02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 1791–1800

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1791–1800

पृष्ठ 1791

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‘ अब शीघ्र आश्रमकी ओर लौटो । हमें विलम्ब नहीं करना चाहिये; क्योंकि मेरा मन बुद्धिकी विवेकशक्तिको आच्छादित करके व्यथित तथा चिन्तासे दग्ध हो रहा है । तथा मेरे शरीरमें यह प्राणोंका स्वामी ( जीव ) भयभीत हुआ छटपटा रहा है ॥ ४ ॥

सरः सुपर्णेन हृतोरगं यथा राष्ट्रं यथाराजकमात्तलक्ष्मि । एवंविधं मे प्रतिभाति काम्यकं शौण्डैर्यथा पीतरसश्च कुम्भः ॥ ५ ॥

‘ जैसे गरुड़के द्वारा सरोवरमें रहनेवाले महासर्पके पकड़ लिये जानेपर वह मथित--सा हो उठता है, जैसे बिना राजाका राज्य श्रीहीन हो जाता है तथा जिस प्रकार रससे भरा हुआ घड़ा धूर्तोंद्वारा ( चुपकेसे ) पी लिये जानेपर सहसा खाली दिखायी देता है; उसी प्रकार शत्रुओंद्वारा काम्यकवनकी भी दुरवस्था की गयी है, ऐसा मुझे जान पड़ता है ' ॥ ५ ॥

ते सैन्धवैरत्यनिलोग्रवेगै- र्महाजवैर्वाजिभिरुह्यमानाः ।

युक्तैर्बृहद्भिः सुरथैर्नृवीरा- स्तदाऽऽश्रमायाभिमुखा बभूवुः ॥ ६ ॥

तत्पश्चात् वे नरवीर पाण्डव हवासे भी अधिक तेज चलनेवाले सिन्धुदेशके महान् वेगशाली अश्वोंसे जुते हुए सुन्दर एवं विशाल रथोंपर बैठकर आश्रमकी ओर चले ॥ ६ ॥

तेषां तु गोमायुरनल्पघोषो निवर्ततां वाममुपेत्य पार्श्वम् । प्रव्याहरत् तत् प्रविमृश्य राजा प्रोवाच भीमं च धनंजयं च ॥ ७ ॥

उस समय एक गीदड़ बड़े जोरसे रोताहुआ लौट हुएपाण्डवोंके वामभागसे होकर निकल गया । इस अपशकुनपर विचार करके राजा युधिष्ठिरने भीमसेन और अर्जुनसे कहा ॥ ७ ॥

यथा वदत्येष विहीनयोनिः शालावृको वाममुपेत्य पार्श्वम् । सुव्यक्तमस्मानवमन्य पापैः कृतोऽभिमर्दः कुरुभिः प्रसह्य ॥ ८ ॥

‘ यह नीच योनिका गीदड़, जो हमलोगोंके वामभागसे होकर निकला है, जैसा शब्द कर रहा है, उससे स्पष्ट जान पड़ता है कि पापी कौरवोंने यहाँ आकर हमारी अवहेलना करते हुए हठपूर्वक भारी संहार मचा रखा है ' ॥ ८ ॥

इत्येव ते तद् वनमाविशन्तो महत्यरण्ये मृगयां चरित्वा ।

पृष्ठ 1792

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बालामपश्यन्त तदा रुदन्तीं धात्रेयिकां प्रेष्यवधूं प्रियायाः ॥ ९ ॥

इस प्रकार उस विशाल वनमें शिकार खेलकर लौटे हुए पाण्डव जब आश्रमके समीपवर्ती वनमें प्रवेश करने लगे, तब उन्होंने देखा कि उनकी प्रिया द्रौपदीकी दासी धात्रेयिका, जो उन्हींके एक सेवककी स्त्री थी, रो रही है ॥ ९ ॥

तामिन्द्रसेनस्त्वरितोऽभिसृत्य रथादवप्लुत्य ततोऽभ्यधावत् । प्रोवाच चैनां वचनं नरेन्द्र धात्रेयिकामन्तितरस्तदानीम् ॥ १० ॥

राजा जनमेजय! उसे रोती देख सारथि इन्द्रसेन तुरंत रथसे कूद पड़ा और वहाँसे दौड़कर धात्रेयिकाके अत्यन्त निकट जाकर उस समय इस प्रकार बोला- ॥ १० ॥

किं रोदिषि त्वं पतिता धरण्यां किं ते मुखं शुष्यति दीनवर्णम् । कच्चिन्न पापैः सुनृशंसकृद्भिः प्रमाथिता द्रौपदी राजपुत्री ॥ ११ ॥

' तू इस प्रकार धरतीपर पड़ी क्यों रो रही है? तेरा मुँह दीन होकर क्यों सूख रहा है? कहीं अत्यन्त निष्ठुर कर्म करनेवाले पापी कौरवोंने यहाँ आकर राजकुमारी द्रौपदीका तिरस्कार तो नहीं किया? ॥ ११ ॥

अचिन्त्यरूपा सुविशालनेत्रा शरीरतुल्या कुरुपुङ्गवानाम् । यद्येव देवी पृथिवीं प्रविष्टा दिवं प्रपन्नाप्यथवा समुद्रम् ॥ १२ ॥

तस्या गमिष्यन्ति पदे हि पार्था यथा हि संतप्यति धर्मपुत्रः ।

पृष्ठ 1793

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‘ धर्मराज युधिष्ठिर महारानीके लिये जिस प्रकार संतप्त हो रहे हैं, उसे देखते हुए यह निश्चय है कि समस्त कुन्तीकुमार उनकी खोजमें अभी जायँगे। उनका रूप अचिन्त्य है । वे सुन्दर एवं विशाल नेत्रोंसे सुशोभित होती हैं तथा कुरुप्रवर पाण्डवोंको अपने शरीरके समान प्यारी हैं । वे द्रौपदीदेवी यदि पृथ्वीके भीतर प्रविष्ट हुई हों, स्वर्गलोकमें गयी हों अथवा समुद्रमें समा गयी हों, पाण्डव उन्हें अवश्य ढूँढ़ निकालेंगे ॥ १२३ ॥

को हीदृशानामरिमर्दनानां क्लेशक्षमानामपराजितानाम् ॥ १३ ॥

प्राणैः समामिष्टतमां जिहीर्षे- दनुत्तमं रत्नमिव प्रमूढः । 'जो शत्रुओंका मान मर्दन करनेवाले और किसीसे भी पराजित नहीं होनेवाले हैं, जो सब प्रकारके क्लेश सहन करनेमें समर्थ हैं, ऐसे पाण्डवोंकी सर्वोत्तम रत्नके समान स्पृहणीय तथा प्राणोंके समान प्रियतमा द्रौपदीका कौन मूर्ख अपहरण करना चाहेगा? ॥ १३३ ॥

न बुध्यते नाथवतीमिहाद्य बहिश्चरं हृदयं पाण्डवानाम् ॥ १४ ॥

कस्याद्य कायं प्रतिभिद्य घोरा महीं प्रवेक्ष्यन्ति शिताः शराग्रयाः ।

पृष्ठ 1794

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'द्रौपदी बाहर प्रकट हुई पाण्डवोंकी अन्तरात्मा है । अपने पतियोंसे सनाथ महारानी द्रौपदीको यहाँ कौन मूर्ख नहीं जानता था? आज पाण्डवोंके अत्यन्त भयंकर और तीक्ष्ण श्रेष्ठ बाण किसके शरीरको विदीर्ण करके पृथ्वीमें घुस जायँगे? ॥ १४३ ॥

मा त्वं शुचस्तां प्रति भीरु विद्धि यथाद्य कृष्णा पुनरेष्यतीति ॥ १५ ॥

निहत्य सर्वान् द्विषतः समग्रान् पार्थाः समेष्यन्त्यथ याज्ञसेन्या । ‘ भीरु! तू महारानी द्रौपदीके लिये शोक न कर । तू समझ ले कि अभी वे पुनः यहाँ आ जायँगी । कुन्तीके पुत्र अपने समस्त शत्रुओंका संहार करके द्रुपदकुमारीसे अवश्य मिलेंगे ' ॥ १५३ ॥

अथाब्रवीच्चारु मुखं प्रमृज्य धात्रेयिका सारथिमिन्द्रसेनम् ॥ १६ ॥

जयद्रथेनापहृता प्रमथ्य पञ्चेन्द्रकल्पान् परिभूय कृष्णा । तिष्ठन्ति वर्त्मानि नवान्यमूनि वृक्षाश्च न म्लान्ति तथैव भग्नाः ॥ १७ ॥

तब अपने सुन्दर मुखपर बहते हुए आँसुओंको (दोनों हाथोंसे ) पोंछकर धात्रेयिकाने सारथि इन्द्रसेनसे कहा – ' इन्द्रसेन! इन्द्रके समान पराक्रमी इन पाँचों पाण्डवोंका अपमान करके जयद्रथने हठपूर्वक द्रौपदीका अपहरण किया है । देखो, उसके रथ और सैनिकोंके जानेसे जो ये नये मार्ग बन गये हैं, वे ज्यों - के - त्यों हैं, मिटे नहीं हैं तथा ये टूटे हुए वृक्ष भी अभी मुरझाये नहीं हैं ॥ १६-१७ ॥ आवर्तयध्वं ह्यनुयात शीघ्रं न दूरयातैव हि राजपुत्री । संनह्यध्वं सर्व एवेन्द्रकल्पा महान्ति चारूणि च दंशनानि ॥ १८ ॥

‘ इन्द्रके समान तेजस्वी समस्त पाण्डववीरो! आपलोग अपने रथोंको लौटाइये । शीघ्र शत्रुओंका पीछा कीजिये । अभी राजकुमारी द्रौपदी दूर नहीं गयी होगी। शीघ्र ही महान् एवं मनोहर कवच धारण कर लीजिये ॥ १८ ॥

गृह्णीत चापानि महाधनानि शरांश्च शीघ्रं पदवीं चरध्वम् । पुरा हि निर्भर्त्सनदण्डमोहिता प्रमोहचित्ता वदनेन शुष्यता ॥ १ ९ ॥ ददाति कस्मैचिदनर्हते तनुं

पृष्ठ 1795

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वराज्यपूर्णामिव भस्मनि स्रुचम् । पुरा तुषाग्नाविव हूयते हविः पुरा श्मशाने स्रगिवापविद्धयते ॥ २० ॥

पुरा च सोमोऽध्वरगोऽवलिह्यते शुना यथा विप्रजने प्रमोहिते । महत्यरण्ये मृगयां चरित्वा पुरा शृगालो नलिनीं विगाहते ॥ २१ ॥

' बहुमूल्य धनुष और बाण ले लीजिये और शीघ्र ही शत्रुके मार्गका अनुसरण कीजिये । कहीं ऐसा न हो कि डाँट-डपट और दण्डके भयसे मोहित और व्याकुलचित्त हो अपना उदास मुख लिये द्रौपदी किसी अयोग्य पुरुषको आत्मसमर्पण कर दे । ऐसी घटना घटित होनेसे पहले ही वहाँ पहुँच जाइये । यदि राजकुमारी कृष्णा किसी पराये पुरुषके हाथमें पड़ गयी तो समझ लीजिये किसीने उत्तम घीसे भरी हुई स्रुवाको राखमें डाल दिया, हविष्यको भूसेकी आगमें होम दिया गया, ( देवपूजाके लिये बनी हुई) सुन्दर माला श्मशानमें फेंक दी गयी, यज्ञमण्डपमें रखे हुए पवित्र सोमरसको वहाँके ब्राह्मणोंकी असावधानीसे किसी कुत्तेने चाट लिया और विशाल वनमें शिकार करके अशुद्ध हुए गीदड़ने किसी पवित्र सरोवरमें गोता लगाकर उसे अपवित्र कर दिया; अतः ऐसी अप्रिय घटना घटित होनेसे पहले ही आपलोगोंको वहाँ पहुँच जाना चाहिये ॥ मा वः प्रियायाः सुनसं सुलोचनं चन्द्रप्रभाच्छं वदनं प्रसन्नम् । स्पृश्याच्छुभं कश्चिदकृत्यकारी श्वा वै पुरोडाशमिवाध्वरस्थम् । एतानि वर्त्मान्यनुयात शीघ्रं मा वः कालः क्षिप्रमिहात्यगाद् वै ॥ २२ ॥

' कहीं ऐसा न हो कि आपलोगोंकी प्रियाके सुन्दर नेत्र तथा मनोहर नासिकासे सुशोभित चन्द्र- रश्मियोंके समान स्वच्छ, प्रसन्न एवं पवित्र मुखको कोई कुकर्मकारी पापात्मा पुरुष छू दे; ठीक उसी तरह, जैसे कुत्ता यज्ञके पुरोडाशको चाट ले । अतः जितना शीघ्र सम्भव हो, इन्हीं मार्गोंसे शत्रुका पीछा कीजिये । आपलोगोंका बहुमूल्य समय यहाँ अधिक नहीं बीतना चाहिये ' ॥ २२ ॥

युधिष्ठिर उवाच भद्रे प्रतिक्राम नियच्छ वाचं मास्मत्सकाशे परुषाण्यवोचः । राजानो वा यदि वा राजपुत्रा

पृष्ठ 1796

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बलेन मत्ता वञ्चनां प्राप्नुवन्ति ॥ २३ ॥

युधिष्ठिर बोले— भद्रे! हट जाओ । अपनी जबान बंद करो । हमारे निकट द्रौपदीके सम्बन्धमें ऐसी अनुचित और कठोर बातें मुँहसे न निकालो । जिन्होंने अपने बलके घमंडमें आकर ऐसा निन्दनीय कार्य किया है, वे राजा हों या राजकुमार, उन्हें अपने प्राण एवं सम्मानसे अवश्य वञ्चित होना पड़ेगा ॥ २३ ॥

वैशम्पायन उवाच एतावदुक्त्वा प्रययुर्हि शीघ्रं तान्येव वर्त्मान्यनुवर्तमानाः । मुहुर्मुहुर्व्यालवदुच्छ्वसन्तो ज्यां विक्षिपन्तश्च महाधनुर्भ्यः ॥ २४ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! ऐसा कहकर समस्त पाण्डव अपने विशाल धनुषकी डोरी खींचते और बार- बार सर्पोंके समान फुफकारते हुए उन्हीं मार्गोंपर चलते हुए बड़े वेगसे आगे बढ़े ॥ २४ ॥

ततोऽपश्यंस्तस्य सैन्यस्य रेणु- मुद्भूतं वै वाजिखुरप्रणुन्नम् । पदातीनां मध्यगतं च धौम्यं विक्रोशन्तं भीममभिद्रवेति ॥ २५ ॥

तदनन्तर उन्हें जयद्रथकी सेनाके घोड़ोंकी टॉपसे आहत होकर उड़ती हुई धूल दिखायी दी । उसके साथ ही पैदल सैनिकोंके बीचमें होकर चलते हुए पुरोहित धौम्य भी दृष्टिगोचर हुए, जो बार- बार पुकार रहे थे— ' भीमसेन! दौड़ो ' ॥ २५ ॥

ते सान्त्व्य धौम्यं परिदीनसत्त्वाः सुखं भवानेत्विति राजपुत्राः । श्येना यथैवामिषसम्प्रयुक्ता जवेन तत् सैन्यमथाभ्यधावन् ॥ २६ ॥

तब असाधारण पराक्रमी राजकुमार पाण्डव धौम्य मुनिको सान्त्वना देते हुए बोले -' आप निश्चिन्त होकर चलिये, ( हमलोग आ पहुँचे हैं । ) ' फिर जैसे बाज मांसकी ओर झपटते हैं, उसी प्रकार पाण्डव जयद्रथकी सेनाके पीछे बड़े वेगसे दौड़े ॥ २६ ॥

तेषां महेन्द्रोपमविक्रमाणां संरब्धानां धर्षणाद् याज्ञसेन्याः । क्रोधः प्रजज्वाल जयद्रथं च दृष्ट्वा प्रियां तस्य रथे स्थितां च ॥ २७ ॥

पृष्ठ 1797

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इन्द्रके समान पराक्रमी पाण्डव द्रौपदीके तिरस्कारकी बात सुनकर ही क्रोधातुर हो रहे थे; जब उन्होंने जयद्रथको और उसके रथपर बैठी हुई अपनी प्रिया द्रौपदीको देखा, तब तो उनकी क्रोधाग्नि प्रबल वेगसे प्रज्वलित हो उठी ॥ २७ ॥

प्रचुक्रुशुश्चाप्यथ सिन्धुराजं

वृकोदरश्चैव धनंजयश्च ।

यमौ च राजा च महाधनुर्धरा- स्ततो दिशः सम्मुमुहुः परेषाम् ॥ २८ ॥

फिर तो भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा राजा युधिष्ठिर- ये सभी महाधनुर्धर वीर सिन्धुराज जयद्रथको ललकारने लगे । उस समय शत्रुओंके सैनिकोंको इतनी घबराहट हुई कि उन्हें दिशाओंतकका ज्ञान न रहा ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीहरणपर्वणि पार्थागमने एकोनसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीहरणपर्वमें पार्थागमनविषयक दोसौ उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६९ ॥

पृष्ठ 1798

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सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः द्रौपदीद्वारा जयद्रथके सामने पाण्डवोंके पराक्रमका वर्णन वैशम्पायन उवाच

ततो घोरतरः शब्दो वने समभवत् तदा ।

भीमसेनार्जुनौ दृष्ट्वा क्षत्रियाणाममर्षिणाम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर उस वनमें भीमसेन और अर्जुनको देखकर अमर्षमें भरे हुए क्षत्रियोंका अत्यन्त घोर कोलाहल सुनायी देने लगा ॥ १ ॥

तेषां ध्वजाग्राण्यभिवीक्ष्य राजा स्वयं दुरात्मा नरपुङ्गवानाम् । जयद्रथो याज्ञसेनीमुवाच रथे स्थितां भानुमतीं हतौजाः ॥ २ ॥

उन नरश्रेष्ठ वीरोंकी ध्वजाओंके अग्रभागोंको देखकर हतोत्साह हुए दुरात्मा राजा जयद्रथने अपने रथपर बैठी हुई तेजस्विनी द्रौपदीसे स्वयं कहा- ॥ २ ॥

आयान्तीमे पञ्च रथा महान्तो मन्ये च कृष्णे पतयस्तवैते । सा जानती ख्यापय नः सुकेशि परं परं पाण्डवानां रथस्थम् ॥ ३ ॥

' सुन्दर केशोंवाली कृष्णे! ये पाँच विशाल रथ आ रहे हैं । जान पड़ता है, इनमें तुम्हारे पति ही बैठे हैं । तुम तो सबको जानती ही हो । मुझे रथपर बैठे हुए इन पाण्डवोंमेंसे एक-एकका उत्तरोत्तर परिचय दो ' ॥ ३ ॥

द्रौपद्युवाच किं ते ज्ञातैर्मूढ महाधनुर्धरै- रनायुष्यं कर्म कृत्वातिघोरम् । एते वीराः पतयो मे समेता न वः शेषः कश्चिदिहास्ति युद्धे ॥ ४ ॥

द्रौपदी बोली - अरे मूढ़! आयुका नाश करनेवाला वह अत्यन्त भयंकर नीच कर्म करके अब तू इन महाधनुर्धर पाण्डव वीरोंका परिचय जानकर क्या करेगा? ये मेरे सभी वीर पति जुट गये हैं । इनके साथ जो युद्ध होनेवाला है, उसमें तेरे पक्षका कोई भी मनुष्य जीवित नहीं बचेगा ॥ ४ ॥

आख्यातव्यं त्वेव सर्वं मुमूर्षो-

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र्मया तुभ्यं पृष्टया धर्म एषः । न मे व्यथा विद्यते त्वद्भयं वा सम्पश्यन्त्याः सानुजं धर्मराजम् ॥ ५ ॥

मैं भाइयोंसहित धर्मराज युधिष्ठिरको सामने देख रही हूँ; अतः अब न मुझे दुःख है और न तेरा डर ही है । अब तू शीघ्र ही मरना चाहता है; अतः ऐसे समयमें तूने मुझसे जो कुछ पूछा है, उसका उत्तर तुझे दे देना उचित है; यही धर्म है । ( अतः मैं अपने पतियोंका परिचय देती हूँ) ॥ ५ ॥

यस्य ध्वजाग्रे नदतो मृदङ्गौ नन्दोपनन्दौ मधुरौ युक्तरूपौ । एतं स्वधर्मार्थविनिश्चयज्ञं सदा जनाः कृत्यवन्तोऽनुयान्ति ॥ ६ ॥

य एष जाम्बूनदशुद्धगौरः प्रचण्डघोणस्तनुरायताक्षः । एतं कुरुश्रेष्ठतमं वदन्ति युधिष्ठिरं धर्मसुतं पतिं मे ॥ ७ ॥

जिनकी ध्वजाके सिरेपर बँधे हुए नन्द और उपनन्द नामक दो सुन्दर मृदंग मधुर स्वरमें बज रहे हैं, जिनका शरीर जाम्बूनद सुवर्णके समान विशुद्ध गौरवर्णका है, जिनकी नासिका ऊँची और नेत्र बड़े - बड़े हैं, जो देखनेमें दुबले -पतले हैं, कुरुकुलके इन श्रेष्ठतम पुरुषको ही धर्मनन्दन युधिष्ठिर कहते हैं । ये मेरे पति हैं । ये अपने धर्म और अर्थके सिद्धान्तको अच्छी तरह जानते हैं; अतः आवश्यकता पड़नेपर लोग इनका सदा अनुसरण करते हैं ॥ ६-७ ॥ अप्येष शत्रोः शरणागतस्य दद्यात् प्राणान् धर्मचारी नृवीरः । परेह्येनं मूढ जवेन भूतये त्वमात्मनः प्राञ्जलिर्न्यस्तशस्त्रः ॥ ८ ॥

ये धर्मात्मा नरवीर अपनी शरणमें आये हुए शत्रुको भी प्राणदान दे देते हैं । अरे मूर्ख! यदि तू अपनी भलाई चाहता है तो हथियार नीचे डाल दे और हाथ जोड़कर शीघ्र इनकी शरणमें जा ॥ ८ ॥

अथाप्येनं पश्यसि यं रथस्थं महाभुजं शालमिव प्रवृद्धम् । संदष्टौष्ठं भ्रुकुटीसंहतभ्रुवं वृकोदरो नाम पतिर्ममैषः ॥ ९ ॥

आजानेया बलिनः साधु दान्ता महाबलाः शूरमुदावहन्ति ।

पृष्ठ 1800

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एतस्य कर्माण्यतिमानुषाणि भीमेति शब्दोऽस्य गतः पृथिव्याम् ॥ १० ॥

ये जो शाल ( साखू) के वृक्षकी तरह ऊँचे और विशाल भुजाओंसे सुशोभित वीर पुरुष तुझे रथमें बैठे दिखायी देते हैं, जो क्रोधके मारे भौंहें टेढ़ी करके दाँतोंसे अपने ओंठ चबा रहे हैं, ये मेरे दूसरे पति वृकोदर हैं । बड़े बलवान्, सुशिक्षित और शक्तिशाली आजानेय नामक अश्व इन शूरशिरोमणिके रथको खींचते हैं । इनके सभी कर्म प्रायः ऐसे होते हैं, जिन्हें मानवजगत् नहीं कर सकता। ये अपने भयंकर पराक्रमके कारण इस भूतलपर भीमके नामसे विख्यात हैं ॥ ९ -१० ॥ नास्यापराद्धाः शेषमवाप्नुवन्ति नायं वैरं विस्मरते कदाचित् । वैरस्यान्तं संविधायोपयाति पश्चाच्छान्तिं न च गच्छत्यतीव ॥ ११ ॥

इनके अपराधी कभी जीवित नहीं रह सकते । ये वैरको कभी नहीं भूलते हैं और वैरका बदला लेकर ही रहते हैं । बदला लेनेके बाद भी अच्छी तरह शान्त नहीं हो पाते ॥ ११ ॥

धनुर्धराग्रयो धृतिमान् यशस्वी जितेन्द्रियो वृद्धसेवी नृवीरः । भ्राता च शिष्यश्च युधिष्ठिरस्य धनंजयो नाम पतिर्ममैषः ॥ १२ ॥

यो वै न कामान्न भयान्न लोभात् त्यजेद् धर्म न नृशंसं च कुर्यात् । स एष वैश्वानरतुल्यतेजाः कुन्तीसुतः शत्रुसहः प्रमाथी ॥ १३ ॥

ये जो तीसरे वीर पुरुष दिखायी दे रहे हैं, वे मेरे पति धनंजय हैं । इन्हें समस्त धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ माना गया है । ये धैर्यवान्, यशस्वी, जितेन्द्रिय, वृद्धपुरुषोंके सेवक तथा महाराज युधिष्ठिरके भाई और शिष्य हैं । अर्जुन कभी काम, भय अथवा लोभवश न तो अपना धर्म छोड़ सकते हैं और न कोई निष्ठुरतापूर्ण कार्य ही कर सकते हैं । इनका तेज अग्निके समान है । ये कुन्तीनन्दन धनंजय समस्त शत्रुओंका सामना करनेमें समर्थ और सभी दुष्टोंका दमन करनेमें दक्ष हैं ॥ १२-१३ ॥ यः सर्वधर्मार्थविनिश्चयज्ञो भयार्तानां भयहर्ता मनीषी । यस्योत्तमं रूपमाहुः पृथिव्यां यं पाण्डवाः परिरक्षन्ति सर्वे ॥ १४ ॥

प्राणैर्गरीयांसमनुव्रतं वै