02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 2051–2060

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2051–2060

पृष्ठ 2051

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वैशम्पायन उवाच ततोऽपश्यत् त्रिदशान् राजपुत्री सर्वानेव स्वेषु धिष्ण्येषु खस्थान् । प्रभावन्तं भानुमन्तं महान्तं यथाऽऽदित्यं रोचमानांस्तथैव ॥ २१ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तब राजकुमारी कुन्तीने आकाशमें अपने - अपने विमानोंपर बैठे हुए सब देवताओंको देखा । जैसे सहस्रों किरणोंसे युक्त भगवान् सूर्य अत्यन्त दीप्तिमान् दिखायी देते हैं, उसी प्रकार वे सब देवता प्रकाशित हो रहे थे ॥ २१ ॥

सा तान् दृष्ट्वा व्रीडमानेव बाला सूर्य देव वचनं प्राह भीता । गच्छ त्वं वै गोपते स्वं विमानं कन्याभावाद् दुःख एवापचारः ॥ २२ ॥

उन्हें देखकर बालिका कुन्तीको बड़ी लज्जा हुई । उस देवीने भयभीत होकर सूर्यदेवसे कहा — ‘ किरणोंके स्वामी दिवाकर! आप अपने विमानपर चले जाइये । छोटी बालिका होनेके कारण मेरेद्वारा आपको बुलानेका यह दुःखदायक अपराध बन गया है ॥ २२ ॥

पिता माता गुरवश्चैव येऽन्ये देहस्यास्य प्रभवन्ति प्रदाने । नाहं धर्मं लोपयिष्यामि लोके स्त्रीणां वृत्तं पूज्यते देहरक्षा ॥ २३ ॥

' मेरे पिता - माता तथा अन्य गुरुजन ही मेरे इस शरीरको देनेका अधिकार रखते हैं । मैं अपने धर्मका लोप नहीं करूंगी । स्त्रियोंके सदाचारमें अपने शरीरकी पवित्रताको बनाये रखना ही प्रधान है और संसारमें उसीकी प्रशंसा की जाती है ॥ २३ ॥

मया मन्त्रबलं ज्ञातुमाहूतस्त्वं विभावसो ।

बाल्याद् बालोति तत् कृत्वा क्षन्तुमर्हसि मे विभो ॥ २४ ॥

' प्रभो! प्रभाकर! मैंने अपने बाल- स्वभावके कारण मन्त्रका बल जाननेके लिये ही आपका आवाहन किया है । एक अनजान बालिका समझकर आप मेरे इस अपराधको क्षमा कर दें ' ॥ २४ ॥

सूर्यउवाच बालेति कृत्वानुनयं तवाहं ददानि नान्यानुनयं लभेत । आत्मप्रदानं कुरु कुन्तिकन्ये शान्तिस्तवैवं हि भवेच्च भीरु ॥ २५ ॥

पृष्ठ 2052

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सूर्यदेवने कहा –कुन्तिभोजकुमारी कुन्ती! बालिका समझकर ही मैं तुमसे इतनी अनुनय- विनय करता हूँ । दूसरी कोई स्त्री मुझसे अनुनयका अवसर नहीं पा सकती । भीरु! तुम मुझे अपना शरीर अर्पण करो । ऐसा करनेसे ही तुम्हें शान्ति प्राप्त हो सकती है ॥ २५ ॥

न चापि गन्तुं युक्तं हि मया मिथ्याकृतेन वै ।

असमेत्य त्वया भीरु मन्त्राहूतेन भाविनि ॥ २६ ॥

गमिष्याम्यनवद्याङ्गि लोके समवहास्यताम् ।

सर्वेषां विबुधानां च वक्तव्यः स्यां तथा शुभे ॥ २७ ॥

निर्दोष अंगोंवाली सुन्दरी! तुमने मन्त्रद्वारा मेरा आवाहन किया है; इस दशामें उस आवाहनको व्यर्थ करके तुमसे मिले बिना ही लौट जाना मेरे लिये उचित न होगा। भीरु! यदि मैं इसी तरह लौटूंगा तो जगत्में मेरा उपहास होगा । शुभे! सम्पूर्ण देवताओंकी दृष्टिमें भी मुझे निन्दनीय बनना पड़ेगा ॥ २६-२७ ॥

सा त्वं मया समागच्छ लप्स्यसे मादृशं सुतम् ।

विशिष्टा सर्वलोकेषु भविष्यसि न संशयः ॥ २८ ॥

अतः तुम मेरे साथ समागम करो । तुम मेरे ही समान पुत्र पाओगी और समस्त संसारमें ( अन्य स्त्रियोंसे ) विशिष्ट समझी जाओगी; इसमें संशय नहीं है ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि सूर्याह्वाने षडधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें सूर्यका आवाहनविषयक तीन सौछठाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ३०६ ॥

* इसी अध्यायके चौदहवें श्लोकमें सूर्यदेवने उस कारणका स्पष्टीकरण किया है ।

पृष्ठ 2053

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सप्ताधिकत्रिशततमोऽध्यायः सूर्यद्वारा कुन्तीके उदरमें गर्भस्थापन वैशम्पायन उवाच

सा तु कन्या बहुविधं ब्रुवन्ती मधुरं वचः ।

अनुनेतुं सहस्रांशुं न शशाक मनस्विनी ॥। १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! इस प्रकार राजकन्या मनस्विनी कुन्ती नाना प्रकारसे मधुर वचन कहकर अनुनय -विनय करनेपर भी भगवान् सूर्यको मनानेमें सफल न हो सकी ॥ १ ॥

न शशाक यदा बाला प्रत्याख्यातुं तमोनुदम् ।

भीता शापात् ततो राजन् दध्यौ दीर्घमथान्तरम् ॥ २ ॥

राजन्! जब वह बाला अन्धकारनाशक भगवान् सूर्यदेवको टाल न सकी, तब शापसे भयभीत हो दीर्घकालतक मन- ही- मन कुछ सोचने लगी ॥ २ ॥

अनागसः पितुः शापो ब्राह्मणस्य तथैव च ।

मन्निमित्तः कथं न स्यात् क्रुद्धादस्माद् विभावसोः ॥ ३ ॥

उसने सोचा कि ' क्या उपाय करूँ? जिससे मेरे कारण मेरे निरपराध पिता तथा निर्दोष ब्राह्मणको क्रोधमें भरे हुए इन सूर्यदेवसे शाप न प्राप्त हो ॥ ३ ॥

बालेनापि सता मोहाद् भृशं पापकृतान्यपि ।

नाभ्यासादयितव्यानि तेजांसि च तपांसि च ॥ ४ ॥

‘ सज्जन बालकको भी चाहिये कि वह अत्यन्त मोहके कारण पापशून्य, तेजस्वी तथा तपस्वी पुरुषोंके अत्यन्त निकट न जाय ॥ ४ ॥

साहमद्य भृशं भीता गृहीता च करे भृशम् ।

कथं त्वकार्यं कुर्यां वै प्रदानं ह्यात्मनः स्वयम् ॥ ५ ॥

‘ परंतु मैं तो आज अत्यन्त भयभीत हो भगवान् सूर्यदेवके हाथमें पड़ गयी हूँ, तो भी स्वयं अपने शरीरको देने जैसा न करनेयोग्य नीच कर्म कैसे करूँ? ' ॥ ५ ॥

वैशम्पायन उवाच

सा वै शापपरित्रस्ता बहु चिन्तयती हृदा ।

मोहेनाभिपरीतङ्गी स्मयमाना पुनः पुनः ॥ ६ ॥

तं देवमब्रवीद् भीता बन्धूनां राजसत्तम ।

व्रीडाविह्वलया वाचा शापत्रस्ता विशाम्पते ॥ ७ ॥

पृष्ठ 2054

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वैशम्पायनजी कहते हैं –नृपश्रेष्ठ! कुन्ती शापसे अत्यन्त डरकर मन-ही- मन तरह-तरहकी बातें सोच रही थी । उसके सारे अंग मोहसे व्याप्त हो रहे थे । वह बार-बार आश्चर्यचकित हो रही थी । एक ओर तो वह शापसे आतंकित थी, दूसरी ओर उसे भाई-बन्धुओंका भय लगा हुआ था । भूपाल! उस दशामें वह लज्जाके कारण विशृंखल वाणीद्वारा सूर्यदेवसे इस प्रकार बोली ॥ कुन्त्युवाच

पिता मे ध्रियते देव माता चान्ये च बान्धवाः ।

न तेषु ध्रियमाणेषु विधिलोपो भवेदयम् ॥ ८ ॥

कुन्तीने कहा- देव! मेरे पिता, माता तथा अन्य बान्धव जीवित हैं । उन सबके जीते-जी स्वयं आत्मदान करनेपर कहीं शास्त्रीय विधिका लोप न हो जाय? ॥ ८ ॥

त्वया तु संगमो देव यदि स्याद् विधिवर्जितः ।

मन्निमित्तं कुलस्यास्य लोके कीर्तिर्नशेत् ततः ॥ ९ ॥

भगवन्! यदि आपके साथ मेरा वेदोक्त विधिके विपरीत समागम हो तो मेरे ही कारण जगत्में इस कुलकी कीर्ति नष्ट हो जायगी ॥ ९ ॥

अथवा धर्ममेतं त्वं मन्यसे तपतां वर ।

ऋते प्रदानाद् बन्धुभ्यस्तव कामं करोम्यहम् ॥ १० ॥

अथवा तपनेवालोंमें श्रेष्ठ दिवाकर! यदि बन्धुजनोंके दिये बिना ही मेरे साथ अपने समागमको आप धर्मयुक्त समझते हों तो मैं आपकी इच्छा पूर्ण कर सकती हूँ ॥ १० ॥

आत्मप्रदानं दुधर्ष तव कृत्वा सती त्वहम् ।

त्वयि धर्मो यशश्चैव कीर्तिरायुश्च देहिनाम् ॥ ११ ॥

दुर्धर्ष देव! क्या मैं आपको आत्मदान करके भी सती- साध्वी रह सकती हूँ? आपमें ही देहधारियोंके धर्म, यश, कीर्ति तथा आयु प्रतिष्ठित हैं ॥ ११ ॥

सूर्यउवाच

न ते पिता न ते माता गुरवो वा शुचिस्मिते ।

प्रभवन्ति वरारोहे भद्रं ते शृणु मे वचः ॥ १२ ॥

भगवान् सूर्यने कहा— शुचिस्मिते! वरारोहे! तुम्हारा कल्याण हो । तुम मेरी बात सुनो । तुम्हारे पिता, माता अथवा अन्य गुरुजन तुम्हें ( इस कामसे रोकनेमें) समर्थ नहीं हैं ॥ १२ ॥

सर्वान् कामयते यस्मात् कमेर्धातोश्च भाविनि ।

तस्मात् कन्येह सुश्रोणि स्वतन्त्रा वरवर्णिनि ॥ १३ ॥

सुन्दर भाववाली कुन्ती! ' कम्' धातुसे कन्या शब्दकी सिद्धि होती है । सुन्दरी! वह ( स्वयंवरमें आये हुए ) सब वरोंमेंसे किसीको भी स्वतन्त्रतापूर्वक अपनी कामनाका विषय बना सकती है; इसीलिये इस जगत् में उसे कन्या कहा गया है ॥ १३ ॥

पृष्ठ 2055

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नाधर्मश्चरितः कश्चित् त्वया भवति भाविनि ।

अधर्मं कुत एवाहं वरेयं लोककाम्यया ॥ १४ ॥

कुन्ती! मेरे साथ समागम करनेसे तुम्हारे द्वारा कोई अधर्म नहीं बन रहा है । भला! मैं लौकिक कामवासनाके वशीभूत होकर अधर्मका वरण कैसे कर सकता हूँ? ॥ १४ ॥

अनावृताः स्त्रियः सर्वा नराश्च वरवर्णिनि ।

स्वभाव एष लोकानां विकारोऽन्य इति स्मृतः ॥ १५ ॥

वरवर्णिनि! मेरे लिये सभी स्त्रियाँ और पुरुष आवरणरहित हैं; क्योंकि मैं सबका साक्षी हूँ । जो अन्य सब विकार हैं, यह तो प्राकृत मनुष्योंका स्वभाव माना गया है ॥ १५ ॥

सा मया सह संगम्य पुनः कन्या भविष्यसि ।

पुत्रश्च ते महाबाहुर्भविष्यति महायशाः ॥ १६ ॥

तुम मेरे साथ समागम करके पुनः कन्या ही बनी रहोगी और तुम्हें महाबाहु एवं महायशस्वी पुत्र प्राप्त होगा ॥ १६ ॥

कुन्त्युवाच

यदि पुत्रो मम भवेत् त्वत्तः सर्वतमोनुद ।

कुण्डली कवची शूरो महाबाहुर्महाबलः ॥ १७ ॥

कुन्ती बोली - समस्त अन्धकारको दूर करनेवाले सूर्यदेव! यदि आपसे मुझे पुत्र प्राप्त हो तो वह महाबाहु, महाबली तथा कुण्डल और कवचसे विभूषित शूरवीर हो ॥ १७ ॥

सूर्यउवाच

भविष्यति महाबाहुः कुण्डली दिव्यवर्मभृत् ।

उभयं चामृतमयं तस्य भद्रे भविष्यति ॥ १८ ॥

सूर्यने कहा – भद्रे! तुम्हारा पुत्र महाबाहु, कुण्डल- धारी तथा दिव्य कवच धारण करनेवाला होगा । उसके कुण्डल और कवच दोनों अमृतमय होंगे ॥ १८ ॥

कुन्त्युवाच

यद्येतदमृतादस्ति कुण्डले वर्म चोत्तमम् ।

मम पुत्रस्य यं वै त्वं मत्त उत्पादयिष्यसि ॥ १ ९ ॥

अस्तु मे सङ्गमो देव यथोक्तं भगवंस्त्वया ।

त्वद्वीर्यरूपसत्त्वौजा धर्मयुक्तो भवेत् स च ॥ २० ॥

कुन्ती बोली- प्रभो! आप मेरे गर्भसे जिसको जन्म देंगे, उस मेरे पुत्रके कुण्डल और कवच यदि अमृतसे उत्पन्न हुए होंगे; तो भगवन्! आपने जैसा कहा है, उसी रूपमें मेरा आपके साथ समागम हो । आपका वह पुत्र आपके ही समान वीर्य, रूप, धैर्य, ओज तथा धर्मसे युक्त होना चाहिये ॥ १ ९-२० ॥

पृष्ठ 2056

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सूर्यउवाच

अदित्या कुण्डले राज्ञि दत्ते मे मत्तकाशिनि ।

तेऽस्य दास्यामि वै भीरु वर्म चैवेदमुत्तमम् ॥ २१ ॥

सूर्यदेवने कहा - यौवनके मदसे सुशोभित होनेवाली भीरु राजकुमारी! माता अदितिने मुझे जो कुण्डल दिये हैं, उन्हें मैं तुम्हारे इस पुत्रको दे दूँगा । साथ ही यह उत्तम कवच भी उसे अर्पित करूँगा ॥ २१ ॥

कुन्त्युवाच

परमं भगवन्नेवं संगमिष्ये त्वया सह ।

यदि पुत्रो भवेदेवं यथा वदसि गोपते ॥ २२ ॥

कुन्ती बोली - भगवन्! गोपते! जैसा आप कहते हैं, वैसा ही पुत्र यदि मुझे प्राप्त हो तो मैं आपके साथ उत्तम रीति से समागम करूँगी ॥ २२ ॥

वैशम्पायन उवाच

तथेत्युक्त्वा तु तां कुन्तीमाविवेश विहङ्गमः ।

स्वर्भानुशत्रुर्योगात्मा नाभ्यां पस्पर्श चैव ताम् ॥ २३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं – जनमेजय! तब ' बहुत अच्छा' कहकर आकाशचारी राहुशत्रु भगवान् सूर्यने योगरूपसे कुन्तीके शरीरमें प्रवेश किया और उसकी नाभिको छू दिया ॥ २३ ॥

ततः सा विह्वलेवासीत् कन्या सूर्यस्य तेजसा ।

पपात चाथ सा देवी शयने मूढचेतना ॥ २४ ॥

तब वह राजकन्या सूर्यके तेजसे विह्वल और अचेत- सी होकर शय्यापर गिर पड़ी ॥ २४ ॥

सूर्यउवाच

साधयिष्यामि सुश्रोणि पुत्रं वै जनयिष्यसि ।

सर्वशस्त्रभृतां श्रेष्ठं कन्या चैव भविष्यसि ॥ २५ ॥

सूर्यने कहा – सुन्दरी! मैं ऐसी चेष्टा करूँगा, जिससे तुम समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ पुत्रको जन्म दोगी और कन्या ही बनी रहोगी ॥ २५ ॥

ततः सा व्रीडिता बाला तदा सूर्यमथाब्रवीत् ।

एवमस्त्विति राजेन्द्र प्रस्थितं भूरिवर्चसम् ॥ २६ ॥

राजेन्द्र! तब संगमके लिये उद्यत हुए महातेजस्वी सूर्यदेवकी ओर देखकर लज्जित हुई उस राजकन्याने उनसे कहा - ' प्रभो! ऐसा ही हो ' ॥ २६ ॥

वैशम्पायन उवाच

पृष्ठ 2057

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इति स्मोक्ता कुन्तिराजात्मजा सा विवस्वन्तं याचमाना सलज्जा । तस्मिन् पुण्ये शयनीये पपात मोहाविष्टा भज्यमाना लतेव ॥ २७ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -ऐसा कहकर कुन्तिनरेशकी कन्या पृथा भगवान् सूर्यसे पुत्रके लिये प्रार्थना करती हुई अत्यन्त लज्जा और मोहके वशीभूत होकर कटी हुई लताकी भाँति उस पवित्र शय्यापर गिर पड़ी ॥ २७ ॥

तिग्मांशुस्तां तेजसा मोहयित्वा योगेनाविश्यात्मसंस्थां चकार । न चैवैनां दूषयामास भानुः संज्ञां लेभे भूय एवाथ बाला ॥ २८ ॥

तत्पश्चात् सूर्यदेवने उसे अपने तेजसे मोहित कर दिया और योगशक्तिके द्वारा उसके भीतर प्रवेश करके अपना तेजोमय वीर्य स्थापित कर दिया । उन्होंने कुन्तीको दूषित नहीं किया — उसका कन्याभाव अछूता ही रहा । तदनन्तर वह राजकन्या फिर सचेत हो गयी ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि सूर्यकुन्तीसमागमे सप्ताधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०७ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें सूर्यकुन्ती- समागमविषयक तीन सौ सातवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ३०७ ॥

पृष्ठ 2058

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अष्टाधिकत्रिशततमोऽध्यायः कर्णका जन्म, कुन्तीका उसे पिटारीमें रखकर जलमें बहा देना और विलाप करना वैशम्पायन उवाच

ततो गर्भः समभवत् पृथायाः पृथिवीपते ।

शुक्ले दशोत्तरे पक्षे तारापतिरिवाम्बरे ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! इस प्रकार आकाशमें जैसे चन्द्रमाका उदय होता है, उसी प्रकार ग्यारहवें मासके * शुक्लपक्षकी प्रतिपदाको कुन्तीके उदरमें भगवान् सूर्यके द्वारा गर्भ स्थापित हुआ ॥ १ ॥

सा बान्धवभयाद् बाला गर्भं तं विनिगूहती ।

धारयामास सुश्रोणी न चैनां बुबुधे जनः ॥ २ ॥

सुन्दर कटिप्रदेशवाली कुन्ती भाई- बन्धुओंके भयसे उस गर्भको छिपाती हुई धारण करने लगी । अतः कोई भी मनुष्य नहीं जान सका कि यह गर्भवती है ॥ २ ॥

न हि तां वेद नार्यन्या काचिद् धात्रेयिकामृते ।

कन्यापुरगतां बालां निपुणां परिरक्षणे ॥ ३ ॥

एक धायके सिवा दूसरी कोई स्त्री भी इसका पता न पा सकी । कुन्ती सदा कन्याओंके अन्तःपुरमें रहती थी एवं अपने रहस्यको छिपानेमें वह अत्यन्त निपुण थी ॥ ३ ॥

ततः कालेन सा गर्भं सुषुवे वरवर्णिनी ।

कन्यैव तस्य देवस्य प्रसादादमरप्रभम् ॥ ४ ॥

तदनन्तर सुन्दरी पृथाने यथासमय भगवान् सूर्यके कृपाप्रसादसे स्वयं कन्या ही बनी रहकर देवताओंके समान तेजस्वी एक पुत्रको जन्म दिया ॥ ४ ॥

तथैवाबद्धकवचं कनकोज्ज्वलकुण्डलम् ।

हर्यक्षं वृषभस्कन्धं यथास्य पितरं तथा ॥ ५ ॥

उसने अपने पिताके ही समान शरीरपर कवच बाँध रखा था और उसके कानोंमें सोनेके बने हुए दो दिव्य कुण्डल जगमगा रहे थे । उस बालककी आँखें सिंहके समान और कंधे वृषभ- जैसे थे ॥ ५ ॥

जातमात्रं च तं गर्भं धात्र्या सम्मन्त्र्य भाविनी ।

मञ्जूषायां समाधाय स्वास्तीर्णायां समन्ततः ॥ ६ ॥

मधूच्छिष्टस्थितायां सा सुखायां रुदती तथा ।

श्लक्ष्णायां सुपिधानायामश्वनद्यामवासृजत् ॥ ७ ॥

पृष्ठ 2059

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उस बालकके पैदा होते ही भामिनी कुन्तीने धायसे सलाह लेकर एक पिटारी मँगवायी और उसमें सब ओर सुन्दर मुलायम बिछौने बिछा दिये । इसके बाद उस पिटारीमें चारों ओर मोम चुपड़ दिया, जिससे उसके भीतर जल न प्रवेश कर सके । जब वह सब तरहसे चिकनी और सुखद हो गयी, तब उसके भीतर उस बालकको सुला दिया और उसका सुन्दर ढक्कन बंद कर दिया तथा रोते - रोते उस पिटारीको अश्वनदीमें छोड़ दिया* ॥ ६-७ ॥

जानती चाप्यकर्तव्यं कन्याया गर्भधारणम् ।

पुत्रस्नेहेन सा राजन् करुणं पर्यदेवयत् ॥ ८ ॥

राजन्! यद्यपि वह यह जानती थी कि किसी कन्याके लिये गर्भधारण करना सर्वथा निषिद्ध और अनुचित है, तथापि पुत्रस्नेह उमड़ आनेसे कुन्ती वहाँ करुणाजनक विलाप करने लगी ॥ ८ ॥

समुत्सृजन्ती मञ्जूषामश्वनद्यां तदा जले ।

उवाच रुदती कुन्ती यानि वाक्यानि तच्छृणु ॥ ९ ॥

उस समय अश्वनदीके जलमें उस पिटारीको छोड़ते समय रोती हुई कुन्तीने जो बातें कहीं, उन्हें बताता हूँ; सुनो ॥ ९ ॥

स्वस्ति ते चान्तरिक्षेभ्यः पार्थिवेभ्यश्च पुत्रक ।

दिव्येभ्यश्चैव भूतेभ्यस्तथा तोयचराश्च ये ॥ १० ॥

वह बोली- ' मेरे बच्चे! जलचर, थलचर, आकाशचारी तथा दिव्य प्राणी तेरा मंगल करें ॥ १० ॥

शिवास्ते सन्तु पन्थानो मा च ते परिपन्थिनः ।

आगताश्च तथा पुत्र भवन्त्वद्रोहचेतसः ॥ ११ ॥

‘ तेरा मार्ग मंगलमय हो । बेटा! तेरे पास शत्रु न आयें । जो आ जायँ, उनके मनमें तेरे प्रति द्रोहकी भावना न रहे ॥ ११ ॥

पातु त्वां वरुणो राजा सलिले सलिलेश्वरः ।

अन्तरिक्षेऽन्तरिक्षस्थः पवनः सर्वगस्तथा ॥ १२ ॥

‘ जलमें उसके स्वामी राजा वरुण तेरी रक्षा करें। अन्तरिक्षमें वहाँ रहनेवाले सर्वगामी वायुदेव तेरी रक्षा करें ॥ १२ ॥

पिता त्वां पातु सर्वत्र तपनस्तपतां वरः ।

येन दत्तोऽसि मे पुत्र दिव्येन विधिना किल ॥ १३ ॥

' पुत्र! जिन्होंने दिव्य रीतिसे तुझे मेरे गर्भमें स्थापित किया है वे तपनेवालोंमें श्रेष्ठ तेरे पिता भगवान् सूर्य सर्वत्र तेरा पालन करें ॥ १३ ॥

आदित्या वसवो रुद्राः साध्या विश्वे च देवताः ।

मरुतश्च सहेन्द्रेण दिशश्च सदिगीश्वराः ॥ १४ ॥

रक्षन्तु त्वां सुराः सर्वे समेषु विषमेषु च ।

पृष्ठ 2060

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वेत्स्यामि त्वां विदेशेऽपि कवचेनाभिसूचितम् ॥ १५ ॥

‘ आदित्य, वसु, रुद्र, साध्य, विश्वेदेव, इन्द्रसहित मरुद्गण, दिक्पालोंसहित दिशाएँ तथा समस्त देवता सभी सम - विषम स्थानोंमें तेरी रक्षा करें । यदि विदेशमें भी तू जीवित रहेगा तो मैं इन कवच - कुण्डल आदि चिह्नोंसे उपलक्षित होनेपर तुझे पहचान लूँगी ॥ १४-१५ ॥

धन्यस्ते पुत्र जनको देवो भानुर्विभावसुः ।

यस्त्वां द्रक्ष्यति दिव्येन चक्षुषा वाहिनीगतम् ॥ १६ ॥

‘ बेटा! तेरे पिता भगवान् भुवनभास्कर धन्य हैं, जो अपनी दिव्य दृष्टिसे नदीकी धारामें स्थित हुए तुझको देखेंगे ॥ १६ ॥

धन्या सा प्रमदा या त्वां पुत्रत्वे कल्पयिष्यति ।

यस्यास्त्वं तृषितः पुत्र स्तनं पास्यसि देवज ॥ १७ ॥

'देवपुत्र! वह रमणी धन्य है जो तुझे अपना पुत्र बनाकर पालेगी और तू भूख- प्यास लगनेपर जिसके स्तनोंका दूध पियेगा ॥ १७ ॥

को नु स्वप्नस्तया दृष्टो या त्वामादित्यवर्चसम् ।

दिव्यवर्मसमायुक्तं दिव्यकुण्डलभूषितम् ॥ १८ ॥

पद्मायतविशालाक्षं पद्मताम्रदलोज्ज्वलम् ।

सुललाटं सुकेशान्तं पुत्रत्वे कल्पयिष्यति ॥ १ ९ ॥

‘ उस भाग्यशालिनी नारीने कौन- सा ऐसा शुभ स्वप्न देखा होगा, जो सूर्यके समान तेजस्वी, दिव्य कवचसे संयुक्त, दिव्य कुण्डलभूषित, कमलदलके समान विशाल नेत्रवाले, लाल कमलदलके सदृश गौर कान्तिवाले, सुन्दर ललाट और मनोहर केशसमूहसे विभूषित तुझ- जैसे दिव्य बालकको अपना पुत्र बनायेगी' ॥ १८-१९ ॥

धन्या द्रक्ष्यन्ति पुत्र त्वां भूमौ संसर्पमाणकम् ।

अव्यक्तकलवाक्यानि वदन्तं रेणुगुण्ठितम् ॥ २० ॥

‘ वत्स! जब तू धरतीपर पेटके बल सरकता फिरेगा और समझमें न आनेवाली मधुर तोतली बोली बोलेगा, उस समय तेरे धूलिधूसरित अंगोंको जो लोग देखेंगे, वे धन्य हैं ॥ २० ॥

धन्या द्रक्ष्यन्ति पुत्र त्वां पुनर्यौवनगोचरम् ।

हिमवद्वनसम्भूतं सिंहं केसरिणं यथा ॥ २१ ॥

‘ पुत्र! हिमालयके जंगलमें उत्पन्न हुए केसरी सिंहके समान तुझे जवानीमें जो लोग देखेंगे, वे धन्य हैं ॥ २१ ॥

एवं बहुविधं राजन् विलप्य करुणं पृथा ।

अवासृजत मञ्जूषामश्वनद्यास्तदा जले ॥ २२ ॥

-विलाप करती हुई! - -1 राजन् इस तरह बहुत सी बातें कहकर करुण कुन्तीने उस समयअश्वनदीके जलमें वह पिटारी छोड़ दी ॥ २२ ॥