श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1611–1620
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1611–1620
पृष्ठ 1611
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
चतुस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः पतिदेवको अनुकूल करनेका उपाय -पतिकी अनन्यभावसे सेवा द्रौपद्युवाच इमं तु ते मार्गमपेतमोहं वक्ष्यामि चित्तग्रहणाय भर्तुः । अस्मिन् यथावत् सखि वर्तमाना भर्तारमाच्छेत्स्यसि कामिनीभ्यः ॥ १ ॥
द्रौपदी बोली - सखी! मैं स्वामीके मनका आकर्षण करनेके लिये तुम्हें एक ऐसा मार्ग बता रही हूँ, जिसमें भ्रम अथवा छल- कपटके लिये तनिक भी स्थान नहीं है । यदि तुम यथावत्रूपसे इसी पथपर चलती रहोगी तो स्वामीके चित्तको अपनी सौतोंसे हटाकर अपनी ओर अवश्य खींच सकोगी ॥ १ ॥
नैतादृशं दैवतमस्ति सत्ये सर्वेषु लोकेषु सदेवकेषु । यथा पतिस्तस्य तु सर्वकामा लभ्याः प्रसादात् कुपितश्च हन्यात् ॥ २ ॥
सत्ये! स्त्रियोंके लिये देवताओंसहित सम्पूर्ण लोकोंमें पतिके समान दूसरा कोई देवता नहीं है । पतिके प्रसादसे नारीकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण हो सकती हैं, और यदि पति ही कुपित हो जाय तो वह नारीकी सभी आशाओंको नष्ट कर सकता है ॥ २ ॥
तस्मादपत्यं विविधाश्च भोगाः शय्यासनान्युत्तमदर्शनानि । वस्त्राणि माल्यानि तथैव गन्धाः स्वर्गश्च लोको विपुला च कीर्तिः ॥ ३ ॥
सेवाद्वारा प्रसन्न किये हुए पतिसे स्त्रियोंको ( उत्तम) संतान, भाँति- भाँतिके भोग, शय्या, आसन, सुन्दर दिखायी देनेवाले वस्त्र, माला, सुगन्धित पदार्थ, स्वर्गलोक तथा महान् यशकी प्राप्ति होती है ॥ ३ ॥
सुखं सुखेनेह न जातु लभ्यं दुःखेन साध्वी लभते सुखानि । सा कृष्णमाराधय सौहृदेन प्रेम्णा च नित्यं प्रतिकर्मणा च ॥ ४ ॥
पृष्ठ 1612
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तथाऽऽसनैश्चारुभिरग्रमाल्यै- र्दाक्षिण्ययोगैर्विविधैश्च गन्धैः । अस्याः प्रियोऽस्मीति यथा विदित्वा त्वामेव संश्लिष्यति तद् विधत्स्व ॥ ५ ॥
सखी! इस जगत्में कभी सुखके द्वारा सुख नहीं मिलता । पतिव्रता स्त्री दुःख उठाकर ही सुख पाती है । तुम सौहार्द, प्रेम, सुन्दर वेश- भूषा धारण, सुन्दर आसन - समर्पण, मनोहर पुष्पमाला, उदारता, सुगन्धित द्रव्य एवं व्यवहारकुशलतासे श्यामसुन्दरकी निरन्तर आराधना करती रहो । उनके साथ ऐसा बर्ताव करो, जिससे वे यह समझकर ' कि सत्यभामाको मैं ही अधिक प्रिय हूँ' तुम्हें ही हृदयसे लगाया करें ॥ ४-५ ॥ श्रुत्वा स्वरं द्वारगतस्य भर्तुः प्रत्युत्थिता तिष्ठ गृहस्य मध्ये । दृष्ट्वा प्रविष्टं त्वरिताऽऽसनेन पाद्येन चैनं प्रतिपूजयस्व ॥ ६ ॥
जब महलके द्वारपर पधारे हुए प्राणवल्लभका स्वर सुनायी पड़े, तब तुम उठकर घरके आँगनमें आ जाओ और उनकी प्रतीक्षामें खड़ी रहो । जब देखो कि वे भीतर आ गये, तब तुरंत आसन और पाद्यके द्वारा उनका यथावत् पूजन करो ॥ ६ ॥
सम्प्रेषितायामथ चैव दास्या- मुत्थाय सर्वं स्वयमेव कार्यम् । जानातु कृष्णस्तव भावमेतं सर्वात्मना मां भजतीति सत्ये ॥ ७ ॥
सत्ये! यदि श्यामसुन्दर किसी कार्यके लिये दासीको भेजते हों तो तुम्हें स्वयं उठकर वह सब काम कर लेना चाहिये; जिससे श्रीकृष्णको तुम्हारे इस सेवा- भावका अनुभव हो जाय कि सत्यभामा सम्पूर्ण हृदयसे मेरी सेवा करती है ॥ ७ ॥
त्वत्संनिधौ यत् कथयेत् पतिस्ते यद्यप्यगुह्यं परिरक्षितव्यम् । काचित् सपत्नी तव वासुदेवं प्रत्यादिशेत् तेन भवेद् विरागः ॥ ८ ॥
तुम्हारे पति तुम्हारे निकट जो भी बात कहें, वह छिपानेयोग्य न हो, तो भी तुम्हें उसे गुप्त ही रखना चाहिये । अन्यथा तुम्हारे मुखसे उस बातको सुनकर यदि कोई सौत उसे श्यामसुन्दरके सामने कह दे, तो इससे उनके मनमें तुम्हारी ओरसे विरक्ति हो सकती है ॥ ८ ॥
प्रियांश्च रक्तांश्च हितांश्च भर्तु- स्तान् भोजयेथा विविधैरुपायैः ।
पृष्ठ 1613
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वेष्यैरुपेक्ष्यैरहितैश्च तस्य भिद्यस्व नित्यं कुहकोद्यतैश्च ॥ ९ ॥
पतिदेवके जो प्रिय, अनुरक्त एवं हितैषी सुहृद् हों, उन्हें तरह- तरहके उपायोंसे खिलाओ - पिलाओ तथा जो उनके शत्रु, उपेक्षणीय और अहितकारक हों अथवा जो उनसे छल - कपट करनेके लिये उद्यत रहते हों; उनसे सदा दूर रहो ॥ ९ ॥
मदं प्रमादं पुरुषेषु हित्वा संयच्छ भावं प्रतिगृह्य मौनम् । प्रद्युम्नसाम्बावपि ते कुमारौ नोपासितव्यौ रहिते कदाचित् ॥ १० ॥
दूसरे पुरुषोंके समीप घमंड और प्रमादका परित्याग करके मौन रहकर अपने मनोभावको प्रकट न होने दो । कुमार प्रद्युम्न और साम्ब यद्यपि तुम्हारे पुत्र हैं, तथापि तुम्हें एकान्तमें कभी उनके पास भी नहीं बैठना चाहिये ॥ १० ॥
महाकुलीनाभिरपापिकाभिः स्त्रीभिः सतीभिस्तव सख्यमस्तु । चण्डाश्च शौण्डाश्च महाशनाश्च चौराश्च दुष्टाश्चपलाश्च वर्ज्याः ॥ ११ ॥
अत्यन्त ऊँचे कुलमें उत्पन्न और पापाचारसे दूर रहनेवाली सती स्त्रियोंके साथ ही तुम्हें सखीभाव स्थापित करना चाहिये । जो अत्यन्त क्रोधी, नशेमें चूर रहनेवाली, अधिक खानेवाली, चोरीकी लत रखनेवाली, दुष्ट और चञ्चल स्वभावकी स्त्रियाँ हों, उन्हें दूरसे ही त्याग देना चाहिये ॥ ११ ॥
एतद् यशस्यं भगदैवतं च स्वार्थ्यं तथा शत्रुनिबर्हणं च । महार्हमाल्याभरणाङ्गरागा भर्तारमाराधय पुण्यगन्धा ॥ १२ ॥
तुम बहुमूल्य हार, आभूषण और अंगराग धारण करके पवित्र सुगन्धित वस्तुओंसे सुवासित हो अपने प्राणवल्लभ श्यामसुन्दर श्रीकृष्णकी आराधना करो । इससे तुम्हारे यश
और सौभाग्यकी वृद्धि होगी । तुम्हारे मनोरथकी सिद्धि तथा शत्रुओंका नाश होगा ॥ १२ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीसत्यभामासंवादपर्वणि द्रौपदीकर्तव्यकथने चतुस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीसत्यभामासंवादपर्वमें द्रौपदीद्वारा स्त्रीकर्तव्यकथनविषयक दो सौ चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३४ ॥
पृष्ठ 1614
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पञ्चत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः सत्यभामाका द्रौपदीको आश्वासन देकर श्रीकृष्णके साथ द्वारकाको प्रस्थान वैशम्पायन उवाच
मार्कण्डेयादिभिर्विप्रैः पाण्डवैश्च महात्मभिः ।
कथाभिरनुकूलाभिः सह स्थित्वा जनार्दनः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! उस समय भगवान् श्रीकृष्ण मार्कण्डेय आदि ब्रह्मर्षियों तथा महात्मा पाण्डवोंके साथ अनुकूल बातें करते हुए कुछ कालतक वहाँ रहकर (द्वारका जानेको उद्यत हुए ) ॥ १ ॥
ततस्तैः संविदं कृत्वा यथावन्मधुसूदनः ।
आरुरुक्षू रथं सत्यामाह्वयामास केशवः ॥ २ ॥
मधुसूदन केशवने उन सबसे यथावत् वार्तालापके अनन्तर विदा लेकर रथपर चढ़नेकी इच्छासे सत्यभामाको बुलाया ॥ २ ॥
सत्यभामा ततस्तत्र स्वजित्वा द्रुपदात्मजाम् ।
उवाच वचनं हृद्यं यथाभावं समाहितम् ॥ ३ ॥
तब सत्यभामा वहाँ द्रुपदकुमारीसे गले मिलकर अपने हार्दिक भावके अनुसार एकाग्रतापूर्वक मधुर वचन बोली- ॥ ३ ॥
पृष्ठ 1615
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
कृष्णे मा भूत् तवोत्कण्ठा मा व्यथा मा प्रजागरः ।
भर्तृभिर्देवसंकाशैर्जितां प्राप्स्यसि मेदिनीम् ॥ ४ ॥
‘ सखी कृष्णे! तुम्हें राज्यके लिये चिन्तित और व्यथित नहीं होना चाहिये । तुम इस प्रकार रात - रातभर जागना छोड़ दो । तुम्हारे देवतुल्य पतियोंद्वारा जीती हुई इस पृथ्वीका राज्य तुम्हें अवश्य प्राप्त होगा ॥ ४ ॥
न ह्येवं शीलसम्पन्ना नैवं पूजितलक्षणाः ।
प्राप्नुवन्ति चिरं क्लेशं यथा त्वमसितेक्षणे ॥ ५ ॥
‘ श्यामलोचने! तुम्हें जैसा क्लेश सहन करना पड़ा है, वैसा कष्ट तुम्हारे जैसी सुशीला तथा श्रेष्ठ लक्षणोंवाली देवियाँ अधिक दिनोंतक नहीं भोगा करती हैं ॥ ५ ॥
अवश्यं च त्वया भूमिरियं निहतकण्टका ।
भर्तृभिः सह भोक्तव्या निर्द्वन्द्वेति श्रुतं मया ॥ ६ ॥
‘ मैंने ( महात्माओंसे) सुना है कि तुम अपने पतियोंके साथ निश्चय ही इस पृथ्वीका निर्द्वन्द्व तथा निष्कण्टक राज्य भोगोगी ॥ ॥
धार्तराष्ट्रवधं कृत्वा वैराणि प्रतियात्य च ।
युधिष्ठिरस्थां पृथिवीं द्रक्ष्यसि द्रुपदात्मजे ॥ ७ ॥
पृष्ठ 1616
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
' द्रुपदकुमारी! तुम शीघ्र ही देखोगी कि धृतराष्ट्रके पुत्रोंको मारकर और पहलेके वैरका भरपूर बदला चुकाकर तुम्हारे पतियोंने विजय पायी है और इस पृथ्वीपर महाराज युधिष्ठिरका अधिकार हो गया है ॥ ७ ॥
यास्ताः प्रव्रजमानां त्वां प्राहसन् दर्पमोहिताः ।
ताः क्षिप्रं हतसंकल्पा द्रक्ष्यसि त्वं कुरुस्त्रियः ॥ ८ ॥
' तुम्हारे वन जाते समय अभिमानसे मोहित हो कुरुकुलकी जिन स्त्रियोंने तुम्हारी हँसी उड़ायी थी, उनकी आशाओंपर पानी फिर जायगा और तुम उन्हें शीघ्र ही दुरवस्थामें पड़ी हुई देखोगी ॥ ८ ॥
तव दुःखोपपन्नाया यैराचरितमप्रियम् ।
विद्धि सम्प्रस्थितान् सर्वांस्तान् कृष्णे यमसादनम् ॥ ९ ॥
' कृष्णे! तुम दुःखमें पड़ी हुई थी, उस दशामें जिन लोगोंने तुम्हारा अप्रिय किया है, उन सबको तुम यमलोकमें गया हुआ ही समझो ॥ ९ ॥
पुत्रस्ते प्रतिविन्ध्यश्च सुतसोमस्तथाविधः ।
श्रुतकर्मार्जुनिश्चैव शतानीकश्च नाकुलिः ॥ १० ॥
सहदेवाच्च यो जातः श्रुतसेनस्तवात्मजः ।
सर्वे कुशलिनो वीराः कृतास्त्राश्च सुतास्तव ॥ ११ ॥
' युधिष्ठिरकुमार प्रतिविन्ध्य, भीमसेननन्दन सुतसोम, अर्जुनकुमार श्रुतकर्मा, नकुलनन्दन शतानीक तथा सहदेवकुमार श्रुतसेन - तुम्हारे ये सभी वीर पुत्र शस्त्रविद्यामें निपुण हो गये हैं और कुशलपूर्वक द्वारकापुरीमें रहते हैं ॥ १०-११ ॥
अभिमन्युरिव प्रीता द्वारवत्यां रता भृशम् ।
त्वमिवैषां सुभद्रा च प्रीत्या सर्वात्मना स्थिता ॥ १२ ॥
‘ वे सबके सब अभिमन्युकी भाँति बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ रहते हैं । द्वारकामें उनका मन बहुत लगता है । सुभद्रादेवी तुम्हारी ही तरह उन सबके साथ सब प्रकारसे प्रेमपूर्ण बर्ताव करती हैं ॥ १२ ॥
प्रीयते तव निर्द्वन्द्वा तेभ्यश्च विगतज्वरा ।
दुःखिता तेन दुःखेन सुखेन सुखिता तथा ॥ १३ ॥
' वे किसीके प्रति भेदभाव न रखकर उन सबके प्रति निश्छल स्नेह रखती हैं । वे उन बालकोंके दुःखसे ही दुःखी और उन्हींके सुखसे सुखी होती हैं ॥ १३ ॥
भजेत् सर्वात्मना चैव प्रद्युम्नजननी तथा ।
भानुप्रभृतिभिश्चैनान् विशिनष्टि च केशवः ॥ १४ ॥
'प्रद्युम्नकी माताजी भी उनकी सब प्रकारसे सेवा और देखभाल करती हैं । श्यामसुन्दर अपने भानु आदि पुत्रोंसे भी बढ़कर तुम्हारे पुत्रोंको मानते हैं ॥ १४ ॥
भोजनाच्छादने चैषां नित्यं मे श्वशुरः स्थितः ।
पृष्ठ 1617
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
रामप्रभृतयः सर्वे भजन्त्यन्धकवृष्णयः ॥ १५ ॥
‘ मेरे श्वशुरजी प्रतिदिन इनके भोजन- वस्त्र आदिकी समुचित व्यवस्थापर दृष्टि रखते हैं । बलरामजी आदि सभी अन्धकवंशी तथा वृष्णिवंशी यादव उनकी सुख- सुविधाका ध्यान रखते हैं ॥ १५ ॥
तुल्यो हि प्रणयस्तेषां प्रद्युम्नस्य च भाविनि ।
एवमादि प्रियं सत्यं हृद्यमुक्त्वा मनोऽनुगम् ॥ १६ ॥
गमनाय मनश्चक्रे वासुदेवरथं प्रति ।
तां कृष्णां कृष्णमहिषी चकाराभिप्रदक्षिणम् ॥ १७ ॥
‘ भामिनि! उन सबका और प्रद्युम्नका भी तुम्हारे पुत्रोंपर समान प्रेम है । ' इस प्रकार हृदयको प्रिय लगनेवाले, सत्य एवं मनके अनुकूल वचन कहकर श्रीकृष्णमहिषी सत्यभामाने अपने स्वामीके रथकी ओर जानेका विचार किया और द्रौपदीकी परिक्रमा की ॥ १६-१७ ॥ आरुरोह रथं शौरेः सत्यभामाथ भाविनी ।
स्मयित्वा तु यदुश्रेष्ठो द्रौपदीं परिसान्त्व्य च ।
उपावर्त्य ततः शीघ्रैर्हयैः प्रायात् पुरं स्वकम् ॥ १८ ॥
तदनन्तर भामिनी सत्यभामा श्रीकृष्णके रथपर आरूढ़ हो गयी। यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णने मुसकराकर द्रौपदीको सान्त्वना दी और उसे लौटाकर शीघ्रगामी घोड़ोंद्वारा अपनी पुरी द्वारकाको प्रस्थान किया ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीसत्यभामासंवादपर्वणि कृष्णगमने पञ्चत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३५ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीसत्यभामासंवादपर्वमें श्रीकृष्णका द्वारकाको प्रस्थानविषयक दो सौ पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३५ ॥
पृष्ठ 1618
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
(घोषयात्रापर्व ) षट्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः पाण्डवोंका समाचार सुनकर धृतराष्ट्रका खेद और चिन्तापूर्ण उद्गार जनमेजय उवाच एवं वने वर्तमाना नराग्र्याः शीतोष्णवातातपकर्शिताङ्गाः । सरस्तदासाद्य वनं च पुण्यं ततः परं किमकुर्वन्त पार्थाः ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा — मुने! इस प्रकार वनमें रहकर सर्दी, गर्मी, हवा और धूपका कष्ट सहनेके कारण जिनके शरीर अत्यन्त कृश हो गये थे, उन नरश्रेष्ठ पाण्डवोंने पवित्र द्वैतवनमें पूर्वोक्त सरोवरके पास पहुँचकर फिर कौन - सा कार्य किया? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच सरस्तदासाद्य तु पाण्डुपुत्रा जनं समुत्सृज्य विधाय वेशम् । वनानि रम्याण्यथ पर्वतांश्च नदीप्रदेशांश्च तदा विचेरुः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी बोले – राजन्! उस ( रमणीय ) सरोवरपर आकर पाण्डवोंने वहाँ आये हुए जनसमुदायको विदा कर दिया और अपने रहनेके लिये कुटी बनाकर वे आस - पासके रमणीय वनों, पर्वतों तथा नदीके तटप्रदेशोंमें विचरने लगे ॥ २ ॥
तथा वने तान् वसतः प्रवीरान्
स्वाध्यायवन्तश्च तपोधनाश्च ।
अभ्याययुर्वेदविदः पुराणा- स्तान् पूजयामासुरथो नराग्र्याः ॥ ३ ॥
इस तरह वनमें रहते हुए उन वीरशिरोमणि पाण्डवोंके पास बहुत- से स्वाध्यायशील, वेदवेत्ता एवं पुरातन तपस्वी ब्राह्मण आते थे और वे नरश्रेष्ठ पाण्डव उनकी यथोचित सेवा-पूजा करते थे ॥ ३ ॥
पृष्ठ 1619
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ततः कदाचित् कुशलः कथासु विप्रोऽभ्यगच्छद् भुवि कौरवेयान् । स तैः समेत्याथ यदृच्छयैव वैचित्रवीर्यं नृपमभ्यगच्छत् ॥ ४ ॥
तदनन्तर किसी समय कथा- वार्तामें कुशल एक ब्राह्मण उस वन्यभूमिमें पाण्डवोंके पास आया और उनसे मिलकर वह घूमता- घामता अकस्मात् राजा धृतराष्ट्रके दरबारमें जा पहुँचा ॥ ४ ॥
अथोपविष्टः प्रतिसत्कृतश्च वृद्धेन राज्ञा कुरुसत्तमेन । प्रचोदितः संकथयाम्बभूव धर्मानिलेन्द्रप्रभवान् यमौ च ॥ ५ ॥
कुरुकुलमें श्रेष्ठ एवं वयोवृद्ध राजा धृतराष्ट्रने उसका बहुत आदर- सत्कार किया । जब वह आसनपर बैठ गया, तब महाराजके पूछनेपर युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन तथा नकुल-सहदेवके समाचार सुनाने लगा ॥ ५ ॥
कृशांश्च वातातपकर्शिताङ्गान् दुःखस्य चोग्रस्य मुखे प्रपन्नान् । तां चाप्यनाथामिव वीरनाथां
पृष्ठ 1620
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
कृष्णां परिक्लेशगुणेन युक्ताम् ॥ ६ ॥
उसने बताया — ‘ इस समय पाण्डव हवा और गर्मी आदिका कष्ट सहन करनेके कारण अत्यन्त कृश हो गये हैं । भयंकर दुःखके मुँहमें पड़ गये हैं और वीरपत्नी द्रौपदी भी अनाथकी भाँति सब ओरसे क्लेश - ही- क्लेश भोग रही है ' ॥ ६ ॥
ततः कथास्तस्य निशम्य राजा वैचित्रवीर्यः कृपयाभितप्तः । वने तथा पार्थिवपुत्रपौत्रान् श्रुत्वा तथा दुःखनदीं प्रपन्नान् ॥ ७ ॥
प्रोवाच दैन्याभिहतान्तरात्मा निःश्वासवातोपहतस्तदानीम् । वाचं कथंचित् स्थिरतामुपेत्य तत् सर्वमात्मप्रभवं विचिन्त्य ॥ ८ ॥
ब्राह्मणकी ये बातें सुनकर विचित्रवीर्यनन्दन राजा धृतराष्ट्र दयासे द्रवित हो बहुत दुःखी हो गये । जब उन्होंने सुना कि राजाके पुत्र और पौत्र होकर भी पाण्डव इस प्रकार दुःखकी नदीमें डूबे हुए हैं, तब उनका हृदय करुणासे भर आया और वे लंबी- लंबी साँसे खींचते हुए किसी प्रकार धैर्य धारण करके सब कुछ अपनी ही करतूतका परिणाम समझकर यों बोले ॥ ७-८ ॥ कथं नु सत्यः शुचिरार्यवृत्तो ज्येष्ठः सुतानां मम धर्मराजः । अजातशत्रुः पृथिवीतले स्म शेते'पुरा राङ्कवकूटशायी ॥ ९ ॥
' अहो! जो मेरे सभी पुत्रोंमें बड़े तथा सत्यवादी, पवित्र और सदाचारी हैं तथा जो पहले रंकु मृगके ( नरम ) रोओंसे बने हुए बिछौनोंपर सोया करते थे, वे अजातशत्रु धर्मराज युधिष्ठिर आजकल भूमिपर कैसे शयन करते होंगे? ॥ ९ ॥
प्रबोध्यते मागधसूतपूगै- र्नित्यं स्तुवद्भिः स्वयमिन्द्रकल्पः । पतत्त्रिसङ्घैः स जघन्यरात्रे प्रबोध्यते नूनमिडातलस्थः ॥ १० ॥
‘ जिन्हें कभी मागधों और सूतोंका समुदाय प्रतिदिन स्तुति-पाठ करके जगाता था, जो साक्षात् इन्द्रके समान तेजस्वी और पराक्रमी हैं, वे ही राजा युधिष्ठिर निश्चय ही अब भूमिपर सोते और पक्षियोंके कलरव सुनकर रातके पिछले पहरमें जागते होंगे ' ॥ १० ॥
कथं नु वातातपकर्शिताङ्गो वृकोदरः कोपपरिप्लुताङ्गः ।