श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 2041–2050
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2041–2050
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क्योंकि पृथ्वीपते! महाभाग ब्राह्मण भलीभाँति पूजित होनेपर सेवकको तारनेमें समर्थ होते हैं; और इसके विपरीत अपमानित होनेपर विनाशकारी बन जाते हैं ॥ ७ ॥
साहमेतद् विजानन्ती तोषयिष्ये द्विजोत्तमम् ।
न मत्कृते व्यथां राजन् प्राप्स्यसि द्विजसत्तमात् ॥ ८ ॥
मैं इस बातको जानती हूँ। अतः इन श्रेष्ठ ब्राह्मणको सब तरहसे संतुष्ट रखूँगी । राजन्! मेरे कारण इन द्विजश्रेष्ठसे आपको कोई कष्ट नहीं प्राप्त होगा ॥ ८ ॥
अपराधेऽपि राजेन्द्र राज्ञामश्रेयसे द्विजाः ।
भवन्ति चवनो यद्वत् सुकन्यायाः कृते पुरा ॥ ९ ॥
राजेन्द्र! किसी बालिकाद्वारा अपराध बन जानेपर भी ब्राह्मणलोग राजाओंका अमंगल करनेको उद्यत हो जाते हैं, जैसे प्राचीनकालमें सुकन्याद्वारा अपराध होनेपर महर्षि च्यवन महाराज शर्यातिका अनिष्ट करनेको उद्यत हो गये थे ॥ ९ ॥
नियमेन परेणाहमुपस्थास्ये द्विजोत्तमम् ।
यथा त्वया नरेन्द्रेदं भाषितं ब्राह्मणं प्रति ॥ १० ॥
नरेन्द्र! आपने ब्राह्मणके प्रति बर्ताव करनेके विषयमें जो कुछ कहा है, उसके अनुसार मैं उत्तम नियमोंके पालनपूर्वक इन श्रेष्ठ ब्राह्मणकी सेवामें उपस्थित रहूँगी ॥
एवं ब्रुवन्तीं बहुशः परिष्वज्य समर्थ्य च ।
इति चेति च कर्तव्यं राजा सर्वमथादिशत् ॥ ११ ॥
इस प्रकार कहती हुई कुन्तीको बारंबार गलेसे लगाकर राजाने उसकी बातोंका समर्थन किया और कैसे - कैसे क्या-क्या करना चाहिये, इसके विषयमें उसे सुनिश्चित आदेश दिया ॥ ११ ॥
राजोवाच
एवमेतत् त्वया भद्रे कर्तव्यमविशङ्कया ।
मद्धितार्थं तथाऽऽत्मार्थं कुलार्थं चाप्यनिन्दिते ॥ १२ ॥
राजा बोले— भद्रे! अनिन्दिते! मेरे, तुम्हारे तथा कुलके हितके लिये तुम्हें निःशंकभावसे इसी प्रकार यह सब कार्य करना चाहिये ॥ १२ ॥
एवमुक्त्वा तु तां कन्यां कुन्तिभोजो महायशाः ।
पृथां परिददौ तस्मै द्विजाय द्विजवत्सलः ॥ १३ ॥
ब्राहणप्रेमी महायशस्वी राजा कुन्तिभोजने पुत्रीसे ऐसा कहकर उन आये हुए द्विजकी सेवामें पृथाको दे दिया ॥ १३ ॥
इयं ब्रह्मन् मम सुता बाला सुखविवर्धिता ।
अपराध्येत यत्र किंचिन्न कार्यं हृदि तत् त्वया ॥ १४ ॥
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और कहा — ' ब्रह्मन्! यह मेरी पुत्री पृथा अभी बालिका है और सुखमें पली हुई है । यदि आपका कोई अपराध कर बैठे, तो भी आप उसे मनमें नहीं लाइयेगा ॥ १४ ॥
द्विजातयो महाभागा वृद्धबालतपस्विषु ।
भवन्त्यक्रोधनाः प्रायो ह्यपराद्धेषु नित्यदा ॥ १५ ॥
‘ वृद्ध, बालक और तपस्वीजन यदि कोई अपराध कर दें, तो भी आप जैसे महाभाग ब्राह्मण प्रायः कभी उनपर क्रोध नहीं करते ॥ १५ ॥
सुमहत्यपराधेऽपि क्षान्तिः कार्या द्विजातिभिः ।
यथाशक्ति यथोत्साहं पूजा ग्राह्या द्विजोत्तम ॥ १६ ॥
‘ विप्रवर! सेवकका महान् अपराध होनेपर भी ब्राह्मणोंको क्षमा करनी चाहिये तथा शक्ति और उत्साहके अनुसार उनके द्वारा की हुई सेवा- पूजा स्वीकार कर लेनी चाहिये ' ॥ १६ ॥
तथेति ब्राह्मणेनोक्तं स राजा प्रीतमानसः ।
हंसचन्द्रांशुसंकाशं गृहमस्मै न्यवेदयत् ॥ १७ ॥
ब्राह्मणने ' तथास्तु ' कहकर राजाका अनुरोध मान लिया। इससे उनके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने ब्राह्मणको रहनेके लिये हंस और चन्द्रमाकी किरणोंके समान एक उज्ज्वल भवन दे दिया ॥ १७ ॥
तत्राग्निशरणे क्लृप्तमासनं तस्य भानुमत् ।
आहारादि च सर्वं तत् तथैव प्रत्यवेदयत् ॥ १८ ॥
वहाँ अग्निहोत्रगृहमें उनके लिये चमचमाते हुए सुन्दर आसनकी व्यवस्था हो गयी ।
भोजन आदिकी सब सामग्री भी राजाने वहीं प्रस्तुत कर दी ॥ १८ ॥
निक्षिप्य राजपुत्री तु तन्द्रीं मानं तथैव च ।
आतस्थे परमं यत्नं ब्राह्मणस्याभिराधने ॥ १ ९ ॥
राजकुमारी कुन्ती आलस्य और अभिमानको दूर भगाकर ब्राह्मणकी आराधनामें बड़े यत्नसे संलग्न हो गयी ॥ १ ९ ॥
तत्र सा ब्राह्मणं गत्वा पृथा शौचपरा सती ।
विधिवत् परिचारर्हं देववत् पर्यतोषयत् ॥ २० ॥
बाहर- भीतरसे शुद्ध हो सती - साध्वी पृथा उन पूजनीय ब्राह्मणके पास जाकर देवताकी भाँति उनकी विधिवत् आराधना करके उन्हें पूर्णरूपसे संतुष्ट रखने लगी ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि पृथाद्विजपरिचर्यायां चतुरधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें कुन्तीके द्वारा ब्राह्मणकी परिचर्याविषयक तीन सौ चारवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ३०४ ॥
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पञ्चाधिकत्रिशततमोऽध्यायः कुन्तीकी सेवासे संतुष्ट होकर तपस्वी ब्राह्मणका उसको मन्त्रका उपदेश देना वैशम्पायन उवाच
सा तु कन्या महाराज ब्राह्मणं संशितव्रतम् ।
तोषयामास शुद्धेन मनसा संशितव्रता ॥। १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - महाराज! इस प्रकार वह कन्या पृथा कठोर व्रतका पालन करती हुई शुद्ध हृदयसे उन उत्तम व्रतधारी ब्राह्मणको अपनी सेवाओंद्वारा संतुष्ट रखने लगी ॥ १ ॥
प्रातरेष्याम्यथेत्युक्त्वा कदाचिद् द्विजसत्तमः ।
तत आयाति राजेन्द्र सायं रात्रावथो पुनः ॥ २ ॥
राजेन्द्र! वे श्रेष्ठ ब्राह्मण कभी यह कहकर कि ' मैं प्रातःकाल लौट आऊँगा ' चल देते और सायंकाल अथवा बहुत रात बीतनेपर पुनः वापस आते थे ॥ २ ॥
तं च सर्वासु वेलासु भक्ष्यभोज्यप्रतिश्रयैः ।
पूजयामास सा कन्या वर्धमानैस्तु सर्वदा ॥ ३ ॥
परंतु वह कन्या प्रतिदिन हर समय पहलेकी अपेक्षा अधिक अधिक परिणाममें भक्ष्य-भोज्य आदि सामग्री तथा शय्या -आसन आदि प्रस्तुत करके उनका सेवा - सत्कार किया करती थी ॥ ३ ॥
अन्नादिसमुदाचारः शय्यासनकृतस्तथा ।
दिवसे दिवसे तस्य वर्धते न तु हीयते ॥ ४ ॥
नित्यप्रति अन्न आदिके द्वारा उन ब्राह्मणका सत्कार अन्य दिनोंकी अपेक्षा बढ़कर ही होता था । उनके लिये शय्या और आसन आदिकी सुविधा भी पहलेकी अपेक्षा अधिक ही दी जाती थी । किसी बातमें तनिक भी कमी नहीं की जाती थी ॥ ४ ॥
निर्भर्त्सनापवादैश्च तथैवाप्रियया गिरा ।
ब्राह्मणस्य पृथा राजन् न चकाराप्रियं तदा ॥ ५ ॥
राजन्! वे ब्राह्मण कभी धिक्कारते, कभी बात- बातमें दोषारोपण करते और प्रायः कटु वचन भी बोला करते थे, तो भी पृथा उनके प्रति कभी कोई अप्रिय बर्ताव नहीं करती थी ॥ ५ ॥
व्यस्ते काले पुनश्चैति न चैति बहुशो द्विजः ।
सुदुर्लभमपि ह्यन्नं दीयतामिति सोऽब्रवीत् ॥ ६ ॥
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वे कभी ऐसे समयमें लौटकर आते थे, जब कि पृथाको दूसरे कामोंसे दम लेनेकी भी फुरसत नहीं होती थी और कभी वे कई दिनोंतक आते ही नहीं थे । आनेपर भी ऐसा भोजन माँग लेते जो अत्यन्त दुर्लभ होता ॥ ६ ॥
कृतमेव च तत् सर्वं यथा तस्मै न्यवेदयत् ।
शिष्यवत् पुत्रवच्चैव स्वसृवच्च सुसंयता ॥ ७ ॥
परंतु कुन्ती उन्हें उनकी माँगी हुई सब वस्तुएँ इस प्रकार प्रस्तुत कर देती थी, मानो उनको पहलेसे ही तैयार करके रखा हो । वह अत्यन्त संयत होकर शिष्य, पुत्र तथा छोटी बहिनकी भाँति सदा उनकी सेवामें लगी रहती थी ॥ ७ ॥
यथोपजोषं राजेन्द्र द्विजातिप्रवरस्य सा ।
प्रीतिमुत्पादयामास कन्यारत्नमनिन्दिता ॥ ८ ॥
राजेन्द्र! उस अनिन्द्य कन्यारत्न कुन्तीने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणको उनकी रुचिके अनुसार सेवा करके अत्यन्त प्रसन्न कर लिया ॥ ८ ॥
तस्यास्तु शीलवृत्तेन तुतोष द्विजसत्तमः ।
अवधानेन भूयोऽस्याः परं यत्नमथाकरोत् ॥ ९ ॥
उसके शील, सदाचार तथा सावधानीसे उन द्विजश्रेष्ठको बड़ा संतोष हुआ । उन्होंने कुन्तीका हित करनेका पूरा प्रयत्न किया ॥ ९ ॥
तां प्रभाते च सायं च पिता पप्रच्छ भारत ।
अपि तुष्यति ते पुत्र ब्राह्मणः परिचर्यया ॥ १० ॥
जनमेजय! पिता कुन्तिभोज प्रतिदिन प्रातःकाल और सायंकालमें पूछते थे — ‘ बेटी! तुम्हारी सेवासे ब्राह्मणको संतोष तो है न? ' ॥ १० ॥
तं सा परममित्येव प्रत्युवाच यशस्विनी ।
ततः प्रीतिमवापाग्रयां कुन्तिभोजो महामनाः ॥ ११ ॥
वह यशस्विनी कन्या उन्हें उत्तर देती— ' हाँ पिताजी! वे बहुत प्रसन्न हैं । ' यह सुनकर महामना कुन्तिभोजको बड़ा हर्ष प्राप्त होता था ॥ ११ ॥
ततः संवत्सरे पूर्णो यदासौ जपतां वरः ।
नापश्यद् दुष्कृतं किंचित् पृथायाः सौहृदे रतः ॥ १२ ॥
ततः प्रीतमना भूत्वा स एनां ब्राह्मणोऽब्रवीत् ।
प्रीतोऽस्मि परमं भद्रे परिचारेण ते शुभे ॥ १३ ॥
वरान् वृणीष्व कल्याणि दुरापात् मानुषैरिह ।
यैस्त्वं सीमन्तिनीः सर्वा यशसाभिभविष्यसि ॥ १४ ॥
तदनन्तर जब एक वर्ष पूरा हो गया और पृथाके प्रति वात्सल्य स्नेह रखनेवाले जपकर्ताओंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण दुर्वासाजीने उसकी सेवामें कोई त्रुटि नहीं देखी, तब वे प्रसन्नचित्त होकर पृथासे इस प्रकार बोले- ' भद्रे! मैं तुम्हारी सेवासे बहुत प्रसन्न हूँ । शुभे!
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कल्याणि! तुम मुझसे ऐसे वर माँगो, जो यहाँ दूसरे मनुष्योंके लिये दुर्लभ हों और जिनके कारण तुम संसारकी समस्त सुन्दरियोंको अपने सुयशसे पराजित कर सको' ॥ १२– १४ ॥ कुन्त्युवाच
कृतानि मम सर्वाणि यस्या मे वेदवित्तम ।
त्वं प्रसन्नः पिता चैव कृतं विप्र वरैर्मम ॥ १५ ॥
कुन्ती बोली - वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ! जब मुझ सेविकाके ऊपर आप और पिताजी प्रसन्न हो गये तब मेरी सब कामनाएँ पूर्ण हो गयीं । विप्रवर! मुझे वर लेनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ १५ ॥
ब्राह्मणउवाच
यदि नेच्छसि मत्तस्त्वं वरं भद्रे शुचिस्मिते ।
इमं मन्त्रं गृहाण त्वमाह्वानाय दिवौकसाम् ॥ १६ ॥
ब्राह्मणने कहा — भद्रे! पवित्र मुसकानवाली पृथे! यदि तुम मुझसे वर नहीं लेना चाहती हो तो देवताओंका आवाहन करनेके लिये यह एक मन्त्र ही ग्रहण कर लो ॥ १६ ॥
यं यं देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहयिष्यसि ।
तेन तेन वशे भद्रे स्थातव्यं ते भविष्यति ॥ १७ ॥
भद्रे! तुम इस मन्त्रके द्वारा जिस-जिस देवताका आवाहन करोगी वह वह तुम्हारे अधीन हो जानेके लिये बाध्य होगा ॥ १७ ॥
अकामो वा सकामो वा स समेष्यति ते वशे ।
विबुधो मन्त्रसंशान्तो भवेद् भृत्य इवानतः ॥ १८ ॥
वह देवता कामनारहित हो या कामनायुक्त, मन्त्रके प्रभावसे शान्तचित्त हो विनीत सेवककी भाँति तुम्हारे पास आकर तुम्हारे अधीन हो जायगा ॥ १८ ॥
वैशम्पायन उवाच
न शशाक द्वितीयं सा प्रत्याख्यातुमनिन्दिता ।
तं वै द्विजातिप्रवरं तदा शापभयान्नृप ॥ १ ९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! साध्वी पृथा दूसरी बार उन श्रेष्ठ ब्राह्मणकी बात न टाल सकी; क्योंकि वैसा करनेपर उसे उनके शापका भय था ॥ १ ९ ॥
ततस्तामनवद्याङ्गीं ग्राहयामास स द्विजः ।
मन्त्रग्रामं तदा राजन्नथर्वशिरसि श्रुतम् ॥ २० ॥
राजन्! तब ब्राह्मणने निर्दोष अंगोंवाली कुन्तीको उस मन्त्रसमूहका उपदेश दिया जो अथर्ववेदीय उपनिषद्में प्रसिद्ध है ॥ २० ॥
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तं प्रदाय तु राजेन्द्र कुन्तिभोजमुवाच ह ।
उषितोऽस्मि सुखं राजन् कन्यया परितोषितः ॥ २१ ॥
तव गेहेषु विहितः सदा सुप्रतिपूजितः ।
साधयिष्यामहे तावदित्युक्त्वान्तरधीयत ॥ २२ ॥
राजेन्द्र! पृथाको वह मन्त्र देकर ब्राह्मणने राजा कुन्तिभोजसे कहा- ' राजन्! मैं तुम्हारे घरमें तुम्हारी कन्याद्वारा सदा समादृत और संतुष्ट होकर बड़े सुखसे रहा हूँ । अब हम अपनी कार्यसिद्धिके लिये यहाँसे जायँगे । ' ऐसा कहकर वे ब्राह्मण वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ २१-२२ ॥
स तु राजा द्विजं दृष्ट्वा तत्रैवान्तर्हितं तदा ।
बभूव विस्मयाविष्टः पृथां च समपूजयत् ॥ २३ ॥
ब्राह्मणको अन्तर्हित हुआ देख उस समय राजाको बड़ा विस्मय हुआ और उन्होंने अपनी पुत्री कुन्तीका विशेष आदर- सत्कार किया ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि पृथाया मन्त्रप्राप्तौ पञ्चाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०५ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें पृथाको मन्त्रकी प्राप्तिविषयक तीन सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०५ ॥
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षडधिकत्रिशततमोऽध्यायः कुन्तीके, द्वारा सूर्यदेवताका आवाहन तथा कुन्ती - सूर्य- संवाद वैशम्पायन उवाच
गते तस्मिन् द्विजश्रेष्ठे कस्मिंश्चित् कारणान्तरे ।
चिन्तयामास सा कन्या मन्त्रग्रामबलाबलम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! उन श्रेष्ठ ब्राह्मणके चले जानेपर किसी कारणवश * राजकन्या कुन्तीने मन-ही-मन सोचा; ' इस मन्त्रसमूहमें कोई बल है या नहीं ॥ १ ॥
अयं वै कीदृशस्तेन मम दत्तो महात्मना ।
मन्त्रग्रामो बलं तस्य ज्ञास्ये नातिचिरादिति ॥ २ ॥
'उन महात्मा ब्राह्मणने मुझे यह कैसा मन्त्रसमूह प्रदान किया है? उसके बलको मैं शीघ्र ही ( परीक्षाद्वारा ) जानूँगी' ॥ २ ॥
एवं संचिन्तयन्ती सा ददर्शर्तुं यदृच्छया ।
व्रीडिता साभवद् बाला कन्याभावे रजस्वला ॥ ३ ॥
इस प्रकार सोच - विचारमें पड़ी हुई कुन्तीने अकस्मात् अपने शरीरमें ऋतुका प्रादुर्भाव हुआ देखा । कन्यावस्थामें ही अपनेको रजस्वला पाकर उस बालिकाने लज्जाका अनुभव किया ॥ ३ ॥
ततो हर्म्यतलस्था सा महार्हशयनोचिता ।
प्राच्यां दिशि समुद्यन्तं ददर्शादित्यमण्डलम् ॥ ४ ॥
तदनन्तर एक दिन कुन्ती अपने महलके भीतर एक बहुमूल्य पलंगपर लेटी हुई थी । उसी समय उसने ( खिड़कीसे ) पूर्वदिशामें उदित होते हुए सूर्यमण्डलकी ओर दृष्टिपात किया ॥ ४ ॥
तत्र बद्धमनोदृष्टिरभवत् सा सुमध्यमा ।
न चातप्यत रूपेण भानोः संध्यागतस्य सा ॥ ५ ॥
प्रातःसंध्याके समय उगते हुए सूर्यकी ओर देखनेमें सुमध्यमा कुन्तीको तनिक भी
तापका अनुभव नहीं हुआ । उसके मन और नेत्र उन्हींमें आसक्त हो गये ॥
तस्या दृष्टिरभूद् दिव्या सापश्यद् दिव्यदर्शनम् ।
आमुक्तकवचं देवं कुण्डलाभ्यां विभूषितम् ॥ ६ ॥
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उस समय उसकी दृष्टि दिव्य हो गयी । उसने दिव्यरूपमें दिखायी देनेवाले भगवान् सूर्यकी ओर देखा । वे कवच धारण किये एवं कुण्डलोंसे विभूषित थे ॥ ६ ॥
तस्याः कौतूहलं त्वासीन्मन्त्रं प्रति नराधिप ।
आह्वानमकरोत् साथ तस्य देवस्य भाविनी । ७ ॥
नरेश्वर! उन्हें देखकर कुन्तीके मनमें अपने मन्त्रकी शक्तिकी परीक्षा करनेके लिये कौतूहल पैदा हुआ । तब उस सुन्दरी राजकन्याने सूर्यदेवका आवाहन किया ॥ ७ ॥
प्राणानुपस्पृश्य तदा ह्याजुहाव दिवाकरम् ।
आजगाम ततो राजंस्त्वरमाणो दिवाकरः ॥ ८ ॥
उसने विधिपूर्वक आचमन और प्राणायाम करके भगवान् दिवाकरका आवाहन किया ।
राजन्! तब भगवान् सूर्य बड़ी उतावलीके साथ वहाँ आये ॥ ८ ॥
मधुपिङ्गो महाबाहुः कम्बुग्रीवो हसन्निव ।
अङ्गदी बद्धमुकुटो दिशः प्रज्वालयन्निव ॥ ९ ॥
उनकी अंगकान्ति मधुके समान पिंगलवर्णकी थी । भुजाएँ बड़ी- बड़ी और ग्रीवा शंखके समान थी । वे हँसते हुए - से जान पड़ते थे । उनकी भुजाओंमें अंगद ( बाजूबंद ) चमक रहे थे और मस्तकपर बँधा हुआ मुकुट शोभा पाता था । वे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रज्वलित - सी कर रहे थे ॥ ९ ॥
योगात् कृत्वा द्विधाऽऽत्मानमाजगाम तताप च ।
आबभाषे ततः कुन्तीं साम्ना परमवल्गुना ॥ १० ॥
वे योगशक्तिसे अपने दो स्वरूप बनाकर एकसे वहाँ आये और दूसरेसे आकाशमें तपते रहे । उन्होंने कुन्तीको समझाते हुए परम मधुर वाणीमें कहा- ॥ १० ॥
आगतोऽस्मि वशं भद्रे तव मन्त्रबलात्कृतः ।
किं करोमि वशो राज्ञि ब्रूहि कर्ता तदस्मि ते ॥ ११ ॥
‘ भद्रे! मैं तुम्हारे मन्त्रके बलसे आकृष्ट होकर तुम्हारे वशमें आ गया हूँ । राजकुमारी! बताओ, तुम्हारे अधीन रहकर मैं कौन-सा कार्य करूँ? तुम जो कहोगी, वही करूँगा' ॥ ११ ॥
कुन्त्युवाच
गम्यतां भगवंस्तत्र यत एवागतो ह्यसि ।
कौतूहलात् समाहूतः प्रसीद भगवन्निति ॥ १२ ॥
कुन्ती बोली – भगवन्! आप जहाँसे आये हैं वहीं पधारिये । मैंने आपको कौतूहलवश
ही बुलाया था । प्रभो! प्रसन्न होइये ॥ १२ ॥
सूर्य उवाच गमिष्येऽहं यथा मां त्वं ब्रवीषि तनुमध्यमे ।
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न तु देवं समाहूय न्याय्यं प्रेषयितुं वृथा ॥ १३ ॥
सूर्यने कहा — तनुमध्यमे! जैसा तुम कह रही हो उसके अनुसार मैं चला तो जाऊँगा ही; परंतु किसी देवताको बुलाकर उसे व्यर्थ लौटा देना न्यायकी बात नहीं है ॥ १३ ॥
तवाभिसंधिः सुभगे सूर्यात् पुत्रो भवेदिति ।
वीर्येणाप्रतिमो लोके कवची कुण्डलीति च ॥ १४ ॥
सुभगे! तुम्हारे मनमें यह संकल्प उठा था कि ' सूर्यदेवसे मुझे एक ऐसा पुत्र प्राप्त हो, जो संसारमें अनुपम पराक्रमी तथा जन्मसे ही दिव्य कवच एवं कुण्डलोंसे सुशोभित हो' ॥ १४ ॥
सा त्वमात्मप्रदानं वै कुरुष्व गजगामिनि ।
उत्पत्स्यति हि पुत्रस्ते यथासंकल्पमङ्गने ॥ १५ ॥
अतः गजगामिनि! तुम मुझे अपना शरीर समर्पित कर दो । अंगने! ऐसा करनेसे तुम्हें अपने संकल्पके अनुसार तेजस्वी पुत्र प्राप्त होगा ॥ १५ ॥
अथ गच्छाम्यहं भद्रे त्वया संगम्य सुस्मिते ।
यदि त्वं वचनं नाद्य करिष्यसि मम प्रियम् ॥ १६ ॥
शपिष्ये त्वामहं क्रुद्धो ब्राह्मणं पितरं च ते ।
त्वत्कृते तान् प्रधक्ष्यामि सर्वानपि न संशयः ॥ १७ ॥
भद्रे! सुन्दर मुसकानवाली पृथे! तुमसे समागम करके मैं पुनः लौट जाऊँगा; परंतु यदि आज तुम मेरा प्रिय वचन नहीं मानोगी तो मैं कुपित होकर तुमको, उस मन्त्रदाता ब्राह्मणको और तुम्हारे पिताको भी शाप दे दूँगा । तुम्हारे कारण मैं उन सबको जलाकर भस्म कर दूँगा; इसमें संशय नहीं है ॥ १६-१७ ॥
पितरं चैव ते मूढं यो न वेत्ति तवानयम् ।
तस्य च ब्राह्मणस्याद्य योऽसौ मन्त्रमदात् तव ॥ १८ ॥
शीलवृत्तमविज्ञाय धास्यामि विनयं परम् । तुम्हारे मूर्ख पिताको भी मैं जला दूँगा, जो तुम्हारे इस अन्यायको नहीं जानता है तथा जिसने तुम्हारे शील और सदाचारको जाने बिना ही मन्त्रका उपदेश दिया है, उस ब्राह्मणको भी अच्छी सीख दूँगा ॥ १८३ ॥
एते हि विबुधाः सर्वे पुरन्दरमुखा दिवि ॥ १ ९ ॥ त्वया प्रलब्धं पश्यन्ति स्मयन्त इव भाविनि ।
पश्य चैनान् सुरगणान् दिव्यं चक्षुरिदं हि ते ।
पूर्वमेव मया दत्तं दृष्टवत्यसि येन माम् ॥ २० ॥
भामिनि! ये इन्द्र आदि समस्त देवता आकाशमें खड़े होकर मुसकराते हुए - से मेरी ओर इस भावसे देख रहे हैं कि मैं तुम्हारे द्वारा कैसा ठगा गया? देखो न, इन देवताओंकी ओर । मैंने तुम्हें पहलेसे ही दिव्य दृष्टि दे दी है, जिससे तुम मुझे देख सकती हो ॥ १ ९-२० ॥