02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 1811–1820

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1811–1820

पृष्ठ 1811

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कथं ह्यनुचरान् हित्वा शत्रुमध्ये पलायसे ॥ ५ ९ ॥ ' राजकुमार! लौटो, तुम्हें पीठ दिखाकर भागना शोभा नहीं देता । अपने सेवकोंको शत्रुओंके बीचमें छोड़कर कैसे भागे जा रहे हो? क्या इसी बलसे तुम दूसरेकी स्त्रीको बलपूर्वक हरकर ले जाना चाहते थे? ' ॥ ५८-५९ ॥ इत्युच्यमानः पार्थेन सैन्धवो न न्यवर्तत ।

तिष्ठ तिष्ठेति तं भीमः सहसाभ्यद्रवद् बली ।

मावधीरिति पार्थस्तं दयावान् प्रत्यभाषत ॥ ६० ॥

अर्जुनके इस प्रकार ताने देनेपर भी सिन्धुराज नहीं लौटा, तब महाबली भीम ' ठहरो, ठहरो ' कहते हुए सहसा उसके पीछे दौड़े । उस समय दयालु अर्जुनने उनसे कहा — ‘ भैया! इसकी जान न मारना ' ॥ ६० ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीहरणपर्वणि जयद्रथपलायने एकसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीहरणपर्वमें जयद्रथपलायनविषयक दोसौ इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७१ ॥

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(जयद्रथविमोक्षणपर्व) द्विसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन वैशम्पायन उवाच

जयद्रथस्तु सम्प्रेक्ष्य भ्रातरावुद्यतावुभौ ।

प्राधावत् तूर्णमव्यग्रो जीवितेप्सुः सुदुःखितः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! भीम और अर्जुन दोनों भाइयोंको अपने बधके लिये तुले हुए देख जयद्रथ बहुत दुःखी हुआ और घबराहट छोड़कर प्राण बचानेकी इच्छासे तुरंत तीव्र गतिसे भागने लगा ॥ १ ॥

तं भीमसेनो धावन्तमवतीर्य रथाद् बली ।

अभिद्रुत्य निजग्राह केशपक्षे ह्यमर्षणः ॥ २ ॥

उसे भागता देख अमर्षमें भरे हुए महाबली भीम भी रथसे उतर गये और बड़े वेगसे दौड़कर उन्होंने उसके केश पकड़ लिये ॥ २ ॥

समुद्यम्य च तं भीमो निष्पिपेष महीतले ।

शिरो गृहीत्वा राजानं ताडयामास चैव ह ॥ ३ ॥

तत्पश्चात् भीमने उसे ऊपर उठाकर धरतीपर पटक दिया और उसे रौंदने लगे । फिर उन्होंने राजा जयद्रथका सिर पकड़कर उसे कई थप्पड़ लगाये ॥ ३ ॥

पुनः संजीवमानस्य तस्योत्पतितुमिच्छतः ।

पदा मूर्ध्नि महाबाहुः प्राहरद् विलपिष्यतः ॥ ४ ॥

तस्य जानू ददौ भीमो जघ्ने चैनमरत्निना ।

स मोहमगमद् राजा प्रहारवरपीडितः ॥ ५ ॥

इतनी मार खाकर भी वह अभी जीवित ही था और उठनेकी इच्छा कर रहा था । इसी समय महाबाहु भीमने उसके मस्तकपर एक लात मारी । इससे वह रोने - चिल्लाने लगा, तो

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भी भीमसेनने उसे गिराकर उसके शरीरपर अपने दोनों घुटने रख दिये और उसे घूँसोंसे मारने लगे । इस प्रकार बड़े जोरकी मार पड़नेसे पीड़ाके मारे राजा जयद्रथ मूर्छित हो गया ॥ ४-५ ||

सरोषं भीमसेनं तुतु वारयामास फाल्गुनः ।

दुःशलायाः कृते राजा यत् तदाहेति कौरव ॥ ६ ॥

इतनेपर भी भीमसेनका क्रोध कम नहीं हुआ । यह देख अर्जुनने उन्हें रोका और कहा –' कुरुनन्दन! दुःशलाके वैधव्यका खयाल करके महाराजने जो आज्ञा दी थी, उसका भी तो विचार कीजिये ' ॥ ६ ॥

भीमसेन उवाच

नायं पापसमाचारो मत्तो जीवितुमर्हति ।

कृष्णायास्तदनर्हायाः परिक्लेष्टा नराधमः ॥ ७ ॥

भीमसेनने कहा – इस नराधमने क्लेश पानेके अयोग्य द्रौपदीको कष्ट पहुँचाया है; अतः अब मेरे हाथसे इस पापाचारी जयद्रथका जीवित रहना ठीक नहीं है ॥ ७ ॥

किं नु शक्यं मया कर्तुं यद् राजा सततं घृणी ।

त्वं च बालिशया बुद्धया सदैवास्मान् प्रबाधसे ॥ ८ ॥

परंतु मैं क्या कर सकता हूँ? राजा युधिष्ठिर सदा दयालु ही बने रहते हैं और तुम भी अपनी बालबुद्धिके कारण मेरे ऐसे कामोंमें सदा बाधा पहुँचाया करते हो ॥ ८ ॥

एवमुक्त्वा सटास्तस्य पञ्च चक्रे वृकोदरः ।

अर्धचन्द्रेण बाणेन किंचिदब्रुवतस्तदा ॥ ९ ॥

ऐसा कहकर भीमने जयद्रथके लम्बे - लम्बे बालोंको अर्द्धचन्द्राकार बाणसे मूँड़कर पाँच चोटियाँ रख दीं । उस समय वह भयके मारे कुछ भी बोल नहीं पाता था ॥ ९ ॥

विकत्थयित्वा राजानं ततः प्राह वृकोदरः ।

जीवितुं चेच्छसे मूढ हेतुं मे गदतः शृणु ॥ १० ॥

तदनन्तर कटुवचनोंसे सिन्धुराजका तिरस्कार करते हुए भीमने उससे कहा — ‘ अरे मूढ़! यदि तू जीवित रहना चाहता है तो जीवनरक्षाका हेतुभूत मेरा यह वचन सुन ॥ १० ॥

दासोऽस्मीति तथा वाच्यं संसत्सु च सभासु च ।

एवं ते जीवितं दद्यामेष युद्धजितो विधिः ॥ ११ ॥

' तू राजाओंकी सभा - समितियोंमें जाकर सदा अपनेको ( महाराज युधिष्ठिरका ) दास बताया कर । यह शर्त स्वीकार हो, तो तुझे जीवन- दान दे सकता हूँ। युद्धमें विजयी पुरुषकी ओरसे हारे हुएके लिये ऐसा ही विधान है ' ॥ ११ ॥

एवमस्त्विति तं राजा कृष्यमाणो जयद्रथः ।

पृष्ठ 1814

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प्रोवाच पुरुषव्याघ्रं भीममाहवशोभिनम् ॥ १२ ॥

उस समय सिन्धुराज जयद्रथ धरतीपर घसीटा जा रहा था । उसने उपर्युक्त शर्त स्वीकार कर ली और युद्धमें शोभा पानेवाले पुरुषसिंह भीमसेनसे अपनी स्वीकृति स्पष्ट बता दी ॥ १२ ॥

तत एनं विचेष्टन्तं बद्ध्वा पार्थो वृकोदरः ।

रथमारोपयामास विसंज्ञं पांसुगुण्ठितम् ॥ १३ ॥

तदनन्तर वह उठनेकी चेष्टा करने लगा । तब कुन्तीकुमार वृकोदरने उसे बाँधकर रथपर डाल दिया । वह बेचारा धूलसे लथपथ और अचेत हो रहा था ॥

ततस्तं रथमास्थाय भीमः पार्थानुगस्तदा ।

अभ्येत्याश्रममध्यस्थमभ्यगच्छद् युधिष्ठिरम् ॥ १४ ॥

उसे रथपर चढ़ाकर आगे- आगे भीम चले और पीछे - पीछे अर्जुन । आश्रमपर आकर भीमसेन वहाँ मध्यभागमें बैठे हुए राजा युधिष्ठिरके पास गये ॥ १४ ॥

दर्शयामास भीमस्तु तदवस्थं जयद्रथम् ।

तं राजा प्राहसद् दृष्ट्वा मुच्यतामिति चाब्रवीत् ॥ १५ ॥

भीमने उसी अवस्थामें जयद्रथको महाराजके सामने उपस्थित किया । उसे देखकर राजा युधिष्ठिर जोर- जोरसे हँसने लगे और बोले— ' अब इसे छोड़ दो ' ॥ १५ ॥

राजानं चाब्रवीद् भीमो द्रौपद्याः कथ्यतामिति ।

दासभावगतो ह्येष पाण्डूनां पापचेतनः ॥ १६ ॥

तब भीमसेनने भी राजासे कहा- ' आप द्रौपदीको यह सूचित कर दीजिये कि यह पापात्मा जयद्रथ पाण्डवोंका दास हो चुका है ' ॥ १६ ॥

तमुवाच ततो ज्येष्ठो भ्राता सप्रणयं वचः ।

मुञ्चैनमधमाचारं प्रमाणा यदि ते वयम् ॥ १७ ॥

तब बड़े भाई युधिष्ठिरने प्रेमपूर्वक भीमसेनसे कहा - ' यदि तुम मेरी बात मानते हो तो इस पापाचारीको छोड़ दो ' ॥ १७ ॥

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द्रौपदी चाब्रवीद् भीममभिप्रेक्ष्य युधिष्ठिरम् ।

दासोऽयं मुच्यतां राज्ञस्त्वया पञ्चसटः कृतः ॥ १८ ॥

उस समय द्रौपदीने भी युधिष्ठिरकी ओर देखकर भीमसेनसे कहा - ‘ आपने इसका सिर मूँड़कर पाँच चोटियाँ रख दी हैं तथा यह महाराजका दास हो गया है; अतः अब इसे छोड़ दीजिये ' ॥ १८ ॥

स मुक्तोऽभ्येत्य राजानमभिवाद्य युधिष्ठिरम् ।

ववन्दे विह्वलो राजंस्तांश्च दृष्ट्वा मुनींस्तदा ॥ १ ९ ॥

राजन्! तब जयद्रथ बन्धनसे मुक्त कर दिया गया। उसने विह्वल होकर राजा युधिष्ठिरके पास जा उन्हें प्रणाम करनेके पश्चात् वहाँ बैठे हुए अन्यान्य मुनियोंको भी देखकर उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया ॥ १ ९ ॥

तमुवाच घृणी राजा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।

तथा जयद्रथं दृष्ट्वा गृहीतं सव्यसाचिना ॥ २० ॥

उस समय ( आदर देते हुए ) अर्जुनने जयद्रथका हाथ थाम लिया । तब दयालु राजा धर्मपुत्र युधिष्ठिरने जयद्रथकी ओर देखकर कहा— ॥ २० ॥

अदासो गच्छ मुक्तोऽसि मैवं कार्षीः पुनः क्वचित् ।

स्त्रीकामं वा धिगस्तु त्वां क्षुद्रः क्षुद्रसहायवान् ॥ २१ ॥

एवंविधं हि कः कुर्यात् त्वदन्यः पुरुषाधमः ।

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( कर्म धर्मविरुद्धं वै लोकदुष्टं च कर्म ते । ) ‘ सिंधुराज! अब तू दास नहीं रहा, जा, तूझे छोड़ दिया गया है । फिर कभी ऐसा काम न करना । अरे! तू परायी स्त्रीकी इच्छा करता है, तुझे धिक्कार है! तू स्वयं तो नीच है ही तेरे सहायक भी अधम हैं । तेरे सिवा दूसरा कौन ऐसा नराधम है जो ऐसा धर्मविरुद्ध कार्य कर सके? तेरा यह कर्म सम्पूर्ण लोकमें निन्दित है ' ॥ २१ ॥

गतसत्त्वमिव ज्ञात्वा कर्तारमशुभस्य तम् ॥ २२ ॥

सम्प्रेक्ष्य भरतश्रेष्ठः कृपां चक्रे नराधिपः ।

धर्मे ते वर्धतां बुद्धिर्मा चाधर्मे मनः कृथाः ॥ २३ ॥

साश्वः सरथपादातः स्वस्ति गच्छ जयद्रथ । वह अशुभ कर्म करनेवाला जयद्रथ मृतप्राय-सा हो गया है, यह देख और समझकर भरतश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने उसपर कृपा की और कहा - ' तेरी बुद्धि धर्ममें उत्तरोत्तर बढ़ती रहे, तू कभी अधर्ममें मन न लगाना । जयद्रथ! अपने रथ, घोड़े और पैदल सबको साथ लिये कुशलपूर्वक चला जा ' ॥ २२-२३३ ॥ एवमुक्तस्तु सव्रीडं तूष्णीं किंचिदवाङ्मुखः ॥ २४ ॥

जगाम राजन् दुःखार्तो गङ्गाद्वाराय भारत ।

स देवं शरणं गत्वा विरूपाक्षमुमापतिम् ॥ २५ ॥

तपश्चचार विपुलं तस्य प्रीतो वृषध्वजः ।

बलिं स्वयं प्रत्यगृह्णात् प्रीयमाणस्त्रिलोचनः ॥ २६ ॥

राजन्! युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर जयद्रथ बहुत लज्जित हुआ और नीचा मुँह किये वहाँसे चुपचाप चला गया । जनमेजय! वह पराजित होनेके महान् दुःखसे पीड़ित था; अतः वहाँसे घर न जाकर गंगाद्वार ( हरिद्वार ) को चल दिया । वहाँ पहुँचकर उसने तीन नेत्रोंवाले भगवान् उमापतिकी शरण ले बड़ी भारी तपस्या की । इससे भगवान् शंकर प्रसन्न हो गये । त्रिनेत्रधारी महादेवने प्रसन्नतापूर्वक स्वयं दर्शन देकर उसकी पूजा ग्रहण की ॥ २४–२६ ॥

वरं चास्मै ददौ देवः स जग्राह च तच्छृणु ।

समस्तान् सरथान् पञ्च जयेयं युधि पाण्डवान् ॥ २७ ॥

इति राजाब्रवीद् देवं नेति देवस्तमब्रवीत् ।

अजय्यांश्चाप्यवध्यांश्च वारयिष्यसि तान् युधि ॥ २८ ॥

ऋतेऽर्जुनं महाबाहुं नरं नाम सुरेश्वरम् ।

बदर्यां तप्ततपसं नारायणसहायकम् ॥ २ ९ ॥

जनमेजय! भगवान्ने उसे वर दिया और जयद्रथने उसको ग्रहण किया । वह वर क्या था? यह बताता हूँ, सुनो — ' मैं रथसहित पाँचों पाण्डवोंको युद्धमें जीत लूँ', यही वर सिन्धुराजने महादेवजीसे माँगा। परंतु महादेवजीने उससे कहा-' ऐसा नहीं हो सकता । पाण्डव अजेय और अवध्य हैं । तुम केवल एक दिन युद्धमें महाबाहु अर्जुनको छोड़कर

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अन्य चार पाण्डवोंको आगे बढ़नेसे रोक सकते हो । देवेश्वर नर, जो बदरिकाश्रममें भगवान् नारायणके साथ रहकर तपस्या करते हैं, वे ही अर्जुन हैं ॥ २७–२९ ॥ अजितं सर्वलोकानां देवैरपि दुरासदम् ।

मया दत्तं पाशुपतं दिव्यमप्रतिमं शरम् ।

अवाप लोकपालेभ्यो वज्रादीन् स महाशरान् ॥ ३० ॥

' उन्हें तुम तो क्या, सम्पूर्ण लोक मिलकर भी जीत नहीं सकते । उनका सामना करना तो देवताओंके लिये भी कठिन है । मैंने उन्हें पाशुपत नामक दिव्य अस्त्र प्रदान किया है, जिसके जोड़का दूसरा कोई अस्त्र ही नहीं है । इसके सिवा अन्यान्य लोकपालोंसे भी उन्होंने वज्र आदि महान् अस्त्र प्राप्त किये हैं ॥ ३० ॥

देवदेवो ह्यनन्तात्मा विष्णुः सुरगुरुः प्रभुः ।

प्रधानपुरुषोऽव्यक्तो विश्वात्मा विश्वमूर्तिमान् ॥ ३१ ॥

[ ‘ अब मैं तुम्हें नरस्वरूप अर्जुनके सहायक भगवान् नारायणकी महिमा बताता हूँ, सूनो] भगवान् नारायण देवताओंके भी देवता, अनन्तस्वरूप, सर्वव्यापी, देवगुरु, सर्वसमर्थ, प्रकृति - पुरुषरूप, अव्यक्त, विश्वात्मा एवं विश्वरूप हैं ॥ ३१ ॥

युगान्तकाले सम्प्राप्ते कालाग्निर्दहते जगत् ।

पृष्ठ 1818

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सपर्वतार्णवद्वीपं सशैलवनकाननम् ॥ ३२ ॥

‘ प्रलयकाल उपस्थित होनेपर वे भगवान् विष्णु ही कालाग्निरूपसे प्रकट हो पर्वत, समुद्र, द्वीप, शैल, वन और काननोंसहित सम्पूर्ण जगत्को दग्ध कर देते हैं ॥ ३२ ॥

निर्दहन् नागलोकांश्च पातालतलचारिणः ।

अथान्तरिक्षे सुमहन्नानावर्णाः पयोधराः ॥ ३३ ॥

‘ फिर पातालतलमें विचरण करनेवाले नागलोकोंको भी वे भस्म कर डालते हैं । कालाग्निद्वारा सब कुछ भस्म हो जानेपर आकाशमें अनेक रंगके महान् मेघोंकी घोर घटा घिर आती है ॥ ३३ ॥

घोरस्वरा विनदिनस्तडिन्मालावलम्बिनः ।

समुत्तिष्ठन् दिशः सर्वा विवर्षन्तः समन्ततः ॥ ३४ ॥

' भयंकर स्वरसे गर्जना करते हुए वे बादल बिजलियोंकी मालाओंसे प्रकाशित हो सम्पूर्ण दिशाओंमें फैल जाते और सब ओर वर्षा करने लग जाते हैं ॥ ३४ ॥

ततोऽग्निं नाशयामासुः संवर्ताग्निनियामकाः ।

अक्षमात्रैश्च धाराभिस्तिष्ठन्त्यापूर्य सर्वशः ॥ ३५ ॥

‘ इससे प्रलयकालीन अग्नि बुझ जाती है । संवर्तक अग्निका नियन्त्रण करनेवाले वे महामेघ लंबे सर्पोंके समान मोटी धाराओंसे जल गिराते हुए सबको डुबो देते हैं ॥ ३५ ॥

एकार्णवे तदा तस्मिन्नुपशान्तचराचरे ।

नष्टचन्द्रार्कपवने ग्रहनक्षत्रवर्जिते ॥ ३६ ॥

‘ उस समय सम्पूर्ण दिशाओंमें पानी भर जानेसे चारों ओर एकाकार जलमय समुद्र ही दृष्टिगोचर होता है । उस एकार्णवके जलमें समस्त चराचर जगत् नष्ट हो जाता है । चन्द्रमा,

सूर्य और वायु भी विलीन हो जाते हैं । ग्रह और नक्षत्रोंका अभाव हो जाता है ॥ ३६ ॥

चतुर्युगसहस्रान्ते सलिलेनाप्लुता मही ।

ततो नारायणाख्यस्तु सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ ३७ ॥

सहस्रशीर्षा पुरुषः स्वप्तुकामस्त्वतीन्द्रियः ।

फटासहस्रविकटं शेषं पर्यङ्कभाजनम् ॥ ३८ ॥

सहस्रमिव तिग्मांशुसंघातममितद्युतिम् ।

कुन्देन्दुहारगोक्षीरमृणालकुमुदप्रभम् ॥ ३ ९ ॥

तत्रासौ भगवान् देवः स्वपञ्जलनिधौ तदा ।

नैशेन तमसा व्याप्तां स्वां रात्रिं कुरुते विभुः ॥ ४० ॥

‘ एक हजार चतुर्युगी समाप्त होनेपर उपर्युक्त एकार्णवके जलमें यह पृथ्वी डूब जाती है । तत्पश्चात् नारायण नामसे प्रसिद्ध भगवान् श्रीहरि उस एकार्णवके जलमें शयन करनेके हेतु अपने लिये निशाकालोचित अन्धकार ( तमोगुण) - से व्याप्त महारात्रिका निर्माण करते हैं । उन भगवान्के सहस्रों नेत्र, सहस्रों चरण और सहस्रों मस्तक हैं । वे अन्तर्यामी पुरुष हैं

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और इन्द्रियातीत होनेपर भी शयन करनेकी इच्छासे उन शेषनागको अपना पर्यंक बनाते हैं जो सहस्रों फणोंसे विकटाकार दिखायी देते हैं । वे शेषनाग एक सहस्र प्रचण्ड सूर्योंके समूहकी भाँति अनन्त एवं असीम प्रभा धारण करते हैं। उनकी कान्ति कुन्द- पुष्प, चन्द्रमा, मुक्ताहार, गोदुग्ध, कमलनाल तथा कुमुद- कुसुमके समान उज्ज्वल है । उन्हींकी शय्या बनाकर भगवान् श्रीहरि शयन करते हैं ॥

सत्त्वोद्रेकात् प्रबुद्धस्तु शून्यं लोकमपश्यत ।

इमं चोदाहरन्त्यत्र श्लोकं नारायणं प्रति ॥ ४१ ॥

‘तत्पश्चात् सृष्टिकालमें सत्त्वगुणके आधिक्यसे भगवान् योगनिद्रासे जाग उठे । जागनेपर उन्हें यह समस्त लोक सूना दिखायी दिया । महर्षिगण भगवान् नारायणके सम्बन्धमें यहाँ इस श्लोकका उदाहरण दिया करते हैं- ॥ ४१ ॥

आपो नारास्तत्तनव इत्यपां नाम शुश्रुम ।

अयनं तेन चैवास्ते तेन नारायणः स्मृतः ॥ ४२ ॥

‘ जल भगवान्का शरीर है, इसीलिये उनका नाम ' नार' सुनते आये हैं । वह नार ही उनका अयन ( गृह ) है अथवा उसके साथ एक होकर वे रहते हैं, इसीलिये उन भगवान्‌को नारायण कहा गया है ' ॥ ४२ ॥

प्रध्यानसमकालं तु प्रजाहेतोः सनातनः ।

ध्यातमात्रे तु भगवन्नाभ्यां पद्मः समुत्थितः ॥ ४३ ॥

‘ तत्पश्चात् प्रजाकी सृष्टिके लिये भगवान्‌ने चिन्तन किया । इस चिन्तनके साथ ही भगवान्की नाभिसे सनातन कमल प्रकट हुआ ॥ ४३ ॥

ततश्चतुर्मुखो ब्रह्मा नाभिपद्माद् विनिःसृतः ।

तत्रोपविष्टः सहसा पद्मे लोकपितामहः ॥ ४४ ॥

शून्यं दृष्ट्वा जगत् कृत्स्नं मानसानात्मनः समान् ।

ततो मरीचिप्रमुखान् महर्षीनसृजन्नव ॥ ४५ ॥

‘ उस नाभिकमलसे चतुर्मुख ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव हुआ। उस कमलपर बैठे हुए लोकपितामह ब्रह्माजीने सहसा सम्पूर्ण जगत्को शून्य देखकर अपने मानसपुत्रके रूपमें अपने ही - जैसे प्रभावशाली मरीचि आदि नौ महर्षियोंको उत्पन्न किया ॥ ४४-४५ ॥

तेऽसृजन् सर्वभूतानि त्रसानि स्थावराणि च ।

यक्षराक्षसभूतानि पिशाचोरगमानुषान् ॥ ४६ ॥

‘ उन महर्षियोंने स्थावर- जंगमरूप सम्पूर्ण भूतोंकी तथा यक्ष, राक्षस, भूत, पिशाच, नाग और मनुष्योंकी सृष्टि की ॥ ४६ ॥

सृज्यते ब्रह्ममूर्तिस्तु रक्षते पौरुषी तनुः ।

रौद्रीभावेन शमयेत् तिस्रोऽवस्थाः प्रजापतेः ॥ ४७ ॥

पृष्ठ 1820

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‘ ब्रह्माजीके रूपसे भगवान् सृष्टि करते हैं । परमपुरुष नारायणरूपसे इसकी रक्षा करते हैं तथा रुद्रस्वरूपसे सबका संहार करते हैं । इस प्रकार प्रजापालक भगवान्की ये तीन अवस्थाएँ हैं ॥ ४७ ॥

न श्रुतं ते सिन्धुपते विष्णोरद्भुतकर्मणः ।

कथ्यमानानि मुनिभिर्ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ॥ ४८ ॥

‘ सिन्धुराज! क्या तुमने वेदोंके पारंगत ब्रह्मर्षियोंके मुखसे अद्भुतकर्मा भगवान् विष्णुका चरित्र नहीं सुना है? ॥ ४८ ॥

जलेन समनुप्राप्ते सर्वतः पृथिवीतले ।

तदा चैकार्णवे तस्मिन्नेकाकाशे प्रभुश्चरन् ॥ ४ ९ ॥

निशायामिव खद्योतः प्रावृट्काले समन्ततः ।

प्रतिष्ठानाय पृथिवीं मार्गमाणस्तदाभवत् ॥ ५० ॥

‘ समस्त भूमण्डल सब ओरसे जलमें डूबा हुआ था । उस समय एकार्णवसे उपलक्षित एकमात्र आकाशमें पृथ्वीका पता लगानेके लिये भगवान् इस प्रकार विचर रहे थे, जैसे वर्षाकालकी रातमें जुगनू सब ओर उड़ता फिरता है । वे पृथ्वीको कहीं स्थिररूपसे स्थापित करनेके लिये उसकी खोज कर रहे थे ॥ ४ ९ -५० ॥

निमग्नां गां दृष्ट्वा चोद्धर्तुं मनसेच्छति ।

किं नुरूपमहं कृत्वा सलिलादुद्धरे महीम् ॥ ५१ ॥

I पृथ्वीको जलमें डूबी हुई देख भगवान्ने मन- हीही- मन उसे बाहर निकालनेकी इच्छा की । वे सोचने लगे, ‘ कौन- सा रूप धारण करके मैं इस जलसे पृथ्वीका उद्धार करूँ' ॥ ५१ ॥

एवं संचिन्त्य मनसा दृष्ट्वा दिव्येन चक्षुषा ।

जलक्रीडाभिरुचितं वाराहं रूपमस्मरत् ॥ ५२ ॥

' इस प्रकार मन-ही-मन चिन्तन करके उन्होंने दिव्य दृष्टिसे देखा कि जलमें क्रीड़ा करनेके योग्य तो वराहरूप है; अतः उन्होंने उसी रूपका स्मरण किया ॥

कृत्वा वराहवपुषं वाङ्मयं वेदसम्मितम् ।

दशयोजनविस्तीर्णमायतं शतयोजनम् ॥ ५३ ॥

महापर्वतवर्ष्माभं तीक्ष्णदंष्ट्रं प्रदीप्तिमत् ।

महामेघौघनिर्घोषं नीलजीमूतसंनिभम् ॥ ५४ ॥

‘ वेदतुल्य वैदिक वाङ्मय वराहरूप धारण करके भगवान्ने जलके भीतर प्रवेश किया । उनका वह विशाल पर्वताकार शरीर सौ योजन लंबा और दस योजन चौड़ा था । उनकी दाढ़ें बड़ी तीखी थीं । उनका शरीर देदीप्यमान हो रहा था। भगवान्‌का कण्ठस्वर महान् मेघोंकी गर्जनाके समान गम्भीर था। उनकी अंगकान्ति नील जलधरके समान श्याम थी ॥ ५३-५४ ॥ भूत्वा यज्ञवराहो वै अपः सम्प्राविशत् प्रभुः ।