02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 1981–1990
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1981–1990
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आरम्भ किया है ॥ ६ ॥
द्युमत्सेन उवाच
व्रतं भिन्धीति वक्तुं त्वां नास्मि शक्तः कथञ्चन ।
पारयस्वेति वचनं युक्तमस्मद्विधो वदेत् ॥ ७ ॥
द्युमत्सेनने कहा- यह तो मैं तुम्हें किसी तरह नहीं कह सकता कि ' बेटी! तुम व्रत भंग कर दो । ' मेरे - जैसा मनुष्य यही समुचित बात कह सकता है कि ' तुम व्रतको निर्विघ्न पूर्ण करो ' ॥ ७ ॥
मार्कण्डेय उवाच
एवमुक्त्वा द्युमत्सेनो विरराम महामनाः ।
तिष्ठन्ती चैव सावित्री काष्ठभूतेव लक्ष्यते ॥ ८ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! ऐसा कहकर महामना द्युमत्सेन चुप हो गये ।
सावित्री एक स्थानपर खड़ी हुई काठ - सी दिखायी देती थी ॥ ८ ॥
श्वोभूते भर्तृमरणे सावित्र्या भरतर्षभ ।
दुःखान्वितायास्तिष्ठन्त्या सा रात्रिर्व्यत्यवर्तत ॥ ९ ॥
भरतश्रेष्ठ! कल ही पतिदेवकी मृत्यु होनेवाली है, यह सोचकर दुःखमें डूबी हुई सावित्रीकी वह रात खड़े ही खड़े बीत गयी ॥ ९ ॥
अद्य तद् दिवसं चेति हुत्वा दीप्तं हुताशनम् ।
युगमात्रोदिते सूर्ये कृत्वा पौर्वाह्निकीः क्रियाः ॥ १० ॥
दूसरे दिन यह सोचकर कि आज ही वह दिन है, उसने सूर्यदेवके चार हाथ ऊपर उठते-उठते पूर्वाह्णकालके सब कृत्य पूरे कर लिये और प्रज्वलित अग्निमें आहुति दी ॥ १० ॥
ततः सर्वान् द्विजान् वृद्धान् श्वश्रूं श्वशुरमेव च ।
अभिवाद्यानुपूर्व्येण प्राञ्जलिर्नियता स्थिता ॥ ११ ॥
फिर सभी ब्राह्मणों, बड़े -बूढ़ों और सास- ससुरको क्रमशः प्रणाम करके वह नियमपूर्वक हाथ जोड़कर उनके सामने खड़ी रही ॥ ११ ॥
अवैधव्याशिषस्ते तु सावित्र्यर्थं हिताः शुभाः ।
ऊचुस्तपस्विनः सर्वे तपोवननिवासिनः ॥ १२ ॥
उस तपोवनमें रहनेवाले सभी तपस्वियोंने सावित्रीके लिये अवैधव्यसूचक— सौभाग्यवर्धक, शुभ और हितकर आशीर्वाद दिये ॥ १२ ॥
एवमस्त्विति सावित्री ध्यानयोगपरायणा ।
मनसा ता गिरः सर्वा प्रत्यगृह्णात् तपस्विनाम् ॥ १३ ॥
सावित्रीने ध्यानयोगमें स्थित हो तपस्वियोंकी उस आशीर्वादमयी वाणीको 'एवमस्तु (ऐसा ही हो ) ' कहकर मन - ही- मन शिरोधार्य किया ॥ १३ ॥
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तं कालं तं मुहूर्तं च प्रतीक्षन्ती नृपात्मजा ।
यथोक्तं नारदवचश्चिन्तयन्ती सुदुःखिता ॥ १४ ॥
फिर पतिकी मृत्युसे सम्बन्ध रखनेवाले समय और मुहूर्तकी प्रतीक्षा करती हुई राजकुमारी सावित्री नारदजीके पूर्वोक्त वचनका चिन्तन करके बहुत दुःखी हो गयी ॥ १४ ॥
ततस्तु श्वश्रूश्वशुरावूचतुस्तां नृपात्मजाम् ।
एकान्तमास्थितां वाक्यं प्रीत्या भरतसत्तम ॥ १५ ॥
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर सास और ससुरने एकान्तमें बैठी हुई राजकुमारी सावित्रीसे प्रेमपूर्वक इस प्रकार कहा ॥ १५ ॥
श्वशुरावूचतुः
व्रतं यथोपदिष्टं तु तथा तत् पारितं त्वया ।
आहारकालः सम्प्राप्तः क्रियतां यदनन्तरम् ॥ १६ ॥
सास - ससुर बोले — बेटी! तुमने शास्त्रके उपदेशके अनुसार अपना व्रत पूरा कर लिया
है, अब पारण करनेका समय हो गया है । अतः जो कर्तव्य है, वह करो ॥ १६ ॥
सावित्र्युवाच
अस्तं गते मयाऽऽदित्ये भोक्तव्यं कृतकामया ।
एष मे हृदि संकल्पः समयश्च कृतो मया ॥ १७ ॥
सावित्री बोली - सूर्यास्त होनेपर जब मेरा मनोरथ पूर्ण हो जायगा तभी मैं भोजन करूँगी । यह मेरे मनका संकल्प है और मैंने ऐसा करनेकी प्रतिज्ञा कर ली है ॥ १७ ॥
मार्कण्डेय उवाच
एवं सम्भाषमाणायाः सावित्र्या भोजनं प्रति ।
स्कन्धे परशुमादाय सत्यवान् प्रस्थितो वनम ॥ १८ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! जब सावित्री भोजनके सम्बन्धमें इस प्रकार बातें कर रही थी, उसी समय सत्यवान् कंधेपर कुल्हाड़ी रखकर ( फल- फूल, समिधा आदि लानेके लिये ) वनकी ओर चले ॥ १८ ॥
सावित्री त्वाह भर्तारं नैकस्त्वं गन्तुमर्हसि ।
सह त्वया गमिष्यामि न हि त्वां हातुमुत्सहे ॥ १ ९ ॥
उस समय सावित्रीने अपने पतिसे कहा - नाथ! आप अकेले न जाइये । मैं भी आपके साथ चलूँगी । आज मैं आपको अकेला नहीं छोड़ सकती ॥ १ ९ ॥
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सत्यवानुवाच
वनं न गतपूर्वं ते दुःखः पन्थाश्च भाविनि ।
व्रतोपवासक्षामा च कथं पद्भयां गमिष्यसि ॥ २० ॥
सत्यवान्ने कहा — सुन्दरि! तुम पहले कभी वनमें नहीं गयी हो । वनका रास्ता बड़ा दुःखदायक होता है, तुम व्रत और उपवास करनेके कारण दुर्बल हो रही हो । ऐसी दशामें पैदल कैसे चल सकोगी? ॥ २० ॥
सावित्र्युवाच
उपवासान्न मे ग्लानिर्नास्ति चापि परिश्रमः ।
गमने च कृतोत्साहां प्रतिषेधुं न मार्हसि ॥ २१ ॥
सावित्री बोली – उपवासके कारण मुझे किसी प्रकारकी शिथिलता और थकावट नहीं है । चलनेके लिये मेरे मनमें पूर्ण उत्साह है, अतः आप मुझे मना न कीजिये ॥ सत्यवानुवाच
यदि ते गमनोत्साहः करिष्यामि तव प्रियम् ।
मम त्वामन्त्रय गुरून् न मां दोषः स्पृशेदयम् ॥ २२ ॥
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सत्यवान्ने कहा — यदि तुम्हें चलनेका उत्साह है तो मैं तुम्हारा प्रिय मनोरथ पूर्ण करूँगा । परंतु तुम मेरे माता - पितासे पूछ लो, जिससे मुझे दोषका भागी न होना पड़े ॥ मार्कण्डेय उवाच
साभिवाद्याब्रवीच्छ्वश्रूं श्वशुरं च महाव्रता ।
अयं गच्छति मे भर्ता फलाहारो महावनम् ॥ २३ ॥
इच्छेयमभ्यनुज्ञाता आर्यया श्वशुरेण ह ।
अनेन सह निर्गन्तुं न मेऽद्य विरहः क्षमः ॥ २४ ॥
गुर्वग्निहोत्रार्थकृते प्रस्थितश्च सुतस्तव ।
न निवार्यो निवार्यः स्यादन्यथा प्रस्थितो वनम् ॥ २५ ॥
संवत्सरः किंचिदूनो न निष्क्रान्ताहमाश्रमात् ।
वनं कुसुमितं द्रष्टुं परं कौतूहलं हि मे ॥ २६ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - तब महान् व्रतका पालन करनेवाली सावित्रीने अपने सास-ससुरको प्रणाम करके कहा– ' ये मेरे पतिदेव फल आदि लानेके लिये महान् वनमें जा रहे हैं । यदि सासजी और ससुरजी मुझे आज्ञा दें तो मैं भी इनके साथ जाना चाहती हूँ । आज मुझे इनका एक क्षणका भी विरह सहा नहीं जाता । आपके पुत्र आज गुरुजनोंके लिये तथा अग्निहोत्रके उद्देश्यसे फल, फूल और समिधा आदि लानेके लिये वनमें जा रहे हैं, अतः उनको रोकना उचित नहीं है । हाँ, यदि किसी दूसरे कार्यके लिये वनमें जाते होते तो उन्हें रोका भी जा सकता था । एक वर्षसे कुछ ही कम हुआ, मैं आश्रमसे बाहर नहीं निकली । अतः आज फूलोंसे भरे हुए वनको देखनेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है ॥ २३– २६ ॥ द्युमत्सेन उवाच
यतः प्रभृति सावित्री पित्रा दत्ता स्नुषा मम ।
नानयाभ्यर्थनायुक्तमुक्तपूर्वं स्मराम्यहम् ॥ २७ ॥
द्युमत्सेन बोले- जबसे सावित्रीके पिताने इसे मेरी पुत्रवधू बनाकर दिया है, तबसे आजतक इसने पहले कभी मुझसे किसी बातके लिये प्रार्थना की हो, इसका मुझे स्मरण नहीं है ॥ २७ ॥
तदेषा लभतां कामं यथाभिलषितं वधूः ।
अप्रमादश्च कर्तव्यः पुत्रि सत्यवतः पथि ॥ २८ ॥
अतः आज मेरी पुत्रवधू अपना अभीष्ट मनोरथ प्राप्त करे । बेटी! जा, सत्यवान्के मार्गमें सावधानी रखना ॥ २८ ॥
मार्कण्डेय उवाच
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उभाभ्यामभ्यनुज्ञाता सा जगाम यशस्विनी ।
सह भर्त्रा हसन्तीव हृदयेन विदूयता ॥ २ ९ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! इस प्रकार सास और ससुर दोनोंकी आज्ञा पाकर यशस्विनी सावित्री अपने पतिदेवके साथ चल दी, वह ऊपरसे तो हँसती- सी जान पड़ती थी, किंतु उसका हृदय दुःखकी ज्वालासे दग्ध हो रहा था ॥ २ ९ ॥
सा वनानि विचित्राणि रमणीयानि सर्वशः ।
मयूरगणजुष्टानि ददर्श विपुलेक्षणा ॥ ३० ॥
विशाल नेत्रोंवाली सावित्रीने सब ओर घूम- घूमकर मयूरसमूहोंसे सेवित रमणीय और विचित्र वन देखे ॥ ३० ॥
नदीः पुण्यवहाश्चैव पुष्पितांश्च नगोत्तमान् ।
सत्यवानाह पश्येति सावित्रीं मधुरं वचः ॥ ३१ ॥
पवित्र जल बहानेवाली नदियों तथा फूलोंसे लदे हुए सुन्दर वृक्षोंको लक्ष्य करके सत्यवान् सावित्रीसे मधुर वाणीमें कहते – ' प्रिये! देखो, कैसा मनोहर दृश्य है ' ॥ ३१ ॥
निरीक्षमाणा भर्तारं सर्वावस्थमनिन्दिता ।
मृतमेव हि भर्तारं काले मुनिवचः स्मरन् ॥ ३२ ॥
सती- साध्वी सावित्री अपने पतिकी सभी अवस्थाओंका निरीक्षण करती थी । नारदजीके वचनोंको स्मरण करके उसे निश्चय हो गया था कि समयपर मेरे पतिकी मृत्यु अवश्यम्भावी है ॥ ३२ ॥
अनुव्रजन्ती भर्तारं जगाम मृदुगामिनी ।
द्विधेव हृदयं कृत्वा तं च कालमवेक्षती ॥ ३३ ॥
मन्दगतिसे चलनेवाली सावित्री मानो अपने हृदयके दो भाग करके एकसे अपने पतिका अनुसरण करती और दूसरेसे प्रतिक्षण उनके मृत्युकालकी प्रतीक्षा कर रही थी ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि पतिव्रतामाहात्म्यपर्वणि सावित्र्युपाख्याने षण्णवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २ ९ ६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत पतिव्रतामाहात्म्यपर्वमें सावित्री- उपाख्यानविषयक दो सौ छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ९६ ॥
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सप्तनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः सावित्री और यमका संवाद, यमराजका संतुष्ट होकर सावित्रीको अनेक वरदान देते हुए मरे हुए सत्यवान्को भी जीवित कर देना तथा सत्यवान् और सावित्रीका वार्तालाप एवं आश्रमकी ओर प्रस्थान मार्कण्डेय उवाच
अथ भार्यासहायः स फलान्यादाय वीर्यवान् ।
कठिनं पूरयामास ततः काष्ठान्यपाटयत् ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - तदनन्तर पत्नीसहित शक्तिशाली सत्यवान्ने फल चुनकर
एक काठकी टोकरी भर ली । तत्पश्चात् वे लकड़ी चीरने लगे ॥ १ ॥
तस्य पाटयतः काष्ठं स्वेदो वै समजायत ।
व्यायामेन च तेनास्य जज्ञे शिरसि वेदना ॥ २ ॥
सोऽभिगम्य प्रियां भार्यामुवाच श्रमपीडितः । लकड़ी चीरते समय परिश्रमके कारण उनके शरीरसे पसीना निकल आया और उसी परिश्रमसे उनके सिरमें दर्द होने लगा । तब वे श्रमसे पीड़ित हो अपनी प्यारी पत्नीके पास जाकर बोले— ॥ २३ ॥
सत्यवानुवाच व्यायामेन ममानेन जाता शिरसि वेदना ॥ ३ ॥
अङ्गानि चैव सावित्रि हृदयं दूयतीव च ।
अस्वस्थमिव चात्मानं लक्षये मितभाषिणि ॥ ४ ॥
शूलैरिव शिरो विद्धमिदं संलक्षयाम्यहम् ।
तत् स्वप्तुमिच्छे कल्याणि न स्थातुं शक्तिरस्ति मे ॥ ५ ॥
सत्यवान्ने कहा – सावित्री! आज लकड़ी काटनेके परिश्रमसे मेरे सिरमें दर्द होने लगा है, सारे अंगोंमें पीड़ा हो रही है और हृदय दग्ध-सा होता जान पड़ता है । मितभाषिणी प्रिये! मैं अपने - आपको अस्वस्थ -सा देख रहा हूँ । ऐसा जान पड़ता है, कोई शूलोंसे मेरे सिरको छेद रहा है । कल्याणि! अब मैं सोना चाहता हूँ। मुझमें खड़े रहनेकी शक्ति नहीं रह गयी है ॥ ३–५ ॥
सा समासाद्य सावित्री भर्तारमुपगम्य च ।
उत्सङ्गेऽस्य शिरः कृत्वा निषसाद महीतले ॥ ६ ॥
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यह सुनकर सावित्री शीघ्र अपने पतिके पास आयी और उनका सिर गोदीमें लेकर पृथ्वीपर बैठ गयी ॥ ६ ॥
ततः सा नारदवचो विमृशन्ती तपस्विनी ।
तं मुहूर्तं क्षणं वेलां दिवसं च युयोज ह ॥ ७ ॥
फिर वह तपस्विनी राजकन्या नारदजीकी बात याद करके उस मुहूर्त, क्षण, समय और दिनका योग मिलाने लगी ॥ ७ ॥
मुहूर्तादेव चापश्यत् पुरुषं रक्तवाससम् ।
बद्धमौलिं वपुष्मन्तमादित्यसमतेजसम् ॥ ८ ॥
श्यामावदातं रक्ताक्षं पाशहस्तं भयावहम् ।
स्थितं सत्यवतः पार्श्वे निरीक्षन्तं तमेव च ॥ ९ ॥
दो ही घड़ीमें उसने देखा, एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए हैं, जिनके शरीरपर लाल रंगका वस्त्र शोभा पा रहा है । सिरपर मुकुट बँधा हुआ है । सूर्यके समान तेजस्वी होनेके कारण वे मूर्तिमान् सूर्य ही जान पड़ते हैं । उनका शरीर श्याम एवं उज्ज्वल प्रभासे उद्भासित है, नेत्र लाल हैं । उनके हाथमें पाश है । उनका स्वरूप डरावना है । वे सत्यवान्के पास खड़े हैं और बार- बार उन्हींकी ओर देख रहे हैं ॥ ८ - ९ ॥
तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय भर्तुर्न्यस्य शनैः शिरः ।
कृताञ्जलिरुवाचार्ता हृदयेन प्रवेपती ॥ १० ॥
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उन्हें देखते ही सावित्रीने धीरेसे पतिका मस्तक भूमिपर रख दिया और सहसा खड़ी हो हाथ जोड़कर काँपते हुए हृदयसे वह आर्त वाणीमें बोली ॥ १० ॥
सावित्र्युवाच
दैवतं त्वाभिजानामि वपुरेतद्ध्यमानुषम् ।
कामया ब्रूहि देवेश कस्त्वं किं चिकीर्षसि ॥ ११ ॥
सावित्रीने कहा- मैं समझती हूँ, आप कोई देवता हैं; क्योंकि आपका यह शरीर मनुष्यों- जैसा नहीं है । देवेश्वर! यदि आपकी इच्छा हो तो बताइये आप कौन हैं और क्या करना चाहते हैं ॥ ११ ॥
यम उवाच
पतिव्रतासि सावित्रि तथैव च तपोऽन्विता ।
अतस्त्वामभिभाषामि विद्धि मां त्वं शुभे यमम् ॥ १२ ॥
यमराज बोले – सावित्री! तू पतिव्रता और तपस्विनी है, इसलिये मैं तुझसे वार्तालाप कर सकता हूँ । शुभे! तू मुझे यमराज जान ॥ १२ ॥
अयं ते सत्यवान् भर्ता क्षीणायुः पार्थिवात्मजः ।
नेष्यामि तमहं बद्ध्वा विद्धयेतन्मे चिकीर्षितम् ॥ १३ ॥
तेरे पति इस राजकुमार सत्यवान्की आयु समाप्त हो गयी है, अतः मैं इसे बाँधकर ले जाऊँगा । बस, मैं यही करना चाहता हूँ ॥ १३ ॥
सावित्र्युवाच
श्रूयते भगवन् दूतास्तवागच्छन्ति मानवान् ।
नेतुं किल भवान् कस्मादागतोऽसि स्वयं प्रभो ॥ १४ ॥
सावित्रीने पूछा — भगवन्! मैंने तो सुना है कि मनुष्योंको ले जानेके लिये आपके दूत आया करते हैं । प्रभो! आप स्वयं यहाँ कैसे चले आये? ॥ १४ ॥
मार्कण्डेय उवाच
इत्युक्तः पितृराजस्तां भगवान् स्वचिकीर्षितम् ।
यथावत् सर्वमाख्यातुं तत्प्रियार्थं प्रचक्रमे ॥ १५ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! सावित्रीके इस प्रकार पूछनेपर पितृराज भगवान् यमने उसका प्रिय करनेके लिये अपना सारा अभिप्राय यथार्थरूपसे बताना आरम्भ किया ॥ १५ ॥
अयं च धर्मसंयुक्तो रूपवान् गुणसागरः ।
नार्हो मत्पुरुषैर्नेतुमतोऽस्मि स्वयमागतः ॥ १६ ॥
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‘ यह सत्यवान् धर्मात्मा, रूपवान् और गुणोंका समुद्र है । मेरे दूतोंद्वारा ले जाया जाने योग्य नहीं है । इसीलिये मैं स्वयं आया हूँ' ॥ १६ ॥
ततः सत्यवतः कायात् पाशबद्धं वशं गतम् ।
अङ्गुष्ठमात्रं पुरुषं निश्चकर्ष यमो बलात् ॥ १७ ॥
तदनन्तर यमराजने सत्यवान्के शरीरसे पाशमें बँधे हुए अंगुष्ठमात्र परिमाणवाले विवश हुए जीवको बलपूर्वक खींचकर निकाला ॥ १७ ॥
ततः समुद्धृतप्राणं गतश्वासं हतप्रभम् ।
निर्विचेष्टं शरीरं तद् बभूवाप्रियदर्शनम् ॥ १८ ॥
फिर तो प्राण निकल जानेसे उसकी साँस बंद हो गयी – अंगकान्ति फीकी पड़ गयी और शरीर निश्चेष्ट होकर अपरूप दिखायी देने लगा ॥ १८ ॥
यमस्तु तं ततो बद्ध्वा प्रयातो दक्षिणामुखः ।
सावित्री चैव दुःखार्ता यममेवान्वगच्छत ।
नियमव्रतसंसिद्धा महाभागा पतिव्रता ॥ १ ९ ॥
यमराज उस जीवको बाँधकर साथ लिये दक्षिण दिशाकी ओर चल दिये । सावित्री दुःखसे आतुर हो यमराजके ही पीछे - पीछे चल पड़ी । वह परम सौभाग्यवती पतिव्रता राजकन्या नियमपूर्वक व्रतोंके पालनसे पूर्णतः सिद्ध हो चुकी थी । ( अतः निर्बाध गतिसे सर्वत्र आने - जानेमें समर्थ थी ) ॥ १ ९ ॥ यम उवाच
निवर्त गच्छ सावित्रि कुरुष्वास्यौर्ध्वदेहिकम् ।
कृतं भर्तुस्त्वयाऽऽनृण्यं यावद् गम्यं गतं त्वया ॥ २० ॥
यमराज बोले — सावित्री! अब तू लौट जा, सत्यवान्का अन्त्येष्टि- संस्कार कर । अब तू पतिके ऋणसे उऋण हो गयी । पतिके पीछे तुझे जहाँतक आना चाहिये था, तू वहाँतक आ चुकी ॥ २० ॥
सावित्र्युवाच
यत्र मे नीयते भर्ता स्वयं वा यत्र गच्छति ।
मया च तत्र गन्तव्यमेष धर्मः सनातनः ॥ २१ ॥
सावित्रीने कहा — जहाँ मेरे पति ले जाये जाते हैं अथवा ये स्वयं जहाँ जा रहे हैं, वहीं मुझे भी जाना चाहिये; यही सनातन धर्म है ॥ २१ ॥
तपसा गुरुभक्त्या च भर्तुः स्नेहाद् व्रतेन च ।
तव चैव प्रसादेन न मे प्रतिहता गतिः ॥ २२ ॥
तपस्या, गुरुभक्ति, पतिप्रेम, व्रतपालन तथा आपकी कृपासे मेरी गति कहीं भी रुक नहीं सकती ॥ २२ ॥
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प्राहुः साप्तपदं मैत्रं बुधास्तत्त्वार्थदर्शिनः ।
मित्रतां च पुरस्कृत्य किञ्चिद् वक्ष्यामि तच्छृणु ॥ २३ ॥
तत्त्वार्थदर्शी विद्वान् ऐसा कहते हैं कि सात पग साथ चलनेमात्रसे मैत्री- सम्बन्ध स्थापित हो जाता है, उसी मित्रताको सामने रखकर मैं आपसे कुछ निवेदन करूँगी, उसे सुनिये ॥ २३ ॥
नानात्मवन्तस्तु वने चरन्ति धर्मं च वासं च परिश्रमं च । विज्ञानतो धर्ममुदाहरन्ति तस्मात् सन्तो धर्ममाहुः प्रधानम् ॥ २४ ॥
जिन्होंने अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें नहीं किया है, वे वनमें रहकर धर्मपालन, गुरुकुलवास तथा कष्टसहनरूप तपस्या नहीं कर सकते हैं । जितेन्द्रिय पुरुष ही यह सब कुछ करनेमें समर्थ हैं । महात्मालोग विवेक विचारसे ही धर्म-प्राप्ति बताते हैं, अतः सभी सत्पुरुष धर्मको ही श्रेष्ठ मानते हैं ॥ २४ ॥
एकस्य धर्मेण सतां मतेन सर्वे स्म तं मार्गमनुप्रपन्नाः । मा वै द्वितीयं मा तृतीयं च वाञ्छे तस्मात् सन्तो धर्ममाहुः प्रधानम् ॥ २५ ॥
अपने एक ही वर्णके सत्पुरुष सम्मत धर्मका पालन करनेसे सभी लोग उस विज्ञान-मार्गपर पहुँच जाते हैं, जो सबका लक्ष्य है । अतः दूसरे या तीसरे वर्णकी इच्छा नहीं रखनी चाहिये । इसलिये साधु पुरुष केवल वर्ण- धर्मको ही प्रधानता देते हैं ॥ २५ ॥
यम उवाच निवर्त तुष्टोऽस्मि तवानया गिरा स्वराक्षरव्यञ्जनहेतुयुक्तया । वरं वृणीष्वेह विनास्य जीवितं ददानि ते सर्वमनिन्दिते वरम् ॥ २६ ॥
यमराज बोले — अनिन्दिते! तू लौट जा । स्वर, अक्षर, व्यंजन एवं युक्तियोंसे युक्त तेरी इन बातोंसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ । तू यहाँ मुझसे कोई वर माँग ले । सत्यवान्के जीवनके सिवा मैं और सब कुछ तुझे दे सकता हूँ ॥ २६ ॥
सावित्र्युवाच च्युतः स्वराज्याद् वनवासमाश्रितो विनष्टचक्षुः श्वशुरो ममाश्रमे । स लब्धचक्षुर्बलवान् भवेन्नृप-