श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1591–1600
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1591–1600
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व्यद्रवन्त रणे भीता विकीर्णायुधकेतनाः ॥ ८६ ॥
उस महिषासुरको आते देख इन्द्र आदि सब देवता भयभीत हो अपने अस्त्र- शस्त्र और ध्वजा फेंककर युद्धभूमिसे भागने लगे ॥ ८६ ॥
ततः स महिषः क्रुद्धस्तूर्णं रुद्ररथं ययौ ।
अभिद्रुत्य च जग्राह रुद्रस्य रथकूबरम् ॥ ८७ ॥
तब क्रोधमें भरा हुआ महिषासुर तुरंत ही भगवान् रुद्रके रथकी ओर दौड़ा और पास जाकर उनके रथका कूबर पकड़ लिया ॥ ८७ ॥
यदा रुद्ररथं क्रुद्धो महिषः सहसा गतः ।
रेसतू रोदसी गाढं मुमुहुश्च महर्षयः ॥ ८८ ॥
जब क्रोधमें भरे हुए महिषासुरने सहसा भगवान् रुद्रके रथपर आक्रमण किया, उस समय पृथ्वी और आकाशमें भारी कोलाहल मच गया और महर्षिगण भी घबरा गये ॥ ८८ ॥
अनदंश्च महाकाया दैत्या जलधरोपमाः ।
आसीच्च निश्चितं तेषां जितमस्माभिरित्युत ॥ ८ ९ ॥
इधर विशालकाय दैत्य मेघोंके समान गम्भीर गर्जना करने लगे । उन्हें यह निश्चय हो गया कि ' हमारी जीत होगी ' ॥ ८ ९ ॥
तथाभूते तु भगवान् नावधीन्महिषं रणे ।
सस्मार च तदा स्कन्दं मृत्युं तस्य दुरात्मनः ॥ ९ ० ॥
उस अवस्थामें भी भगवान् रुद्रने युद्धमें महिषासुरको स्वयं नहीं मारा किंतु उस दुरात्मा दानवकी मृत्यु जिनके हाथोंसे होनेवाली थी, उन कुमार कार्तिकेयका स्मरण किया ॥ ९ ० ॥
महिषोऽपि रथं दृष्ट्वा रौद्रो रुद्रस्य चानदत् ।
देवान् संत्रासयंश्चापि दैत्यांश्चापि प्रहर्षयन् ॥ ९ १ ॥
भयानक महिषासुर रुद्रके रथको देखकर देवताओंको त्रास और दैत्योंको हर्ष प्रदान करता हुआ बार- बार सिंहनाद करने लगा ॥ ९ १ ॥
ततस्तस्मिन् भये घोरे देवानां समुपस्थिते ।
आजगाम महासेनः क्रोधात् सूर्य इव ज्वलन् ॥ ९ २ ॥
देवताओंके लिये वह घोर भयका अवसर उपस्थित था । इसी समय जगमगाते हुए सूर्यकी भाँति कुमार महासेन क्रोधमें भरे हुए वहाँ आ पहुँचे ॥ ९ २ ॥
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लोहिताम्बरसंवीतो लोहितस्रग्विभूषणः ।
लोहिताश्वो महाबाहुर्हिरण्यकवचः प्रभुः ॥ ९ ३ ॥
उन्होंने अपने शरीरको लाल वस्त्रोंसे आच्छादित कर रखा था । उनके हार और आभूषण भी लाल रंगके ही थे । उनके घोड़ेका रंग भी लाल था । उन महाबाहु भगवान् स्कन्दने सुवर्णमय कवच धारण किया था ॥ ९ ३ ॥
रथमादित्यसंकाशमास्थितः कनकप्रभम् ।
तं दृष्ट्वा दैत्यसेना सा व्यद्रवत् सहसा रणे ॥ ९ ४ ॥
वे सूर्यके समान तेजस्वी रथपर विराजमान थे । उनकी अंगकान्ति भी सुवर्णके समान ही उद्भासित हो रही थी । उन्हें सहसा संग्राममें उपस्थित देख दैत्योंकी सेना रणभूमिसे भाग चली ॥ ९ ४ ॥
स चापि तां प्रज्वलितां महिषस्य विदारिणीम् ।
मुमोच शक्तिं राजेन्द्र महासेनो महाबलः ॥ ९ ५ ॥
राजेन्द्र! महाबली महासेनने महिषासुरपर एक प्रज्वलित शक्ति चलायी, जो उसके शरीरको विदीर्ण करनेवाली थी ॥ ९ ५ ॥
सा मुक्ताभ्यहरत् तस्य महिषस्य शिरो महत् ।
पपात भिन्ने शिरसि महिषस्त्यक्तजीवितः ॥ ९ ६ ॥
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कुमारके हाथसे छूटते ही उस शक्तिने महिषासुरके महान् मस्तकको काट गिराया । सिर कट जानेपर महिषासुर प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ९ ६ ॥
पतता शिरसा तेन द्वारं षोडशयोजनम् ।
पर्वताभेन पिहितं तदागम्यं ततोऽभवत् ॥ ९ ७ ॥
उसके पर्वत- सदृश विशाल मस्तकने गिरकर ( उत्तर- पूर्व देशके ) सोलह योजन लम्बे द्वारको बंद कर दिया । अतः वह देश सर्वसाधारणके लिये अगम्य हो गया ॥ ९ ७ ॥
उत्तराः कुरवस्तेन गच्छन्त्यद्य यथासुखम् ।
क्षिप्ताक्षिप्ता तु सा शक्तिर्हत्वा शत्रून् सहस्रशः ॥ ९ ८ ॥
स्कन्दहस्तमनुप्राप्ता दृश्यते देवदानवैः । उत्तर कुरुके निवासी अब उस मार्गसे सुखपूर्वक आते -जाते हैं। देवताओं और दानवोंने देखा, कुमार कार्तिकेय बार- बार शत्रुओंपर शक्तिका प्रहार करते हैं और वह सहस्रों योद्धाओंको मारकर पुनः उनके हाथमें लौट आती है ॥ ९ ८३ ॥ प्रायः शरैर्विनिहता महासेनेन धीमता ॥ ९९ ॥
शेषा दैत्यगणा घोरा भीतास्त्रस्ता दुरासदैः ।
स्कन्दपारिषदैर्हत्वा भक्षिताश्च सहस्रशः ॥ १०० ॥
परम बुद्धिमान् महासेनने अपने बाणोंद्वारा अधिकांश दैत्योंको समाप्त कर दिया, बचे- खुचे भयंकर दैत्य भी भयभीत हो साहस खो चुके थे । स्कन्ददेवके दुर्धर्ष पार्षद उन सहस्रों दैत्योंको मारकर खा गये ॥ ९९ -१०० ॥
दानवान् भक्षयन्तस्ते प्रपिबन्तश्च शोणितम् ।
क्षणान्निर्दानवं सर्वमकार्षुर्भृशहर्षिताः ॥ १०१ ॥
उन सबने अत्यन्त हर्षमें भरकर दानवोंको खाते और उनके रक्त पीते हुए क्षणभरमें सारी रणभूमिको दानवोंसे खाली कर दिया ॥ १०१ ॥
तमांसीव यथा सूर्यो वृक्षानग्निर्घनान् खगः ।
तथा स्कन्दोऽजयच्छत्रून् स्वेन वीर्येण कीर्तिमान् ॥ १०२ ॥
जैसे सूर्य अन्धकार मिटा देते हैं, आग वृक्षोंको जला डालती है और आकाशचारी वायु बादलोंको छिन्न - भिन्न कर देती है, वैसे ही कीर्तिशाली कुमार कार्तिकेयने अपने पराक्रमद्वारा समस्त शत्रुओंको नष्ट करके उनपर विजय पायी ॥ १०२ ॥
सम्पूज्यमानस्त्रिदशैरभिवाद्य महेश्वरम् ।
शुशुभे कृत्तिकापुत्रः प्रकीर्णांशुरिवांशुमान् ॥ १०३ ॥
उस समय देवतालोग कृत्तिकानन्दन स्कन्ददेवकी स्तुति और पूजा करने लगे । कुमार स्कन्द अपने पिता महेश्वरको प्रणाम करके सब ओर किरणें बिखेरनेवाले अंशुमाली सूर्यकी भाँति शोभा पाने लगे ॥ १०३ ॥
नष्टशत्रुर्यदा स्कन्दः प्रयातस्तु महेश्वरम् ।
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तदाब्रवीन्महासेनं परिष्वज्य पुरंदरः ॥ १०४ ॥
शत्रुओंका नाश करके जब कुमार कार्तिकेय भगवान् महेश्वरके पास पहुँचे, उस समय इन्द्रने उनको हृदयसे लगा लिया और इस प्रकार कहा— ॥ १०४ ॥
ब्रह्मदत्तवरः स्कन्द त्वयायं महिषो हतः ।
देवास्तृणसमा यस्य बभूवुर्जयतां वर ॥ १०५ ॥
सोऽयं त्वया महाबाहो शमितो देवकण्टकः ।
शतं महिषतुल्यानां दानवानां त्वया रणे ॥ १०६ ॥
निहतं देवशत्रूणां यैर्वयं पूर्वतापिताः ।
तावकैर्भक्षिताश्चान्ये दानवाः शतसङ्घशः ॥ १०७ ॥
‘ विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ स्कन्द! इस महिषासुरको ब्रह्माजीने वरदान दिया था, जिसके कारण इसके सामने सब देवता तिनकोंके समान हो गये थे । आज तुमने इसे मार गिराया है । महाबाहो! यह देवताओंके लिये बड़ा भारी काँटा था, जिसे तुमने निकाल फेंका है । यही नहीं, आज रणभूमिमें इस महिषके समान पराक्रमी एक सौ देवद्रोही दानव और तुम्हारे हाथसे मारे गये हैं, जो पहले हमें बहुत कष्ट दे चुके हैं । तुम्हारे पार्षद भी सैकड़ों दानवोंको खा गये हैं ॥ १०५–१०७ ॥
अजेयस्त्वं रणेऽरीणामुमापतिरिव प्रभुः ।
एतत् ते प्रथमं देव ख्यातं कर्म भविष्यति ॥ १०८ ॥
त्रिषु लोकेषु कीर्तिश्च तवाक्षय्या भविष्यति ।
वशगाश्च भविष्यन्ति सुरास्तव महाभुज ॥ १० ९ ॥
‘देव! तुम भगवान् शंकरके समान ही युद्धमें शत्रुओंके लिये अजेय हो । यह तुम्हारा प्रथम पराक्रम सर्वत्र विख्यात होगा । तुम्हारी अक्षय कीर्ति तीनों लोकोंमें फैल जायगी । महाबाहो! सब देवता तुम्हारे वशमें रहेंगे ' ॥
एवमुक्त्वा महासेनं निवृत्तः सह दैवतैः ।
अनुज्ञातो भगवता त्र्यम्बकेण शचीपतिः ॥ ११० ॥
महासेनसे ऐसा कहकर शचीपति इन्द्र भगवान् शंकरकी आज्ञा ले देवताओंके साथ स्वर्गलोकको लौट गये ॥
गतो भद्रवटं रुद्रो निवृत्ताश्च दिवौकसः ।
उक्ताश्च देवा रुद्रेण स्कन्दं पश्यत मामिव ॥ १११ ॥
भगवान् रुद्र भद्रवटके समीप गये और देवता अपने- अपने स्थानको लौटने लगे । उस समय भगवान् शंकरने देवताओंसे कहा - ' तुम सब लोग कुमार कार्तिकेयको मेरे ही समान मानना' ॥ १११ ॥
स हत्वा दानवगणान् पूज्यमानो महर्षिभिः ।
एकाह्मैवाजयत् सर्वं त्रैलोक्य वह्निनन्दनः ॥ ११२ ॥
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अग्निनन्दन स्कन्दने सब दानवोंको मारकर महर्षियोंसे पूजित हो एक ही दिनमें समूची त्रिलोकीको जीत लिया ॥ ११२ ॥
स्कन्दस्य य इदं विप्रः पठेज्जन्म समाहितः ।
स पुष्टिमिह सम्प्राप्य स्कन्दसालोक्यमाप्नुयात् ॥ ११३ ॥
जो ब्राह्मण एकाग्रचित्त हो स्कन्ददेवके इस जन्मवृत्तान्तका पाठ करता है, वह संसारमें पुष्टिको प्राप्त हो अन्तमें भगवान् स्कन्दके लोकमें जाता है ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आङ्गिरसे स्कन्दोत्पत्तौ महिषासुरवधे एकत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३१ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें अंगिरसोपाख्यानके प्रसंगमें स्कन्दकी उत्पत्तितथा महिषासुरवधविषयक दो सौ एकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३१ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल ११३३ श्लोक हैं) *रथका वह अग्रभाग जहाँ जूआ बाँधा जाता है, कूबर कहलाता है । ग्राम्य भाषामें उसे ' नकेला' या ' सबुनी ' कहते हैं ।
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द्वात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः कार्तिकेयके प्रसिद्ध नामोंका वर्णन तथा उनका स्तवन युधिष्ठिर उवाच
भगवन् श्रोतुमिच्छामि नामान्यस्य महात्मनः ।
त्रिषु लोकेषु यान्यस्य विख्यातानि द्विजोत्तम ॥ १ ॥
युधिष्ठिर बोले — भगवन्! विप्रवर! तीनों लोकोंमें महामना कार्तिकेयके जो-जो नाम विख्यात हैं, मैं उन्हें सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तः पाण्डवेयेन महात्मा ऋषिसंनिधौ ।
उवाच भगवांस्तत्र मार्कण्डेयो महातपाः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके इस प्रकार कहनेपर महातपस्वी महात्मा भगवान् मार्कण्डेयने ऋषियोंके समीप इस प्रकार कहा— ॥ २ ॥
मार्कण्डेय उवाच
आग्नेयश्चैव स्कन्दश्च दीप्तकीर्तिरनामयः ।
मयूरकेतुर्धर्मात्मा भूतेशो महिषार्दनः ॥ ३ ॥
कामजित् कामदः कान्तः सत्यवाग् भुवनेश्वरः ।
शिशुः शीघ्रः शुचिश्चण्डो दीप्तवर्णः शुभाननः ॥ ४ ॥
अमोघस्त्वनघो रौद्रः प्रियश्चन्द्राननस्तथा ।
दीप्तशक्तिः प्रशान्तात्मा भद्रकृत् कूटमोहनः ॥ ५ ॥
षष्ठीप्रियश्च धर्मात्मा पवित्रो मातृवत्सलः ।
कन्याभर्ता विभक्तश्च स्वाहेयो रेवतीसुतः ॥ ६ ॥
प्रभुर्नेता विशाखश्च नैगमेयः सुदुश्चरः ।
सुव्रतो ललितश्चैव बालक्रीडनकप्रियः ॥ ७ ॥
खचारी ब्रह्मचारी च शूरः शरवणोद्भवः ।
विश्वामित्रप्रियश्चैव देवसेनाप्रियस्तथा ॥ ८ ॥
वासुदेवप्रियश्चैव प्रियः प्रियकृदेव तु ।
नामान्येतानि दिव्यानि कार्तिकेयस्य यः पठेत् ।
स्वर्गं कीर्तिं धनं चैव स लभेन्नात्र संशयः ॥ ९ ॥
मार्कण्डेयजी बोले – राजन्! आग्नेय, स्कन्द, दीप्तकीर्ति, अनामय, मयूरकेतु, धर्मात्मा, भूतेश, महिषमर्दन, कामजित्, कामद, कान्त, सत्यवाक्, भुवनेश्वर, शिशु, शीघ्र,
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शुचि, चण्ड, दीप्तवर्ण, शुभानन, अमोघ, अनघ, रौद्र, प्रिय, चन्द्रानन, दीप्तशक्ति, प्रशान्तात्मा, भद्रकृत्, कूटमोहन, षष्ठीप्रिय, धर्मात्मा, पवित्र, मातृवत्सल, कन्याभर्ता, विभक्त, स्वाहेय, रेवतीसुत, प्रभु, नेता, विशाख, नैगमेय, सुदुश्चर, सुव्रत, ललित, बाल-क्रीडनकप्रिय, आकाशचारी, ब्रह्मचारी, शूर, शंखणोद्भव, विश्वामित्रप्रिय, देवसेनाप्रिय, वासुदेवप्रिय, प्रिय और प्रियकृत्—ये कार्तिकेयजीके दिव्य नाम हैं । जो इनका पाठ करता है, वह धन, कीर्ति तथा स्वर्गलोक प्राप्त कर लेता है; इसमें संशय नहीं है ॥ ३ – ९ ॥ स्तोष्यामि देवैर्ऋषिभिश्च जुष्टं शक्त्या गुहं नामभिरप्रमेयम् । षडाननं शक्तिधरं सुवीरं निबोध चैतानि कुरुप्रवीर ॥ १० ॥
कुरुकुलके प्रमुख वीर युधिष्ठिर! अब मैं देवताओं तथा ऋषियोंसे सेवित, असंख्य नामों तथा अनन्त शक्तिसे सम्पन्न, शक्ति नामक अस्त्र धारण करनेवाले वीरवर षडानन गुहकी स्तुति करता हूँ, तुम ध्यान देकर सुनो ॥ ब्रह्मण्यो वै ब्रह्मजो ब्रह्मविच्च ब्रह्मेशयो ब्रह्मवतां वरिष्ठः । ब्रह्मप्रियो ब्राह्मणसव्रती त्वं ब्रह्मज्ञो वै ब्राह्मणानां च नेता ॥ ११ ॥
स्कन्ददेव! आप ब्राह्मणहितैषी, ब्रह्मात्मज, ब्रह्मवेत्ता, ब्रह्मनिष्ठ, ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ, ब्राह्मणप्रिय, ब्राह्मणोंके समान व्रतधारी, ब्रह्मज्ञ तथा ब्राह्मणोंके नेता हैं ॥ ११ ॥
स्वाहा स्वधा त्वं परमं पवित्रं मन्त्रस्तुतस्त्वं प्रथितः षडर्चिः । संवत्सरस्त्वमृतवश्च षड् वै मासार्धमासावयनं दिशश्च ॥ १२ ॥
आप स्वाहा, स्वधा, परम पवित्र, मन्त्रोंद्वारा प्रशंसित और सुप्रसिद्ध षडर्चि (छः ज्वालाओंसे युक्त) अग्नि हैं । आप ही संवत्सर, छः ऋतुएँ, पक्ष, मास, अयन और दिशाएँ हैं ॥ १२ ॥
त्वं पुष्कराक्षस्त्वरविन्दवक्त्रः सहस्रवक्त्रोऽसि सहस्रबाहुः । त्वं लोकपालः परमं हविश्च त्वं भावनः सर्वसुरासुराणाम् ॥ १३ ॥
आप कमलनयन, कमलमुख, सहस्रवदन और सहस्रबाहु हैं । आप ही लोकपाल, सर्वोत्तम हविष्य तथा सम्पूर्ण देवताओं और असुरोंके पालक हैं ॥ १३ ॥
त्वमेव सेनाधिपतिः प्रचण्डः
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प्रभुर्विभुश्चाप्यथ शत्रुजेता । सहस्रभूस्त्वं धरणी त्वमेव सहस्रतुष्टिश्च सहस्रभुक् च ॥ १४ ॥
आप ही सेनापति, अत्यन्त कोपवान्, प्रभु, विभु और शत्रुविजयी हैं । आप ही सहस्रभू और पृथ्वी हैं । आप ही सहस्रों प्राणियोंको संतोष देनेवाले तथा सहस्रभोक्ता हैं ॥ १४ ॥
सहस्रशीर्षस्त्वमनन्तरूपः सहस्रपात् त्वं गुह शक्तिधारी । गङ्गासुतस्त्वं स्वमतेन देव स्वाहामहीकृत्तिकानां तथैव ॥ १५ ॥
आपके सहस्रों मस्तक हैं । आपके रूपका कहीं अन्त नहीं है । आपके सहस्रों चरण हैं । गुह! आप शक्ति धारण करते हैं। देव! आप अपने इच्छानुसार गंगा, स्वाहा, पृथ्वी तथा कृत्तिकाओंके पुत्ररूपसे प्रकट हुए हैं ॥ १५ ॥
त्वं क्रीडसे षण्मुख कुक्कुटेन यथेष्टनानाविधकामरूपी । दीक्षासि सोमो मरुतः सदैव धर्मोऽसि वायुरचलेन्द्र इन्द्रः ॥ १६ ॥
षडानन! आप मुर्गेसे खेलते हैं तथा इच्छानुसार नाना प्रकारके कमनीय रूप धारण करते हैं । आप सदा ही दीक्षा, सोम, मरुद्गण, धर्म, वायु, गिरिराज तथा इन्द्र हैं ॥ १६ ॥
सनातनानामपि शाश्वतस्त्वं प्रभुः प्रभूणामपि चोग्रधन्वा । ऋतस्य कर्ता दितिजान्तकस्त्वं जेता रिपूणां प्रवरः सुराणाम् ॥ १७ ॥
आप सनातनोंमें भी सनातन हैं । प्रभुओंके भी प्रभु हैं । आपका धनुष भयंकर है । आप सत्यके प्रवर्तक, दैत्योंका संहार करनेवाले, शत्रुविजयी तथा देवताओं में श्रेष्ठ हैं ॥ १७ ॥
सूक्ष्मं तपस्तत् परमं त्वमेव परावरज्ञोऽसि परावरस्त्वम् । धर्मस्य कामस्य परस्य चैव त्वत्तेजसा कृत्स्नमिदं महात्मन् ॥ १८ ॥
जो सर्वोत्कृष्ट सूक्ष्म तप है, वह आप ही हैं। आप ही कार्य - कारण-तत्त्वके ज्ञाता तथा कार्यकारणस्वरूप हैं । धर्म, काम तथा इन दोनोंसे परे जो मोक्षतत्त्व है, उसके भी आप ही ज्ञाता हैं । महात्मन्! यह सम्पूर्ण जगत् आपके तेजसे प्रकाशित होता है ॥ १८ ॥
व्याप्तं जगत् सर्वसुरप्रवीर शक्त्या मया संस्तुत लोकनाथ ।
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नमोऽस्तु ते द्वादशनेत्रबाहो अतः परं वेद्मि गतिं न तेऽहम् ॥ १ ९ ॥ समस्त देवताओंके प्रमुख वीर! आपकी शक्तिसे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है । लोकनाथ! मैंने यथाशक्ति आपका स्तवन किया है । बारह नेत्रों और भुजाओंसे सुशोभित देव! आपको नमस्कार है । इससे परे आपका जो स्वरूप है, उसे मैं नहीं जानता ॥ १ ९ ॥
स्कन्दस्य य इदं विप्रः पठेज्जन्म समाहितः ।
श्रावयेद् बाह्मणेभ्यो यः शृणुयाद् वा द्विजेरितम् ॥ २० ॥
धनमायुर्यशो दीप्तं पुत्राञ्छत्रुजयं तथा ।
स पुष्टितुष्टी सम्प्राप्य स्कन्दसालोक्यमाप्नुयात् ॥ २१ ॥
जो ब्राह्मण एकाग्रचित्त हो स्कन्ददेवके इस जन्म- वृत्तान्तको पढ़ता है, ब्राह्मणोंको सुनाता है अथवा स्वयं ब्राह्मणके मुखसे सुनता है, वह धन, आयु, उज्ज्वल यश, पुत्र, शत्रुविजय तथा तुष्टि - पुष्टि पाकर अन्तमें स्कन्दके लोकमें जाता है ॥ २०-२१ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आङ्गिरसे कार्तिकेयस्तवे द्वात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानके प्रसंगमें कार्तिकेयस्तुतिविषयक दो सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३२ ॥
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द्रौपदी - सत्यभामा- संवाद