श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 2061–2070

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2061–2070

पृष्ठ 2061

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रुदती पुत्रशोकार्ता निशीथे कमलेक्षणा ।

धात्र्या सह पृथा राजन् पुत्रदर्शनलालसा ॥ २३ ॥

जनमेजय! आधी रातके समय कमलनयनी कुन्ती पुत्रशोकसे आतुर हो उसके दर्शनकी लालसासे धात्रीके साथ नदीके तटपर देरतक रोती रही ॥ २३ ॥

विसर्जयित्वा मञ्जूषां सम्बोधनभयात् पितुः ।

विवेश राजभवनं पुनः शोकातुरा ततः ॥ २४ ॥

पेटीको पानीमें बहाकर, कहीं पिताजी जग न जायँ, इस भयसे वह शोकसेआतुर हो पुनः राजभवनमें चली गयी ॥ २४ ॥

मञ्जूषा त्वश्वनद्याः सा ययौ चर्मण्वतीं नदीम् ।

चर्मण्वत्याश्च यमुनां ततो गङ्गां जगाम ह ॥ २५ ॥

वह पिटारी अश्वनदीसे चर्मण्वती ( चम्बल ) नदीमें गयी । चर्मण्वतीसे यमुनामें और वहाँसे गंगामें जा पहुँची ॥ २५ ॥

गङ्गायाः सूतविषयं चम्पामनुययौ पुरीम् ।

स मञ्जूषागतो गर्भस्तरङ्गैरुह्यमानकः ॥ २६ ॥

पिटारीमें सोया हुआ वह बालक गंगाकी लहरोंसे बहाया जाता हुआ चम्पापुरीके पास सूतराज्यमें जा पहुँचा ॥

अमृतादुत्थितं दिव्यं तनुवर्म सकुण्डलम् ।

धारयामास तं गर्भं दैवं च विधिनिर्मितम् ॥ २७ ॥

उसके शरीरका दिव्य कवच और कानोंके कुण्डल -ये अमृतसे प्रकट हुए थे । वे ही विधाताद्वारा रचित उस देवकुमारको जीवित रख रहे थे ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि कर्णपरित्यागे अष्टाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें कर्णपरित्यागविषयक तीन सौ आठवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ३०८ ॥

* यहाँ मूल पाठमें मासका निर्देश करनेके लिये ' दशोत्तरे ' यह पद आया है, जिसका अर्थ है ग्यारहवें महीनेमें । यह ग्यारहवाँ महीना कौन - सा है? इस विषयमें दो प्रकारके मत उपलब्ध होते हैं । एक मतके अनुसार यहाँ ‘ माघ’ मास ग्रहण किया जाना चाहिये; कारण कि वर्षका आरम्भ चैत्रसे होता है, अतः इस क्रमसे गणना करनेपर ' माघ' ही ग्यारहवाँ मास निश्चित होता है । दूसरे मतवालोंका कहना यह है कि पहले मार्गशीर्ष माससे वर्षकी गणना होती थी । इसीलिये वह ‘ अग्रहायण' ( वर्षका प्रथम मास) कहा जाता है । ' मासानां मार्गशीर्षोऽहम्' इस वचनसे भी यही सूचित होता है । इस क्रमसे गणना करनेपर ' आश्विन मास ' ग्यारहवाँ सिद्ध होता है । *• इस प्रकार पिटारीमें बंद करके बहा देनेपर भी वह बालक इसलिये नहीं मरा कि वह अमृतसे उत्पन्न कवच और कुण्ड धारण किये हुए था । देखिये इसी अध्यायका सत्ताईसवाँ श्लोक ।

पृष्ठ 2062

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नवाधिकत्रिशततमोऽध्यायः अधिरथ सूत तथा उसकी पत्नी राधाको बालक कर्णकी प्राप्ति, राधाके द्वारा उसका पालन, हस्तिनापुरमें उसकी शिक्षा- दीक्षा तथा कर्णके पास इन्द्रका आगमन वैशम्पायन उवाच

एतस्मिन्नेव काले तु धृतराष्ट्रस्य वै सखा ।

सूतोऽधिरथ इत्येव सदारो जाह्नवीं ययौ ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! इसी समय राजा धृतराष्ट्रका मित्र अधिरथ सूत अपनी स्त्रीके साथ गंगाजीके तटपर आया ॥ १ ॥

तस्य भार्याभवद् राजन् रूपेणासदृशी भुवि ।

राधा नाम महाभागा न सा पुत्रमविन्दत ॥ २ ॥

राजन्! उसकी परम सौभाग्यवती पत्नी इस भूतलपर अनुपम सुन्दरी थी । उसका नाम था राधा । उसके कोई पुत्र नहीं हुआ था ॥ २ ॥

अपत्यार्थे परं यत्नमकरोच्च विशेषतः ।

सा ददर्शाथ मञ्जूषामुह्यमानां यदृच्छया ॥ ३ ॥

राधा पुत्रप्राप्तिके लिये विशेष यत्न करती रहती थी । दैवयोगसे उसीने गंगाजीके जलमें बहती हुई उस पिटारीको देखा ॥ ३ ॥

दत्तरक्षाप्रतिसरामन्वालम्भनशोभनाम् ।

ऊर्मीतरङ्गैर्जाह्नव्याः समानीतामुपह्वरम् ॥ ४ ॥

पिटारीके ऊपर उसकी रक्षाके लिये लता लपेट दी गयी थी और सिन्दूरका लेप लगा होनेसे उसकी बड़ी शोभा हो रही थी । गंगाकी तरंगोंके थपेड़े खाकर वह पिटारी तटके समीप आ लगी ॥ ४ ॥

सातु कौतूहलात् प्राप्तां ग्राहयामास भाविनी ।

ततो निवेदयामास सूतस्याधिरथस्य वै ॥ ५ ॥

भामिनी राधाने कौतूहलवश उस पिटारीको सेवकोंसे पकड़वा मँगाया और अधिरथ सूतको इसकी सूचना दी ॥

स तामुद्धृत्य मञ्जूषामुत्सार्य जलमन्तिकात् ।

यन्त्रैरुद्घाटयामास सोऽपश्यत् तत्र बालकम् ॥ ६ ॥

अधिरथने उस पिटारीको पानीसे बाहर निकालकर जब यन्त्रों ( औजारों) द्वारा उसे खोला, तब उसके भीतर एक बालकको देखा ॥ ६ ॥

पृष्ठ 2063

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तरुणादित्यसंकाशं हेमवर्मधरं तथा ।

मृष्टकुण्डलयुक्तेन वदनेन विराजता ॥ ७ ॥

वह बालक प्रातःकालीन सूर्यके समान तेजस्वी था । उसने अपने अंगोंमें स्वर्णमय कवच धारण कर रखा था। उसका मुख कानोंमें पड़े हुए दो उज्ज्वल कुण्डलोंसे प्रकाशित हो रहा था ॥ ७ ॥

स सूतो भार्यया सार्धं विम्मयोत्फुल्ललोचनः ।

अङ्कमारोप्य तं बालं भार्यां वचनमब्रवीत् ॥ ८ ॥

उसे देखकर पत्नीसहित सूतके नेत्रकमल आश्चर्य एवं प्रसन्नतासे खिल उठे । उसने बालकको गोदमें लेकर अपनी पत्नीसे कहा— ॥ ८ ॥

इदमत्यद्भुतं भीरु यतो जातोऽस्मि भाविनि ।

दृष्टवान् देवगर्भोऽयं मन्येऽस्माकमुपागतः ॥ ९ ॥

‘ भीरु! भाविनि! जबसे मैं पैदा हुआ हूँ, तबसे आज ही मैंने ऐसा अद्भुत बालक देखा है । मैं समझता हूँ, यह कोई देवबालक ही हमें भाग्यवश प्राप्त हुआ है ॥ ९ ॥

अनपत्यस्य पुत्रोऽयं देवैर्दत्तो ध्रुवं मम ।

इत्युक्त्वा तं ददौ पुत्रं राधायै स महीपते ॥ १० ॥

'मुझ पुत्रहीनको अवश्य ही देवताओंने दया करके यह पुत्र प्रदान किया है । ' राजन्! ऐसा कहकर अधिरथने वह पुत्र राधाको दे दिया ॥ १० ॥

प्रतिजग्राह तं राधा विधिवद् दिव्यरूपिणम् ।

पुत्रं कमलगर्भाभं देवगर्भं श्रिया वृतम् ॥ ११ ॥

( स्तन्यं समास्रवच्चास्या दैवादित्यथ निश्चयः । ) राधाने भी कमलके भीतरी भागके समान कान्तिमान्, शोभाशाली तथा दिव्यरूपधारी उस देवबालकको विधि- पूर्वक ग्रहण किया । निश्चय ही दैवकी प्रेरणासे राधाके स्तनोंसे दूघ भी झरने लगा ॥ ११ ॥

पुपोष चैनं विधिवद् ववृधे स च वीर्यवान् ।

ततः प्रभृति चाप्यन्ये प्राभवन्नौरसाः सुताः ॥ १२ ॥

उसने विधिपूर्वक उस बालकका पालन-पोषण किया और वह धीरे- धीरे सबल होकर दिनोदिन बढ़ने लगा । तभीसे उस सूत-दम्पतिके और भी अनेक औरस पुत्र उत्पन्न हुए ॥ १२ ॥

वसुवर्मधरं दृष्ट्वा तं बालं हेमकुण्डलम् ।

नामास्य वसुषेणेति ततश्चक्रुर्द्विजातयः ॥ १३ ॥

तदनन्तर वसु ( सुवर्ण) मय कवच धारण किये तथा सोनेके ही कुण्डल पहने हुए उस बालकको देखकर ब्राह्मणोंने उसका नाम ' वसुषेण ' रखा ॥ १३ ॥

एवं स सूतपुत्रत्वं जगामामितविक्रमः ।

पृष्ठ 2064

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वसुषेण इति ख्यातो वृष इत्येव च प्रभुः ॥ १४ ॥

इस प्रकार वह अमितपराक्रमी एवं सामर्थ्यशाली बालक सूतपुत्र बन गया । लोकमें ' वसुषेण ' और ' वृष ' इन दो नामोंसे उसकी प्रसिद्धि हुई ॥ १४ ॥

सूतस्य ववृधेऽङ्गेषु श्रेष्ठः पुत्रः स वीर्यवान् ।

चारेण विदितश्चासीत् पृथया दिव्यवर्मभृत् ॥ १५ ॥

अधिरथ सूतका वह पराक्रमी श्रेष्ठ पुत्र अंगदेशमें पालित होकर दिनोदिन बढ़ने लगा । कुन्तीने गुप्तचर भेजकर मालूम कर लिया था कि मेरा दिव्य कवचधारी पुत्र अधिरथके यहाँ पल रहा है ॥ १५ ॥

सूतस्त्वधिरथः पुत्रं विवृद्धं समयेन तम् ।

दृष्ट्वा प्रस्थापयामास पुरं वारणसाह्वयम् ॥ १६ ॥

अधिरथ सूतने अपने पुत्रको बड़ा हुआ देख उसे यथासमय हस्तिनापुर भेज दिया ॥ १६ ॥

तत्रोपसदनं चक्रे द्रोणस्येष्वस्त्रकर्मणि ।

सख्यं दुर्योधनेनैवमगमत् स च वीर्यवान् ॥ १७ ॥

वहाँ उसने धनुर्वेदकी शिक्षा लेनेके लिये आचार्य द्रोणकी शिष्यता स्वीकार की । इस प्रकार पराक्रमी कर्णकी दुर्योधनके साथ मित्रता हो गयी ॥ १७ ॥

द्रोणात् कृपाच्च रामाच्च सोऽस्त्रग्रामं चतुर्विधम् ।

लब्धवा लोकेऽभवत् ख्यातः परमेष्वासतां गतः ॥ १८ ॥

वह द्रोणाचार्य, कृपाचार्य तथा परशुरामसे चारों प्रकारकी अस्त्रविद्या सीखकर संसारमें एक महान् धनुर्धरके रूपमें विख्यात हुआ ॥ १८ ॥

संधाय धार्तराष्ट्रेण पार्थानां विप्रिये रतः ।

योद्धुमाशंसते नित्यं फाल्गुनेन महात्मना ॥ १ ९ ॥

धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनसे मिलकर वह कुन्ती-कुमारोंका अनिष्ट करनेमें लगा रहता और सदा महामना अर्जुनसे युद्ध करनेकी इच्छा व्यक्त किया करता था ॥ १ ९ ॥

सदा हि तस्य स्पर्धा ss सीदर्जुनेन विशाम्पते ।

अर्जुनस्य च कर्णेन यतो दृष्टो बभूव सः ॥ २० ॥

राजन्! अर्जुन और कर्णने जबसे एक- दूसरेको देखा था, तभीसे कर्ण अर्जुनके साथ स्पर्धा रखता था और अर्जुन भी कर्णके साथ बड़ी स्पर्धा रखते थे ॥ २० ॥

एतद् गुह्यं महाराज सूर्यस्यासीन्न संशयः यः सूर्यसम्भवः कर्णः कुन्त्यां सूतकुले तथा ॥ २१ ॥

महाराज! निःसंदेह सूर्यका यही वह गुप्त रहस्य है कि कुन्तीके गर्भसे सूर्यद्वारा उत्पन्न कर्ण सूतकुलमें पला था ॥ २१ ॥

तं तु कुण्डलिनं दृष्ट्वा वर्मणा च समन्वितम् ।

पृष्ठ 2065

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अवध्यं समरे मत्वा पर्यतप्यद् युधिष्ठिरः ॥ २२ ॥

उसे दिव्य कुण्डल और कवचसे संयुक्त देख युद्धमें अवध्य जानकर राजा युधिष्ठिर सदा संतप्त होते रहते थे ॥ २२ ॥

यदा च कर्णो राजेन्द्र भानुमन्तं दिवाकरम् ।

स्तौति मध्यन्दिने प्राप्ते प्राञ्जलिः सलिले स्थितः ॥ २३ ॥

तत्रैनमुपतिष्ठन्ति ब्राह्मणा धनहेतुना ।

नादेयं तस्य तत्काले किञ्चिदस्ति द्विजातिषु ॥ २४ ॥

राजेन्द्र! जब कर्ण दोपहरके समय जलमें खड़ा हो हाथ जोड़कर अंशुमाली भगवान्

दिवाकरकी स्तुति करता था, उस समय बहुत से ब्राह्मण धनके लिये उसके पास आते थे ।

उस अवसरपर उसके पास कोई ऐसी वस्तु नहीं थी, जो ब्राह्मणोंके लिये अदेय हो ॥

तमिन्द्रो ब्राह्मणो भूत्वा भिक्षां देहीत्युपस्थितः ।

स्वागतं चेति राधेयस्तमथ प्रत्यभाषत ॥ २५ ॥

इन्द्र भी उसी समय ब्राह्मण बनकर वहाँ उपस्थित हुए और बोले- ' मुझे भिक्षा दो । ' यह सुनकर राधानन्दन कर्णने उत्तर दिया- 'विप्रवर! आपका स्वागत है ' ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि राधाकर्णप्राप्तौ नवाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३० ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें राधाको कर्णकी प्राप्तिविषयक तीन सौ नवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ३०९ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल २५३ श्लोक हैं )

पृष्ठ 2066

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दशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः इन्द्रका कर्णको अमोघ शक्ति देकर बदलेमें उसके कवच- कुण्डल लेना वैशम्पायन उवाच

देवराजमनुप्राप्तं ब्राह्मणच्छद्मना वृतम् ।

दृष्ट्वा स्वागतमित्याह न बुबोधास्य मानसम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! देवराजको ब्राह्मणके छद्मवेषमें छिपकर आये देख कर्णने कहा — ‘ ब्रह्मन्! आपका स्वागत है। ' परंतु कर्णको उस समय इन्द्रके मनोभावका कुछ भी पता न चला ॥ १ ॥

हिरण्यकण्ठीः प्रमदा ग्रामान् वा बहुगोकुलान् ।

किं ददानीति तं विप्रमुवाचाधिरथिस्ततः । २ ॥

तब अधिरथकुमारने उन ब्राह्मणरूपधारी इन्द्रसे कहा - ' विप्रवर! मैं आपको क्या दूँ? सोनेके कण्ठोंसे विभूषित युवती स्त्रियाँ अथवा बहुसंख्यक गोधनोंसे भरे हुए अनेक ग्राम? ' ॥ २ ॥

ब्राह्मणउवाच

हिरण्यकण्ठ्यः प्रमदा यच्चान्यत् प्रीतिवर्धनम् ।

नाहं दत्तमिहेच्छामि तदर्थिभ्यः प्रदीयताम् ॥ ३ ॥

ब्राह्मण बोले- वीरवर! तुम्हारी दी हुई सोनेके कंठोंसे विभूषित युवती स्त्रियाँ तथा दूसरी आनन्दवर्धक वस्तुएँ मैं नहीं लेना चाहता । इन वस्तुओंको उन याचकोंको दे दो, जो इनकी अभिलाषा लेकर आये हों ॥ ३ ॥

यदेतत् सहजं वर्म कुण्डले च तवानघ ।

एतदुत्कृत्य मे देहि यदि सत्यव्रतो भवान् ॥ ४ ॥

अनघ! यदि तुम सत्यव्रती हो, तो ये जो तुम्हारे शरीरके साथ ही उत्पन्न हुए कवच और कुण्डल हैं, इन्हें काटकर मुझे दे दो ॥ ४ ॥

एतदिच्छाम्यहं क्षिप्रं त्वया दत्तं परंतप ।

एष मे सर्वलाभानां लाभः परमको मतः ॥ ५ ॥

परंतप! तुम्हारा दिया हुआ यही दान मैं शीघ्रतापूर्वक लेना चाहता हूँ । यही मेरे लिये सम्पूर्ण लाभोंमें सबसे बढ़कर लाभ है ॥ ५ ॥

कर्णउवाच अवनिं प्रमदा गाश्च निवापं बहुवार्षिकम् ।

पृष्ठ 2067

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तत् ते विप्र प्रदास्यामि न तु वर्म सकुण्डलम् ॥ ६ ॥

कर्णने कहा — ब्रह्मन्! यदि आप घर बनानेके लिये भूमि, गृहस्थी बसानेके लिये सुन्दरी तरुणी स्त्रियाँ, बहुत - सी गौएँ, खेत और बहुत वर्षोंतक चालू रहनेवाली जीवनवृत्ति लेना चाहें तो दे दूँगा; परंतु कवच और कुण्डल नहीं दे सकता ॥ ६ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं बहुविधैर्वाक्यैर्याच्यमानः स तु द्विजः ।

कर्णेन भरतश्रेष्ठ नान्यं वरमयाचत ॥ ७ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार बहुत - सी बातें कहकर कर्णके प्रार्थना करनेपर भी उन ब्राह्मणदेवने दूसरा कोई वर नहीं माँगा ॥ ७ ॥

सान्त्वितश्च यथाशक्ति पूजितश्च यथाविधि ।

न चान्यं स द्विजश्रेष्ठः कामयामास वै वरम् ॥ ८ ॥

कर्णने उन्हें यथाशक्ति बहुत समझाया एवं विधि- पूर्वक उनका पूजन किया । तथापि उन द्विजश्रेष्ठने और किसी वरको लेनेसे अनिच्छा प्रकट कर दी ॥ ८ ॥

यदा नान्यं प्रवृणुते वरं वै द्विजसत्तमः ।

( विनास्य सहजं वर्म कुण्डले च विशाम्पते ) ।

तदैनमब्रवीद् भूयो राधेयः प्रहसन्निव ॥ ९ ॥

राजन्! जब उन द्विजश्रेष्ठने कर्णके सहज कवच और कुण्डलके सिवा दूसरी कोई वस्तु नहीं माँगी, तब राधानन्दन कर्णने उनसे हँसते हुए- से कहा – ॥ ९ ॥

सहजं वर्म मे विप्र कुण्डले चामृतोद्भवे ।

तेनावध्योऽस्मि लोकेषु ततो नैतज्जहाम्यहम् ॥ १० ॥

‘ विप्रवर! कवच तो मेरे शरीरके साथ ही उत्पन्न हुआ है और दोनों कुण्डल भी अमृतसे प्रकट हुए हैं। इन्हींके कारण मैं संसारमें अवध्य बना हुआ हूँ; अत: मैं इन सब वस्तुओंको त्याग नहीं सकता ॥ १० ॥

विशालं पृथिवीराज्यं क्षेमं निहतकण्टकम् ।

प्रतिगृह्णीष्व मत्तस्त्वं साधु ब्राह्मणपुङ्गव ॥ ११ ॥

‘ ब्राह्मणप्रवर! आप मुझसे समूची पृथ्वीका कल्याणमय, अकण्टक, विशाल एवं उत्तम साम्राज्य ले लें ॥ ११ ॥

कुण्डलाभ्यां विमुक्तोऽहं वर्मणा सहजेन च ।

गमनीयो भविष्यामि शत्रूणां द्विजसत्तम ॥ १२ ॥

‘द्विजश्रेष्ठ इस सहज कवच और दोनों कुण्डलोंसे वंचित हो जानेपर मैं शत्रुओंका वध्य हो जाऊँगा ( अतः इन्हें न माँगिये ) ' ॥ १२ ॥

वैशम्पायन उवाच

पृष्ठ 2068

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यदान्यं न वरं वव्रे भगवान् पाकशासनः ।

ततः प्रहस्य कर्णस्तं पुनरित्यब्रवीद् वचः ॥ १३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इतना अनुनय- विनय करनेपर भी जब पाकशासन भगवान् इन्द्रने दूसरा कोई वर नहीं माँगा, तब कर्णने हँसकर पुनः इस प्रकार कहा— ॥ १३ ॥

विदितो देवदेवेश प्रागेवासि मम प्रभो ।

न तु न्याय्यं मया दातुं तव शक्र वृथा वरम् ॥ १४ ॥

‘ देवदेवेश्वर! प्रभो! आप पधार रहे हैं, यह बात मुझे पहले ही ज्ञात हो गयी थी । पर देवेन्द्र! मैं आपको निष्फल कर दूँ, यह न्यायसंगत नहीं है ॥ १४ ॥

त्वं हि देवेश्वरः साक्षात् त्वया देयो वरो मम ।

अन्येषां चैव भूतानामीश्वरो ह्यसि भूतकृत् ॥ १५ ॥

‘ आप साक्षात् देवेश्वर हैं । उचित तो यही है कि आप मुझे वर दें; क्योंकि आप अन्य सब भूतोंके ईश्वर तथा उन्हें उत्पन्न करनेवाले हैं ॥ १५ ॥

यदि दास्यामि ते देव कुण्डले कवचं तथा ।

वध्यतामुपयास्यामि त्वं च शक्रावहास्यताम् ॥ १६ ॥

तस्माद् विनिमयं कृत्वा कुण्डले वर्म चोत्तमम् ।

हरस्व शक्र कामं मे न दद्यामहमन्यथा ॥ १७ ॥

‘ इन्द्रदेव! यदि मैं आपको अपने दोनों कुण्डल और कवच दे दूँगा तो मैं तो शत्रुओंका वध्य हो जाऊँगा और संसारमें आपकी हँसी होगी। इसलिये ( कर्णने सूर्यकी आज्ञाको याद करके कहा— ) शक्र! आप कुछ बदला देकर इच्छानुसार मेरे कुण्डल और उत्तम कवच ले जाइये; अन्यथा मैं इन्हें नहीं दे सकता' ॥ १६-१७ ॥ शक्र उवाच

विदितोऽहं रवेः पूर्वमायानेव तवान्तिकम् ।

तेन ते सर्वमाख्यातमेवमेतन्न संशयः ॥ १८ ॥

इन्द्र बोले — कर्ण! जब मैं तुम्हारे पास आ रहा था, उसके पहले ही सूर्यदेवको यह बात मालूम हो गयी थी । इसमें संदेह नहीं कि उन्होंने ही तुमसे सारी बातें बता दी हैं ॥ १८ ॥

काममस्तु तथा तात तव कर्ण यथेच्छसि ।

वर्जयित्वा तु मे वज्रं प्रवृणीष्व यथेच्छसि ॥ १ ९ ॥

तात कर्ण! तुम्हारी रुचिके अनुसार इन वस्तुओंका परिवर्तन ही हो जाय । मेरे वज्रको छोड़कर तुम जो चाहो, वही आयुध मुझसे माँग लो ॥ १ ९ ॥ वैशम्पायन उवाच ततः कर्णः प्रहृष्टस्तु उपसंगम्य वासवम् ।

पृष्ठ 2069

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अमोघां शक्तिमभ्येत्य वव्रे सम्पूर्णमानसः ॥ २० ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तब कर्ण अत्यन्त प्रसन्न होकर देवराज इन्द्रके पास गया और सफलमनोरथ होकर उसने उनकी अमोघ शक्ति माँगी ॥ २० ॥

कर्णउवाच

वर्मणा कुण्डलाभ्यां च शक्तिं मे देहि वासव ।

अमोघां शत्रुसंघानां घातिनीं पृतनामुखे ॥ २१ ॥

कर्ण बोला- वासव! मेरे कवच और कुण्डल लेकर आप मुझे अपनी वह अमोघ शक्ति प्रदान कीजिये जो सेनाके अग्रभागमें शत्रुसमुदायका संहार करनेवाली है ॥

ततः संचिन्त्य मनसा मुहूर्तमिव वासवः ।

शक्त्यर्थं पृथिवीपाल कर्णं वाक्यमथाब्रवीत् ॥ २२ ॥

राजन्! तब इन्द्रने शक्तिके विषयमें दो घड़ी तक मन- ही - मन विचार करके कर्णसे इस प्रकार कहा— ॥ २२ ॥

कुण्डले मे प्रयच्छस्व वर्म चैव शरीरजम् ।

गृहाण कर्ण शक्तिं त्वमनेन समयेन च ॥ २३ ॥

' कर्ण! तुम मुझे अपने दोनों कुण्डल और सहज कवच दे दो और मेरी यह शक्ति ग्रहण कर लो । इसी शर्तके अनुसार हमलोगोंमें इन वस्तुओंका विनिमय ( बदला ) हो जाय ॥ २३ ॥

अमोघा हन्ति शतशः शत्रून् मम करच्युता ।

पुनश्च पाणिमभ्येति मम दैत्यान् विनिघ्नतः ॥ २४ ॥

' सूतनन्दन! दैत्योंका संहार करते समय मेरे हाथसे छूटनेपर यह अमोघ शक्ति सैकड़ों शत्रुओंको मार देती है और पुनः मेरे हाथमें चली आती है ' ॥ २४ ॥

सेयं तव करप्राप्ता हत्वैकं रिपुमूर्जितम् ।

गर्जन्तं प्रतपन्तं च मामेवैष्यति सूतज ॥ २५ ॥

‘ वही शक्ति तुम्हारे हाथमें जाकर किसी एक तेजस्वी, ओजस्वी, प्रतापी तथा गर्जना करनेवाले शत्रुको मारकर पुनः मेरे ही पास आ जायगी' ॥ २५ ॥

कर्णउवाच

एकमेवाहमिच्छामि रिपुं हन्तुं महाहवे ।

गर्जन्तं प्रतपन्तं च यतो मम भयं भवेत् ॥ २६ ॥

कर्ण बोला— देवेन्द्र! मैं महासमरमें अपने एक ही शत्रुको इसके द्वारा मारना चाहता हूँ जो बहुत गर्जना करनेवाला और प्रतापी है, तथा जिससे मुझे सदा भय बना रहता है ॥ २६ ॥

इन्द्र उवाच

पृष्ठ 2070

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एकं हनिष्यसि रिपुं गर्जन्तं बलिनं रणे ।

त्वं तु यं प्रार्थयस्येकं रक्ष्यते स महात्मना ॥ २७ ॥

यमाहुर्वेदविद्वांसो वरार्हमपराजितम् ।

नारायणमचिन्त्यं च तेन कृष्णेन रक्ष्यते ॥ २८ ॥

इन्द्रने कहा- कर्ण! तुम ( इस शक्तिसे ) रणभूमिमें गर्जना करनेवाले किसी एक बलवान् शत्रुको मार सकोगे, परंतु इस समय तुम जिस एक शत्रुको लक्ष्य करके यह अमोघ शक्ति माँग रहे हो वह तो उन परमात्माद्वारा सुरक्षित है, जिन्हें वेदवेत्ता विद्वान् पुरुषोत्तम अपराजित, हरि तथा अचिन्त्यस्वरूप नारायण कहते हैं। वे स्वयं श्रीकृष्ण हैं जिनके द्वारा उस वीरकी रक्षा हो रही है ॥ २७-२८ ॥ कर्णउवाच

एवमप्यस्तु भगवन्नेकवीरवधे मम ।

अमोघां देहि मे शक्तिं यथा हन्यां प्रतापिनम् ॥ २ ९ ॥

कर्ण बोला — भगवन्! ऐसा ही हो । तो भी आप एक वीरके वधके लिये मुझे अपनी अमोघ शक्ति दे दीजिये, जिससे मैं अपने प्रतापी शत्रुका वध कर सकूँ ॥ २ ९ ॥

उत्कृत्य तु प्रदास्यामि कुण्डले कवचं च ते ।

निकृत्तेषु तु गात्रेषु न मे बीभत्सता भवेत् ॥ ३० ॥

मैं आपको अपने शरीरसे उधेड़कर कवच और कुण्डल तो दे दूँगा; परंतु उस समय मेरे अंगोंके कट जानेपर मेरा स्वरूप बीभत्स न होना चाहिये ॥ ३० ॥

इन्द्र उवाच

न ते बीभत्सता कर्ण भविष्यति कथञ्चन ।

व्रणश्चैव न गात्रेषु यस्त्वं नानृतमिच्छसि ॥ ३१ ॥

इन्द्रने कहा —कर्ण! तुम्हारा स्वरूप किसी प्रकार भी बीभत्स नहीं होगा । तुम्हारे अंगोंमें घावतक नहीं होगा; क्योंकि तुम असत्यकी इच्छा नहीं रखते हो ॥ ३१ ॥

यादृशस्ते पितुर्वर्णस्तेजश्च वदतां वर ।

तादृशेनैव वर्णेन त्वं कर्ण भविता पुनः ॥ ३२ ॥

विद्यमानेषु शस्त्रेषु यद्यमोघामसंशये ।

प्रमत्तो मोक्ष्यसे चापि त्वय्येवैषा पतिष्यति ॥ ३३ ॥

वक्ताओंमें श्रेष्ठ कर्ण! तुम्हारे पिताका जैसा वर्ण और तेज है, वैसे ही वर्ण और तेजसे तुम पुनः सम्पन्न हो जाओगे । जबतक तुम्हारे पास दूसरे शस्त्र रहें और प्राणसंकटकी परिस्थिति न आ जाय, तबतक तुम यदि प्रमादवश यह अमोघ शक्ति यों ही किसी शत्रुपर छोड़ दोगे तो यह उसे न मारकर तुम्हारे ही ऊपर आ पड़ेगी ॥ ३२-३३ ॥