श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 191–200
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 191–200
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धारा बह रही थी और वे वियोगके भयसे भीत हो हा नाथ! हा धर्म! इस प्रकार पुकारते हुए कह रहे थे — ‘ कुरुवंशके श्रेष्ठ अधिपति, प्रजाजनोंपर पिताका- सा स्नेह रखनेवाले धर्मराज युधिष्ठिर हम सब पुत्रों, पुरवासियों तथा समस्त देशवासियोंको छोड़कर अब कहाँ चले जा रहे हैं? ॥ ८ - ९ ॥ धिग् धार्तराष्ट्रं सुनृशंसबुद्धिं धिक् सौबलं पापमतिं च कर्णम् । अनर्थमिच्छन्ति नरेन्द्र पापा ये धर्मनित्यस्य सतस्तवैवम् ॥ १० ॥
'क्रूरबुद्धि धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनको धिक्कार है । सुबलपुत्र शकुनि तथा पापपूर्ण विचार रखनेवाले कर्णको भी धिक्कार है, जो पापी सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले आपका इस प्रकार अनर्थ करना चाहते हैं ॥ १० ॥
स्वयं निवेश्याप्रतिमं महात्मा पुरं महादेवपुरप्रकाशम् । शतक्रतुप्रस्थममेयकर्मा हित्वा प्रयातः क्व नु धर्मराजः ॥ ११ ॥
‘ जिन महात्माने स्वयं ही पुरुषार्थ करके महादेवजीके नगर कैलासकी - सी सुषमावाले अनुपम इन्द्रप्रस्थ नामक नगरको बसाया था, वे अचिन्त्यकर्मा धर्मराज युधिष्ठिर अपनी उस पुरीको छोड़कर अब कहाँ जा रहे हैं? ॥ ११ ॥
चकार यामप्रतिमां महात्मा सभां मयो देवसभाप्रकाशाम् । तां देवगुप्तामिव देवमायां हित्वा प्रयातः क्व नु धर्मराजः ॥ १२ ॥
‘ महामना मयदानवने देवताओंकी सभाके समान सुशोभित होनेवाली जिस अनुपम सभाका निर्माण किया था, देवताओंद्वारा रक्षित देवमायाके समान उस सभाका परित्याग करके धर्मराज युधिष्ठिर कहाँ चले जा रहे हैं?' ॥ १२ ॥
तान् धर्मकामार्थविदुत्तमौजा बीभत्सुरुच्चैः सहितानुवाच । आदास्यते वासमिमं निरुष्य वनेषु राजा द्विषतां यशांसि ॥ १३ ॥
धर्म, अर्थ और कामके ज्ञाता उत्तम पराक्रमी अर्जुनने उन सब प्रजाजनोंको सम्बोधित करके उच्च स्वरसे कहा - ' राजा युधिष्ठिर इस वनवासकी अवधि पूर्ण करके शत्रुओंका यश छीन लेंगे ॥ १३ ॥
द्विजातिमुख्याः सहिताः पृथक् च
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भवद्भिरासाद्य तपस्विनश्च । प्रसाद्य धर्मार्थविदश्च वाच्या यथार्थसिद्धिः परमा भवेन्नः ॥ १४ ॥
‘ आपलोग एक साथ या अलग- अलग श्रेष्ठ ब्राह्मणों, तपस्वियों तथा धर्म - अर्थके ज्ञाता महापुरुषोंको प्रसन्न करके उन सबसे यह प्रार्थना करें, जिससे हमलोगोंके अभीष्ट मनोरथकी उत्तम सिद्धि हो ' ॥ १४ ॥
इत्येवमुक्ते वचनेऽर्जुनेन ते ब्राह्मणाः सर्ववर्णाश्च राजन् । मुदाभ्यनन्दन् सहिताश्च चक्रुः प्रदक्षिणं धर्मभृतां वरिष्ठम् ॥ १५ ॥
राजन्! अर्जुनके ऐसा कहनेपर ब्राह्मणों तथा अन्य सब वर्णके लोगोंने एक स्वरसे प्रसन्नतापूर्वक उनकी बातका अभिनन्दन किया तथा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरकी परिक्रमा की ॥ १५ ॥
आमन्त्र्य पार्थं च वृकोदरं च धनंजयं याज्ञसेनीं यमौ च । प्रतस्थिरे राष्ट्रमपेतहर्षा युधिष्ठिरेणानुमता यथास्वम् ॥ १६ ॥
तदनन्तर सब लोग कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, द्रौपदी तथा नकुल- सहदेवसे विदा ले एवं युधिष्ठिरकी अनुमति प्राप्त करके उदास होकर अपने राष्ट्रको प्रस्थित हुए ॥ १६ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि द्वैतवनप्रवेशे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमेंद्वैतवनप्रवेशविषयक तेईसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥
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चतुर्विंशोऽध्यायः पाण्डवोंका द्वैतवनमें जाना वैशम्पायन उवाच
ततस्तेषु प्रयातेषु कौन्तेयः सत्यसंगरः ।
अभ्यभाषत धर्मात्मा भ्रातॄन् सर्वान् युधिष्ठिरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर प्रजाजनोंके चले जानेपर सत्यप्रतिज्ञ एवं धर्मात्मा कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने अपने सब भाइयों से कहा- ॥ १ ॥
द्वादशेमानि वर्षाणि वस्तव्यं निर्जने वने ।
समीक्षध्वं महारण्ये देशं बहुमृगद्विजम् ॥ २ ॥
‘ हमलोगोंको इन आगामी बारह वर्षोंतक निर्जन वनमें निवास करना है, अतः इस महान् वनमें कोई ऐसा स्थान ढूँढो, जहाँ बहुत- से पशु- पक्षी निवास करते हों ॥ २ ॥
बहुपुष्पफलं रम्यं शिवं पुण्यजनावृतम् ।
यत्रेमाः शरदः सर्वाः सुखं प्रतिवसेमहि ॥ ३ ॥
'जहाँ फल--फूलोंकी अधिकता हो, जो देखनेमें रमणीय एवं कल्याणकारी हो तथा जहाँ बहुत - से पुण्यात्मा पुरुष रहते हों । वह स्थान इस योग्य होना चाहिये, जहाँ हम सब लोग इन बारह वर्षोंतक सुखपूर्वक रह सकें ' ॥ ३ ॥
एवमुक्ते प्रत्युवाच धर्मराजं धनंजयः ।
गुरुवन्मानवगुरुं मानयित्वा मनस्विनम् ॥ ४ ॥
धर्मराजके ऐसा कहनेपर अर्जुनने उन मनस्वी मानवगुरु युधिष्ठिरका गुरुतुल्य सम्मान करके उनसे इस प्रकार कहा ॥ ४ ॥
अर्जुनउवाच
भवानेव महर्षीणां वृद्धानां पर्युपासिता ।
अज्ञातं मानुषे लोके भवतो नास्ति किंचन ॥ ५ ॥
अर्जुन बोले — आर्य! आप स्वयं ही बड़े-बड़े ऋषियों तथा वृद्ध पुरुषोंका संग करनेवाले हैं । इस मनुष्यलोकमें कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो ॥ ५ ॥
त्वया ह्युपासिता नित्यं ब्राह्मणा भरतर्षभ ।
द्वैपायनप्रभृतयो नारदश्च महातपाः ॥ ६ ॥
भरतश्रेष्ठ! आपने सदा द्वैपायन आदि बहुत - से ब्राह्मणों तथा महातपस्वी नारदजीकी उपासना की है ॥ ६ ॥
यः सर्वलोकद्वाराणि नित्यं संचरते वशी ।
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देवलोकाद् ब्रह्मलोकं गन्धर्वाप्सरसामपि ॥ ७ ॥
जो मन और इन्द्रियोंको वशमें रखकर सदा सम्पूर्ण लोकोंमें विचरते रहते हैं । देवलोकसे लेकर ब्रह्मलोक तथा गन्धर्वों और अप्सराओंके लोकोंमें भी उनकी पहुँच है ॥ ७ ॥
अनुभावांश्च जानासि ब्राह्मणानां न संशयः ।
प्रभावांश्चैव वेत्थ त्वं सर्वेषामेव पार्थिव ॥ ८ ॥
राजन्! आप सभी ब्राह्मणोंके अनुभाव और प्रभावको जानते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ८ ॥
त्वमेव राजन् जानासि श्रेयःकारणमेव च ।
यत्रेच्छसि महाराज निवासं तत्र कुर्महे ॥ ९ ॥
राजन्! आप ही श्रेय ( मोक्ष ) - के कारणका ज्ञान रखते हैं । महाराज! आपकी जहाँ इच्छा हो वहीं हमलोग निवास करेंगे ॥ ९ ॥
इदं द्वैतवनं नाम सरः पुण्यजलोचितम् ।
बहुपुष्पफलं रम्यं नानाद्विजनिषेवितम् ॥ १० ॥
यह जो पवित्र जलसे भरा हुआ सरोवर है, इसका नाम द्वैतवन है। यहाँ फल और फूलोंकी बहुलता है । देखनेमें यह स्थान रमणीय तथा अनेक ब्राह्मणोंसे सेवित है ॥ १० ॥
अत्रेमा द्वादश समा विहरेमेति रोचये ।
यदि तेऽनुमतं राजन् किमन्यन्मन्यते भवान् ॥ ११ ॥
मेरी इच्छा है कि यहीं हमलोग इन बारह वर्षोंतक निवास करें । राजन्! यदि आपकी अनुमति हो तो द्वैतवनके समीप रहा जाय । अथवा आप दूसरे किस स्थानको उत्तम मानते हैं ॥ ११ ॥
युधिष्ठिर उवाच
ममाप्येतन्मतं पार्थ त्वया यत् समुदाहृतम् ।
गच्छामः पुण्यविख्यातं महद् द्वैतवनं सरः ॥ १२ ॥
युधिष्ठिरने कहा — पार्थ! तुमने जैसा बताया है, वही मेरा भी मत है । हमलोग पवित्र जलके कारण प्रसिद्ध द्वैतवन नामक विशाल सरोवरके समीप चलें ॥ १२ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततस्ते प्रययुः सर्वे पाण्डवा धर्मचारिणः ।
ब्राह्मणैर्बहुभिः सार्धं पुण्यं द्वैतवनं सरः ॥ १३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर वे सभी धर्मात्मा पाण्डव बहुत- से ब्राह्मणोंके साथ पवित्र द्वैतवन नामक सरोवरको चले गये ॥ १३ ॥
ब्राह्मणाः साग्निहोत्राश्च तथैव च निरग्नयः ।
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स्वाध्यायिनो भिक्षवश्च तथैव वनवासिनः ॥ १४ ॥
बहवो ब्राह्मणास्तत्र परिवव्रुर्युधिष्ठिरम् ।
तपःसिद्धा महात्मानः शतशः संशितव्रताः ॥ १५ ॥
वहाँ बहुतस-- से अग्निहोत्री ब्राह्मणों, निरग्निकों, स्वाध्यायपरायण ब्रह्मचारियों, वानप्रस्थियों, संन्यासियों, सैकड़ों कठोर व्रतका पालन करनेवाले तपःसिद्ध महात्माओं तथा अन्य अनेक ब्राह्मणोंने महाराज युधिष्ठिरको घेर लिया ॥ १४-१५ ॥
ते यात्वा पाण्डवास्तत्र ब्राह्मणैर्बहुभिः सह ।
पुण्यं द्वैतवनं रम्यं विविशुर्भरतर्षभाः ॥ १६ ॥
वहाँ पहुँचकर भरतश्रेष्ठ पाण्डवोंने बहुत से ब्राह्मणोंके साथ पवित्र एवं रमणीय द्वैतवनमें प्रवेश किया ॥ १६ ॥
तमालतालाम्रमधूकनीप- कदम्बसर्जार्जुनकर्णिकारैः । तपात्यये पुष्पधरैरुपेतं महावनं राष्ट्रपतिर्ददर्श ॥ १७ ॥
राष्ट्रपति युधिष्ठिरने देखा, वह महान् वन तमाल, ताल, आम, महुआ, नीप, कदम्ब, साल, अर्जुन और कनेर आदि वृक्षोंसे, जो ग्रीष्म ऋतु बीतनेपर फूल धारण करते हैं, सम्पन्न है ॥ १७ ॥
महाद्रुमाणां शिखरेषु तस्थु- र्मनोरमां वाचमुदीरयन्तः ।
मयूरदात्यूहचकोरसङ्घा- स्तस्मिन् वने बर्हिणकोकिलाश्च ॥ १८ ॥
उस वनमें बड़े -बड़े वृक्षोंकी ऊँची शाखाओं पर मयूर, चातक, चकोर, बर्हिण तथा कोकिल आदि पक्षी मनको भानेवाली मीठी बोली बोलते हुए बैठे थे ॥ १८ ॥
करेणुयूथैः सह यूथपानां मदोत्कटानामचलप्रभाणाम् । महान्ति यूथानि महाद्विपानां तस्मिन् वने राष्ट्रपतिर्ददर्श ॥ १ ९ ॥ राष्ट्रपति युधिष्ठिरको उस वनमें पर्वतोंके समान प्रतीत होनेवाले मदोन्मत्त गजराजोंके, जो एक- एक यूथके अधिपति थे, हथिनियोंके साथ विचरनेवाले कितने ही भारी - भारी झुंड दिखायी दिये ॥ १ ९ ॥ मनोरमां भोगवतीमुपेत्य पूतात्मनां चीरजटाधराणाम् । तस्मिन् वने धर्मभृतां निवासे
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ददर्श सिद्धर्षिगणाननेकान् ॥ २० ॥
मनोरम भोगवती ( सरस्वती ) नदीमें स्नान करके जिनके अन्तःकरण पवित्र हो गये हैं, जो वल्कल और जटा धारण करते हैं, ऐसे धर्मात्माओंके निवासभूत उस वनमें राजाने सिद्धमहर्षियोंके अनेक समुदाय देखे ॥ २० ॥
ततः स यानादवरुह्य राजा
_सभ्रातृकः सजनः काननं तत् ।
विवेश धर्मात्मवतां वरिष्ठ- स्त्रिविष्टपं शक्र इवामितौजाः ॥ २१ ॥
तदनन्तर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ एवं अमित तेजस्वी राजा युधिष्ठिरने अपने सेवकों और भाइयोंसहित रथसे उतरकर स्वर्गमें इन्द्रके समान उस वनमें प्रवेश किया ॥ २१ ॥
तं सत्यसंधं सहसाभिपेतु- र्दिदृक्षवश्चारणसिद्धसङ्घाः । वनौकसश्चापि नरेन्द्रसिंहं मनस्विनं तं परिवार्य तस्थुः ॥ २२ ॥
उस समय उन सत्यप्रतिज्ञ मनस्वी राजसिंह युधिष्ठिरको देखनेकी इच्छासे सहसा बहुत- से चारण, सिद्ध एवं वनवासी महर्षि आये और उन्हें घेरकर खड़े हो गये ॥ २२ ॥
स तत्र सिद्धानभिवाद्य सर्वान् प्रत्यर्चितो राजवद् देववच्च । विवेश सर्वैः सहितो द्विजाग्रयैः कृताञ्जलिर्धर्मभृतां वरिष्ठः ॥ २३ ॥
वहाँ आये हुए समस्त सिद्धोंको प्रणाम करके धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर उनके द्वारा भी राजा तथा देवताके समान पूजित हुए एवं दोनों हाथ जोड़कर उन्होंने उन समस्त श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके साथ वनके भीतर पदार्पण किया ॥ २३ ॥
स पुण्यशीलः पितृवन्महात्मा तपस्विभिर्धर्मपरैरुपेत्य । प्रत्यर्चितः पुष्पधरस्य मूले महाद्रुमस्योपविवेश राजा ॥ २४ ॥
उस वनमें रहनेवाले धर्मपरायण तपस्वियोंने उन पुण्यशील महात्मा राजाके पास जाकर उनका पिताकी भाँति सम्मान किया । तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिर फूलोंसे लदे हुए एक महान् वृक्षके नीचे उसकी जड़के समीप बैठे ॥ २४ ॥
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भीमश्च कृष्णा च धनंजयश्च यमौ च ते चानुचरा नरेन्द्रम् । विमुच्य वाहानवशाश्च सर्वे तत्रोपतस्थुर्भरतप्रबर्हाः ॥ २५ ॥
तदनन्तर पराधीन - दशामें पड़े हुए भीम, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा सेवकगण सवारी छोड़कर उतर गये । वे सभी भरतश्रेष्ठ वीर महाराज युधिष्ठिरके समीप जा बैठे ॥ २५ ॥
लतावतानावनतः स पाण्डवै- र्महाद्रुमः पञ्चभिरेव धन्विभिः ।
बभौ निवासोपगतैर्महात्मभि- र्महागिरिर्वारणयूथपैरिव ॥ २६ ॥
जैसे महान् पर्वत यूथपति गजराजोंसे सुशोभित होता है, उसी प्रकार, लतासमूहसे झुका हुआ वह महान् वृक्ष वहाँ निवासके लिये आये हुए पाँच धनुर्धर महात्मा पाण्डवोंद्वारा शोभा पाने लगा ॥ २६ ॥
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि द्वैतवनप्रवेशे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें द्वैतवनप्रवेशविषयक चौबीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २४ ॥
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पञ्चविंशोऽध्यायः महर्षि मार्कण्डेयका पाण्डवोंको धर्मका आदेश देकर उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान वैशम्पायन उवाच तत् काननं प्राप्य नरेन्द्रपुत्राः सुखोचिता वासमुपेत्य कृच्छ्रम् । विजहुरिन्द्रप्रतिमाः शिवेषु सरस्वतीशालवनेषु तेषु ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! सुख भोगनेके योग्य राजकुमार पाण्डव इन्द्रके समान तेजस्वी थे । वे वनवासके संकटमें पड़कर द्वैतवनमें प्रवेश करके वहाँ सरस्वतीतटवर्ती सुखद शालवनोंमें विहार करने लगे ॥ १ ॥
यतींश्च राजा स मुनींश्च सर्वां- स्तस्मिन् वने मूलफलैरुदग्रैः । द्विजातिमुख्यानृषभः कुरूणां संतर्पयामास महानुभावः ॥ २ ॥
इष्टीश्च पित्र्याणि तथा क्रियाश्च
महावने वसतां पाण्डवानाम् ।
पुरोहितस्तत्र समृद्धतेजा- श्चकार धौम्यः पितृवन्नृपाणाम् ॥ ३ ॥
कुरुश्रेष्ठ महानुभाव राजा युधिष्ठिरने उस वनमें रहनेवाले सम्पूर्ण यतियों, मुनियों और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको उत्तम फल- मूलोंके द्वारा तृप्त किया । अत्यन्त तेजस्वी पुरोहित धौम्य पिताकी भाँति उस महावनमें रहनेवाले राजकुमार पाण्डवोंके यज्ञ- याग, पितृ- श्राद्ध तथा अन्य सत्कर्म करते - कराते रहते थे ॥ २-३ ॥ अपेत्य राष्ट्राद् वसतां तु तेषा- मृषिः पुराणोऽतिथिराजगाम । तमाश्रमं तीव्रसमृद्धतेजा मार्कण्डेयः श्रीमतां पाण्डवानाम् ॥ ४ ॥
राज्यसे दूर होकर वनमें निवास करनेवाले श्रीमान् पाण्डवोंके उस आश्रमपर उद्दीप्त तेजस्वी पुरातन महर्षि मार्कण्डेयजी अतिथिके रूपमें आये ॥ ४ ॥
तमागतं ज्वलितहुताशनप्रभं
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महामनाः कुरुवृषभो युधिष्ठिरः । अपूजयत् सुरऋषिमानवार्चितं महामुनिं ह्यनुपमसत्त्ववीर्यवान् ॥ ५ ॥
उनकी अंग - कान्ति प्रज्वलित अग्निके समान उद्भासित हो रही थी । देवताओं, ऋषियों तथा मनुष्योंद्वारा पूजित महामुनि मार्कण्डेयको आया देख अनुपम धैर्य और पराक्रमसे सम्पन्न महामनस्वी कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरने उनकी यथावत् पूजा की ॥ ५ ॥
स सर्वविद् द्रौपदीं वीक्ष्य कृष्णां युधिष्ठिरं भीमसेनार्जुनौ च । संस्मृत्य रामं मनसा महात्मा तपस्विमध्येऽस्मयतामितौजाः ॥ ६ ॥
अमित तेजस्वी तथा सर्वज्ञ महात्मा मार्कण्डेयजी द्रुपदकुमारी कृष्णा, युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन ( और नकुल सहदेव ) - को देखकर मन-ही- मन श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके तपस्वियोंके बीचमें मुसकराने लगे ॥ ६ ॥
तं धर्मराजो विमना इवाब्रवीत्
सर्वे ह्रिया सन्ति तपस्विनोऽमी ।
भवानिदं किं स्मयतीव हृष्ट- स्तपस्विनां पश्यतां मामुदीक्ष्य ॥ ७ ॥
तब धर्मराज युधिष्ठिरने उदासीन से होकर पूछा- ' मुने! ये सब तपस्वी तो मेरी अवस्था देखकर कुछ संकुचित- से हो रहे हैं, परंतु क्या कारण है कि आप इन सब महात्माओंके सामने मेरी ओर देखकर प्रसन्नतापूर्वक यों मुसकराते से दिखायी देते हैं? ' ॥ ७ ॥
मार्कण्डेय उवाच न तात हृष्यामि न च स्मयामि प्रहर्षजो मां भजते न दर्पः । तवापदं त्वद्य समीक्ष्य रामं सत्यव्रतं दाशरथिं स्मरामि ॥ ८ ॥
मार्कण्डेयजी बोले – तात! न तो मैं हर्षित होता हूँ और न मुसकराता ही हूँ । हर्षजनित अभिमान कभी मेरा स्पर्श नहीं कर सकता । आज तुम्हारी यह विपत्ति देखकर मुझे सत्यप्रतिज्ञ दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण हो आया ॥ ८ ॥
स चापि राजा सह लक्ष्मणेन वने निवासं पितुरेव शासनात् । धन्वी चरन् पार्थ मयैव दृष्टो