श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1971–1980
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1971–1980
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तदैव तस्य वचनं प्रतिगृह्येदमब्रवीत् ॥ ६ मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! पिताके यह कहनेपर कि ' बेटी! तू अपनी यात्राका वृतान्त विस्तारके साथ बतला ' शुभलक्षणा सावित्री उनकी आज्ञा मानकर उस समय इस प्रकार बोली ॥ ६ ॥
सावित्र्युवाच
आसीच्छाल्वेषु धर्मात्मा क्षत्रियः पृथिवीपतिः ।
द्युमत्सेन इति ख्यातः पश्चाच्चान्धो बभूव ह ॥ ७ ॥
सावित्रीने कहा — पिताजी! शाल्वदेशमें द्युमत्सेन नामसे प्रसिद्ध एक धर्मात्मा क्षत्रिय
राजा राज्य करते थे । पीछे वे अंधे हो गये ॥ ७ ॥
विनष्टचक्षुषस्तस्य बालपुत्रस्य धीमतः ।
सामीप्येन हृतं राज्यं छिद्रेऽस्मिन् पूर्ववैरिणा ॥ ८ ॥
उनकी आँखें चली गयीं और पुत्र अभी बाल्यावस्थामें था, यह अवसर पाकर उनके पूर्वशत्रु एक पड़ोसी राजाने आक्रमण किया और उस बुद्धिमान् नरेशका राज्य हर लिया ॥ ८ ॥
स बालवत्सया सार्धं भार्यया प्रस्थितो वनम् ।
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महारण्यं गतश्चापि तपस्तेपे महाव्रतः ॥ ९ ॥
तस्य पुत्रः पुरे जातः संवृद्धश्च तपोवने ।
सत्यवाननुरूपो मे भर्तेति मनसा वृतः ॥ १० ॥
तब अपनी छोटी अवस्थाके पुत्रवाली पत्नीके साथ वे वनमें चले आये और विशाल वनके भीतर रहकर बड़े -बड़े व्रतोंका पालन करते हुए तपस्या करने लगे । उनके एक पुत्र हैं सत्यवान्, जो पैदा तो नगरमें हुए हैं, परंतु उनका पालन- पोषण एवं संवर्धन तपोवनमें हुआ
है । वे ही मेरे योग्य पति हैं । उन्हींका मैंने मन- ही - मन वरण किया है ॥ ९ -१० ॥
नारद उवाच
अहो बत महत् पापं सावित्र्या नृपते कृतम् ।
अजानन्त्या यदनया गुणवान् सत्यवान् वृतः ॥ ११ ॥
( यह सुनकर नारदजी बोल उठे - अहो! यह बड़े खेदकी बात है । राजन्! सावित्रीने बिना जाने ही अपना बड़ा अनिष्ट किया है, जो कि इसने सत्यवान्को गुणवान् समझकर वरण कर लिया है ॥ ११ ॥
सत्यं वदत्यस्य पिता सत्यं माता प्रभाषते ।
तथास्य ब्राह्मणाश्चक्रुर्नामैतत् सत्यवानिति ॥ १२ ॥
इस राजकुमारके पिता सदा सत्य बोलते हैं । इसकी माता भी सत्यभाषण करती है ।
इसलिये ब्राह्मणोंने इसका नाम ' सत्यवान् ' रख दिया था ॥ १२ ॥
बालस्याश्वाः प्रियाश्चास्य करोत्यश्वांश्च मृन्मयान् ।
चित्रेऽपि विलिखत्यश्वांश्चित्राश्व इति चोच्यते ॥ १३ ॥
इस बालकको अश्व बहुत प्रिय हैं । यह मिट्टीके अश्व बनाया करता है और चित्र लिखते समय भी अश्वोंको ही अंकित करता है, अतः इसे ' चित्राश्व' भी कहते हैं ॥ १३ ॥
राजोवाच
अपीदानीं स तेजस्वी बुद्धिमान् वा नृपात्मजः ।
क्षमावानपि वा शूरः सत्यवान् पितृवत्सलः ॥ १४ ॥
राजाने पूछा — देवर्षे! इस समय पितृभक्त राजकुमार सत्यवान् तेजस्वी, बुद्धिमान्, क्षमावान् और शूरवीर तो है न? ॥ १४ ॥
नारद उवाच
विवस्वानिव तेजस्वी बृहस्पतिसमो मतौ ।
महेन्द्र इव वीरश्च वसुधेव समन्वितः ॥ १५ ॥
नारदजीने कहा — वह राजकुमार सूर्यके समान तेजस्वी, बृहस्पतिके समान बुद्धिमान्, इन्द्रके समान वीर और पृथ्वीके समान क्षमाशील है ॥ १५ ॥
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अश्वपतिरुवाच
अपि राजात्मजो दाता ब्रह्मण्यश्चापि सत्यवान् ।
रूपवानप्युदारो वाप्यथवा प्रियदर्शनः ॥ १६ ॥
अश्वपतिने पूछा — क्या राजपुत्र सत्यवान् दानी, ब्राह्मणभक्त, रूपवान्, उदार अथवा प्रियदर्शन भी है? ॥ नारद उवाच
सांकृते रन्तिदेवस्य स्वशक्त्या दानतः समः ।
ब्रह्मण्यः सत्यवादी च शिबिरौशीनरो यथा ॥ १७ ॥
नारदजीने कहा— सत्यवान् अपनी शक्तिके अनुसार दान देनेमें संकृतिनन्दन रन्तिदेवके समान है तथा उशीनरपुत्र शिबिके समान ब्राह्मणभक्त और सत्यवादी है ॥ १७ ॥
ययातिरिव चोदारः सोमवत् प्रियदर्शनः ।
रूपेणान्यतमोऽश्विभ्यां द्युमत्सेनसुतो बली ॥ १८ ॥
वह ययातिकी भाँति उदार और चन्द्रमाके समान प्रियदर्शन है । द्युमत्सेनका वह बलवान् पुत्र रूपवान् तो इतना है मानो अश्विनीकुमारोंमेंसे ही एक हो ॥ १८ ॥
स दान्तः स मृदुः शूरः स सत्यः संयतेन्द्रियः ।
स मैत्रः सोऽनसूयश्च स ह्रीमान् द्युतिमांश्च सः ॥ १ ९ ॥
वह जितेन्द्रिय, मृदुल, शूरवीर, सत्यस्वरूप, इन्द्रियसंयमी, सबके प्रति मैत्रीभाव रखनेवाला, अदोषदर्शी, लज्जावान् और कान्तिमान् है ॥ १ ९ ॥
नित्यशश्चार्जवं तस्मिन् स्थितिस्तस्यैव च ध्रुवा ।
संक्षेपतस्तपोवृद्धैः शीलवृद्धैश्च कथ्यते ॥ २० ॥
तप और शीलमें बढ़े हुए वृद्ध पुरुष संक्षेपमें उसके विषयमें ऐसा कहते हैं कि राजकुमार सत्यवान्में सरलताका नित्य निवास है और उस सद्गुणमें उसकी अविचल स्थिति है ॥ २० ॥
अश्वपतिरुवाच
गुणैरुपेतं सर्वैस्तं भगवन् प्रब्रवीषि मे ।
दोषानप्यस्य मे ब्रूहि यदि सन्तीह केचन ॥ २१ ॥
अश्वपति बोले — भगवन्! आप तो उसे सभी गुणोंसे सम्पन्न ही बता रहे हैं, यदि उसमें कोई दोष हों तो उन्हें भी बतलाइये ॥ २१ ॥
नारद उवाच एक एवास्य दोषो हि गुणानाक्रम्य तिष्ठति ।
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स च दोषः प्रयत्नेन न शक्यमतिवर्तितुम् ॥ २२ ॥
नारदजीने कहा — दोष तो एक ही है, जो उसके सभी गुणोंको दबाकर स्थित है । उस दोषको प्रयत्न करके भी हटाया नहीं जा सकता ॥ २२ ॥
एको दोषोऽस्ति नान्योऽस्य सोऽद्यप्रभृति सत्यवान् ।
संवत्सरेण क्षीणायुर्देहन्यासं करिष्यति ॥ २३ ॥
आजसे लेकर एक वर्ष पूर्ण होनेतक सत्यवान्की आयु पूर्ण हो जायगी और वह शरीर त्याग देगा । केवल यही दोष उसमें है, दूसरा नहीं ॥ २३ ॥
राजोवाच
एहि सावित्रि गच्छस्व अन्यं वरय शोभने ।
तस्य दोषो महानेको गुणानाक्रम्य च स्थितः ॥ २४ ॥
राजा बोले — बेटी सावित्री! यहाँ आ । शोभने! तू पुनः यात्रा कर और दूसरे किसी पुरुषका वरण कर ले । सत्यवान्का यह एक ही बहुत बड़ा दोष है जो उसके सभी गुणोंको दबाकर स्थित है ॥ २४ ॥
यथा मे भगवानाह नारदो देवसत्कृतः ।
संवत्सरेण सोऽल्पायुर्देहन्यासं करिष्यति ॥ २५ ॥
जैसा कि देववदिन्त भगवान् नारदजी कह रहे हैं, सत्यवान्की आयु बहुत थोड़ी है और वह एक ही वर्षमें देहत्याग कर देगा ॥ २५ ॥
सावित्र्युवाच
सकृदंशो निपतति सकृत् कन्या प्रदीयते ।
सकृदाह ददानीति त्रीण्येतानि सकृत् सकृत् ॥ २६ ॥
दीर्घायुरथवाल्पायुः सगुणो निर्गुणोऽपि वा ।
सकृद् वृतो मया भर्ता न द्वितीयं वृणोम्यहम् ॥ २७ ॥
सावित्री बोली - भाइयोंमें धनका बँटवारा एक ही बार होता है, कन्या एक ही बार दी जाती है तथा श्रेष्ठ दाता ' मैं दूँगा', यह कहकर एक ही बार वचनदान करता है । ये तीन बातें एक- एक बार ही होती हैं । सत्यवान् दीर्घायु हों या अल्पायु गुणवान् हों या गुणहीन; मैंने उन्हें एक बार अपना पति चुन लिया। अब मैं दूसरे किसी पुरुषका वरण नहीं कर सकती ॥ २६-२७ ||
मनसा निश्चयं कृत्वा ततो वाचाभिधीयते ।
क्रियते कर्मणा पश्चात् प्रमाणं मे मनस्ततः ॥ २८ ॥
पहले मनसे निश्चय करके फिर वाणीद्वारा कहा जाता है। तत्पश्चात् उसे कार्यरूपमें परिणत किया जाता है, अतः इस विषयमें मेरा मन ही प्रमाण है ॥ २८ ॥
नारद उवाच
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स्थिरा बुद्धिर्नरश्रेष्ठ सावित्र्या दुहितुस्तव ।
नैषा वारयितुं शक्या धर्मादस्मात् कथंचन ॥ २ ९ ॥
नारदजी बोले – नरश्रेष्ठ! आपकी पुत्री सावित्रीकी बुद्धि स्थिर है । इसे इस धर्ममार्गसे किसी तरह हटाया नहीं जा सकता ॥ २ ९ ॥ नान्यस्मिन् पुरुषे सन्ति ये सत्यवति वै गुणाः 1 प्रदानमेव तस्मान्मे रोचते दुहितुस्तव ॥ ३० ॥
सत्यवान्में जो गुण हैं, वे दूसरे किसी पुरुषमें हैं भी नहीं । अतः मुझे आपकी पुत्रीका सत्यवान्के साथ विवाह कर देना ही ठीक मालूम पड़ता है ॥ ३० ॥
राजोवाच
अविचाल्यं तदुक्तं यत् तथ्यं भगवता वचः ।
करिष्याम्येतदेवं च गुरुर्हि भगवान् मम ॥ ३१ ॥
राजा बोले — देवर्षे! आपने जो बात कही है, वह ठीक है । उसे टाला नहीं जा सकता ।
अतः मैं ऐसा ही करूंगा, क्योंकि आप मेरे गुरु हैं ॥ ३१ ॥
नारद उवाच
अविघ्नमस्तु सावित्र्याः प्रदाने दुहितुस्तव ।
साधयिष्याम्यहं तावत् सर्वेषां भद्रमस्तु वः ॥ ३२ ॥
नारदजीने कहा- राजन्! आपकी पुत्री सावित्रीके विवाहमें किसी प्रकारकी विघ्न-बाधा न आवे । अच्छा, अब मैं चलता हूँ। आप सब लोगोंका कल्याण हो ॥ मार्कण्डेय उवाच
एवमुक्त्वा समुत्पत्य नारदस्त्रिदिवं गतः ।
राजापि दुहितुः सज्जं वैवाहिकमकारयत् ॥ ३३ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! ऐसा कहकर नारदजी उठे और स्वर्गलोकमें चले गये । इधर राजा भी अपनी पुत्रीके विवाहकी तैयारी कराने लगे ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि पतिव्रतामाहात्म्यपर्वणि सावित्र्युपाख्याने चतुर्नवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २ ९ ४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत पतिव्रतामाहात्म्यपर्वमें सावित्री- उपाख्यानविषयक दो सौ चौरानबेवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २ ९४ ॥
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पञ्चनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः सत्यवान् और सावित्रीका विवाह तथा सावित्रीका अपनी सेवाओंद्वारा सबको संतुष्ट करना मार्कण्डेय उवाच
अथ कन्याप्रदाने स तमेवार्थं विचिन्तयन् ।
समानिन्ये च तत् सर्वं भाण्डं वैवाहिकं नृपः ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! तदनन्तर कन्यादानके विषयमें नारदजीके ही कथनपर विचार करते हुए राजा अश्वपतिने विवाहके लिये सारी सामग्री एकत्र करवायी ॥ १ ॥
ततो वृद्धान् द्विजान् सर्वानृत्विजः सपुरोहितान् ।
समाहूय दिने पुण्ये प्रययौ सह कन्यया ॥ २ ॥
फिर उन्होंने बूढ़े ब्राह्मणों, समस्त ऋत्विजों तथा पुरोहितोंको बुलाकर किसी शुभ दिनमें कन्याके साथ तपोवनको प्रस्थान किया ॥ २ ॥
मेध्यारण्यं स गत्वा च द्युमत्सेनाश्रमं नृपः ।
पद्भ्यामेव द्विजैः सार्धं राजर्षिं तमुपागमत् ॥ ३ ॥
पवित्र वनमें द्युमत्सेनके आश्रमके निकट पहुँचकर राजा अश्वपति ब्राह्मणोंके साथ पैदल ही उन राजर्षिके पास गये ॥ ३ ॥
तत्रापश्यन्महाभागं शालवृक्षमुपाश्रितम् ।
कौश्यां बृस्यां समासीनं चक्षुर्हीनं नृपं तदा ॥ ४ ॥
वहाँ उन्होंने उन महाभाग नेत्रहीन नरेशको शालवृक्षके नीचे एक कुशकी चटाईपर बैठे देखा ॥ ४ ॥
स राजा तस्य राजर्षेः कृत्वा पूजां यथार्हतः ।
वाचा सुनियतो भूत्वा चकारात्मनिवेदनम् ॥५ ॥
तस्यार्घ्यमासनं चैव गां चावेद्य स धर्मवित् ।
किमागमनमित्येवं राजा राजानमब्रवीत् ॥ ६ ॥
राजा अश्वपतिने राजर्षि द्युमत्सेनकी यथायोग्य पूजा की और वाणीको संयममें रखकर उन्होंने उनके समक्ष अपना परिचय दिया । तब धर्मज्ञ राजा द्युमत्सेनने मद्रराज अश्वपतिको अर्घ्य, आसन और गौ निवेदन करके उनसे पूछा— ' किस उद्देश्यसे आपका यहाँ शुभागमन हुआ है? ' ॥ ५-६ ॥ तस्य सर्वमभिप्रायमितिकर्तव्यतां च ताम् ।
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सत्यवन्तं समुद्दिश्य सर्वमेव न्यवेदयत् ॥ ७ ॥
तब राजाने उनसे सत्यवान्के उद्देश्यसे अपना सारा अभिप्राय तथा कैसे - कैसे क्या - क्या करना है इत्यादि बातोंका विवरण सब कुछ स्पष्ट बता दिया ॥ ७ ॥
अश्वपतिरुवाच
सावित्री नाम राजर्षे कन्येयं मम शोभना ।
तां स्वधर्मेण धर्मज्ञ स्नुषार्थे त्वं गृहाण मे ॥ ८ ॥
अश्वपति बोले — धर्मज्ञ राजर्षे! सावित्री नामसे प्रसिद्ध मेरी यह सुन्दरी कन्या है । इसे आप धर्मतः अपनी पुत्रवधू बनानेके लिये स्वीकार करें ॥ ८ ॥
द्युमत्सेन उवाच च्युताः स्म राज्याद् वनवासमाश्रिता- श्चराम धर्मं नियतास्तपस्विनः । कथं त्वनर्हा वनवासमाश्रमे निवत्स्यते क्लेशमिमं सुता तव ॥ ९ ॥
द्युमत्सेन बोले- महाराज! हम राज्यसे भ्रष्ट हो चुके हैं एवं वनका आश्रय लेकर संयम - नियमके साथ तपस्वी जीवन बिताते हुए धर्मका अनुष्ठान करते हैं । आपकी कन्या ये सब कष्ट सहन करनेयोग्य नहीं है । ऐसी दशामें यह आश्रममें रहकर वनवासके इस कष्टको कैसे सह सकेगी? ॥ ९ ॥
अश्वपतिरुवाच सुखं च दुःखं च भवाभवात्मकं यदा विजानाति सुताहमेव च । न मद्विधे युज्यति वाक्यमीदृशं विनिश्चयेनाभिगतोऽस्मि ते नृप ॥ १० ॥
अश्वपतिने कहा — राजन्! सुख और दुःख तो उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं । इस बातको मैं और मेरी पुत्री दोनों जानते हैं । मेरे जैसे मनुष्यसे आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये । मैं तो सब प्रकारसे निश्चय करके ही आपके पास आया हूँ ॥ १० ॥
आशां नार्हसि मे हन्तुं सौहृदात् प्रणतस्य च ।
अभितश्चागतं प्रेम्णा प्रत्याख्यातुं न मार्हसि ॥ ११ ॥
मैं सौहार्दभावसे आपकी शरणमें आया हूँ । आप मेरी आशा भग्न न करें - प्रेमपूर्वक अपने पास आये हुए मुझ प्रार्थीको निराश न लौटावें ॥ ११ ॥
अनुरूपो हि युक्तश्च त्वं ममाहं तवापि च ।
स्नुषां प्रतीच्छ मे कन्यां भार्यां सत्यवतः सतः ॥ १२ ॥
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आप सर्वथा मेरे अनुरूप और योग्य हैं । मैं भी आपके योग्य हूँ । आप मेरी इस कन्याको अपने श्रेष्ठ पुत्र सत्यवान्की पत्नी एवं अपनी पुत्रवधूके रूपमें ग्रहण कीजिये ॥ १२ ॥
द्युमत्सेन उवाच
पूर्वमेवाभिलषितः सम्बन्धो मे त्वया सह ।
भ्रष्टराज्यस्त्वहमिति तत एतद् विचारितम् ॥ १३ ॥
द्युमत्सेन बोले — महाराज! मैं तो पहलेसे ही आपके साथ सम्बन्ध करना चाहता था; परंतु इस समय अपने राज्यसे भ्रष्ट हो गया हूँ, ऐसा सोचकर मैंने ऐसा विचार कर लिया था कि अब यह सम्बन्ध नहीं हो सकेगा ॥ १३ ॥
अभिप्रायस्त्वयं यो मे पूर्वमेवाभिकाङ्क्षितः ।
स निर्वर्ततु मेऽद्यैव काङ्क्षितो ह्यसि मेऽतिथिः ॥ १४ ॥
किंतु मेरा यह अभिप्राय, जो मुझे पहलेसे ही अभीष्ट था, यदि आज ही सिद्ध होना
चाहता है तो अवश्य हो । आप मेरे मनोवांछित अतिथि हैं ॥ १४ ॥
ततः सर्वान् समानाय्य द्विजानाश्रमवासिनः ।
यथाविधि समुद्वाहं कारयामासतुर्नृपौ ॥ १५ ॥
तदनन्तर उस आश्रममें रहनेवाले सभी ब्राह्मणोंको बुलाकर दोनों राजाओंने सत्यवान्-सावित्रीका विवाह - संस्कार विधिवत् सम्पन्न कराया ॥ १५ ॥
दत्त्वा सोऽश्वपतिः कन्यां यथार्हं सपरिच्छदम् ।
ययौ स्वमेव भवनं युक्तः परमया मुदा ॥ १६ ॥
राजा अश्वपति दहेजसहित कन्यादान देकर बड़ी प्रसन्नताके साथ अपनी राजधानीको लौट गये ॥ १६ ॥
सत्यवानपि तां भार्यां लब्ध्वा सर्वगुणान्विताम् ।
मुमुदे सा च तं लब्ध्वा भर्तारं मनसेप्सितम् ॥ १७ ॥
उस सर्वसद्गुणसम्पन्न भार्याको पाकर सत्यवान्को बड़ी प्रसन्नता हुई और सत्यवान्को अपने मनोवांछित पतिके रूपमें पाकर सावित्रीको भी बड़ा आनन्द हुआ ॥
गते पितरि सर्वाणि संन्यस्याभरणानि सा ।
जगृहे वल्कलान्येव वस्त्रं काषायमेव च ॥ १८ ॥
पिताके चले जानेपर सावित्री अपने सब आभूषण उतारकर वल्कल तथा गेरुआ वस्त्र पहनने लगी ॥ १८ ॥
परिचारैर्गुणैश्चैव प्रश्रयेण दमेन च ।
सर्वकामक्रियाभिश्च सर्वेषां तुष्टिमादधे ॥ १९ ॥
सावित्रीने सेवा, गुण, विनय, संयम और सबके मनके अनुसार कार्य करनेसे सभीको प्रसन्न कर लिया ॥ १ ९ ॥
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श्वश्रूं शरीरसत्कारैः सर्वैराच्छादनादिभिः ।
श्वशुरं देवसत्कारैर्वाचः संयमनेन च ॥ २० ॥
उसने शारीरिक सेवा तथा वस्त्राभूषण आदिके द्वारा सासको और वाणीके संयमपूर्वक देवोचित सत्कारद्वारा ससुरको संतुष्ट किया ॥ २० ॥
तथैव प्रियवादेन नैपुणेन शमेन च ।
रहश्चैवोपचारेण भर्तारं पर्यंतोषयत् ॥ २१ ॥
इसी प्रकार मधुर सम्भाषण, कार्य कुशलता, शान्ति तथा एकान्तसेवाद्वारा पतिदेवको भी सदा प्रसन्न रखा ॥ २१ ॥
एवं तत्राश्रमे तेषां तदा निवसतां सताम् ।
कालस्तपस्यतां कश्चिदपाक्रामत भारत ॥ २२ ॥
भरतनन्दन! इस प्रकार उन सब लोगोंको उस आश्रममें रहकर तपस्या करते कुछ काल व्यतीत हो गया ॥ २२ ॥
सावित्र्या ग्लायमानायास्तिष्ठन्त्यास्तु दिवानिशम् ।
नारदेन यदुक्तं तद् वाक्यं मनसि वर्तते ॥ २३ ॥
इधर सावित्री निरन्तर चिन्तासे गली जा रही थी । दिन - रात सोते -उठते हर समय नारदजीकी कही हुई बात उसके मनमें बनी रहती थी- वह उसे क्षणभरके लिये भी नहीं भूलती थी ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि पतिव्रतामाहात्म्यपर्वणि सावित्र्युपाख्याने पञ्चनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २ ९ ५ ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत पतिव्रतामाहात्म्यपर्वमें सावित्री- उपाख्यानविषयक दो सौ पंचानबेवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २९५ ॥
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षण्णवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः सावित्रीकी व्रतचर्या तथा सास - ससुर और पतिकी आज्ञा लेकर सत्यवान्के साथ उसका वनमें जाना मार्कण्डेय उवाच
ततः काले बहुतिथे व्यतिक्रान्ते कदाचन ।
प्राप्तः स कालो मर्तव्यं यत्र सत्यवता नृप ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! तदनन्तर बहुत दिन बीत जानेपर एक दिन वह समय भी आ पहुँचा जब कि सत्यवान्की मृत्यु होनेवाली थी ॥ १ ॥
गणयन्त्याश्च सावित्र्या दिवसे दिवसे गते ।
यद् वाक्यं नारदेनोक्तं वर्तते हृदि नित्यशः ॥ २ ॥
सावित्री एक -एक दिन बीतनेपर उसकी गणना करती रहती थी । नारदजीने जो बात कही थी, वह उसके हृदयमें सदा विद्यमान रहती थी ॥ २ ॥
चतुर्थेऽहनि मर्तव्यमिति संचिन्त्य भाविनी ।
व्रतं त्रिरात्मुद्दिश्य दिवारात्रं स्थिताभवत् ॥ ३ ॥
भाविनी सावित्रीको जब यह निश्चय हो गया कि मेरे पतिको आजसे चौथे दिन मरना है, तब उसने तीन रातका व्रत धारण किया और उसमें वह दिन - रात खड़ी ही रही ॥ ३ ॥
तं श्रुत्वा नियमं तस्या भृशं दुःखान्वितो नृपः ।
उत्थाय वाक्यं सावित्रीमब्रवीत् परिसान्त्वयन् ॥ ४ ॥
सावित्रीका यह कठोर नियम सुनकर राजा द्युमत्सेनको बड़ा दुःख हुआ । उन्होंने उठकर सावित्रीको सान्त्वना देते हुए कहा ॥ ४ ॥
द्युमत्सेन उवाच
अतितीव्रोऽयमारम्भस्त्वयाऽऽरब्धो नृपात्मजे ।
तिसृणां वसतीनां हि स्थानं परमदुश्चरम् ॥ ५ ॥
द्युमत्सेन बोले- राजकुमारी! तुमने यह बड़ा कठोर व्रत आरम्भ किया है । तीन दिनोंतक निराहार रहना तो अत्यन्त दुष्कर कार्य है ॥ ५ ॥
सावित्र्युवाच
न कार्यस्तात संतापः पारयिष्याम्यहं व्रतम् ।
व्यवसायकृतं हीदं व्यवसायश्च कारणम् ॥ ६ ॥
सावित्री बोली – पिताजी! आप चिन्ता न करें । मैं इस व्रतको पूर्ण कर लूँगी । दृढ़ निश्चय ही व्रतके निर्वाहमें कारण हुआ करता है, सो मैंने भी दृढ़ निश्चयसे ही इस व्रतको