श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1631–1640

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1631–1640

पृष्ठ 1631

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' जुएका अवसर उपस्थित होनेपर विदुरजीने मुझसे, तुमसे तथा ( मामा) शकुनिसे जैसी बातें कही थीं, उन्हें तो तुम जानते ही हो ॥ ६ ॥

तानि सर्वाणि वाक्यानि यच्चान्यत् परिदेवितम् विचिन्त्य नाधिगच्छामि गमनायेतराय वा ॥ ७ ॥

‘ उन सब बातोंपर तथा और भी पाण्डवोंके लिये जो विलाप किया गया है, उसपर विचार करके मैं किसी निश्चयपर नहीं पहुँच पाता कि द्वैतवनमें चलूँ या न चलूँ ॥

ममापि हि महान् हर्षो यदहं भीमफाल्गुनौ ।

क्लिष्टावरण्ये पश्येयं कृष्णया सहिताविति ॥ ८ ॥

‘ यदि मैं भीमसेन तथा अर्जुनको द्रौपदीके साथ वनमें क्लेश उठाते देख सकूँ, तो मुझे भी बड़ी प्रसन्नता होगी ॥ ८ ॥

न तथा ह्याप्नुयां प्रीतिमवाप्य वसुधामिमाम् ।

दृष्ट्वा यथा पाण्डुसुतान् वल्कलाजिनवाससः ॥ ९ ॥

‘ पाण्डवोंको वल्कल वस्त्र पहने और मृगचर्म ओढ़े देखकर मुझे जितनी खुशी होगी, उतनी इस समूची पृथ्वीका राज्य पाकर भी नहीं होगी' ॥ ९ ॥

किं नु स्यादधिकं तस्माद् यदहं द्रुपदात्मजाम् ।

द्रौपदीं कर्ण पश्येयं काषायवसनां वने ॥ १० ॥

‘ कर्ण! मैं द्रुपदकुमारी कृष्णाको वनमें गेरुए कपड़े पहने देखूँ, इससे बढ़कर प्रसन्नताकी बात मेरे लिये और क्या हो सकती है? ॥ १० ॥

यदि मां धर्मराजश्च भीमसेनश्च पाण्डवः ।

युक्तं परमया लक्ष्म्या पश्येतां जीवितं भवेत् ॥ ११ ॥

‘ यदि धर्मराज युधिष्ठिर तथा पाण्डुनन्दन भीमसेन मुझे परमोत्कृष्ट राजलक्ष्मीसे सम्पन्न देख लें तो मेरा जीवन सफल हो जाय ॥ ११ ॥

उपायं न तु पश्यामि येन गच्छेम तद् वनम् ।

यथा चाभ्यनुजानीयाद् गच्छन्तं मां महीपतिः ॥ १२ ॥

‘ परन्तु मुझे कोई ऐसा उपाय नहीं दिखायी देता, जिससे हमलोग द्वैतवनमें जा सकें; अथवा महाराज मुझे वहाँ जानेकी आज्ञा दे दें' ॥ १२ ॥

स सौबलेन सहितस्तथा दुःशासनेन च ।

उपायं पश्य निपुणं येन गच्छेम तद् वनम् ॥ १३ ॥

‘ अतः तुम मामा शकुनि तथा भाई दुःशासनके साथ सलाह करके कोई अच्छा- सा उपाय ढूँढ़ निकालो, जिससे हमलोग द्वैतवनमें चल सकें ॥ १३ ॥

अहमप्यद्य निश्चित्य गमनायेतराय च ।

कल्यमेव गमिष्यामि समीपं पार्थिवस्य ह ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1632

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' मैं भी आज ही जाने या न जानेके विषयमें कोई निश्चय करके कल सबेरा होते ही महाराजके पास जाऊँगा ॥

मयि तत्रोपविष्टे तु भीष्मे च कुरुसत्तमे ।

उपायो यो भवेद् दृष्टस्तं ब्रूयाः सहसौबलः ॥ १५ ॥

‘ जब मैं वहाँ बैठ जाऊँ और कुरुश्रेष्ठ भीष्मजी भी उपस्थित रहें, उस समय जो उपाय दिखायी दे, उसे तुम और शकुनि - दोनों बतलाना ॥ १५ ॥

वचो भीष्मस्य राज्ञश्च निशम्य गमनं प्रति ।

व्यवसायं करिष्येऽहमनुनीय पितामहम् ॥ १६ ॥

‘ पितामह भीष्मजीकी तथा महाराजकी वहाँ जानेके विषयमें क्या सम्मति है; यह सुन लेनेपर पितामहको अनुनय- विनयसे राजी करके ( उनकी आज्ञा लेकर ही) द्वैतवनमें चलनेका निश्चय करूँगा ' ॥ १६ ॥

तथेत्युक्त्वा तु ते सर्वे जग्मुरावसथान् प्रति ।

व्युषितायां रजन्यां तु कर्णो राजानमभ्ययात् ॥ १७ ॥

' बहुत अच्छा, ऐसा ही हो ' यह कहकर सब अपने- अपने विश्रामगृहमें चले गये । जब रात बीती और सबेरा हुआ, तब कर्ण राजा दुर्योधनके पास गया ॥ १७ ॥

ततो दुर्योधनं कर्णः प्रहसन्निदमब्रवीत् ।

उपायः परिदृष्टोऽयं तं निबोध जनेश्वर ॥ १८ ॥

वहाँ कर्णने हँसकर दुर्योधनसे कहा – ' जनेश्वर! मुझे जो उपाय सूझा है, उसे बताता हूँ, सुनो ॥ १८ ॥

घोषा द्वैतवने सर्वे त्वत्प्रतीक्षा नराधिप ।

घोषयात्रापदेशेन गमिष्यामो न संशयः ॥ १ ९ ॥

' नरेश्वर! गौओंके रहनेके सभी स्थान इस समय द्वैतवनमें ही हैं और वहाँ आपके पधारनेकी सदा प्रतीक्षा की जाती है, अतः घोषयात्रा ( उन स्थानोंको देखने) के बहाने हम वहाँ निःसन्देह चल सकेंगे ॥ १ ९ ॥

उचितं हि सदा गन्तुं घोषयात्रां विशाम्पते ।

एवं च त्वां पिता राजन् समनुज्ञातुमर्हति ॥ २० ॥

‘ राजन्! अपनी गौओंको देखनेके लिये यात्रा करना सदा उचित ही है; ऐसा बहाना लेनेपर पिताजी तुम्हें अवश्य वहाँ जानेकी आज्ञा दे सकते हैं ' ॥ २० ॥

तथा कथयमानौ तौ घोषयात्राविनिश्चयम् ।

गान्धारराजः शकुनिः प्रत्युवाच हसन्निव ॥ २१ ॥

घोषयात्राका निश्चय करनेके लिये इस प्रकारकी बातें करते हुए उन दोनों सुहृदोंसे गान्धारराज शकुनिने हँसते हुए- से कहा- ॥ २१ ॥

उपायोऽयं मया दृष्टो गमनाय निरामयः ।

पृष्ठ 1633

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अनुज्ञास्यति नो राजा बोधयिष्यति चाप्युत ॥ २२ ॥

' द्वैतवनमें जानेका यह उपाय मुझे सर्वथा निर्दोष दिखायी दिया है । इसके लिये राजा धृतराष्ट्र हमें अवश्य आज्ञा दे देंगे और वहाँ जाकर हमें क्या- क्या करना चाहिये — इसके विषयमें कुछ समझायेंगे भी ॥ २२ ॥

घोषा द्वैतवने सर्वे त्वत्प्रतीक्षा नराधिप ।

घोषयात्रापदेशेन गमिष्यामो न संशयः ॥ २३ ॥

‘ नरेश्वर! गौओंके रहनेके सभी स्थान इस समय द्वैतवनमें ही हैं और वहाँ तुम्हारे पधारनेकी सदा प्रतीक्षा की जाती है; अतः घोषयात्राके बहाने हम वहाँ निःसंदेह चल सकेंगे ' ॥ २३ ॥

ततः प्रहसिताः सर्वे तेऽन्योन्यस्य तलान् ददुः ।

तदेव च विनिश्चित्य ददृशुः कुरुसत्तमम् ॥ २४ ॥

तदनन्तर वे सब - के - सब अपनी योजनाको सफल होती देख हँसने और एक- दूसरेके हाथपर प्रसन्नतासे ताली देने लगे । फिर यही निश्चय करके वे तीनों कुरुश्रेष्ठ राजा धृतराष्ट्रसे मिले ॥ २४ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि घोषयात्रामन्त्रणे अष्टात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें घोषयात्राके सम्बन्धमें परामर्शविषयक दो सौ अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३८ ॥

पृष्ठ 1634

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एकोनचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः कर्ण आदिके द्वारा द्वैतवनमें जानेका प्रस्ताव, राजा धृतराष्ट्रकी अस्वीकृति, शकुनिका समझाना, धृतराष्ट्रका अनुमति देना तथा दुर्योधनका प्रस्थान वैशम्पायन उवाच

धृतराष्ट्रं ततः सर्वे ददृशुर्जनमेजय ।

पृष्ट्वा सुखमथो राज्ञः पृष्टा राज्ञा च भारत ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - भरतनन्दन जनमेजय! तदनन्तर वे सब लोग राजा धृतराष्ट्रसे मिले । उन्होंने राजाकी कुशल पूछी तथा राजाने उनकी ॥ १ ॥

ततस्तैर्विहितः पूर्वं समङ्गो नाम बल्लवः ।

समीपस्थास्तदा गावो धृतराष्ट्रे न्यवेदयत् ॥ २ ॥

उन लोगोंने समंग नामक एक ग्वालेको पहलेसे ही सिखा- पढ़ाकर ठीक कर लिया था । उसने राजा धृतराष्ट्रकी सेवामें निवेदन किया कि ' महाराज! आजकल आपकी गौएँ समीप ही आयी हुई हैं ' ॥ २ ॥

अनन्तरं च राधेयः शकुनिश्च विशाम्पते ।

आहतुः पार्थिवश्रेष्ठं धृतराष्ट्रं जनाधिपम् ॥ ३ ॥

जनमेजय! इसके बाद कर्ण और शकुनिने राजाओंमें श्रेष्ठ जननायक धृतराष्ट्रसे कहा -– ॥ ३ ॥

पृष्ठ 1635

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रमणीयेषु देशेषु घोषाः सम्प्रति कौरव ।

स्मारणे समयः प्राप्तो वत्सानामपि चाङ्कनम् ॥ ४ ॥

'कुरुराज! इस समय हमारी गौओंके स्थान रमणीय प्रदेशोंमें हैं । यह समय गौओं और बछड़ोंकी गणना करने तथा उनकी आयु, रंग, जाति एवं नामका ब्यौरा लिखनेके लिये भी अत्यन्त उपयोगी है ॥ ४ ॥

मृगया चोचिता राजन्नस्मिन् काले सुतस्य ते ।

दुर्योधनस्य गमनं समनुज्ञातुमर्हसि ॥ ५ ॥

‘ राजन्! इस समय आपके पुत्र दुर्योधनके लिये हिंसक पशुओंके शिकार करनेका भी उपयुक्त अवसर है । अतः आप इन्हें द्वैतवनमें जानेकी आज्ञा दीजिये ' ॥ ५ ॥

धृतराष्ट्रउवाच

मृगया शोभना तात गवां हि समवेक्षणम् ।

विश्रम्भस्तु न गन्तव्यो बल्लवानामिति स्मरे ॥ ६ ॥

धृतराष्ट्र बोले — तात! हिंसक पशुओंका शिकार खेलनेका प्रस्ताव सुन्दर है । गौओंकी देख - भालका काम भी अच्छा ही है; परंतु ग्वालोंकी बातोंपर विश्वास नहीं करना चाहिये, यह नीतिका वचन है, जिसका मुझे स्मरण हो आया है ॥ ६ ॥

ते तु तत्र नरव्याघ्राः समीप इति नः श्रुतम् ।

पृष्ठ 1636

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अतो नाभ्यनुजानामि गमनं तत्र वः स्वयम् ॥ ७ ॥

मैंने सुना है कि नरश्रेष्ठ पाण्डव भी इन दिनों वहीं कहीं आस- पास ठहरे हुए हैं; अतः तुमलोगोंको मैं स्वयं वहाँ जानेकी आज्ञा नहीं दे सकता ॥ ७ ॥

छद्मना निर्जितास्ते तु कर्शिताश्च महावने ।

तपोनित्याश्च राधेय समर्थाश्च महारथाः ॥ ८ ॥

राधानन्दन! पाण्डव छलपूर्वक हराये गये हैं । महान् वनमें रहकर उन्हें बड़ा कष्ट भोगना पड़ा है । वे निरन्तर तपस्या करते रहे हैं और अब विशेष शक्तिसम्पन्न हो गये हैं । महारथी तो वे हैं ही ॥ ८ ॥

धर्मराजोन संक्रुद्धयेद् भीमसेनस्त्वमर्षणः ।

यज्ञसेनस्य दुहिता तेज एव तु केवलम् ॥ ९ ॥

माना कि धर्मराज युधिष्ठिर क्रोध नहीं करेंगे, परंतु भीमसेन तो सदा ही अमर्षमें भरे रहते हैं और राजा द्रुपदकी पुत्री कृष्णा भी साक्षात् अग्निकी ही मूर्ति है ॥ ९ ॥

यूयं चाप्यपराध्येयुर्दर्पमोहसमन्विताः ।

ततो विनिर्दहेयुस्ते तपसा हि समन्विताः ॥ १० ॥

तुमलोग तो अहंकार और मोहमें चूर रहते ही हो; अतः उनका अपराध अवश्य करोगे । उस दशामें वे तुम्हें भस्म किये बिना नहीं छोड़ेंगे । क्योंकि उनमें तपःशक्ति विद्यमान ॥ १० ॥

अथवा सायुधा वीरा मन्युनाभिपरिप्लुताः ।

सहिता बद्धनिस्त्रिंशा दहेयुः शस्त्रतेजसा ॥ ११ ॥

अथवा, उन वीरोंके पास अस्त्र- शस्त्रोंकी भी कमी नहीं है । तुम्हारे प्रति उनका क्रोध सदा ही बना रहता है । वे तलवार बाँधे सदा एक साथ रहते हैं; अतः वे अपने शस्त्रोंके तेजसे भी तुम्हें दग्ध कर सकते हैं ॥

अथ यूयं बहुत्वात् तानभियात कथंचन ।

अनार्यं परमं तत् स्यादशक्यं तच्च वै मतम् ॥ १२ ॥

यदि संख्यासे अधिक होनेके कारण तुमने ही किसी प्रकार उनपर चढ़ाई कर दी तो यह भी तुम्हारी बड़ी भारी नीचता ही समझी जायगी । मेरी समझमें तो तुमलोगोंका पाण्डवोंपर विजय पाना असम्भव ही है ॥ १२ ॥

उषितो हि महाबाहुरिन्द्रलोके धनंजयः ।

दिव्यान्यस्त्राण्यवाप्याथ ततः प्रत्यागतो वनम् ॥ १३ ॥

महाबाहु धनंजय इन्द्रलोकमें रह चुके हैं और वहाँसे दिव्यास्त्रोंकी शिक्षा लेकर वनमें लौटे हैं ॥ १३ ॥

अकृतास्त्रेण पृथिवी जिता बीभत्सुना पुरा ।

किं पुनः स कृतास्त्रोऽद्य न हन्याद् वो महारथः ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1637

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पहले जब अर्जुनको दिव्यास्त्र नहीं प्राप्त हुए थे, तभी उन्होंने सारी पृथ्वीको जीत लिया था । अब तो महारथी अर्जुन दिव्यास्त्रोंके विद्वान् हैं, ऐसी दशामें वे तुम्हें मार डालें, यह कौन बड़ी बात है? ॥ १४ ॥

अथवा मद्वचः श्रुत्वा तत्र यत्ता भविष्यथ ।

उद्विग्नवासो विश्रम्भाद् दुःखं तत्र भविष्यति ॥ १५ ॥

अथवा मेरी बात सुनकर तुमलोग वहाँ यदि अपनेको काबूमें रखते हुए सावधानीके साथ रह सको, तो भी यह विश्वास करके कि ये लोग सत्यवादी होनेके कारण हमें कष्ट नहीं देंगे, वनवाससे उद्विग्न हुए पाण्डवोंके बीचमें निवास करना तुम्हारे लिये दुःखदायी ही होगा ॥ १५ ॥

अथवा सैनिकाः केचिदपकुर्युर्युधिष्ठिरम् ।

तदबुद्धिकृतं कर्म दोषमुत्पादयेच्च वः ॥ १६ ॥

अथवा यह भी सम्भव है कि तुमलोगोंके कुछ सैनिक युधिष्ठिरका अपमान कर बैठें और तुम्हारे अनजानमें किया गया यह अपराध तुमलोगोंके लिये हानिकारक हो जाय ॥ १६ ॥

तस्माद् गच्छन्तु पुरुषाः स्मारणायाप्तकारिणः ।

न स्वयं तत्र गमनं रोचये तव भारत ॥ १७ ॥

अतः भरतनन्दन! दूसरे विश्वसनीय पुरुष गौओंकी गणना करनेके लिये वहाँ चले जायँगे । स्वयं तुम्हारा वहाँ जाना मुझे ठीक नहीं जान पड़ता ॥ १७ ॥

शकुनिरुवाच

धर्मज्ञः पाण्डवो ज्येष्ठः प्रतिज्ञातं च संसदि ।

तेन द्वादश वर्षाणि वस्तव्यानीति भारत ॥ १८ ॥

शकुनि बोला- भारत! ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिर धर्मात्मा हैं । उन्होंने भरी सभामें यह प्रतिज्ञा की है कि ' हमें बारह वर्षोंतक वनमें रहना है ' ॥ १८ ॥

अनुवृत्ताश्च ते सर्वे पाण्डवा धर्मचारिणः ।

युधिष्ठिरस्तु कौन्तेयो न नः कोपं करिष्यति ॥ १ ९ ॥

अन्य पाण्डव भी धर्मपर ही चलनेवाले हैं; अतः वे सब- के - सब युधिष्ठिरका ही अनुसरण करते हैं । कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर हमलोगोंपर कदापि क्रोध नहीं करेंगे ॥

मृगयां चैव नो गन्तुमिच्छा संवर्तते भृशम् ।

स्मारणं तु चिकीर्षामो न तु पाण्डवदर्शनम् ॥ २० ॥

हमारी विशेष इच्छा केवल हिंसक पशुओंका शिकार खेलनेकी है । हमलोग वहाँ स्मरणके लिये केवल गौओंकी गणना करना चाहते हैं । पाण्डवोंसे मिलनेकी हमारी इच्छा बिलकुल नहीं है ॥ २० ॥

पृष्ठ 1638

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न चानार्यसमाचारः कश्चित् तत्र भविष्यति ।

न च तत्र गमिष्यामो यत्र तेषां प्रतिश्रयः ॥ २१ ॥

हमारी ओरसे वहाँ कोई भी नीचतापूर्ण व्यवहार नहीं होगा । जहाँ पाण्डवोंका निवास होगा, उधर हमलोग जायँगे ही नहीं ॥ २१ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तः शकुनिना धृतराष्ट्रो जनेश्वरः ।

दुर्योधनं सहामात्यमनुजज्ञे न कामतः ॥ २२ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! शकुनिके ऐसा कहनेपर राजा धृतराष्ट्रने इच्छा न होते हुए भी मन्त्रियों - सहित दुर्योधनको वहाँ जानेकी आज्ञा दे दी ॥ २२ ॥

अनुज्ञातस्तु गान्धारिः कर्णेन सहितस्तदा ।

निर्ययौ भरतश्रेष्ठो बलेन महता वृतः ॥ २३ ॥

धृतराष्ट्रकी आज्ञा पाकर गान्धारीपुत्र भरतश्रेष्ठ दुर्योधन कर्ण और विशाल सेनाके साथ नगरसे बाहर निकला ॥ २३ ॥

दुःशासनेन च तथा सौबलेन च धीमता ।

संवृतो भ्रातृभिश्चान्यैः स्त्रीभिश्चापि सहस्रशः ॥ २४ ॥

दुःशासन, बुद्धिमान् शकुनि, अन्यान्य भाइयों तथा सहस्रों स्त्रियोंसे घिरे हुए दुर्योधनने वहाँसे प्रस्थान किया ॥ २४ ॥

तं निर्यान्तं महाबाहुं द्रष्टुं द्वैतवनं सरः ।

पौराश्चानुययुः सर्वे सहदारा वनं च तत् ॥ २५ ॥

द्वैतवन नामक सरोवर तथा वनको देखनेके लिये यात्रा करनेवाले महाबाहु दुर्योधनके पीछे समस्त पुरवासी भी अपनी स्त्रियोंको साथ लेकर गये ॥ २५ ॥

अष्टौ रथसहस्राणि त्रीणि नागायुतानि च ।

पत्तयो बहुसाहस्रा हयाश्च नवतिः शताः ॥ २६ ॥

दुर्योधनके साथ आठ हजार रथ, तीस हजार हाथी, कई हजार पैदल और नौ हजार घोड़े गये ॥ २६ ॥

शकटापणवेशाश्च वणिजो वन्दिनस्तथा ।

नराश्च मृगयाशीलाः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २७ ॥

बोझ ढोनेके लिये सैकड़ों छकड़े, दुकानें तथा वेष- भूषाकी सामग्रियाँ भी साथ चलीं ।

वणिक्, वंदीजन तथा आखेटप्रिय मनुष्य सैकड़ों- हजारोंकी संख्यामें साथ गये ॥ २७ ॥

ततः प्रयाणे नृपतेः सुमहानभवत् स्वनः ।

प्रावृषीव महावायोरुद्धतस्य विशाम्पते ॥ २८ ॥

पृष्ठ 1639

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राजन्! राजा दुर्योधनके प्रस्थानकालमें बड़े जोरका कोलाहल हुआ, मानो वर्षाकालमें प्रचण्ड वायुका भयंकर शब्द सुनायी दे रहा हो ॥ २८ ॥

गव्यूतिमात्रे न्यवसद् राजा दुर्योधनस्तदा ।

प्रयातो वाहनैः सर्वैस्ततो द्वैतवनं सरः ॥ २९ ॥

नगरसे दो कोस दूर जाकर राजा दुर्योधनने पड़ाव डाल दिया । फिर वहाँसे समस्त वाहनोंके साथ द्वैतवन एवं सरोवरकी ओर प्रस्थान किया ॥ २ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि दुर्योधनप्रस्थाने एकोनचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें दुर्योधनप्रस्थानविषयक दो सौ उनतालीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ९ ॥

पृष्ठ 1640

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चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः दुर्योधनका सेनासहित वनमें जाकर गौओंकी देखभाल करना और उसके सैनिकों एवं गन्धर्वोंमें परस्पर कटु संवाद वैशम्पायन उवाच

अथ दुर्योधनो राजा तत्र तत्र वने वसन् ।

जगाम घोषानभितस्तत्र चक्रे निवेशनम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तदनन्तर राजा दुर्योधन जहाँ - तहाँ वनमें पड़ाव डालता हुआ उन घोषों ( गोशालाओं ) के पास पहुँच गया और वहाँ उसने अपनी छावनी डाली ॥ १ ॥

रमणीये समाज्ञाते सोदके समहीरुहे ।

देशे सर्वगुणोपेते चक्रुरावसथान् पराः ॥ २ ॥

उसके साथ गये हुए लोगोंने भी उस सर्वगुणसम्पन्न, रमणीय, सुपरिचित, सजल तथा सघन वृक्षावलियोंसे युक्त प्रदेशमें अपने डेरे डाल दिये ॥ २ ॥

तथैव तत्समीपस्थान् पृथगावसथान् बहुन् ।

कर्णस्य शकुनेश्चैव भ्रातॄणां चैव सर्वशः ॥ ३ ॥

इसी प्रकार दुर्योधनके डेरेके पास ही कर्ण, शकुनि तथा दुःशासन आदि सब भाइयोंके लिये पृथक् - पृथक् बहुत- से खेमे पड़ गये ॥ ३ ॥

ददर्श स तदा गावः शतशोऽथ सहस्रशः ।

अङ्कुर्लक्षैश्च ताः सर्वा लक्षयामास पार्थिवः ॥ ४ ॥

( रहनेकी व्यवस्था ठीक हो जानेपर) राजा दुर्योधनने अपनी सैकड़ों एवं हजारों

गौओंका निरीक्षण करना आरम्भ किया । उन सबपर संख्या और निशानी डलवा दी ॥ ४ ॥

अङ्कयामास वत्सांश्च जज्ञे चोपसृतांस्त्वपि ।

बालवत्साश्च या गावः कालयामास ता अपि ॥ ५ ॥

फिर बछड़ोंपर भी संख्या और निशानी डलवायी और उनमेंसे जो नाथनेयोग्य थे, उन सबकी गणना कराकर उनपर पहचान डाल दी । जिन गौओंके बछड़े बहुत छोटे थे, उनकी भी अलग गणना करवायी ॥ ५ ॥

अथ स स्मारणं कृत्वा लक्षयित्वा त्रिहायनान् ।

वृतो गोपालकैः प्रीतो व्यहरत् कुरुनन्दनः ॥ ६ ॥

इस प्रकार जाँच- पड़तालका काम पूरा करके कुरुनन्दन दुर्योधनने तीन सालके बछड़ोंकी पृथक् गणना करवायी और स्मरणके लिये सब कुछ लिखकर वह बड़ी