श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 171–180
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 171–180
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अप्रमादः सदा कार्यो नगरे यादवर्षभाः ॥ ८ ॥
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर मैं नगरनिवासियोंको आश्वासन देकर राजा उग्रसेन, पिता वसुदेव तथा सम्पूर्ण वृष्णिवंशियोंका हर्ष बढ़ाते हुए बोला- ' यदुकुलके श्रेष्ठ पुरुषो! आपलोग नगरकी रक्षाके लिये सदा सावधान रहें ॥ ७-८ ॥
शाल्वराजविनाशाय प्रयातं मां निबोधत ।
नाहत्वा तं निवर्तिष्ये पुरीं द्वारवतीं प्रति ॥ ९ ॥
‘ मैं शाल्वराजका नाश करनेके लिये यहाँसे प्रस्थान करता हूँ । आप यह निश्चय जानें; मैं शाल्वका वध किये बिना द्वारकापुरीको नहीं लौटूंगा ॥ ९ ॥
सशाल्वं सौभनगरं हत्वा द्रष्टास्मि वः पुनः ।
त्रिःसामा हन्यतामेषा दुन्दुभिः शत्रुभीषणा ॥ १० ॥
‘ शाल्वसहित सौभनगरका नाश कर लेनेपर ही मैं पुनः आपलोगोंका दर्शन करूँगा ।
अब शत्रुओंको भयभीत करनेवाले इस नगाड़ेको तीन बार बजाइये ' ॥ १० ॥
ते मयाऽऽश्वासिता वीरा यथावद् भरतर्षभ ।
सर्वे मामब्रुवन् हृष्टाः प्रयाहि जहि शात्रवान् ॥ ११ ॥
भरतकुलभूषण! मेरे इस प्रकार आश्वासन देनेपर सभी यदुवंशी वीरोंने प्रसन्न होकर मुझसे कहा – ' जाइये और शत्रुओंका विनाश कीजिये ' ॥ ११ ॥
तैः प्रहृष्टात्मभिर्वीरैराशीर्भिरभिनन्दितः ।
वाचयित्वा द्विजश्रेष्ठान् प्रणम्य शिरसा भवम् ॥ १२ ॥
शैब्यसुग्रीवयुक्तेन रथेनानादयन् दिशः ।
प्रध्माय शङ्खप्रवरं पाञ्चजन्यमहं नृप ॥ १३ ॥
प्रयातोऽस्मि नरव्याघ्र बलेन महता वृतः ।
क्लृप्तेन चतुरङ्गेण यत्तेन जितकाशिना ॥ १४ ॥
प्रसन्नचित्तवाले उन वीरोंके द्वारा आशीर्वादसे अभिनन्दित होकर मैंने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराया और मस्तक झुकाकर भगवान् शिवको प्रणाम किया । नरश्रेष्ठ! तदनन्तर शैब्य और सुग्रीव नामक घोड़ोंसे जुते हुए अपने रथके द्वारा सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए श्रेष्ठ शंख पांचजन्यको बजाकर मैंने विशाल सेनाके साथ रणके लिये प्रस्थान किया । मेरी उस व्यूहरचनासे युक्त और नियन्त्रित सेनामें हाथी, घोड़े, रथी और
पैदल — चारों ही अंग मौजूद थे । उस समय वह सेना विजयसे सुशोभित हो रही थी ॥ १२
—१४ ॥
समतीत्य बहुन् देशान् गिरींश्च बहुपादपान् ।
सरांसि सरितश्चैव मार्तिकावतमासदम् ॥ १५ ॥
तब मैं बहुत - से देशों और असंख्य वृक्षोंसे हरे- भरे पर्वतों, सरोवरों और सरिताओंको लाँघता हुआ मार्तिकावतमें जा पहुँचा ॥ १५ ॥
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तत्राश्रौषं नरव्याघ्र शाल्वं सागरमन्तिकात् ।
प्रयान्तं सौभमास्थाय तमहं पृष्ठतोऽन्वयाम् ॥ १६ ॥
नरव्याघ्र! वहाँ मैंने सुना कि शाल्व सौभविमानपर बैठकर समुद्रके निकट जा रहा है ।
तब मैं उसीके पीछे लग गया ॥ १६ । ।
ततः सागरमासाद्य कुक्षौ तस्य महोर्मिणः ।
समुद्रनाभ्यां शाल्वोऽभूत् सौभमास्थाय शत्रुहन् ॥ १७ ॥
शत्रुनाशन! फिर समुद्रके निकट पहुँचकर उत्ताल तरंगोंवाले महासागरकी कुक्षिके अन्तर्गत उसके नाभिदेश (एक द्वीप) - में जाकर राजा शाल्व सौभविमानपर ठहरा हुआ था ॥ १७ ॥
स समालोक्य दूरान्मां स्मयन्निव युधिष्ठिर ।
आह्वयामास दुष्टात्मा युद्धायैव मुहुर्मुहुः ॥ १८ ॥
युधिष्ठिर! वह दुष्टात्मा दूरसे ही मुझे देखकर मुसकराता हुआ - सा बारंबार युद्धके लिये ललकारने लगा ॥ १८ ॥
तस्य शार्ङ्गविनिर्मुक्तैर्बहुभिर्मर्मभेदिभिः ।
पुंर नासाद्यत शरैस्ततो मां रोष आविशत् ॥ १९ ॥
मेरे शार्ङ्ग धनुषसे छूटे हुए बहुत- से मर्मभेदी बाण शाल्वके विमानतक नहीं पहुँच सके । इससे मैं रोषमें भर गया ॥ १ ९ ॥
स चापि पापप्रकृतिर्दैतेयापसदो नृप ।
मय्यवर्षत दुर्धर्षः शरधाराः सहस्रशः ॥ २० ॥
राजन्! नीच दैत्य दुर्धर्ष राजा शाल्व स्वभावसे ही पापाचारी था । उसने मेरे ऊपर सहस्रों बाणधाराएँ बरसायीं ॥ २० ॥
सैनिकान् मम सूतं च हयांश्च समवाकिरत् ।
अचिन्तयन्तस्तु शरान् वयं युध्याम भारत ॥ २१ ॥
मेरे सारथि, घोड़ों तथा सैनिकोंपर उसने भी बाणोंकी झड़ी लगा दी। भारत! उसके बाणोंकी बौछारको कुछ न समझकर मैं युद्धमें ही लगा रहा ॥ २१ ॥
ततः शतसहस्राणि शराणां नतपर्वणाम् ।
चिक्षिपुः समरे वीरा मयि शाल्वपदानुगाः ॥ २२ ॥
तदनन्तर शाल्वके अनुगामी वीरोंने युद्धमें मेरे ऊपर झुकी हुई गाँठवाले लाखों बाण बरसाये ॥ २२ ॥
ते हयांश्च रथं चैव तदा दारुकमेव च ।
छादयामासुरसुरास्तैर्बाणैर्मर्मभेदिभिः ॥ २३ ॥
उस समय उन असुरोंने अपने मर्मवेधी बाणोंद्वारा मेरे घोड़ोंको, रथको और दारुकको भी ढक दिया ॥ २३ ॥
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न हयान रथो वीर न यन्ता मम दारुकः ।
अदृश्यन्त शरैश्छन्नास्तथाहं सैनिकाश्च मे ॥ २४ ॥
वीरवर! उस समय मेरे घोड़े, रथ, मेरा सारथि दारुक, मैं तथा मेरे सारे सैनिक— सभी बाणोंसे आच्छादित होकर अदृश्य हो गये ॥ २४ ॥
ततोऽहमपि कौन्तेय शराणामयुतान् बहून् ।
आमन्त्रितानां धनुषा दिव्येन विधिनाक्षिपम् ॥ २५ ॥
कुन्तीनन्दन! तब मैंने भी अपने धनुषद्वारा दिव्य विधिसे अभिमन्त्रित किये हुए कई हजार बाण बरसाये ॥ २५ ॥
न तत्र विषयस्त्वासीन्मम सैन्यस्य भारत ।
खे विषक्तं हि तत् सौभं क्रोशमात्र इवाभवत् ॥ २६ ॥
भारत! शाल्वका सौभविमान आकाशमें इस प्रकार प्रवेश कर गया था कि मेरे सैनिकोंकी दृष्टिमें आता ही नहीं था, मानो एक कोस दूर चला गया हो ॥ २६ ॥
ततस्ते प्रेक्षकाः सर्वे रङ्गवाद इव स्थिताः ।
हर्षयामासुरुच्चैर्मां सिंहनादतलस्वनैः ॥ २७ ॥
तब वे सैनिक रंगशालामें बैठे हुए दर्शकोंकी भाँति केवल मेरे युद्धका दृश्य देखते हुए जोर- जोरसे सिंहनाद और करतलध्वनि करके मेरा हर्ष बढ़ाने लगे ॥ २७ ॥
मत्कराग्रविनिर्मुक्ता दानवानां शरास्तथा ।
अङ्गेषु रुचिरापाङ्गा विविशुः शलभा इव ॥ २८ ॥
तब मेरे हाथोंसे छूटे हुए मनोहर पंखवाले बाण दानवोंके अंगोंमें शलभोंकी भाँति घुसने लगे ॥ २८ ॥
ततो हलहलाशब्दः सौभमध्ये व्यवर्धत ।
वध्यतां विशिखैस्तीक्ष्णैः पततां च महार्णवे ॥ २ ९ ॥
इससे सौभविमानमें मेरे तीखे बाणोंसे मरकर महासागरमें गिरनेवाले दानवोंका कोलाहल बढ़ने लगा ॥ २ ९ ॥
ते निकृत्तभुजस्कन्धाः कबन्धाकृतिदर्शनाः ।
नदन्तो भैरवान् नादान् निपतन्ति स्म दानवाः ॥ ३० ॥
कंधे और भुजाओंके कट जानेसे कबन्धकी आकृतिमें दिखायी देनेवाले वे दानव भयंकर नाद करते हुए समुद्रमें गिरने लगे ॥ ३० ॥
पतितास्तेऽपि भक्ष्यन्ते समुद्राम्भोनिवासिभिः ।
ततो गोक्षीरकुन्देन्दुमृणालरजतप्रभम् ॥ ३१ ॥
जलजं पाञ्चजन्यं वै प्राणेनाहमपूरयम् ।
तान् दृष्ट्वा पतितांस्तत्र शाल्वः सौभपतिस्ततः ॥ ३२ ॥
मायायुद्धेन महता योधयामास मां युधि ।
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ततो गदा हलाः प्रासाः शूलशक्तिपरश्वधाः ॥ ३३ ॥
असयः शक्तिकुलिशपाशर्ष्टिकनपाः शराः ।
पट्टिशाश्च भुशुण्ड्यश्च प्रपतन्त्यनिशं मयि ॥ ३४ ॥
जो गिरते थे, उन्हें समुद्रमें रहनेवाले जीव- जन्तु निगल जाते थे । तत्पश्चात् मैंने गोदुग्ध, कुन्दपुष्प, चन्द्रमा, मृणाल तथा चाँदीकी - सी कान्तिवाले पांचजन्य नामक शंखको बड़े जोरसे फूँका । उन दानवोंको समुद्रमें गिरते देख सौभराज शाल्व महान् मायायुद्धके द्वारा मेरा सामना करने लगा । फिर तो मेरे ऊपर गदा, हल, प्रास, शूल, शक्ति, फरसे, खड्ग, शक्ति, वज्र, पाश, ऋष्टि, कनप, बाण, पट्टिश और भुशुण्डी आदि शस्त्रास्त्रोंकी निरन्तर वर्षा होने लगी ॥ ३१–३४ ॥
तामहं माययैवाशु प्रतिगृह्य व्यनाशयम् ।
तस्यां हतायां मायायां गिरिशृङ्गैरयोधयत् ॥ ३५ ॥
शाल्वकी उस मायाको मैंने मायाद्वारा ही नियन्त्रित करके नष्ट कर दिया । उस मायाका नाश होनेपर वह पर्वतके शिखरोंद्वारा युद्ध करने लगा ॥ ३५ ॥
ततोऽभवत् तम इव प्रकाश इव चाभवत् ।
दुर्दिनं सुदिनं चैव शीतमुष्णं च भारत ॥ ३६ ॥
अङ्गारपांशुवर्षं च शस्त्रवर्षं च भारत ।
एवं मायां प्रकुर्वाणो योधयामास मां रिपुः ॥ ३७ ॥
तदनन्तर कभी अन्धकार-सा हो जाता, कभी प्रकाश-सा हो जाता, कभी मेघोंसे आकाश घिर जाता और कभी बादलोंके छिन्न -भिन्न होनेसे सुन्दर दिन प्रकट हो जाता था । कभी सर्दी और कभी गरमी पड़ने लगती थी। अंगार और धूलिकी वर्षाके साथ- साथ शस्त्रोंकी भी वृष्टि होने लगती । इस प्रकार शत्रुने मेरे साथ मायाका प्रयोग करते हुए युद्ध आरम्भ किया ॥ ३६–३७ ॥
विज्ञाय तदहं सर्वं माययैव व्यनाशयम् ।
यथाकालं तु युद्धेन व्यधमं सर्वतः शरैः ॥ ३८ ॥
वह सब जानकर मैंने मायाद्वारा ही उसकी मायाका नाश कर दिया । यथासमय युद्ध करते हुए मैंने बाणोंद्वारा शाल्वकी सेनाको सब ओरसे संतप्त कर दिया ॥ ३८ ॥
ततो व्योम महाराज शतसूर्यमिवाभवत् ।
शतचन्द्रं च कौन्तेय सहस्रायुततारकम् ॥ ३ ९ ॥
कुन्तीपुत्र महाराज युधिष्ठिर! इसके बाद आकाश सौ सूर्योंसे उद्भासित - सा दिखायी देने लगा । उसमें सैकड़ों चन्द्रमा और करोड़ों तारे दिखायी देने लगे ॥ ३ ९ ॥
ततो नाज्ञायत तदा दिवारात्रं तथा दिशः ।
ततोऽहं मोहमापन्नः प्रज्ञास्त्रं समयोजयम् ॥ ४० ॥
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उस समय यह नहीं जान पड़ता था कि यह दिन है या रात्रि! दिशाओंका भी ज्ञान नहीं होता था; इससे मोहित होकर मैंने प्रज्ञास्त्रका संधान किया ॥ ४० ॥
ततस्तदस्त्रं कौन्तेय धूतं तूलमिवानिलैः ।
तथा तदभवद् युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ।
लब्धालोकस्तु राजेन्द्र पुनः शत्रुमयोधयम् ॥ ४१ ॥
कुन्तीकुमार! तब उस अस्त्रने उस सारी मायाको उसी प्रकार उड़ा दिया, जैसे हवा रूईको उड़ा देती है । इसके बाद शाल्वके साथ हमलोगोंका अत्यन्त भयंकर तथा रोमांचकारी युद्ध होने लगा । राजेन्द्र! सब ओर प्रकाश हो जानेपर मैंने पुनः शत्रुसे युद्ध प्रारम्भ कर दिया ॥ ४१ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि सौभवधोपाख्याने विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें सौभवधोपाख्यानविषयक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥
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एकविंशोऽध्यायः श्रीकृष्णका शाल्वकी मायासे मोहित होकर पुनः सजग होना वासुदेव उवाच
एवं स पुरुषव्याघ्र शाल्वराजो महारिपुः ।
युध्यमानो मया संख्ये वियदभ्यगमत् पुनः ॥ १ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं - पुरुषसिंह! इस प्रकार मेरे साथ युद्ध करनेवाला महाशत्रु शाल्वराज पुनः आकाशमें चला गया ॥ १ ॥
ततः शतघ्नीश्च महागदाश्च दीप्तांश्च शूलान् मुसलानसींश्च । चिक्षेप रोषान्मयि मन्दबुद्धिः शाल्वो महाराज जयाभिकाङ्क्षी ॥ २ ॥
महाराज! वहाँसे विजयकी इच्छा रखनेवाले मन्दबुद्धि शाल्वने क्रोधमें भरकर मेरे ऊपर शतघ्नियाँ, बड़ी - बड़ी गदाएँ, प्रज्वलित शूल, मुसल और खड्ग फेंके ॥ २ ॥
तानाशुगैरापततोऽहमाशु
निवार्य हन्तुं खगमान् ख एव ।
द्विधा त्रिधा चाच्छिदमाशुमुक्तै- स्ततोऽन्तरिक्षे निनदो बभूव ॥ ३ ॥
उनके आते ही मैंने तुरंत शीघ्रगामी बाणोंद्वारा उन्हें रोककर उन गगनचारी शत्रुओंको आकाशमें ही मार डालनेका निश्चय किया और शीघ्र छोड़े हुए बाणोंद्वारा उन सबके दो -दो
तीन- तीन टुकड़े कर डाले । इससे अन्तरिक्षमें बड़ा भारी आर्त्तनाद हुआ ॥ ३ ॥
ततः शतसहस्रेण शराणां नतपर्वणाम् ।
दारुकं वाजिनश्चैव रथं च समवाकिरत् ॥ ४ ॥
तदनन्तर शाल्वने झुकी हुई गाँठोंवाले लाखों बाणोंका प्रहार करके मेरे सारथि दारुक, घोड़ों तथा रथको आच्छादित कर दिया ॥ ४ ॥
ततो मामब्रवीद् वीर दारुको विह्वलन्निव ।
स्थातव्यमिति तिष्ठामि शाल्वबाणप्रपीडितः ।
अवस्थातुं न शक्नोमि अङ्गं मे व्यवसीदति ॥ ५ ॥
वीरवर! तब दारुक व्याकुल- सा होकर मुझसे बोला- ' प्रभो! युद्धमें डटे रहना चाहिये ' इस कर्तव्यका स्मरण करके ही मैं यहाँ ठहरा हुआ हूँ; किंतु शाल्वके बाणोंसे अत्यन्त
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पीड़ित होनेके कारण मुझमें खड़े रहनेकी भी शक्ति नहीं रह गयी है । मेरा अंग शिथिल होता जा रहा है ' ॥ ५ ॥
इति तस्य निशम्याहं सारथेः करुणं वचः ।
अवेक्षमाणो यन्तारमपश्यं शरपीडितम् ॥ ६ ॥
सारथिका यह करुण वचन सुनकर मैंने उसकी ओर देखा । उसे बाणोंद्वारा बड़ी पीड़ा हो रही थी ॥ ६ ॥
न तस्योरसि नो मूर्ध्नि न काये न भुजद्वये ।
अन्तरं पाण्डवश्रेष्ठ पश्याम्यनिचितं शरैः ॥ ७ ॥
स तु बाणवरोत्पीडाद् विस्रवत्यसृगुल्बणम् ।
अभिवृष्टे यथा मेघे गिरिर्गैरिकधातुमान् ॥ ८ ॥
पाण्डवश्रेष्ठ! उसकी छातीमें, मस्तकपर, शरीरके अन्य अवयवोंमें तथा दोनों भुजाओंमें थोड़ा- सा भी ऐसा स्थान नहीं दिखायी देता था, जिसमें बाण न चुभे हुए हों । जैसे मेघके वर्षा करनेपर गेरू आदि धातुओंसे युक्त पर्वत लाल पानीकी धारा बहाने लगता है, वैसे ही वह बाणोंसे छिदे हुए अपने अंगोंसे भयंकर रक्तकी धारा बहा रहा था ॥ ७-८ ॥
अभीषु हस्तं तं दृष्ट्वा सीदन्तं सारथिं रणे ।
अस्तम्भयं महाबाहो शाल्वबाणप्रपीडितम् ॥ ९ ॥
महाबाहो! उस युद्धमें हाथमें बागडोर लिये सारथिको शाल्वके बाणोंसे पीड़ित होकर कष्ट पाते देख मैंने उसे ढाढ़स बँधाया ॥ ९ ॥
अथ मां पुरुषः कश्चिद् द्वारकानिलयोऽब्रवीत् ।
त्वरितो रथमभ्येत्य सौहृदादिव भारत ॥ १० ॥
आहुकस्य वचो वीर तस्यैव परिचारकः ।
विषण्णः सन्नकण्ठेन तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ ११ ॥
भरतवंशी वीरवर! इतनेमें ही कोई द्वारकावासी पुरुष आकर तुरंत मेरे रथपर चढ़ गया और सौहार्द दिखाता हुआ- सा बोला । वह राजा उग्रसेनका सेवक था और दुःखी होकर उसने गद्गदकण्ठसे उनका जो संदेश सुनाया, उसे बताता हूँ, सुनिये ॥ १०-११ ॥
द्वारकाधिपतिर्वीर आह त्वामाहुको वचः ।
केशवैहि विजानीष्व यत् त्वां पितृसखोऽब्रवीत् ॥ १२ ॥
( दूत बोला - ) ' वीर! द्वारकानरेश उग्रसेनने आपको यह एक संदेश दिया है । केशव! वे आपके पिताके सखा हैं; उन्होंने आपसे कहा है कि यहाँ आ जाओ और जान लो ॥ १२ ॥
उपायायाद्य शाल्वेन द्वारकां वृष्णिनन्दन ।
विषक्ते त्वयि दुर्धर्ष हतः शूरसुतो बलात् ॥ १३ ॥
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‘ दुर्धर्ष वृष्णिनन्दन! आपके युद्धमें आसक्त होनेपर शाल्वने अभी द्वारकापुरीमें आकर शूरनन्दन वसुदेवजीको बलपूर्वक मार डाला है ॥ १३ ॥
तदलं साधु युद्धेन निवर्तस्व जनार्दन ।
द्वारकामेव रक्षस्व कार्यमेतन्महत् तव ॥ १४ ॥
‘ जनार्दन! अब युद्ध करके क्या लेना है? लौट आओ । द्वारकाकी ही रक्षा करो । तुम्हारे लिये यही सबसे महान् कार्य है ' ॥ १४ ॥
इत्यहं तस्य वचनं श्रुत्वा परमदुर्मनाः ।
निश्चयं नाधिगच्छामि कर्तव्यस्येतरस्य च ॥ १५ ॥
दूतका यह वचन सुनकर मेरा मन उदास हो गया । मैं कर्तव्य और अकर्तव्यके विषयमें कोई निश्चय नहीं कर पाता था ॥ १५ ॥
सात्यकिं बलदेवं च प्रद्युम्नं च महारथम् ।
जगर्हे मनसा वीर तच्छ्रुत्वा महदप्रियम् ॥ १६ ॥
वीर युधिष्ठिर! वह महान् अप्रिय वृत्तान्त सुनकर मैं मन- ही- मन सात्यकि, बलरामजी तथा महारथी प्रद्युम्नकी निन्दा करने लगा ॥ १६ ॥
अहं हि द्वारकायाश्च पितुश्च कुरुनन्दन ।
तेषु रक्षां समाधाय प्रयातः सौभपातने ॥ १७ ॥
कुरुनन्दन! मैं द्वारका तथा पिताजीकी रक्षाका भार उन्हीं लोगोंपर रखकर सौभविमानका नाश करनेके लिये चला था ॥ १७ ॥
बलदेवो महाबाहुः कच्चिज्जीवति शत्रुहा ।
सात्यकी रौक्मिणेयश्च चारुदेष्णश्च वीर्यवान् ॥ १८ ॥
साम्बप्रभृतयश्चैवेत्यहमासं सुदुर्मनाः ।
एतेषु हि नरव्याघ्र जीवत्सु न कथंचन ॥ १ ९ ॥
शक्यः शूरसुतो हन्तुमपि वज्रभृता स्वयम् ।
हतः शूरसुतो व्यक्तं व्यक्तं चैते परासवः ॥ २० ॥
बलदेवमुखाः सर्व इति मे निश्चिता मतिः ।
सोऽहं सर्वविनाशं तं चिन्तयानो मुहुर्मुहुः ।
अविह्वलो महाराज पुनः शाल्वमयोधयम् ॥ २१ ॥
क्या शत्रुहन्ता महाबली बलरामजी जीवित हैं? क्या सात्यकि, रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न, महाबली चारुदेष्ण तथा साम्ब आदि जीवन धारण करते हैं? इन बातोंका विचार करते-करते मेरा मन बहुत उदास हो गया । नरश्रेष्ठ! इन वीरोंके जीते - जी साक्षात् इन्द्र भी मेरे पिता वसुदेवजीको किसी प्रकार मार नहीं सकते थे । अवश्य ही शूरनन्दन वसुदेवजी मारे गये और यह भी स्पष्ट है कि बलरामजी आदि सभी प्रमुख वीर प्राणत्याग कर चुके हैं - यह मेरा
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निश्चित विचार हो गया । महाराज! इस प्रकार सबके विनाशका बारंबार चिन्तन करके भी मैं व्याकुल न होकर राजा शाल्वसे पुनः युद्ध करने लगा ॥ १८–२१ ॥
ततोऽपश्यं महाराज प्रपतन्तमहं तदा ।
सौभाच्छूरसुतं वीर ततो मां मोह आविशत् ॥ २२ ॥
वीर महाराज! इसी समय मैंने देखा, सौभविमानसे मेरे पिता वसुदेवजी नीचे गिर रहे हैं । इससे शाल्वकी मायासे मुझे मूर्च्छा- सी आ गयी ॥ २२ ॥
तस्य रूपं प्रपततः पितुर्मम नराधिप ।
ययातेः क्षीणपुण्यस्य स्वर्गादिव महीतलम् ॥ २३ ॥
नरेश्वर! उस विमानसे गिरते हुए मेरे पिताका स्वरूप ऐसा जान पड़ता था, मानो पुण्यक्षय होनेपर स्वर्गसे पृथ्वीतलपर गिरनेवाले राजा ययातिका शरीर हो ॥ २३ ॥
विशीर्णमलिनोष्णीषः प्रकीर्णाम्बरमूर्धजः ।
प्रपतन् दृश्यते ह स्म क्षीणपुण्य इव ग्रहः ॥ २४ ॥
उनकी मलिन पगड़ी बिखर गयी थी, शरीरके वस्त्र अस्त - व्यस्त हो गये थे और बाल बिखर गये थे । वे गिरते समय पुण्यहीन ग्रहकी भाँति दिखायी देते थे ॥ २४ ॥
ततः शार्ङ्गं धनुःश्रेष्ठं करात् प्रपतितं मम ।
मोहापन्नश्च कौन्तेय रथोपस्थ उपाविशम् ॥ २५ ॥
कुन्तीनन्दन! उनकी यह अवस्था देख धनुषोंमें श्रेष्ठ शार्ङ्ग मेरे हाथसे छूटकर गिर गया और मैं शाल्वकी मायासे मोहित- सा होकर रथके पिछले भागमें चुपचाप बैठ गया ॥ २५ ॥
ततो हाहाकृतं सर्वं सैन्यं मे गतचेतनम् ।
मां दृष्ट्वा रथनीडस्थं गतासुमिव भारत ॥ २६ ॥
भारत! फिर तो मुझे रथके पिछले भागमें प्राणरहितके समान पड़ा देख मेरी सारी सेना
हाहाकार कर उठी । सबकी चेतना लुप्त सी हो गयी ॥ २६ ॥
प्रसार्य बाहू पततः प्रसार्य चरणावपि ।
रूपं पितुर्मे विबभौ शकुनेः पततो यथा ॥ २७ ॥
हाथों और पैरोंको फैलाकर गिरते हुए मेरे पिताका शरीर मरकर गिरनेवाले पक्षीके समान जान पड़ता था ॥ २७ ॥
तं पतन्तं महाबाहो शूलपट्टिशपाणयः ।
अभिघ्नन्तो भृशं वीर मम चेतो ह्यकम्पयन् ॥ २८ ॥
वीरवर महाबाहो! गिरते समय शत्रु सैनिक हाथोंमें शूल और पट्टिश लिये उनके ऊपर बारंबार प्रहार कर रहे थे । उनके इस क्रूर कृत्यने मेरे हृदयको कम्पित- सा कर दिया ॥ २८ ॥
ततो मुहूर्तात् प्रतिलभ्य संज्ञा- महं तदा वीर महाविमर्दे ।
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न तत्र सौभं न रिपुं च शाल्वं पश्यामि वृद्धं पितरं न चापि ॥ २ ९ ॥ वीरवर! तदनन्तर दो घड़ीके बाद जब मैं सचेत होकर देखता हूँ, तब उस महासमरमें न तो सौभविमानका पता है, न मेरा शत्रु शाल्व ही दिखायी देता है और न मेरे बूढ़े पिता ही दृष्टिगोचर होते हैं ॥ २ ९ ॥
ततो ममासीन्मनसि मायेयमिति निश्चितम् ।
प्रबुद्धोऽस्मि ततो भूयः शतशोऽवाकिरं शरान् ॥ ३० ॥
तब मेरे मनमें यह निश्चय हो गया कि यह वास्तवमें माया ही थी । तब मैंने सजग होकर सैकड़ों बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ की ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि सौभवधोपाख्याने एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें सौभवधोपाख्यानविषयक इक्कीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २१ ॥