02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 1621–1630

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1621–1630

पृष्ठ 1621

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शेते पृथिव्यामतथोचिताङ्गः कृष्णासमक्षं वसुधातलस्थः ॥ ११ ॥

‘ भीमसेनका शरीर हवा और धूपका कष्ट सहन करनेसे अत्यन्त दुर्बल हो गया होगा । उनका अंग- अंग क्रोधसे काँपता और फड़कता होगा । वे द्रौपदीके सामने कैसे धरतीपर शयन करते होंगे? उनका शरीर ऐसा कष्ट भोगनेयोग्य नहीं है ॥ ११ ॥

तथार्जुनः सुकुमारो मनस्वी

वशे स्थितो धर्मसुतस्य राज्ञः ।

विदूयमानैरिव सर्वगात्रै- ध्रुवं न शेते वसतीरमर्षात् ॥ १२ ॥

' इसी प्रकार सुकुमार एवं मनस्वी अर्जुन, जो सदा धर्मराज युधिष्ठिरके अधीन रहते हैं, अमर्षके कारण उनके सारे अंगोंमें संताप हो रहा होगा और निश्चय ही उन्हें अपनी कुटियामें अच्छी तरह नींद नहीं आती होगी ॥ १२ ॥

यमौ च कृष्णां च युधिष्ठिरं च भीमं च दृष्ट्वा सुखविप्रयुक्तम् । विनिःश्वसन् सर्प इवोग्रतेजा ध्रुवं न शेते वसतीरमर्षात् ॥ १३ ॥

' अर्जुनका तेज बड़ा ही भयंकर है । वे नकुल, सहदेव, द्रौपदी, युधिष्ठिर तथा भीमसेनको सुखसे वंचित देखकर सर्पके समान फुककारते होंगे और अमर्षके कारण निश्चय ही उन्हें नींद नहीं आती होगी ॥ १३ ॥

तथा यमौ चाप्यसुखौ सुखार्हो समृद्धरूपावमरौ दिवीव । प्रजागरस्थौ ध्रुवमप्रशान्तौ धर्मेण सत्येन च वार्यमाणौ ॥ १४ ॥

‘ इसी प्रकार सुख भोगनेके योग्य नकुल और सहदेवका भी सुख छिन गया है । वे दोनों भाई स्वर्गके देवता अश्विनीकुमारोंकी भाँति रूपवान् हैं । वे भी निश्चय ही अशान्तभावसे सारी रात जागते हुए भूमिपर सोते होंगे । धर्म और सत्य ही उन्हें तत्काल आक्रमण करनेसे रोके हुए हैं ॥ १४ ॥

समीरणेनाथ समो बलेन समीरणस्यैव सुतो बलीयान् । स धर्मपाशेन सितोऽग्रजेन ध्रुवं विनिःश्वस्य सहत्यमर्षम् ॥ १५ ॥

‘ जो बलमें वायुके समान हैं, वायुदेवताके ही अत्यन्त बलवान् पुत्र हैं, वे भीमसेन भी अपने बड़े भाईके द्वारा धर्मके बन्धनमें बाँध लिये गये हैं । निश्चय ही इसीलिये चुपचाप लम्बी

पृष्ठ 1622

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साँसें खींचते हुए वे क्रोधको सहन करते हैं ॥ १५ ॥

स चापि भूमौ परिवर्तमानो वधं सुतानां मम काङ्क्षमाणः । सत्येन धर्मेण च वार्यमाणः कालं प्रतीक्षत्यधिको रणेऽन्यैः ॥ १६ ॥

' रणभूमिमें भीमसेन दूसरोंकी अपेक्षा सदा अधिक पराक्रमी सिद्ध होते हैं । वे मेरे पुत्रोंके वधकी कामना करते हुए धरतीपर करवटें बदल रहे होंगे । सत्य और धर्मने ही उन्हें रोक रखा है; अतः वे भी अवसरकी ही प्रतीक्षा कर रहे हैं ॥ १६ ॥

अजातशत्रौ तु जिते निकृत्या दुःशासनो यत् परुषाण्यवोचत् । तानि प्रविष्टानि वृकोदराङ्गं दहन्ति कक्षाग्निरिवेन्धनानि ॥ १७ ॥

‘ अजातशत्रु युधिष्ठिरको जूएमें छलपूर्वक हरा दिये जानेपर दुःशासनने जो कड़वी बातें कही थीं, वे भीमसेनके शरीरमें घुसकर जैसे आग तृण और काष्ठके समूहको जला डालती है, उसी प्रकार उन्हें दग्ध कर रही होंगी ॥ १७ ॥

न पापकं ध्यास्यति धर्मपुत्रो धनंजयश्चाप्यनुवर्त्स्यते तम् । अरण्यवासेन विवर्धते तु भीमस्य कोपोऽग्निरिवानिलेन ॥ १८ ॥

' धर्मपुत्र युधिष्ठिर मेरे अपराधपर ध्यान नहीं देंगे । अर्जुन भी उन्हींका अनुसरण करेंगे । परंतु इस वनवाससे भीमसेनका क्रोध तो उसी प्रकार बढ़ रहा होगा, जैसे हवा लगनेसे आग धधक उठती है ॥ १८ ॥

स तेन कोपेन विदह्यमानः करं करेणाभिनिपीड्य वीरः । विनिःश्वसत्युष्णमतीव घोरं दहन्निवेमान् मम पुत्रपौत्रान् ॥ १ ९ ॥ ' उस क्रोधसे जलते हुए वीरवर भीमसेन हाथसे हाथ मलकर इस प्रकार अत्यन्त भयंकर गर्म - गर्म साँस खींच रहे होंगे, मानो मेरे इन पुत्रों और पौत्रोंको अभी भस्म कर डालेंगे ॥ १ ९ ॥ गाण्डीवधन्वा च वृकोदरश्च संरम्भिणावन्तककालकल्पौ । न शेषयेतां युधि शत्रुसेनां शरान् किरन्तावशनिप्रकाशान् ॥ २० ॥

पृष्ठ 1623

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‘ गाण्डीवधारी अर्जुन तथा भीमसेन जब क्रोधमें भर जायँगे, उस समय यमराज और कालके समान हो जायँगे । वे रणभूमिमें विद्युत्के समान चमकनेवाले बाणोंकी वर्षा करके शत्रुसेनामेंसे किसीको भी जीवित नहीं छोड़ेंगे ॥ दुर्योधनः शकुनिः सूतपुत्रो दुःशासनश्चापि सुमन्दचेताः । मधु प्रपश्यन्ति न तु प्रपातं यद् द्यूतमालम्ब्य हरन्ति राज्यम् ॥ २१ ॥

'दुर्योधन, शकुनि, सूतपुत्र कर्ण तथा दुःशासन –ये बड़े ही मूढबुद्धि हैं, क्योंकि जूएके सहारे दूसरेके राज्यका अपहरण कर रहे हैं । ( ये अपने ऊपर आनेवाले संकटको नहीं देखते हैं) इन्हें वृक्षकी शाखासे टपकता हुआ केवल मधु ही दिखायी देता है, वहाँसे गिरनेका जो भारी भय है, उधर इनकी दृष्टि नहीं है ॥ २१ ॥

शुभाशुभं कर्म नरो हि कृत्वा प्रतीक्षते तस्य फलं स्म कर्ता । स तेन मुह्यत्यवशः फलेन ' मोक्षः कथं स्यात् पुरुषस्य तस्मात् ॥ २२ ॥

मनुष्य शुभ और अशुभ कर्म करके उसके स्वर्ग- नरकरूप फलकी प्रतीक्षा करता है । वह उस फलसे विवश होकर मोहित होता है । ऐसी दशामें मूढ़ पुरुषका उस मोहसे कैसे छुटकारा हो सकता है? ॥ २२ ॥

क्षेत्रे सुकृष्टे ह्युपिते च बीजे

देवे च वर्षत्यृतुकालयुक्तम् ।

न स्यात् फलं तस्य कुतः प्रसिद्धि- रन्यत्र दैवादिति चिन्तयामि ॥ २३ ॥

‘ मैं सोचता हूँ कि अच्छी तरह जोते हुए खेतमें बीज बोया जाय तथा ऋतुके अनुसार ठीक समयपर वर्षा भी हो, फिर भी उसमें फल न लगे, तो इसमें प्रारब्धके अतिरिक्त अन्य किसी कारणकी सिद्धि कैसे की जा सकती है? ॥ २३ ॥

कृतं मताक्षेण यथा न साधु साधुप्रवृत्तेन च पाण्डवेन । मया च दुष्पुत्रवशानुगेन तथा कुरूणामयमन्तकालः ॥ २४ ॥

' द्यूतप्रेमी शकुनिने जूआ खेलकर कदापि अच्छा नहीं किया। साधुतामें लगे हुए युधिष्ठिरने भी जो उसे तत्काल नहीं मार डाला, यह भी अच्छा नहीं किया । इसी प्रकार कुपुत्रके वशमें पड़कर मैंने भी कोई अच्छा काम नहीं किया है । इसीका फल है कि यह कौरवोंका अन्तकाल आ पहुँचा है ॥ २४ ॥

पृष्ठ 1624

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ध्रुवं प्रवास्यत्यसमीरितोऽपि

ध्रुवं प्रजास्यत्युत गर्भिणी या ।

ध्रुवं दिनादौ रजनीप्रणाश- स्तथा क्षपादौ च दिनप्रणाशः ॥ २५ ॥

'निश्चय ही बिना किसी प्रेरणाके भी हवा चलेगी ही, जो गर्भिणी है, वह समयपर अवश्य ही बच्चा जनेगी । दिनके आदिमें रजनीका नाश अवश्यम्भावी है तथा रात्रिके प्रारम्भमें दिनका भी अन्त होना निश्चित है । ( इसी प्रकार पापका फल भी किसीके टाले नहीं टल सकता) ॥ २५ ॥

क्रियेत कस्मादपरे च कुर्यु- र्वित्तं न दद्युः पुरुषाः कथंचित् । प्राप्यार्थकालं च भवेदनर्थः कथं न तत् स्यादिति तत् कुतः स्यात् ॥ २६ ॥

' यदि यह विश्वास हो जाय तो हम लोभके वश होकर न करनेयोग्य काम क्यों करें और दूसरे भी क्यों करें एवं बुद्धिमान् मनुष्य भी उपार्जित धनका दान क्यों न करें? अर्थके उपयोगका समय प्राप्त होनेपर यदि उसका सदुपयोग न किया जाय तो वह अनर्थका हेतु हो जाता है । अतः विचार करना चाहिये कि उस धनका सदुपयोग क्यों नहीं होता और कैसे हो? ॥ २६ ॥

कथं न भिद्येत न च स्रवेत न च प्रसिच्येदिति रक्षितव्यम् । अरक्ष्यमाणं शतधा प्रकीर्येद् ध्रुवं न नाशोऽस्ति कृतस्य लोके ॥ २७ ॥

‘यदि प्राप्त हुए धनका यथावत् वितरण न किया जायगा तो वह कच्चे घड़ेमें रखे हुए जलकी भाँति चूकर व्यर्थ नष्ट क्यों न होगा? यह सोचकर उसकी रक्षा करना ही कर्तव्य है । यदि यथायोग्य विभाजनके द्वारा धनकी रक्षा न की जायगी तो वह सैकड़ों प्रकारसे बिखर जायगा । जगत्में किये हुए कर्म -फलका नाश नहीं होता - यह निश्चित है । ( इससे यही सिद्ध होता है कि उसका यथायोग्य वितरण कर देना ही उचित है ) ' ॥ २७ ॥

गतो ह्यरण्यादपि शक्रलोकं धनंजयः पश्यत वीर्यमस्य । अस्त्राणि दिव्यानि चतुर्विधानि ज्ञात्वा पुनर्लोकमिमं प्रपन्नः ॥ २८ ॥

‘देखो, अर्जुनमें कितनी शक्ति है! वे वनसे भी इन्द्रलोकको चले गये और वहाँसे चारों प्रकारके दिव्यास्त्र सीखकर पुनः इस लोकमें लौट आये ॥ २८ ॥

स्वर्गं हि गत्वा सशरीर एव

पृष्ठ 1625

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को मानुषः पुनरागन्तुमिच्छेत् । अन्यत्र कालोपहताननेकान् समीक्षमाणस्तु कुरून् मुमूर्षून् ॥ २ ९ ॥ ‘ सदेह स्वर्गमें जाकर कौन मनुष्य इस संसारमें पुनः लौटना चाहेगा । अर्जुनके पुनः मर्त्यलोकमें लौटनेका कारण इसके सिवा दूसरा नहीं है कि ये बहुसंख्यक कौरव कालके वशीभूत हो मृत्युके निकट पहुँच गये हैं और अर्जुन इनकी इस अवस्थाको अच्छी तरह देख रहे हैं ॥ २ ९ ॥ धनुर्ग्राहश्चार्जुनः सव्यसाची धनुश्च तद् गाण्डिवं भीमवेगम् । अस्त्राणि दिव्यानि च तानि तस्य त्रयस्य तेजः प्रसहेत कोऽत्र ॥ ३० ॥

‘ सव्यसाची अर्जुन अद्वितीय धनुर्धर हैं । उनके उस गाण्डीव धनुषका वेग भी बड़ा भयानक है, और अब तो अर्जुनको वे दिव्यास्त्र भी प्राप्त हो गये हैं । इस समय इन तीनोंके सम्मिलित तेजको यहाँ कौन सह सकता है? ' ॥ ३० ॥

निशम्य तद् वचनं पार्थिवस्य दुर्योधनं रहिते सौबलोऽथ । अबोधयत् कर्णमुपेत्य सर्वं स चाप्यहृष्टोऽभवदल्पचेताः ॥ ३१ ॥

एकान्तमें कही हुई राजा धृतराष्ट्रकी उपर्युक्त सारी बातें सुनकर सुबलपुत्र शकुनिने दुर्योधन और कर्णके पास जाकर ज्यों-की - त्यों कह सुनायी । इससे मन्दमति दुर्योधन उदास एवं चिन्तित हो गया ॥ ३१ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि धृतराष्ट्रखेदवाक्ये षट्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें धृतराष्ट्रके खेदयुक्त वचनसे सम्बन्ध रखनेवाला दो सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३६ ॥

पृष्ठ 1626

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सप्तत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः शकुनि और कर्णका दुर्योधनकी प्रशंसा करते हुए उसे वनमें पाण्डवोंके पास चलनेके लिये उभाड़ना वैशम्पायन उवाच

धृतराष्ट्रस्य तद् वाक्यं निशम्य शकुनिस्तदा ।

दुर्योधनमिदं काले कर्णेन सहितोऽब्रवीत् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! धृतराष्ट्रके पूर्वोक्त वचन सुनकर उस समय कर्णसहित शकुनिने अवसर देखकर दुर्योधनसे इस प्रकार कहा- ॥ १ ॥

प्रव्राज्य पाण्डवान् वीरान् स्वेन वीर्येण भारत ।

भुङ्क्ष्वेमां पृथिवीमेको दिवि शम्बरहा यथा ॥ २ ॥

‘ भरतनन्दन! तुमने अपने पराक्रमसे पाण्डव- वीरोंको देशनिकाला देकर वनवासी बना दिया है । अब तुम स्वर्गमें इन्द्रकी भाँति अकेले ही इस पृथ्वीका राज्य भोगो ॥ २ ॥

( तवाद्य पृथिवी राजन्नखिला सागराम्बरा । सपर्वतवनारामा सह स्थावरजङ्गमा ॥ ) ‘ राजन्! पर्वत, वन, उद्यान एवं स्थावर-जङ्गमोंसहित यह सारी समुद्रपर्यना पृथ्वी आज तुम्हारे अधिकारमें है ॥

प्राच्याश्च दाक्षिणात्याश्च प्रतीच्योदीच्यवासिनः ।

कृताः करप्रदाः सर्वे राजानस्ते नराधिप ॥ ३ ॥

‘ नरेश्वर! पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशाके सभी राजाओंको तुम्हारे लिये करदाता बना दिया है ॥ ३ ॥

या हि सा दीप्यमानेव पाण्डवानभजत् पुरा ।

साद्य लक्ष्मीस्त्वया राजन्नवाप्ता भ्रातृभिः सह ॥ ४ ॥

‘ राजन्! जो दीप्तिमती श्री पहले पाण्डवोंकी सेवा करती थी, वही आज भाइयोंसहित तुम्हारे अधिकारमें आ गयी है ॥ ४ ॥

इन्द्रप्रस्थगते यां तां दीप्यमानां युधिष्ठिरे ।

अपश्याम श्रियं राजन् दृश्यते सा तवाद्य वै ॥ ५ ॥

‘ महाराज! इन्द्रप्रस्थमें जानेपर युधिष्ठिरके यहाँ हम लोग जिस राजलक्ष्मीको प्रकाशित होते देखते थे, वही आज तुम्हारे यहाँ उद्भासित होती दिखायी देती है ॥ ५ ॥

शत्रवस्तव राजेन्द्र न चिरं शोककर्शिताः ।

सा तु बुद्धिबलेनेयं राज्ञस्तस्माद् युधिष्ठिरात् ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1627

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त्वयाऽऽक्षिप्ता महाबाहो दीप्यमानेव दृश्यते । ‘ राजेन्द्र! तुम्हारे शत्रु शीघ्र ही शोकसे दीन-दुर्बल हो गये हैं । महाबाहो! तुमने राजा युधिष्ठिरसे इस लक्ष्मीको अपने बुद्धिबलसे छीन लिया है । अतः अब तुम्हारे यहाँ यह प्रकाशित होती - सी दिखायी दे रही है ॥ ६३ ॥

तथैव तव राजेन्द्र राजानः परवीरहन् ॥ ७ ॥

शासनेऽधिष्ठिताः सर्वे किं कुर्म इति वादिनः । ' शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले महाराज! इसी प्रकार सब राजा अपनेको किंकर बताते हुए आपकी आज्ञाके अधीन रहते हैं ॥ ७३ ॥

तवेयं पृथिवी राजन् निखिला सागराम्बरा ॥ ८ ॥

सपर्वतवना देवी सग्रामनगराकरा ।

नानावनोद्देशवती पर्वतैरुपशोभिता ॥ ९ ॥

‘ राजन्! इस समय यह सारी समुद्रवसना पृथ्वीदेवी पर्वत, वन, ग्राम, नगर तथा खानोंके साथ तुम्हारे अधिकारमें आ गयी है । यह नाना प्रकारके प्रदेशोंसे युक्त तथा पर्वतोंसे सुशोभित है ॥ ८ - ९ ॥ (नानाध्वजपताकाङ्का स्फीतराष्ट्रा महाबला ) ‘ नाना प्रकारकी ध्वजा - पताकाओंसे चिह्नित इस भूतलपर कितने ही समृद्धिशाली राष्ट्र हैं और वहाँ बहुत - सी विशाल सेनाएँ संगठित हैं ॥

वन्द्यमानो द्विजै राजन् पूज्यमानश्च राजभिः ।

पौरुषाद् दिवि देवेषु भ्राजसे रश्मिवानिव ॥ १० ॥

‘ राजन्! तुम अपने पुरुषार्थसे द्विजोंद्वारा सम्मानित तथा राजाओंद्वारा पूजित होकर स्वर्ग एवं देवताओंमें अंशुमाली सूर्यकी भाँति इस भूतलपर प्रकाशित हो रहे हो ॥ १० ॥

रुद्रैरिव यमो राजा मरुद्भिरिव वासवः ।

कुरुभिस्त्वं वृतो राजन् भासि नक्षत्रराडिव ॥ ११ ॥

‘महाराज! जिस प्रकार रुद्रोंसे यमराज, मरुद्गणोंसे इन्द्र तथा नक्षत्रोंसे उनके स्वामी चन्द्रमाकी शोभा होती है, उसी प्रकार कौरवोंसे घिरे हुए तुम शोभा पा रहे हो ॥

यैः स्म ते नाद्रियेताज्ञा न च ये शासने स्थिताः ।

पश्यामस्तान् श्रिया हीनान् पाण्डवान् वनवासिनः ॥ १२ ॥

' जिन्होंने तुम्हारी आज्ञाका आदर नहीं किया था और जो तुम्हारे शासनमें नहीं थे, उन पाण्डवोंकी दशा हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं । वे राजलक्ष्मीसे वञ्चित हो वनमें निवास करते हैं ॥ १२ ॥

श्रूयते हि महाराज सरो द्वैतवनं प्रति ।

वसन्तः पाण्डवाः सार्धं ब्राह्मणैर्वनवासिभिः ॥ १३ ॥

पृष्ठ 1628

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'महाराज! सुननेमें आया है कि पाण्डवलोग द्वैतवनमें सरोवरके तटपर वनवासी ब्राह्मणोंके साथ रहते हैं ॥ १३ ॥

स प्रयाहि महाराज श्रिया परमया युतः ।

तापयन् पाण्डुपुत्रांस्त्वं रश्मिवानिव तेजसा ॥ १४ ॥

‘महाराज! तुम उत्कृष्ट राजलक्ष्मीसे सुशोभित होकर वहाँ चलो और जैसे सूर्य अपने तेजसे जगत्को संतप्त करते हैं, उसी प्रकार पाण्डुपुत्रोंको संताप दो ॥ १४ ॥

स्थितो राज्ये च्युतान् राज्याच्छ्रिया हीनाञ्छ्रिया वृतः ।

असमृद्धान् समृद्धार्थः पश्य पाण्डुसुतान् नृप ॥ १५ ॥

‘ इस समय तुम राजाके पदपर प्रतिष्ठित हो और पाण्डव राज्यसे भ्रष्ट हो गये हैं। तुम श्रीसम्पन्न हो और वे श्रीहीन हैं । तुम समृद्धिशाली हो और वे निर्धन हो गये हैं । नरेश्वर! तुम इसी दशामें चलकर पाण्डवोंको देखो ॥ १५ ॥

महाभिजनसम्पन्नं भद्रे महति संस्थितम् ।

पाण्डवास्त्वाभिवीक्षन्तां ययातिमिव नाहुषम् ॥ १६ ॥

‘ पाण्डव तुम्हें नहुषनन्दन ययातिकी भाँति महान् वंशमें उत्पन्न तथा परम मंगलमयी स्थितिमें प्रतिष्ठित देखें ॥ १६ ॥

यां श्रियं सुहृदश्चैव दुर्हृदश्च विशाम्पते ।

पश्यन्ति पुरुषे दीप्तां सा समर्था भवत्युत ॥ १७ ॥

‘ प्रजापालक नरेश! पुरुषमें प्रकाशित होनेवाली जिस लक्ष्मीको उसके सुहृद् और शत्रु दोनों देखते हैं, वही सबल होती है ॥ १७ ॥

समस्थो विषमस्थान् हि दुर्हृदो योऽभिवीक्षते ।

जगतीस्थानिवाद्रिस्थः किमतः परमं सुखम् ॥ १८ ॥

‘ जैसे पर्वतकी चोटीपर खड़ा हुआ मनुष्य भूतलपर स्थित हुई सभी वस्तुओंको नीची और छोटी देखता है, उसी प्रकार जो पुरुष स्वयं सुखमें रहकर शत्रुओंको संकटमें पड़ा हुआ देखता है, उसके लिये इससे बढ़कर सुखकी बात और क्या होगी? ॥ १८ ॥

न पुत्रधनलाभेन न राज्येनापि विन्दति ।

प्रीतिं नृपतिशार्दूल याममित्राघदर्शनात् ॥ १ ९ ॥

किं नु तस्य सुखं न स्यादाश्रमे यो धनंजयम् ।

अभिवीक्षेत सिद्धार्थो वल्कलाजिनवाससम् ॥ २० ॥

'नृपश्रेष्ठ! मनुष्यको अपने शत्रुओंकी दुर्दशा देखनेसे जो प्रसन्नता प्राप्त होती है, वह धन, पुत्र तथा राज्य मिलने से भी नहीं होती । हमलोगोंमेंसे जो भी स्वयं सिद्धमनोरथ होकर आश्रममें अर्जुनको वल्कल और मृगछाला पहने देखेगा, उसे कौन- सा सुख नहीं मिल जायगा? ॥ १ ९ -२० ॥ सुवाससो हि ते भार्या वल्कलाजिनसंवृताम् ।

पृष्ठ 1629

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पश्यन्तु दुःखितां कृष्णां सा च निर्विद्यतां पुनः ॥ २१ ॥

‘ तुम्हारी रानियाँ सुन्दर साड़ियाँ पहनकर चलें और वनमें वल्कल एवं मृगचर्म लपेटकर दुःखमें डूबी हुई द्रुपदकुमारी कृष्णाको देखें तथा द्रौपदी भी इन्हें देखकर बार- बार संताप करे ॥ २१ ॥

विनिन्दतां तथाऽऽत्मानं जीवितं च धनच्युतम् ।

न तथा हि सभामध्ये तस्या भवितुमर्हति ।

वैमनस्यं यथा दृष्ट्वा तव भार्याः स्वलंकृताः ॥ २२ ॥

'वह धनसे वञ्चित हुए अपने आत्मा तथा जीवनकी निन्दा करे– उन्हें बार- बार धिक्कारे । सभामें उसके साथ जो बर्ताव किया गया था, उससे उसके हृदयमें इतना दुःख नहीं हुआ होगा, जितना कि तुम्हारी रानियोंको वस्त्राभूषणोंसे विभूषित देखकर हो सकता है ' ॥ २२ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा तु राजानं कर्णः शकुनिना सह ।

तूष्णीम्बभूवतुरुभौ वाक्यान्ते जनमेजय ॥ २३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! शकुनि और कर्ण दोनों राजा दुर्योधनसे ऐसा कहकर ( अपनी बात पूरी होनेपर) चुप हो गये ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि कर्णशकुनिवाक्ये सप्तत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें कर्ण और शकुनिके वचनविषयक दोसौ सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३७ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ श्लोक मिलाकर कुल २४३ श्लोक हैं । )

पृष्ठ 1630

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अष्टात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः दुर्योधनके द्वारा कर्ण और शकुनिकी मन्त्रणा स्वीकार करना तथा कर्ण आदिका घोषयात्राको निमित्त बनाकर द्वैतवनमें जानेके लिये धृतराष्ट्रसे आज्ञा लेने जाना वैशम्पायन उवाच

कर्णस्य वचनं श्रुत्वा राजा दुर्योधनस्ततः ।

हृष्टो भूत्वा पुनर्दीन इदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! कर्णकी बात सुनकर राजा दुर्योधनको पहले तो बड़ी प्रसन्नता हुई; फिर वह दीन होकर इस प्रकार बोला- ॥ १ ॥

ब्रवीषि यदिदं कर्ण सर्वं मनसि मे स्थितम् ।

न त्वभ्यनुज्ञां लप्स्यामि गमने यत्र पाण्डवाः ॥ २ ॥

‘ कर्ण! तुम जो कुछ कह रहे हो, वह सब मेरे मनमें भी है । परंतु जहाँ पाण्डव रहते हैं, वहाँ जानेके लिये मैं पिताजीकी आज्ञा नहीं पा सकूँगा ॥ २ ॥

परिदेवति तान् वीरान् धृतराष्ट्रो महीपतिः ।

मन्यतेऽभ्यधिकांश्चापि तपोयोगेन पाण्डवान् ॥ ३ ॥

'महाराज धृतराष्ट्र उन वीर पाण्डवोंके लिये सदा विलाप करते रहते हैं । वे तपःशक्तिके संयोगसे पाण्डवोंको हमसे अधिक बलशाली भी मानते हैं ॥ ३ ॥

अथवाप्यनुबुध्येत नृपोऽस्माकं चिकीर्षितम् ।

एवमप्यायतिं रक्षन् नाभ्यनुज्ञातुमर्हति ॥ ४ ॥

‘ अथवा यदि उन्हें इस बातका पता लग जाय कि हमलोग वहाँ जाकर क्या करना चाहते हैं, तब वे भावी संकटसे हमारी रक्षाके लिये ही हमें वहाँ जानेकी अनुमति नहीं देंगे ॥ ४ ॥

न हि द्वैतवने किंचिद् विद्यतेऽन्यत् प्रयोजनम् ।

उत्सादनमृते तेषां वनस्थानां महाद्युते ॥ ५ ॥

‘ महातेजस्वी कर्ण! (पिताजीको यह समझते देर नहीं लगेगी कि ) वनमें रहनेवाले पाण्डवोंको उखाड़ फेंकनेके अतिरिक्त हमलोगोंके द्वैतवनमें जानेका दूसरा कोई प्रयोजन नहीं है ॥ ५ ॥

जानासि हि यथा क्षत्ता द्यूतकाल उपस्थिते ।

अब्रवीद् यच्च मां त्वां च सौबलं वचनं तदा ॥ ६ ॥