02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 2101–2110

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2101–2110

पृष्ठ 2101

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 2101 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

है ॥ ९ २ ॥ यक्ष उवाच

को मोहः प्रोच्यते राजन् कश्च मानः प्रकीर्तितः ।

किमालस्यं च विज्ञेयं कश्च शोकः प्रकीर्तितः ॥ ९ ३ ॥

यक्षने पूछा — राजन्! मोह किसे कहते हैं? मान क्या कहलाता है? आलस्य किसे जानना चाहिये? और शोक किसे कहते हैं? ॥ ९ ३ ॥ युधिष्ठिरउवाच

मोहो हि धर्ममूढत्वं मानस्त्वात्माभिमानिता ।

धर्मनिष्क्रियताऽऽलस्यं शोकस्त्वज्ञानमुच्यते ॥ ९ ४ ॥

युधिष्ठिर बोले - धर्ममूढ़ता ही मोह है, आत्माभिमान ही मान है, धर्मका पालन न करना आलस्य है और अज्ञानको ही शोक कहते हैं ॥ ९ ४ ॥ यक्षउवाच

किं स्थैर्यमृषिभिः प्रोक्तं किं च धैर्यमुदाहृतम् ।

स्नानं च किं परं प्रोक्तं दानं च किमिहोच्यते ॥ ९ ५ ॥

यक्षने पूछा—ऋषियोंने स्थिरता किसे कहा है? धैर्य क्या कहलाता है? परम स्नान किसे कहते हैं? और दान किसका नाम है? ॥ ९ ५ ॥ युधिष्ठिरउवाच

स्वधर्मे स्थिरता स्थैर्यं धैर्यमिन्द्रियनिग्रहः ।

स्नानं मनोमलत्यागो दानं वै भूतरक्षणम् ॥ ९ ६ ॥

युधिष्ठिर बोले - अपने धर्ममें स्थिर रहना ही स्थिरता है, इन्द्रियनिग्रह धैर्य है, मानसिक मलोंका त्याग करना परम स्नान है और प्राणियोंकी रक्षा करना ही दान है ॥ यक्षउवाच

कः पण्डितः पुमान् ज्ञेयो नास्तिकः कश्च उच्यते ।

को मूर्खः कश्च कामः स्यात् को मत्सर इति स्मृतः ॥ ९ ७ ॥

यक्षने पूछा — किस पुरुषको पण्डित समझना चाहिये, नास्तिक कौन कहलाता है? मूर्ख कौन है? काम क्या है? तथा मत्सर किसे कहते हैं? ॥ ९ ७ ॥ युधिष्ठिर उवाच

धर्मज्ञः पण्डितो ज्ञेयो नास्तिको मूर्ख उच्यते ।

कामः संसारहेतुश्च हृत्तापो मत्सरः स्मृतः ॥ ९ ८ ॥

पृष्ठ 2102

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 2102 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

युधिष्ठिर बोले — धर्मज्ञको पण्डित समझना चाहिये, मूर्ख नास्तिक कहलाता है और नास्तिक मूर्ख है तथा जो जन्म- मरणरूप संसारका कारण है, वह वासना काम है और हृदयकी जलन ही मत्सर है ॥ ९ ८ ॥ यक्ष उवाच

कोऽहङ्कार इति प्रोक्तः कश्च दम्भः प्रकीर्तितः ।

किं तद् दैवं परं प्रोक्तं किं तत् पैशुन्यमुच्यते ॥ ९९ ॥

यक्षने पूछा — अहंकार किसे कहते हैं? दम्भ क्या कहलाता है? जिसे परम दैव कहते हैं, वह क्या है? और पैशुन्य किसका नाम है? ॥ ९९ ॥

युधिष्ठिर उवाच

महाज्ञानमहङ्कारो दम्भो धर्मो ध्वजोच्छ्रयः ।

दैवं दानफलं प्रोक्तं पैशुन्यं परदूषणम् ॥ १०० ॥

युधिष्ठिर बोले — महान् अज्ञान अहंकार है, अपनेको झूठ - मूठ बड़ा धर्मात्मा प्रसिद्ध करना दम्भ है, दानका फल दैव कहलाता है और दूसरोंको दोष लगाना पैशुन्य ( चुगली ) है ॥ १०० ॥

यक्ष उवाच

धर्मश्चार्थश्च कामश्च परस्परविरोधिनः ।

एषां नित्यविरुद्धानां कथमेकत्र संगमः ॥ १०१ ॥

यक्षने पूछा — धर्म, अर्थ और काम- ये सब परस्पर विरोधी हैं। इन नित्य- विरुद्ध पुरुषार्थोंका एक स्थानपर कैसे संयोग हो सकता है? ॥ १०१ ॥

युधिष्ठिर उवाच

यदा धर्मश्च भार्या च परस्परवशानुगौ ।

तदा धर्मार्थकामानां त्रयाणामपि संगमः ॥ १०२ ॥

युधिष्ठिर बोले- जब धर्म और भार्या-ये दोनों परस्पर अविरोधी होकर मनुष्यके वशमें हो जाते हैं, उस समय धर्म, अर्थ और काम- इन तीनों परस्पर विरोधियोंका भी एक साथ रहना सहज हो जाता है * ॥ १०२ ॥

यक्ष उवाच

अक्षयो नरकः केन प्राप्यते भरतर्षभ ।

एतन्मे मृच्छतः प्रश्ननं तच्छीघ्रं वक्तुमर्हसि ॥ १०३ ॥

यक्षने पूछा — भरतश्रेष्ठ! अक्षय नरक किस पुरुषको प्राप्त होता है? मेरे इस प्रश्नका शीघ्र ही उत्तर दो ॥ १०३ ॥

पृष्ठ 2103

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 2103 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

युधिष्ठिर उवाच

ब्राह्मणं स्वयमाहूय याचमानमकिञ्चनम् ।

पश्चान्नास्तीति यो ब्रूयात् सोऽक्षयं नरकं व्रजेत् ॥ १०४ ॥

युधिष्ठिर बोले- जो पुरुष भिक्षा माँगनेवाले किसी अकिञ्चन ब्राह्मणको स्वयं बुलाकर फिर उसे ' नाहीं' कर देता है, वह अक्षय नरकमें जाता है ॥ १०४ ॥

वेदेषु धर्मशास्त्रेषु मिथ्या यो वै द्विजातिषु ।

देवेषु पितृधर्मेषु सोऽक्षयं नरकं व्रजेत् ॥ १०५ ॥

जो पुरुष वेद, धर्मशास्त्र, ब्राह्मण, देवता और पितृधर्मोंमें मिथ्याबुद्धि रखता है, वह अक्षय नरकको प्राप्त होता है ॥ १०५ ॥

विद्यमाने धने लोभाद् दानभोगविवर्जितः ।

पश्चान्नास्तीति यो ब्रूयात् सोऽक्षयं नरकं व्रजेत् ॥ १०६ ॥

धन पास रहते हुए भी जो लोभवश दान और भोगसे रहित है तथा ( माँगनेवाले ब्राह्मणादिको एवं न्याययुक्त भोगके लिये स्त्री-पुत्रादिको ) पीछेसे यह कह देता है कि मेरे पास कुछ नहीं है, वह अक्षय नरकमें जाता है ॥ १०६ ॥

यक्ष उवाच

राजन् कुलेन वृत्तेन स्वाध्यायेन श्रुतेन वा ।

ब्राह्मण्यं केन भवति प्रब्रूह्येतत् सुनिश्चितम् ॥ १०७ ॥

यक्षने पूछा — राजन्! कुल, आचार, स्वाध्याय और शास्त्रश्रवण–इनमेंसे किसके द्वारा ब्राह्मणत्व सिद्ध होता है? यह बात निश्चय करके बताओ ॥ १०७ ॥

युधिष्ठिर उवाच

शृणु यक्ष कुलं तात न स्वाध्यायो न च श्रुतम् ।

कारणं हि द्विजत्वे च वृत्तमेव न संशयः ॥ १०८ ॥

युधिष्ठिर बोले – तात यक्ष! सुनो न तो कुल ब्राह्मणत्वमें कारण है न स्वाध्याय और न शास्त्रश्रवण । ब्राह्मणत्वका हेतु आचार ही है, इसमें संशय नहीं है ॥

वृत्तं यत्नेन संरक्ष्यं ब्राह्मणेन विशेषतः ।

अक्षीणवृत्तो न क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः ॥ १० ९ ॥

इसलिये प्रयत्नपूर्वक सदाचारकी ही रक्षा करनी चाहिये । ब्राह्मणको तो उसपर विशेषरूपसे दृष्टि रखनी जरूरी है; क्योंकि जिसका सदाचार अक्षुण्ण है, उसका ब्राह्मणत्व भी बना हुआ है और जिसका आचार नष्ट हो गया, वह तो स्वयं भी नष्ट हो गया ॥ १० ९ ॥

पठकाः पाठकाश्चैव ये चान्ये शास्त्रचिन्तकाः ।

सर्वे व्यसनिनो मूर्खा यः क्रियावान् स पण्डितः ॥ ११० ॥

पृष्ठ 2104

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 2104 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पढ़नेवाले, पढ़ानेवाले तथा शास्त्रका विचार करनेवाले – ये सब तो व्यसनी और मूर्ख ही हैं । पण्डित तो वही है, जो अपने ( शास्त्रोक्त ) कर्तव्यका पालन करता है ॥ ११० ॥

चतुर्वेदोऽपि दुर्वृत्तः स शूद्रादतिरिच्यते ।

योऽग्निहोत्रपरो दान्तः स ब्राह्मण इति स्मृतः ॥ १११ ॥

चारों वेद पढ़ा होनेपर भी जो दुराचारी है, वह अधमतामें शूद्रसे भी बढ़कर है । जो ( नित्य ) अग्निहोत्रमें तत्पर और जितेन्द्रिय है, वही ' ब्राह्मण' कहा जाता है ॥ यक्षउवाच प्रियवचनवादी किं लभते विमृतिकार्यकरः किं लभते । बहुमित्रकरः किं लभते धर्मरतः किं लभते कथय ॥ ११२ ॥

यक्षने पूछा- बताओ; मधुर वचन बोलनेवालेको क्या मिलता है? सोच - विचारकर काम करनेवाला क्या पा लेता है? जो बहुत- से मित्र बना लेता है, उसे क्या लाभ होता है? और जो धर्मनिष्ठ है, उसे क्या मिलता है? ॥ ११२ ॥

युधिष्ठिरउवाच प्रियवचनवादी प्रियो भवति विमृतिकार्यकरोऽधिकं जयति । बहुमित्रकरः सुखं वसते यश्च धर्मरतः स गतिं लभते ॥ ११३ ॥

युधिष्ठिर बोले — मधुर वचन बोलनेवाला सबको प्रिय होता है, सोच - विचारकर काम करनेवालेको अधिकतर सफलता मिलती है एवं जो बहुत- से मित्र बना लेता है, वह सुखसे रहता है और जो धर्मनिष्ठ है, वह सद्गति पाता है ॥ ११३ ॥

यक्षउवाच

को मोदते किमाश्चर्यं कः पन्थाः का च वार्तिका ।

ममैतांश्चतुरः प्रश्नान् कथयित्वा जलं पिब ॥ ११४ ॥

- यक्षने पूछा – सुखी कौन है? आश्चर्य क्या है? मार्ग क्या है और वार्ता क्या है? मेरे इन चार प्रश्नोंका उत्तर देकर जल पीओ ॥ ११४ ॥

युधिष्ठिर उवाच

पञ्चमेऽहनि षष्ठे वा शाकं पचति स्वे गृहे ।

अनृणी चाप्रवासी च स वारिचर मोदते ॥ ११५ ॥

पृष्ठ 2105

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 2105 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

युधिष्ठिर बोले — जलचर यक्ष! जिस पुरुषपर ऋण नहीं है और जो परदेशमें नहीं है, वह भले ही पाँचवें या छठे दिन अपने घरके भीतर साग- पात ही पकाकर खाता हो, तो भी वही सुखी है ॥ ११५ ॥

अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम् ।

शेषाः स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम् ॥ ११६ ॥

संसारसे रोज - रोज प्राणी यमलोकमें जा रहे हैं; किंतु जो बचे हुए हैं, वे सर्वदा जीते रहनेकी इच्छा करते हैं; इससे बढ़कर आश्चर्य और क्या होगा? ॥ ११६ ॥

तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्ना नैको ऋषिर्यस्य मतं प्रमाणम् । धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः स पन्थाः ॥ ११७ ॥

तर्ककी कहीं स्थिति नहीं है, श्रुतियाँ भी भिन्न-भिन्न हैं, एक ही ऋषि नहीं है कि जिसका मत प्रमाण माना जाय तथा धर्मका तत्त्व गुहामें निहित है अर्थात् अत्यन्य गूढ़ है; अतः जिससे महापुरुष जाते रहे हैं, वही मार्ग है ॥ ११७ ॥

अस्मिन् महामोहमये कटाहे सूर्याग्निना रात्रिदिवेन्धनेन । मासर्तुदर्वीपरिघट्टनेन भूतानि कालः पचतीति वार्ता ॥ ११८ ॥

इस महामोहरूपी कड़ाहेमें भगवान् काल समस्त प्राणियोंको मास और ऋतुरूप करछीसे उलट- पलटकर सूर्यरूप अग्नि और रात-दिनरूप ईंधनके द्वारा राँध रहे हैं, यही वार्ता है ॥ ११८ ॥

यक्ष उवाच

व्याख्याता मे त्वया प्रश्ना याथातथ्यं परंतप ।

पुरुषं त्विदानीं व्याख्याहि यश्च सर्वधनी नरः ॥ ११ ९ ॥

यक्षने पूछा- परंतप! तुमने मेरे सब प्रश्नोंके उत्तर ठीक- ठीक दे दिये, अब तुम पुरुषकी भी व्याख्या कर दो और यह बताओ कि सबसे बड़ा धनी कौन है? ॥ युधिष्ठिर उवाच

दिवं स्पृशति भूमिं च शब्दः पुण्येन कर्मणा ।

यावत् स शब्दो भवति तावत् पुरुष उच्यते ॥ १२० ॥

युधिष्ठिर बोले- जिस व्यक्तिके पुण्यकर्मोंकी कीर्तिका शब्द जबतक स्वर्ग और भूमिको स्पर्श करता है, तबतक वह पुरुष कहलाता है ॥ १२० ॥

तुल्ये प्रियाप्रिये यस्य सुखदुःखे तथैव च ।

पृष्ठ 2106

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 2106 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अतीतानागते चोभे स वै सर्वधनी नरः ॥ १२१ ॥

जो मनुष्य प्रिय- अप्रिय, सुख-दुःख और भूत- भविष्यत्– इन द्वन्द्वोंमें सम है, वही सबसे बड़ा धनी है ॥ १२१ ॥

( भूतभव्यभविष्येषु निःस्पृहः शान्तमानसः । सुप्रसन्नः सदा योगी स वै सर्वधनीश्वरः ॥ ) जो भूत, वर्तमान और भविष्य सभी विषयोंकी ओरसे निःस्पृह, शान्तचित्त, सुप्रसन्न और सदा योगयुक्त है, वही सब धनियोंका स्वामी है ॥ यक्ष उवाच

व्याख्यातः पुरुषो राजन् यश्च सर्वधनी नरः ।

तस्मात् त्वमेकं भ्रातॄणां यमिच्छसि स जीवतु ॥ १२२ ॥

यक्षने कहा- राजन्! जो सबसे बढ़कर धनी पुरुष है, उसकी तुमने ठीक- ठीक व्याख्या कर दी; इसलिये अपने भाइयोंमेंसे जिस एकको तुम चाहो, वही जीवित हो सकता है ॥ १२२ ॥

युधिष्ठिर उवाच

श्यामो य एष रक्ताक्षो बृहच्छाल इवोत्थितः ।

व्यूढोरस्को महाबाहुर्नकुलो यक्ष जीवतु ॥ १२३ ॥

युधिष्ठिर बोले- यक्ष! यह जो श्यामवर्ण, अरुणनयन, सुविशाल शालवृक्षके समान ऊँचा और चौड़ी छातीवाला महाबाहु नकुल है, वही जीवित हो जाय ॥ १२३ ॥

यक्षउवाच

प्रियस्ते भीमसेनोऽयमर्जुनो वः परायणम् ।

स कस्मान्नकुलं राजन् सापत्नं जीवमिच्छसि ॥ १२४ ॥

यक्षने कहा — राजन्! यह तुम्हारा प्रिय भीमसेन है और यह तुमलोगोंका सबसे बड़ा सहारा अर्जुन है; इन्हें छोड़कर तुम किसलिये सौतेले भाई नकुलको जिलाना चाहते हो? ॥ १२४ ॥

यस्य नागसहस्रेण दशसंख्येन वै बलम् ।

तुल्यं तं भीममुत्सृज्य नकुलं जीवमिच्छसि ॥ १२५ ॥

जिसमें दस हजार हाथियोंके समान बल है, उस भीमको छोड़कर तुम नकुलको ही क्यों जिलाना चाहते हो? ॥ १२५ ॥

तथैनं मनुजाः प्राहुर्भीमसेनं प्रियं तव ।

अथ केनानुभावेन सापत्नं जीवमिच्छसि ॥ १२६ ॥

पृष्ठ 2107

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 2107 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सभी मनुष्य भीमसेनको तुम्हारा प्रिय बतलाते हैं; उसे छोड़कर भला सौतेले भाई नकुलमें तुम कौन- सा सामर्थ्य देखकर उसे जिलाना चाहते हो? ॥ १२६ ॥

यस्य बाहुबलं सर्वे पाण्डवाः समुपासते ।

अर्जुनं तमपाहाय नकुलं जीवमिच्छसि ॥ १२७ ॥

जिसके बाहुबलका सभी पाण्डवोंको पूरा भरोसा है, उस अर्जुनको भी छोड़कर तुम्हें नकुलको जिला देनेकी इच्छा क्यों है? ॥ १२७ ॥

युधिष्ठिर उवाच

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ।

तस्माद् धर्मं न त्यजामि मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥ १२८ ॥

युधिष्ठिर बोले- यदि धर्मका नाश किया जाय, तो वह नष्ट हुआ धर्म ही कर्ताको भी नष्ट कर देता है और यदि उसकी रक्षा की जाय, तो वही कर्ताकी भी रक्षा कर लेता है । इसीसे मैं धर्मका त्याग नहीं करता कि कहीं नष्ट होकर वह धर्म मेरा ही नाश न कर दे ॥ १२८ ॥

आनृशंस्यं परो धर्मः परमार्थाच्च मे मतम् ।

आनृशंस्यं चिकीर्षामि नकुलो यक्ष जीवतु ॥ १२ ९ ॥

यक्ष! मेरा ऐसा विचार है कि वस्तुतः अनृशंसता ( दया तथा समता ) ही परम धर्म है । यही सोचकर मैं सबके प्रति दया और समानभाव रखना चाहता हूँ; इसलिये नकुल ही जीवित हो जाय ॥ १२ ९ ॥

धर्मशीलः सदा राजा इति मां मानवा विदुः ।

स्वधर्मान्न चलिष्यामि नकुलो यक्ष जीवतु ॥ १३० ॥

यक्ष! लोग मेरे विषयमें ऐसा समझते हैं कि राजा युधिष्ठिर धर्मात्मा हैं; अतएव मैं अपने

धर्मसे विचलित नहीं होऊँगा । मेरा भाई नकुल जीवित हो जाय ॥ १३० ॥

कुन्ती चैव तु माद्री च द्वे भार्ये तु पितुर्मम ।

उभे सपुत्रे स्यातां वै इति मे धीयते मतिः ॥ १३१ ॥

मेरे पिता कुन्ती और माद्री नामकी दो भार्याएँ रहीं । वे दोनों ही पुत्रवती बनी रहें, ऐसा मेरा विचार है ॥ १३१ ॥

यथा कुन्ती तथा माद्री विशेषो नास्ति मे तयोः ।

मातृभ्यां सममिच्छामि नकुलो यक्ष जीवतु ॥ १३२ ॥

यक्ष! मेरे लिये जैसी कुन्ती है, वैसी ही माद्री । उन दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है । मैं दोनों

माताओंके प्रति समानभाव ही रखना चाहता हूँ । इसलिये नकुल ही जीवित हो ॥ १३२ ॥

यक्षउवाच तस्य तेऽर्थाच्च कामाच्च आनृशंस्यं परं मतम् ।

पृष्ठ 2108

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 2108 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तस्मात् ते भ्रातरः सर्वे जीवन्तु भरतर्षभ ॥ १३३ ॥

यक्षने कहा — भरतश्रेष्ठ! तुमने अर्थ और कामसे भी अधिक दया और समताका आदर किया है, इसलिये तुम्हारे सभी भाई जीवित हो जायँ ॥ १३३ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि आरणेयपर्वणि यक्षप्रश्नने त्रयोदशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३१३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत आरणेयपर्वमें यक्षप्रश्नविषयक तीन सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१३ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १३४ श्लोक हैं । ) • धर्मानुकूल प्राप्त भार्यासे धर्मका विरोध नहीं होता एवं वह पातिव्रत्यधर्मका पालन करनेवाली हो, तो धर्मसे उसका विरोध नहीं होता । इस प्रकार धर्मानुसार प्राप्त पातिव्रत्यधर्मका पालन करनेवाली स्त्री और धर्म दोनों जिसके अनुकूल हो जाते हैं, वह धर्मात्मा गृहस्थ कभी दरिद्र नहीं होता । इसलिये उसके घरमें धर्म, अर्थ और काम तीनों बिना विरोधके एक साथ रह सकते

पृष्ठ 2109

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 2109 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

चतुर्दशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः यक्षका चारों भाइयोंको जिलाकर धर्मके रूपमें प्रकट हो युधिष्ठिरको वरदान देना वैशम्पायन उवाच

ततस्ते यक्षवचनादुदतिष्ठन्त पाण्डवाः ।

क्षुत्पिपासे च सर्वेषां क्षणेन व्यपगच्छताम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर यक्षके कहते ही सब पाण्डव उठकर खड़े हो गये तथा एक क्षणमें ही उन सबकी भूख- प्यास जाती रही ॥ १ ॥

युधिष्ठिर उवाच

सरस्येकेन पादेन तिष्ठन्तमपराजितम् ।

पृच्छामि को भवान् देवो न मे यक्षो मतो भवान् ॥ २ ॥

युधिष्ठिर बोले- इस सरोवरमें एक पैरसे खड़े हुए, किसीसे भी पराजित न होनेवाले आपसे मैं पूछता हूँ — आप कौन देवश्रेष्ठ हैं? मुझे तो आप यक्ष नहीं मालूम होते ॥ २ ॥

वसूनां वा भवानेको रुद्राणामथवा भवान् ।

अथवा मरुतां श्रेष्ठो वज्री वा त्रिदशेश्वरः ॥ ३ ॥

आप वसुओंमेंसे, रुद्रोंमेंसे अथवा मरुद्गणोंमेंसे कोई एक श्रेष्ठ पुरुष तो नहीं हैं? अथवा आप स्वयं वज्रधारी देवराज इन्द्र ही हैं? ॥ ३ ॥

मम हि भ्रातर इमे सहस्रशतयोधिनः ।

तं योधं न प्रपश्यामि येन सर्वे निपातिताः ॥ ४ ॥

मेरे ये भाई तो लाखों वीरोंसे युद्ध करनेवाले हैं। ऐसा तो मैंने कोई योद्धा नहीं देखा, जिसने इन सभीको रणभूमिमें गिरा दिया हो ॥ ४ ॥

सुखं प्रतिप्रबुद्धानामिन्द्रियाण्युपलक्षये ।

स भवान् सुहृदोऽस्माकमथवा नः पिता भवान् ॥ ५ ॥

अब जीवित होनेपर भी इनकी इन्द्रियाँ सुखकी नींद सोकर उठे हुए पुरुषोंके समान स्वस्थ दिखायी देती हैं, अतः आप हमारे कोई सुहृद् हैं अथवा पिता? ॥ ५ ॥

यक्षउवाच

अहं ते जनकस्तात धर्मोऽमृदुपराक्रम ।

त्वां दिदृक्षुरनुप्राप्तो विद्धि मां भरतर्षभ ॥ ६ ॥

यक्षने कहा — प्रचण्ड पराक्रमी भरतश्रेष्ठ तात! युधिष्ठिर! मैं तुम्हारा जन्मदाता पिता धर्मराज हूँ । तुम्हें देखनेकी इच्छासे ही मैं यहाँ आया हूँ, मुझे पहचानो ॥ ६ ॥

पृष्ठ 2110

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 2110 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

यशः सत्यं दमः शौचमार्जवं ह्रीरचापलम् ।

दानं तपो ब्रह्मचर्यमित्येतास्तनवो मम ॥ ७ ॥

यश, सत्य, दम, शौच, सरलता, लज्जा, अचंचलता, दान, तप और ब्रह्मचर्य — ये सब मेरे शरीर हैं ॥ ७ ॥

अहिंसा समता शान्तिरानृशंस्यममत्सरः ।

द्वाराण्येतानि मे विद्धि प्रियो ह्यसि सदा मम ॥ ८ ॥

अहिंसा, समता, शान्ति, दया और अमत्सर- डाहका न होना–इन्हें मेरे पास

पहुँचनेके द्वार समझो । तुम मुझे सदा प्रिय हो ॥ ८ ॥

दिष्ट्या पञ्चसु रक्तोऽसि दिष्ट्या ते षट्पदी जिता ।

द्वे पूर्वे मध्यमे द्वे च द्वे चान्ते साम्परायिके ॥ ९ ॥

- सौभाग्यवश तुम्हारा शम, दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान –इन पाँचों साधनोंपर अनुराग है तथा सौभाग्यसे तुमने भूख- प्यास, शोक - मोह और जरा - मृत्यु – इन छहों दोषोंको जीत लिया है । इनमेंसे पहले दो दोष आरम्भसे ही रहते हैं, बीचके दो तरुणावस्था आनेपर होते हैं तथा बादवाले दो दोष अन्तिम समयपर आते हैं ॥ ९ ॥

धर्मोऽहमिति भद्रं ते जिज्ञासुस्त्वामिहागतः ।

आनृशंस्येन तुष्टोऽस्मि वरं दास्यामि तेऽनघ ॥ १० ॥

तुम्हारा मंगल हो । मैं धर्म हूँ और तुम्हारा व्यवहार जाननेकी इच्छासे ही यहाँ आया हूँ । निष्पाप राजन्! तुम्हारी दयालुता और समदर्शितासे मैं तुमपर प्रसन्न हूँ और तुम्हें वर देना चाहता हूँ ॥ १० ॥

वरं वृणीष्व राजेन्द्र दाता ह्यस्मि तवानघ ।

ये हि मे पुरुषा भक्ता न तेषामस्ति दुर्गतिः ॥ ११ ॥

पापरहित राजेन्द्र! तुम मनोऽनुकूल वर माँग लो। मैं तुम्हें अवश्य दे दूँगा । जो मनुष्य मेरे भक्त हैं, उनकी कभी दुर्गति नहीं होती ॥ ११ ॥

युधिष्ठिर उवाच

अरणीसहितं यस्य मृगो ह्यादाय गच्छति ।

तस्याग्नयो न लुप्येरन् प्रथमोऽस्तु वरो मम ॥ १२ ॥

युधिष्ठिर बोले — भगवन्! पहला वर तो मैं यही माँगता हूँ कि जिस ब्राह्मणके अरणीसहित मन्थन- काष्ठको मृग लेकर भाग गया है, उसके अग्निहोत्रका लोप न हो ॥ १२ ॥

यक्ष उवाच

अरणीसहितं ह्यस्य ब्राह्मणस्य हृतं मया ।

मृगवेषेण कौन्तेय जिज्ञासार्थं तव प्रभो ॥ १३ ॥