श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1831–1840
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1831–1840
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पञ्चसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण, खर और शूर्पणखाकी उत्पत्ति, तपस्या और वरप्राप्ति तथा कुबेरका रावणको शाप देना मार्कण्डेय उवाच
पुलस्त्यस्य तु यः क्रोधादर्धदेहोऽभवन्मुनिः ।
विश्रवा नाम सक्रोधः स वैश्रवणमैक्षत ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! पुलस्त्यके क्रोधसे उनके आधे शरीरसे जो ‘ विश्रवा ’ नामक मुनि प्रकट हुए थे, वे कुबेरको कुपित दृष्टिसे देखने लगे ॥ १ ॥
बुबुधे तं तु सक्रोधं पितरं राक्षसेश्वरः ।
कुबेरस्तत्प्रसादार्थं यतते स्म सदा नृप ॥ २ ॥
युधिष्ठिर! राक्षसोंके स्वामी कुबेरको जब यह बात मालूम हो गयी कि मेरे पिता मुझपर रुष्ट रहते हैं, तब वे उन्हें प्रसन्न रखनेका यत्न करने लगे ॥ २ ॥
स राजराजो लङ्कायां न्यवसन्नरवाहनः ।
राक्षसीः प्रददौ तिस्रः पितुर्वै परिचारिकाः ॥ ३ ॥
राजराज कुबेर स्वयं लंकामें ही रहते थे । वे मनुष्योंद्वारा ढोई जानेवाली पालकी आदिकी सवारीपर चलते थे, इसलिये नरवाहन कहलाते थे । उन्होंने अपने पिता विश्रवाकी सेवाके लिये तीन राक्षसकन्याओंको परिचारिकाओंके रूपमें नियुक्त कर दिया था ॥ ३ ॥
ताः सदा तं महात्मानं संतोषयितुमुद्यताः ।
ऋषिं भरतशार्दूल नृत्यगीतविशारदाः ॥ ४ ॥
भरतश्रेष्ठ! वे तीनों ही नाचने और गानेकी कलामें निपुण थीं तथा सदा ही उन महात्मा महर्षिको संतुष्ट रखनेके लिये सचेष्ट रहती थीं ॥ ४ ॥
पुष्पोत्कटा च राका च मालिनी च विशाम्पते ।
अन्योन्यस्पर्धया राजन् श्रेयस्कामाः सुमध्यमाः ॥ ५ ॥
महाराज! उनके नाम थे - पुष्पोत्कटा, राका तथा मालिनी । वे तीनों सुन्दरियाँ अपना भला चाहती थीं । इसलिये एक- दूसरीसे स्पर्धा रखकर मुनिकी सेवा करती थीं ॥ ५ ॥
स तासां भगवांस्तुष्टो महात्मा प्रददौ वरान् ।
लोकपालोपमान् पुत्रानेकैकस्या यथेप्सितान् ॥ ६ ॥
वे ऐश्वर्यशाली महात्मा उनकी सेवाओंसे प्रसन्न हो गये और उनमेंसे प्रत्येकको उनकी इच्छाके अनुसार लोकपालोंके समान पराक्रमी पुत्र होनेका वरदान दिया ॥
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पुष्पोत्कटायां जज्ञाते द्वौ पुत्रौ राक्षसेश्वरौ ।
कुम्भकर्णदशग्रीवौ बलेनाप्रतिमौ भुवि ॥ ७ ॥
पुष्पोत्कटाके दो पुत्र हुए- रावण और कुम्भकर्ण । ये दोनों ही राक्षसोंके अधिपति थे । भूमण्डलमें इनके समान बलवान् दूसरा कोई नहीं था ॥ ७ ॥
मालिनी जनयामास पुत्रमेकं विभीषणम् ।
राकायां मिथुनं जज्ञे खरः शूर्पणखा तथा ॥ ८ ॥
मालिनीने एक ही पुत्र विभीषणको जन्म दिया । राकाके गर्भसे एक पुत्र और एक पुत्री हुई। पुत्रका नाम खर था और पुत्रीका शूर्पणखा ॥ ८ ॥
विभीषणस्तु रूपेण सर्वेभ्योऽभ्यधिकोऽभवत् ।
स बभूव महाभागो धर्मगोप्ता क्रियारतिः ॥ ९ ॥
इन सब बालकोंमें विभीषण ही सबसे अधिक रूपवान्, सौभाग्यशाली, धर्मरक्षक तथा कर्तव्यपरायण थे ॥ ९ ॥
दशग्रीवस्तु सर्वेषां श्रेष्ठो राक्षसपुङ्गवः ।
महोत्साहो महावीर्यो महासत्त्वपराक्रमः ॥ १० ॥
रावणके दस मस्तक थे । वही सबमें ज्येष्ठ तथा राक्षसोंका स्वामी था । उत्साह, बल, धैर्य और पराक्रममें भी वह महान् था ॥ १० ॥
कुम्भकर्णो बलेनासीत् सर्वेभ्योऽभ्यधिको युधि ।
मायावी रणशौण्डश्च रौद्रश्च रजनीचरः ॥ ११ ॥
कुम्भकर्ण शारीरिक बलमें सबसे बढ़ा- चढ़ा था। युद्धमें भी वह सबसे बढ़कर था ।
मायावी और रणकुशल तो था ही, वह निशाचर बड़ा भयंकर भी था ॥ ११ ॥
खरो धनुषि विक्रान्तो ब्रह्मद्विट् पिशिताशनः ।
सिद्धविघ्नकरी चापि रौद्री शूर्पणखा तथा ॥ १२ ॥
खर धनुर्विद्यामें विशेष पराक्रमी था । वह ब्राह्मणोंसे द्वेष रखनेवाला तथा मांसाहारी था । शूर्पणखाकी आकृति बड़ी भयानक थी । वह सिद्ध ऋषि -मुनियोंकी तपस्यामें विघ्न डाला करती थी ॥ १२ ॥
सर्वे वेदविदः शूराः सर्वे सुचरितव्रताः ।
ऊषुः पित्रा सहरता गन्धमादनपर्वते ॥ १३ ॥
वे सभी बालक वेदवेत्ता, शूरवीर तथा ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले थे और अपने पिताके साथ गन्धमादन पर्वतपर सुखपूर्वक रहते थे ॥ १३ ॥
ततो वैश्रवणं तत्र ददृशुर्नरवाहनम् ।
पित्रा सार्धं समासीनमृद्धया परमया युतम् ॥ १४ ॥
एक दिन नरवाहन कुबेर अपने महान् ऐश्वर्यसे युक्त होकर पिताके साथ बैठे थे । उसी अवस्थामें रावण आदिने उनको देखा ॥ १४ ॥
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जातामर्षास्ततस्ते तु तपसे धृतनिश्चयाः ।
ब्रह्माणं तोषयामासुघरण तपसा तदा ॥ १५
उनका वैभव देखकर इन बालकोंके हृदयमें डाह पैदा हो गयी । अतः उन्होंने मन- ही-मन तपस्या करनेका निश्चय किया और घोर तपस्याके द्वारा उन्होंने ब्रह्माजीको संतुष्ट कर लिया ॥ १५ ॥
अतिष्ठदेकपादेन सहस्रं परिवत्सरान् ।
वायुभक्षो दशग्रीवः पञ्चाग्निः सुसमाहितः ॥ १६ ॥
रावण सहस्रों वर्षोंतक एक पैरसे खड़ा रहा । वह चित्तको एकाग्र रखकर पंचाग्निसेवन करता और वायु पीकर रहता था ॥ १६ ॥
अधःशायी कुम्भकर्णो यताहारो यतव्रतः ।
विभीषणः शीर्णपर्णमेकमभ्यवहारयन् ॥ १७ ॥
कुम्भकर्णने भी आहारका संयम किया। वह भूमिपर सोता और कठोर नियमोंका पालन करता था । विभीषण केवल एक सूखा पत्ता खाकर रहते थे ॥ १७ ॥
उपवासरतिर्धीमान् सदा जप्यपरायणः ।
तमेव कालमातिष्ठत् तीव्रं तप उदारधीः ॥ १८ ॥
उनका भी उपवासमें ही प्रेम था । बुद्धिमान् एवं उदारबुद्धि विभीषण सदा जप किया करते थे । उन्होंने भी उतने समयतक तीव्र तपस्या की ॥ १८ ॥
खरः शूर्पणखा चैव तेषां वै तप्यतां तपः ।
परिचर्यां च रक्षां च चक्रतुर्हृष्टमानसौ ॥ १ ९ ॥
खर और शूर्पणखा ये दोनों प्रसन्नमनसे तपस्यामें लगे हुए अपने भाइयोंकी परिचर्या तथा रक्षा करते थे ॥
पूर्णे वर्षसहस्रे तु शिरश्छित्त्वा दशाननः ।
जुहोत्यग्नी दुराधर्षस्तेनातुष्यज्जगत्प्रभुः ॥ २० ॥
एक हजार वर्ष पूर्ण होनेपर दुर्धर्ष दशाननने अपना मस्तक काटकर अग्निमें उसकी आहुति दे दी । उसके इस अद्भुत कर्मसे लोकेश्वर ब्रह्माजी बहुत संतुष्ट हुए ॥
ततो ब्रह्मा स्वयं गत्वा तपसस्तान् न्यवारयत् ।
प्रलोभ्य वरदानेन सर्वानेव पृथक् पृथक् ॥ २१ ॥
तदनन्तर ब्रह्माजीने स्वयं जाकर उन सबको तपस्या करनेसे रोका और प्रत्येकको पृथक् - पृथक् वरदानका लोभ देते हुए कहा— ॥ २१ ॥
ब्रह्मोवाच
प्रीतोऽस्मि वो निवर्तध्वं वरान् वृणुत पुत्रकाः ।
यद् यदिष्टमृते त्वेकममरत्वं तथास्तु तत् ॥ २२ ॥
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ब्रह्माजी बोले- पुत्रो! मैं तुम सबपर प्रसन्न हूँ, वर माँगो और तपस्यासे निवृत्त हो
जाओ । केवल अमरत्वको छोड़कर जिसकी जो - जो इच्छा हो, उसके अनुसार वह वर माँगे ।
उसका वह मनोरथ पूर्ण होगा ॥
यद् यदग्नौ हुतं सर्वं शिरस्ते महदीप्सया ।
तथैव तानि ते देहे भविष्यन्ति यथेप्सया ॥ २३ ॥
( तत्पश्चात् उन्होंने रावणकी ओर लक्ष्य करके कहा— ) तुमने महत्त्वपूर्ण पद प्राप्त करनेकी इच्छासे अपने जिन -जिन मस्तकोंकी अग्निमें आहुति दी है, वे सब - के - सब पूर्ववत् तुम्हारे शरीरमें इच्छानुसार जुड़ जायँगे ॥
वैरूप्यं च न ते देहे कामरूपधरस्तथा ।
भविष्यसि रणेऽरीणां विजेता न च संशयः ॥ २४ ॥
तुम्हारे शरीरमें किसी प्रकारकी कुरूपता नहीं होगी, तुम इच्छानुसार रूप धारण कर सकोगे तथा युद्धमें शत्रुओंपर विजयी होओगे, इसमें संशय नहीं है ॥ २४ ॥
रावणउवाच
गन्धर्वदेवासुरतो यक्षराक्षसतस्तथा ।
सर्पकिन्नरभूतेभ्यो न मे भूयात् पराभवः ॥ २५ ॥
रावण बोला- भगवन्! गन्धर्व, देवता, असुर, यक्ष, राक्षस, सर्प, किन्नर तथा भूतोंसे कभी मेरी पराजय न हो ॥ २५ ॥
ब्रह्मोवाच
य एते कीर्तिताः सर्वे न तेभ्योऽस्ति भयं तव ।
ऋते मनुष्याद् भद्रं ते तथा तद् विहितं मया ॥ २६ ॥
ब्रह्माजीने कहा — तुमने जिन लोगोंका नाम लिया है, इनमेंसे किसीसे भी तुम्हें भय नहीं होगा । केवल मनुष्यको छोड़कर तुम सबसे निर्भय रहो । तुम्हारा भला हो । तुम्हारे लिये मनुष्यसे होनेवाले भयका विधान मैंने ही किया है ॥ २६ ॥
मार्कण्डेय उवाच
एवमुक्तो दशग्रीवस्तुष्टः समभवत् तदा ।
अवमेने हि दुर्बुद्धिर्मनुष्यान् पुरुषादकः ॥ २७ ॥
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10/11 मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर दसमुख रावण बहुत प्रसन्न हुआ । वह दुर्बुद्धि नरभक्षी राक्षस मनुष्योंकी अवहेलना करता था ॥ २७ ॥
कुम्भकर्णमथोवाच तथैव प्रपितामहः ।
स वव्रे महतीं निद्रां तमसा ग्रस्तचेतनः ॥ २८ ॥
तत्पश्चात् ब्रह्माजीने कुम्भकर्णसे वर माँगनेको कहा । परंतु उसकी बुद्धि तमोगुणसे ग्रस्त थी; अतः उसने अधिक कालतक नींद लेनेका वर माँगा ॥ २८ ॥
तथा भविष्यतीत्युक्त्वा विभीषणमुवाच ह ।
वरं वृष्णीष्व पुत्र त्वं प्रीतोऽस्मीति पुनः पुनः ॥ २ ९ ॥
उसे ‘ ऐसा ही होगा ' यों कहकर ब्रह्माजी विभीषणके पास गये और इस प्रकार बोले — ' बेटा! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, अतः तुम भी वर माँगो । ' ब्रह्माजीने यह बात बार- बार दुहरायी ॥ २ ९ ॥ विभीषण उवाच
परमापद्गतस्यापि नाधर्मे मे मतिर्भवेत् ।
अशिक्षितं च भगवन् ब्रह्मास्त्रं प्रतिभातु मे ॥ ३० ॥
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विभीषण बोले- भगवन्! बहुत बड़ा संकट आनेपर भी मेरे मनमें कभी पापका विचार न उठे तथा बिना सीखे ही मेरे हृदयमें ब्रह्मास्त्रके प्रयोग और उपसंहारकी विधि स्फुरित हो जाय ॥ ३० ॥
ब्रह्मोवाच
यस्माद् राक्षसयोनौ ते जातस्यामित्रकर्शन ।
नाधर्मे धीयते बुद्धिरमरत्वं ददानि ते ॥ ३१ ॥
ब्रह्माजीने कहा – शत्रुनाशन! राक्षसयोनिमें जन्म लेकर भी तुम्हारी बुद्धि अधर्ममें नहीं लगती; इसलिये ( तुम्हारे माँगे हुए वरके अतिरिक्त ) मैं तुम्हें अमरत्व भी देता ॥ ३१ ॥
मार्कण्डेय उवाच
राक्षसस्तु वरं लब्ध्वा दशग्रीवो विशाम्पते ।
लङ्कायाश्च्यावयामास युधि जित्वा धनेश्वरम् ॥ ३२ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! राक्षस दशाननने वर प्राप्त कर लेनेपर सबसे पहले अपने भाई कुबेरको युद्धमें परास्त किया और उन्हें लंकाके राज्यसे बहिष्कृत कर दिया ॥ ३२ ॥
हित्वा स भगवाँल्लङ्कामाविशद् गन्धमादनम् ।
गन्धर्वयक्षानुगतो रक्षः किम्पुरुषैः सह ॥ ३३ ॥
भगवान् कुबेर लंका छोड़कर गन्धर्व, यक्ष, राक्षस तथा किम्पुरुषोंके साथ गन्धमादन पर्वतपर आकर रहने लगे ॥
विमानं पुष्पकं तस्य जहाराक्रम्य रावणः ।
शशाप तं वैश्रवणो न त्वामेतद् वहिष्यति ॥ ३४ ॥
यस्तु त्वां समरे हन्ता तमेवैतद् वहिष्यति ।
अवमन्य गुरुं मां च क्षिप्रं त्वं न भविष्यसि ॥ ३५ ॥
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WAL NAVSAY रावणने आक्रमण करके उनका पुष्पक विमान भी छीन लिया । तब कुबेरने कुपित होकर उसे शाप दिया - ' अरे! यह विमान तेरी सवारीमें नहीं आ सकेगा । जो युद्धमें तुझे मार डालेगा, उसीका यह वाहन होगा । मैं तेरा बड़ा भाई होनेके कारण मान्य था, परंतु तूने मेरा अपमान किया है । इससे बहुत शीघ्र तेरा नाश हो जायगा' ॥ ३४-३५ ॥
विभीषणस्तु धर्मात्मा सतां मार्गमनुस्मरन् ।
अन्वगच्छन्महाराज श्रिया परमया युतः ॥ ३६ ॥
महाराज! विभीषण धर्मात्मा थे । उन्होंने सत्पुरुषोंके मार्गका ध्यान रखकर सदा अपने भाई कुबेरका अनुसरण किया; अतः वे उत्तम लक्ष्मीसे सम्पन्न हुए ॥ ३६ ॥
तस्मै स भगवांस्तुष्टो भ्राता भ्रात्रे धनेश्वरः ।
सैनापत्यं ददौ धीमान् यक्षराक्षससेनयोः ॥ ३७ ॥
बड़े भाई बुद्धिमान् भगवान् कुबेरने संतुष्ट होकर छोटे भाई विभीषणको यक्ष तथा राक्षसोंकी सेनाका सेनापति बना दिया ॥ ३७ ॥
राक्षसाः पुरुषादाश्च पिशाचाश्च महाबलाः ।
सर्वे समेत्य राजानमभ्यषिञ्चन् दशाननम् ॥ ३८ ॥
नरभक्षी राक्षस तथा महाबली पिशाच - सबने मिलकर दशमुख रावणको राक्षसराजके पदपर अभिषिक्त किया ॥ ३८ ॥
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दशग्रीवश्च दैत्यानां देवानां च बलोत्कटः ।
आक्रम्य रत्नान्यहरत् कामरूपी विहङ्गमः ॥ ३ ९ ॥
बलोन्मत्त रावण इच्छानुसार रूप धारण करने और आकाशमें भी चलनेमें समर्थ था । उसने दैत्यों और देवताओंपर आक्रमण करके उनके पास जो रत्न या रत्नभूत वस्तुएँ थीं, उन सबका अपहरण कर लिया ॥ ३ ९ ॥
रावयामास लोकान् यत् तस्माद्रावण उच्यते ।
दशग्रीवः कामबलो देवानां भयमादधत् ॥ ४० ॥
उसने सम्पूर्ण लोकोंको रुला दिया था; इसलिये वह रावण कहलाता है । दशाननका बल उसके इच्छानुसार बढ़ जाता था; अतः वह सदा देवताओंको भयभीत किये रहता था ॥ ४० ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि रावणादिवरप्राप्तौ पञ्चसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७५ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें रावण आदिको वरप्राप्तिविषयक दो सौ पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७५ ॥
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षट्सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः देवताओंका ब्रह्माजीके पास जाकर रावणके अत्याचारसे बचानेके लिये प्रार्थना करना तथा ब्रह्माजीकी आज्ञासे देवताओंका रीछ और वानरयोनिमें संतान उत्पन्न करना एवं दुन्दुभी गन्धर्वीका मन्थरा बनकर आना मार्कण्डेय उवाच
ततो ब्रह्मर्षयः सर्वे सिद्धा देवर्षयस्तथा ।
हव्यवाहं पुरस्कृत्य ब्रह्माणं शरणं गताः ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! तत्पश्चात् रावणसे कष्ट पाये हुए ब्रह्मर्षि, देवर्षि तथा सिद्धगण अग्निदेवको आगे करके ब्रह्माजीकी शरणमें गये ॥ १ ॥
अग्निरुवाच
योऽसौ विश्रवसः पुत्रो दशग्रीवो महाबलः ।
अवध्यो वरदानेन कृतो भगवता पुरा ॥ २ ॥
स बाधते प्रजाः सर्वा विप्रकारैर्महाबलः ।
ततो नस्त्रातु भगवन् नान्यस्त्राता हि विद्यते ॥ ३ ॥
अग्निदेव बोले- भगवन्! आपने पहले जो वरदान देकर विश्रवाके पुत्र महाबली रावणको अवध्य कर दिया है, वह महाबलवान् राक्षस अब संसारकी समस्त प्रजाको अनेक प्रकारसे सता रहा है; अतः आप ही उसके भयसे हमारी रक्षा कीजिये । आपके सिवा हमारा दूसरा कोई रक्षक नहीं है ॥ २-३ ॥ ब्रह्मोवाच
न स देवासुरैः शक्यो युद्धे जेतुं विभावसो ।
विहितं तत्र यत् कार्यमभितस्तस्य निग्रहः ॥ ४ ॥
ब्रह्माजीने कहा - अग्ने! देवता या असुर उसे युद्धमें नहीं जीत सकते । उसके विनाशके लिये जो आवश्यक कार्य था, वह कर दिया गया । अब सब प्रकारसे उस दुष्टका दमन हो जायगा ॥ ४ ॥
तदर्थमवतीर्णोऽसौ मन्नियोगाच्चतुर्भुजः ।
विष्णुः प्रहरतां श्रेष्ठः स तत् कर्म करिष्यति ॥ ५ ॥
उस राक्षसके निग्रहके लिये मैंने चतुर्भुज भगवान् विष्णुसे अनुरोध किया था । मेरी प्रार्थनासे वे भगवान् भूतलपर अवतार ले चुके हैं । वे योद्धाओंमें श्रेष्ठ हैं; अतः वे ही रावणके
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दमनका कार्य करेंगे ॥ ५ ॥
मार्कण्डेय उवाच
पितामहस्ततस्तेषां संनिधौ शक्रमब्रवीत् ।
सर्वैर्देवगणैः सार्धं सम्भव त्वं महीतले ॥ ६ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर ब्रह्माजीने उन देवताओंके समीप ही इन्द्रसे कहा — ‘ तुम समस्त देवताओंके साथ भूतलपर जन्म ग्रहण करो ॥ ६ ॥
विष्णोः सहायानृक्षीषु वानरीषु च सर्वशः ।
जनयध्वं सुतान् वीरान् कामरूपबलान्वितान् ॥ ७ ॥
‘ वहाँ रीछों और वानरोंकी स्त्रियोंसे ऐसे वीर पुत्रको उत्पन्न करो, जो इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ, बलवान् तथा भूतलपर अवतीर्ण हुए भगवान् विष्णुके योग्य सहायक हों' ॥ ७ ॥
ततो भागानुभागेन देवगन्धर्वपन्नगाः ।
अवतर्तुं महीं सर्वे मन्त्रयामासुरञ्जसा ॥ ८ ॥
तदनन्तर देवता, गन्धर्व और नाग अपने - अपने अंश एवं अंशांशसे इस पृथ्वीपर अवतीर्ण होनेके लिये परस्पर परामर्श करने लगे ॥ ८ ॥
तेषां समक्षं गन्धर्वी दुन्दुभीं नाम नामतः ।
शशास वरदो देवो गच्छ कार्यार्थसिद्धये ॥ ९ ॥
फिर वरदायक देवता ब्रह्माजीने उन सबके सामने ही दुन्दुभी नामवाली गन्धर्वीको आज्ञा दी कि ' तुम भी देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये भूतलपर जाओ ॥ ९ ॥
पितामहवचः श्रुत्वा गन्धर्वी दुन्दुभी ततः ।
मन्थरा मानुषे लोके कुब्जा समभवत् तदा ॥ १० ॥
पितामहकी बात सुनकर गन्धर्वी दुन्दुभी मनुष्यलोकमें आकर मन्थरा नामसे प्रसिद्ध कुबड़ी दासी हुई ॥ १० ॥
शक्रप्रभृतयश्चैव सर्वे ते सुरसत्तमाः ।
वानरर्क्षवरस्त्रीषु जनयामासुरात्मजान् ॥ ११ ॥
तेऽन्ववर्तन् पितॄन् सर्वे यशसा च बलेन च ।
भेत्तारो गिरिशृङ्गाणां शालतालशिलायुधाः ॥ १२ ॥
इन्द्र आदि समस्त श्रेष्ठ देवता भी वानरों तथा रीछोंकी उत्तम स्त्रियोंसे संतान उत्पन्न करने लगे । वे सब वानर और रीछ यश तथा बलमें अपने पिता देवताओंके समान ही हुए । वे पर्वतोंके शिखर तोड़ डालनेकी शक्ति रखते थे एवं शाल (साखू) और ताल ( ताड़ ) -के वृक्ष तथा पत्थरोंकी चट्टानें ही उनके आयुध थे ॥ ११-१२ ॥ वज्रसंहननाः सर्वे सर्वे चौघबलास्तथा ।