02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 181–190

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 181–190

पृष्ठ 181

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द्वाविंशोऽध्यायः शाल्ववधोपाख्यानकी समाप्ति और युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर श्रीकृष्ण, धृष्टद्युम्न तथा अन्य सब राजाओंका अपने- अपने नगरको प्रस्थान वासुदेव उवाच

ततोऽहं भरतश्रेष्ठ प्रगृह्य रुचिरं धनुः ।

शरैरपातयं सौभाच्छिरांसि विबुधद्विषाम् ॥ १ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं - भरतश्रेष्ठ! तब मैं अपना सुन्दर धनुष उठाकर बाणोंद्वारा सौभविमानसे देवद्रोही दानवोंके मस्तक काट- काटकर गिराने लगा ॥ १ ॥

शरांश्चाशीविषाकारानूर्ध्वगांस्तिग्मतेजसः ।

प्रैषयं शाल्वराजाय शार्ङ्गमुक्तान् सुवाससः ॥ २ ॥

तत्पश्चात् शार्ङ्ग धनुषसे छूटे हुए विषैले सर्पोंके समान प्रतीत होनेवाले, सुन्दर पंखोंसे सुशोभित, प्रचण्ड तेजस्वी तथा अनेक ऊर्ध्वगामी बाण मैंने राजा शाल्वपर चलाये ॥ २ ॥

ततो नादृश्यत तदा सौभं कुरुकुलोद्वह ।

अन्तर्हितं माययाभूत् ततोऽहं विस्मितोऽभवम् ॥ ३ ॥

कुरुकुलशिरोमणे! परंतु उस समय सौभविमान मायासे अदृश्य हो गया, अतः किसी

प्रकार दिखायी नहीं देता था । इससे मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ३ ॥

अथ दानवसङ्घास्ते विकृताननमूर्धजाः ।

उदक्रोशन् महाराज विष्ठिते मयि भारत ॥ ४ ॥

भरतवंशी महराज! तदनन्तर जब मैं निर्भय और अचलभावसे स्थित हुआ तथा उनपर शस्त्रप्रहार करने लगा, तब विकृत मुख और केशवाले सौभनिवासी दानवगण जोर- जोरसे चिल्लाने लगे ॥ ४ ॥

ततोऽस्त्रं शब्दसाहं वै त्वरमाणो महारणे ।

अयोजयं तद्वधाय ततः शब्द उपारमत् ॥ ५ ॥

तब मैंने उनके वधके लिये उस महान् संग्राममें बड़ी उतावलीके साथ शब्दवेधी बाणका संधान किया । यह देख उनका कोलाहल शान्त हो गया ॥ ५ ॥

हतास्ते दानवाः सर्वे यैः स शब्द उदीरितः ।

शरैरादित्यसंकाशैर्ज्वलितैः शब्दसाधनैः ॥ ६ ॥

जिन दानवोंने पहले कोलाहल किया था, वे सब सूर्यके समान तेजस्वी शब्दवेधी बाणोंद्वारा मारे गये ॥ ६ ॥

पृष्ठ 182

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तस्मिन्नुपरते शब्दे पुनरेवान्यतोऽभवत् ।

शब्दोऽपरो महाराज तत्रापि प्राहरं शरैः ॥ ७ ॥

महाराज! वह कोलाहल शान्त होनेपर फिर दूसरी ओर उनका शब्द सुनायी दिया । तब मैंने उधर भी बाणोंका प्रहार किया ॥ ७ ॥

एवं दश दिशः सर्वास्तिर्यगूर्ध्वं च भारत ।

नादयामासुरसुरास्ते चापि निहता मया ॥ ८ ॥

भारत! इस तरह वे असुर इधर- उधर ऊपर- नीचे दसों दिशाओंमें कोलाहल करते और मेरे हाथसे मारे जाते थे ॥ ८ ॥

ततः प्राग्ज्योतिषं गत्वा पुनरेव व्यदृश्यत ।

सौभं कामगमं वीर मोहयन्मम चक्षुषी ॥ ९ ॥

तदनन्तर इच्छानुसार चलनेवाला सौभविमान प्राग्ज्योतिषपुरके निकट जाकर मेरे नेत्रोंको भ्रममें डालता हुआ फिर दिखायी दिया ॥ ९ ॥

ततो लोकान्तकरणो दानवो दारुणाकृतिः ।

शिलावर्षेण महता सहसा मां समावृणोत् ॥ १० ॥

तत्पश्चात् लोकान्तकारी भयंकर आकृतिवाले दानवने आकर सहसा पत्थरोंकी भारी वर्षाके द्वारा मुझे आवृत कर दिया ॥ १० ॥

सोऽहं पर्वतवर्षेण वध्यमानः पुनः पुनः ।

वल्मीक इव राजेन्द्र पर्वतोपचितोऽभवम् ॥ ११ ॥

राजेन्द्र! शिलाखण्डोंकी उस निरन्तर वृष्टिसे बार- बार आहत होकर मैं पर्वतोंसे आच्छादित बाँबी - सा प्रतीत होने लगा ॥ ११ ॥

ततोऽहं पर्वतचितः सहयः सहसारथिः ।

अप्रख्यातिमियां राजन् सर्वतः पर्वतैश्चितः ॥ १२ ॥

राजन्! मेरे चारों ओर शिलाखण्ड जमा हो गये थे । मैं घोड़ों और सारथिसहित प्रस्तरखण्डोंसे चुना - सा गया था, जिससे दिखायी नहीं देता था ॥ १२ ॥

ततो वृष्णिप्रवीरा ये ममासन् सैनिकास्तदा ।

ते भयार्ता दिशः सर्वे सहसा विप्रदुद्रुवुः ॥ १३ ॥

यह देख वृष्णिकुलके श्रेष्ठ वीर जो मेरे सैनिक थे, भयसे आर्त हो सहसा चारों दिशाओंमें भाग चले ॥ १३ ॥

ततो हाहाकृतमभूत् सर्वं किल विशाम्पते ।

द्यौश्च भूमिश्च खं चैवादृश्यमाने तथा मयि ॥ १४ ॥

प्रजानाथ! मेरे अदृश्य हो जानेपर भूलोक, अन्तरिक्ष तथा स्वर्गलोक — सभी स्थानोंमें हाहाकार मच गया ॥ १४ ॥

ततो विषण्णमनसो मम राजन् सुहृज्जनाः ।

पृष्ठ 183

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रुरुदुश्चक्रुशुश्चैव दुःखशोकसमन्विताः ॥ १५ ॥

राजन्! उस समय मेरे सभी सुहृद् खिन्नचित्त हो दुःख-शोकमें-२ डूबकर रोने - चिल्लाने लगे ॥ १५ ॥

द्विषतां च प्रहर्षोऽभूदार्तिश्चाद्विषतामपि ।

एवं विजितवान् वीर पश्चादश्रौषमच्युत ॥ १६ ॥

शत्रुओंमें उल्लास छा गया और मित्रोंमें शोक । अपनी मर्यादासे च्युत न होनेवाले वीर युधिष्ठिर! इस प्रकार राजा शाल्व एक बार मुझपर विजयी हो चुका था । यह बात मैंने सचेत होनेपर पीछे सारथिके मुँहसे सुनी थी ॥ १६ ॥

ततोऽहमिन्द्रदयितं सर्वपाषाणभेदनम् ।

वज्रमुद्यम्य तान् सर्वान् पर्वतान् समशातयम् ॥ १७ ॥

तब मैंने सब प्रकारके प्रस्तरोंको विदीर्ण करनेवाले इन्द्रके प्रिय आयुध वज्रका प्रहार करके उन समस्त शिलाखण्डोंको चूर- चूर कर दिया ॥ १७ ॥

ततः पर्वतभारार्त्ता मन्दप्राणविचेष्टिताः ।

हया मम महाराज वेपमाना इवाभवन् ॥ १८ ॥

महाराज! उस समय पर्वतखण्डोंके भारसे पीड़ित हुए मेरे घोड़े कम्पित - से हो रहे थे ।

उनकी बलसाध्य चेष्टाएँ बहुत कम हो गयी थीं ॥ १८ ॥

मेघजालमिवाकाशे विदार्याभ्युदितं रविम् ।

दृष्ट्वा मां बान्धवाः सर्वे हर्षमाहारयन् पुनः ॥ १ ९ ॥

जैसे आकाशमें बादलोंके समुदायको छिन्न- भिन्न करके सूर्य उदित होता है, उसी प्रकार शिलाखण्डोंको हटाकर मुझे प्रकट हुआ देख मेरे सभी बन्धु -बान्धब पुनः हर्षसे खिल उठे ॥ १ ९ ॥

ततः पर्वतभारार्त्तान् मन्दप्राणविचेष्टितान् ।

हयान् संदृश्य मां सूतः प्राह तात्कालिकं वचः ॥ २० ॥

तब प्रस्तरखण्डोंके भारसे पीड़ित तथा धीरे- धीरे प्राणसाध्य चेष्टा करनेवाले घोड़ोंको देखकर सारथिने मुझसे यह समयोचित बात कही— ॥ २० ॥

साधु सम्पश्य वार्ष्णेय शाल्वं सौभपतिं स्थितम् ।

अलं कृष्णावमन्यैनं साधु यत्नं समाचर ॥ २१ ॥

‘ वार्ष्णेय! वह देखिये, सौभराज शाल्व वहाँ खड़ा है । श्रीकृष्ण! इसकी उपेक्षा करनेसे कोई लाभ नहीं । इसके वधका कोई उचित उपाय कीजिये ॥ २१ ॥

मार्दवं सखितां चैव शाल्वादद्य व्यपाहर ।

जहि शाल्वं महाबाहो मैनं जीवय केशव ॥ २२ ॥

‘ महाबाहु केशव! अब शाल्वकी ओरसे कोमलता और मित्रभाव हटा लीजिये । इसे मार डालिये, जीवित न रहने दीजिये ॥ २२ ॥

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सर्वैः पराक्रमैर्वीर वध्यः शत्रुरमित्रहन् ।

न शत्रुरवमन्तव्यो दुर्बलोऽपि बलीयसा ॥ २३ ॥

' शत्रुहन्ता वीरवर! आपको सारा पराक्रम लगाकर इस शत्रुका वध कर डालना चाहिये । कोई कितना ही बलवान् क्यों न हो, उसे अपने दुर्बल शत्रुकी भी अवहेलना नहीं करनी चाहिये ॥ २३ ॥

योऽपि स्यात् पीठगः कश्चित् किं पुनः समरे स्थितः ।

स त्वं पुरुषशार्दूल सर्वयत्नैरिमं प्रभो ॥ २४ ॥

जहि वृष्णिकुलश्रेष्ठ मा त्वां कालोऽत्यगात् पुनः ।

नैष मार्दवसाध्यो वै मतो नापि सखा तव ॥ २५ ॥

येन त्वं योधितो वीर द्वारका चावमर्दिता ।

एवमादि तु कौन्तेय श्रुत्वाहं सारथेर्वचः ॥ २६ ॥

तत्त्वमेतदिति ज्ञात्वा युद्धे मतिमधारयम् ।

वधाय शाल्वराजस्य सौभस्य च निपातने ॥ २७ ॥

' कोई शत्रु अपने घरमें आसनपर बैठा हो ( युद्ध न करना चाहता हो ), तो भी उसे नष्ट करनेमें नहीं चूकना चाहिये; फिर जो संग्राममें युद्ध करनेके लिये खड़ा हो, उसकी तो बात ही क्या है? अतः पुरुषसिंह! प्रभो! आप सभी उपायोंसे इस शत्रुको मार डालिये । वृष्णिवंशावतंस! इस कार्यमें आपको पुनः विलम्ब नहीं करना चाहिये । यह मृदुतापूर्ण उपायसे वशमें आनेवाला नहीं । वास्तवमें यह आपका मित्र भी नहीं है; क्योंकि वीर! इसने आपके साथ युद्ध किया और द्वारकापुरीको तहस- नहस कर दिया, अतः इसको शीघ्र मार डालना चाहिये । ' कुन्तीनन्दन! सारथिके मुखसे इस तरहकी बातें सुनकर मैंने सोचा, यह ठीक ही तो कहता है । यह विचारकर मैंने शाल्वराजका वध करने और सौभविमानको मार गिरानेके लिये युद्धमें मन लगा दिया ॥ २४ – २७ ॥

दारुकं चाब्रुवं वीर मुहूर्तं स्थीयतामिति ।

ततोऽप्रतिहतं दिव्यमभेद्यमतिवीर्यवत् ॥ २८ ॥

आग्नेयमस्त्रं दयितं सर्वसाहं महाप्रभम् ।

योजयं तत्र धनुषा दानवान्तकरं रणे ॥ २ ९ ॥

वीर! तत्पश्चात् मैंने दारुकसे कहा- ' सारथे! दो घड़ी और ठहरो (फिर तुम्हारी इच्छा पूरी हो जायगी ) । ' तदनन्तर मैंने कहीं भी कुण्ठित न होनेवाले दिव्य, अभेद्य, अत्यन्त शक्तिशाली, सब कुछ सहन करनेमें समर्थ, प्रिय तथा परम कान्तिमान् आग्नेयास्त्रका अपने धनुषपर संधान किया । वह अस्त्र युद्धमें दानवोंका अन्त करनेवाला था ॥ २८-२९ ॥

यक्षाणां राक्षसानां च दानवानां च संयुगे ।

राज्ञां च प्रतिलोमानां भस्मान्तकरणं महत् ॥ ३० ॥

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इतना ही नहीं, वह यक्षों, राक्षसों, दानवों तथा विपक्षी राजाओंको भी भस्म कर डालनेवाला और महान् था ॥ ३० ॥

क्षुरान्तममलं चक्रं कालान्तकयमोपमम् ।

अनुमन्त्र्याहमतुलं द्विषतां विनिबर्हणम् ॥ ३१ ॥

जहि सौभं स्ववीर्येण ये चात्र रिपवो मम ।

इत्युक्त्वा भुजवीर्येण तस्मै प्राहिणवं रुषा ॥ ३२ ॥

वह आग्नेयास्त्र ( सुदर्शन) चक्रके रूपमें था । उसके परिधिभागमें सब ओर तीखे छुरे लगे हुए थे । वह उज्ज्वल अस्त्र काल, यम और अन्तकके समान भयंकर था । उस शत्रुनाशक अनुपम अस्त्रको अभिमन्त्रित करके मैंने कहा–' तुम अपनी शक्तिसे सौभविमान और उसपर रहनेवाले मेरे शत्रुओंको मार डालो । ' ऐसा कहकर अपने बाहुबलसे रोषपूर्वक मैंने वह अस्त्र सौभ विमानकी ओर चलाया ॥ ३१-३२ ॥

रूपं सुदर्शनस्यासीदाकाशे पततस्तदा ।

द्वितीयस्येव सूर्यस्य युगान्ते प्रपतिष्यतः ॥ ३३ ॥

आकाशमें जाते ही उस सुदर्शन चक्रका स्वरूप प्रलयकालमें उगनेवाले द्वितीय सूर्यके समान प्रकाशित हो उठा ॥ ३३ ॥

तत् समासाद्य नगरं सौभं व्यपगतत्विषम् ।

मध्येन पाटयामास क्रकचो दार्विवोच्छ्रितम् ॥ ३४ ॥

उस दिव्यास्त्रने सौभनगरमें पहुँचकर उसे श्रीहीन कर दिया और जैसे आरा ऊँचे काठको चीर डालता है, उसी प्रकार सौभविमानको बीचसे काट डाला ॥ ३४ ॥

द्विधा कृतं ततः सौभं सुदर्शनबलाद्धतम् ।

महेश्वरशरोद्धूतं पपात त्रिपुरं यथा ॥ ३५ ॥

सुदर्शन चक्रकी शक्तिसे कटकर दो टुकड़ोंमें बँटा हुआ सौभविमान महादेवजीके बाणोंसे छिन्न - भिन्न हुए त्रिपुरकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३५ ॥

तस्मिन् निपतिते सौभे चक्रमागात् करं मम ।

पुनश्चादाय वेगेन शाल्वायेत्यहमब्रुवम् ॥ ३६ ॥

सौभविमानके गिरनेपर चक्र फिर मेरे हाथमें आ गया । मैंने फिर उसे लेकर वेगपूर्वक चलाया और कहा — ‘ अबकी बार शाल्वको मारनेके लिये तुम्हें छोड़ रहा हूँ' ॥ ३६ ॥

ततः शाल्वं गदां गुर्वीमाविध्यन्तं महाहवे ।

द्विधा चकार सहसा प्रजज्वाल च तेजसा ॥ ३७ ॥

तब उस चक्रने महासमरमें बड़ी भारी गदा घुमानेवाले शाल्वके सहसा दो टुकड़े कर दिये और वह तेजसे प्रज्वलित हो उठा ॥ ३७ ॥

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तस्मिन् विनिहते वीरे दानवास्त्रस्तचेतसः ।

हाहाभूता दिशो जग्मुरर्दिता मम सायकैः ॥ ३८ ॥

वीर शाल्वके मारे जानेपर दानवोंके मनमें भय समा गया । वे मेरे बाणोंसे पीड़ित हो हाहाकार करते हुए सब दिशाओंमें भाग गये ॥ ३८ ॥

ततोऽहं समवस्थाप्य रथं सौभसमीपतः ।

शङ्खं प्रध्माप्य हर्षेण सुहृदः पर्यहर्षयम् ॥ ३ ९ ॥

तब मैंने सौभविमानके समीप अपने रथको खड़ा करके प्रसन्नतापूर्वक शंख बजाकर सभी सुहृदोंको हर्षमें निमग्न कर दिया ॥ ३ ९ ॥

तन्मेरुशिखराकारं विध्वस्ताट्टालगोपुरम् ।

दह्यमानमभिप्रेक्ष्य स्त्रियस्ताः सम्प्रदुद्रुवुः ॥ ४० ॥

मेरुपर्वतके शिखरके समान आकृतिवाले सौभ- नगरकी अट्टालिका और गोपुर सभी नष्ट हो गये । उसे जलते देख उसपर रहनेवाली स्त्रियाँ इधर - उधर भाग गयीं ॥ ४० ॥

एवं निहत्य समरे सौभं शाल्वं निपात्य च ।

आनर्तान् पुनरागम्य सुहृदां प्रीतिमावहम् ॥ ४१ ॥

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धर्मराज! इस प्रकार युद्धमें सौभविमान तथा राजा शाल्वको नष्ट करके मैं पुनः आनर्तनगर ( द्वारका ) -में लौट आया और सुहृदोंका हर्ष बढ़ाया ॥ ४१ ॥

तदेतत् कारणं राजन् यदहं नागसाह्वयम् ।

नागमं परवीरघ्न न हि जीवेत् सुयोधनः ॥ ४२ ॥

मय्यागतेऽथवा वीर द्यूतं न भविता तथा ।

अद्याहं किं करिष्यामि भिन्नसेतुरिवोदकम् ॥ ४३ ॥

राजन्! यही कारण है, जिससे मैं उन दिनों हस्तिनापुरमें न आ सका । शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले धर्मराज! मेरे आनेपर या तो जूआ नहीं होता या दुर्योधन जीवित नहीं रह पाता । जैसे बाँध टूट जानेपर पानीको कोई नहीं रोक सकता, उसी प्रकार आज जबकि सब कुछ बिगड़ चुका है, तब मैं क्या कर सकूँगा ॥ ४२-४३ ॥ वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा महाबाहुः कौरवं पुरुषोत्तमः ।

आमन्त्र्य प्रययौ श्रीमान् पाण्डवान् मधुसूदनः ॥ ४४ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! ऐसा कहकर पुरुषोंमें श्रेष्ठ महाबाहु श्रीमान् मधुसूदन कुरुनन्दन युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर द्वारकाकी ओर चले ॥ ४४ ॥

अभिवाद्य महाबाहुर्धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।

राज्ञा मूर्धन्युपाघ्रातो भीमेन च महाभुजः ॥ ४५ ॥

महाबाहु श्रीकृष्णने धर्मराज युधिष्ठिरको प्रणाम किया । राजा युधिष्ठिर तथा भीमने बड़ी - बड़ी भुजाओंवाले श्रीकृष्णका सिर सूँघा ॥ ४५ ॥

परिष्वक्तश्चार्जुनेन यमाभ्यां चाभिवादितः ।

सम्मानितश्च धौम्येन द्रौपद्या चार्चितोऽश्रुभिः ॥ ४६ ॥

अर्जुनने उनको हृदयसे लगाया और नकुल सहदेवने उनके चरणोंमें प्रणाम किया । पुरोहित धौम्यजीने उनका सम्मान किया तथा द्रौपदीने अपने आँसुओंसे उनकी अर्चना की ॥ ४६ ॥

सुभद्रामभिमन्युं च रथमारोप्य काञ्चनम् ।

आरुरोह रथं कृष्णः पाण्डवैरभिपूजितः ॥ ४७ ॥

पाण्डवोंसे सम्मानित श्रीकृष्ण सुभद्रा और अभिमन्युको अपने सुवर्णमय रथपर बैठाकर स्वयं भी उसपर आरूढ़ हुए ॥ ४७ ॥

शैब्यसुग्रीवयुक्तेन रथेनादित्यवर्चसा ।

द्वारकां प्रययौ कृष्णः समाश्वास्य युधिष्ठिरम् ॥ ४८ ॥

उस रथमें शैब्य और सुग्रीव नामक घोड़े जुते हुए थे और वह सूर्यके समान तेजस्वी प्रतीत होता था । युधिष्ठिरको आश्वासन देकर श्रीकृष्ण उसी रथके द्वारा द्वारकापुरीकी ओर

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चल दिये ॥ ४८ ॥

ततः प्रयाते दाशार्हे धृष्टद्युम्नोऽपि पार्षतः ।

द्रौपदेयानुपादाय प्रययौ स्वपुरं तदा ॥ ४ ९ ॥

श्रीकृष्णके चले जानेपर द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्नने भी द्रौपदीकुमारोंको साथ ले अपनी राजधानीको प्रस्थान किया ॥ ४ ९ ॥

धृष्टकेतुः स्वसारं च समादायाथ चेदिराट् ।

जगाम पाण्डवान् दृष्ट्वा रम्यां शुक्तिमतीं पुरीम् ॥ ५० ॥

चेदिराज धृष्टकेतु भी अपनी बहिन करेणुमतीको, जो नकुलकी भार्या थी, साथ ले पाण्डवोंसे मिल - जुलकर अपनी सुरम्य राजधानी शुक्तिमतीपुरीको चले गये ॥ ५० ॥

केकयाश्चाप्यनुज्ञाताः कौन्तेयेनामितौजसा ।

आमन्त्र्य पाण्डवान् सर्वान् प्रययुस्तेऽपि भारत ॥ ५१ ॥

भारत! केकयराजकुमार भी अमित तेजस्वी कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरकी आज्ञा पा समस्त पाण्डवोंसे विदा लेकर अपने नगरको चले गये ॥ ५१ ॥

ब्राह्मणाश्च विशश्चैव तथा विषयवासिनः ।

विसृज्यमानाः सुभृशं न त्यजन्ति स्म पाण्डवान् ॥ ५२ ॥

युधिष्ठिरके राज्यमें रहनेवाले ब्राह्मण तथा वैश्य बारंबार विदा करनेपर भी पाण्डवोंको छोड़कर जाना नहीं चाहते थे ॥ ५२ ॥

समवायः स राजेन्द्र सुमहाद्भुतदर्शनः ।

आसीन्महात्मनां तेषां काम्यके भरतर्षभ ॥ ५३ ॥

भरतवंशभूषण महाराज जनमेजय! उस समय काम्यकवनमें उन महात्माओंका बड़ा अद्भुत सम्मेलन जुटा था ॥ ५३ ॥

युधिष्ठिरस्तु विप्रांस्ताननुमान्य महामनाः ।

शशास पुरुषान् काले रथान् योजयतेति वै ॥ ५४ ॥

तदनन्तर महामना युधिष्ठिरने सब ब्राह्मणोंकी अनुमतिसे अपने सेवकोंको समयपर आज्ञा दी — ' रथोंको जोतकर तैयार करो ' ॥ ५४ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि सौभवधोपाख्याने द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें सौभवधोपाख्यानविषयक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२ ॥

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त्रयोविंशोऽध्यायः पाण्डवोंका द्वैतवनमें जानेके लिये उद्यत होना और प्रजावर्गकी व्याकुलता वैशम्पायन उवाच तस्मिन् दशार्हाधिपतौ प्रयाते युधिष्ठिरो भीमसेनार्जुनौ च । यमौ च कृष्णा च पुरोहितश्च रथान् महार्हान् परमाश्वयुक्तान् ॥ १ ॥

आस्थाय वीराः सहिता वनाय प्रतस्थिरे भूतपतिप्रकाशाः । हिरण्यनिष्कान् वसनानि गाश्च प्रदाय शिक्षाक्षरमन्त्रविद्भयः ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! यादवकुलके अधिपति भगवान् श्रीकृष्णके चले जानेपर युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव, द्रौपदी और पुरोहित धौम्य उत्तम घोड़ोंसे जुते हुए बहुमूल्य रथोंपर बैठे । फिर भूतनाथ भगवान् शंकरके समान सुशोभित होनेवाले वे सभी वीर एक साथ दूसरे वनमें जानेके लिये उद्यत हुए । वेद - वेदांग और मन्त्रके जाननेवाले ब्राह्मणोंको सोनेकी मुद्राएँ, वस्त्र तथा गौएँ प्रदान करके उन्होंने यात्रा प्रारम्भ की ॥ १-२ ॥ प्रेष्याः पुरो विंशतिरात्तशस्त्रा धनूंषि शस्त्राणि शरांश्च दीप्तान् । मौर्वीश्च यन्त्राणि च सायकांश्च सर्वे समादाय जघन्यमीयुः ॥ ३ ॥

भगवान् श्रीकृष्णके साथ बीस सेवक अस्त्र- शस्त्रोंसे सुसज्जित हो धनुष, तेजस्वी बाण, शस्त्र, डोरी, यन्त्र और अनेक प्रकारके सायक लेकर पहले ही पश्चिम दिशामें स्थित द्वारकापुरीकी ओर चले गये थे ॥ ३ ॥

ततस्तु वासांसि च राजपुत्र्या धात्र्यश्च दास्यश्च विभूषणं च । तदिन्द्रसेनस्त्वरितः प्रगृह्य जघन्यमेवोपययौ रथेन ॥ ४ ॥

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तदनन्तर सारथि इन्द्रसेन राजकुमारी सुभद्राके वस्त्र, आभूषण, धायों तथा दासियोंको लेकर तुरंत ही रथके द्वारा द्वारकापुरीको चल दिया ॥ ४ ॥

ततः कुरुश्रेष्ठमुपेत्य पौराः प्रदक्षिणं चक्रुरदीनसत्त्वाः । तं ब्राह्मणाश्चाभ्यवदन् प्रसन्ना मुख्याश्च सर्वे कुरुजाङ्गलानाम् ॥ ५ ॥

इसके बाद उदार हृदयवाले पुरवासियोंने कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरके पास जा उनकी परिक्रमा की । कुरुजांगलदेशके ब्राह्मणों तथा सभी प्रमुख लोगोंने उनसे प्रसन्नतापूर्वक बातचीत की ॥ ५ ॥

स चापि तानभ्यवदत् प्रसन्नः सहैव तैर्भ्रातृभिर्धर्मराजः । तस्थौ च तत्राधिपतिर्महात्मा दृष्ट्वा जनौघं कुरुजाङ्गलानाम् ॥ ६ ॥

अपने भाइयोंसहित धर्मराज युधिष्ठिरने भी प्रसन्न होकर उन सबसे वार्तालाप किया । कुरुजांगलदेशके उस जनसमुदायको देखकर महात्मा राजा युधिष्ठिर थोड़ी देरके लिये वहाँ ठहर गये ॥ ६ ॥

पितेव पुत्रेषु स तेषु भावं चक्रे कुरूणामृषभो महात्मा । ते चापि तस्मिन् भरतप्रबर्हे तदा बभूवुः पितरीव पुत्राः ॥ ७ ॥

जैसे पिताका अपने पुत्रोंपर वात्सल्यभाव होता है, उसी प्रकार कुरुश्रेष्ठ महात्मा युधिष्ठिरने उन सबके प्रति अपने आन्तरिक स्नेहका परिचय दिया। वे भी उन भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिरके प्रति वैसे ही अनुरक्त थे, जैसे पुत्र अपने पितापर ॥ ७ ॥

ततस्तमासाद्य महाजनौघाः कुरुप्रवीरं परिवार्य तस्थुः । हा नाथ हा धर्म इति ब्रुवाणा भीताश्च सर्वेऽश्रुमुखाश्च राजन् ॥ वरः कुरूणामधिपः प्रजानां पितेव पुत्रानपहाय चास्मान् । पौरानिमाञ्जानपदांश्च सर्वान् हित्वा प्रयातः क्व नुनु धर्मराजः ॥ ९ ॥

उस महान् जनसमुदाय ( प्रजा ) - के लोग कुरुकुलके प्रमुख वीर युधिष्ठिरके पास जा उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये।राजन्! उस समय उन सबके मुखपर आँसुओंकी