02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 2011–2020
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2011–2020
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कहा जा सकता है कि सत्यवान् जीवित है ॥ १८ ॥
धौम्य उवाच
सर्वैर्गुणैरुपेतस्ते यथा पुत्रो जनप्रियः ।
दीर्घायुर्लक्षणोपेतस्तथा जीवति सत्यवान् ॥ १ ९ ॥
धौम्यने कहा —महाराज! आपका यह पुत्र जिस प्रकार समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न, जनप्रिय तथा चिरजीवी पुरुषोंके लक्षणोंसे युक्त है, उसके अनुसार यही मानना चाहिये कि सत्यवान् जीवित है ॥ १ ९ ॥ मार्कण्डेय उवाच
एवमाश्वासितस्तैस्तु सत्यवाग्भिस्तपस्विभिः ।
तांस्तान् विगणयन् सर्वांस्ततः स्थिर इवाभवत् ॥ २० ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! इस प्रकार सत्यवादी एवं तपस्वी मुनियोंने जब राजा द्युमत्सेनको पूर्णतः आश्वासन दिया, तब उन सबका समादर करते हुए उनकी बात मानकर वे स्थिर- से हो गये ॥ २० ॥
ततो मुहूर्तात् सावित्री भर्त्रा सत्यवता सह ।
आजगामाश्रमं रात्रौ प्रहृष्टा प्रविवेश ह ॥ २१ ॥
तदनन्तर दो ही घड़ीमें सावित्री अपने पति सत्यवान् के साथ रातमें वहाँ आयी और बड़े हर्षके साथ उसने आश्रममें प्रवेश किया ॥ २१ ॥
ब्राह्मणा ऊचुः
पुत्रेण संगतं त्वां तु चक्षुष्मन्तं निरीक्ष्य च ।
सर्वे वयं वै पृच्छामो वृद्धिं वै पृथिवीपते ॥ २२ ॥
तब ब्राह्मणोंने कहा — महाराज! पुत्रके साथ आपका मिलन हुआ और आपको नेत्र भी प्राप्त हो गये, इस अवस्थामें आपको देखकर हम सब लोग आपका अभ्युदय मना रहे हैं ॥ २२ ॥
समागमेन 'पुत्रस्य सावित्र्या दर्शनेन च ।
चक्षुषश्चात्मनो लाभात् त्रिभिर्दिष्ट्या विवर्धसे ॥ २३ ॥
बड़े सौभाग्यकी बात है कि आपको पुत्रका समागम प्राप्त हुआ, बहू सावित्रीका दर्शन हुआ और अपने खोये हुए नेत्र पुनः मिल गये । इन तीनों बातोंसे आपका अभ्युदय सूचित होता है ॥ २३ ॥
सर्वैरस्माभिरुक्तं यत् तथा तन्नात्र संशयः ।
भूयोभूयः समृद्धिस्ते क्षिप्रमेव भविष्यति ॥ २४ ॥
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हम सब लोगोंने जो बात कही है, वह ज्यों -की - त्यों सत्य निकली, इसमें संशय नहीं है । आगे भी शीघ्र ही आपकी बारंबार समृद्धि होनेवाली है ॥ २४ ॥
ततोऽग्निं तत्र संज्वाल्य द्विजास्ते सर्व एव हि ।
उपासांचक्रिरे पार्थ द्युमत्सेनं महीपतिम् ॥ २५ ॥
युधिष्ठिर! तदनन्तर सभी ब्राह्मण वहाँ आग जलाकर राजा द्युमत्सेनके पास बैठ गये ॥ २५ ॥
शैब्या च सत्यवांश्चैव सावित्री चैकतः स्थिताः ।
सर्वैस्तैरभ्यनुज्ञाता विशोकाः समुपाविशन् ॥ २६ ॥
शैब्या, सत्यवान् तथा सावित्री – ये तीनों भी एक ओर खड़े थे, जो उन सब महात्माओंकी आज्ञा पाकर शोकरहित हो बैठ गये ॥ २६ ॥
ततो राज्ञा सहासीनाः सर्वे ते वनवासिनः ।
जातकौतूहलाः पार्थ पप्रच्छुर्नृपतेः सुतम् ॥ २७ ॥
पार्थ! तत्पश्चात् राजाके साथ बैठे हुए वे सभी वनवासी कौतूहलवश राजकुमार सत्यवान्से पूछने लगे ॥ २७ ॥
ऋषय ऊचुः
प्रागेव नागतं कस्मात् सभार्येण त्वया विभो ।
विरात्रे चागतं कस्मात् कोऽनुबन्धस्तवाभवत् ॥ २८ ॥
ऋषि बोले- राजकुमार! तुम अपनी पत्नीके साथ पहले ही क्यों नहीं चले आये? क्यों इतनी रात बिताकर आये? तुम्हारे सामने कौन- सी अड़चन आ गयी थी? ॥ २८ ॥
संतापितः पिता माता वयं चैव नृपात्मज ।
कस्मादिति न जानीमस्तत् सर्वं वक्तुमर्हसि ॥ २ ९ ॥
राजपुत्र! तुमने आनेमें विलम्ब करके अपने माता- पिता तथा हमलोगोंको भी भारी संतापमें डाल दिया था । तुमने ऐसा क्यों किया? यह हम नहीं जान पाते हैं, अतः सब बातें स्पष्ट रूपसे बताओ ॥ २ ९ ॥ सत्यवानुवाच
पित्राहमभ्यनुज्ञातः सावित्रीसहितो गतः ।
अथ मेऽभूच्छिरोदुःखं वने काष्ठानि भिन्दतः ॥ ३० ॥
सत्यवान् बोले- मैं पिताकी आज्ञा पाकर सावित्रीके साथ वनमें गया । फिर वनमें लकड़ियोंको चीरते समय मेरे सिरमें बड़े जोरसे दर्द होने लगा ॥ ३० ॥
सुप्तश्चाहं वेदनया चिरमित्युपलक्षये ।
तावत् कालं न च मया सुप्तपूर्वं कदाचन ॥ ३१ ॥
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मैं समझता हूँ कि मैं वेदनासे व्याकुल होकर देरतक सोता रह गया । उतने समयतक मैं उसके पहले कभी नहीं सोया था ॥ ३१ ॥
सर्वेषामेव भवतां संतापो मा भवेदिति ।
अतो विरात्रागमनं नान्यदस्तीह कारणम् ॥ ३२ ॥
नींद खुलनेपर मैं इतनी रातके बाद भी इसलिये चला आया कि आप सब लोगोंको मेरे
लिये चिन्तित न होना पड़े । इस विलम्बमें और कोई कारण नहीं है ॥ ३२ ॥
गौतम उवाच
अकस्माच्चक्षुषः प्राप्तिर्द्युमत्सेनस्य ते पितुः ।
नास्य त्वं कारणं वेत्सि सावित्री वक्तुमर्हति ॥ ३३ ॥
गौतम बोले — तुम्हारे पिता द्युमत्सेनको जो सहसा नेत्रोंकी प्राप्ति हुई है, इसका कारण तुम नहीं जानते । सम्भवतः सावित्री बतला सकती है ॥ ३३ ॥
श्रोतुमिच्छामि सावित्रि त्वं हि वेत्थ परावरम् ।
त्वां हि जानामि सावित्रि सावित्रीमिव तेजसा ॥ ३४ ॥
त्वमत्र हेतुं जानीषे तस्मात् सत्यं निरूच्यताम् ।
रहस्यं यदि ते नास्ति किंचिदत्र वदस्व नः ॥ ३५ ॥
सावित्री! मैं इसका रहस्य तुमसे सुनना चाहता हूँ; क्योंकि तुम भूत और भविष्य सब कुछ जानती हो । मैं तुम्हें साक्षात् सावित्रीदेवीके समान तेजस्विनी जानता हूँ । राजाको जो सहसा नेत्रोंकी प्राप्ति हुई है, इसका कारण तुम जानती हो । सच-सच बताओ, यदि इसमें कुछ छिपानेकी बात न हो तो हमसे अवश्य कहो ॥ ३४-३५ ॥ सावित्र्युवाच
एवमेतद् यथा वेत्थ संकल्पो नान्यथा हि वः ।
न हि किंचिद् रहस्यं मे श्रूयतां तथ्यमेव यत् ॥ ३६ ॥
सावित्री बोली -मुनीश्वरो! आपलोग जैसा समझते हैं, ठीक है । आपलोगोंका संकल्प अन्यथा नहीं हो सकता । मेरे लिये कोई छिपानेकी बात नहीं है । मैं सब घटनाएँ ठीक - ठीक बताती हूँ, सुनिये ॥ ३६ ॥
मृत्युर्मे पत्युराख्यातो नारदेन महात्मना ।
स चाद्य दिवसः प्राप्तस्ततो नैनं जहाम्यहम् ॥ ३७ ॥
महात्मा नारदजीने मुझसे मेरे पतिकी मृत्युका हाल बताया था । वह मृत्युदिवस आज ही आया था; इसलिये मैं इन्हें अकेला नहीं छोड़ती थी ॥ ३७ ॥
सुप्तं चैनं यमः साक्षादुपागच्छत् सकिङ्करः ।
स एनमनयद् बद्ध्वा दिशं पितृनिषेविताम् ॥ ३८ ॥
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जब ये सिरके दर्दसे व्याकुल होकर सो गये, उस समय साक्षात् भगवान् यमराज अपने सेवकके साथ पधारे । वे इन्हें बाँधकर दक्षिण दिशाकी ओर ले चले ॥ ३८ ॥
अस्तौषं तमहं देवं सत्येन वचसा विभुम् ।
पञ्च वै तेन मे दत्ता वराः शृणुत तान् मम ॥ ३ ९ ॥
उस समय मैंने सत्यवचनोंद्वारा उन भगवान् यमकी स्तुति की । तब उन्होंने मुझे पाँच वर दिये । उन वरोंको आप मुझसे सुनिये ॥ ३ ९ ॥
चक्षुषी च स्वराज्यं च द्वौ वरौ श्वशुरस्य मे ।
लब्धं पितुः पुत्रशतं पुत्राणां चात्मनः शतम् ॥ ४० ॥
नेत्र तथा अपने राज्यकी प्राप्ति- ये दो वर मेरे श्वशुरके लिये प्राप्त हुए हैं । इसके सिवा मैंने अपने पिताके लिये सौ पुत्र तथा अपने लिये भी सौ पुत्र होनेके दो वर और पाये हैं ॥ ४० ॥
चतुर्वर्षशतायुर्मे भर्ता लब्धश्च सत्यवान् ।
भर्तुर्हि जीवितार्थं तु मया चीर्णं त्विदं व्रतम् ॥ ४१ ॥
पाँचवें वरके रूपमें मुझे मेरे पति सत्यवान् चार सौ वर्षोंकी आयु लेकर प्राप्त हुए हैं । पतिके जीवनकी रक्षाके लिये ही मैंने यह व्रत किया था ॥ ४१ ॥
एतत् सर्वं मयाऽऽख्यातं कारणं विस्तरेण वः ।
यथावृत्तं सुखोदर्कमिदं दुःखं महन्मम ॥ ४२ ॥
इस प्रकार मैंने आपलोगोंसे विलम्बसे आनेका कारण और उसका यथावत् वृत्तान्त विस्तारपूर्वक बताया है । मुझे जो यह महान् दुःख उठाना पड़ा है उसका अन्तिम फल सुख ही हुआ है ॥ ४२ ॥
ऋषय ऊचुः निमज्जमानं व्यसनैरभिद्रुतं कुलं नरेन्द्रस्य तमोमये हृदे । त्वया सुशीलव्रतपुण्यया कुलं समुद्धृतं साध्वि पुनः कुलीनया ॥ ४३ ॥
ऋषि बोले- पतिव्रते! राजा द्युमत्सेनका कुल भाँति- भाँतिकी विपत्तियोंसे ग्रस्त होकर दुःखके अंधकारमय गढ़ेमें डूबा जा रहा था; परंतु तुझ जैसी सुशीला, व्रतपरायणा और पवित्र आचरणवाली कुलीन वधूने आकर इसका उद्धार कर दिया ॥ ४३ ॥
मार्कण्डेय उवाच तथा प्रशस्य ह्यभिपूज्य चैव वरस्त्रियं तामृषयः समागताः । नरेन्द्रमामन्त्र्य सपुत्रमञ्जसा
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शिवेन जग्मुर्मुदिताः स्वमालयम् ॥ ४४ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! इस प्रकार वहाँ आये हुए महर्षियोंने स्त्रियोंमें श्रेष्ठ सावित्रीकी भूरि- भूरि प्रशंसा तथा आदर- सत्कार करके पुत्रसहित राजा द्युमत्सेनकी अनुमति ले सुख और प्रसन्नताके साथ अपने - अपने घरको प्रस्थान किया ॥ ४४ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि पतिव्रतामाहात्म्यपर्वणि सावित्र्युपाख्याने अष्टनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २ ९ ८ ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत पतिव्रतामाहात्म्यपर्वमें सावित्री- उपाख्यानविषयक दौ सौ अट्ठानबेवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २९८ ॥
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नवनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः शाल्वदेशकी प्रजाके अनुरोधसे महाराज द्युमत्सेनका राज्याभिषेक कराना तथा सावित्रीको सौ पुत्रों और सौ भाइयोंकी प्राप्ति मार्कण्डेय उवाच
तस्यां रात्र्यां व्यतीतायामुदिते सूर्यमण्डले ।
कृतपौर्वाह्णिकाः सर्वे समेयुस्ते तपोधनाः ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं- जब वह रात बीत गयी और सूर्यमण्डलका उदय हुआ, उस समय सब तपोधन ऋषिगण पूर्वाह्णकालका नित्यकृत्य पूरा पुनः उस आश्रममें एकत्र हुए ॥ १ ॥
तदेव सर्वं सावित्र्या महाभाग्यं महर्षयः ।
द्युमत्सेनाय नातृप्यन् कथयन्तः पुनः पुनः ॥ २ ॥
वे महर्षिगण राजा द्युमत्सेनसे सावित्रीके उस परम सौभाग्यका बारंबार वर्णन करते हुए भी तृप्त नहीं होते थे ॥ ततः प्रकृतयः सर्वाः शाल्वेभ्योऽभ्यागता नृप आचख्युर्निहतं चैव स्वेनामात्येन तं द्विषम् ॥ ३ ॥
राजन्! उसी समय शाल्वदेशसे वहाँकी सारी प्रजाओंने आकर महाराज द्युमत्सेनसे कहा — ‘ प्रभो! आपका शत्रु अपने ही मन्त्रीके हाथों मारा गया है ' ॥ ३ ॥
तं मन्त्रिणा हतं श्रुत्वा ससहायं सबान्धवम् ।
न्यवेदयन् यथावृत्तं विद्रुतं च द्विषद्बलम् ॥४ ॥
ऐकमत्यं च सर्वस्य जनस्याथ नृपं प्रति ।
सचक्षुर्वाप्यचक्षुर्वा स नो राजा भवत्विति ॥ ५ ॥
उन्होंने यह भी निवेदन किया कि ' उसके सहायक और बन्धु बान्धव भी मन्त्रीके ही हाथों मर चुके हैं । शत्रुकी सारी सेना पलायन कर गयी है । यह यथावत् वृत्तान्त सुनकर सब लोगोंका एकमतसे यह निश्चय हुआ है कि हमें पूर्व नरेशपर ही विश्वास है । उन्हें दिखायी देता हो या न दीखता हो, वे ही हमारे राजा हों ' ॥ ४-५ ॥
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अनेन निश्चयेनेह वयं प्रस्थापिता नृप ।
प्राप्तानीमानि यानानि चतुरङ्गं च ते बलम् ॥ ६ ॥
‘ नरेश्वर! ऐसा निश्चय करके ही हमें यहाँ भेजा गया है । ये सवारियाँ प्रस्तुत हैं और आपकी चतुरंगिणी सेना भी सेवामें उपस्थित है ' ॥ ६ ॥
प्रयाहि राजन् भद्रं ते घुष्टस्ते नगरे जयः ।
अध्यास्स्व चिररात्राय पितृपैतामहं पदम् ॥ ७ ॥
' राजन्! आपका कल्याण हो । अब अपने राज्यमें पधारिये । नगरमें आपकी विजय घोषित कर दी गयी है । आप दीर्घकालतक अपने बाप- दादोंके राज्यपर प्रतिष्ठित रहें' ॥ ७ ॥
चक्षुष्मन्तं च तं दृष्ट्वा राजानं वपुषान्वितम् ।
मूर्ध्ना निपतिताः सर्वे विस्मयोत्फुल्ललोचनाः ॥ ८ ॥
तत्पश्चात् राजा द्युमत्सेनको नेत्रयुक्त और स्वस्थ शरीरसे सुशोभित देखकर उन सबके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे और सबने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया ॥ ८ ॥
ततोऽभिवाद्य तान् वृद्धान् द्विजानाश्रमवासिनः ।
तैश्चाभिपूजितः सर्वैः प्रययौ नगरं प्रति ॥ ९ ॥
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इसके बाद राजाने आश्रममें रहनेवाले उन वृद्ध ब्राह्मणोंका अभिवादन किया और उन सबसे समादृत हो वे अपनी राजधानीकी ओर चले ॥ ९ ॥
शैब्या च सह सावित्र्या स्वास्तीर्णेन सुवर्चसा ।
नरयुक्तेन यानेन प्रययौ सेनया वृता ॥ १० ॥
शैब्या भी अपनी बहू सावित्रीके साथ सुन्दर बिछावनसे युक्त तेजस्वी शिबिकापर, जिसे कई कहार ढो रहे थे, आरूढ़ हो सेनासे घिरी हुई चल दी ॥ १० ॥
ततोऽभिषिषिचुः प्रीत्या द्युमत्सेनं पुरोहिताः ।
पुत्रं चास्य महात्मानं यौवराज्येऽभ्यषेचयन् ॥ ११ ॥
वहाँ पहुँचनेपर पुरोहितोंने बड़ी प्रसन्नताके साथ द्युमत्सेनका राज्याभिषेक किया । साथ ही उनके महामना पुत्र सत्यवान्को भी युवराजके पदपर अभिषिक्त कर दिया ॥ ११ ॥
ततः कालेन महता सावित्र्याः कीर्तिवर्धनम् ।
तद् वै पुत्रशतं जज्ञे शूराणामनिवर्तिनाम् ॥ १२ ॥
तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् सावित्रीके गर्भसे उसकी कीर्ति बढ़ानेवाले सौ पुत्र उत्पन्न हुए । वे सब - के - सब शूरवीर तथा संग्राममें कभी पीछे न हटनेवाले थे ॥ १२ ॥
भ्रातॄणां सोदराणां च तथैवास्याभवच्छतम् ।
मद्राधिपस्याश्वपतेर्मालव्यां सुमहद् बलम् ॥ १३ ॥
इसी प्रकार मद्रराज अश्वपतिके भी मालवीके गर्भसे सावित्रीके सौ सहोदर भाई उत्पन्न हुए, जो अत्यन्त बलशाली थे ॥ १३ ॥
एवमात्मा पिता माताश्वश्रूः श्वशुर एव च ।
भर्तुः कुलं च सावित्र्या सर्वं कृच्छ्रात् समुद्धृतम् ॥ १४ ॥
इस तरह सावित्रीने अपने आपको, पिता - माताको, सास-स- ससुरको तथा पतिके समस्त कुलको भी भारी संकटसे बचा लिया था ॥ १४ ॥
तथैवैषा हि कल्याणी द्रौपदी शीलसम्मता ।
तारयिष्यति वः सर्वान् सावित्रीव कुलाङ्गना ॥ १५ ॥
सावित्रीकी ही भाँति यह कल्याणमयी उत्तम कुलवाली सुशीला द्रौपदी तुम सब लोगोंका महान् संकटसे उद्धार करेगी ॥ १५ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं स पाण्डवस्तेन अनुनीतो महात्मना ।
विशोको विज्वरो राजन् काम्यके न्यवसत् तदा ॥ १६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार उन महात्मा मार्कण्डेयजीके समझाने - बुझाने और आश्वासन देनेपर उस समय पाण्डुनन्दन राजा युधिष्ठिर शोक तथा चिन्तासे रहित हो काम्यकवनमें सुखपूर्वक रहने लगे ॥ १६ ॥
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यश्चेदं शृणुयाद् भक्त्या सावित्र्याख्यानमुत्तमम् ।
स सुखी सर्वसिद्धार्थो न दुःखं प्राप्नुयान्नरः ॥ १७ ॥
जो इस परम उत्तम सावित्री - उपाख्यानको भक्तिभावसे सुनेगा, वह मनुष्य सदा अ समस्त मनोरथोंके सिद्ध होनेसे सुखी होगा और कभी दुःख नहीं पायेगा ॥ १७ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि पतिव्रतामाहात्म्यपर्वणि सावित्र्युपाख्याने नवनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २ ९९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत पतिव्रतामाहात्म्यपर्वमें सावित्री- उपाख्यानविषयक दो सौ निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ९९ ॥
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(कुण्डलाहरणपर्व) त्रिशततमोऽध्यायः सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना जनमेजय उवाच
यत् तत् तदा महद् बाँल्लोमशो वाक्यमब्रवीत् ।
इन्द्रस्य वचनादेव पाण्डुपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ १ ॥
यच्चापि ते भयं तीव्रं न च कीर्तयसे क्वचित् ।
तच्चाप्यपहरिष्यामि धनंजय इतो गते ॥ २ ॥
किं नु तज्जपतां श्रेष्ठ कर्णं प्रति महद् भयम् ।
आसीन्न च स धर्मात्मा कथयामास कस्यचित् ॥ ३ ॥
जनमेजयने पूछा— ब्रह्मन्! लोमशजीने इन्द्रके कथनानुसार उस समय पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरसे जो यह महत्वपूर्ण वचन कहा था कि ' तुम्हें जो बड़ा भारी भय लगा रहता है और जिसकी तुम किसीके सामने चर्चा भी नहीं करते, उसे भी मैं अर्जुनके यहाँ ( स्वर्ग) -से चले जानेपर दूर कर दूँगा । ' जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ वैशम्पायनजी! धर्मात्मा महाराज युधिष्ठिरको कर्णसे वह कौन- सा भारी भय था, जिसकी वे किसीके सम्मुख बात भी नहीं चलाते थे ॥ १ –३ ॥ वैशम्पायन उवाच
अहं ते राजशार्दूल कथयामि कथामिमाम् ।
पृच्छतो भरतश्रेष्ठ शुश्रूषस्व गिरं मम ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजीने कहा- नृपश्रेष्ठ! भरतकुलभूषण! तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैं यह कथा सुनाऊँगा । तुम ध्यान देकर मेरी बात सुनो ॥ ४ ॥
द्वादशे समतिक्रान्ते वर्षे प्राप्ते त्रयोदशे ।
पाण्डूनां हितकृच्छक्रः कर्णं भिक्षितुमुद्यतः ॥ ५ ॥
जब पाण्डवोंके वनवासके बारह वर्ष बीत गये और तेरहवाँ वर्ष आस्मभ हुआ, तब पाण्डवोंके हितकारी इन्द्र कर्णसे कवच- कुण्डल माँगनेको उद्यत हुए ॥ ५ ॥