02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 1581–1590
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1581–1590
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मार्कण्डेय उवाच
यदाभिषिक्तो भगवान् सैनापत्येन पावकिः ।
तदा सम्प्रस्थितः श्रीमान् हृष्टो भद्रवटं हरः ॥ २८ ॥
रथेनादित्यवर्णेन पार्वत्या सहितः प्रभुः । ( अनुयातः सुरैः सर्वैः सहस्राक्षपुरोगमैः ) सहस्रं तस्य सिंहानां तस्मिन् युक्तं रथोत्तमे ॥ २ ९ ॥ मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! जब अग्निनन्दन भगवान् स्कन्दका सेनापतिके पदपर अभिषेक हो गया, तब श्रीमान् भगवान् शिव देवी पार्वतीके साथ सूर्यके समान रथपर आरूढ हो प्रसन्नतापूर्वक भद्रवटकी ओर प्रस्थित हुए । उस समय इन्द्र आदि सब देवता उनके पीछे - पीछे चले । भगवान् शिवके उस उत्तम रथमें एक हजार सिंह जुते हुए थे ॥ २८-२९ ॥
उत्पपात दिवं शुभ्रं कालेनाभिप्रचोदितम् ।
ते पिबन्त इवाकाशं त्रासयन्तश्चराचरान् ॥ ३० ॥
सिंहा नभस्यगच्छन्त नदन्तश्चारुकेसराः । साक्षात् काल उस रथका संचालन कर रहा था । उसकी प्रेरणासे वह शुभ्र रथ आकाशमें उड़ चला । मनोहर केसरोंसे सुशोभित वे सिंह चराचर प्राणियोंको भयभीत करते और दहाड़ते हुए आकाशमें इस प्रकार चलने लगे, मानो उसे पी जायँगे ॥ ३० ॥
तस्मिन् रथे पशुपतिः स्थितो भात्युमया सह ॥ ३१ ॥
विद्युता सहितः सूर्यः सेन्द्रचापे घने यथा । उस रथपर भगवती उमाके साथ बैठे हुए भगवान् शिव इस प्रकार शोभित हो रहे थे, मानो इन्द्रधनुषयुक्त मेघोंकी घटामें विद्युत्के साथ भगवान् सूर्य प्रकाशित हो रहे हों ॥ ३१३ || अग्रतस्तस्य भगवान् धनेशो गुह्यकैः सह ॥ ३२ ॥
आस्थाय रुचिरं याति पुष्पकं नरवाहनः । उनके आगे - आगे गुह्यकोंसहित नरवाहन धनाध्यक्ष भगवान् कुबेर मनोहर पुष्पक विमानपर बैठकर जा रहे थे ॥ ३२ ॥
ऐरावतं समास्थाय शक्रश्चापि सुरैः सह ॥ ३३ ॥
पृष्ठतोऽनुययौ यान्तं वरदं वृषभध्वजम् । देवताओंसहित इन्द्र भी ऐरावत हाथीपर आरूढ़ हो (भद्रवटको ) जाते हुए वरदायक भगवान् वृषभध्वजके पीछे - पीछे चल रहे थे ॥ ३३ ॥
जृम्भकैर्यक्षरक्षोभिः स्रग्विभिः समलङ्कृतः ॥ ३४ ॥
यात्यमोघो महायक्षो दक्षिणं पक्षमास्थितः ।
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मालाधारी जृम्भकगण, यक्ष तथा राक्षसोंसे सुशोभित महायक्ष अमोघ भगवान् शंकरके दाहिने भागमें रहकर चल रहा था ॥ ३४ ॥
तस्य दक्षिणतो देवा बहवश्चित्रयोधिनः ॥ ३५ ॥
गच्छन्ति वसुभिः सार्धं रुद्रैश्च सह सङ्गताः । उसके दाहिने भागमें विचित्र प्रकारके युद्ध करनेवाले बहुत - से देवता वसुओं तथा रुद्रोंके साथ संगठित होकर चल रहे थे ॥ ३५३ ॥
यमश्च मृत्युना सार्धं सर्वतः परिवारितः ॥ ३६ ॥
घोरैर्व्याधिशतैर्याति घोररूपवपुस्तथा । मृत्युसहित यमराज अत्यन्त भयंकर रूप धारण करके देवताओंके साथ यात्रा कर रहे थे । उन्हें सैकड़ों भयानक रोगोंने मूर्तिमान् होकर चारों ओरसे घेर रखा था ॥ ३६३ ॥
यमस्य पृष्ठतश्चैव घोरस्त्रिशिखरः शितः ॥ ३७ ॥
विजयो नाम रुद्रस्य याति शूलः स्वलङ्कृतः । यमराजके पीछे - पीछे भगवान् शंकरका विजय नामक भयंकर त्रिशूल जा रहा था, जो तीन शिखरोंसे सुशोभित और तीक्ष्ण था । उस त्रिशूलको सिन्दूर आदिसे भलीभाँति सजाया गया था ॥ ३७३ ॥
तमुग्रपाशो वरुणो भगवान् सलिलेश्वरः ॥ ३८ ॥
परिवार्य शनैर्याति यादोभिर्विविधैर्वृतः । जलके स्वामी भगवान् वरुण हाथमें भयंकर पाश लिये उस त्रिशूलको सब ओरसे घेरकर धीरे - धीरे चल रहे थे । उनके साथ नाना प्रकारकी आकृतिवाले जलजन्तु भी थे ॥ ३८३ ॥
पृष्ठतो विजयस्यापि याति रुद्रस्य पट्टिशः ॥ ३ ९ ॥ गदामुसलशक्त्याद्यैर्वृतः प्रहरणोत्तमैः । विजयके पीछे भगवान् रुद्रका पट्टिश नामक शस्त्र जा रहा था, जिसे गदा, मुसल और शक्ति आदि उत्तम आयुधोंने घेर रक्खा था ॥ ३ ९ ३ ॥ पट्टिशं त्वन्वगाद् राजञ्छत्रं रौद्रं महाप्रभम् ॥ ४० ॥
कमण्डलुश्चाप्यनु तं महर्षिगणसेवितः । राजन्! पट्टिशके पीछे भगवान् रुद्रका अत्यन्त प्रभापूर्ण छत्र जा रहा था और उसके पीछे महर्षियोंद्वारा सेवित कमण्डलु यात्रा कर रहा था ॥ ४० ॥
तस्य दक्षिणतो भाति दण्डो गच्छन् श्रिया वृतः ॥ ४१ ॥
भृग्वङ्गिरोभिः सहितो दैवतैश्चानुपूजितः ।
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कमण्डलुके दाहिने भागमें जाते हुए तेजस्वी दण्डकी बड़ी शोभा हो रही थी । उसके साथ भृगु और अंगिरा आदि महर्षि थे और देवता भी बार- बार उसका पूजन करते थे ॥ ४१ ॥
एषां तु पृष्ठतो रुद्रो विमले स्यन्दने स्थितः ॥ ४२ ॥
याति संहर्षयन् सर्वांस्तेजसा त्रिदिवौकसः । इन सबके पीछे उज्ज्वल रथपर आरुढ़ हो रुद्रदेव यात्रा करते थे, जो अपने तेजसे सम्पूर्ण देवताओंका हर्ष बढ़ा रहे थे ॥ ४२ ॥
ऋषयश्चापि देवाश्च गन्धर्वा भुजगास्तथा ॥ ४३ ॥
नद्यो ह्रदाः समुद्राश्च तथैवाप्सरसां गणाः ।
नक्षत्राणि ग्रहाश्चैव देवानां शिशवश्च ये ॥ ४४ ॥
रुद्रदेवके पीछे ऋषि, देवता, गन्धर्व, नाग, नदियाँ, गहरे जलाशय, समुद्र, अप्सराएँ, नक्षत्र, ग्रह तथा देवकुमार चल रहे थे ॥ ४३-४४ ॥
स्त्रियश्च विविधाकारा यान्ति रुद्रस्य पृष्ठतः ।
सृजन्त्यः पुष्पवर्षाणि चारुरूपा वराङ्गनाः ॥ ४५ ॥
मनोहर रूप और भाँति- भाँतिकी आकृति धारण करनेवाली बहुत - सी सुन्दरी स्त्रियाँ फूलोंकी वर्षा करती हुई भगवान् रुद्रके पीछे - पीछे जा रही थीं ॥ ४५ ॥
पर्जन्यश्चाप्यनुययौ नमस्कृत्य पिनाकिनम् ।
छत्रं च पाण्डुरं सोमस्तस्य मूर्धन्यधारयत् ॥ ४६ ॥
पिनाकधारी भगवान् शंकरको नमस्कार करके पर्जन्यदेव भी उनके पीछे - पीछे चले ।
चन्द्रमाने उनके मस्तकपर श्वेत छत्र लगा रखा था ॥ ४६ ॥
चामरे चापि वायुश्च गृहीत्वाग्निश्च धिष्ठितौ ।
शक्रश्च पृष्ठतस्तस्य याति राजञ्छ्रिया वृतः ॥ ४७ ॥
सह राजर्षिभिः सर्वैः स्तुवानो वृषकेतनम् । राजन्! वायु और अग्नि चँवर लेकर दोनों ओर खड़े थे । तेजस्वी इन्द्र समस्त राजर्षियोंके साथ भगवान् वृषभध्वजकी स्तुति करते हुए उनके पीछे - पीछे जा रहे थे ॥ ४७ ३ ॥ गौरी विद्याथ गान्धारी केशिनी मित्रसाह्वया ॥ ४८ ॥
सावित्र्या सह सर्वास्ताः पार्वत्या यान्ति पृष्ठतः ।
तत्र विद्यागणाः सर्वे ये केचित् कविभिः कृताः ॥ ४ ९ ॥
गौरी, विद्या, गान्धारी, केशिनी, मित्रा और सावित्री - ये सब पार्वतीदेवीके पीछे - पीछे चल रही थीं । विद्वानोंद्वारा प्रकाशित सम्पूर्ण विद्याएँ भी उन्हींके साथ थीं ॥ ४८-४९ ॥
तस्य कुर्वन्ति वचनं सेन्द्रा देवाश्चमूमुखे ।
गृहीत्वा तु पताकां वै यात्यग्रे राक्षसो ग्रहः ॥ ५० ॥
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इन्द्र आदि देवता सेनाके मुहानेपर उपस्थित हो भगवान् शिवके आदेशका पालन करते थे । एक राक्षस ग्रह सेनाका झंडा लेकर आगे- आगे चलता था ॥ ५० ॥
व्यापृतस्तु श्मशाने यो नित्यं रुद्रस्य वै सखा ।
पिङ्गलो नाम यक्षेन्द्रो लोकस्यानन्ददायकः ॥ ५१ ॥
भगवान् रुद्रका सखा यक्षराज पिंगलदेव जो सदा श्मशानमें ही ( उसकी रक्षाके लिये ) निवास करता और सम्पूर्ण जगत्को आनन्द देनेवाला था, उस यात्रामें भगवान् शिवके साथ था ॥ ५१ ॥
एभिश्च सहितो देवस्तत्र याति यथासुखम् ।
अग्रतः पृष्ठतश्चैव न हि तस्य गतिर्ध्रुवा ॥ ५२ ॥
इन सबके साथ महादेवजी सुखपूर्वक भद्रवटकी यात्रा कर रहे थे। वे कभी सेनाके
आगे रहते और कभी पीछे । उनकी कोई निश्चित गति नहीं थी ॥ ५२ ॥
रुद्रं सत्कर्मभिर्मर्त्याः पूजयन्तीह दैवतम् ।
शिवमित्येव यं प्राहुरीशं रुद्रं पितामहम् ॥ ५३ ॥
भावैस्तु विविधाकारैः पूजयन्ति महेश्वरम् । मरणधर्मा मनुष्य इस संसारमें सत्कर्मोंद्वारा रुद्रदेवकी ही पूजा करते हैं । इन्हींको शिव, ईश, रुद्र और पितामह कहते हैं । लोग नाना प्रकारके भावोंसे भगवान् महेश्वरकी पूजा करते हैं ॥ ५३ ॥
देवसेनापतिस्त्वेवं देवसेनाभिरावृतः ।
अनुगच्छति देवेशं ब्रह्मण्यः कृत्तिकासुतः ॥ ५४ ॥
इसी प्रकार ब्राह्मणहितैषी, देवसेनापति, कृत्तिका - नन्दन स्कन्द भी देवताओंकी सेनासे घिरे हुए देवेश्वर भगवान् शिवके पीछे- पीछे जा रहे थे ॥ ५४ ॥
अथाब्रवीन्महासेनं महादेवो बृहद् वचः ।
सप्तमं मारुतस्कन्धं रक्ष नित्यमतन्द्रितः ॥ ५५ ॥
तदनन्तर महादेवजीने कुमार महासेनसे यह उत्तम बात कही - ' बेटा! तुम सदा सावधानीके साथ मारुतस्कन्ध नामक देवताओंके सातवें व्यूहकी रक्षा करना ' ॥ ५५ ॥
स्कन्द उवाच
सप्तमं मारुतस्कन्धं पालयिष्याम्यहं प्रभो ।
यदन्यदपि मे कार्यं देव तद् वद माचिरम् ॥ ५६ ॥
स्कन्द बोले — प्रभो! मैं सातवें व्यूह मारुतस्कन्धकी अवश्य रक्षा करूँगा । देव! इसके सिवा और भी मेरा जो कुछ कर्तव्य हो, उसके लिये आप शीघ्र आज्ञा दीजिये ॥ रुद्र उवाच कार्येष्वहं त्वया पुत्र संद्रष्टव्यः सदैव हि ।
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दर्शनान्मम भक्त्या च श्रेयः परमवाप्स्यसि ॥ ५७ ॥
रुद्रने कहा - पुत्र! काम पड़नेपर तुम सदा मुझसे मिलते रहना । मेरे दर्शनसे तथा मुझमें भक्ति करनेसे तुम्हारा परम कल्याण होगा ॥ ५७ ॥
मार्कण्डेय उवाच
इत्युक्त्वा विससर्जेनं परिष्वज्य महेश्वरः ।
विसर्जिते ततः स्कन्दे बभूवौत्पातिकं महत् ॥ ५८ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! ऐसा कहकर भगवान् महेश्वरने कार्तिकेयको हृदयसे लगाकर बिदा किया । स्कन्दके बिदा होते ही बड़ा भारी उत्पात होने लगा ॥ ५८ ॥
सहसैव महाराज देवान् सर्वान् प्रमोहयत् ।
जज्वाल खं सनक्षत्रं प्रमूढं भुवनं भृशम् ॥ ५ ९ ॥
महाराज! सहसा समस्त देवताओंको मोहमें डालता हुआ नक्षत्रोंसहित आकाश प्रज्वलित हो उठा । समस्त संसार अत्यन्त मूढ़ - सा हो गया ॥ ५ ९ ॥
चचाल व्यनदच्चोर्वी तमोभूतं जगद् बभौ ।
ततस्तद् दारुणं दृष्ट्वा क्षुभितः शङ्करस्तदा ॥ ६० ॥
उमा चैव महाभागा देवाश्च समहर्षयः ।
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पृथ्वी हिलने लगी । उसमें गड़गड़ाहट पैदा हो गयी । सारा जगत् अन्धकारमें मग्न- सा जान पड़ता था । उस समय यह दारुण उत्पात देखकर भगवान् शंकर, महाभागा उमा, देवगण तथा महर्षिगण क्षुब्ध हो उठे ॥ ततस्तेषु प्रमूढेषु पर्वताम्बुदसंनिभम् ॥ ६१ ॥
नानाप्रहरणं घोरमदृश्यत महद् बलम् ।
तद् वै घोरमसंख्येयं गर्जच्च विविधा गिरः ॥ ६२ ॥
जिस समय वे सब लोग मोहग्रस्त हो रहे थे, उसी समय पर्वतों और मेघमालाओंके समान दैत्योंकी विशाल एवं भयंकर सेना दिखायी दी । वह नाना प्रकारके अस्त्र- शस्त्रोंसे सुसज्जित थी । उसके सैनिकोंकी संख्या गिनी नहीं जा सकती थी । वह भयंकर वाहिनी अनेक प्रकारकी बोली बोलती हुई भीषण गर्जना कर रही थी ॥
अभ्यद्रवद् रणे देवान् भगवन्तं च शङ्करम् ।
तैर्विसृष्टान्यनीकेषु बाणजालान्यनेकशः ॥ ६३ ॥
उसने रणभूमिमें आकर देवताओं तथा भगवान् शंकरपर धावा बोल दिया । दैत्योंने देवताओंके सैनिकोंपर कई बार बाण - वर्षा की ॥ ६३ ॥
पर्वताश्च शतघ्न्यश्च प्रासासिपरिघा गदाः ।
निपतद्भिश्च तैर्घोरैर्देवानीकं महायुधैः ॥ ६४ ॥
क्षणेन व्यद्रवत् सर्वं विमुखं चाप्यदृश्यत । शिलाखण्ड, शतघ्नी ( तोप ), प्रास, खड्ग, परिघ और गदाओंके लगातार प्रहार हो रहे थे । इन भयंकर महान् अस्त्रोंकी मारसे देवताओंकी सारी सेना क्षणभरमें ( पीठ दिखाकर ) भाग चली । सारे सैनिक युद्धसे विमुख दिखायी देते थे ॥ ६४ ॥
निकृत्तयोधनागाश्वं कृत्तायुधमहारथम् ॥ ६५ ॥
दानवैरर्दितं सैन्यं देवानां विमुखं बभौ । बहुत - से योद्धा, हाथी और घोड़े काट डाले गये । असंख्य आयुध और बड़े - बड़े रथ टूक - टूक कर दिये गये । इस प्रकार दानवोंद्वारा पीड़ित हुई देवताओंकी सेना युद्धसे विमुख हो गयी ॥ ६५३ ॥
असुरैर्वध्यमानं तत् पावकैरिव काननम् ॥ ६६ ॥
अपतद् दग्धभूयिष्ठं महाद्रुमवनं यथा । जैसे आग समूचे वनको जला देती है, उसी प्रकार असुरोंने देवताओंकी सेनामें भारी मार- काट मचा दी । बड़े- बड़े वृक्षोंसे भरे हुए वनका अधिकांश भाग जल जानेपर उसकी जैसी'दुरवस्था दिखायी देती है, उसी प्रकार दैत्योंकी अस्त्राग्निमें अधिकांश सैनिकोंके दग्ध हो जानेके कारण वह देवसेना धराशायिनी हो रही थी ॥ ते विभिन्नशिरोदेहाः प्राद्रवन्तो दिवौकसः ॥ ६७ ॥
न नाथमधिगच्छन्ति वध्यमाना महारणे ।
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उस महासमरमें असुरोंकी मार खाकर वे सब देवता भागते हुए कहीं कोई रक्षक नहीं पा रहे थे । किन्हींके सिर फट गये थे तो किन्हींके सब अंगोंमें गहरे घाव हो गये थे ॥ ६७ || अथ तद् विद्रुतं सैन्यं दृष्ट्वा देवः पुरंदरः ॥ ६८ ॥
आश्वासयन्नुवाचेदं बलभिद् दानवार्दितम् ।
भयं त्यजत भद्रं वः शूराः शस्त्राणि गृह्णत ॥ ६ ९ ॥
कुरुध्वं विक्रमे बुद्धिं मा वः काचिद् व्यथा भवेत् ।
जयतैनान् सुदुर्वृत्तान् दानवान् घोरदर्शनान् ॥ ७० ॥
अभिद्रवत भद्रं वो मया सह महासुरान् ।
शक्रस्य वचनं श्रुत्वा समाश्वस्ता दिवौकसः ॥ ७१ ॥
तदनन्तर बलासुरविनाशक देवराज इन्द्रने अपनी उस सेनाको दानवोंसे पीड़ित होकर भागती देख उसे आश्वासन देते हुए कहा -' शूरवीरो! भय त्याग दो, इससे तुम्हारा मंगल होगा । हथियार उठाओ और पराक्रममें मन लगाओ । तुम्हें किसी प्रकार व्यथित नहीं होना चाहिये । इन भयंकर दिखायी देनेवाले दुराचारी दानवोंको जीतो । तुम्हारा कल्याण हो। तुम सब लोग मेरे साथ इन महाकाय दैत्योंपर टूट पड़ो । ' इन्द्रकी यह बात सुनकर देवताओंको बड़ी सान्त्वना मिली ॥ ६८–७१ ॥
दानवान् प्रत्ययुध्यन्त शक्रं कृत्वा व्यपाश्रयम् ।
ततस्ते त्रिदशाः सर्वे मरुतश्च महाबलाः ॥ ७२ ॥
प्रत्युद्ययुर्महाभागाः साध्याश्च वसुभिः सह । उन्होंने इन्द्रको अपना आश्रय बनाकर दानवोंके साथ पुनः युद्ध प्रारम्भ किया । तत्पश्चात् वे सभी देवता महाबली मरुद्गण तथा वसुओं एवं महाभाग साध्यगण -सहित युद्धभूमिमें आगे बढ़ने लगे ॥ ७२३ ॥
तैर्विसृष्टान्यनीकेषु क्रुद्धैः शस्त्राणि संयुगे ॥ ७३ ॥
शराश्च दैत्यकायेषु पिबन्ति रुधिरं बहु । उन्होंने संग्राममें कुपित होकर दैत्योंकी सेनाओंके ऊपर जो अस्त्र- शस्त्र और बाण चलाये, वे उनके शरीरोंमें घुसकर प्रचुर मात्रामें रक्त पीने लगे ॥ ७३ ॥
तेषां देहान् विनिर्भिद्य शरास्ते निशितास्तदा ॥ ७४ ॥
निपतन्तोऽभ्यदृश्यन्त नगेभ्य इव पन्नगाः । वे तीखे बाण उस समय दैत्योंके शरीरोंको विदीर्ण कर रणभूमिमें इस प्रकार गिरते दिखायी देते थे, मानो वृक्षोंसे सर्प गिर रहे हों ॥ ७४ ॥
तानि दैत्यशरीराणि निर्भिन्नानि स्म सायकैः ॥ ७५ ॥
अपतन् भूतले राजंश्छिन्नाभ्राणीव सर्वशः ।
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राजन्! देवताओंके बाणोंसे विदीर्ण हुए वे दैत्योंके शरीर सब प्रकारसे छिन्न - भिन्न हुए बादलोंके समान धरतीपर गिरने लगे ॥ ७५३ ॥
ततस्तद् दानवं सैन्यं सर्वैर्देवगणैर्युधि ॥ ७६ ॥
त्रासितं विविधैर्बाणैः कृतं चैव पराङ्मुखम् । तदनन्तर समस्त देवताओंने उस युद्धमें दानवसेनाको अपने विविध बाणोंके प्रहारसे भयभीत करके रणभूमिसे विमुख कर दिया ॥ ७६३ ॥
अथोत्क्रुष्टं तदा हृष्टैः सर्वैर्देवैरुदायुधैः ॥ ७७ ॥
संहतानि च तूर्याणि प्रावाद्यन्त ह्यनेकशः । फिर तो उस समय हाथोंमें अस्त्र- शस्त्र उठाये सम्पूर्ण देवता हर्षमें भरकर कोलाहल करने लगे और अनेक प्रकारके विजय वाद्य एक साथ बज उठे ॥ ७७ ॥
एवमन्योन्यसंयुक्तं युद्धमासीत् सुदारुणम् ॥ ७८ ॥
देवानां दानवानां च मांसशोणितकर्दमम् ।
अनयो देवलोकस्य सहसैवाभ्यदृश्यत ॥ ७९ ॥
तथा हि दानवा घोरा विनिघ्नन्ति दिवौकसः । इस प्रकार देवताओं और दानवोंमें परस्पर अत्यन्त भयंकर युद्ध हो रहा था । रक्त और मांससे वहाँकी भूमिपर कीचड़ जम गयी थी । फिर सहसा बाजी पलट गयी । देवलोककी
पराजय दिखायी देने लगी । भयंकर दानव देवताओंको मारने लगे ॥ ७८-७९ ३ ॥
ततस्तूर्यप्रणादाश्च भेरीणां च महास्वनः ॥ ८० ॥
बभूवुर्दानवेन्द्राणां सिंहनादाश्च दारुणाः । उस समय दानवेन्द्रोंके भयंकर सिंहनाद सुनायी पड़ते थे । उनके रणवाद्यों तथा भेरियोंका गम्भीर घोष सब ओर गूँज उठा ॥ ८०३ ॥
अथ दैत्यबलाद् घोरान्निष्पपात महाबलः ॥ ८१ ॥
दानवो महिषो नाम प्रगृह्य विपुलं गिरिम् । इतनेहीमें दैत्योंकी भयंकर सेनासे महाबली दानव ' महिष ' हाथोंमें एक विशाल पर्वत लिये निकला और देवताओंपर टूट पड़ा ॥ ८१३ ॥
ते तं घनैरिवादित्यं दृष्ट्वा सम्परिवारितम् ॥ ८२ ॥
तमुद्यतगिरिं राजन् व्यद्रवन्त दिवौकसः । राजन्! बादलोंसे घिरे हुए सूर्यकी भाँति पर्वत उठाये हुए उस दानवको देखकर सब देवता भाग चले ॥ ८२३ ॥
अथाभिद्रुत्य महिषो देवांश्चिक्षेप तं गिरिम् ॥ ८३ ॥
पतता तेन गिरिणा देवसैन्यस्य पार्थिव ।
भीमरूपेण निहतमयुतं प्रापतद् भुवि ॥ ८४ ॥
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परंतु महिषासुरने देवताओंका पीछा करके उनके ऊपर वह पहाड़ पटक दिया । युधिष्ठिर! उस भयानक पर्वतके गिरनेसे देवसेनाके दस हजार योद्धा कुचलकर धरतीपर गिर पड़े ॥ ८३-८४ ॥
अथ तैर्दानवैः सार्धं महिषस्त्रासयन् सुरान् ।
अभ्यद्रवद् रणे तूर्णं सिंहः क्षुद्रमृगानिव ॥ ८५ ॥
तदनन्तर जैसे सिंह छोटे मृगोंको डराता हुआ उनपर टूट पड़ता है, उसी प्रकार महिषासुरने अपने दानव - सैनिकोंके साथ रणभूमिमें समस्त देवताओंको भयभीत करते हुए उनपर शीघ्र ही प्रबल आक्रमण किया ॥ ८५ ॥
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Gremie कार्तिकेयके द्वारा महिषासुरका वध तमापतन्तं महिषं दृष्ट्वा सेन्द्रा दिवौकसः ।