श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1571–1580

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1571–1580

पृष्ठ 1571

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स्कन्द बोले — देवियो! आपलोगोंने यह दुःखकी बात कही है, तो भी मैं आपको पहलेकी मातृकाओंकी संतानको अर्पित कर देता हूँ; परंतु आपलोग उन सबकी रक्षा करें;

इसीसे आपका भला होगा । मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ ॥ २० ॥

मातर ऊचुः

परिरक्षाम भद्रं ते प्रजाः स्कन्द यथेच्छसि ।

त्वया नो रोचते स्कन्द सहवासश्चिरं प्रभो ॥ २१ ॥

माताओंने कहा — स्कन्द! जैसी तुम्हारी इच्छा है, उसके अनुसार हम उन संतानोंकी रक्षा अवश्य करेंगी । शक्तिशाली कुमार! हमें दीर्घकालतक तुम्हारे साथ रहनेकी इच्छा है ॥ २१ ॥

स्कन्द उवाच

यावत् षोडश वर्षाणि भवन्ति तरुणाः प्रजाः ।

प्रबाधत मनुष्याणां तावद्रूपैः पृथग्विधैः ॥ २२ ॥

स्कन्द बोले — संसारके मनुष्य जबतक सोलह वर्षके तरुण न हो जायँ, तबतक आप मानव- प्रजाको पृथक् - पृथक् उतने ही रूप धारण करके संताप दे सकती हैं ॥ २२ ॥

अहं च वः प्रदास्यामि रौद्रमात्मानमव्ययम् ।

परमं तेन सहिताः सुखं वत्स्यथ पूजिताः ॥ २३ ॥

मैं आपलोगोंको एक भयंकर एवं अविनाशी पुरुष प्रदान करूँगा, जो मेरा अभिन्न स्वरूप होगा । उसके साथ सम्मानपूर्वक रहकर आपलोग परम सुखकी भागिनी होंगी ॥ २३ ॥

मार्कण्डेय उवाच

ततः शरीरात् स्कन्दस्य पुरुषः पावकप्रभः ।

भोक्तुं प्रजाः स मर्त्यानां निष्पपात महाप्रभः ॥ २४ ॥

मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर स्कन्दके शरीरसे अग्निके समान तेजस्वी तथा परम कान्तिमान् एक पुरुष प्रकट हुआ, जो समस्त मानव प्रजाको खा जानेकी इच्छा रखता था ॥ २४ ॥

अपतत् सहसा भूमौ विसंज्ञोऽथ क्षुधार्दितः ।

स्कन्देन सोऽभ्यनुज्ञातो रौद्ररूपोऽभवद् ग्रहः ॥ २५ ॥

वह पैदा होते ही भूखसे पीडित हो सहसा अचेत होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा । फिर स्कन्दकी आज्ञासे वह भयंकर रूपधारी ग्रह हो गया ॥ २५ ॥

स्कन्दापस्मारमित्याहुर्ग्रहं तं द्विजसत्तमाः ।

विनता तु महारौद्रा कथ्यते शकुनिग्रहः ॥ २६ ॥

पृष्ठ 1572

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श्रेष्ठ द्विज! इस ग्रहको ' स्कन्दापस्मार' कहते हैं। इसी प्रकार अत्यन्त रौद्र रूप धारण करनेवाली विनताको ‘ शकुनि ग्रह ' बताया जाता है ॥ २६ ॥

पूतनां राक्षसीं प्राहुस्तं विद्यात् पूतनाग्रहम् ।

कष्टा दारुणरूपेण घोररूपा निशाचरी ॥ २७ ॥

पूतनाको राक्षसी बताया गया है, उसे ' पूतनाग्रह' समझना चाहिये । वह भयंकर रूप धारण करनेवाली निशाचरी बड़ी क्रूरताके साथ बालकोंको कष्ट पहुँचाती है ॥ २७ ॥

पिशाची दारुणाकारा कथ्यते शीतपूतना ।

गर्भान् सा मानुषीणां तु हरते घोरदर्शना ॥ २८ ॥

इसके सिवा भयानक आकारवाली एक पिशाची है, जिसे ' शीतपूतना ' कहते हैं, वह

देखनेमें बड़ी डरावनी है । वह मानवी स्त्रियोंका गर्भ हर ले जाती है ॥ २८ ॥

अदितिं रेवतीं प्राहुर्ग्रहस्तस्यास्तु रैवतः ।

सोऽपि बालान् महाघोरो बाधते वै महाग्रहः ॥ २ ९ ॥

लोग अदिति देवीको रेवती कहते हैं । रेवतीके ग्रहका नाम रैवत है । वह महाभयंकर महान् ग्रह भी बालकोंको बड़ा कष्ट देता है ॥ २ ९ ॥

दैत्यानां या दितिर्माता तामाहुर्मुखमण्डिकाम् ।

अत्यर्थं शिशुमांसेन सम्प्रहृष्टा दुरासदा ॥ ३० ॥

दैत्योंकी माता जो दिति है, उसे ' मुखमण्डिका ' कहते हैं। वह छोटे बच्चोंके मांससे

अधिक प्रसन्न होती है । उसे पराजित करना अत्यन्त कठिन है ॥ ३० ॥

कुमाराश्च कुमार्यश्च ये प्रोक्ताः स्कन्दसम्भवाः ।

तेऽपि गर्भभुजः सर्वे कौरव्य सुमहाग्रहाः ॥ ३१ ॥

कुरुनन्दन! स्कन्दके शरीरसे उत्पन्न हुए जिन कुमार एवं कुमारियोंका वर्णन किया गया है, वे सभी गर्भस्थ बालकोंका भक्षण करनेवाले महान् ग्रह हैं ॥ ३१ ॥

तासामेव तु पत्नीनां पतयस्ते प्रकीर्तिताः ।

आजायमानान् गृह्णन्ति बालकान् रौद्रकर्मिणः ॥ ३२ ॥

वे कुमार उन्हीं पत्नीस्वरूपा कुमारियोंके पति कहे गये हैं । उनके कर्म बड़े भयंकर हैं । वे जन्म लेनेके पहले ही बच्चोंको पकड़ ले जाते हैं ॥ ३२ ॥

गवां माता तु या प्राज्ञैः कथ्यते सुरभिर्नृप ।

शकुनिस्तामथारुह्य सह भुङ्क्ते शिशून् भुवि ॥ ३३ ॥

राजन्! विद्वान् पुरुष जिसे गोमाता सुरभि कहते हैं, उसीपर आरूढ़ होकर शकुनिग्रह —विनता अन्य ग्रहोंके साथ भूमण्डलके बालकोंका भक्षण करती है ॥ ३३ ॥

सरमा नाम या माता शुनां देवी जनाधिप ।

सापि गर्भान् समादत्ते मानुषीणां सदैव हि ॥ ३४ ॥

पृष्ठ 1573

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नरेश्वर! कुत्तोंकी माता जो देवजातीय सरमा है, वह भी सदैव मानवीय स्त्रियोंके गर्भस्थ बालकोंका अपहरण करती रहती है ॥ ३४ ॥

पादपानां च या माता करञ्जनिलया हि सा ।

वरदा सा हि सौम्या च नित्यं भूतानुकम्पिनी ॥ ३५ ॥

जो वृक्षोंकी माता है, वह करंजवृक्षपर निवास किया करती है । वह वर देनेवाली तथा सौम्य है और सदा समस्त प्राणियोंपर कृपा करती है ॥ ३५ ॥

करञ्जे तां नमस्यन्ति तस्मात् पुत्रार्थिनो नराः ।

इमे त्वष्टादशान्ये वै ग्रहा मांसमधुप्रियाः ॥ ३६ ॥

द्विपञ्चरात्रं तिष्ठन्ति सततं सूतिकागृहे ।

कद्रूः सूक्ष्मवपुर्भूत्वा गर्भिणीं प्रविशत्यथ ॥ ३७ ॥

भुङ्क्ते सा तत्र तं गर्भं सा तु नागं प्रसूयते । इसीलिये पुत्रार्थी मनुष्य करंजवृक्षपर रहनेवाली उस देवीको नमस्कार करते हैं । ये तथा दूसरे अठारह ग्रह मांस और मधुके प्रेमी हैं और दस राततक सूतिका- गृहमें निरन्तर टिके रहते हैं । कद्रू सूक्ष्म शरीर धारण करके गर्भिणी स्त्रीके शरीरके भीतर प्रवेश कर जाती है और वहाँ उस गर्भको खा जाती है । इससे वह गर्भिणी स्त्री सर्प पैदा करती है ॥ ३६-३७ || गन्धर्वाणां तु या माता सा गर्भं गृह्य गच्छति ॥ ३८ ॥

ततो विलीनगर्भा सा मानुषी भुवि दृश्यते । जो गन्धर्वोंकी माता है, वह गर्भिणी स्त्रीके गर्भको लेकर चल देती है, जिससे उस मानवी स्त्रीका गर्भ विलीन हुआ देखा जाता है ॥ ३८३ ॥

या जनित्री त्वप्सरसां गर्भमास्ते प्रगृह्य सा ॥ ३ ९ ॥ उपनष्टं ततो गर्भं कथयन्ति मनीषिणः । जो अप्सराओंकी माता है, वह भी गर्भको पकड़ लेती है, जिससे बुद्धिमान् मनुष्य कहते हैं कि अमुक स्त्रीका गर्भ नष्ट हो गया ॥ ३ ९ ३ ॥ लोहितस्योदधेः कन्या धात्री स्कन्दस्य सा स्मृता ॥ ४० ॥

लोहितायनिरित्येवं कदम्बे सा हि पूज्यते ।

लालसागरकी कन्याका नाम लोहितायनि है, जिसे स्कन्दकी धाय बताया गया है ।

उसकी कदम्बवृक्षोंमें पूजा की जाती है ॥ ४० ॥

पुरुषेषु यथा रुद्रस्तथाऽऽर्या प्रमदास्वपि ॥ ४१ ॥

आर्या माता कुमारस्य पृथक् कामार्थमिज्यते ।

एवमेते कुमाराणां मया प्रोक्ता महाग्रहाः ॥ ४२ ॥

यावत् षोडश वर्षाणि शिशूनां ह्यशिवास्ततः ।

पृष्ठ 1574

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जैसे पुरुषोंमें भगवान् रुद्र श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार स्त्रियोंमें आर्या उत्तम मानी गयी हैं । आर्या कुमार कार्तिकेयकी जननी हैं । लोग अपने अभीष्टकी सिद्धिके लिये उनका उपर्युक्त ग्रहोंसे पृथक् पूजन करते हैं । इस प्रकार मैंने ये कुमारसम्बन्धी महान् ग्रह बताये हैं । जबतक सोलह वर्षकी अवस्था न हो जाय, तबतक ये बालकोंका अमंगल करनेवाले होते हैं ॥ ४१-४२ ॥ ये च मातृगणाः प्रोक्ताः पुरुषाश्चैव ये ग्रहाः ॥ ४३ ॥

सर्वे स्कन्दग्रहा नाम ज्ञेया नित्यं शरीरिभिः । जो मातृगण और पुरुषग्रह बताये गये हैं, इन सबको समस्त देहधारी मनुष्य सदा ‘ स्कन्दग्रह ' के नामसे जाने * ॥ ४३ ॥

तेषां प्रशमनं कार्यं स्नानं धूपमथाञ्जनम् ।

बलिकर्मोपहाराश्च स्कन्दस्येज्याविशेषतः ॥ ४४ ॥

स्नान, धूप, अञ्जन, बलिकर्म, उपहार अर्पण तथा स्कन्ददेवकी विशेष पूजा करके इन स्कन्दग्रहोंकी शान्ति करनी चाहिये ॥ ४४ ॥

एवमभ्यर्चिताः सर्वे प्रयच्छन्ति शुभं नृणाम् ।

आयुर्वीर्यं च राजेन्द्र सम्यक्पूजानमस्कृताः ॥ ४५ ॥

राजेन्द्र! इस प्रकार पूजित तथा विधिवत् पूजनद्वारा अभिवन्दित होनेपर वे सभी ग्रह मनुष्योंका मंगल करते हैं और उन्हें आयु तथा बल देते हैं ॥ ४५ ॥

ऊर्ध्वं तु षोडशाद् वर्षाद् ये भवन्ति ग्रहा नृणाम् ।

तानहं सम्प्रवक्ष्यामि नमस्कृत्य महेश्वरम् ॥ ४६ ॥

अब मैं भगवान् महेश्वरको नमस्कार करके उन ग्रहोंका परिचय दूँगा, जो सोलह वर्षकी अवस्थाके बाद मनुष्योंके लिये अनिष्टकारक होते हैं ॥ ४६ ॥

यः पश्यति नरो देवान् जाग्रद् वा शयितोऽपि वा ।

उन्माद्यति स तु क्षिप्रं तं तु देवग्रहं विदुः ॥ ४७ ॥

जो मनुष्य जागते या सोतेमें देवताओंको देखता और तुरंत पागल हो जाता है, उस कष्ट देनेवाले ग्रहको ' देवग्रह' कहते हैं ॥ ४७ ॥

आसीनश्च शयानश्च यः पश्यति नरः पितॄन् ।

उन्माद्यति स तु क्षिप्रं स ज्ञेयस्तु पितृग्रहः ॥ ४८ ॥

जो मनुष्य बैठे - बैठे या सोते समय पितरोंको देखता और शीघ्र पागल हो जाता है, उस बाधा देनेवाले ग्रहको ‘ पितृग्रह ' जानना चाहिये ॥ ४८ ॥

अवमन्यति यः सिद्धान् क्रुद्धाश्चापि शपन्ति यम् ।

उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ज्ञेयः सिद्धग्रहस्तु सः ॥ ४ ९ ॥

पृष्ठ 1575

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जो सिद्ध पुरुषोंका अनादर करता है और क्रोधमें आकर वे सिद्ध पुरुष जिसे शाप दे देते हैं, जिसके कारण वह तुरंत पागल हो जाता है, उसे ' सिद्धग्रह ' की बाधा प्राप्त हुई है, ऐसा समझना चाहिये ॥ ४ ९ ॥

उपाघ्राति च यो गन्धान् रसांश्चापि पृथग्विधान् ।

उन्माद्यति स तु क्षिप्रं स ज्ञेयो राक्षसो ग्रहः ॥ ५० ॥

जो विभिन्न सुगन्धोंको सूँघता तथा रसोंका आस्वादन करता है एवं तत्काल ही उन्मत्त हो उठता है, उसपर प्रभाव डालनेवाले ग्रहको ' राक्षसग्रह ' जानना चाहिये ॥

गन्धर्वाश्चापि यं दिव्याः संविशन्ति नरं भुवि ।

उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ग्रहो गान्धर्व एव सः ॥ ५१ ॥

भूतलपर जिस मनुष्यमें दिव्य गन्धर्वोंका आवेश होता है, वह भी शीघ्र ही उन्मादग्रस्त हो जाता है । इसे ' गान्धर्वग्रह' की ही बाधा समझनी चाहिये ॥ ५१ ॥

अधिरोहन्ति यं नित्यं पिशाचाः पुरुषं प्रति ।

उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ग्रहः पैशाच एव सः ॥ ५२ ॥

जिस पुरुषपर सदा पिशाच चढ़े रहते हैं, वह भी शीघ्र पागल हो जाता है । अतः वह ' पिशाचग्रह ' की ही बाधा है ॥ ५२ ॥

आविशन्ति च यं यक्षाः पुरुषं कालपर्यये उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ज्ञेयो यक्षग्रहस्तु सः ॥ ५३ ॥

कालक्रमसे जिस पुरुषमें यक्षोंका आवेश होता है, उसे भी पागल होते देर नहीं लगती ।

इसे ‘ यक्षग्रह ' की बाधा जाननी चाहिये ॥ ५३ ॥

यस्य दोषैः प्रकुपितं चित्तं मुह्यति देहिनः ।

उन्माद्यति स तु क्षिप्रं साधनं तस्य शास्त्रतः ॥ ५४ ॥

जिस देहधारी मनुष्यका चित्त वात, पित्त और कफ नामक दोषोंके कुपित होनेसे अपनी संज्ञा खो बैठता है, वह शीघ्र ही विक्षिप्त हो जाता है । उसकी वैद्यक शास्त्रके अनुसार चिकित्सा करानी चाहिये ॥ ५४ ॥

वैक्लव्याच्च भयाच्चैव घोराणां चापि दर्शनात् ।

उन्माद्यति स तु क्षिप्रं सान्त्वं तस्य तु साधनम् ॥ ५५ ॥

जो घबराहट, भय तथा घोर वस्तुओंके दर्शनसे ही तत्काल पागल हो जाता है, उनके अच्छे होनेका उपाय केवल उसे सान्त्वना देना है ॥ ५५ ॥

कश्चित् क्रीडितुकामो वै भोक्तुकामस्तथापरः ।

अभिकामस्तथैवान्य इत्येष त्रिविधो ग्रहः ॥ ५६ ॥

कोई ग्रह क्रीडा -विनोदकी, कोई भोजनकी और कोई कामोपभोगकी इच्छा रखता है, इस प्रकार ग्रहोंकी प्रकृति तीन प्रकारकी है ॥ ५६ ॥

यावत् सप्ततिवर्षाणि भवन्त्येते ग्रहा नृणाम् ।

पृष्ठ 1576

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1576 का मूल पृष्ठ
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अतः परं देहिनां तु ग्रहतुल्यो भवेज्ज्वरः ॥ ५७ ॥

जबतक सत्तर वर्षकी अवस्था पूरी होती है, तबतक ये ग्रह मनुष्योंको सताते हैं । उसके बाद तो सभी देहधारियोंको ज्वर आदि रोग ही ग्रहोंके समान सताने लगते हैं ॥ ५७ ॥

अप्रकीर्णेन्द्रियं दान्तं शुचिं नित्यमतन्द्रितम् ।

आस्तिकं श्रद्दधानं च वर्जयन्ति सदा ग्रहाः ॥ ५८ ॥

जिसने अपनी इन्द्रियोंको सब ओरसे समेट लिया है, जो जितेन्द्रिय, पवित्र, नित्य आलस्यरहित, आस्तिक तथा श्रद्धालु है, उस पुरुषको ग्रह कभी नहीं छेड़ते हैं — उसे दूरसे ही त्याग देते हैं ॥ ५८ ॥

इत्येष ते ग्रहोद्देशो मानुषाणां प्रकीर्तितः ।

न स्पृशन्ति ग्रहा भक्तान् नरान् देवं महेश्वरम् ॥ ५ ९ ॥

राजन्! इस प्रकार मैंने मनुष्योंको जो ग्रहोंकी बाधा प्राप्त होती है, उसका संक्षेपसे वर्णन किया है । जो भगवान् महेश्वरके भक्त हैं, उन मनुष्योंको भी ये ग्रह नहीं छूते हैं ॥ ५ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आङ्गिरसे मनुष्यग्रहकथने त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानके प्रसंगमें मनुष्योंको कष्ट देनेवाले ग्रहोंके वर्णनसे सम्बन्ध रखनेवाला दो सौ तीसवाँअध्याय पूराहुआ ॥ २३० ॥

* मनुष्योंको कष्ट देनेवाले ये तामस स्कन्दग्रह भगवान् रुद्रके भूत-प्रेतादि गणोंकी भाँति कुमार स्कन्दके शरीरसे उत्पन्न तमोमय कुमारके साथी माने जाते हैं । इन ग्रहोंसे रक्षा पानेके लिये भगवान् महेश्वरकी भक्ति करनी चाहिये । भय दिखाकर भी भगवान्की भक्ति करानेमें हेतुभूत होनेके कारण इन ग्रहोंका वर्णन यहाँ किया गया है । भगवान्के भक्तोंको ये ग्रह छू भी नहीं सकते । तमोगुणी प्रजापर ही सब तामस ग्रहोंका बल काम करता है । और वही इनकी पूजा- अर्चना किया करते हैं।

पृष्ठ 1577

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1577 का मूल पृष्ठ
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एकत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः स्कन्दद्वारा स्वाहादेवीका सत्कार, रुद्रदेवके साथ स्कन्द और देवताओंकी भद्रवट- यात्रा, देवासुर संग्राम, महिषासुर- वध तथा स्कन्दकी प्रशंसा मार्कण्डेय उवाच

यदा स्कन्देन मातृणामेवमेतत् प्रियं कृतम् ।

अथैनमब्रवीत् स्वाहा मम पुत्रस्त्वमौरसः ॥ १ ॥

मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! जब स्कन्दने इस प्रकार मातृगणोंका यह प्रिय मनोरथ पूर्ण किया, तब स्वाहाने आकर उनसे कहा - ' तुम मेरे औरस पुत्र हो ॥ १ ॥

इच्छाम्यहं त्वया दत्तां प्रीतिं परमदुर्लभाम् ।

तामब्रवीत् ततः स्कन्दः प्रीतिमिच्छसि कीदृशीम् ॥ २ ॥

' अतः मैं चाहती हूँ कि तुम मुझे परम दुर्लभ प्रीति प्रदान करो । ' तब स्कन्दने पूछा — ' माँ तुम कैसी प्रीति पानेकी अभिलाषा रखती हो? ' ॥ २ ॥

स्वाहोवाच

दक्षस्याहं प्रिया कन्या स्वाहा नाम महाभुज ।

बाल्यात्प्रभृति नित्यं च जातकामा हुताशने ॥ ३ ॥

स्वाहा बोली- महाबाहो! मैं प्रजापति दक्षकी प्रिय पुत्री हूँ, मेरा नाम स्वाहा है । मैं बचपनसे ही सदा अग्निदेवके प्रति अनुराग रखती आयी हूँ ॥ ३ ॥

न स मां कामिनीं पुत्र सम्यक् जानाति पावकः ।

इच्छामि शाश्वतं वासं वस्तुं पुत्र सहाग्निना ॥ ४ ॥

पुत्र! परंतु अग्निदेवको इस बातका अच्छी तरह पता नहीं है कि मैं उन्हें चाहती हूँ । बेटा! मेरी यह हार्दिक अभिलाषा है कि मैं नित्य- निरन्तर अग्निदेवके ही साथ निवास करूँ ॥ ४ ॥

स्कन्द उवाच

हव्यं कव्यं च यत्किंचिद् द्विजानां मन्त्रसंस्तुतम् ।

होष्यन्त्यग्नौ सदा देवि स्वाहेत्युक्त्वा समुद्धृतम् ॥ ५ ॥

अद्यप्रभृति दास्यन्ति सुवृत्ताः सत्पथे स्थिताः ।

एवमग्निस्त्वया सार्धं सदा वत्स्यति शोभने ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1578

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स्कन्द बोले — देवि! आजसे सन्मार्गपर चलने - वाले सदाचारी धर्मात्मा मनुष्य देवताओं तथा पितरोंके लिये हव्य और कव्यके रूपमें उठाकर ब्राह्मणोंद्वारा उच्चारित वेदमन्त्रोंके साथ अग्निमें जो कुछ आहुति देंगे, वह सब स्वाहाका नाम लेकर ही अर्पण करेंगे । शोभने! इस प्रकार तुम्हारे साथ निरन्तर अग्निदेवका निवास बना रहेगा ॥ ५-६ ॥ मार्कण्डेय उवाच

एवमुक्ता ततः स्वाहा तुष्टा स्कन्देन पूजिता ।

पावकेन समायुक्ता भर्त्रा स्कन्दमपूजयत् ॥ ७ ॥

मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! स्कन्दके इस प्रकार कहने और आदर देनेपर स्वाहा बहुत संतुष्ट हुई । अपने स्वामी अग्निदेवका संयोग पाकर उसने भी स्कन्दका पूजन किया ॥ ७ ॥

ततो ब्रह्मा महासेनं प्रजापतिरथाब्रवीत् ।

अभिगच्छ महादेवं पितरं त्रिपुरार्दनम् ॥ ८ ॥

तदनन्तर प्रजापति ब्रह्माजीने महासेनसे कहा– ' वत्स! अब तुम अपने पिता त्रिपुरविनाशक महादेवजीसे मिलो ॥

रुद्रेणाग्निं समाविश्य स्वाहामाविश्य चोमया ।

हितार्थं सर्वलोकानां जातस्त्वमपराजितः ॥ ९ ॥

‘ भगवान् रुद्रने अग्निमें और भगवती उमाने स्वाहामें प्रवेश करके समस्त लोकोंके हितके लिये तुम - जैसे अपराजित वीरको उत्पन्न किया है ॥ ९ ॥

उमायोन्यां च रुद्रेण शुक्रं सिक्तं महात्मना ।

अस्मिन् गिरौ निपतितं मिञ्जिकामिञ्जिकं यतः ॥ १० ॥

सम्भूतं लोहितोदे तु शुक्रशेषमवापतत् ।

सूर्यरश्मिषु चाप्यन्यदन्यच्चैवापतद् भुवि ॥ ११ ॥

आसक्तमन्यद् वृक्षेषु तदेवं पञ्चधापतत् ।

तत्र ते विविधाकारा गणा ज्ञेया मनीषिभिः ।

तव पारिषदा घोरा य एते पिशिताशिनः ॥ १२ ॥

‘ महात्मा रुद्रने उमाके गर्भमें जिस वीर्यकी स्थापना की थी, उसका कुछ भाग इसी पर्वतपर गिर पड़ा था, जिससे मिंजिका -मिंजिक नामक जोड़ेकी उत्पत्ति हुई । शेष शुक्रका कुछ अंश लोहित- सागरमें, कुछ सूर्यकी किरणोंमें, कुछ पृथ्वीपर और कुछ वृक्षोंपर गिर पड़ा । इस प्रकार वह पाँच भागोंमें विभक्त होकर गिरा था । उसीसे ये तुम्हारे विभिन्न आकृतिवाले, मांसभक्षी एवं भयंकर पार्षद प्रकट हुए हैं; जिन्हें मनीषी पुरुष ही जान पाते हैं ' ॥ १०–१२ ॥ एवमस्त्विति चाप्युक्त्वा महासेनो महेश्वरम् ।

पृष्ठ 1579

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अपूजयदमेयात्मा पितरं पितृवत्सलः ॥ १३ ॥

तब अपरिमित आत्मबलसे सम्पन्न एवं पितृभक्त कुमार महासेनने ' एवमस्तु ' कहकर अपने पिता भगवान् महेश्वरका पूजन किया ॥ १३ ॥

मार्कण्डेय उवाच

अर्कपुष्पैस्तु ते पञ्च गणाः पूज्या धनार्थिभिः ।

व्याधिप्रशमनार्थं च तेषां पूजां समाचरेत् ॥ १४ ॥

मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! धनार्थी पुरुषों को आकके फूलोंसे उन पाँचों गणोंकी सेवा करनी चाहिये । रोगोंकी शान्तिके लिये भी उनका पूजन करना उचित है ॥ १४ ॥

मिञ्जिकामिञ्जिकं चैव मिथुनं रुद्रसम्भवम् ।

नमस्कार्यं सदैवेह बालानां हितमिच्छता ॥ १५ ॥

मिंजिका -मिंजकका जोड़ा भी भगवान् शंकरसे उत्पन्न हुआ है । अतः बालकोंके हितकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको चाहिये कि वे सदा इस जोड़ेको नमस्कार करें ॥ १५ ॥

स्त्रियो मानुषमांसादा वृद्धिका नाम नामतः ।

वृक्षेषु जातास्ता देव्यो नमस्कार्याः प्रजार्थिभिः ॥ १६ ॥

वृक्षोंपरसे गिरे हुए शुक्रसे ' वृद्धिका' नामवाली स्त्रियाँ उत्पन्न हुई हैं, जो मनुष्यका मांस भक्षण करनेवाली हैं । संतानकी इच्छा रखनेवाले लोगोंको इन देवियोंके आगे मस्तक झुकाना चाहिये ॥ १६ ॥

एवमेते पिशाचानामसंख्येया गणाः स्मृताः ।

घण्टायाः सपताकायाः शृणु मे सम्भवं नृप ॥ १७ ॥

इस प्रकार ये पिशाचोंके असंख्य गण बताये गये हैं । राजन्! अब तुम मुझसे स्कन्दके घण्टे और पताकाकी उत्पत्तिका वृत्तान्त सुनो ॥ १७ ॥

ऐरावतस्य घण्टे द्वे वैजयन्त्याविति श्रुते ।

गुहस्य ते स्वयं दत्ते क्रमेणानाय्य धीमता ॥ १८ ॥

इन्द्रके ऐरावत हाथीके उपयोगमें आनेवाले जो दो ' वैजयन्ती ' नामसे विख्यात घण्टे थे, उन्हें बुद्धिमान् इन्द्रने क्रमशः ले आकर स्वयं कुमार कार्तिकेयको अर्पण कर दिया ॥ १८ ॥

एका तत्र विशाखस्य घण्टा स्कन्दस्य चापरा ।

पताका कार्तिकेयस्य विशाखस्य च लोहिता ॥ १ ९ ॥

उनमेंसे एक घण्टा विशाखने ले लिया और दूसरा स्कन्दके पास रह गया । कार्तिकेय और विशाख दोनोंकी पताकाएँ लाल रंगकी हैं ॥ १ ९ ॥

यानि क्रीडनकान्यस्य देवैर्दत्तानि वै तदा ।

तैरेव रमते देवो महासेनो महाबलः ॥ २० ॥

पृष्ठ 1580

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उस समय देवताओंने जो खिलौने इन्हें दिये थे, उन्हींसे महाबली महासेन खेलते और मन बहलाते हैं ॥

स संवृतः पिशाचानां गणैर्देवगणैस्तथा ।

शुशुभे काञ्चने शैले दीप्यमानः श्रिया वृतः ॥ २१ ॥

राजन्! अद्भुत शोभासे सम्पन्न और कान्तिमान् कुमार कार्तिकेय उस समय उस स्वर्णमय शिखरपर पिशाचों और देवताओंके समूहसे घिरकर बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ २१ ॥

तेन वीरेण शुशुभे स शैलः शुभकाननः ।

आदित्येनेवांशुमता मन्दरश्चारुकन्दरः ॥ २२ ॥

जैसे अंशुमाली सूर्यके उदयसे मनोहर कन्दरावाले मन्दराचलकी शोभा होती है, उसी प्रकार वीरवर स्कन्दके निवाससे सुन्दर वनवाले उस श्वेतगिरिकी शोभा बढ़ गयी थी ॥ २२ ॥

संतानकवनैः फुल्लैः करवीरवनैरपि ।

पारिजातवनैश्चैव जपाशोकवनैस्तथा ॥ २३ ॥

कदम्बतरुषण्डैश्च दिव्यैर्मृगगणैरपि ।

दिव्यैः पक्षिगणैश्चैव शुशुभे श्वेतपर्वतः ॥ २४ ॥

वहाँ कहीं फूलोंसे भरे हुए कल्पवृक्षके वन और कहीं कनेरके कानन सुशोभित होते थे । कहीं पारिजातके वन थे तो कहीं जपा और अशोकके उपवन शोभा पाते थे । कहीं कदम्ब नामक वृक्षोंके समूह लहलहा रहे थे तो कहीं दिव्य मृगगण विचर रहे थे । सब ओर दिव्य पक्षियोंके समुदाय कलरव कर रहे थे । इन सबसे उस श्वेत पर्वतकी शोभा बहुत बढ़ गयी थी ॥ २३-२४ ॥

तत्र देवगणाः सर्वे सर्वे देवर्षयस्तथा ।

मेघतूर्यरवाश्चैव क्षुब्धोदधिसमस्वनाः ॥ २५ ॥

वहाँ सम्पूर्ण देवता तथा देवर्षिगण आकर विराजमान हो गये । क्षुब्ध महासागरकी गम्भीर गर्जनाके समान मेघों और दिव्य वाद्योंका तुमुल घोष सब ओर गूँजने लगा ॥ २५ ॥

तत्र दिव्याश्च गन्धर्वा नृत्यन्तेऽप्सरसस्तथा ।

हृष्टानां तत्र भूतानां श्रूयते निनदो महान् ॥ २६ ॥

‘ वहाँ दिव्य गन्धर्व और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं । हर्षमें भरे हुए प्राणियोंका महान् कोलाहल सुनायी देने लगा ॥ २६ ॥

एवं सेन्द्रं जगत् सर्वं श्वेतपर्वतसंस्थितम् ।

प्रहृष्टं प्रेक्षते स्कन्दं न च ग्लायति दर्शनात् ॥ २७ ॥

इस प्रकार इन्द्रसहित सम्पूर्ण जगत् बड़ी प्रसन्नताके साथ श्वेत पर्वतपर विराजमान

कुमार कार्तिकेयका दर्शन करने लगा । उनके दर्शनसे किसीका जी नहीं भरता था ॥ २७ ॥