02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 1781–1790

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1781–1790

पृष्ठ 1781

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1781 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पतिव्रता द्रौपदी चाहती थी कि मेरे पति अभी यहाँ आ जायँ । अतः वह जयद्रथसे वाद-विवाद करती हुई उसे बातोंमें फँसाये रखनेकी चेष्टा करने लगी ॥ २० ॥

(द्रौपद्युवाच नैवं वद महाबाहो न्याय्यं त्वं न च बुध्यसे ॥

पाण्डूनां धार्तराष्ट्राणां स्वसा चैव कनीयसी ।

दुःशला नाम तस्यास्त्वं भर्ता राजकुलोद्वह ॥

मम भ्राता च न्याय्येन त्वया रक्ष्या महारथ ।

धर्मिष्ठानां कुले जातो न धर्मं त्वमवेक्षसे ॥

द्रौपदी बोली – महाबाहो! ऐसी पापकी बात न बोलो । कौन- सा कार्य धर्मके अनुकूल और न्यायसंगत है, इसका तुम्हें ज्ञान नहीं है । तुम धृतराष्ट्रपुत्रों तथा पाण्डवोंकी छोटी बहन दुःशलाके पति हो । महारथी राजकुमार! इस नाते से न्यायतः तुम मेरे भाई हो; अतः तुम्हें मेरी रक्षा करनी चाहिये । तुम्हारा जन्म तो धर्मात्माओंके कुलमें हुआ है, परंतु तुम्हारी दृष्टि धर्मकी ओर नहीं है ॥ वैशम्पायन उवाच इत्युक्तः सिन्धुराजोऽथ वाक्यमुत्तरमब्रवीत् । वैशम्पायनजी कहते हैं - द्रौपदीके ऐसा कहनेपर सिन्धुराज जयद्रथने उसे इस प्रकार उत्तर दिया । जयद्रथ उवाच राज्ञां धर्मं न जानीषे स्त्रियो रत्नानि चैव हि । साधारणानि लोकेऽस्मिन् प्रवदन्ति मनीषिणः II ) जयद्रथ बोला – कृष्णे! तुम राजाओंका धर्म नहीं जानती । मनीषी पुरुषोंका कथन है कि इस संसारमें स्त्रियाँ तथा रत्न सर्वसाधारणकी वस्तुएँ हैं ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीहरणपर्वणि जयद्रथद्रौपदीसंवादे सप्तषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीहरणपर्वमें जयद्रथद्रौपदीसंवादविषयक दो सौ सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६७ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल २४ श्लोक हैं )

पृष्ठ 1782

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1782 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अष्टषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः द्रौपदीका जयद्रथको फटकारना और जयद्रथद्वारा उसका अपहरण वैशम्पायन उवाच सरोषरागोपहतेन बल्गुना सरागनेत्रेण नतोन्नतभ्रुवा । मुखेन विस्फूर्य सुवीरराष्ट्रपं ततोऽब्रवीत् तं द्रुपदात्मजा पुनः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! जयद्रथकी बात सुनकर द्रौपदीका सुन्दर मुख क्रोधसे तमतमा उठा, आँखें लाल हो गयीं, भौंहें टेढ़ी होकर तन गयीं और उसने सौवीरराज जयद्रथको फटकारकर पुनः इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥

यशस्विनस्तीक्ष्णविषान् महारथा- नभिब्रुवन् मूढ न लज्जसे कथम् । महेन्द्रकल्पान् निरतान् स्वकर्मसु स्थितान् समूहेष्वपि यक्षरक्षसाम् ॥ २ ॥

' अरे मूढ़! मेरे पति पाण्डव महान् यशस्वी, सदा अपने धर्मके पालनमें स्थित, यक्षों तथा राक्षसोंके समूहमें भी युद्ध करनेमें समर्थ, देवराज इन्द्रके सदृश शक्तिशाली तथा महारथी वीर हैं । उनका क्रोध तीक्ष्ण विषवाले नागोंके समान भयंकर है । उनके सम्मानके विरुद्ध ऐसी ओछी बातें कहते हुए तुझे लज्जा कैसे नहीं आती? ॥ २ ॥

न किंचिदीड्यं प्रवदन्ति पापं वनेचरं वा गृहमेधिनं वा । तपस्विनं सम्परिपूर्णविद्यं भषन्ति हैवं श्वनराः सुवीर ॥ ३ ॥

‘ अच्छे लोग पूजनीय, तपस्वी तथा पूर्ण विद्वान् पुरुषके प्रति भले ही वह वनवासी हो या गृहस्थ कोई अनुचित बात नहीं कहते हैं। जयद्रथ! मनुष्योंमें जो तेरे- जैसे कुत्ते हैं, वे ही इस तरह भूँका करते हैं ॥ ३ ॥

अहं तु मन्ये तव नास्ति कश्चि- देतादृशे क्षत्रियसंनिवेशे । यस्त्वाद्य पातालमुखे पतन्तं पाणौ गृहीत्वा प्रतिसंहरेत ॥ ४ ॥

पृष्ठ 1783

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1783 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

नागं प्रभिन्नं गिरिकूटकल्प- मुपत्यकां हैमवतीं चरन्तम् । दण्डीव यूथादपसेधसि त्वं यो जेतुमाशंससि धर्मराजम् ॥ ५ ॥

'मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि इस क्षत्रिय- मण्डलीमें कोई भी तेरा ऐसा हितैषी स्वजन नहीं है, जो आज तेरा हाथ पकड़कर तुझे पातालके गहरे गर्तमें गिरनेसे बचा ले । अरे! जैसे कोइ मूर्ख मनुष्य हिमालयकी उपत्यकामें विचरनेवाले पर्वतशिखरके समान ऊँचे एवं मदकी धारा बहानेवाले गजराजको हाथमें डंडा लेकर उसके यूथसे अलग हाँक लाना चाहे, उसी प्रकार तू धर्मराज युधिष्ठिरको जीतनेका हौसला रखता है ॥ ४-५ ॥ बाल्यात् प्रसुप्तस्य महाबलस्य सिंहस्य पक्ष्माणि मुखाल्लुनासि । पदा समाहत्य पलायमानः क्रुद्धं यदा द्रक्ष्यसि भीमसेनम् ॥ ६ ॥

' तू मूर्खतावश ( अपनी माँदमें) सोये हुए महाबली सिंहको लात मारकर उसके मुखके बाल नोंच रहा है । जिस समय तू क्रोधमें भरे हुए भीमसेनको देखेगा, उस समय तुरंत भाग

पृष्ठ 1784

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1784 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

छूटेगा ॥ || महाबलं घोरतरं प्रवृद्धं जातं हरिं पर्वतकन्दरेषु । प्रसुप्तमुग्रं प्रपदेन हंसि यः क्रुद्धमायोत्स्यसि जिष्णुमुग्रम् ॥ ७ ॥

' यदि तू रोषमें भरे हुए भयंकर योद्धा अर्जुनसे जूझना चाहता है, तो समझ ले कि पर्वतकी कन्दराओंमें उत्पन्न हो वहीं पलकर बढ़े हुए अत्यन्त घोर और महाबली सोये हुए भयानक सिंहको तू पैरसे ठोकर मार रहा है ॥ ७ ॥

कृष्णोरगौ तीक्ष्णमुखौ द्विजिह्वौ मत्तः पदाऽऽक्रामसि पुच्छदेशे । यः पाण्डवाभ्यां पुरुषोत्तमाभ्यां जघन्यजाभ्यां प्रयुयुत्ससे त्वम् ॥ ८ ॥

‘यदि तू पुरुषरत्न दोनों छोटे पाण्डवोंके साथ युद्ध करनेकी इच्छा रखता है तो यह मानना पड़ेगा कि मतवाला होकर तू मुखमें तीक्ष्ण विष धारण करनेवाले एवं दो जिह्वाओंसे युक्त दो काले नागोंकी पूँछको पैरसे कुचल रहा है ॥ ८ ॥

यथा च वेणुः कदली नलो वा फलन्त्यभावाय न भूतयेऽऽत्मनः । तथैव मां तैः परिरक्ष्यमाणा- मादास्यसे कर्कटकीव गर्भम् ॥ ९ ॥

' अरे मूर्ख! जैसे बाँस, केला और नरकुल - ये अपने विनाशके लिये ही फलते हैं, समृद्धिके लिये नहीं तथा जैसे केकड़ेकी मादा अपनी मृत्युके लिये ही गर्भ धारण करती है, उसी प्रकार तू पाण्डवोंद्वारा सदा सुरक्षित मुझ द्रौपदीका अपनी मृत्युके लिये ही अपहरण करना चाहता है ' ॥ ९ ॥

जयद्रथ उवाच जानामि कृष्णे विदितं ममैतद् यथाविधास्ते नरदेवपुत्राः । न त्वेवमेतेन विभीषणेन शक्या वयं त्रासयितुं त्वयाद्य ॥ १० ॥

- जयद्रथने कहा – कृष्णे! मैं जानता हूँ कि तुम्हारे पति राजकुमार पाण्डव कैसे हैं? मुझे ये सब बातें मालूम हैं। परंतु इस समय इस विभीषिकाद्वारा तुम हमें डरा नहीं सकती ॥ १० ॥

वयं पुनः सप्तदशेषु कृष्णे

पृष्ठ 1785

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1785 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

कुलेषु सर्वेऽनवमेषु जाताः । षड्भ्यो गुणेभ्योऽभ्यधिका विहीनान् मन्यामहे द्रौपदि पाण्डुपुत्रान् ॥ ११ ॥

द्रुपदकुमारी कृष्णे! हम सब लोग उन श्रेष्ठ कुलोंमें उत्पन्न हुए हैं, जो सत्रह- गुणोंसे सम्पन्न हैं । इसके सिवा हम छ गुणोंको पाकर पाण्डवोंसे बढ़े- चढ़े हैं; अतः उन्हें अपनेसे हीन मानते हैं ॥ ११ ॥

सा क्षिप्रमातिष्ठ गजं रथं वा न वाक्यमात्रेण वयं हि शक्याः । आशंस वा त्वं कृपणं वदन्ती सौवीरराजस्य पुनः प्रसादम् ॥ १२ ॥

कृष्णे! तुम बड़ी - बड़ी बातें बनाकर हमें रोक नहीं सकती । अब तुम्हारे सामने दो ही मार्ग हैं —या तो सीधी तरहसे तुरंत चलकर मेरे हाथी या रथपर सवार हो जाओ; अथवा पाण्डवोंके हार जानेपर दीन वाणीमें विलाप करती हुई सौवीरराज जयद्रथसे कृपाकी भीख माँगो ॥ १२ ॥

द्रौपद्युवाच महाबला किंत्विह दुर्बलेव सौवीरराजस्य मताहमस्मि । नाहं प्रमाथादिह सम्प्रतीता सौवीरराजं कृपणं वदेयम् ॥ १३ ॥

द्रौपदीने कहा- मैं महान् बल एवं शक्तिसे सम्पन्न हूँ, तो भी सौवीरराज जयद्रथकी दृष्टिमें यहाँ दुर्बल-सी प्रतीत हो रही हूँ। मुझे भगवान्पर विश्वास है, मैं जोर-जबर्दस्ती करनेसे यहाँ जयद्रथके सामने कभी दीन वचन नहीं बोल सकती ॥ १३ ॥

यस्या हि कृष्णौ पदवीं चरेतां

समास्थितावेकरथे समेतौ ।

इन्द्रोऽपि तां नापहरेत् कथंचि- न्मनुष्यमात्रः कृपणः कुतोऽन्यः ॥ १४ ॥

एक रथपर बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन साथ होकर जिसकी खोजमें निकलेंगे, उस द्रौपदीको देवराज इन्द्र भी किसी तरह हरकर नहीं ले जा सकते । फिर दूसरे किसी दीन - हीन मनुष्यकी तो बिसात ही क्या है? ॥ १४ ॥

यदा किरीटी परवीरघाती निघ्नन् रथस्थो द्विषतां मनांसि । मदन्तरे त्वद्ध्वजिनीं प्रवेष्टा

पृष्ठ 1786

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1786 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

कक्षं दहन्नग्निरिवोष्णगेषु ॥ १५ ॥

जब शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले किरीटधारी अर्जुन शत्रुओंके मनोबलको नष्ट करते हुए मेरे लिये रथमें स्थित हो तेरी सेनामें प्रवेश करेंगे, उस समय जैसे गर्मियोंमें आग घास-फूसको जलाती है, उसी प्रकार तुझे और तेरी सेनाको भस्म कर डालेंगे ॥ १५ ॥

जनार्दनः सान्धकवृष्णिवीरो महेष्वासाः केकयाश्चापि सर्वे । एते हि सर्वे मम राजपुत्राः प्रहृष्टरूपाः पदवीं चरेयुः ॥ १६ ॥

अन्धक और वृष्णिवंशी वीरोंके साथ भगवान् श्रीकृष्ण तथा महान् धनुर्धर समस्त केकयराजकुमार मेरे रक्षक हैं । ये सभी राजपुत्र हर्ष और उत्साहमें भरकर मेरा पता लगानेके लिये निकल पड़ेंगे ॥ १६ ॥

मौर्वीविसृष्टाः स्तनयित्नुघोषा गाण्डीवमुक्तास्त्वतिवेगवन्तः । हस्तं समाहत्य धनंजयस्य भीमाः शब्दं घोरतरं नदन्ति ॥ १७ ॥

अर्जुनके गाण्डीव धनुषकी प्रत्यञ्चासे छूटे हुए अत्यन्त वेगशाली बाण मेघोंके समान गर्जना करते हैं । वे भयानक बाण अर्जुनके हाथसे टकराकर अत्यन्त घोर शब्दकी सृष्टि करते हैं ॥ १७ ॥

गाण्डीवमुक्तांश्च महाशरौघान् पतंगसङ्घानिव शीघ्रवेगान् । यदा द्रष्टास्यर्जुनं वीर्यशालिनं तदा स्वबुद्धिं प्रतिनिन्दितासि ॥ १८ ॥

जब तू गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए विशाल बाण- समूहोंको टिड्डियोंकी भाँति वेगसे उड़ते देखेगा और जब अद्भुत पराक्रमसे शोभा पानेवाले वीर अर्जुनपर तेरी दृष्टि पड़ेगी, उस समय अपने इस कुकृत्यको याद करके तू स्वयं ही अपनी बुद्धिको धिक्कारेगा ॥ १८ ॥

सशङ्खघोषः सतलत्रघोषो गाण्डीवधन्वा मुहुरुद्वहंश्च । यदा शरानर्पयिता तवोरसि तदा मनस्ते किमिवाभविष्यत् ॥ १ ९ ॥ जब गाण्डीव धनुष धारण करनेवाले अर्जुन शंख- ध्वनिके साथ दस्तानेकी आवाज फैलाते हुए बार- बार बाण उठा - उठाकर तेरी छातीपर चोट करेंगे, उस समय तेरे मनकी दशा कैसी होगी? ( इसे भी सोच ले ) ॥ १ ९ ॥ गदाहस्तं भीममभिद्रवन्तं

पृष्ठ 1787

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1787 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

माद्रीपुत्रौ सम्पतन्तौ दिशश्च । अमर्षजं क्रोधविषं वमन्तौ दृष्ट्वा चिरं तापमुपैष्यसेऽधम ॥ २० ॥

अरे नीच! जब भीमसेन हाथमें गदा लिये दौड़ेंगे और माद्रीनन्दन नकुल- सहदेव अमर्षजनित क्रोधरूपी विष उगलते हुए ( तेरी सेनापर) सब दिशाओंसे टूट पड़ेंगे, तब उन्हें देखकर तू दीर्घकालतक संतापकी आगमें जलता रहेगा ॥ २० ॥

यथा वाहं नातिचरे कथंचित् पतीन् महार्हान् मनसापि जातु । तेनाद्य सत्येन वशीकृतं त्वां द्रष्टास्मि पार्थैः परिकृष्यमाणम् ॥ २१ ॥

यदि मैंने कभी मनसे भी अपने परम पूजनीय पतियोंका किसी तरह उल्लंघन नहीं किया हो तो आज इस सत्यके प्रभावसे मैं देखूँगी कि पाण्डव तुझे जीतकर अपने वशमें करके जमीनपर घसीट रहे हैं ॥ २१ ॥

न सम्भ्रमं गन्तुमहं हि शक्ष्ये त्वया नृशंसेन विकृष्यमाणा । समागताहं हि कुरुप्रवीरैः पुनर्वनं काम्यकमागतास्मि ॥ २२ ॥

मैं जानती हूँ कि तू नृशंस है, अतः मुझे बलपूर्वक खींचकर ले जायगा । परंतु इससे मैं सम्भ्रम ( घबराहट ) -में नहीं पड़ सकूँगी । मैं अपने पति कुरुवंशी वीर पाण्डवोंसे शीघ्र ही मिलूँगी और उनके साथ पुनः इसी काम्यकवनमें आकर रहूँगी ॥ २२ ॥

वैशम्पायन उवाच सा ताननुप्रेक्ष्य विशालनेत्रा जिघृक्षमाणानवभर्त्सयन्ती । प्रोवाच मा मा स्पृशतेति भीता धौम्यं प्रचुक्रोश पुरोहितं सा ॥ २३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! उस समय जयद्रथके साथी आश्रममें प्रविष्ट होकर द्रौपदीको पकड़ लेना चाहते थे । यह देख विशाल नेत्रोंवाली द्रौपदी उन्हें डाँटकर बोली — ‘ खबरदार, कोई मेरे शरीरका स्पर्श न करे । ' फिर भयभीत होकर उसने अपने पुरोहित धौम्य मुनिको पुकारा ॥ २३ ॥

जग्राह तामुत्तरवस्त्रदेशे जयद्रथस्तं समवाक्षिपत् सा । तया समाक्षिप्ततनुः स पापः

पृष्ठ 1788

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1788 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पपात शाखीव निकृत्तमूलः ॥ २४ ॥

इतनेमें ही जयद्रथने आगे बढ़कर द्रौपदीकी ओढ़नीका छोर पकड़ लिया, परंतु द्रौपदीने उसे जोरका धक्का दिया । उसका धक्का लगते ही पापी जयद्रथका शरीर जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ प्रगृह्यमाणा तु महाजवेन मुहुर्विनिःश्वस्य च राजपुत्री । सा कृष्यमाणा रथमारुरोह धौम्यस्य पादावभिवाद्य कृष्णा ॥ २५ ॥

फिर बड़े वेगसे उठकर उसने राजकुमारी द्रौपदीको पकड़ लिया । तब बार- बार लंबी साँसें छोड़ती हुई द्रौपदीने धौम्यमुनिके चरणोंमें प्रणाम किया, किंतु वह जयद्रथके द्वारा खींची जानेके कारण बाध्य होकर उसके रथपर बैठ गयी ॥ २५ ॥

धौम्य उवाच

नेयं शक्या त्वया नेतुमविजित्य महारथान् ।

धर्मं क्षत्रस्य पौराणमवेक्षस्व जयद्रथ ॥ २६ ॥

तब धौम्यने कहा – जयद्रथ! तू क्षत्रियोंके प्राचीन धर्मपर दृष्टिपात कर। महारथी पाण्डवोंको परास्त किये बिना इसे ले जानेका तुझे कोई अधिकार नहीं है ॥ २६ ॥

क्षुद्रं कृत्वा फलं पापं त्वं प्राप्स्यसि न संशयः ।

आसाद्य पाण्डवान् वीरान् धर्मराजपुरोगमान् ॥ २७ ॥

तू धर्मराज आदि वीर पाण्डवोंके सामने पड़नेपर इस खोटे कर्मका बुरा फल प्राप्त करेगा, इसमें संशय नहीं है ॥ २७ ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्त्वा हियमाणां तां राजपुत्रीं यशस्विनीम् ।

अन्वगच्छत् तदा धौम्यः पदातिगणमध्यगः ॥ २८ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! ऐसा कहकर धौम्य मुनि हरकर ले जायी जाती हुई यशस्विनी राजकुमारी द्रौपदीके पीछे - पीछे पैदल सेनाके बीचमें होकर चलने लगे ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीहरणपर्वणि अष्टषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीहरणपर्वमें दो सौ अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६८ ॥

पृष्ठ 1789

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1789 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

3. खेती, व्यापार, दुर्ग, पुल बनाना, हाथी बाँधना, खानोंकी रक्षा, कर वसूलना और निर्जन प्रदेशोंको बर संधान - कर्म तथा प्रभुशक्ति, मन्त्रशक्ति, उत्साहशक्ति, प्रभुसिद्धि, मन्त्रसिद्धि, उत्साहसिद्धि, प्रभूदय, उत्साहोदय – ये नौ मिलाकर सत्रह गुण होते हैं । २. शौर्य, तेज, धृति, दाक्षिण्य, दान तथा ऐश्वर्य – ये छः गुण हैं ।

पृष्ठ 1790

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1790 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एकोनसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः पाण्डवोंका आश्रमपर लौटना और धात्रेयिकासे द्रौपदीहरणका वृत्तान्त जानकर जयद्रथका पीछा करना वैशम्पायन उवाच ततो दिशः सम्प्रविहृत्य पार्था मृगान् वराहान् महिषांश्च हत्वा । धनुर्धराः श्रेष्ठतमाः पृथिव्यां पृथक् चरन्तः सहिता बभूवुः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर भूमण्डलके श्रेष्ठतम धनुर्धर पाँचों कुन्तीकुमार सब दिशाओंमें घूम-फिरकर हिंसक पशुओं, वराहों और जंगली भैंसोंको मारकर पृथक् - पृथक् विचरते हुए एक साथ हो गये ॥ १ ॥

ततो मृगव्यालगणानुकीर्णं महावनं तद् विहगोपघुष्टम् । भ्रातॄंश्च तानभ्यवदद् युधिष्ठिरः श्रुत्वा गिरो व्याहरतां मृगाणाम् ॥ २ ॥

उस समय हिंसक पशुओं और साँपोंसे भरा हुआ वह महान् वन सहसा चिड़ियोंके चीत्कारसे गूँज उठा तथा वन्य पशु भी भयभीत होकर आर्तनाद करने लगे । उन सबकी आवाज सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने अपने भाइयोंसे कहा— ॥ २ ॥

आदित्यदीप्तां दिशमभ्युपेत्य मृगा द्विजाः क्रूरमिमे वदन्ति । आयासमुग्रं प्रतिवेदयन्तो महावनं शत्रुभिर्बाध्यमानम् ॥ ३ ॥

‘ भाइयो! देखो, ये मृग और पक्षी सूर्यके द्वारा प्रकाशित पूर्वदिशाकी ओर दौड़ते हुए अत्यन्त कठोर शब्द बोल रहे हैं और किसी भयंकर उत्पातकी सूचना देते हैं । जान पड़ता है, यह विशाल वन हमारे शत्रुओं द्वारा पीड़ित हो रहा है ॥ ३ ॥

क्षिप्रं निवर्तध्वमलं विलम्बै- न हि मे दूति दह्यते च ।

बुद्धिं समाच्छाद्य च मेमे समन्यु- रुद्धूयते प्राणपतिः शरीरे ॥ ४ ॥