पुरीकी रक्षामें दत्तचित थे । जो अत्यन्त विख्यात कुलोंमें उत्पन्न थे तथा युद्धके अवसरोंपर जिनके बल- वीर्यका परिचय मिल चुका था, ऐसे वीर रक्षक मध्यम गुल्म ( नगरके मध्यवर्ती दुर्ग ) में स्थित हो पुरीकी पूर्णतः रक्षा कर रहे थे । सबको प्रमादसे बचानेवाले उग्रसेन और उद्धव आदिने शत्रुओंके गुल्मोंको नष्ट करनेकी शक्ति रखनेवाले घुड़सवारोंके हाथमें झंडे देकर समूचे नगरमें यह घोषणा करा दी थी कि किसीको भी मद्यपान नहीं करना चाहिये ॥ ९ –१२ ॥
प्रमत्तेष्वभिघातं हि कुर्याच्छाल्वो नराधिपः ।
इति कृत्वाप्रमत्तास्ते सर्वे वृष्ण्यन्धकाः स्थिताः ॥ १३ ॥
क्योंकि मदिरासे उन्मत्त हुए लोगोंपर राजा शाल्व घातक प्रहार कर सकता है । यह सोचकर वृष्णि और अन्धकवंशके सभी योद्धा पूरी सावधानीके साथ युद्धमें डटे हुए थे ॥ १३ ॥
आनर्ताश्च तथा सर्वे नटा नर्तकगायनाः ।
बहिर्निर्वासिताः क्षिप्रं रक्षद्भिर्वित्तसंचयम् ॥ १४ ॥
धनसंग्रहकी रक्षा करनेवाले यादवोंने आनर्तदेशीय नटों, नर्तकों तथा गायकोंको शीघ्र ही नगरसे बाहर कर दिया था ॥ १४ ॥
संक्रमा भेदिताः सर्वे नावश्च प्रतिषेधिताः ।
परिखाश्चापि कौरव्य कालैः सुनिचिताः कृताः ॥ १५ ॥
कुरुनन्दन! द्वारकापुरीमें आनेके लिये जो पुल मार्गमें पड़ते थे वे सब तोड़ दिये गये । नौकाएँ रोक दी गयी थीं और खाइयोंमें काँटे बिछा दिये गये थे ॥ १५ ॥
उदपानाः कुरुश्रेष्ठ तथैवाप्यम्बरीषकाः ।
समन्तात् क्रोशमात्रं च कारिता विषमा च भूः ॥ १६ ॥
कुरुश्रेष्ठ! द्वारकापुरीके चारों ओर एक कोसतकके चारों ओरके कुएँ इस प्रकार जलशून्य कर दिये गये थे मानो भाड़ हों और उतनी दूरकी भूमि भी लौहकण्टक आदिसे व्याप्त कर दी गयी थी ॥ १६ ॥
प्रकृत्या विषमं दुर्गं प्रकृत्या च सुरक्षितम् ।
प्रकृत्या चायुधोपेतं विशेषेण तदानघ ॥ १७ ॥
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निष्पाप नरेश! द्वारका एक तो स्वभावसे ही दुर्गम्य, सुरक्षित और अस्त्र - शस्त्रोंसे सम्पन्न है, तथापि उस समय इसकी विशेष व्यवस्था कर दी गयी थी ॥ १७ ॥
सुरक्षितं सुगुप्तं च सर्वायुधसमन्वितम् ।
तत् पुरं भरतश्रेष्ठ यथेन्द्रभवनं तथा ॥ १८ ॥
भरतश्रेष्ठ! द्वारकानगर इन्द्रभवनकी भाँति ही सुरक्षित, सुगुप्त और सम्पूर्ण आयुधोंसे भरा- पूरा है ॥ १८ ॥
न चामुद्रोऽभिनिर्याति न चामुद्रः प्रवेश्यते ।
वृष्ण्यन्धकपुरे राजंस्तदा सौभसमागमे ॥ १ ९ ॥
राजन्! सौभनिवासियोंके साथ युद्ध होते समय वृष्णि और अन्धकवंशी वीरोंके उस नगरमें कोई भी राजमुद्रा ( पास ) के बिना न तो बाहर निकल सकता था और न बाहरसे नगरके भीतर ही आ सकता था ॥ १ ९ ॥
अनुरथ्यासु सर्वासु चत्वरेषु च कौरव ।
बलं बभूव राजेन्द्र प्रभूतगजवाजिमत् ॥ २० ॥
कुरुनन्दन राजेन्द्र! वहाँ प्रत्येक सड़क और चौराहेपर बहुत -से हाथीसवार और घुड़सवारोंसे युक्त विशाल सेना उपस्थित रहती थी ॥ २० ॥
दत्तवेतनभक्तं च दत्तायुधपरिच्छदम् ।
कृतोपधानं च तदा बलमासीन्महाभुज ॥ २१ ॥
महाबाहो! उस समय सेनाके प्रत्येक सैनिकको पूरा- पूरा वेतन और भत्ता चुका दिया गया था । सबको नये - नये हथियार और पोशाकें दी गयी थीं और उन्हें विशेष पुरस्कार आदि देकर उनका प्रेम और विश्वास प्राप्त कर लिया गया था ॥ २१ ॥
न कुप्यवेतनी कश्चिन्न चातिक्रान्तवेतनी ।
नानुग्रहभृतः कश्चिन्न चादृष्टपराक्रमः ॥ २२ ॥
कोई भी सैनिक ऐसा नहीं था जिसे सोने - चाँदीके सिवा ताँबा आदि वेतनके रूपमें दिया जाता हो अथवा जिसे समयपर वेतन न प्राप्त हुआ हो । किसी भी सैनिकको दयावश सेनामें भर्ती नहीं किया गया था तथा कोई भी ऐसा न था जिसका पराक्रम बहुत दिनोंसे देखा न गया हो ॥ २२ ॥
एवं सुविहिता राजन् द्वारका भूरिदक्षिणा ।
आहुकेन सुगुप्ता च राज्ञा राजीवलोचन ॥ २३ ॥
कमलनयन राजन्! जिसमें बहुत- से दक्ष मनुष्य निवास करते थे उस द्वारकानगरीकी रक्षाके लिये इस प्रकारकी व्यवस्था की गयी थी । वह राजा उग्रसेनके द्वारा भलीभाँति सुरक्षित थी ॥ २३ ॥
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि सौभवधोपाख्याने पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें सौभवधविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १५ ॥
• श्रुतश्रवा शिशुपालकी माताका नाम है । यह वसुदेवजीकी बहिन थी ।
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षोडशोऽध्यायः शाल्वकी विशाल सेनाके आक्रमणका यादवसेनाद्वारा प्रतिरोध, साम्बद्वारा क्षेमवृद्धिकी पराजय, वेगवान्का वध तथा चारुदेष्णद्वारा विविन्ध्य दैत्यका वध एवं प्रद्युम्नद्वारा सेनाको आश्वासन वासुदेव उवाच
तां तूपयात राजेन्द्र शाल्वः सौभपतिस्तदा ।
प्रभूतनरनागेन बलेनोपविवेश ह ॥ १ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं - राजेन्द्र! सौभ विमानका स्वामी राजा शाल्व अपनी बहुत बड़ी सेनाके साथ, जिसमें हाथीसवारों तथा पैदलोंकी संख्या अधिक थी, द्वारकापुरीपर चढ़ आया और उसके निकट आकर ठहरा ॥ १ ॥
समे निविष्टा सा सेना प्रभूतसलिलाशये ।
चतुरङ्गबलोपेता शाल्वराजाभिपालिता ॥ २ ॥
जहाँ अधिक जलसे भरा हुआ जलाशय था, वहीं समतल भूमिमें उसकी सेनाने पड़ाव डाला । उसमें हाथीसवार, घुड़सवार, रथी और पैदल चारों प्रकारके सैनिक थे । स्वयं राजा शाल्व उसका संरक्षक था ॥ २ ॥
वर्जयित्वा श्मशानानि देवताऽऽयतनानि च ।
वल्मीकांश्चैत्यवृक्षांश्च तन्निविष्टमभूद् बलम् ॥ ३ ॥
श्मशानभूमि, देवमन्दिर, बाँबी और चैत्यवृक्षको छोड़कर सभी स्थानोंमें उसकी सेना फैलकर ठहरी हुई थी ॥ ३ ॥
अनीकानां विभागेन पन्थानः संवृताऽभवन् ।
प्रवणाय च नैवासञ्छाल्वस्य शिविरे नृप ॥ ४ ॥
सेनाओंके विभागपूर्वक पड़ाव डालनेसे सारे रास्ते घिर गये थे । राजन्! शाल्वके शिविरमें प्रवेश करनेका कोई मार्ग नहीं रह गया था ॥ ४ ॥
सर्वायुधसमोपेतं सर्वशस्त्रविशारदम् ।
रथनागाश्वकलिलं पदातिध्वजसंकुलम् ॥ ५ ॥
तुष्टपुष्टबलोपेतं वीरलक्षणलक्षितम् ।
विचित्रध्वजसन्नाहं विचित्ररथकार्मुकम् ॥ ६ ॥
संनिवेश्य च कौरव्य द्वारकायां नरर्षभ ।
अभिसारयामास तदा वेगेन पतगेन्द्रवत् ॥ ७ ॥