श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 2091–2100

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2091–2100

पृष्ठ 2091

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यक्षोऽहमस्मि भद्रं ते नास्मि पक्षी जलेचरः ॥ ३६ ॥

मयैते निहताः सर्वे भ्रातरस्ते महौजसः । यक्षने कहा — तुम्हारा कल्याण हो । मैं जलचर पक्षी नहीं हूँ, यक्ष हूँ । तुम्हारे ये सभी महान् तेजस्वी भाई मेरे द्वारा ही मारे गये हैं ॥ ३६३ ॥

वैशम्पायन उवाच ततस्तामशिवां श्रुत्वा वाचं स परुषाक्षराम् ॥ ३७ ॥

यक्षस्य ब्रुवतो राजन्नुपक्रम्य तदा स्थितः ।

विरूपाक्षं महाकायं यक्षं तालसमुच्छ्रयम् ॥ ३८ ॥

ज्वलनार्कप्रतीकाशमधृष्यं पर्वतोपमम् ।

वृक्षमाश्रित्य तिष्ठन्तं ददर्श भरतर्षभः ॥ ३ ९ ॥

मेघगम्भीरनादेन तर्जयन्तं महास्वनम् । वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! तत्पश्चात् उस समय इस प्रकार बोलनेवाले उस यक्षकी वह अमंगलमयी और कठोर वाणी सुनकर भरतश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर उसके पास जाकर खड़े हो गये । उन्होंने देखा, एक विकट नेत्रोंवाला विशालकाय यक्ष वृक्षके ऊपर बैठा है । वह बड़ा ही दुर्धर्ष, ताड़के समान लंबा, अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी तथा पर्वतके

समान ऊँचा है । वही अपनी मेघके समान गम्भीर नादयुक्त वाणीसे उन्हें फटकार रहा है ।

उसकी आवाज बहुत ऊँची है ॥

यक्ष उवाच इमे ते भ्रातरो राजन् वार्यमाणा मयासकृत् ॥ ४० ॥

बलात् तोयं जिहीर्षन्तस्ततो वै मृदिता मया ।

न पेयमुदकं राजन् प्राणानिह परीप्सता ॥ ४१ ॥

पार्थ मा साहसं कार्षीर्मम पूर्वपरिग्रहः ।

प्रश्नानुक्त्वा तु कौन्तेय ततः पिब हरस्व च ॥ ४२ ॥

यक्षने कहा- राजन्! तुम्हारे इन भाइयोंको मैंने बार- बार रोका था; फिर भी ये बलपूर्वक जल ले जाना चाहते थे; इसीसे मैंने इन्हें मार डाला । महाराज युधिष्ठिर! यदि तुम्हें अपने प्राण बचानेकी इच्छा हो, तो वहाँ जल नहीं पीना चाहिये । पार्थ! तुम पानी पीनेका साहस न करना, यह पहलेसे ही मेरे अधिकारकी वस्तु है । कुन्तीनन्दन! पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दो, उसके बाद जल पीओ और ले भी जाओ ॥ ४०–४२ ॥ युधिष्ठिर उवाच

न चाहं कामये यक्ष तव पूर्वपरिग्रहम् ।

कामं नैतत् प्रशंसन्ति सन्तो हि पुरुषाः सदा ॥ ४३ ॥

पृष्ठ 2092

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यदात्मना स्वमात्मानं प्रशंसे पुरुषर्षभ ।

यथाप्रज्ञं तु ते प्रश्नान् प्रतिवक्ष्यामि पृच्छ माम् ॥ ४४ ॥

युधिष्ठिरने कहा— यक्ष! मैं तुम्हारे अधिकारकी वस्तुको नहीं ले जाना चाहता । मैं स्वयं ही अपनी बड़ाई करूँ; इस बातकी सत्पुरुष कभी प्रशंसा नहीं करते । मैं अपनी बुद्धिके अनुसार तुम्हारे प्रश्नोंका उत्तर दूँगा, तुम मुझसे प्रश्न करो ॥ ४३-४४ ॥ यक्ष उवाच

किं स्विदादित्यमुन्नयति के च तस्याभितश्चराः ।

कश्चैनमस्तं नयति कस्मिंश्च प्रतितिष्ठति ॥ ४५ ॥

यक्षने पूछा- सूर्यको कौन ऊपर उठाता ( उदित करता ) है? उसके चारों ओर कौन चलते हैं? उसे अस्त कौन करता है? और वह किसमें प्रतिष्ठित है? ॥ ४५ ॥

युधिष्ठिर उवाच

ब्रह्मादित्यमुन्नयति देवास्तस्याभितश्चराः ।

धर्मश्चास्तं नयति च सत्ये च प्रतितिष्ठति ॥ ४६ ॥

युधिष्ठिर बोले- ब्रह्म सूर्यको ऊपर उठाता ( उदित करता ) है, देवता उसके चारों ओर चलते हैं, धर्म उसे अस्त करता है और वह सत्यमें प्रतिष्ठित है ॥ ४६ ॥

यक्ष उवाच

केनस्विच्छ्रोत्रियो भवति केनस्विद् विन्दते महत् ।

केनस्विद् द्वितीयवान् भवति राजन् केन च बुद्धिमान् ॥ ४७ ॥

यक्षने पूछा— राजन्! मनुष्य श्रोत्रिय किससे होता है? महत्पदको किसके द्वारा प्राप्त करता है? वह किसके द्वारा द्वितीयवान् होता है? और किससे बुद्धिमान् होता है? ॥ ४७ ॥

युधिष्ठिर उवाच

श्रुतेन श्रोत्रियो भवति तपसा विन्दते महत् ।

धृत्या द्वितीयवान् भवति बुद्धिमान् वृद्धसेवया ॥ ४८ ॥

युधिष्ठिर बोले – वेदाध्ययनके द्वारा मनुष्य श्रोत्रिय होता है, तपसे महत्पद प्राप्त करता है, धैर्यसे द्वितीयवान् ( दूसरे साथीसे युक्त ) होता है और वृद्ध पुरुषोंकी सेवासे बुद्धिमान् होता है ॥ ४८ ॥

यक्ष उवाच

किं ब्राह्मणानां देवत्वं कश्च धर्मः सतामिव ।

कश्चैषां मानुषो भावः किमेषामसतामिव ॥ ४ ९ ॥

पृष्ठ 2093

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यक्षने पूछा —ब्राह्मणोंमें देवत्व क्या है? उनमें सत्पुरुषोंका - सा धर्म क्या है? उनका मनुष्यभाव क्या है? और उनमें असत्पुरुषोंका- सा आचरण क्या है? ॥ ४ ९ ॥ युधिष्ठिरउवाच

स्वाध्याय एषां देवत्वं तप एषां सतामिव ।

मरणं मानुषो भावः परिवादोऽसतामिव ॥ ५० ॥

युधिष्ठिर बोले- वेदोंका स्वाध्याय ही ब्राह्मणोंमें देवत्व है, तप सत्पुरुषोंका- सा धर्म है, मरना मनुष्य- भाव है और निन्दा करना असत्पुरुषोंका- सा आचरण है ॥ ५० ॥

यक्ष उवाच

किं क्षत्रियाणां देवत्वं कश्च धर्मः सतामिव ।

कश्चैषां मानुषो भावः किमेषामसतामिव ॥ ५१ ॥

यक्षने पूछा — क्षत्रियोंमें देवत्व क्या है? उनमें सत्पुरुषोंका- सा धर्म क्या है? उनका मनुष्यभाव क्या है? और उनमें असत्पुरुषोंका - सा आचरण क्या है? ॥ ५१ ॥

युधिष्ठिर उवाच

इष्वस्त्रमेषां देवत्वं यज्ञ एषां सतामिव ।

भयं वै मानुषो भावः परित्यागोऽसतामिव ॥ ५२ ॥

युधिष्ठिर बोले- बाणविद्या क्षत्रियोंका देवत्व है, यज्ञ उनका सत्पुरुषोंका - सा धर्म है, भय मानवीय भाव है और शरणमें आये हुए दुःखियोंका परित्याग कर देना उनमें असत्पुरुषोंका- सा आचरण है ॥ ५२ ॥

यक्षउवाच

किमेकं यज्ञियं साम किमेकं यज्ञियं यजुः ।

का चैषां वृणुते यज्ञं कां यज्ञो नातिवर्तते ॥ ५३ ॥

यक्षने पूछा- कौन एक वस्तु यज्ञिय साम है? कौन एक ( यज्ञसम्बन्धी ) यज्ञिय यजु है? कौन एक वस्तु यज्ञका वरण करती है? और किस एकका यज्ञ अतिक्रमण नहीं करता? ॥ ५३ ॥

युधिष्ठिर उवाच

प्राणो वै यज्ञियं साम मनो वै यज्ञियं यजुः ।

ऋगेका वृणुते यज्ञं तां यज्ञो नातिवर्तते ॥ ५४ ॥

युधिष्ठिर बोले- प्राण ही यज्ञिय साम है, मन ही यज्ञसम्बन्धी यजु है, एकमात्र ऋचा ही यज्ञका वरण करती है और उसीका यज्ञ अतिक्रमण नहीं करता ॥ ५४ ॥

यक्ष उवाच

पृष्ठ 2094

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किंस्विदावपतां श्रेष्ठं किंस्विन्निवपतां वरम् ।

किंस्वित् प्रतिष्ठमानानां किंस्वित् प्रसवतां वरम् ॥ ५५ ॥

यक्षने पूछा — खेती करनेवालोंके लिये कौन - सी वस्तु श्रेष्ठ है? बिखेरने ( बोने ) वालोंके लिये क्या श्रेष्ठ है? प्रतिष्ठाप्राप्त धनियोंके लिये कौन- सी वस्तु श्रेष्ठ है? तथा संतानोत्पादन करनेवालोंके लिये क्या श्रेष्ठ है? ॥ युधिष्ठिर उवाच

वर्षमावपतां श्रेष्ठं बीजं निवपतां वरम् ।

गावः प्रतिष्ठमानानां पुत्रः प्रसवतां वरः ॥ ५६ ॥

युधिष्ठिर बोले- खेती करनेवालोंके लिये वर्षा श्रेष्ठ है । बिखेरने ( बोने ) वालोंके लिये बीज श्रेष्ठ है । प्रतिष्ठाप्राप्त धनियोंके लिये गौ ( का पालन-पोषण और संग्रह ) श्रेष्ठ है और संतानोत्पादन करनेवालोंके लिये पुत्र श्रेष्ठ है ॥ ५६ ॥

यक्षउवाच

इन्द्रियार्थाननुभवन् बुद्धिमाँल्लोकपूजितः ।

सम्मतः सर्वभूतानामुच्छ्वसन् को न जीवति ॥ ५७ ॥

यक्षने पूछा- ऐसा कौन पुरुष है, जो बुद्धिमान्, लोकमें सम्मानित और सब प्राणियोंका माननीय होकर एवं इन्द्रियोंके विषयोंको अनुभव करते तथा श्वास लेते हुए भी वास्तवमें जीवित नहीं है? ॥ ५७ ॥

युधिष्ठिरउवाच

देवतातिथिभृत्यानां पितॄणामात्मनश्च यः ।

न निर्वपति पञ्चानामुच्छ्वसन् न स जीवति ॥ ५८ ॥

युधिष्ठिरने कहा — जो देवता, अतिथि, भरणीय कुटुम्बीजन, पितर और आत्मा —इन पाँचोंका पोषण नहीं करता, वह श्वास लेनेपर भी जीवित नहीं है ॥ यक्षउवाच

किंस्विद् गुरुतरं भूमेः किंस्विदुच्चतरं च खात् ।

किंस्विच्छीघ्रतरं वायोः किंस्विद् बहुतरं तृणात् ॥ ५ ९ ॥

यक्षने पूछा — पृथ्वीसे भी भारी क्या है? आकाशसे भी ऊँचा क्या है? वायुसे भी तेज चलनेवाला क्या है? और तिनकोंसे भी अधिक ( असंख्य) क्या है? ॥ ५ ९ ॥ युधिष्ठिरउवाच

माता गुरुतरा भूमेः खात् पितोच्चतरस्तथा ।

मनः शीघ्रतरं वाताच्चिन्ता बहुतरी तृणात् ॥ ६० ॥

पृष्ठ 2095

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युधिष्ठिर बोले- माताका गौरव पृथ्वीसे भी अधिक है । पिता आकाशसे भी ऊँचा है । मन वायुसे भी तेज चलनेवाला है और चिन्ता तिनकोंसे भी अधिक असंख्य एवं अनन्त है ॥ ६० ॥

यक्षउवाच

किंस्वित् सुप्तं न निमिषति किंस्विज्जातं न चोपति ।

कस्यस्विद्धृदयं नास्ति किंस्विद् वेगेन वर्धते ॥ ६१ ॥

यक्षने पूछा- कौन सोनेपर भी आँखें नहीं मूँदता? उत्पन्न होकर भी कौन चेष्टा नहीं करता? किसमें हृदय नहीं है? और कौन वेगसे बढ़ता है ॥ ६१ ॥

युधिष्ठिर उवाच

मत्स्यः सुप्तो न निमिषत्यण्डं जातं न चोपति ।

अश्मनो हृदयं नास्ति नदी वेगेन वर्धते ॥ ६२ ॥

युधिष्ठिर बोले- मछली सोनेपर भी आँखें नहीं मूँदती, अण्डा उत्पन्न होकर भी चेष्टा नहीं करता, पत्थरमें हृदय नहीं है और नदी वेगसे बढ़ती है ॥ ६२ ॥

यक्ष उवाच

किंस्वित् प्रवसतो मित्रं किंस्विन्मित्रं गृहे सतः ।

आतुरस्य च किं मित्रं किंस्विन्मित्रं मरिष्यतः ॥ ६३ ॥

यक्षने पूछा- प्रवासी ( परदेशके यात्री ) - का मित्र कौन है? गृहवासी ( गृहस्थ) - का मित्र कौन है? रोगीका मित्र कौन है? और मृत्युके समीप पहुँचे हुए पुरुषका मित्र कौन है? ॥ ६३ ॥

युधिष्ठिरउवाच

सार्थः प्रवसतो मित्रं भार्या मित्रं गृहे सतः ।

आतुरस्य भिषमित्रं दानं मित्रं मरिष्यतः ॥ ६४ ॥

युधिष्ठिर बोले— सहयात्रियोंका समुदाय अथवा साथमें यात्रा करनेवाला साथी ही प्रवासीका मित्र है, पत्नी गृहवासीका मित्र है, वैद्य रोगीका मित्र है और दान मुमूर्षु ( अर्थात् मरनेवाले ) मनुष्यका मित्र है ॥ ६४ ॥

यक्षउवाच

कोऽतिथिः सर्वभूतानां किंस्विद् धर्मं सनातनम् ।

अमृतं किंस्विद् राजेन्द्र किंस्वित् सर्वमिदं जगत् ॥ ६५ ॥

यक्षने पूछा- राजेन्द्र! समस्त प्राणियोंका अतिथि कौन है? सनातन धर्म क्या है? अमृत क्या है? और यह सारा जगत् क्या है? ॥ ६५ ॥

पृष्ठ 2096

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युधिष्ठिर उवाच

अतिथिः सर्वभूतानामग्निः सोमो गवामृतम् ।

सनातनोऽमृतो धर्मो वायुः सर्वमिदं जगत् ॥ ६६ ॥

युधिष्ठिर बोले – अग्नि समस्त प्राणियोंका अतिथि है, गौका दूध अमृत है, अविनाशी नित्य धर्म ही सनातन धर्म है और वायु यह सारा जगत् है ॥ ६६ ॥

यक्ष उवाच

किंस्विदेको विचरते जातः को जायते पुनः ।

किंस्विद्धिमस्य भैषज्यं किंस्विदावपनं महत् ॥ ६७ ॥

यक्षने पूछा — अकेला कौन विचरता है? एक बार उत्पन्न होकर पुनः कौन उत्पन्न होता है? शीतकी ओषधि क्या है? और महान् आवपन ( क्षेत्र) क्या है? ॥ युधिष्ठिर उवाच

सूर्य एको विचरते चन्द्रमा जायते पुनः ।

अग्निर्हिमस्य भैषज्यं भूमिरावपनं महत् ॥ ६८ ॥

युधिष्ठिर बोले — सूर्य अकेला विचरता है, चन्द्रमा एक बार जन्म लेकर पुनः जन्म लेता है, अग्नि शीतकी ओषधि है और पृथ्वी बड़ा भारी आवपन है ॥ ६८ ॥

यक्षउवाच

किंस्विदेकपदं धर्म्यं किंस्विदेकपदं यशः ।

किंस्विदेकपदं स्वर्ग्यं किंस्विदेकपदं सुखम् ॥ ६ ९ ॥

यक्षने पूछा — धर्मका मुख्य स्थान क्या है? यशका मुख्य स्थान क्या है? स्वर्गका मुख्य स्थान क्या है? और सुखका मुख्य स्थान क्या है? ॥ ६ ९ ॥ युधिष्ठिरउवाच

दाक्ष्यमेकपदं धर्म्यं दानमेकपदं यशः ।

सत्यमेकपदं स्वर्ग्यं शीलमेकपदं सुखम् ॥ ७० ॥

युधिष्ठिर बोले — धर्मका मुख्य स्थान दक्षता है, यशका मुख्य स्थान दान है, स्वर्गका मुख्य स्थान सत्य है और सुखका मुख्य स्थान शील है ॥ ७० ॥

यक्षउवाच

किंस्विदात्मा मनुष्यस्य किंस्विद् दैवकृतः सखा ।

उपजीवनं किंस्विदस्य किंस्विदस्य परायणम् ॥ ७१ ॥

यक्षने पूछा- मनुष्यकी आत्मा क्या है? इसका दैवकृत सखा कौन है? इसका उपजीवन ( जीवनका सहारा ) क्या है? और इसका परम आश्रय क्या है? ॥

पृष्ठ 2097

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युधिष्ठिरउवाच

पुत्र आत्मा मनुष्यस्य भार्या दैवकृतः सखा ।

उपजीवनं च पर्जन्यो दानमस्य परायणम् ॥ ७२ ॥

युधिष्ठिर बोले – पुत्र मनुष्यकी आत्मा है, स्त्री इसकी दैवकृत सहचरी है, मेघ उपजीवन है और दान इसका परम आश्रय है ॥ ७२ ॥

यक्ष उवाच

धन्यानामुत्तमं किंस्विद् धनानां स्यात् किमुत्तमम् ।

लाभानामुत्तमं किं स्यात् सुखानां स्यात् किमुत्तमम् ॥ ७३ ॥

यक्षने पूछा — धन्यवादके योग्य पुरुषोंमें उत्तम गुण क्या है? धनोंमें उत्तम धन क्या है? लाभोंमें प्रधान लाभ क्या है? और सुखोंमें उत्तम सुख क्या है? ॥ ७३ ॥

युधिष्ठिर उवाच

धन्यानामुत्तमं दाक्ष्यं धनानामुत्तमं श्रुतम् ।

लाभानां श्रेय आरोग्यं सुखानां तुष्टिरुत्तमा ॥ ७४ ॥

युधिष्ठिर बोले- धन्य पुरुषोंमें दक्षता ही उत्तम गुण है, धनोंमें शास्त्रज्ञान प्रधान है, लाभोंमें आरोग्य श्रेष्ठ है और सुखोंमें संतोष ही उत्तम सुख है ॥ ७४ ॥

यक्ष उवाच

कश्च धर्मः परो लोके कश्च धर्मः सदाफलः ।

किं नयम्य न शोचन्ति कैश्च संधिर्न जीर्यते ॥ ७५ ॥

यक्षने पूछा - लोकमें श्रेष्ठ धर्म क्या है? नित्य फलवाला धर्म क्या है? किसको वशमें रखनेसे मनुष्य शोक नहीं करते? और किनके साथ की हुई मित्रता नष्ट नहीं होती? ॥ ७५ ॥

युधिष्ठिर उवाच

आनृशंस्यं परो धर्मस्त्रयीधर्मः सदाफलः ।

मनो यम्य न शोचन्ति संधिः सद्भिर्न जीर्यते ॥ ७६ ॥

युधिष्ठिर बोले- लोकमें दया श्रेष्ठ धर्म है, वेदोक्त धर्म नित्य फलवाला है, मनको वशमें रखनेसे मनुष्य शोक नहीं करते और सत्पुरुषोंके साथ की हुई मित्रता नष्ट नहीं होती ॥ ७६ ॥

यक्षउवाच किं नु हित्वा प्रियो भवति किं नु हित्वा न शोचति ।

पृष्ठ 2098

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किं नु हित्वार्थवान् भवति किं नु हित्वा सुखी भवेत् ॥ ७७ ॥

यक्षने पूछा- किस वस्तुको त्यागकर मनुष्य प्रिय होता है? किसको त्यागकर शोक नहीं करता? किसको त्यागकर वह अर्थवान् होता है? और किसको त्यागकर सुखी होता है? ॥ ७७ ॥

युधिष्ठिरउवाच मानं हित्वा प्रियो भवति क्रोधं हित्वा न शोचति । कामं हित्वार्थवान् भवति लोभं हित्वा सुखी भवेत् ॥ ७८ ॥

युधिष्ठिर बोले — मानको त्याग देनेपर मनुष्य प्रिय होता है, क्रोधको त्यागकर शोक नहीं करता, कामको त्यागकर वह अर्थवान् होता है और लोभको त्यागकर सुखी होता ॥ ७८ ॥

यक्ष उवाच

किमर्थं ब्राह्मणे दानं किमर्थं नटनर्तके ।

किमर्थं चैव भृत्येषु किमर्थं चैव राजसु ॥ ७ ९ ॥

यक्षने पूछा— ब्राह्मणको किसलिये दान दिया जाता है? नट और नर्तकोंको क्यों दान देते हैं? सेवकोंको दान देनेका क्या प्रयोजन है? और राजाओंको क्यों दान दिया जाता है? ॥ ७९ ॥

युधिष्ठिर उवाच

धर्मार्थं ब्राह्मणे दानं यशोऽर्थं नटनर्तके ।

भृत्येषु भरणार्थं वै भयार्थं चैव राजसु ॥ ८० ॥

युधिष्ठिर बोले- ब्राह्मणको धर्मके लिये दान दिया जाता है, नट- नर्तकोंको यशके लिये दान ( धन ) देते हैं, सेवकोंको उनके भरण- पोषणके लिये दान ( वेतन ) दिया जाता है और राजाओंको भयके कारण दान ( कर ) देते हैं ॥ ८० ॥

यक्षउवाच

केनस्विदावृतो लोकः केनस्विन्न प्रकाशते ।

केन त्यजति मित्राणि केन स्वर्गं न गच्छति ॥ ८१ ॥

यक्षने पूछा — जगत् किस वस्तुसे ढका हुआ है? किसके कारण वह प्रकाशित नहीं होता? मनुष्य मित्रोंको किसलिये त्याग देता है? और स्वर्गमें किस कारण नहीं जाता? ॥ ८१ ॥

पृष्ठ 2099

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 2099 का मूल पृष्ठ
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युधिष्ठिर उवाच

अज्ञानेनावृतो लोकस्तमसा न प्रकाशते ।

लोभात् त्यजति मित्राणि संगात् स्वर्गं न गच्छति ॥ ८२ ॥

युधिष्ठिर बोले — जगत् अज्ञानसे ढका हुआ है, तमोगुणके कारण वह प्रकाशित नहीं होता, लोभके कारण मनुष्य मित्रोंको त्याग देता है और आसक्तिके कारण स्वर्गमें नहीं जाता ॥ ८२ ॥

यक्ष उवाच

मृतः कथं स्यात् पुरुषः कथं राष्ट्रं मृतं भवेत् ।

श्राद्धं मृतं कथं वा स्यात् कथं यज्ञो मृतो भवेत् ॥ ८३ ॥

यक्षने पूछा - पुरुष किस प्रकार मरा हुआ कहा जाता है? राष्ट्र किस प्रकार मर जाता है? श्राद्ध किस प्रकार मृत हो जाता है? और यज्ञ कैसे नष्ट हो जाता है? ॥ युधिष्ठिर उवाच

मृतो दरिद्रः पुरुषो मृतं राष्ट्रमराजकम् ।

मृतमश्रोत्रियं श्राद्धं मृतो यज्ञस्त्वदक्षिणः ॥ ८४ ॥

युधिष्ठिर बोले- दरिद्र पुरुष मरा हुआ है यानी मरे हुएके समान है, बिना राजाका राज्य मर जाता है यानी नष्ट हो जाता है, श्रोत्रिय ब्राह्मणके बिना श्राद्ध मृत हो जाता है और बिना दक्षिणाका यज्ञ नष्ट हो जाता है ॥ यक्षउवाच

का दिक् किमुदकं प्रोक्तं किमन्नं किं च वै विषम् ।

श्राद्धस्य कालमाख्याहि ततः पिब हरस्व च ॥ ८५ ॥

यक्षने पूछा - दिशा क्या है? जल क्या है? अन्न क्या है? विष क्या है? और श्राद्धका

समय क्या है? यह बताओ । इसके बाद जल पीओ और ले भी जाओ ॥ ८५ ॥

युधिष्ठिर उवाच

सन्तो दिग् जलमाकाशं गौरन्नं प्रार्थना विषम् ।

श्राद्धस्य ब्राह्मणः कालः कथं वा यक्ष मन्यसे ॥ ८६ ॥

युधिष्ठिर बोले — सत्पुरुष दिशा हैं, आकाश जल है, पृथ्वी अन्न है, प्रार्थना ( कामना) विष है और ब्राह्मण ही श्राद्धका समय है अथवा यक्ष! इस विषयमें तुम्हारी क्या मान्यता है? ॥ ८६ ॥

यक्षउवाच तपः किं लक्षणं प्रोक्तं को दमश्च प्रकीर्तितः ।

पृष्ठ 2100

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क्षमा च का परा प्रोक्ता का च ह्रीः परिकीर्तिता ॥ ८७ ॥

यक्षने पूछा — तपका क्या लक्षण बताया गया है? दम किसे कहा गया है? उत्तम क्षमा क्या बतायी गयी है? और लज्जा किसको कहा गया है? ॥ ८७ ॥

युधिष्ठिर उवाच

तपः स्वधर्मवर्तित्वं मनसो दमनं दमः ।

क्षमा द्वन्द्वसहिष्णुत्वं हीरकार्यनिवर्तनम् ॥ ८८ ॥

युधिष्ठिर बोले - अपने धर्ममें तत्पर रहना तप है, मनके दमनका ही नाम दम है, सर्दी-गरमी आदि द्वन्द्वोंको सहन करना क्षमा है तथा न करने योग्य कामसे दूर रहना लज्जा है ॥ ८८ ॥

यक्षउवाच

किं ज्ञानं प्रोच्यते राजन् कः शमश्च प्रकीर्तितः ।

दया च का परा प्रोक्ता किं चार्जवमुदाहृतम् ॥ ८ ९ ॥

यक्षने पूछा — राजन्! ज्ञान किसे कहते हैं? शम क्या कहलाता है? उत्तम दया किसका नाम है? और आर्जव ( सरलता ) किसे कहते हैं? ॥ ८ ९ ॥ युधिष्ठिर उवाच

ज्ञानं तत्त्वार्थसम्बोधः शमश्चित्तप्रशान्तता ।

दया सर्वसुखैषित्वमार्जवं समचित्तता ॥ ९ ० ॥

युधिष्ठिर बोले- परमात्मतत्त्वका यथार्थ बोध ही ज्ञान है, चित्तकी शान्ति ही शम है, सबके सुखकी इच्छा रखना ही उत्तम दया है और समचित्त होना ही आर्जव ( सरलता) है ॥ ९ ० ॥ यक्ष उवाच

कः शत्रुर्दुर्जयः पुंसां कश्च व्याधिरनन्तकः ।

कीदृशश्च स्मृतः साधुरसाधुः कीदृशः स्मृतः ॥ ९ १ ॥

यक्षने पूछा- मनुष्योंका दुर्जय शत्रु कौन है? अनन्त व्याधि क्या है? साधु कौन माना जाता है? और असाधु किसे कहते हैं? ॥ ९ १ ॥ युधिष्ठिरउवाच

क्रोधः सुदुर्जयः शत्रुर्लोभो व्याधिरनन्तकः ।

सर्वभूतहितः साधुरसाधुर्निर्दयः स्मृतः ॥ ९ २ ॥

युधिष्ठिर बोले- क्रोध दुर्जय शत्रु है, लोभ अनन्त व्याधि है तथा जो समस्त प्राणियोंका हित करनेवाला हो, वही साधु है और निर्दयी पुरुषको ही असाधु माना गया