श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1971–1980

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1971–1980

पृष्ठ 1971

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तदैव तस्य वचनं प्रतिगृह्येदमब्रवीत् ॥ ६ मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! पिताके यह कहनेपर कि ' बेटी! तू अपनी यात्राका वृतान्त विस्तारके साथ बतला ' शुभलक्षणा सावित्री उनकी आज्ञा मानकर उस समय इस प्रकार बोली ॥ ६ ॥

सावित्र्युवाच

आसीच्छाल्वेषु धर्मात्मा क्षत्रियः पृथिवीपतिः ।

द्युमत्सेन इति ख्यातः पश्चाच्चान्धो बभूव ह ॥ ७ ॥

सावित्रीने कहा — पिताजी! शाल्वदेशमें द्युमत्सेन नामसे प्रसिद्ध एक धर्मात्मा क्षत्रिय

राजा राज्य करते थे । पीछे वे अंधे हो गये ॥ ७ ॥

विनष्टचक्षुषस्तस्य बालपुत्रस्य धीमतः ।

सामीप्येन हृतं राज्यं छिद्रेऽस्मिन् पूर्ववैरिणा ॥ ८ ॥

उनकी आँखें चली गयीं और पुत्र अभी बाल्यावस्थामें था, यह अवसर पाकर उनके पूर्वशत्रु एक पड़ोसी राजाने आक्रमण किया और उस बुद्धिमान् नरेशका राज्य हर लिया ॥ ८ ॥

स बालवत्सया सार्धं भार्यया प्रस्थितो वनम् ।

पृष्ठ 1972

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महारण्यं गतश्चापि तपस्तेपे महाव्रतः ॥ ९ ॥

तस्य पुत्रः पुरे जातः संवृद्धश्च तपोवने ।

सत्यवाननुरूपो मे भर्तेति मनसा वृतः ॥ १० ॥

तब अपनी छोटी अवस्थाके पुत्रवाली पत्नीके साथ वे वनमें चले आये और विशाल वनके भीतर रहकर बड़े -बड़े व्रतोंका पालन करते हुए तपस्या करने लगे । उनके एक पुत्र हैं सत्यवान्, जो पैदा तो नगरमें हुए हैं, परंतु उनका पालन- पोषण एवं संवर्धन तपोवनमें हुआ

है । वे ही मेरे योग्य पति हैं । उन्हींका मैंने मन- ही - मन वरण किया है ॥ ९ -१० ॥

नारद उवाच

अहो बत महत् पापं सावित्र्या नृपते कृतम् ।

अजानन्त्या यदनया गुणवान् सत्यवान् वृतः ॥ ११ ॥

( यह सुनकर नारदजी बोल उठे - अहो! यह बड़े खेदकी बात है । राजन्! सावित्रीने बिना जाने ही अपना बड़ा अनिष्ट किया है, जो कि इसने सत्यवान्‌को गुणवान् समझकर वरण कर लिया है ॥ ११ ॥

सत्यं वदत्यस्य पिता सत्यं माता प्रभाषते ।

तथास्य ब्राह्मणाश्चक्रुर्नामैतत् सत्यवानिति ॥ १२ ॥

इस राजकुमारके पिता सदा सत्य बोलते हैं । इसकी माता भी सत्यभाषण करती है ।

इसलिये ब्राह्मणोंने इसका नाम ' सत्यवान् ' रख दिया था ॥ १२ ॥

बालस्याश्वाः प्रियाश्चास्य करोत्यश्वांश्च मृन्मयान् ।

चित्रेऽपि विलिखत्यश्वांश्चित्राश्व इति चोच्यते ॥ १३ ॥

इस बालकको अश्व बहुत प्रिय हैं । यह मिट्टीके अश्व बनाया करता है और चित्र लिखते समय भी अश्वोंको ही अंकित करता है, अतः इसे ' चित्राश्व' भी कहते हैं ॥ १३ ॥

राजोवाच

अपीदानीं स तेजस्वी बुद्धिमान् वा नृपात्मजः ।

क्षमावानपि वा शूरः सत्यवान् पितृवत्सलः ॥ १४ ॥

राजाने पूछा — देवर्षे! इस समय पितृभक्त राजकुमार सत्यवान् तेजस्वी, बुद्धिमान्, क्षमावान् और शूरवीर तो है न? ॥ १४ ॥

नारद उवाच

विवस्वानिव तेजस्वी बृहस्पतिसमो मतौ ।

महेन्द्र इव वीरश्च वसुधेव समन्वितः ॥ १५ ॥

नारदजीने कहा — वह राजकुमार सूर्यके समान तेजस्वी, बृहस्पतिके समान बुद्धिमान्, इन्द्रके समान वीर और पृथ्वीके समान क्षमाशील है ॥ १५ ॥

पृष्ठ 1973

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अश्वपतिरुवाच

अपि राजात्मजो दाता ब्रह्मण्यश्चापि सत्यवान् ।

रूपवानप्युदारो वाप्यथवा प्रियदर्शनः ॥ १६ ॥

अश्वपतिने पूछा — क्या राजपुत्र सत्यवान् दानी, ब्राह्मणभक्त, रूपवान्, उदार अथवा प्रियदर्शन भी है? ॥ नारद उवाच

सांकृते रन्तिदेवस्य स्वशक्त्या दानतः समः ।

ब्रह्मण्यः सत्यवादी च शिबिरौशीनरो यथा ॥ १७ ॥

नारदजीने कहा— सत्यवान् अपनी शक्तिके अनुसार दान देनेमें संकृतिनन्दन रन्तिदेवके समान है तथा उशीनरपुत्र शिबिके समान ब्राह्मणभक्त और सत्यवादी है ॥ १७ ॥

ययातिरिव चोदारः सोमवत् प्रियदर्शनः ।

रूपेणान्यतमोऽश्विभ्यां द्युमत्सेनसुतो बली ॥ १८ ॥

वह ययातिकी भाँति उदार और चन्द्रमाके समान प्रियदर्शन है । द्युमत्सेनका वह बलवान् पुत्र रूपवान् तो इतना है मानो अश्विनीकुमारोंमेंसे ही एक हो ॥ १८ ॥

स दान्तः स मृदुः शूरः स सत्यः संयतेन्द्रियः ।

स मैत्रः सोऽनसूयश्च स ह्रीमान् द्युतिमांश्च सः ॥ १ ९ ॥

वह जितेन्द्रिय, मृदुल, शूरवीर, सत्यस्वरूप, इन्द्रियसंयमी, सबके प्रति मैत्रीभाव रखनेवाला, अदोषदर्शी, लज्जावान् और कान्तिमान् है ॥ १ ९ ॥

नित्यशश्चार्जवं तस्मिन् स्थितिस्तस्यैव च ध्रुवा ।

संक्षेपतस्तपोवृद्धैः शीलवृद्धैश्च कथ्यते ॥ २० ॥

तप और शीलमें बढ़े हुए वृद्ध पुरुष संक्षेपमें उसके विषयमें ऐसा कहते हैं कि राजकुमार सत्यवान्‌में सरलताका नित्य निवास है और उस सद्गुणमें उसकी अविचल स्थिति है ॥ २० ॥

अश्वपतिरुवाच

गुणैरुपेतं सर्वैस्तं भगवन् प्रब्रवीषि मे ।

दोषानप्यस्य मे ब्रूहि यदि सन्तीह केचन ॥ २१ ॥

अश्वपति बोले — भगवन्! आप तो उसे सभी गुणोंसे सम्पन्न ही बता रहे हैं, यदि उसमें कोई दोष हों तो उन्हें भी बतलाइये ॥ २१ ॥

नारद उवाच एक एवास्य दोषो हि गुणानाक्रम्य तिष्ठति ।

पृष्ठ 1974

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स च दोषः प्रयत्नेन न शक्यमतिवर्तितुम् ॥ २२ ॥

नारदजीने कहा — दोष तो एक ही है, जो उसके सभी गुणोंको दबाकर स्थित है । उस दोषको प्रयत्न करके भी हटाया नहीं जा सकता ॥ २२ ॥

एको दोषोऽस्ति नान्योऽस्य सोऽद्यप्रभृति सत्यवान् ।

संवत्सरेण क्षीणायुर्देहन्यासं करिष्यति ॥ २३ ॥

आजसे लेकर एक वर्ष पूर्ण होनेतक सत्यवान्की आयु पूर्ण हो जायगी और वह शरीर त्याग देगा । केवल यही दोष उसमें है, दूसरा नहीं ॥ २३ ॥

राजोवाच

एहि सावित्रि गच्छस्व अन्यं वरय शोभने ।

तस्य दोषो महानेको गुणानाक्रम्य च स्थितः ॥ २४ ॥

राजा बोले — बेटी सावित्री! यहाँ आ । शोभने! तू पुनः यात्रा कर और दूसरे किसी पुरुषका वरण कर ले । सत्यवान्का यह एक ही बहुत बड़ा दोष है जो उसके सभी गुणोंको दबाकर स्थित है ॥ २४ ॥

यथा मे भगवानाह नारदो देवसत्कृतः ।

संवत्सरेण सोऽल्पायुर्देहन्यासं करिष्यति ॥ २५ ॥

जैसा कि देववदिन्त भगवान् नारदजी कह रहे हैं, सत्यवान्की आयु बहुत थोड़ी है और वह एक ही वर्षमें देहत्याग कर देगा ॥ २५ ॥

सावित्र्युवाच

सकृदंशो निपतति सकृत् कन्या प्रदीयते ।

सकृदाह ददानीति त्रीण्येतानि सकृत् सकृत् ॥ २६ ॥

दीर्घायुरथवाल्पायुः सगुणो निर्गुणोऽपि वा ।

सकृद् वृतो मया भर्ता न द्वितीयं वृणोम्यहम् ॥ २७ ॥

सावित्री बोली - भाइयोंमें धनका बँटवारा एक ही बार होता है, कन्या एक ही बार दी जाती है तथा श्रेष्ठ दाता ' मैं दूँगा', यह कहकर एक ही बार वचनदान करता है । ये तीन बातें एक- एक बार ही होती हैं । सत्यवान् दीर्घायु हों या अल्पायु गुणवान् हों या गुणहीन; मैंने उन्हें एक बार अपना पति चुन लिया। अब मैं दूसरे किसी पुरुषका वरण नहीं कर सकती ॥ २६-२७ ||

मनसा निश्चयं कृत्वा ततो वाचाभिधीयते ।

क्रियते कर्मणा पश्चात् प्रमाणं मे मनस्ततः ॥ २८ ॥

पहले मनसे निश्चय करके फिर वाणीद्वारा कहा जाता है। तत्पश्चात् उसे कार्यरूपमें परिणत किया जाता है, अतः इस विषयमें मेरा मन ही प्रमाण है ॥ २८ ॥

नारद उवाच

पृष्ठ 1975

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स्थिरा बुद्धिर्नरश्रेष्ठ सावित्र्या दुहितुस्तव ।

नैषा वारयितुं शक्या धर्मादस्मात् कथंचन ॥ २ ९ ॥

नारदजी बोले – नरश्रेष्ठ! आपकी पुत्री सावित्रीकी बुद्धि स्थिर है । इसे इस धर्ममार्गसे किसी तरह हटाया नहीं जा सकता ॥ २ ९ ॥ नान्यस्मिन् पुरुषे सन्ति ये सत्यवति वै गुणाः 1 प्रदानमेव तस्मान्मे रोचते दुहितुस्तव ॥ ३० ॥

सत्यवान्में जो गुण हैं, वे दूसरे किसी पुरुषमें हैं भी नहीं । अतः मुझे आपकी पुत्रीका सत्यवान्के साथ विवाह कर देना ही ठीक मालूम पड़ता है ॥ ३० ॥

राजोवाच

अविचाल्यं तदुक्तं यत् तथ्यं भगवता वचः ।

करिष्याम्येतदेवं च गुरुर्हि भगवान् मम ॥ ३१ ॥

राजा बोले — देवर्षे! आपने जो बात कही है, वह ठीक है । उसे टाला नहीं जा सकता ।

अतः मैं ऐसा ही करूंगा, क्योंकि आप मेरे गुरु हैं ॥ ३१ ॥

नारद उवाच

अविघ्नमस्तु सावित्र्याः प्रदाने दुहितुस्तव ।

साधयिष्याम्यहं तावत् सर्वेषां भद्रमस्तु वः ॥ ३२ ॥

नारदजीने कहा- राजन्! आपकी पुत्री सावित्रीके विवाहमें किसी प्रकारकी विघ्न-बाधा न आवे । अच्छा, अब मैं चलता हूँ। आप सब लोगोंका कल्याण हो ॥ मार्कण्डेय उवाच

एवमुक्त्वा समुत्पत्य नारदस्त्रिदिवं गतः ।

राजापि दुहितुः सज्जं वैवाहिकमकारयत् ॥ ३३ ॥

मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! ऐसा कहकर नारदजी उठे और स्वर्गलोकमें चले गये । इधर राजा भी अपनी पुत्रीके विवाहकी तैयारी कराने लगे ॥ ३३ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि पतिव्रतामाहात्म्यपर्वणि सावित्र्युपाख्याने चतुर्नवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २ ९ ४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत पतिव्रतामाहात्म्यपर्वमें सावित्री- उपाख्यानविषयक दो सौ चौरानबेवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २ ९४ ॥

पृष्ठ 1976

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पञ्चनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः सत्यवान् और सावित्रीका विवाह तथा सावित्रीका अपनी सेवाओंद्वारा सबको संतुष्ट करना मार्कण्डेय उवाच

अथ कन्याप्रदाने स तमेवार्थं विचिन्तयन् ।

समानिन्ये च तत् सर्वं भाण्डं वैवाहिकं नृपः ॥ १ ॥

मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! तदनन्तर कन्यादानके विषयमें नारदजीके ही कथनपर विचार करते हुए राजा अश्वपतिने विवाहके लिये सारी सामग्री एकत्र करवायी ॥ १ ॥

ततो वृद्धान् द्विजान् सर्वानृत्विजः सपुरोहितान् ।

समाहूय दिने पुण्ये प्रययौ सह कन्यया ॥ २ ॥

फिर उन्होंने बूढ़े ब्राह्मणों, समस्त ऋत्विजों तथा पुरोहितोंको बुलाकर किसी शुभ दिनमें कन्याके साथ तपोवनको प्रस्थान किया ॥ २ ॥

मेध्यारण्यं स गत्वा च द्युमत्सेनाश्रमं नृपः ।

पद्भ्यामेव द्विजैः सार्धं राजर्षिं तमुपागमत् ॥ ३ ॥

पवित्र वनमें द्युमत्सेनके आश्रमके निकट पहुँचकर राजा अश्वपति ब्राह्मणोंके साथ पैदल ही उन राजर्षिके पास गये ॥ ३ ॥

तत्रापश्यन्महाभागं शालवृक्षमुपाश्रितम् ।

कौश्यां बृस्यां समासीनं चक्षुर्हीनं नृपं तदा ॥ ४ ॥

वहाँ उन्होंने उन महाभाग नेत्रहीन नरेशको शालवृक्षके नीचे एक कुशकी चटाईपर बैठे देखा ॥ ४ ॥

स राजा तस्य राजर्षेः कृत्वा पूजां यथार्हतः ।

वाचा सुनियतो भूत्वा चकारात्मनिवेदनम् ॥५ ॥

तस्यार्घ्यमासनं चैव गां चावेद्य स धर्मवित् ।

किमागमनमित्येवं राजा राजानमब्रवीत् ॥ ६ ॥

राजा अश्वपतिने राजर्षि द्युमत्सेनकी यथायोग्य पूजा की और वाणीको संयममें रखकर उन्होंने उनके समक्ष अपना परिचय दिया । तब धर्मज्ञ राजा द्युमत्सेनने मद्रराज अश्वपतिको अर्घ्य, आसन और गौ निवेदन करके उनसे पूछा— ' किस उद्देश्यसे आपका यहाँ शुभागमन हुआ है? ' ॥ ५-६ ॥ तस्य सर्वमभिप्रायमितिकर्तव्यतां च ताम् ।

पृष्ठ 1977

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सत्यवन्तं समुद्दिश्य सर्वमेव न्यवेदयत् ॥ ७ ॥

तब राजाने उनसे सत्यवान्के उद्देश्यसे अपना सारा अभिप्राय तथा कैसे - कैसे क्या - क्या करना है इत्यादि बातोंका विवरण सब कुछ स्पष्ट बता दिया ॥ ७ ॥

अश्वपतिरुवाच

सावित्री नाम राजर्षे कन्येयं मम शोभना ।

तां स्वधर्मेण धर्मज्ञ स्नुषार्थे त्वं गृहाण मे ॥ ८ ॥

अश्वपति बोले — धर्मज्ञ राजर्षे! सावित्री नामसे प्रसिद्ध मेरी यह सुन्दरी कन्या है । इसे आप धर्मतः अपनी पुत्रवधू बनानेके लिये स्वीकार करें ॥ ८ ॥

द्युमत्सेन उवाच च्युताः स्म राज्याद् वनवासमाश्रिता- श्चराम धर्मं नियतास्तपस्विनः । कथं त्वनर्हा वनवासमाश्रमे निवत्स्यते क्लेशमिमं सुता तव ॥ ९ ॥

द्युमत्सेन बोले- महाराज! हम राज्यसे भ्रष्ट हो चुके हैं एवं वनका आश्रय लेकर संयम - नियमके साथ तपस्वी जीवन बिताते हुए धर्मका अनुष्ठान करते हैं । आपकी कन्या ये सब कष्ट सहन करनेयोग्य नहीं है । ऐसी दशामें यह आश्रममें रहकर वनवासके इस कष्टको कैसे सह सकेगी? ॥ ९ ॥

अश्वपतिरुवाच सुखं च दुःखं च भवाभवात्मकं यदा विजानाति सुताहमेव च । न मद्विधे युज्यति वाक्यमीदृशं विनिश्चयेनाभिगतोऽस्मि ते नृप ॥ १० ॥

अश्वपतिने कहा — राजन्! सुख और दुःख तो उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं । इस बातको मैं और मेरी पुत्री दोनों जानते हैं । मेरे जैसे मनुष्यसे आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये । मैं तो सब प्रकारसे निश्चय करके ही आपके पास आया हूँ ॥ १० ॥

आशां नार्हसि मे हन्तुं सौहृदात् प्रणतस्य च ।

अभितश्चागतं प्रेम्णा प्रत्याख्यातुं न मार्हसि ॥ ११ ॥

मैं सौहार्दभावसे आपकी शरणमें आया हूँ । आप मेरी आशा भग्न न करें - प्रेमपूर्वक अपने पास आये हुए मुझ प्रार्थीको निराश न लौटावें ॥ ११ ॥

अनुरूपो हि युक्तश्च त्वं ममाहं तवापि च ।

स्नुषां प्रतीच्छ मे कन्यां भार्यां सत्यवतः सतः ॥ १२ ॥

पृष्ठ 1978

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आप सर्वथा मेरे अनुरूप और योग्य हैं । मैं भी आपके योग्य हूँ । आप मेरी इस कन्याको अपने श्रेष्ठ पुत्र सत्यवान्की पत्नी एवं अपनी पुत्रवधूके रूपमें ग्रहण कीजिये ॥ १२ ॥

द्युमत्सेन उवाच

पूर्वमेवाभिलषितः सम्बन्धो मे त्वया सह ।

भ्रष्टराज्यस्त्वहमिति तत एतद् विचारितम् ॥ १३ ॥

द्युमत्सेन बोले — महाराज! मैं तो पहलेसे ही आपके साथ सम्बन्ध करना चाहता था; परंतु इस समय अपने राज्यसे भ्रष्ट हो गया हूँ, ऐसा सोचकर मैंने ऐसा विचार कर लिया था कि अब यह सम्बन्ध नहीं हो सकेगा ॥ १३ ॥

अभिप्रायस्त्वयं यो मे पूर्वमेवाभिकाङ्क्षितः ।

स निर्वर्ततु मेऽद्यैव काङ्क्षितो ह्यसि मेऽतिथिः ॥ १४ ॥

किंतु मेरा यह अभिप्राय, जो मुझे पहलेसे ही अभीष्ट था, यदि आज ही सिद्ध होना

चाहता है तो अवश्य हो । आप मेरे मनोवांछित अतिथि हैं ॥ १४ ॥

ततः सर्वान् समानाय्य द्विजानाश्रमवासिनः ।

यथाविधि समुद्वाहं कारयामासतुर्नृपौ ॥ १५ ॥

तदनन्तर उस आश्रममें रहनेवाले सभी ब्राह्मणोंको बुलाकर दोनों राजाओंने सत्यवान्-सावित्रीका विवाह - संस्कार विधिवत् सम्पन्न कराया ॥ १५ ॥

दत्त्वा सोऽश्वपतिः कन्यां यथार्हं सपरिच्छदम् ।

ययौ स्वमेव भवनं युक्तः परमया मुदा ॥ १६ ॥

राजा अश्वपति दहेजसहित कन्यादान देकर बड़ी प्रसन्नताके साथ अपनी राजधानीको लौट गये ॥ १६ ॥

सत्यवानपि तां भार्यां लब्ध्वा सर्वगुणान्विताम् ।

मुमुदे सा च तं लब्ध्वा भर्तारं मनसेप्सितम् ॥ १७ ॥

उस सर्वसद्गुणसम्पन्न भार्याको पाकर सत्यवान्‌को बड़ी प्रसन्नता हुई और सत्यवान्‌को अपने मनोवांछित पतिके रूपमें पाकर सावित्रीको भी बड़ा आनन्द हुआ ॥

गते पितरि सर्वाणि संन्यस्याभरणानि सा ।

जगृहे वल्कलान्येव वस्त्रं काषायमेव च ॥ १८ ॥

पिताके चले जानेपर सावित्री अपने सब आभूषण उतारकर वल्कल तथा गेरुआ वस्त्र पहनने लगी ॥ १८ ॥

परिचारैर्गुणैश्चैव प्रश्रयेण दमेन च ।

सर्वकामक्रियाभिश्च सर्वेषां तुष्टिमादधे ॥ १९ ॥

सावित्रीने सेवा, गुण, विनय, संयम और सबके मनके अनुसार कार्य करनेसे सभीको प्रसन्न कर लिया ॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 1979

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श्वश्रूं शरीरसत्कारैः सर्वैराच्छादनादिभिः ।

श्वशुरं देवसत्कारैर्वाचः संयमनेन च ॥ २० ॥

उसने शारीरिक सेवा तथा वस्त्राभूषण आदिके द्वारा सासको और वाणीके संयमपूर्वक देवोचित सत्कारद्वारा ससुरको संतुष्ट किया ॥ २० ॥

तथैव प्रियवादेन नैपुणेन शमेन च ।

रहश्चैवोपचारेण भर्तारं पर्यंतोषयत् ॥ २१ ॥

इसी प्रकार मधुर सम्भाषण, कार्य कुशलता, शान्ति तथा एकान्तसेवाद्वारा पतिदेवको भी सदा प्रसन्न रखा ॥ २१ ॥

एवं तत्राश्रमे तेषां तदा निवसतां सताम् ।

कालस्तपस्यतां कश्चिदपाक्रामत भारत ॥ २२ ॥

भरतनन्दन! इस प्रकार उन सब लोगोंको उस आश्रममें रहकर तपस्या करते कुछ काल व्यतीत हो गया ॥ २२ ॥

सावित्र्या ग्लायमानायास्तिष्ठन्त्यास्तु दिवानिशम् ।

नारदेन यदुक्तं तद् वाक्यं मनसि वर्तते ॥ २३ ॥

इधर सावित्री निरन्तर चिन्तासे गली जा रही थी । दिन - रात सोते -उठते हर समय नारदजीकी कही हुई बात उसके मनमें बनी रहती थी- वह उसे क्षणभरके लिये भी नहीं भूलती थी ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि पतिव्रतामाहात्म्यपर्वणि सावित्र्युपाख्याने पञ्चनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २ ९ ५ ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत पतिव्रतामाहात्म्यपर्वमें सावित्री- उपाख्यानविषयक दो सौ पंचानबेवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २९५ ॥

पृष्ठ 1980

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षण्णवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः सावित्रीकी व्रतचर्या तथा सास - ससुर और पतिकी आज्ञा लेकर सत्यवान्के साथ उसका वनमें जाना मार्कण्डेय उवाच

ततः काले बहुतिथे व्यतिक्रान्ते कदाचन ।

प्राप्तः स कालो मर्तव्यं यत्र सत्यवता नृप ॥ १ ॥

मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! तदनन्तर बहुत दिन बीत जानेपर एक दिन वह समय भी आ पहुँचा जब कि सत्यवान्की मृत्यु होनेवाली थी ॥ १ ॥

गणयन्त्याश्च सावित्र्या दिवसे दिवसे गते ।

यद् वाक्यं नारदेनोक्तं वर्तते हृदि नित्यशः ॥ २ ॥

सावित्री एक -एक दिन बीतनेपर उसकी गणना करती रहती थी । नारदजीने जो बात कही थी, वह उसके हृदयमें सदा विद्यमान रहती थी ॥ २ ॥

चतुर्थेऽहनि मर्तव्यमिति संचिन्त्य भाविनी ।

व्रतं त्रिरात्मुद्दिश्य दिवारात्रं स्थिताभवत् ॥ ३ ॥

भाविनी सावित्रीको जब यह निश्चय हो गया कि मेरे पतिको आजसे चौथे दिन मरना है, तब उसने तीन रातका व्रत धारण किया और उसमें वह दिन - रात खड़ी ही रही ॥ ३ ॥

तं श्रुत्वा नियमं तस्या भृशं दुःखान्वितो नृपः ।

उत्थाय वाक्यं सावित्रीमब्रवीत् परिसान्त्वयन् ॥ ४ ॥

सावित्रीका यह कठोर नियम सुनकर राजा द्युमत्सेनको बड़ा दुःख हुआ । उन्होंने उठकर सावित्रीको सान्त्वना देते हुए कहा ॥ ४ ॥

द्युमत्सेन उवाच

अतितीव्रोऽयमारम्भस्त्वयाऽऽरब्धो नृपात्मजे ।

तिसृणां वसतीनां हि स्थानं परमदुश्चरम् ॥ ५ ॥

द्युमत्सेन बोले- राजकुमारी! तुमने यह बड़ा कठोर व्रत आरम्भ किया है । तीन दिनोंतक निराहार रहना तो अत्यन्त दुष्कर कार्य है ॥ ५ ॥

सावित्र्युवाच

न कार्यस्तात संतापः पारयिष्याम्यहं व्रतम् ।

व्यवसायकृतं हीदं व्यवसायश्च कारणम् ॥ ६ ॥

सावित्री बोली – पिताजी! आप चिन्ता न करें । मैं इस व्रतको पूर्ण कर लूँगी । दृढ़ निश्चय ही व्रतके निर्वाहमें कारण हुआ करता है, सो मैंने भी दृढ़ निश्चयसे ही इस व्रतको