02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 1821–1830

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1821–1830

पृष्ठ 1821

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दंष्ट्रेणैकेन चोद्धृत्य स्वे स्थाने न्यविशन्महीम् ॥ ५५ ॥

‘ इस प्रकार यज्ञवाराहरूप धारण करके भगवान्ने जलके भीतर प्रवेश किया और एक ही दाँतसे पृथ्वीको उठाकर उसे अपने स्थानपर स्थापित कर दिया ॥ ५५ ॥

पुनरेव महाबाहुरपूर्वां तनुमाश्रितः ।

नरस्य कृत्वार्धतनुं सिंहस्यार्धतनुं प्रभुः ॥ ५६ ॥

दैत्येन्द्रस्य सभां गत्वा पाणिं संस्पृश्य पाणिना ।

दैत्यानामादिपुरुषः सुरारिर्दितिनन्दनः ॥ ५७ ॥

दृष्ट्वा चापूर्वपुरुषं क्रोधात् संरक्तलोचनः । ‘ तदनन्तर महाबाहु भगवान् श्रीहरिने एक अपूर्व शरीर धारण किया, जिसमें आधा अंग तो मनुष्यका था और आधा सिंहका । इस प्रकार नृसिंहरूप धारण करके हाथसे हाथका स्पर्श किये हुए दैत्यराज हिरण्यकशिपुकी सभामें गये । दैत्योंके आदिपुरुष और देवताओंके शत्रु दितिनन्दन हिरण्यकशिपुने उस अपूर्व पुरुषको देखकर क्रोधसे आँखें लाल कर लीं ॥ ५६-५७ ॥ शुलोद्यतकरः स्रग्वी हिरण्यकशिपुस्तदा ॥ ५८ ॥

मेघस्तनितनिर्घोषो नीलाभ्रचयसंनिभः ।

देवारिर्दितिजो वीरो नृसिंहं समुपाद्रवत् ॥ ५९ ॥

‘ उसने एक हाथमें शूल उठा रखा था । उसके गलेमें पुष्पोंकी माला शोभा पा रही थी । उस समय वीर हिरण्यकशिपुने, जिसकी आवाज मेघकी गर्जनाके समान थी, जो नीले मेघोंके समूह - जैसा श्याम था तथा जो दितिके गर्भसे उत्पन्न होकर देवताओंका शत्रु बना हुआ था; भगवान् नृसिंहपर धावा किया ॥ ५८-५९ ॥

समुपेत्य ततस्तीक्ष्णैर्मृगेन्द्रेण बलीयसा ।

नारसिंहेन वपुषा दारितः करजैर्भृशम् ॥ ६० ॥

' इसी समय अत्यन्त बलवान् मृगेन्द्रस्वरूप भगवान् नृसिंहने दैत्यके निकट जाकर उसे अपने तीखे नखोंद्वारा अत्यन्त विदीर्ण कर दिया ॥ ६० ॥

एवं निहत्य भगवान् दैत्येन्द्रं रिपुघातिनम् ।

भूयोऽन्यः पुण्डरीकाक्षः प्रभुर्लोकहिताय च ॥ ६१ ॥

‘ इस प्रकार शत्रुघाती दैत्यराज हिरण्यकशिपुका वध करके भगवान् कमलनयन श्रीहरि पुनः सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये अन्य रूपमें प्रकट हुए ॥ ६१ ॥

कश्यपस्यात्मजः श्रीमानदित्या गर्भधारितः ।

पूर्णे वर्षसहस्रे तु प्रसूता गर्भमुत्तमम् ॥ ६२ ॥

‘ उस समय वे कश्यपजीके तेजस्वी पुत्र हुए । अदितिदेवीने उन्हें गर्भमें धारण किया था । पूरे एक हजार वर्षतक गर्भमें धारण करनेके पश्चात् अदितिने एक उत्तम बालकको जन्म दिया ॥ ६२ ॥

पृष्ठ 1822

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दुर्दिनाम्भोदसदृशो दीप्ताक्षो वामनाकृतिः ।

दण्डी कमण्डलुधरः श्रीवत्सोरसि भूषितः ॥ ६३ ॥

‘ वह वर्षाकालके मेघके समान श्यामवर्णका था । उसके नेत्र देदीप्यमान हो रहे थे । वे वामनाकार, दण्ड और कमण्डलु धारण किये तथा वक्षःस्थलमें श्रीवत्सचिह्न से विभूषित थे ॥ ६३ ॥

जटी यज्ञोपवीती च भगवान् बालरूपधृक् ।

यज्ञवाटं गतः श्रीमान् दानवेन्द्रस्य वै तदा ॥ ६४ ॥

'उनके सिरपर जटा थी और गलेमें यज्ञोपवीत शोभा पाता था । उस समय वे बालरूपधारी श्रीमान् भगवान् दानवराज बलिकी यज्ञशालाके समीप गये ॥

बृहस्पतिसहायोऽसौ प्रविष्टो बलिनो मखे ।

तं दृष्ट्वा वामनतनुं प्रहृष्टो बलिरब्रवीत् ॥ ६५ ॥

‘ बृहस्पतिजीकी सहायतासे उनका बलिके यज्ञ मण्डपमें प्रवेश हुआ । वामनरूपधारी भगवान्‌को देखकर राजा बलि बहुत प्रसन्न हुए और बोले— ॥ ६५ ॥

प्रीतोऽस्मि दर्शने विप्र ब्रूहि त्वं किं ददानि ते ।

एवमुक्तस्तु बलिना वामनः प्रत्युवाच ह ॥ ६६ ॥

स्वस्तीत्युक्त्वा बलिं देवः स्मयमानोऽभ्यभाषत ।

मेदिनीं दानवपते देहि मे विक्रमत्रयम् ॥ ६७ ॥

'ब्रह्मन्! आपका दर्शन पाकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूँ। आज्ञा कीजिये, मैं आपकी सेवाके लिये क्या दूँ? ' बलिके ऐसा कहनेपर भगवान् वामनने ' ( आपका ) स्वस्ति ( कल्याण हो ) ' ऐसा कहकर बलिको आशीर्वाद दिया और मुसकराते हुए कहा – ' दानवराज! मुझे तीन पग पृथ्वी दे दीजिये ' ॥ ६६-६७ ॥

बलिर्ददौ प्रसन्नात्मा विप्रायामिततेजसे ।

ततो दिव्याद्भुततमं रूपं विक्रमतो हरेः ॥ ६८ ॥

' बलिने प्रसन्नचित्त होकर उन अमिततेजस्वी ब्राह्मणदेवताको उनकी मुँहमाँगी वस्तु दे दी । तब भूमिको नापते समय श्रीहरिका अत्यन्त अद्भुत दिव्य रूप प्रकट हुआ ॥ ६८ ॥

विक्रमैस्त्रिभिरक्षोभ्यो जहाराशु स मेदिनीम् ।

ददौ शक्राय च महीं विष्णुर्देवः सनातनः ॥ ६ ९ ॥

‘उन अक्षोभ्य सनातन विष्णुदेवने तीन पगद्वारा शीघ्र ही सारी वसुधा नाप ली और देवराज इन्द्रको समर्पित कर दी ॥ ६ ९ ॥

एष ते वामनो नाम प्रादुर्भावः प्रकीर्तितः ।

तेन देवाः प्रादुरासन् वैष्णवं चोच्यते जगत् ॥ ७० ॥

‘ यह मैंने तुम्हें भगवान्के वामनावतारकी बात बतायी है । उन्हींसे देवताओंकी उत्पत्ति हुई है । यह जगत् भी भगवान् विष्णुसे प्रकट होनेके कारण वैष्णव कहलाता है ॥ ७० ॥

पृष्ठ 1823

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असतां निग्रहार्थाय धर्मसंरक्षणाय च ।

अवतीर्णो मनुष्याणामजायत यदुक्षये ॥ ७१ ॥

स एवं भगवान् विष्णुः कृष्णेति परिकीर्त्यते ।

अनाद्यन्तमजं देवं प्रभुं लोकनमस्कृतम् ॥ ७२ ॥

' राजन्! वे ही भगवान् विष्णु दुष्टोंका दमन और धर्मका संरक्षण करनेके लिये मनुष्योंके बीच यदुकुलमें अवतीर्ण हुए हैं । उन्हींको श्रीकृष्ण कहते हैं । वे अनादि, अनन्त, अजन्मा, दिव्यस्वरूप, सर्वसमर्थ और विश्ववन्दित हैं ॥ ७१-७२ ॥

यं देवं विदुषो गान्ति तस्य कर्माणि सैन्धव ।

यमाहुरजितं कृष्णं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥ ७३ ॥

श्रीवत्सधारिणं देवं पीतकौशेयवाससम् ।

प्रधानः सोऽस्त्रविदुषां तेन कृष्णेन रक्ष्यते ॥ ७४ ॥

‘सिन्धुराज! विद्वान् पुरुष उन्हीं भगवान्‌की महिमा गाते और उन्हींके पावन चरित्रोंका वर्णन करते हैं । उन्हींको अपराजित, शंखचक्रगदाधारी पीतपट्टाम्बर- विभूषित श्रीवत्सधारी भगवान् श्रीकृष्ण कहा गया है । अस्त्रविद्याके विद्वानोंमें श्रेष्ठ अर्जुन उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा सुरक्षित हैं ॥ ७३-७४ ॥

सहायः पुण्डरीकाक्षः श्रीमानतुलविक्रमः ।

समानस्यन्दने पार्थमास्थाय परवीरहा ॥ ७५ ॥

' शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अतुलपराक्रमी श्रीमान् कमलनयन श्रीकृष्ण एक ही रथपर अर्जुनके समीप बैठकर उनकी सहायता करते हैं ॥ ७५ ॥

न शक्यते तेन जेतुं त्रिदशैरपि दुःसहः ।

कः पुनर्मानुषो भावो रणे पार्थं विजेष्यति ॥ ७६ ॥

'इस कारण अर्जुनको कोई नहीं जीत सकता । उनका वेग सहन करना देवताओंके लिये भी कठिन है; फिर कौन ऐसा मनुष्य है जो युद्धमें अर्जुनपर विजय पा सके? ॥

तमेकं वर्जयित्वा तु सर्वं यौधिष्ठिरं बलम् ।

चतुरः पाण्डवान् राजन् दिनैकं जेष्यसे रिपून् ॥ ७७ ॥

‘ राजन्! केवल अर्जुनको छोड़कर एक दिन ही तुम युधिष्ठिरकी सारी सेनाको और अपने'शत्रु चारों पाण्डवोंको भी जीत सकोगे ' ॥ ७७ ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्येवमुक्त्वा नृपतिं सर्वपापहरो हरः ।

उमापतिः पशुपतिर्यज्ञहा त्रिपुरार्दनः ॥ ७८ ॥

वामनैर्विकटैः कुब्जैरुग्रश्रवणदर्शनैः ।

वृतः पारिषदैर्घोरैर्नानाप्रहरणोद्यतैः ॥ ७९ ॥

पृष्ठ 1824

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त्र्यम्बको राजशार्दूल भगनेत्रनिपातनः ।

उमासहायो भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ८० ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! उमापति भगवान् हर समस्त पापोंका अपहरण करनेवाले हैं । वे पशुरूपी जीवोंके पालक, दक्षयज्ञविध्वंसक तथा त्रिपुरविनाशक हैं । उनके तीन नेत्र हैं और उन्हींके द्वारा भगदेवताके नेत्र नष्ट किये गये हैं । भगवती उमा सदा उनके साथ रहती हैं । नृपश्रेष्ठ! भगवान् शिव सिन्धुराज जयद्रथसे पूर्वोक्त वचन कहकर भयंकर कानों और नेत्रोंवाले भाँति- भाँतिके अस्त्र उठाये रहनेवाले अपने भयंकर पार्षदोंके साथ, जिनमें बौने, कुबड़े और विकट आकृतिवाले प्राणी भी थे, भगवती पार्वतीसहित वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ७८–८० ॥

जयद्रथोऽपि मन्दात्मा स्वमेव भवनं ययौ ।

पाण्डवाश्च वने तस्मिन् न्यवसन् काम्यके तथा ॥ ८१ ॥

तत्पश्चात् मन्दबुद्धि जयद्रथ भी अपने घर चला गया और पाण्डवगण उस काम्यकवनमें उसी प्रकार निवास करने लगे ॥ ८१ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि जयद्रथविमोक्षणपर्वणि द्विसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत जयद्रथविमोक्षणपर्वमें दो सौ बहत्तरवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २७२ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल ८१३ श्लोक हैं )

पृष्ठ 1825

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( रामोपाख्यानपर्व ) त्रिसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः अपनी दुरवस्थासे दुःखी हुए युधिष्ठिरका मार्कण्डेय मुनिसे प्रश्न करना जनमेजय उवाच

एवं हृतायां कृष्णायां प्राप्य क्लेशमनुत्तमम् ।

अत ऊर्ध्वं नरव्याघ्राः किमकुर्वत पाण्डवाः ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा – इस प्रकार द्रौपदीका अपहरण होनेपर महान् क्लेश उठानेके पश्चात् मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी पाण्डवोंने कौन- सा कार्य किया? ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं कृष्णां मोक्षयित्वा विनिर्जित्य जयद्रथम् ।

आसांचक्रे मुनिगणैर्धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी बोले -जनमेजय! इस प्रकार जयद्रथको जीतकर द्रौपदीको छुड़ा लेनेके पश्चात् धर्मराज युधिष्ठिर मुनिमण्डलीके साथ बैठे हुए थे ॥ २ ॥

तेषां मध्ये महर्षीणां शृण्वतामनुशोचताम् ।

मार्कण्डेयमिदं वाक्यमब्रवीत् पाण्डुनन्दनः ॥ ३ ॥

महर्षिलोग भी पाण्डवोंपर आये हुए संकटको सुनते और उसके लिये बारंबार शोक प्रकट करते थे । उन्हींमेंसे मार्कण्डेयजीको लक्ष्य करके पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने इस प्रकार कहा ॥ ३ ॥

युधिष्ठिर उवाच

भगवन् देवर्षीणां त्वं ख्यातो भूतभविष्यवित् ।

संशयं परिपृच्छामि छिन्धि मे हृदि संस्थितम् ॥ ४ ॥

युधिष्ठिर बोले — भगवन्! आप भूत, भविष्य और वर्तमान- तीनों कालोंके ज्ञाता हैं । देवर्षियोंमें भी आपका नाम विख्यात है । अतः आपसे मैं अपने हृदयका एक संदेह पूछता हूँ, उसका निवारण कीजिये ॥ ४ ॥

द्रुपदस्य सुता ह्येषा वेदिमध्यात् समुत्थिता ।

अयोनिजा महाभागा स्नुषा पाण्डोर्महात्मनः ॥ ५ ॥

पृष्ठ 1826

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यह परम सौभाग्यशालिनी द्रुपदकुमारी यज्ञकी वेदीसे प्रकट हुई है; अतः अयोनिजा है ( इसे गर्भवासका कष्ट नहीं सहन करना पड़ा है ) । इसे महात्मा पाण्डुकी पुत्रवधू होनेका गौरव भी मिला है ॥ ५ ॥

मन्ये कालश्च भगवान् दैवं च विधिनिर्मितम् ।

भवितव्यं च भूतानां यस्य नास्ति व्यतिक्रमः ॥ ६ ॥

मेरी समझमें भगवान् काल, विधिनिर्मित दैव और समस्त प्राणियोंकी भवितव्यता अर्थात् उनके लिये होनेवाली घटना–ये तीनों ही प्रबल हैं; इनको कोई टाल नहीं सकता ॥ ६ ॥

इमां हि पत्नीमस्माकं धर्मज्ञां धर्मचारिणीम् ।

संस्पृशेदीदृशो भावः शुचिं स्तैन्यमिवानृतम् ॥ ७ ॥

अन्यथा हमारी इस पत्नीको, जो धर्मको जाननेवाली तथा धर्मके पालनमें तत्पर रहनेवाली है, ऐसा भाव ( अपहृत होनेका लांछन) कैसे स्पर्श कर सकता था? यह तो ठीक वैसा ही है, जैसे किसी शुद्ध आचार-विचारवाले मनुष्यपर झूठे ही चोरीका कलंक लग जाय ॥ ७ ॥

न हि पापं कृतं किंचित् कर्म वा निन्दितं क्वचित् ।

द्रौपद्या ब्राह्मणेष्वेव धर्मः सुचरितो महान् ॥ ८ ॥

इसने कभी कोई पाप या निन्दित कर्म नहीं किया है । द्रौपदीने ब्राह्मणोंके प्रति सेवा- सत्कार आदिके रूपमें महान् धर्मका आचरण किया है ॥ ८ ॥

तां जहार बलाद् राजा मूढबुद्धिर्जयद्रथः ।

तस्याः संहरणात् पापः शिरसः केशपातनम् ॥ ९ ॥

पराजयं च संग्रामे ससहायः समाप्तवान् ।

प्रत्याहृता तथा स्माभिर्हत्वा तत् सैन्धवं बलम् ॥ १० ॥

ऐसी स्त्रीका भी मूढबुद्धि पापी राजा जयद्रथने बलपूर्वक अपहरण किया । इस अपहरणके ही कारण उसका सिर मूँड़ा गया, वह अपने सहायकों सहित युद्धमें पराजित हुआ तथा हमलोग सिन्धु-देशकी सेनाका संहार करके पुनः द्रौपदीको लौटा लाये हैं ॥ ९ -१० ॥

तद् दारहरणं प्राप्तमस्माभिरवितर्कितम् ।

ज्ञातिभिर्विप्रवासश्च मिथ्याव्यवसितैरियम् ॥ ११ ॥

इस प्रकार हमने जिसे कभी सोचातक न था, वह अपनी पत्नीका अपहरणरूप अपमान हमें प्राप्त हुआ और मिथ्या व्यवसायमें लगे हुए बान्धवोंने हमें देशसे निर्वासित कर दिया है ॥ ११ ॥

अस्ति नूनं मया कश्चिदल्पभाग्यतरो नरः ।

भवता दृष्टपूर्वो वा श्रुतपूर्वोऽपि वा भवेत् ॥ १२ ॥

पृष्ठ 1827

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1827 का मूल पृष्ठ
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अतः मैं पूछता हूँ, क्या संसारमें मेरे जैसा मन्दभाग्य मनुष्य कोई और भी है अथवा आपने पहले कभी मुझ जैसे भाग्यहीनको कहीं देखा या सुना है? ॥ १२ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि युधिष्ठिरप्रश्ने त्रिसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें युधिष्ठिरप्रश्नविषयक दो सौ तिहत्तरवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २७३ ॥

पृष्ठ 1828

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1828 का मूल पृष्ठ
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चतुःसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः श्रीराम आदिका जन्म तथा कुबेरकी उत्पत्ति और उन्हें ऐश्वर्यकी प्राप्ति मार्कण्डेय उवाच

प्राप्तमप्रतिमं दुःखं रामेण भरतर्षभ ।

रक्षसा जानकी तस्य हृता भार्या बलीयसा ॥ १ ॥

आश्रमाद् राक्षसेन्द्रेण रावणेन दुरात्मना ।

मायामास्थाय तरसा हत्वा गृध्रं जटायुषम् ॥ २ ॥

मार्कण्डेयजीने कहा - भरतश्रेष्ठ! श्रीरामचन्द्रजीको भी वनवास तथा स्त्रीवियोगका अनुपम दुःख सहन करना पड़ा था । दुरात्मा राक्षसराज महाबली रावण अपना मायाजाल बिछाकर आश्रमसे उनकी पत्नी सीताको वेगपूर्वक हर ले गया था और अपने कार्यमें बाधा डालनेवाले गृध्रराज जटायुको उसने वहीं मार गिराया था ॥ १-२ ॥

प्रत्याजहार तां रामः सुग्रीवबलमाश्रितः ।

बद्ध्वा सेतुं समुद्रस्य दग्ध्वा लङ्कां शितैः शरैः ॥ ३ ॥

फिर श्रीरामचन्द्रजी भी सुग्रीवकी सेनाका सहारा ले समुद्रपर पुल बाँधकर लंकामें गये और अपने तीखे ( आग्नेय आदि) बाणोंसे उसको भस्म करके वहाँसे सीताको वापस लाये ॥ ३ ॥

युधिष्ठिरउवाच

कस्मिन् रामः कुले जातः किंवीर्यः किम्पराक्रमः ।

रावणः कस्य पुत्रो वा किं वैरं तस्य तेन ह ॥ ४ ॥

युधिष्ठिरने पूछा — भगवन्! श्रीरामचन्द्रजी किस कुलमें प्रकट हुए थे? उनका बल और पराक्रम कैसा था? रावण किसका पुत्र था और उसका रामचन्द्रजीसे क्या वैर था? ॥ ४ ॥

एतन्मे भगवन् सर्वं सम्यगाख्यातुमर्हसि ।

श्रोतुमिच्छामि चरितं रामस्याक्लिष्टकर्मणः ॥ ५ ॥

भगवन्! ये सभी बातें मुझे अच्छी प्रकार बताइये । मैं अनायास ही महान् कर्म करनेवाले भगवान् श्रीरामका चरित्र सुनना चाहता हूँ ॥ ५ ॥

मार्कण्डेय उवाच

अजो नामाभवद् राजा महानिक्ष्वाकुवंशजः ।

तस्य पुत्रो दशरथः शश्वत्स्वाध्यायवाञ्छुचिः ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1829

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मार्कण्डेयजीने कहा- राजन्! इक्ष्वाकुवंशमें अज नामसे प्रसिद्ध एक महान् राजा हो गये हैं । उनके पुत्र थे दशरथ, जो सदा स्वाध्यायमें संलग्न रहनेवाले और पवित्र थे ॥ ६ ॥

अभवंस्तस्य चत्वारः पुत्रा धर्मार्थकोविदाः ।

रामलक्ष्मणशत्रुघ्ना भरतश्च महाबलः ॥ ७ ॥

उनके चार पुत्र हुए । वे सब - के - सब धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाले थे । उनके नाम इस प्रकार हैं — राम, लक्ष्मण, महाबली भरत और शत्रुघ्न ॥ ७ ॥

रामस्य माता कौसल्या कैकेयी भरतस्य तु ।

सुतौ लक्ष्मणशत्रुघ्नौ सुमित्रायाः परंतपौ ॥ ८ ॥

श्रीरामचन्द्रजीकी माताका नाम कौसल्या था, भरतकी माता कैकेयी थी तथा शत्रुओंको संताप देनेवाले लक्ष्मण और शत्रुघ्न सुमित्राके पुत्र थे ॥ ८ ॥

विदेहराजो जनकः सीता तस्यात्मजा विभो ।

यां चकार स्वयं त्वष्टा रामस्य महिषीं प्रियाम् ॥ ९ ॥

राजन्! विदेहदेशके राजा जनककी एक पुत्री थी, जिसका नाम था सीता । उसे स्वयं विधाताने ही भगवान् श्रीरामकी प्यारी रानी होनेके लिये रचा था ॥ ९ ॥

एतद् रामस्य ते जन्म सीतायाश्च प्रकीर्तितम् ।

रावणस्यापि ते जन्म व्याख्यास्यामि जनेश्वर ॥ १० ॥

जनेश्वर! इस प्रकार मैंने तुम्हें श्रीराम और सीताके जन्मका वृत्तान्त बताया है । अब रावणके भी जन्मका प्रसंग सुनाऊँगा ॥ १० ॥

पितामहो रावणस्य साक्षाद् देवः प्रजापतिः ।

स्वयम्भूः सर्वलोकानां प्रभुः स्रष्टा महातपाः ॥ ११ ॥

सम्पूर्ण जगत्के स्वामी, सबकी सृष्टि करनेवाले, प्रजापालक, महातपस्वी और स्वयम्भू साक्षात् भगवान् ब्रह्माजी ही रावणके पितामह थे ॥ ११ ॥

पुलस्त्यो नाम तस्यासीन्मानसो दयितः सुतः ।

तस्य वैश्रवणो नाम गवि पुत्रोऽभवत् प्रभुः ॥ १२ ॥

ब्रह्माजीके एक परम प्रिय मानसपुत्र पुलस्त्यजी थे । उनसे उनकी गौ नामकी पत्नीके गर्भसे वैश्रवण नामक शक्तिशाली पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १२ ॥

पितरं स समुत्सृज्य पितामहमुपस्थितः ।

तस्य कोपात् पिता राजन् ससर्जात्मानमात्मना ॥ १३ ॥

स जज्ञे विश्रवा नाम तस्यात्मार्धेन वै द्विजः ।

प्रतीकाराय सक्रोधस्ततो वैश्रवणस्य वै ॥ १४ ॥

राजन्! वैश्रवण अपने पिताको छोड़कर पितामहकी सेवामें रहने लगे । इससे उनपर क्रोध करके पिता पुलस्त्यने स्वयं अपने -आपको ही दूसरे रूपमें प्रकट कर लिया ।

पृष्ठ 1830

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पुलस्त्यके आधे शरीरसे जो दूसरा द्विज प्रकट हुआ, उसका नाम विश्रवा था । विश्रवा वैश्रवणसे बदला लेनेके लिये उनके ऊपर सदा कुपित रहा करते थे ॥ १३-१४ ॥

पितामहस्तु प्रीतात्मा ददौ वैश्रवणस्य ह ।

अमरत्वं धनेशत्वं लोकपालत्वमेव च ॥ १५ ॥

परंतु पितामह ब्रह्माजी उनपर प्रसन्न थे; अतः उन्होंने वैश्रवणको अमरत्व प्रदान किया और धनका स्वामी तथा लोकपाल बना दिया ॥ १५ ॥

ईशानेन तथा सख्यं पुत्रं च नलकूबरम् ।

राजधानीनिवेशं च लङ्कां रक्षोगणान्विताम् ॥ १६ ॥

पितामहने उनकी महादेवजीसे मैत्री करायी, उन्हें नलकूबर नामक पुत्र दिया तथा राक्षसोंसे भरी हुई लंकाको उनकी राजधानी बनायी ॥ १६ ॥

विमानं पुष्पकं नाम कामगं च ददौ प्रभुः ।

यक्षाणामाधिपत्यं च राजराजत्वमेव च ॥ १७ ॥

साथ ही उन्हें इच्छानुसार विचरनेवाला पुष्पक नामका एक विमान दिया । इसके सिवा ब्रह्माजीने कुबेरको यक्षोंका स्वामी बना दिया और उन्हें ' राजराज' की पदवी प्रदान की ॥ १७ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि रामरावणयोर्जन्मकथने चतुःसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें राम- रावणजन्मकथनविषयक दो सौ चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७४ ॥