श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 2021–2030
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2021–2030
पृष्ठ 2021
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अभिप्रायमथो ज्ञात्वा महेन्द्रस्य विभावसुः ।
कुण्डलार्थे महाराज सूर्यः कर्णमुपागतः ॥ ६ ॥
महाराज! कुण्डलके विषयमें देवराज इन्द्रका मनोभाव जानकर भगवान् सूर्य कर्णके पास गये ॥ ६ ॥
महार्हे शयने वीरं स्पर्द्धयास्तरणसंवृते ।
शयानमतिविश्वस्तं ब्रह्मण्यं सत्यवादिनम् ॥ ७ ॥
ब्राह्मणभक्त और सत्यवादी वीर कर्ण अत्यन्त निश्चिन्त होकर एक सुन्दर बिछौनेवाली बहुमूल्य शय्यापर सोया था ॥ ७ ॥
स्वप्नान्ते निशि राजेन्द्र दर्शयामास रश्मिवान् ।
कृपया परयाऽऽविष्टः पुत्रस्नेहाच्च भारत ॥ ८ ॥
राजेन्द्र! भरतनन्दन! अंशुमाली भगवान् सूर्यने पुत्रस्नेहवश अत्यन्त दयाभावसे युक्त हो रातको सपनेमें कर्णको दर्शन दिया ॥ ८ ॥
ब्राह्मणो वेदविद् भूत्वा सूर्यो योगर्द्धिरूपवान् ।
हितार्थमब्रवीत् कर्णं सान्त्वपूर्वमिदं वचः ॥ ९ ॥
उस समय उन्होंने वेदवेत्ता ब्राह्मणका रूप धारण कर रखा था । उनका स्वरूप योग-समृद्धिसे सम्पन्न था । उन्होंने कर्णके हितके लिये उसे समझाते हुए इस प्रकार कहा - ॥९ ॥
पृष्ठ 2022
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
कर्ण मद्वचनं तात शृणु सत्यभृतां वर ।
ब्रुवतोऽद्य महाबाहो सौहृदात् परमं हितम् ॥ १० ॥
‘ सत्यधारियोंमें श्रेष्ठ तात कर्ण! मेरी बात सुनो । महाबाहो! मैं सौहार्दवश आज तुम्हारे परम हितकी बात कहता हूँ ॥ १० ॥
उपायास्यति शक्रस्त्वां पाण्डवानां हितेप्सया ।
ब्राह्मणच्छद्मना कर्ण कुण्डलापजिहीर्षया ॥ ११ ॥
‘ कर्ण! देवराज इन्द्र पाण्डवोंके हितकी इच्छासे तुम्हारे दोनों कुण्डल ( और कवच) लेनेके लिये ब्राह्मणका छद्मवेष धारण करके तुम्हारे पास आयँगे ॥ ११ ॥
विदितं तेन शीलं ते सर्वस्य जगतस्तथा ।
यथा त्वं भिक्षितः सद्भिर्ददास्येव न याचसे ॥ १२ ॥
' तुम्हारी दानशीलताका उन्हें ज्ञान है तथा सम्पूर्ण जगत्को तुम्हारे इस नियमका पता है कि किसी सत्पुरुषके माँगनेपर तुम उसकी अभीष्ट वस्तु देते ही हो, उससे कुछ माँगते नहीं हो ॥ १२ ॥
त्वं हि तात ददास्येव ब्राह्मणेभ्यः प्रयाचितम् ।
वित्तं यच्चान्यदप्याहुर्न प्रत्याख्यासि कस्यचित् ॥ १३ ॥
पृष्ठ 2023
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
' तात! तुम ब्राह्मणोंको उनकी माँगी हुई वस्तु दे ही देते हो; साथ ही धन तथा और जो कुछ भी वे माँग लें, सब दे डालते हो । किसीको 'नहीं ' कहकर निराश नहीं लौटाते ॥ १३ ॥
त्वां तु चैवंविधं ज्ञात्वा स्वयं वै पाकशासनः ।
आगन्ता कुण्डलार्थाय कवचं चैव भिक्षितुम् ॥ १४ ॥
' तुम्हारे ऐसे स्वभावको जानकर साक्षात् इन्द्र तुमसे तुम्हारे कवच और कुण्डल माँगनेके लिये आनेवाले हैं ॥ १४ ॥
तस्मै प्रयाचमानाय न देये कुण्डले त्वया ।
अनुनेयः परं शक्त्या श्रेय एतद्धि ते परम् ॥ १५ ॥
‘ उनके माँगनेपर तुम उन्हें अपने दोनों कुण्डल दे न देना । यथाशक्ति अनुनय-विनय करके उन्हें समझा देना; इससे तुम्हारा परम मंगल होगा ॥ १५ ॥
कुण्डलार्थे ब्रुवंस्तात कारणैर्बहुभिस्त्वया ।
अन्यैर्बहुविधैर्वित्तैः सन्निवार्यः पुनः पुनः ॥ १६ ॥
‘ इस प्रकार वे जब- जब कुण्डलके लिये बात करें तब - तब बहुत -से कारण बताकर तथा दूसरे नाना प्रकारके धन आदि देनेकी बात कहकर बार-बार उन्हें कुण्डल माँगनेसे मना करना ॥ १६ ॥
रत्नैः स्त्रीभिस्तथा गोभिर्धनैर्बहुविधैरपि ।
निदर्शनैश्च बहुभिः कुण्डलेप्सुः पुरन्दरः ॥ १७ ॥
‘ नाना प्रकारके रत्न, स्त्री, गौ, भाँति- भाँतिके धन देकर तथा बहुत- से दृष्टान्तोंद्वारा बहलाकर कुण्डलार्थी इन्द्रको टालनेका प्रयत्न करना ॥ १७ ॥
यदि दास्यसि कर्ण त्वं सहजे कुण्डले शुभे ।
आयुषः प्रक्षयं गत्वा मृत्योर्वशमुपैष्यसि ॥ १८ ॥
‘ कर्ण! यदि तुम अपने जन्मके साथ ही उत्पन्न हुए ये सुन्दर कुण्डल इन्द्रको दे दोगे तो तुम्हारी आयु क्षीण हो जायगी और तुम मृत्युके अधीन हो जाओगे ॥ १८ ॥
कवचेन समायुक्तः कुण्डलाभ्यां च मानद ।
अवध्यस्त्वं रणेऽरीणामिति विद्धि वचो मम ॥ १ ९ ॥
' मानद! तुम अपने कवच और कुण्डलोंसे संयुक्त होनेपर रणमें शत्रुओंके लिये भी अवध्य बने रहोगे, मेरी इस बातको समझ लो ॥ १ ९ ॥
अमृतादुत्थितं ह्येतदुभयं रत्नसम्भवम् ।
तस्माद् रक्ष्यं त्वया कर्ण जीवितं चेत् प्रियं तव ॥ २० ॥
‘ कर्ण! ये दोनों रत्नमय कवच और कुण्डल अमृतसे उत्पन्न हुए हैं; अतः यदि तुम्हें अपना जीवन प्रिय हो तो इन दोनों वस्तुओंकी रक्षा अवश्य करना ' ॥ २० ॥
कर्णउवाच
पृष्ठ 2024
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
को मामेवं भवान् प्राह दर्शयन् सौहृदं परम् ।
कामया भगवन् ब्रूहि को भवान् द्विजवेषधृक् ॥ २१ ॥
कर्णने पूछा — भगवन्! आप मेरे प्रति अत्यन्त स्नेह दिखाते हुए जो इस प्रकार हितकर सलाह दे रहे हैं इससे मैं जानना चाहता हूँ कि आप कौन हैं? यदि इच्छा हो, तो बताइये । इस प्रकार ब्राह्मणवेष धारण करनेवाले आप कौन हैं? ॥ २१ ॥
ब्राह्मणउवाच
अहं तात सहस्रांशुः सौहृदात् त्वां निदर्शये ।
कुरुष्वैतद् वचो मे त्वमेतच्छ्रेयः परं हि ते ॥ २२ ॥
ब्राह्मणने कहा - तात! मैं सहस्रांशु सूर्य हूँ । स्नेहवश ही तुम्हें दर्शन देकर सामयिक कर्तव्य सुझा रहा हूँ । तुम मेरा कहना मान लो । इससे तुम्हारा परम कल्याण होगा ॥ २२ ॥
कर्णउवाच
श्रेय एव ममात्यन्तं यस्य मे गोपतिःप्रभुः ।
प्रवक्ताद्य हितान्वेषी शृणु चेदं वचो मम ॥ २३ ॥
कर्णने कहा — जिसके हितका अनुसंधान साक्षात् भगवान् सूर्य करते और हितकी बात बताते हैं, उस कर्णका तो परम कल्याण है ही । भगवन्! आप मेरी यह बात सुनें ॥ २३ ॥
प्रसादये त्वां वरदं प्रणयाच्च ब्रवीम्यहम् ।
न निवार्यो व्रतादस्मादहं यद्यस्मि ते प्रियः ॥ २४ ॥
प्रभो! आप वरदायक देवता हैं । मैं आपसे प्रसन्न रहनेका अनुरोध करता हूँ और प्रेमपूर्वक यह कहता हूँ कि यदि मैं आपका प्रिय हूँ तो आप मुझे इस व्रतसे विचलित न करें ॥ २४ ॥
व्रतं वै मम लोकोऽयं वेत्ति कृत्स्नं विभावसो ।
यथाहं द्विजमुख्येभ्यो दद्यां प्राणानपि ध्रुवम् ॥ २५ ॥
सूर्यदेव! संसारमें सब लोग मेरे इस व्रतके विषयमें पूर्णरूपसे जानते हैं कि मैं श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके याचना करनेपर उन्हें निश्चय ही अपने प्राण भी दे सकता हूँ ॥ २५ ॥
यद्यागच्छति मां शक्रो ब्राह्मणच्छद्मना वृतः ।
हितार्थं पाण्डुपुत्राणां खेचरोत्तम भिक्षितुम् ॥ २६ ॥
दास्यामि विबुधश्रेष्ठ कुण्डले वर्म चोत्तमम् ।
न मे कीर्तिः प्रणश्येत त्रिषु लोकेषु विश्रुता ॥ २७ ॥
आकाशमें विचरनेवालोंमें उत्तम सूर्यदेव! यदि पाण्डवोंके हितके लिये ब्राह्मणके छद्मवेशमें अपनेको छिपाकर साक्षात् इन्द्रदेव मेरे पास भिक्षा माँगने आ रहे हैं तो देवेश्वर! मैं
पृष्ठ 2025
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
उन्हें दोनों कुण्डल और उत्तम कवच अवश्य दे दूँगा, जिससे तीनों लोकोंमें विख्यात हुई मेरी कीर्ति नष्ट न होने पाये ॥ २६-२७ ॥
मद्विधस्य यशस्यं हि न युक्तं प्राणरक्षणम् ।
युक्तं हि यशसा युक्तं मरणं लोकसम्मतम् ॥ २८ ॥
मेरे - जैसे शूरवीरको प्राण देकर भी यशकी ही रक्षा करनी चाहिये; अपयश लेकर प्राणोंकी रक्षा करनी कदापि उचित नहीं है । सुयशके साथ यदि मृत्यु हो जाय तो वह वीरोचित एवं सम्पूर्ण लोकके लिये सम्मानकी वस्तु है ॥ २८ ॥
सोऽहमिन्द्राय दास्यामि कुण्डले सह वर्मणा ।
यदि मां बलवृत्रघ्नो भिक्षार्थमुपयास्यति ॥ २ ९ ॥
ऐसी स्थितिमें यदि बलासुर और वृत्रासुरके विनाशक देवराज इन्द्र मेरे पास भिक्षाके लिये पधारेंगे तो मैं कवचसहित दोनों कुण्डल उन्हें अवश्य दे दूँगा ॥ २ ९ ॥
हितार्थं पाण्डुपुत्राणां कुण्डले मे प्रयाचितुम् ।
तन्मे कीर्तिकरं लोके तस्याकीर्तिर्भविष्यति ॥ ३० ॥
यदि इन्द्र पाण्डवोंके हितके लिये मेरे कुण्डल माँगने आयेंगे तो इससे संसारमें मेरी कीर्ति बढ़ेगी और उनका अपयश होगा ॥ ३० ॥
वृणोमि कीर्तिं लोके हि जीवितेनापि भानुमन् ।
कीर्तिमानश्नुते स्वर्गं हीनकीर्तिस्तु नश्यति ॥ ३१ ॥
अतः सूर्यदेव! मैं जीवन देकर भी जगत्में कीर्तिका ही वरण करूँगा । कीर्तिमान् पुरुष स्वर्गका सुख भोगता है । जिसकी कीर्ति नष्ट हो जाती है, वह स्वयं भी नष्ट ही है ॥ ३१ ॥
कीर्तिर्हि पुरुषं लोके संजीवयति मातृवत् ।
अकीर्तिर्जीवितं हन्ति जीवतोऽपि शरीरिणः ॥ ३२ ॥
कीर्ति इस संसारमें माताकी भाँति मनुष्यको नूतन जीवन प्रदान करती है । परंतु अकीर्ति जीवित पुरुषके भी जीवनको नष्ट कर देती है ॥ ३२ ॥
अयं पुराणः श्लोको हि स्वयं गीतो विभावसो ।
धात्रा लोकेश्वर यथा कीर्तिरायुर्नरस्य ह ॥ ३३ ॥
विभावसो! लोकेश्वर! साक्षात् ब्रह्माजीके द्वारा गाया हुआ यह प्राचीन श्लोक है कि कीर्ति मनुष्यकी आयु है ॥ ३३ ॥
पुरुषस्य परे लोके कीर्तिरेव परायणम् ।
इह लोके विशुद्धा च कीर्तिरायुर्विवर्द्धनी ॥ ३४ ॥
परलोकमें कीर्ति ही पुरुषके लिये सबसे महान् आश्रय है । इस लोकमें भी विशुद्ध कीर्ति आयु बढ़ानेवाली होती है ॥ ३४ ॥
सोऽहं शरीरजे दत्त्वा कीर्तिं प्राप्स्यामि शाश्वतीम् ।
दत्त्वा च विधिवद् दानं ब्राह्मणेभ्यो यथाविधि ॥ ३५ ॥
पृष्ठ 2026
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
हुत्वा शरीरं संग्रामे कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ।
विजित्य च परानाजौ यशः प्राप्स्यामि केवलम् ॥ ३६ ॥
अतः मैं अपने शरीरके साथ उत्पन्न हुए कवच-कुण्डल इन्द्रको देकर सनातन कीर्ति प्राप्त करूँगा । ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक दान देकर, अत्यन्त दुष्कर पराक्रम करके समराग्निमें शरीरकी आहुति देकर तथा शत्रुओंको संग्राममें जीतकर मैं केवल सुयशका उपार्जन करूँगा ॥ ३५-३६ ॥
भीतानामभयं दत्त्वा संग्रामे जीवितार्थिनाम् ।
वृद्धान् बालान् द्विजातींश्च मोक्षयित्वा महाभयात् ॥ ३७ ॥
प्राप्स्यामि परमं लोके यशः स्वर्ग्यमनुत्तमम् ।
जीवितेनापि मे रक्ष्या कीर्तिस्तद् विद्धि मे व्रचम् ॥ ३८ ॥
संग्राममें भयभीत होकर प्राणोंकी भीख माँगनेवाले सैनिकोंको अभय देकर तथा बालक, वृद्ध और ब्राह्मणोंको महान् भयसे छुड़ाकर संसारमें परम उत्तम स्वर्गीय यशका उपार्जन करूँगा । मुझे प्राण देकर भी अपनी कीर्ति सुरक्षित रखनी है। यही मेरा व्रत समझें ॥ ३७-३८ ॥
सोऽहं दत्त्वा मघवते भिक्षामेतामनुत्तमाम् ।
ब्राह्मणच्छद्मिने देव लोके गन्ता परां गतिम् ॥ ३ ९ ॥
इसलिये देव! इस प्रकारके व्रतवाला मैं ब्राह्मण वेषधारी इन्द्रको यह परम श्रेष्ठ भिक्षा देकर जगत्में उत्तम गति प्राप्त करूँगा ॥ ३ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि सूर्यकर्णसंवादे त्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें सूर्यकर्णसंवादविषयक तीन सौवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ३०० ॥
पृष्ठ 2027
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
एकाधिकत्रिशततमोऽध्यायः सूर्यका कर्णको समझाते हुए उसे इन्द्रको कुण्डल न देनेका आदेश देना सूर्य उवाच
माहितं कर्ण कार्षीस्त्वमात्मनः सुहृदां तथा ।
पुत्राणामथ भार्याणामथो मातुरथो पितुः ॥ १ ॥
सूर्यने कहा – कर्ण! तुम अपना, अपने सुहृदोंका, पुत्रों और पत्नियोंका तथा माता-पिताका अहित न करो ॥ १ ॥
शरीरस्याविरोधेन प्राणिनां प्राणभृद्वर ।
इष्यते यशसः प्राप्तिः कीर्तिश्च त्रिदिवे स्थिरा ॥ २ ॥
प्राणधारियोंमें श्रेष्ठ वीर! अपने शरीरकी रक्षा करते हुए ही प्राणियोंको इहलोकमें यशकी प्राप्ति तथा स्वर्गमें स्थायी कीर्ति अभीष्ट होती है ॥ २ ॥
यस्त्वं प्राणविरोधेन कीर्तिमिच्छसि शाश्वतीम् ।
सा ते प्राणान् समादाय गमिष्यति न संशयः ॥ ३ ॥
यदि तुम प्राणोंका विरोध ( नाश) करके सनातन कीर्ति प्राप्त करना चाहते हो तो इसमें संदेह नहीं कि वह ( कीर्ति) तुम्हारे प्राणोंको लेकर ही जायगी ॥ ३ ॥
जीवतां कुरुते कार्यं पिता माता सुतास्तथा ।
ये चान्ये बान्धवाः केचिल्लोकेऽस्मिन् पुरुषर्षभ ॥ ४ ॥
पुरुषरत्न! पिता, माता, पुत्र तथा और जो कोई भी भाई- बन्धु इस लोकमें हैं, वे सब जीवित पुरुषोंसे ही अपने प्रयोजनकी सिद्धि करते हैं ॥ ४ ॥
राजानश्च नरव्याघ्र पौरुषेण निबोध तत् ।
कीर्तिश्च जीवतः साध्वी पुरुषस्य महाद्युते ॥ ५ ॥
महातेजस्वी नरश्रेष्ठ! राजालोग भी जीवित रहनेपर ही पुरुषार्थसे कीर्तिलाभ करते हैं । इस बातको समझो; जीवित पुरुषके लिये ही कीर्ति अच्छी मानी गयी है ॥
मृतस्य कीर्त्या किं कार्यं भस्मीभूतस्य देहिनः ।
मृतःकीर्तिं न जानीते जीवन् कीर्तिं समश्नुते ॥ ६ ॥
जो मर गया, जिसका शरीर चिताकी आगमें जलकर भस्म हो गया; उसे कीर्तिसे क्या प्रयोजन है? मरा हुआ पुरुष कीर्तिके विषयमें कुछ नहीं जानता । जीवित पुरुष ही कीर्तिजनित सुखका अनुभव करता है ॥ ६ ॥
मृतस्य कीर्तिर्मर्त्यस्य यथा माला गतायुषः
पृष्ठ 2028
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अहं तु त्वां ब्रवीम्येतद् भक्तोऽसीति हितेप्सया ॥ ७ ॥
मरे हुए मनुष्यकी कीर्ति मुर्देके गलेमें पड़ी हुई मालाके समान व्यर्थ है । तुम मेरे भक्त हो, इसीलिये तुम्हारे हितकी इच्छासे मैं ये सब बातें कहता हूँ ॥ ७ ॥
भक्तिमन्तो हि मे रक्ष्या इत्येतेनापि हेतुना ।
भक्तोऽयं परया भक्त्या मामित्येव महाभुज ।
ममापि भक्तिरुत्पन्ना स त्वं कुरु वचो मम ॥ ८ ॥
मुझे अपने भक्तोंकी रक्षा करनी ही चाहिये, इसलिये भी तुमसे तुम्हारे हितकी बात कहता हूँ । महाबाहो! यह मेरा भक्त है, परम भक्तिभावसे मेरा भजन करता है, यह सोचकर मेरे मनमें भी तुम्हारे प्रति स्नेह जाग उठा है । अतः तुम मेरी आज्ञाका पालन करो ॥ ८ ॥
अस्ति चात्र परं किञ्चिदध्यात्मं देवनिर्मितम् ।
अतश्च त्वां ब्रवीम्येतत् क्रियतामविशङ्कया ॥ ९ ॥
इस सम्बन्धमें एक देवविहित आध्यात्मिक रहस्य है । इसी कारण तुमसे कह रहा हूँ कि तुम बेखटके यही कार्य करो, जिसे मैंने तुम्हें बतलाया है ॥ ९ ॥
देवगुह्यं त्वया ज्ञातुं न शक्यं पुरुषर्षभ ।
तस्मान्नाख्यामि ते गुह्यं काले वेत्स्यति तद् भवान् ॥ १० ॥
पुरुषरत्न! देवताओंकी गुप्त बात तुम नहीं समझ सकते, इसीलिये वह गोपनीय रहस्य
तुम्हें नहीं बता रहा हूँ । समय आनेपर तुम सब कुछ अपने - आप जान लोगे ॥ १० ॥
पुनरुक्तं च वक्ष्यामि त्वं राधेय निबोध तत् ।
मास्मै ते कुण्डले दद्या भिक्षिते वज्रपाणिना ॥ ११ ॥
राधानन्दन! मैं फिर अपनी कही हुई बात दुहराता हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो— ' इन्द्रके माँगनेपर भी तुम उन्हें अपने वे कुण्डल न देना' ॥ ११ ॥
शोभसे कुण्डलाभ्यां च रुचिराभ्यां महाद्युते ।
विशाखयोर्मध्यगतः शशीव विमले दिवि ॥ १२ ॥
महाद्युते! तुम इन दोनों मनोहर कुण्डलोंसे निर्मल आकाशमें विशाखा नामक दो नक्षत्रोंके बीच प्रकाशित होनेवाले चन्द्रमाकी भाँति शोभा पाते हो ॥ १२ ॥
कीर्तिश्च जीवतः साध्वी पुरुषस्येति विद्धि तत् ।
प्रत्याख्येयस्त्वया तात कुण्डलार्थे सुरेश्वरः ॥ १३ ॥
तुम्हें यह मालूम होना चाहिये कि जीवित पुरुषके लिये ही कीर्ति प्रशंसनीय है । अतः तात! तुम्हें कुण्डलके लिये आये हुए देवराज इन्द्रको देनेसे इनकार कर देना चाहिये ॥ १३ ॥
शक्या बहुविधैर्वाक्यैः कुण्डलेप्सा त्वयानघ ।
विहन्तुं देवराजस्य हेतुयुक्तैः पुनः पुनः ॥ १४ ॥
पृष्ठ 2029
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अनघ! तुम बारंबार युक्तियुक्त वचन कहकर अनेक प्रकारकी बातोंमें बहलाकर देवराज इन्द्रकी कुण्डल लेनेकी इच्छाको नष्ट कर सकते हो ॥ १४ ॥
हेतुमदुपपन्नार्थैर्माधुर्यकृतभूषणैः ।
पुरन्दरस्य कर्ण त्वं बुद्धिमेतामपानुद ॥ १५ ॥
कर्ण! अनेक कारण दिखाकर, नाना प्रकारकी युक्तियाँ सामने रखकर तथा माधुर्यगुणसे विभूषित वचन सुनाकर देवराज इन्द्रके इस कुण्डल लेनेके विचारको तुम पलट देना ॥ १५ ॥
त्वं हि नित्यं नरव्याघ्र स्पर्धसे सव्यसाचिना ।
सव्यसाची त्वया चेह युधि शूरः समेष्यति ॥ १६ ॥
नरव्याघ्र! तुम सदा अर्जुनसे स्पर्धा रखते हो अतः शूरवीर अर्जुन युद्धमें कभी तुमसे अवश्य भिड़ेगा ॥ १६ ॥
न तु त्वामर्जुनः शक्तः कुण्डलाभ्यां समन्वितम् ।
विजेतुं युधि यद्यस्य स्वयमिन्द्रः सखा भवेत् ॥ १७ ॥
यदि तुम इन दोनों कुण्डलोंको धारण किये रहोगे, तो अर्जुन तुम्हें युद्धमें कदापि नहीं जीत सकते; भले ही साक्षात् इन्द्र भी उनकी सहायता करनेके लिये आ जायँ ॥ १७ ॥
तस्मान्न देये शक्राय त्वयैते कुण्डले शुभे ।
संग्रामे यदि निर्जेतुं कर्ण कामयसेऽर्जुनम् ॥ १८ ॥
अतः कर्ण! यदि तुम समरभूमिमें अर्जुनको जीतनेकी अभिलाषा रखते हो तो इन्द्रको ये दोनों शुभ कुण्डल कदापि न देना ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि सूर्यकर्णसंवादे एकाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें सूर्य-कर्णसंवादविषयक तीन सौ एकवाँअध्याय पूराहुआ ॥ ३०१ ॥
पृष्ठ 2030
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वयधिकत्रिशततमोऽध्यायः सूर्य - कर्ण संवाद, सूर्यकी आज्ञाके अनुसार कर्णका इन्द्रसे शक्ति लेकर ही उन्हें कुण्डल और कवच देनेका निश्चय कर्णउवाच
भगवन्तमहं भक्तो यथा मां वेत्थ गोपते ।
तथा परमतिग्मांशो नास्त्यदेयं कथंचन ॥ १ ॥
कर्णने कहा — सूर्यदेव! मैं आपका अनन्य भक्त हूँ, जैसा कि आप भी मुझे जानते हैं ।
प्रचण्डरश्मे! आपके लिये किसी प्रकार कुछ भी अदेय नहीं है ॥ १ ॥
न मे दारा न मे पुत्रा न चात्मा सुहृदो न च ।
तथेष्टा वै सदा भक्त्या यथा त्वं गोपते मम ॥ २ ॥
स्त्री, पुत्र, सुहृद् और अपना शरीर भी मुझे वैसा प्रिय नहीं है, जैसे आप हैं । किरणोंके स्वामी सूर्यदेव! सदा आप ही मेरे भक्तिभावके आश्रय हैं ॥ २ ॥
इष्टानां च महात्मानो भक्तानां च न संशयः ।
कुर्वन्ति भक्तिमिष्टां च जानीषे त्वं च भास्कर ॥ ३ ॥
प्रभाकर! आप भी जानते ही हैं कि महात्मा पुरुष भी अपने प्रिय भक्तोंपर पूर्ण स्नेह रखते हैं, इसमें संदेह नहीं है ॥ ३ ॥
इष्टो भक्तश्च मे कर्णो न चान्यद् दैवतं दिवि ।
जानीत इति वै कृत्वा भगवानाह मद्धितम् ॥ ४ ॥
आपको यह मालूम है कि कर्ण मेरा प्रिय भक्त है और वह स्वर्गके दूसरे किसी भी देवताको ( अपने इष्टरूपमें नहीं जानता है, यही समझकर आप मुझे मेरे हितका उपदेश कर रहे हैं ॥ ४ ॥
भूयश्च शिरसा याचे प्रसाद्य च पुनः पुनः ।
इति ब्रवीमि तिग्मांशो त्वं तु मे क्षन्तुमर्हसि ॥ ५ ॥
प्रचण्ड किरणोंवाले देव! मैं पुनः आपके चरणोंमें मस्तक रखकर, आपको प्रसन्न करके बारंबार क्षमायाचना करता हूँ । इस समय मैं जो कुछ कहता हूँ, उसके लिये आप मुझे क्षमा करें ॥ ५ ॥
बिभेमि न तथा मृत्योर्यथा बिभ्येऽनृतादहम् ।
विशेषेण द्विजातीनां सर्वेषां सर्वदा सताम् ॥ ६ ॥
प्रदाने जीवितस्यापि न मेऽत्रास्ति विचारणा ।