श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1991–2000
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1991–2000
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स्तव प्रसादाज्ज्वलनार्कसंनिभः ॥ २७ ॥
सावित्री बोली- भगवन्! मेरे श्वशुर अपने राज्यसे भ्रष्ट होकर वनमें रहते हैं । उनकी आँखें भी नष्ट हो गयी हैं । मैं चाहती हूँ, आपकी कृपासे उन महाराजको उनकी आँखें मिल जायँ और वे बलवान् तथा अग्नि एवं सूर्यके समान तेजस्वी हो जायँ ॥ २७ ॥
यम उवाच ददानि तेऽहं तमनिन्दिते वरं यथा त्वयोक्तंभविता च तत् तथा । तवाध्वना ग्लानिमिवोपलक्षये निवर्त गच्छस्व न ते श्रमो भवेत् ॥ २८ ॥
यमराज बोले — अनिन्दिते! मैं तुझे वर देता हूँ । तूने जैसा कहा है, वह सब वैसा ही होगा । मैं देखता हूँ, तू राह चलनेके कारण बहुत थक गयी है । अब लौट जा, जिससे तुझे अधिक परिश्रम न हो ॥ २८ ॥
सावित्र्युवाच श्रमः कुतो भर्तृसमीपतो हि मे यतो हि भर्ता मम सा गतिर्ध्रुवा । यतः पतिं नेष्यसि तत्र मे गतिः सुरेश भूयश्च वचो निबोध मे ॥ २ ९ ॥ सावित्री बोली – स्वामीके समीप रहते हुए मुझे श्रम हो ही कैसे सकता है । जहाँ मेरे पतिदेव रहेंगे, वहीं मेरी भी गति निश्चित है । आप जहाँ मेरे प्राणनाथको ले जायँगे, वहीं मेरा
जाना भी अवश्यम्भावी है । देवेश्वर! आप फिर मेरी बात सुनिये ॥ २ ९ ॥
सतां सकृत्संगतमीप्सितं परं ततः परं मित्रमिति प्रचक्षते । न चाफलं सत्पुरुषेण सङ्गतं ततः सतां सन्निवसेत् समागमे ॥ ३० ॥
सत्पुरुषोंका एक बारका समागम भी अत्यन्त अभीष्ट होता है । उनके साथ मित्रता हो जाना उससे भी बढ़कर बताया गया है । साधु पुरुषका संग कभी निष्फल नहीं होता; अतः सदा सत्पुरुषोंके ही समीप रहना चाहिये ॥ ३० ॥
यम उवाच मनोऽनुकूलं बुधबुद्धिवर्धनं त्वया यदुक्तं वचनं हिताश्रयम् । विना पुनः सत्यवतोऽस्य जीवितं
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वरं द्वितीयं वरयस्व भामिनि ॥ ३१ ॥
यमराज बोले — भामिनी! तूने जो सबके हितकी बात कही है, वह मेरे मनके अनुकूल है तथा विद्वानोंकी भी बुद्धिको बढ़ानेवाली है; अतः इस सत्यवान्के जीवनको छोड़कर तू दूसरा कोई वर और माँग ले ॥ ३१ ॥
सावित्र्युवाच हृतं पुरा मे श्वशुरस्य धीमतः स्वमेव राज्यं लभतां स पार्थिवः । जह्यात् स्वधर्मं न च मे गुरुर्यथा द्वितीयमेतद् वरयामि ते वरम् ॥ ३२ ॥
सावित्री बोली- मेरे बुद्धिमान् श्वशुरका राज्य, जो पहले उनसे छीन लिया गया है, उसे वे महराज पुनः प्राप्त कर लें तथा वे मेरे पूज्य गुरु महाराज द्युमत्सेन कभी अपना धर्म न छोड़ें; यही दूसरा वर मैं आपसे माँगती हूँ ॥ ३२ ॥
यम उवाच स्वमेव राज्यं प्रतिपत्स्यतेऽचिरा- न्न च स्वधर्मात् परिहास्यते नृपः । कृतेन कामेन मया नृपात्मजे निवर्त गच्छस्व न ते श्रमो भवेत् ॥ ३३ ॥
यमराज बोले- राजा द्युमत्सेन शीघ्र एवं अनायास ही अपना राज्य प्राप्त कर लेंगे और वे कभी अपने धर्मका भी परित्याग नहीं करेंगे । राजकुमारी! मेरेद्वारा अब तेरी इच्छा पूरी हो गयी । तू लौट जा, जिससे तुझे परिश्रम न हो ॥ ३३ ॥
सावित्र्युवाच प्रजास्त्वयैता नियमेन संयता नियम्य चैता नयसे निकामया । ततो यमत्वं तव देव विश्रुतं निबोध चेमां गिरमीरितां मया ॥ ३४ ॥
सावित्री बोली – देव! इस सारी प्रजाको आप नियमसे संयममें रखते हैं और उसका नियमन करके आप अपनी इच्छाके अनुसार उसे विभिन्न लोकोंमें ले जाते हैं । इसीलिये
आपका ‘ यम' नाम सर्वत्र विख्यात है । मैं जो बात कहती हूँ, उसे सुनिये ॥ ३४ ॥
अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा ।
अनुग्रहश्च दानं च सतां धर्मः सनातनः ॥ ३५ ॥
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मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीसे द्रोह न करना, सबपर दयाभाव बनाये रखना और दान देना यह साधु पुरुषोंका सनातन धर्म है ॥ ३५ ॥
एवंप्रायश्च लोकोऽयं मनुष्याः शक्तिपेशलाः ।
सन्तस्त्वेवाप्यमित्रेषु दयां प्राप्तेषु कुर्वते ॥ ३६ ॥
प्रायः इस संसारके लोग अल्पायु होते हैं, मनुष्योंकी शक्तिहीनता तो प्रसिद्ध ही है । आप- जैसे संत- महात्मा तो अपनी शरणमें आये हुए शत्रुओंपर भी दया करते हैं । ( फिर हम-जैसे दीन मनुष्योंपर दया क्यों न करेंगे? ) ॥ ३६ || यम उवाच पिपासितस्येव भवेद् यथा पय- स्तथा त्वया वाक्यमिदं समीरितम् । विना पुनः सत्यवतोऽस्य जीवितं वरं वृणीष्वेह शुभे यदिच्छसि ॥ ३७ ॥
यमराज बोले — शुभे! जैसे प्यासे मनुष्यको प्राप्त हुआ जल आनन्ददायक होता है, उसी प्रकार तेरी कही हुई यह बात मुझे अत्यन्त सुख दे रही है । अतः तू सत्यवान्के जीवनके सिवा और कोई वर, जिसे तूतू लेना चाहे, माँग ले ॥ ३७ ॥
सावित्र्युवाच ममानपत्यः पृथिवीपतिः पिता भवेत् पितुः पुत्रशतं तथौरसम् । कुलस्य सन्तानकरं च यद् भवेत् तृतीयमेतद् वरयामि ते वरम् ॥ ३८ ॥
सावित्रीने कहा — भगवन्! मेरे पिता महाराज अश्वपति पुत्रहीन हैं; उन्हें सौ ऐसे औरस पुत्र प्राप्त हों, जो उनके कुलकी संतानपरम्पराको चलानेवाले हों । मैं आपसे यही तीसरा वर माँगती हूँ ॥ ३८ ॥
यम उवाच कुलस्य सन्तानकरं सुवर्चसं शतं सुतानां पितुरस्तु ते शुभे । कृतेन कामेन नराधिपात्मजे निवर्त दूरं हि पथस्त्वमागता ॥ ३ ९ ॥ यमराज बोले- शुभे! तेरे पिताके कुलकी संतान - परम्पराको चलानेवाले सौ तेजस्वी पुत्र होंगे । राजकुमारी! तेरी यह कामना भी पूरी हुई। अब लौट जा, तू रास्तेसे बड़ी दूर चली आयी है ॥ ३ ९ ॥
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सावित्र्युवाच न दूरमेतन्मम भर्तृसंनिधौ मनो हि मे दूरतरं प्रधावति । अथ व्रजन्नेव गिरं समुद्यतां मयोच्यमानां शृणु भूय एव च ॥ ४० ॥
सावित्रीने कहा — भगवन्! मैं अपने स्वामीके समीप हूँ । इसलिये यह स्थान मेरे लिये दूर नहीं है । मेरा मन तो और भी दूरतक दौड़ लगाता है । आप चलते - चलते ही मेरी कही हुई ये प्रस्तुत बातें पुनः सुनें ॥ ४० ॥
विवस्वतस्त्वं तनयः प्रतापवां-
स्ततो हि वैवस्वत उच्यसे बुधैः ।
समेन धर्मेण चरन्ति ताः प्रजा- स्ततस्तवेहेश्वर धर्मराजता ॥ ४१ ॥
देवेश्वर! आप विवस्वान् ( सूर्य ) -के प्रतापी पुत्र हैं; इसलिये विद्वान् पुरुष आपको वैवस्वत कहते हैं । आप समस्त प्रजाके साथ समतापूर्वक धर्मानुसार आचरण करते हैं, इसलिये आप धर्मराज कहलाते हैं ॥ ४१ ॥
आत्मन्यपि न विश्वासस्तथा भवति सत्सु यः ।
तस्मात् सत्सु विशेषेण सर्वः प्रणयमिच्छति ॥ ४२ ॥
मनुष्यको अपने - आपपर भी उतना विश्वास नहीं होता है, जितना संतोंपर होता है ।
इसलिये सब लोग संतोंसे विशेष प्रेम करना चाहते हैं ॥ ४२ ॥
सौहृदात् सर्वभूतानां विश्वासो नाम जायते ।
तस्मात् सत्सु विशेषेण विश्वासं कुरुते जनः ॥ ४३ ॥
सौहार्दसे ही समस्त प्राणियोंका एक-दूसरेके प्रति विश्वास उत्पन्न होता है । संतोंमें सौहार्द होनेके कारण ही सब लोग उनपर अधिक विश्वास करते हैं ॥ ४३ ॥
यमउवाच उदाहृतं ते वचनं यदङ्गने शुभे न तादृक् त्वदृते श्रुतं मया । अनेन तुष्टोऽस्मि विनास्य जीवितं वरं चतुर्थं वरयस्व गच्छ च ॥ ४४ ॥
यमराज बोले — कल्याणि! तूने जैसी बात कही है, वैसी मैंने तेरे सिवा किसी दूसरेके मुखसे नहीं सुनी है । शुभे! तेरी इस बातसे मैं बहुत संतुष्ट हूँ; तू सत्यवान्के जीवनके सिवा और कोई चौथा वर माँग ले और यहाँसे लौट जा ॥ ४४ ॥
सावित्र्युवाच
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ममात्मजं सत्यवतस्तथौरसं
भवेदुभाभ्यामिह यत् कुलोद्वहम् ।
शतं सुतानां बलवीर्यशालिना- मिदं चतुर्थं वरयामि ते वरम् ॥ ४५ ॥
सावित्रीने कहा- मेरे और सत्यवान्— दोनोंके संयोगसे कुलकी वृद्धि करनेवाले, बल
और पराक्रमसे सुशोभित सौ औरस पुत्र हों । यह मैं आपसे चौथा वर माँगती हूँ ॥ ४५ ॥
यम उवाच शतं सुतानां बलवीर्यशालिनां भविष्यति प्रीतिकरं तवाबले । परिश्रमस्ते न भवन्नृपात्मजे निवर्त दूरं हि पथस्त्वमागता ॥ ४६ ॥
यमराज बोले — अबले! तुझे बल और पराक्रमसे सम्पन्न सौ पुत्र प्राप्त होंगे; जो तेरी प्रसन्नताको बढ़ानेवाले होंगे । राजकुमारी! अब तू लौट जा, जिससे तुझे थकावट न हो । तू रास्तेसे बहुत दूर चली आयी है ॥ ४६ ॥
सावित्र्युवाच सतां सदा शाश्वतधर्मवृत्तिः सन्तो न सीदन्ति न च व्यथन्ति । सतां सद्भिर्नाफलः सङ्गमोऽस्ति सद्भयो भयं नानुवर्तन्ति सन्तः ॥ ४७ ॥
सावित्रीने कहा— सत्पुरुषोंकी वृत्ति निरन्तर धर्ममें ही लगी रहती है । श्रेष्ठ पुरुष कभी दुःखी या व्यथित नहीं होते । सत्पुरुषोंका संतोंके साथ जो समागम होता है, वह कभी निष्फल नहीं होता है । श्रेष्ठ पुरुष संतोंसे कभी भय नहीं मानते हैं ॥ ४७ ॥
सन्तो हि सत्येन नयन्ति सूर्यं सन्तो भूमिं तपसा धारयन्ति । सन्तो गतिर्भूतभव्यस्य राजन् सतां मध्ये नावसीदन्ति सन्तः ॥ ४८ ॥
श्रेष्ठ पुरुष सत्यके बलसे सूर्यका संचालन करते हैं। संत- महात्मा अपनी तपस्यासे इस पृथ्वीको धारण करते हैं । राजन्! सत्पुरुष ही भूत, वर्तमान और भविष्यके आश्रय हैं । श्रेष्ठ पुरुष संतोंके बीचमें रहकर कभी दुःख नहीं उठाते हैं ॥ ४८ ॥
आर्यजुष्टमिदं वृत्तमिति विज्ञाय शाश्वतम् ।
सन्तः परार्थं कुर्वाणा नावेक्षन्ति परस्परम् ॥ ४ ९ ॥
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यह सनातन सदाचार सत्पुरुषोंद्वारा सेवित है । यह जानकर सभी श्रेष्ठ पुरुष परोपकार करते हैं और आपसमें एक- दूसरेकी ओर स्वार्थकी दृष्टिसे कभी नहीं देखते हैं ॥ ४ ९ ॥ न च प्रसादः सत्पुरुषेषु मोघो न चाप्यर्थो नश्यति नापि मानः । यस्मादेतन्नियतं सत्सु नित्यं तस्मात् सन्तो रक्षितारो भवन्ति ॥ ५० ॥
सत्पुरुषोंका प्रसाद कभी व्यर्थ नहीं जाता । वहाँ किसीको स्वार्थकी हानि नहीं उठानी पड़ती है और न मान- सम्मान ही नष्ट होता है । ये तीनों ( प्रसाद, अर्थ और मान) संतोंमें नित्य- निरन्तर बने रहते हैं; इसलिये वे सम्पूर्ण जगत्के रक्षक होते हैं ॥ ५० ॥
यम उवाच यथा यथा भाषसि धर्मसंहितं मनोऽनुकूलं सुपदं महार्थवत् । तथा तथा मे त्वयि भक्तिरुत्तमा वरं वृणीष्वाप्रतिमं पतिव्रते ॥ ५१ ॥
यमराज बोले- पतिव्रते! जैसे-जैसे तू गम्भीर अर्थसे युक्त और सुन्दर पदोंसे विभूषित, मनके अनुकूल धर्मसंगत बातें मुझे सुनाती जा रही है, वैसे - ही - वैसे तेरे प्रति मेरी उत्तम भक्ति बढ़ती जाती है; अतः तू मुझसे कोई अनुपम वर माँग ले ॥ ५१ ॥
सावित्र्युवाच न तेऽपवर्गः सुकृताद् विनाकृत- स्तथा यथान्येषु वरेषु मानद । वरं वृणे जीवतु सत्यवानयं यथा मृता ह्येवमहं पतिं विना ॥ ५२ ॥
सावित्रीने कहा — मानद! आपने मुझे जो पुत्र प्राप्तिका वर दिया है, वह पुण्यमय दाम्पत्य - संयोगके बिना सफल नहीं हो सकता । अन्य वरोंकी जैसी स्थिति है, वैसी इस अन्तिम वरकी नहीं है । इसलिये मैं पुनः यह वर माँगती हूँ कि ये सत्यवान् जीवित हो जायँ; क्योंकि इन पतिदेवताके बिना मैं मरी हुईके ही समान हूँ ॥ ५२ ॥
न कामये भर्तृविनाकृता सुखं न कामये भर्तृविनाकृता दिवम् । न कामये भर्तृविनाकृता श्रियं न भर्तृहीना व्यवसामि जीवितुम् ॥ ५३ ॥
पतिके बिना यदि कोई सुख मिलता है तो वह मुझे नहीं चाहिये । पतिदेवके बिना मैं स्वर्गलोकमें भी जानेकी इच्छा नहीं रखती । पतिके बिना मुझे धन- सम्पत्तिकी भी इच्छा नहीं
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है । अधिक क्या कहूँ, मैं पतिके बिना जीवित रहना भी नहीं चाहती ॥ ५३ ॥
वरातिसर्गः शतपुत्रता मम त्वयैव दत्तो ह्रियते च मे पतिः । वरं वृणे जीवतु सत्यवानयं तवैव सत्यं वचनं भविष्यति ॥ ५४ ॥
आपने ही मुझे सौ पुत्र होनेका वर दिया है और आप ही मेरे पतिको अन्यत्र लिये जा रहे हैं; अतः मैं वही वर माँगती हूँ कि ये सत्यवान् जीवित हो जायँ, इससे आपका ही वचन सत्य होगा ॥ ५४ ॥
मार्कण्डेय उवाच
तथेत्युक्त्वा तु तं पाश मुक्त्वा वैवस्वतो यमः ।
धर्मराजः प्रहृष्टात्मा सावित्रीमिदमब्रवीत् ॥ ५५ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! तदनन्तर ' तथास्तु ' कहकर सूर्यपुत्र धर्मराज यमने सत्यवान्का बन्धन खोल दिया और प्रसन्नचित्त होकर सावित्री से इस प्रकार कहा— एष भद्रे मया मुक्तो भर्ता ते कुलनन्दिनि । ( तोषितोऽहं त्वया साध्वि वाक्यैर्धर्मार्थसंहितैः । ) अरोगस्तव नेयश्च सिद्धार्थः स भविष्यति ॥ ५६ ॥
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' भद्रे! यह ले, मैंने तेरे पतिको छोड़ दिया । कुलनन्दिनी! तूने अपने धर्मार्थयुक्त वचनोंद्वारा मुझे पूर्ण संतुष्ट कर दिया है । साध्वी! यह सत्यवान् नीरोग, सफल - मनोरथ तथा तेरे द्वारा ले जानेयोग्य हो गया ॥ ५६ ॥
चतुर्वर्षशतायुश्च त्वया सार्धमवाप्स्यति ।
इष्ट्वा यज्ञैश्च धर्मेण ख्यातिं लोके गमिष्यति ॥ ५७ ॥
‘ यह तेरे साथ रहकर चार सौ वर्षोंकी आयु प्राप्त करेगा । यज्ञोंद्वारा भगवान्का यजन करके यह अपने धर्माचरणके द्वारा सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात होगा ॥ ५७ ॥
त्वयि पुत्रशतं चैव सत्यवान् जनयिष्यति ।
ते चापि सर्वे राजानः क्षत्रियाः पुत्रपौत्रिणः ॥ ५८ ॥
‘ सत्यवान् तेरे गर्भसे सौ पुत्र उत्पन्न करेगा और वे सभी राजकुमार राजा होनेके साथ ही पुत्र- पौत्रोंसे सम्पन्न होंगे ॥ ५८ ॥
ख्यातास्त्वन्नामधेयाश्च भविष्यन्तीह शाश्वताः ।
पितुश्च ते पुत्रशतं भविता तव मातरि ॥ ५ ९ ॥
' तेरे ही नामसे उनकी सदा ख्याति होगी अर्थात् वे सावित्र नामसे प्रसिद्ध होंगे । तेरे पिताके भी तेरी माताके ही गर्भसे सौ पुत्र होंगे ॥ ५ ९ ॥
मालव्यां मालवा नाम शाश्वताः पुत्रपौत्रिणः ।
भ्रातरस्ते भविष्यन्ति क्षत्रियास्त्रिदशोपमाः ॥ ६० ॥
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जगलाथ यम - सावित्री
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‘ वे तेरी माता मालवीसे उत्पन्न होनेके कारण मालव नामसे विख्यात होंगे । तेरे भाई मालव क्षत्रिय पुत्र- पौत्रोंसे सम्पन्न तथा देवताओंके समान तेजस्वी होंगे ' ॥ ६० ॥
एवं तस्यै वरं दत्त्वा धर्मराजः प्रतापवान् ।
निवर्तयित्वा सावित्रीं स्वमेव भवनं ययौ ॥ ६१ ॥
सावित्रीको इस प्रकार वरदान दे प्रतापी धर्मराज उसे लौटाकर अपने लोकको चले गये ॥ ६१ ॥
सावित्र्यपि यमे याते भर्तारं प्रतिलभ्य च ।
जगाम तत्र यत्रास्या भर्तुः शावं कलेवरम् ॥ ६२ ॥
यमराजके चले जानेपर सावित्री अपने पतिको पाकर उसी स्थानपर गयी; जहाँ पतिका मृत शरीर पड़ा था ॥ ६२ ॥
सा भूमौ प्रेक्ष्य भर्तारमुपसुत्योपगृह्य च ।
उत्सङ्गे शिर आरोप्य भूमावुपविवेश ह ॥ ६३ ॥
वह पृथ्वीपर अपने पतिको पड़ा देख उनके पास गयी और पृथ्वीपर बैठ गयी, फिर पतिको उठाकर उसने उनके मस्तकको गोदीमें रख लिया ॥ ६३ ॥
संज्ञां च स पुनर्लब्ध्वा सावित्रीमभ्यभाषत ।
प्रोष्यागत इव प्रेम्णा पुनः पुनरुदीक्ष्य वै ॥ ६४ ॥
तदनन्तर पुनः चेतना प्राप्त करके सत्यवान् परदेशमें रहकर लौटे हुए पुरुषकी भाँति बार- बार प्रेमपूर्वक सावित्रीकी ओर देखते हुए उससे बोले ॥ ६४ ॥
सत्यवानुवाच
सुचिरं बत सुप्तोऽस्मि किमर्थं नावबोधितः ।
क्व चासौपुरुषः श्यामो योऽसौ मां संचकर्ष ह ॥ ६५ ॥
सत्यवान्ने कहा — प्रिये! खेद है कि मैं बहुत देरतक सोता रह गया । तुमने मुझे जगा क्यों नहीं दिया? वे श्यामवर्णके पुरुष कहाँ हैं जिन्होंने मुझे खींचा था? ॥ ६५ ॥
सावित्र्युवाच
सुचिरं त्वं प्रसुप्तोऽसि ममाङ्के पुरुषर्षभ ।
गतः स भगवान् देवः प्रजासंयमनो यमः ॥ ६६ ॥
सावित्री बोली – नरश्रेष्ठ! आप मेरी गोदमें बहुत देरतक सोते रह गये । वे श्यामवर्णके पुरुष प्रजाको संयममें रखनेवाले साक्षात् भगवान् यम थे, जो अब चले गये हैं ॥ ६६ ॥
विश्रान्तोऽसि महाभाग विनिद्रश्च नृपात्मज ।
यदि शक्यं समुत्तिष्ठ विगाढां पश्य शर्वरीम् ॥ ६७ ॥
महाभाग! आपने विश्राम कर लिया । राजकुमार! अब आपकी नींद भी टूट चुकी है ।
यदि शक्ति हो तो उठिये; देखिये, प्रगाढ़ अन्धकारसे युक्त रात्रि हो गयी है ॥ ६७ ॥