श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1771–1780
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1771–1780
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पञ्चषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः कोटिकास्यका द्रौपदीसे जयद्रथ और उसके साथियोंका परिचय देते हुए उसका भी परिचय पूछना कोटिक उवाच का त्वं कदम्बस्य विनाम्य शाखा- मेकाऽऽश्रमे तिष्ठसि शोभमाना । देदीप्यमानाग्निशिखेव नक्तं व्याधूयमाना पवनेन सुभ्रूः ॥ १ ॥
कोटिक बोला – सुन्दर भौंहोंवाली सुन्दरी! तुम कौन हो? जो कदम्बकी डाली झुकाकर उसके सहारे इस आश्रममें अकेली खड़ी हो, यहाँ तुम्हारी बड़ी शोभा हो रही है । जैसे रातमें वायुसे आन्दोलित अग्निकी ज्वाला देदीप्यमान दिखायी देती है, उसी प्रकार तुम भी इस आश्रममें अपनी प्रभा बिखेर रही हो ॥ १ ॥
अतीव रूपेण समन्विता त्वं न चाप्यरण्येषु बिभेषि किं नु । देवी नु यक्षी यदि दानवी वा वराप्सरा दैत्यवराङ्गना वा ॥ २ ॥
तुम बड़ी रूपवती हो । क्या इन जंगलोंमें भी तुम्हें डर नहीं लगता है? तुम किसी देवता, यक्ष, दानव अथवा दैत्यकी स्त्री तो नहीं हो या कोई श्रेष्ठ अप्सरा हो? ॥ २ ॥
वपुष्मती वोरगराजकन्या वनेचरी वा क्षणदाचरस्त्री । यद्येव राज्ञो वरुणस्य पत्नी यमस्य सोमस्य धनेश्वरस्य ॥ ३ ॥
क्या तुम दिव्यरूप धारण करनेवाली नागराजकुमारी हो अथवा वनमें विचरनेवाली किसी राक्षसकी पत्नी हो अथवा राजा वरुण, यमराज, चन्द्रमा एवं धनाध्यक्ष कुबेर— इनमें से किसीकी पत्नी हो? ॥ ३ ॥
धातुर्विधातुः सवितुर्विभोर्वा शक्रस्य वा त्वं सदनात् प्रपन्ना । न ह्येव नः पृच्छसि ये वयं स्म न चापि जानीम तवेह नाथम् ॥ ४ ॥
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अथवा तुम धाता, विधाता, सविता, विभु या इन्द्रके भवनसे यहाँ आयी हो? न तो तुम्हीं हमारा परिचय पूछती हो और न हम ही यहाँ तुम्हारे पतिके विषयमें जानते हैं ॥ वयं हि मानं तव वर्धयन्तः पृच्छाम भद्रे प्रभवं प्रभुं च । आचक्ष्व बन्धूंश्च पतिं कुलं च तत्त्वेन यच्चेह करोषि कार्यम् ॥ ५ ॥
भद्रे! हम तुम्हारा सम्मान बढ़ाते हुए तुम्हारे पिता और पतिका परिचय पूछ रहे हैं । तुम अपने बन्धु - बान्धव, पति और कुलका यथार्थ परिचय दो और यह भी बताओ कि तुम यहाँ कौन - सा कार्य करती हो? ॥ अहं तु राज्ञः सुरथस्य पुत्रो यं कोटिकास्येति विदुर्मनुष्याः । असौ तु यस्तिष्ठति काञ्चनाङ्गे रथे हुतोऽग्निश्चयने यथैव ॥ ६ ॥
त्रिगर्तराजः कमलायताक्षि क्षेमङ्करो नाम स एष वीरः । कमलके समान विशाल नेत्रोंवाली द्रौपदी! मैं राजा सुरथका पुत्र हूँ, जिसे साधारण जनता कोटिकास्यके नामसे जानती है और वे जो सुवर्णमय रथमें बैठे हैं तथा वेदीपर स्थापित एवं घीकी आहुति पड़नेसे प्रज्वलित हुए अग्निके समान प्रकाशित हो रहे हैं,
त्रिगर्तदेशके राजा हैं । ये वीर क्षेमंकरके नामसे प्रसिद्ध हैं ॥ ६३ ॥
अस्मात् परस्त्वेष महाधनुष्मान् पुत्रः कुलिन्दाधिपतेर्वरिष्ठः ॥ ७ ॥
निरीक्षते त्वां विपुलायताक्षः सुपुष्पितः पर्वतवासनित्यः । इनके बाद जो ये महान् धनुष धारण किये सुन्दर फूलोंकी मालाएँ पहने विशाल नेत्रोंवाले वीर तुम्हें निहार रहे हैं, कुलिन्दराजके ज्येष्ठ पुत्र हैं। वे सदा पर्वतपर ही निवास करते हैं ॥ ७३ ॥
असौ तु यः पुष्करिणीसमीपे श्यामो युवा तिष्ठति दर्शनीयः ॥ ८ ॥
इक्ष्वाकुराज्ञः सुबलस्य पुत्रः स एव हन्ता द्विषतां सुगात्रि । सुन्दराङ्गि! और वे जो पुष्करिणीके समीप श्यामवर्णके दर्शनीय नवयुवक खड़े हैं, इक्ष्वाकुवंशी राजा सुबलके पुत्र हैं । ये अकेले ही अपने शत्रुओंका संहार करनेमें समर्थ हैं ॥ ८३ ॥
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यस्यानुचक्रं ध्वजिनः प्रयान्ति सौवीरका द्वादश राजपुत्राः ॥ ९ ॥
शोणाश्वयुक्तेषु रथेषु सर्वे मखेषु दीप्ता इव हव्यवाहाः । अङ्गारकः कुञ्जरो गुप्तकश्च शत्रुञ्जयः संजयसुप्रवृद्धौ ॥ १० ॥
भयंकरोऽथ भ्रमरो रविश्च शूरः प्रतापः कुहनश्च नाम । यं षट् सहस्रा रथिनोऽनुयान्ति नागा हयाश्चैव पदातिनश्च ॥ ११ ॥
जयद्रथो नाम यदि श्रुतस्ते सौवीरराजः सुभगे स एषः । लाल रंगके घोड़ोंसे जुते हुए रथोंपर बैठकर यज्ञोंमें प्रज्वलित अग्निके समान सुशोभित होनेवाले अंगारक, कुञ्जर, गुप्तक, शत्रुञ्जय, संजय, सुप्रवृद्ध, भयंकर, भ्रमर, रवि, शूर, प्रताप तथा कुहन — सौवीरदेशके ये बारह राजकुमार जिनके रथके पीछे हाथमें ध्वजा लिये चलते हैं तथा छः हजार रथी, हाथी, घोड़े और पैदल जिनका अनुगमन करते हैं, उन सौवीरराज जयद्रथका नाम तुमने सुना होगा । सौभाग्यशालिनि! ये वे ही राजा जयद्रथ दिखायी दे रहे हैं ॥ ९ –११३ ॥ तस्यापरे भ्रातरोऽदीनसत्त्वा बलाहकानीकविदारणाद्याः ॥ १२ ॥
उनके दूसरे उदार हृदयवाले भाई बलाहक और अनीक– विदारण आदि भी उनके साथ हैं ॥ १२ ॥
सौवीरवीराः प्रवरा युवानो राजानमेते बलिनो ऽनुयान्ति । एतैः सहायैरुपयाति राजा मरुद्गणैरिन्द्र इवाभिगुप्तः ॥ १३ ॥
सौवीरदेशके ये प्रमुख बलवान् नवयुवक वीर सदा राजा जयद्रथके साथ चलते हैं । राजा जयद्रथ इन सहायकोंसे सुरक्षित हो मरुद्गणोंसे घिरे हुए देवराज इन्द्रकी भाँति यात्रा करते हैं ॥ १३ ॥
अजानतां ख्यापय न: सुकेशि कस्यासि भार्या दुहिता च कस्य ॥ १४ ॥
सुकेशि! हम तुमसे सर्वथा अनजान हैं, अतः हमें भी अपना परिचय दो; तुम किसकी पत्नी और किसकी पुत्री हो? ॥ १४ ॥
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीहरणपर्वणि कोटिकास्यप्रश्ने पञ्चषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीहरणपर्वमें कोटिकास्यकाप्रश्नविषयक सौ पैसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६५ ॥
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षट्षष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः द्रौपदीका कोटिकास्यको उत्तर वैशम्पायन उवाच अथाब्रवीद् द्रौपदी राजपुत्री पृष्टा शबीनां प्रवरेण तेन । अवेक्ष्य मन्दं प्रविमुच्य शाखां संगृह्णती कौशिकमुत्तरीयम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! शिबिदेशके प्रमुख वीर कोटिकास्यके इस प्रकार पूछनेपर राजकुमारी द्रौपदी कदम्बकी वह डाली छोड़कर अपनी रेशमी ओढ़नीको सँभालती हुई संकोचपूर्वक उसकी ओर देखकर बोली- ॥ १ ॥
बुद्धयाभिजानामि नरेन्द्रपुत्र
न मादृशी त्वामभिभाष्टुमर्हति ।
न त्वेह वक्तास्ति तवेह वाक्य- मन्यो नरो वाप्यथवापि नारी ॥ २ ॥
‘ राजकुमार! मैं बुद्धिसे सोच-विचारकर भलीभाँति समझती हूँ कि मुझ - जैसी पतिपरायणा स्त्रीको तुम जैसे पर पुरुषसे वार्तालाप नहीं करना चाहिये; परंतु यहाँ कोई दूसरा ऐसा पुरुष अथवा स्त्री नहीं है जो तुम्हारी बातका उत्तर दे सके ॥ २ ॥
एका ह्यहं सम्प्रति तेन वाचं ददामि वै भद्र निबोध चेदम् । अहं ह्यरण्ये कथमेकमेका त्वामालपेयं निरता स्वधर्मे ॥ ३ ॥
‘ मैं इस समय यहाँ अकेली ही हूँ । इसलिये विवश होकर तुमसे बोलना पड़ रहा है । भद्रपुरुष! मेरी इस बातपर ध्यान दो । मैं अपने धर्मके पालनमें तत्पर रहनेवाली हूँ । इस समय इस वनमें मैं अकेली हूँ और तुम भी अकेले पुरुष हो, ऐसी दशामें मैं तुम्हारे साथ कैसे वार्तालाप कर सकती हूँ? ॥ ३ ॥
जानामि च त्वां सुरथस्य पुत्रं
यं कोटिकास्येति विदुर्मनुष्याः ।
तस्मादहं शैब्य तथैव तुभ्य- माख्यामि बन्धून् प्रथितं कुलं च ॥ ४ ॥
' परंतु मैं तुम्हें पहचानती हूँ, तुम राजा सुरथके पुत्र हो, जिसे लोग कोटिकास्यके नामसे जानते हैं । शैब्य! इसीलिये मैं तुम्हें अपने बन्धुजनों तथा विश्वविख्यात वंशका परिचय देती
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हूँ ॥ ४ ॥
अपत्यमस्मि द्रुपदस्य राज्ञः कृष्णेति मां शैब्य विदुर्मनुष्याः । साहं वृणे पञ्च जनान् पतित्वे ये खाण्डवप्रस्थगताः श्रुतास्ते ॥ ५ ॥
‘ शिबिदेशके राजकुमार! मैं राजा द्रुपदकी पुत्री हूँ । मनुष्य मुझे कृष्णाके नामसे जानते हैं । मैंने पाँचों पाण्डवोंका पतिरूपमें वरण किया है, जो खाण्डव- प्रस्थमें रहते थे । उनका नाम तुमने अवश्य सुना होगा ॥ युधिष्ठिरो भीमसेनार्जुनौ च माद्रयाश्च पुत्रौ पुरुषप्रवीरौ । मां निवेश्येह दिशश्चतस्रो विभज्य पार्था मृगयां प्रयाताः ॥ ६ ॥
- ' युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन तथा माद्रीपुत्र नरवीर नकुल सहदेव – ये ही मेरे पति हैं । वे सब - के - सब मुझे यहाँ रखकर हिंसक पशुओंको मारनेके लिये अलग- अलग बँटकर चारों दिशाओंमें गये हैं ॥ ६ ॥
प्राचीं राजा दक्षिणां भीमसेनो जयः प्रतीचीं यमजावुदीचीम् । मन्ये तु तेषां रथसत्तमानां कालोऽभितः प्राप्त इहोपयातुम् ॥ ७ ॥
‘ स्वयं राजा युधिष्ठिर पूर्व दिशामें गये हैं, भीमसेन दक्षिण दिशामें, अर्जुन पश्चिम दिशामें और नकुल - सहदेव उत्तर दिशामें गये हैं । मैं समझती हूँ, अब उन महारथियोंके सब ओरसे यहाँ पहुँचनेका समय हो गया है ॥ ७ ॥
सम्मानिता यास्यथ तैर्यथेष्टं विमुच्य वाहानवरोहयध्वम् । प्रियातिथिर्धर्मसुतो महात्मा प्रीतो भविष्यत्यभिवीक्ष्य युष्मान् ॥ ८ ॥
' अब तुमलोग अपनी सवारियोंसे उतरो और घोड़ोंको खोलकर विश्राम करो । मेरे पतियोंका आदर- सत्कार ग्रहण करके अपने अभीष्ट देशको जाना । महात्मा धर्मपुत्र युधिष्ठिर अतिथियोंके बड़े प्रेमी हैं । वे तुमलोगोंको देखकर बहुत प्रसन्न होंगे ' ॥ ८ ॥
एतावदुक्त्वा द्रुपदात्मजा सा शैब्यात्मजं चन्द्रमुखी प्रतीता । विवेश तां पर्णशालां प्रशस्तां संचिन्त्य तेषामतिथित्वमर्थे ॥ ९ ॥
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शिबिदेशके राजकुमार कोटिकास्यसे ऐसा कहकर वह चन्द्रमुखी द्रौपदी अपनी उत्तम पर्णशालाके भीतर चली गयी । ' ये लोग हमारे अतिथि हैं ' ऐसा सोचकर उसे उनपर विश्वास हो गया था । अतः वह प्रसन्नतापूर्वक उनके आतिथ्यकी व्यवस्थामें लग गयी ॥ ९ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीहरणपर्वणि द्रौपदीवाक्ये षट्षष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीहरणपर्वमें द्रौपदीवाक्यविषयक दो सौ छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६६ ॥
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सप्तषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः जयद्रथ और द्रौपदीका संवाद वैशम्पायन उवाच
तथाऽऽसीनेषु सर्वेषु तेषु राजसु भारत ।
यदुक्तं कृष्णया सार्धं तत् सर्वं प्रत्यवेदयत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - भारत! पूर्वोक्त प्रकारसे रथपर बैठे हुए उन सब राजाओंके पास जाकर कोटिकास्यने द्रौपदीके साथ उसकी जो- जो बातें हुई थीं, वे सब कह सुनायीं ॥ १ ॥
कोटिकास्यवचः श्रुत्वा शैब्यं सौवीरकोऽब्रवीत् ।
यदा वाचं व्याहरन्त्यामस्यां मे रमते मनः ॥ २ ॥
सीमन्तिनीनां मुख्यायां विनिवृत्तः कथं भवान् ।
एतां दृष्ट्वा स्त्रियो मेऽन्या यथा शाखामृगस्त्रियः ॥ ३ ॥
प्रतिभान्ति महाबाहो सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।
दर्शनादेव हि मनस्तया मेऽपहृतं भृशम् ॥ ४ ॥
तां समाचक्ष्व कल्याणीं यदि स्याच्छैब्य मानुषी । कोटिकास्यकी बात सुनकर सौवीरनरेश जयद्रथने उससे कहा – ' शैब्य! सुन्दरियोंमें सर्वश्रेष्ठ वह युवती जब तुमसे बातचीत कर रही थी, उस समय मेरा मन उसीमें लगा हुआ था । तुम उसे साथ लिये बिना कैसे लौट आये? महाबाहो! मैं तुमसे यह सच कहता हूँ इसे देखकर मुझे दूसरी स्त्रियाँ ऐसी जान पड़ती हैं मानो बंदरियाँ हों । उसने दर्शनमात्रसे ही मेरे मनको अच्छी तरह हर लिया है । शैब्य! यदि वह मानवी हो तो उस कल्याणीके विषयमें ठीक- ठीक बताओ ’ ॥ २–४३ ॥ कोटिक उवाच एषा वै द्रौपदी कृष्णा राजपुत्री यशस्विनी ॥ ५ ॥
पञ्चानां पाण्डुपुत्राणां महिषी सम्मता भृशम् ।
सर्वेषां चैव पार्थानां प्रिया बहुमता सती ॥ ६ ॥
तया समेत्य सौवीर सौवीराभिमुखो व्रज । कोटिक बोला — सौवीरनरेश! यह यशस्विनी राजकुमारी द्रुपदपुत्री कृष्णा ही है, जो पाँचों पाण्डवोंकी अत्यन्त आदरणीया महारानी है । कुन्तीके सभी पुत्र इसे प्यार करते हैं । यह सती- साध्वी देवी अपने पतियोंके लिये बड़े सम्मानकी वस्तु है । तुम उससे मिलकर सौवीरदेशकी राह लो ॥ ५-६३ ॥
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वैशम्पायन उवाच एवमुक्तः प्रत्युवाच पश्यामि द्रौपदीमिति ॥ ७ ॥
पतिः सौवीरसिन्धूनां दुष्टभावो जयद्रथः । वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! कोटिकास्यके ऐसा कहनेपर सौवीर और सिन्धु आदि देशोंके स्वामी जयद्रथने मनमें दुर्भावना लेकर उसे उत्तर दिया –‘अच्छा, मैं भी द्रौपदीसे मिल लेता हूँ ' ॥ ७३ ॥
स प्रविश्याश्रमं पुण्यं सिंहगोष्ठं वृको यथा ॥ ८ ॥
आत्मना सप्तमः कृष्णामिदं वचनमब्रवीत् ।
कुशलं ते वरारोहे भर्तारस्तेऽप्यनामयाः ॥ ९ ॥
येषां कुशलकामासि तेऽपि कच्चिदनामयाः । उसने अपने छः भाइयोंके साथ स्वयं सातवाँ बनकर द्रौपदीके पवित्र आश्रममें प्रवेश किया, मानो कोई भेड़िया सिंहकी माँदमें घुसा हो । वहाँ जाकर उसने द्रौपदीसे इस प्रकार कहा— ' वरारोहे! तुम कुशलसे हो न? तुम्हारे पति नीरोग तो हैं न? इनके सिवा और जिन लोगोंको तुम सकुशल देखना चाहती हो, वे सभी स्वस्थ तो हैं न? ॥ ८ - ९ ३ ॥ द्रौपद्युवाच अपि ते कुशलं राजन् राष्ट्रे कोशे बले तथा ॥ १० ॥
कच्चिदेकः शिबीनाढ्यान् सौवीरान् सह सिन्धुभिः ।
अनुतिष्ठसि धर्मेण ये चान्ये विजितास्त्वया ॥ ११ ॥
द्रौपदी बोली- राजन्! तुम स्वयं सकुशल हो न? तुम्हारे राज्य, खजाना और सैनिक तो कुशलसे हैं न? समृद्धिशाली शिबि, सौवीर, सिन्धु तथा अन्य जो- जो प्रदेश तुम्हारे अधिकारमें आ गये हैं, उन सबकी प्रजाका तुम धर्मपूर्वक पालन तो करते हो न? ॥ १०-११ ॥
कौरव्यः कुशली राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
अहं च भ्रातरश्चास्य यांश्चान्यान् परिपृच्छसि ॥ १२ ॥
पाद्यं प्रतिगृहाणेदमासनं च नृपात्मज । मेरे पति कुरुकुलरत्न कुन्तीकुमार राजा युधिष्ठिर सकुशल हैं। मैं, उनके चारों भाई तथा अन्य जिन लोगोंके विषयमें तुम पूछ रहे हो, वे सब कुशलसे हैं । राजकुमार! यह पैर धोनेके लिये जल है, इसे ग्रहण करो और यह आसन है, इसपर बैठो ॥ १२३ ॥
जयद्रथ उवाच एहि मे रथमारोह सुखमाप्नुहि केवलम् ॥ १३ ॥
गतश्रीकांश्च्युतान् राज्यात् कृपणान् गतचेतसः ।
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अरण्यवासिनः पार्थान् नानुरोद्धुं त्वमर्हसि ॥ १४ ॥
नैव प्राज्ञा गतश्रीकं भर्तारमुपयुञ्जते ।
युञ्जानमनुयुञ्जीत न श्रियः संक्षये वसेत् ॥ १५ ॥
जयद्रथने कहा — आओ चलो, मेरे रथपर बैठो और अखण्ड सुखका उपभोग करो । अब पाण्डवोंके पास धन नहीं रहा । उनका राज्य छीन लिया गया । वे दीन और उत्साहहीन हो गये हैं । अब इन वनवासी कुन्तीपुत्रोंका अनुसरण करना तुम्हें शोभा नहीं देता । विदुषी स्त्रियाँ निर्धन पतिकी उपासना नहीं करती हैं | स्वामीके पास जबतक लक्ष्मी रहे, तभीतक उसके साथ रहना चाहिये । जब उसकी सम्पत्ति नष्ट हो जाय, तो वहाँ कदापि न रहे ॥ १३ —१५ ॥
श्रिया विहीना राष्ट्राच्च विनष्टाः शाश्वतीः समाः ।
अलं ते पाण्डुपुत्राणां भक्त्या क्लेशमुपासितुम् ॥ १६ ॥
पाण्डव सदाके लिये श्रीहीन तथा राज्यभ्रष्ट हो गये हैं । अब तुम्हें पाण्डवोंके प्रति भक्ति रखकर कष्ट भोगनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ १६ ॥
भार्या मे भव सुश्रोणि त्यजैनान् सुखमाप्नुहि ।
अखिलान् सिन्धुसौवीरानाप्नुहि त्वं मया सह ॥ १७ ॥
सुन्दरि! तुम मेरी भार्या बन जाओ । इन पाण्डवोंको छोड़ दो और मेरे साथ रहकर सुख भोगो । मेरे साथ रहनेसे तुम्हें सम्पूर्ण सिन्धु और सौवीरदेशका राज्य प्राप्त होगा, तुम महारानी बनोगी ॥ १७ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्ता सिन्धुराजेन वाक्यं हृदयकम्पनम् ।
कृष्णा तस्मादपाक्रामद् देशात् सभ्रुकुटीमुखी ॥ १८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! सिन्धुराज जयद्रथके मुखसे यह हृदय कँपा देनेवाली बात सुनकर द्रुपदकुमारी कृष्णा उस स्थानसे दूर हट गयी । उसके मुखपर रोष छा गया और उसकी भौंहें तन गयीं ॥ १८ ॥
अवमत्यास्य तद् वाक्यमाक्षिप्य च सुमध्यमा ।
मैवमित्यब्रवीत् कृष्णा लज्जस्वेति च सैन्धव ॥ १ ९ ॥
उसके इस प्रस्तावका तिरस्कार करके सुन्दरी द्रौपदीने उसे कड़ी फटकार सुनायी और बोली – ‘ खबरदार, फिर कभी ऐसी बात मुखसे मत निकालना । सिन्धुराज! तुम्हें लज्जा आनी चाहिये थी ॥ १ ९ ॥
साकाङ्क्षमाणा भर्तृणामुपयातमनिन्दिता ।
विलोभयामास परं वाक्यैर्वाक्यानि युञ्जती ॥ २० ॥