श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1801–1810

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1801–1810

पृष्ठ 1801

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स एष वीरो नकुलः पतिर्मे । जो समस्त धर्म और अर्थके निश्चयको जानते हैं, भयसे पीड़ित मनुष्योंका भय दूर करते हैं, जो परम बुद्धिमान् हैं, इस भूमण्डलमें जिनका रूप सबसे सुन्दर बताया जाता है, जो अपने बड़े भाइयोंकी सेवामें तत्पर रहनेवाले और उन्हें प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं, समस्त पाण्डव जिनकी रक्षा करते हैं, वे ही ये मेरे वीर पति नकुल हैं ॥ १४ ॥

यः खड्गयोधी लघुचित्रहस्तो महांश्च धीमान् सहदेवोऽद्वितीयः ॥ १५ ॥

यस्याद्य कर्म द्रक्ष्यसे मूढसत्त्व शतक्रतोर्वा दैत्यसेनासु संख्ये । शूरः कृतास्त्रो मतिमान् मनस्वी प्रियङ्करो धर्मसुतस्य राज्ञः ॥ १६ ॥

जो खड्गद्वारा युद्ध करनेकी कलामें कुशल हैं, जिनका हाथ बड़ी फुर्तीसे अद्भुत पैंतरे दिखाता हुआ चलता है, जो परम बुद्धिमान् और अद्वितीय वीर हैं, वे सहदेव मेरे पाँचवें पति हैं । ओ मूढ़ प्राणी! जैसे दैत्योंकी सेनामें देवराज इन्द्रका पराक्रम प्रकट होता है, उसी प्रकार युद्धमें तू आज सहदेवका महान् पौरुष देखेगा। वे शौर्यसम्पन्न, अस्त्रविद्याके विशेषज्ञ, बुद्धिमान्, मनस्वी तथा धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरका प्रिय करनेवाले हैं ॥ १५-१६ ॥ य एष चन्द्रार्कसमानतेजा जघन्यजः पाण्डवानां प्रियश्च । बुद्धया समो यस्य नरो न विद्यते वक्ता तथा सत्सु विनिश्चयज्ञः ॥ १७ ॥

इनका तेज चन्द्रमा और सूर्यके समान है । ये पाण्डवोंमें सबसे छोटे और सबके प्रिय हैं । बुद्धिमें इनकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है । ये अच्छे वक्ता और सत्पुरुषोंकी सभामें सिद्धान्तके ज्ञाता माने गये हैं ॥ १७ ॥

स एष शूरो नित्यममर्षणश्च धीमान् प्राज्ञः सहदेवः पतिर्मे । त्यजेत् प्राणान् प्रविशेद्धव्यवाहं न त्वेवैष व्याहरेद् धर्मबाह्यम् ॥ १८ ॥

सदा मनस्वी क्षत्रधर्मे रतश्च कुन्त्याः प्राणैरिष्टतमो नृवीरः । मेरे पति सहदेव शूरवीर, सदा ईर्ष्यारहित, बुद्धिमान् और विद्वान् हैं । ये अपने प्राण छोड़ सकते हैं, प्रज्वलित आगमें प्रवेश कर सकते हैं, परंतु धर्मके विरुद्ध कोई बात नहीं

बोल सकते । नरवीर सहदेव सदा क्षत्रियधर्मके पालनमें तत्पर रहनेवाले और मनस्वी हैं ।

आर्या कुन्तीको ये प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं ॥ १८३ ॥

पृष्ठ 1802

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विशीर्यन्तीं नावमिवार्णवान्ते रत्नाभिपूर्णां मकरस्य पृष्ठे ॥ १ ९ ॥ सेनां तवेमां हतसर्वयोधां विक्षोभितां द्रक्ष्यसि पाण्डुपुत्रैः । ( अरे मूढ! ) रत्नोंसे लदी हुई नाव जैसे समुद्रके बीचमें जाकर किसी मगरमच्छकी पीठसे टकराकर टूट जाती है, उसी प्रकार पाण्डवलोग आज तेरे समस्त सैनिकोंका संहार करके तेरी इस सारी सेनाको छिन्न- भिन्न कर डालेंगे और तू अपनी आँखोंसे यह सब कुछ देखेगा ॥ १ ९ ३ ॥ इत्येते वै कथिताः पाण्डुपुत्रा यांस्त्वं मोहादवमन्य प्रवृत्तः । यद्येतेभ्यो मुच्यसेऽरिष्टदेहः पुनर्जन्म प्राप्स्यसे जीव एव ॥ २० ॥

इस प्रकार मैंने तुझे इन पाण्डवोंका परिचय दिया है, जिनका अपमान करके तू मोहवश इस नीच कर्ममें प्रवृत्त हुआ है । यदि आज तू इनके हाथोंसे जीवित बच जाय और तेरे शरीरपर कोई आँच नहीं आये, तो तुझे जीते - जी यह दूसरा जन्म प्राप्त हो ॥ २० ॥

वैशम्पायन उवाच ततः पार्थाः पञ्च पञ्चेन्द्रकल्पा- स्त्यक्त्वा त्रस्तान् प्राञ्जलींस्तान् पदातीन् । रथानीकं शरवर्षान्धकारं चक्रुः क्रुद्धाः सर्वतः संनिगृह्य ॥ २१ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! द्रौपदी यह बात कह ही रही थी कि पाँच इन्द्रोंके समान पराक्रमी पाँचों पाण्डव भयभीत होकर हाथ जोड़नेवाले पैदल सैनिकोंको छोड़कर कुपित हो रथ, हाथी और घोड़ोंसे युक्त अवशिष्ट सेनाको सब ओरसे घेरकर खड़े हो गये और बाणोंकी ऐसी घनघोर वर्षा करने लगे कि चारों ओर अन्धकार छा गया ॥ २१ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीहरणपर्वणि द्रौपदीवाक्ये सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीहरणपर्वमें द्रौपदीवचनविषयक दो सौ सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७० ॥

पृष्ठ 1803

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एकसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः पाण्डवोंद्वारा जयद्रथकी सेनाका संहार, जयद्रथका पलायन, द्रौपदी तथा नकुल सहदेवके साथ युधिष्ठिरका आश्रमपर लौटना तथा भीम और अर्जुनका वनमें जयद्रथका पीछा करना वैशम्पायन उवाच

संतिष्ठत प्रहरत तूर्णं विपरिधावत ।

इति स्म सैन्धवो राजा चोदयामास तान् नृपान् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! तब सिन्धुराज जयद्रथ ' ठहरो, मारो, जल्दी दौड़ो ' कहकर अपने साथ आये हुए राजाओंको युद्धके लिये उत्साहित करने लगा ॥ १ ॥

ततो घोरतमः शब्दो रणे समभवत् तदा ।

भीमार्जुनयमान् दृष्ट्वा सैन्यानां सयुधिष्ठिरान् ॥ २ ॥

उस समय रणभूमिमें युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेवको देखकर जयद्रथके सैनिकोंमें बड़ा भयंकर कोलाहल मच गया ॥ २ ॥

शिबिसौवीरसिन्धूनां विषादश्चाप्यजायत ।

तान् दृष्ट्वा पुरुषव्याघ्रान् व्याघ्रानिव बलोत्कटान् ॥ ३ ॥

सिंहके समान उत्कट बलवान् पुरुषसिंह पाण्डवोंको देखकर शिबि, सौवीर तथा सिन्धुदेशके राजाओंके मनमें भी अत्यन्त विषाद छा गया ॥ ३ ॥

हेमचित्रसमुत्सेधां सर्वशैक्यायसीं गदाम् ।

प्रगृह्याभ्यद्रवद् भीमः सैन्धवं कालचोदितम् ॥ ४ ॥

जिसका ऊपरी भाग स्वर्णपत्रसे जटित होनेके कारण विचित्र शोभा पाता था, जिसका सब कुछ शैक्य नामक लोहेसे बनाया गया था, उस विशाल गदाको हाथमें लेकर भीमसेन कालप्रेरित जयद्रथकी ओर दौड़े ॥ ४ ॥

तदन्तरमथावृत्य कोटिकास्योऽभ्यहारयत् ।

महता रथवंशेन परिवार्य वृकोदरम् ॥ ५ ॥

इतनेमें ही रथोंकी विशाल सेनाके द्वारा भीमसेनको सब ओरसे घेरकर कोटिकास्यने जयद्रथ और भीमसेनके बीचमें भारी व्यवधान डाल दिया ॥ ५ ॥

शक्तितोमरनाराचैर्वीरबाहुप्रचोदितैः ।

कीर्यमाणोऽपि बहुभिर्न स्म भीमोऽभ्यकम्पत ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1804

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उस समय सब योद्धा भीमसेनपर अपनी भुजाओंके द्वारा चलाकर शक्ति, तोमर और नाराच आदि बहुत - से अस्त्र- शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे; परंतु भीमसेन इससे तनिक भी विचलित नहीं हुए ॥ ६ ॥

गजं तु सगजारोहं पदातींश्च चतुर्दश ।

जघान गदया भीमः सैन्धवध्वजिनीमुखे ॥ ७ ॥

उन्होंने जयद्रथकी सेनाके मुहानेपर जाकर अपनी गदाकी चोटसे सवारसहित एक हाथी और चौदह पैदलोंको मार डाला ॥ ७ ॥

पार्थः पञ्च शतान् शूरान् पर्वतीयान् महारथान् ।

परीप्समानः सौवीरं जघान ध्वजिनीमुखे ॥ ८ ॥

इसी प्रकार अर्जुनने सौवीरराज जयद्रथको पकड़नेकी इच्छा रखकर सेनाके अग्रभागमें स्थित पाँच सौ शूरवीर पर्वतीय महारथियोंको मार डाला ॥ ८ ॥

राजा स्वयं सुवीराणां प्रवराणां प्रहारिणाम् ।

निमेषमात्रेण शतं जघान समरे तदा ॥ ९ ॥

स्वयं राजा युधिष्ठिरने भी उस समय अपने ऊपर प्रहार करनेवाले सौवीर क्षत्रियोंके सौ प्रमुख वीरोंको पलक मारते - मारते समरांगणमें मार गिराया ॥ ९ ॥

ददृशे नकुलस्तत्र रथात् प्रस्कन्द्य खड्गधृक् ।

शिरांसि पादरक्षाणां बीजवत् प्रवपन् मुहुः ॥ १० ॥

महावीर नकुल हाथमें तलवार लिये रथसे कूद पड़े और पादरक्षक सैनिकोंके मस्तक काट - काटकर बीजकी भाँति उन्हें बार- बार धरतीपर बोते दिखायी दिये ॥ १० ॥

सहदेवस्तु संयाय रथेन गजयोधिनः ।

पातयामास नाराचैर्द्रुमेभ्य इव बर्हिणः ॥ ११ ॥

सहदेव रथद्वारा आगे बढ़कर हाथीसवार योद्धाओंसे भिड़ गये और नाराच नामक बाणोंसे मार - मारकर उन्हें इस प्रकार नीचे गिराने लगे, मानो कोई व्याध वृक्षोंपरसे मोरोंको घायल करके गिरा रहा हो ॥ ११ ॥

ततस्त्रिगर्तः सधनुरवतीर्य महारथात् ।

गदया चतुरो वाहान् राज्ञस्तस्य तदावधीत् ॥ १२ ॥

तदनन्तर धनुष हाथमें लिये त्रिगर्तराजने अपने विशाल रथसे उतरकर राजा युधिष्ठिरके चारों घोड़ोंको गदासे मार डाला ॥ १२ ॥

तमभ्याशगतं राजा पदातिं कुन्तिनन्दनः ।

अर्धचन्द्रेण बाणेन विव्याधोरसि धर्मराट् ॥ १३ ॥

उसे पैदल ही पास आया देख कुन्तीनन्दन धर्मराज युधिष्ठिरने अर्धचन्द्राकार बाणसे उसकी छातीको छेद डाला ॥ १३ ॥

स भिन्नहृदयो वीरो वक्त्राच्छोणितमुद्वमन् ।

पृष्ठ 1805

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पपाताभिमुखः पार्थं छिन्नमूल इव द्रुमः ॥ १४ ॥

तब हृदय विदीर्ण हो जानेके कारण वीर त्रिगर्तराज मुखसे रक्त वमन करता हुआ राजा युधिष्ठिरके सामने ही जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥

इन्द्रसेनद्वितीयस्तु रथात् प्रस्कन्द्य धर्मराट् ।

हताश्वः सहदेवस्य प्रतिपेदे महारथम् ॥ १५ ॥

इधर धर्मराज युधिष्ठिर अपने घोड़े मारे जानेके कारण सारथि इन्द्रसेनके साथ सहदेवके विशाल रथपर जा बैठे ॥ १५ ॥

नकुलं त्वभिसंधाय क्षेमङ्करमहामुखौ ।

उभावुभयतस्तीक्ष्णैः शरवर्षैरवर्षताम् ॥ १६ ॥

दूसरी ओर क्षेमंकर और महामुख नामक दो वीर ( राजकुमार ) नकुलको लक्ष्य करके दोनों ओरसे तीखे बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ १६ ॥

तोमरैरभिवर्षन्तौ जीमूताविव वार्षिकौ ।

एकैकेन विपाठेन जघ्ने माद्रवतीसुतः ॥ १७ ॥

उस समय तोमरोंकी वर्षा करते हुए वे दोनों योद्धा वर्षाऋतुके दो बादलोंके समान जान पड़ते थे । परंतु माद्रीनन्दन नकुलने एक- एक विपाठ नामक बाण मारकर उन दोनोंको धराशायी कर दिया ॥ १७ ॥

त्रिगर्तराजः सुरथस्तस्याथ रथधूर्गतः ।

रथमाक्षेपयामास गजेन गजयानवित् ॥ १८ ॥

तदनन्तर हाथीका संचालन करनेमें निपुण त्रिगर्तराज सुरथने नकुलके रथके धुरेके पास पहुँचकर अपने हाथीके द्वारा उनके रथको दूर फेंकवा दिया ॥ १८ ॥

नकुलस्त्वपभीस्तस्माद् रथाच्चर्मासिपाणिमान् ।

उद्भ्रान्तं स्थानमास्थाय तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥ १ ९ ॥

परंतु नकुलको इससे तनिक भी भय नहीं हुआ । वे हाथमें ढाल - तलवार लिये उस रथसे कूद पड़े और एक निरापद स्थानमें आकर पर्वतकी भाँति अविचलभावसे खड़े हो गये ॥ १ ९ ॥

सुरथस्तं गजवरं वधाय नकुलस्य तु ।

प्रेषयामास सक्रोधमत्युच्छ्रितकरं ततः ॥ २० ॥

तब सुरथने कुपित होकर अत्यन्त ऊँचे सूँड़ उठाये हुए उस गजराजको नकुलका वध करनेके लिये प्रेरित किया ॥ २० ॥

नकुलस्तस्य नागस्य समीपपरिवर्तिनः ।

सविषाणं भुजं मूले खड्गेन निरकृन्तत ॥ २१ ॥

परंतु नकुलने खड्गद्वारा अपने निकट आये हुए उस हाथीकी सूँड़को दाँतोंसहित जड़से काट डाला ॥

पृष्ठ 1806

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स विनद्य महानादं गजः किङ्किणिभूषणः ।

पतन्नवाक्शिरा भूमौ हस्त्यारोहमपोथयत् ॥ २२ ॥

फिर तो घुघुरुओंसे विभूषित वह गजराज बड़े जोरसे चीत्कार करके नीचे मस्तक किये पृथ्वीपर गिर पड़ा । गिरते - गिरते उसने महावतको भी पृथ्वीपर दे मारा ॥ २२ ॥

स तत् कर्म महत् कृत्वा शूरो माद्रवतीसुतः ।

भीमसेनरथं प्राप्य शर्म लेभे महारथः ॥ २३ ॥

यह महान् पराक्रम प्रकट करके शूरवीर माद्रीनन्दन महारथी नकुल भीमसेनके रथपर चढ़ गये और वहीं पहुँचकर उन्हें शान्ति मिली ॥ २३ ॥

भीमस्त्वापततो राज्ञः कोटिकास्यस्य सङ्गरे ।

सूतस्य नुदतो वाहान् क्षुरेणापाहरच्छिरः ॥ २४ ॥

इधर भीमसेनने युद्धमें अपने ऊपर आक्रमण करनेवाले राजा कोटिकास्यके सारथिका, जो उस समय घोड़ोंका संचालन कर रहा था, छुरेसे सिर उड़ा दिया ॥

न बुबोध तं सूतं स राजा बाहुशालिना ।

तस्याश्वा व्यद्रवन् संख्ये हतसूतास्ततस्ततः ॥ २५ ॥

परंतु राजाको यह मालूम न हो सका कि बाहुशाली भीमके द्वारा मेरा सारथि मारा गया है । उसके मारे जानेसे कोटिकास्यके घोड़े रणभूमिमें इधर- उधर भागने लगे ॥ २५ ॥

विमुखं हतसूतं तं भीमः प्रहरतां वरः ।

जघान तलयुक्तेन प्रासेनाभ्येत्य पाण्डवः ॥ २६ ॥

सारथिके नष्ट हो जानेसे कोटिकास्यको रणसे विमुख हुआ देख योद्धाओंमें श्रेष्ठ पाण्डुनन्दन भीमसेनने उसके पास जाकर प्रास नामक मूठदार शस्त्रसे उसे मार डाला ॥ २६ ॥

द्वादशानां तु सर्वेषां सौवीराणां धनंजयः ।

चकर्त निशितैर्भल्लैर्धनूंषि च शिरांसि च ॥ २७ ॥

अर्जुनने सौवीरदेशके जो बारह राजकुमार थे, उन सबके धनुष और मस्तक अपने भल्ल नामक तीखे बाणोंसे काट गिराये ॥ २७ ॥

शिबीनिक्ष्वाकुमुख्यांश्च त्रिगर्तान् सैन्धवानपि ।

जघानातिरथः संख्ये बाणगोचरमागतान् ॥ २८ ॥

उन अतिरथी वीरने युद्धमें बाणोंके लक्ष्य बने हुए शिबि, इक्ष्वाकु, त्रिगर्त और सिन्धुदेशके क्षत्रियोंको भी मार डाला ॥ २८ ॥

सादिताः प्रत्यदृश्यन्त बहवः सव्यसाचिना ।

सपताकाश्च मातङ्गाः सध्वजाश्च महारथाः ॥ २ ९ ॥

सव्यसाची अर्जुनके द्वारा मारे या नष्ट किये गये पताकासहित बहुतेरे हाथी और ध्वजायुक्त अनेक विशाल रथ दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ २ ९ ॥

पृष्ठ 1807

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प्रच्छाद्य पृथिवीं तस्थुः सर्वमायोधनं प्रति ।

शरीराण्यशिरस्कानि विदेहानि शिरांसि च ॥ ३० ॥

उस समय बिना सिरके धड़ और बिना धड़के सिर समस्त रणभूमिको आच्छादित करके बिखरे पड़े थे ॥

श्वगृध्रकङ्ककाकोलभासगोमायुवायसाः ।

अतृप्यंस्तत्र वीराणां हतानां मांसशोणितैः ॥ ३१ ॥

वहाँ मारे गये वीरोंके मांस तथा रक्तसे कुत्ते, गीध, कंक ( सफेद चीलें), काकोल ( पहाड़ी कौए ) चीलें, गीदड़ और कौए तृप्त हो रहे थे ॥ ३१ ॥

हतेषु तेषु वीरेषु सिन्धुराजो जयद्रथः ।

विमुच्य कृष्णां संत्रस्तः पलायनपरोऽभवत् ॥ ३२ ॥

उन वीरोंके मारे जानेपर सिन्धुराज जयद्रथ भयसे थर्रा उठा और द्रौपदीको वहीं छोड़कर उसने भाग जानेका विचार किया ॥ ३२ ॥

स तस्मिन् संकुले सैन्ये द्रौपदीमवतार्य ताम् ।

प्राणप्रेप्सुरुपाधावद् वनं येन नराधमः ॥ ३३ ॥

उस तितर- बितर हुई सेनाके बीच उस द्रौपदीको रथसे उतारकर नराधम जयद्रथ अपने प्राण बचानेके लिये वनकी ओर भागा ॥ ३३ ॥

द्रौपदीं धर्मराजस्तु दृष्ट्वा धौम्यपुरस्कृताम् ।

माद्रीपुत्रेण वीरेण रथमारोपयत् तदा ॥ ३४ ॥

धर्मराज युधिष्ठिरने देखा कि द्रौपदी धौम्य मुनिको आगे करके आ रही है, तो उन्होंने वीरवर माद्रीनन्दन सहदेवद्वारा उसे रथपर चढ़वा लिया ॥ ३४ ॥

ततस्तद् विद्रुतं सैन्यमपयाते जयद्रथे ।

आदिश्यादिश्य नाराचैराजघान वृकोदरः ॥ ३५ ॥

जयद्रथके भाग जानेपर सारी सेना इधर- उधर भाग चली, परंतु भीमसेन अपने नाराचोंद्वारा नाम बता - बताकर उन सैनिकोंका वध करने लगे ॥ ३५ ॥

सव्यसाची तु तं दृष्ट्वा पलायन्तं जयद्रथम् ।

वारयामास निघ्नन्तं भीमं सैन्धवसैनिकान् ॥ ३६ ॥

जयद्रथको भागते देख अर्जुनने उसके सैनिकोंके संहारमें लगे हुए भीमसेनको रोका ॥ ३६ ॥

अर्जुनउवाच

यस्यापचारात् प्राप्तोऽयमस्मान् क्लेशो दुरासदः ।

तमस्मिन् समरोद्देशे न पश्यामि जयद्रथम् ॥ ३७ ॥

पृष्ठ 1808

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अर्जुन बोले — जिसके अत्याचारसे हमलोगोंको यह दुःसह क्लेश सहन करना पड़ा है, उस जयद्रथको तो मैं इस समरभूमिमें देखता ही नहीं हूँ ॥ ३७ ॥

तमेवान्विष भद्रं ते किं ते योधैर्निपातितैः ।

अनामिषमिदं कर्म कथं वा मन्यते भवान् ॥ ३८ ॥

भैया! आपका भला हो, आप जयद्रथकी ही खोज करें, इन ( निरीह ) सैनिकोंको मारनेसे क्या लाभ? यह कार्य तो निष्फल दिखायी देता है अथवा आप इसे कैसा समझते हैं? ॥ ३८ ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्तो भीमसेनस्तु गुडाकेशेन धीमता ।

युधिष्ठिरमभिप्रेक्ष्य वाग्मी वचनमब्रवीत् ॥ ३ ९ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! बुद्धिमान् अर्जुनके ऐसा कहनेपर बातचीतमें कुशल भीमसेनने युधिष्ठिरकी ओर देखकर कहा— ॥ ३ ९ ॥

हतप्रवीरा रिपवो भूयिष्ठं विद्रुता दिशः ।

गृहीत्वा द्रौपदीं राजन् निवर्ततु भवानितः ॥ ४० ॥

' राजन्! शत्रुओंके प्रमुख वीर मारे जा चुके हैं और बहुत- से सैनिक सब दिशाओंमें भाग गये हैं । अब आप द्रौपदीको साथ लेकर यहाँसे आश्रमको लौटिये ॥ ४० ॥

यमाभ्यां सह राजेन्द्र धौम्येन च महात्मना ।

प्राप्याश्रमपदं राजन् द्रौपदीं परिसान्त्वय ॥ ४१ ॥

' महाराज! आप नकुल, सहदेव तथा महात्मा धौम्यके साथ आश्रमपर पहुँचकर द्रौपदीको सान्त्वना दीजिये ॥ ४१ ॥

न हि मे मोक्ष्यते जीवन् मूढः सैन्धवको नृपः ।

पातालतलसंस्थोऽपि यदि शक्रोऽस्य सारथिः ॥ ४२ ॥

‘ मूर्ख सिन्धुराज जयद्रथ यदि पातालमें घुस जाय अथवा इन्द्र भी उसके सारथि या सहायक होकर आ जायँ तो भी आज वह मेरे हाथसे जीवित नहीं बच सकता' ॥ ४२ ॥

युधिष्ठिरउवाच

न हन्तव्यो महाबाहो दुरात्मापि स सैन्धवः ।

दुःशलामभिसंस्मृत्य गान्धारीं च यशस्विनीम् ॥ ४३ ॥

युधिष्ठिर बोले – महाबाहो! सिन्धुराज जयद्रथ यद्यपि अत्यन्त दुरात्मा है; तथापि बहिन दुःशला और यशस्विनी माता गान्धारीको स्मरण करके उसका वध न करना ॥ ४३ ॥

वैशम्पायन उवाच

पृष्ठ 1809

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तच्छ्रुत्वा द्रौपदी भीममुवाच व्याकुलेन्द्रिया ।

कुपिता ह्रीमती प्राज्ञा पती भीमार्जुनावुभौ ॥ ४४ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! युधिष्ठिरकी यह बात सुनकर द्रौपदीकी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो उठीं । वह लज्जावती और बुद्धिमती होनेपर भी भीमसेन और अर्जुन दोनों पतियोंसे कुपित होकर बोली– ॥

कर्तव्यं चेत् प्रियं मह्यं वध्यः स पुरुषाधमः ।

सैन्धवापसदः पापो दुर्मतिः कुलपांसनः ॥ ४५ ॥

‘ यदि आप लोगोंको मेरा प्रिय करना है तो उस नराधमको अवश्य मार डालिये । वह पापी दुर्बुद्धि जयद्रथ सिन्धुदेशका कलङ्क और कुलाङ्गार है ॥ ४५ ॥

भार्याभिहर्ता वैरी यो यश्च राज्यहरो रिपुः ।

याचमानोऽपि संग्रामे न मोक्तव्यः कथंचन ॥ ४६ ॥

'जो अपनी पत्नीका अपहरण करनेवाला तथा राज्यको हड़प लेनेवाला हो, ऐसे शत्रुको युद्धमें पाकर वह प्राणोंकी भीख माँगे तो भी किसी तरह जीवित नहीं छोड़ना चाहिये ' ॥ ४६ ॥

इत्युक्तौ तौ नरव्याघ्रौ ययतुर्यत्र सैन्धवः ।

राजा निववृते कृष्णामादाय सपुरोहितः ॥ ४७ ॥

द्रौपदीके ऐसा कहनेपर वे दोनों नरश्रेष्ठ जिस ओर जयद्रथ गया था, उसी ओर चल दिये तथा राजा युधिष्ठिर द्रौपदीको लेकर पुरोहित धौम्यके साथ आश्रमपर चल पड़े ॥ ४७ ॥

स प्रविश्याश्रमपदमपविद्धबृसीमठम् ।

मार्कण्डेयादिभिर्विप्रैरनुकीर्णं ददर्श ह ॥ ४८ ॥

उन्होंने आश्रममें प्रवेश करके देखा कि बैठनेके आसन और स्वाध्यायके लिये बनी हुई पर्णशालामें सब वस्तुएँ इधर- उधर बिखरी पड़ी थीं । मार्कण्डेय आदि ब्रह्मर्षि वहाँ इकट्ठे हो रहे थे ॥ ४८ ॥

द्रौपदीमनुशोचद्भिर्ब्राह्मणैस्तैः समाहितैः ।

समियाय महाप्राज्ञः सभार्यो भ्रातृमध्यगः ॥ ४ ९ ॥

वे सब ब्राह्मण एकाग्रचित्त हो द्रौपदीके लिये ही बार- बार शोक कर रहे थे । इतनेमें ही पत्नीसहित परम बुद्धिमान् युधिष्ठिर अपने भाई नकुल और सहदेवके बीचमें होकर चलते हुए वहाँ आ पहुँचे ॥ ४९ ॥

ते स्म तं मुदिता दृष्ट्वा पुनः प्रत्यागतं नृपम् ।

जित्वा तान् सिन्धुसौवीरान् द्रौपदीं चाहतां पुनः ॥ ५० ॥

सिन्धु और सौवीरदेशके क्षत्रियोंको जीतकर महाराज लौटे हैं और द्रौपदीदेवी भी पुनः आश्रममें आ गयी हैं, यह देखकर उन ऋषियोंको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ५० ॥

पृष्ठ 1810

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स तैः परिवृतो राजा तत्रैवोपविवेश ह ।

प्रविवेशाश्रमं कृष्णा यमाभ्यां सह भाविनी ॥ ५१ ॥

उन ब्राह्मणोंसे घिरे हुए राजा युधिष्ठिर वहीं बैठ गये और भामिनी कृष्णा नकुल-सहदेवके साथ आश्रमके भीतर चली गयी ॥ ५१ ॥

भीमसेनार्जुनौ चापि श्रुत्वा क्रोशगतं रिपुम् ।

स्वयमश्वांस्तुदन्तौ तौ जवेनैवाभ्यधावताम् ॥ ५२ ॥

इधर भीमसेन और अर्जुनने जब सुना कि हमारा शत्रु जयद्रथ एक कोस आगे निकल गया है, तब वे स्वयं अपने घोड़ोंको हाँकते हुए बड़े वेगसे उसके पीछे दौड़े ॥ ५२ ॥

इदमत्यद्भुतं चात्र चकार पुरुषोऽर्जुनः ।

क्रोशमात्रगतानश्वान् सैन्धवस्य जघान यत् ॥ ५३ ॥

स हि दिव्यास्त्रसम्पन्नः कृच्छ्रकालेऽप्यसम्भ्रमः ।

अकरोद् दुष्करं कर्म शरैरस्त्रानुमन्त्रितैः ॥ ५४ ॥

यहाँ वीर पुरुष अर्जुनने एक अद्भुत पराक्रम दिखाया । यद्यपि जयद्रथके घोड़े एक कोस आगे निकल गये थे, तो भी उन्होंने दिव्यास्त्रोंसे अभिमन्त्रित बाणोंद्वारा उन्हें दूरसे ही मार डाला । अर्जुन दिव्यास्त्रसे सम्पन्न थे । संकटकालमें भी घबराते नहीं थे । इसीलिये उन्होंने वह दुष्कर कर्म कर दिखाया ॥ ५३-५४ ॥

ततोऽभ्यधावतां वीरावुभौ भीमधनंजयौ ।

हताश्वं सैन्धवं भीतमेकं व्याकुलचेतसम् ॥ ५५ ॥

तत्पश्चात् वे दोनों वीर भीम और अर्जुन जयद्रथके पीछे दौड़े । वह अकेला तो था ही, घोड़ोंके मारे जानेसे अत्यन्त भयभीत भी हो गया था । उसके हृदयमें व्याकुलता छा गयी थी ॥ ५५ ॥

सैन्धवस्तु हतान् दृष्ट्वा तथाश्वान् स्वान् सुदुःखितः ।

अतिविक्रमकर्माणि कुर्वाणं च धनंजयम् ॥ ५६ ॥

सिन्धुराज अपने घोड़ोंको मारा गया देख और अलौकिक पराक्रम कर दिखानेवाले अर्जुनको आता जान अत्यन्त दुःखी हो गया ॥ ५६ ॥

पलायनकृतोत्साहः प्राद्रवद् येन वै वनम् ।

सैन्धवं त्वभिसम्प्रेक्ष्य पराक्रान्तं पलायने ॥ ५७ ॥

अनुयाय महाबाहुः फाल्गुनो वाक्यमब्रवीत् । अब उसमें केवल भागनेका उत्साह रह गया था, अतः वह वनकी ओर भागा । सिन्धुराजको केवल भागनेमें ही पराक्रम दिखाता देख महाबाहु अर्जुन उसका पीछा करते हुए बोले— ॥ ५७३ ॥

अनेन वीर्येण कथं स्त्रियं प्रार्थयसे बलात् ॥ ५८ ॥

राजपुत्र निवर्तस्व न ते युक्तं पलायनम् ।