श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 2111–2120
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2111–2120
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यक्षने कहा – कुन्तीनन्दन महाराज युधिष्ठिर! उस ब्राह्मणके अरणीसहित मन्थनकाष्ठको तो तुम्हारी परीक्षाके लिये मैं ही मृगरूपसे लेकर भाग गया था ॥ वैशम्पायन उवाच
ददानीत्येव भगवानुत्तरं प्रत्यपद्यत ।
अन्यं वरय भद्रं ते वरं त्वममरोपम ॥ १४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - इसके बाद भगवान् धर्मने उत्तर दिया कि ( लो, अरणी और मन्थनकाष्ठ) तुम्हें दे ही देता हूँ। देवोपम नरेश! तुम्हारा कल्याण हो, अब तुम कोई दूसरा वर माँगो ॥ १४ ॥
युधिष्ठिर उवाच
वर्षाणि द्वादशारण्ये त्रयोदशमुपस्थितम् ।
तत्र नो नाभिजानीयुर्वसतो मनुजाः क्वचित् ॥ १५ ॥
युधिष्ठिर बोले- हम बारह वर्षतक वनमें रह चुके । अब तेरहवाँ वर्ष आ लगा है। अतः ऐसा वर दीजिये कि इसमें कहीं भी रहनेपर लोग हमें पहचान न सकें ॥ १५ ॥
वैशम्पायन उवाच
ददानीत्येव भगवानुत्तरं प्रत्यपद्यत ।
भूयश्चाश्वासयामास कौन्तेयं सत्यविक्रमम् ॥ १६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! यह सुनकर भगवान् धर्मने उत्तरमें कहा — ' मैं तुम्हें यह वर भी देता हूँ । ' इसके बाद धर्मराजने पुनः सत्यपराक्रमी युधिष्ठिरको आश्वासन देते हुए कहा— ॥ १६ ॥
यद्यपि स्वेन रूपेण चरिष्यथ महीमिमाम् ।
न वो विज्ञास्यते कश्चित् त्रिषु लोकेषु भारत ॥ १७ ॥
‘ भरतनन्दन! यद्यपि तुम इस पृथ्वीपर इसी रूपसे विचरोगे, तो भी तीनों लोकोंमें कोई भी तुम्हें नहीं पहचान सकेगा ॥ १७ ॥
वर्षं त्रयोदशमिदं मत्प्रसादात् कुरूद्वहाः ।
विराटनगरे गूढा अविज्ञाताश्चरिष्यथ ॥ १८ ॥
‘ कुरुनन्दन पाण्डवगण! मेरी कृपासे तुमलोग तेरहवें वर्षमें गुप्तरूपसे विराटनगरमें रहते हुए किसीसे भी पहचाने न जाकर विचरण करोगे ॥ १८ ॥
यद् वः संकल्पितं रूपं मनसा यस्य यादृशम् ।
तादृशं तादृशं सर्वे छन्दतो धारयिष्यथ ॥ १ ९ ॥
‘ तथा तुममेंसे जो - जो मनसे जैसा संकल्प करेगा, वह इच्छानुसार वैसा - वैसा ही रूप धारण कर सकेगा ॥ १ ९ ॥
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अरणीसहितं चेदं ब्राह्मणाय प्रयच्छत ।
जिज्ञासार्थं मया ह्येतदाहृतं मृगरूपिणा ॥ २० ॥
‘ यह अरणीसहित मन्थनकाष्ठ उस ब्राह्मणको दे दो। तुम्हारी परीक्षाके लिये ही मैंने मृगका रूप धारण करके इसका हरण किया था ॥ २० ॥
प्रवृणीष्वापरं सौम्य वरमिष्टं ददानि ते ।
न तृप्यामि नरश्रेष्ठ प्रयच्छन् वै वरांस्तथा ॥ २१ ॥
‘ सौम्य! इसके अतिरिक्त तुम एक और भी अभीष्ट वर माँग लो । वह मैं तुम्हें दूँगा ।
नरश्रेष्ठ! तुम्हें वर देते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ २१ ॥
तृतीयं गृह्यतां पुत्र वरमप्रतिमं महत् ।
त्वं हि मत्प्रभवो राजन् विदुरश्च ममांशजः ॥ २२ ॥
' बेटा! तुम तीसरा भी महान् एवं अनुपम वर माँग लो । राजन्! तुम मेरे पुत्र हो और विदुरने भी मेरे ही अंशसे जन्म लिया है ' ॥ २२ ॥
युधिष्ठिर उवाच
देवदेवो मया दृष्टो भवान् साक्षात् सनातनः ।
यं ददासि वरं तुष्टस्तं ग्रहीष्याम्यहं पितः ॥ २३ ॥
- युधिष्ठिर बोले – पिताजी! आप सनातन देवाधिदेव हैं। आज मुझे साक्षात् आपके दर्शन हो गये । आप प्रसन्न होकर मुझे जो भी वर देंगे, उसे मैं शिरोधार्य करूँगा ॥ २३ ॥
जयेयं लोभमोहौ च क्रोधं चाहं सदा विभो ।
दाने तपसि सत्ये च मनो मे सततं भवेत् ॥ २४ ॥
विभो! मुझे ऐसा वर दीजिये कि मैं लोभ, मोह और क्रोधको जीत सकूँ तथा दान, तप और सत्यमें सदा मेरा मन लगा रहे ॥ २४ ॥
धर्मउवाच
उपपन्नो गुणैरेतैः स्वभावेनासि पाण्डव ।
भवान् धर्मः पुनश्चैव यथोक्तं ते भविष्यति ॥ २५ ॥
धर्मराजने कहा - पाण्डुपुत्र! तुम तो स्वयं धर्म- स्वरूप ही हो । अतः इन गुणोंसे तो स्वभावसे ही सम्पन्न हो । आगे भी तुम्हारे कथनानुसार तुममें ये सब धर्म बने रहेंगे ॥ २५ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वान्तर्दधे धर्मो भगवाँल्लोकभावनः ।
समेताः पाण्डवाश्चैव सुखसुप्ता मनस्विनः ॥ २६ ॥
उपेत्य चाश्रमं वीराः सर्व एव गतक्लमाः ।
आरणेयं ददुस्तस्मै ब्राह्मणाय तपस्विने ॥ २७ ॥
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वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! ऐसा कहकर लोकरक्षक भगवान् धर्म अन्तर्धान हो गये एवं सुखपूर्वक सोकर उठनेसे श्रमरहित हुए मनस्वी वीर पाण्डवगण एकत्र होकर आश्रममें लौट आये । वहाँ आकर उन्होंने उस तपस्वी ब्राह्मणको उसकी अरणी एवं मन्थनकाष्ठ दे दिये ॥ इदं समुत्थानसमागतं महत् पितुश्च पुत्रस्य च कीर्तिवर्धनम् । पठन् नरः स्याद् विजितेन्द्रियो वशी सपुत्रपौत्रः शतवर्षभाग् भवेत् ॥ २८ ॥
भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवके पुनः जीवनलाभ करनेसे सम्बन्ध रखनेवाले तथा पिता धर्म और पुत्र युधिष्ठिरके संवाद तथा समागमरूप कीर्तिको बढ़ानेवाले इस प्रशस्त उपाख्यानका जो पुरुष पाठ करता है, वह जितेन्द्रिय, वशी तथा पुत्र- पौत्रोंसे सम्पन्न होकर सौ वर्षतक जीवित रहता है ॥ २८ ॥
न चाप्यधर्मे न सुहृद्विभेदने परस्वहारे परदारमर्शने । कदर्यभावे न रमेन्मनः सदा नृणां सदाख्यानमिदं विजानताम् ॥ २ ९ ॥ तथा जो लोग सदा इस मनोहर उपाख्यानको स्मरण रखेंगे; उनका मन अधर्ममें, सुहृदोंके भीतर फूट डालनेमें, दूसरोंका धन हरनेमें, परस्त्रीगमनमें अथवा कृपणतामें कभी प्रवृत्त नहीं होगा ॥ २ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि आरणेयपर्वणि नकुलादिजीवनादिवरप्राप्तौ चतुर्दशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३१४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत आरणेयपर्वमें नकुल आदिके जीवित होने आदि वरोंकी प्राप्तिविषयक तीन सौ चौदहवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ३१४ ॥
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पञ्चदशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः अज्ञातवासके लिये अनुमति लेते समय शोकाकुल हुए युधिष्ठिरको महर्षि धौम्यका समझाना, भीमसेनका उत्साह देना तथा आश्रमसे दूर जाकर पाण्डवोंका परस्पर परामर्शके लिये बैठना वैशम्पायन उवाच
धर्मेण तेऽभ्यनुज्ञाताः पाण्डवाः सत्यविक्रमाः ।
अज्ञातवासं वत्स्यन्तच्छन्ना वर्षं त्रयोदशम् ॥ १ ॥
उपोपविष्टा विद्वांसः सहिताः संशितव्रताः ।
ये तद्भक्ता वसन्ति स्म वनवासे तपस्विनः ॥ २ ॥
तानब्रुवन् महात्मानः स्थिताः प्राञ्जलयस्तदा ।
अभ्यनुज्ञापयिष्यन्तस्तं निवासं धृतव्रताः ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! धर्मराजकी अनुमति पाकर सत्यपराक्रमी पाण्डव तेरहवें वर्षमें छिपकर अज्ञातवास करनेकी इच्छासे एकत्र हो विचार- विमर्शके लिये आस - पास बैठे । वे सब - के - सब उत्तम व्रतका पालन करनेवाले और विद्वान् थे । वनवासके समय जो तपस्वी ब्राह्मण पाण्डवोंके प्रति स्नेह होनेके कारण उनके साथ रहते थे, उनसे अज्ञातवासके हेतु आज्ञा लेनेके लिये व्रतधारी महात्मा पाण्डव हाथ जोड़कर खड़े हो इस प्रकार बोले – ॥ १–३ ॥
विदितं भवतां सर्वं धार्तराष्ट्रैर्यथा वयम् ।
छद्मना हृतराज्याश्चानयाश्च बहुशः कृताः ॥ ४ ॥
‘ मुनिवरो! धृतराष्ट्रके पुत्रोंने जिस प्रकार छल करके हमारा राज्य हर लिया और हमपर बारंबार अत्याचार किया, वह सब आपलोगोंको विदित ही है ॥ ४ ॥
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उषिताश्च वने कृच्छ्रे वयं द्वादश वत्सरान् ।
अज्ञातवाससमयं शेषं वर्षं त्रयोदशम् ॥ ५ ॥
‘ हमलोग कष्टदायक वनमें बारह वर्षोंतक रह लिये । अब अन्तिम तेरहवाँ वर्ष हमारे अज्ञातवासका समय है ॥ ५ ॥
तद् वसामो वयं छन्नास्तदनुज्ञातुमर्हथ ।
सुयोधनश्च दुष्टात्मा कर्णश्च सहसौबलः ॥ ६ ॥
जानन्तो विषमं कुर्युरस्मास्वत्यन्तवैरिणः ।
युक्तचाराश्च युक्ताश्च पौरस्य स्वजनस्य च ॥ ७ ॥
‘ अतः इस वर्ष हम छिपकर रहना चाहते हैं । इसके लिये आपलोग हमें आज्ञा दें । दुष्टात्मा दुर्योधन, कर्ण और शकुनि हमसे अत्यन्त वैर रखते हैं । वे स्वयं तो हमारा पता लगानेको उद्यत हैं ही, उन्होंने गुप्तचर भी लगा रखे हैं । अतः यदि उन्हें हमारे रहनेका पता चल जायगा, तो वे हमसे सम्बन्ध रखनेवाले पुरजनों तथा स्वजनोंके साथ भी विषम ( बुरा ) बर्ताव कर सकते हैं ॥ ६-७ ॥
अपि नस्तद् भवेद् भूयो यद् वयं ब्राह्मणैः सह ।
समस्ताः स्वेषु राष्ट्रेषु स्वराज्यस्था भवेमहि ॥ ८ ॥
' क्या हमारे सामने फिर कभी ऐसा अवसर आयेगा, जब कि हम सब भाई ब्राह्मणोंके साथ अपने राष्ट्रमें रहेंगे - अपने राज्यपर प्रतिष्ठित होंगे' ॥ ८ ॥
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वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा दुःखशोकार्तः शुचिर्धर्मसुतस्तदा ।
सम्मूर्छितोऽभवद् राजा साश्रुकण्ठो युधिष्ठिरः ॥ ९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! ऐसा कहकर पवित्र अन्तःकरणवाले धर्मनन्दन राजा युधिष्ठिर दुःख और शोकसे आतुर होकर मूर्च्छित हो गये । उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बह रही थी और कण्ठ अवरुद्ध हो गया था ॥ ९ ॥
तमथाश्वासयन् सर्वे ब्राह्मणा भ्रातृभिः सह ।
अथ धौम्योऽब्रवीद् वाक्यं महार्थं नृपतिं तदा ॥ १० ॥
उस समय उनके भाइयोंसहित समस्त ब्राह्मणोंने उन्हें आश्वासन दिया । तत्पश्चात् महर्षि धौम्यने राजा युधिष्ठिरसे यह गम्भीर अर्थयुक्त वचन कहा— ॥ १० ॥
राजन् विद्वान् भवान् दान्तः सत्यसंधो जितेन्द्रियः । नैवंविधाः प्रमुह्यन्ते नराः कस्याञ्चिदापदि ॥ ११ ‘ राजन्! आप विद्वान्, मनको वशमें रखनेवाले, सत्यप्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय हैं । आप-जैसे मनुष्य किसी भी आपत्तिमें मोहित नहीं होते अर्थात् अपना धैर्य और विवेक नहीं खोते हैं ॥ ११ ॥
देवैरप्यापदः प्राप्ताश्च्छन्नैश्च बहुशस्तथा ।
तत्र तत्र सपत्नानां निग्रहार्थं महात्मभिः ॥ १२ ॥
‘ महामना देवताओंको भी जहाँ- तहाँ शत्रुओंके निग्रहके लिये अनेक बार छिपकर रहना और विपत्तियोंको भोगना पड़ा है ॥ १२ ॥
इन्द्रेण निषधान् प्राप्य गिरिप्रस्थाश्रमे तदा ।
छन्नेनोष्य कृतं कर्म द्विषतां च विनिग्रहे ॥ १३ ॥
'देवराज इन्द्र शत्रुओंका दमन करनेके लिये गुप्तरूपसे निषधदेशमें गये और गिरिप्रस्थाश्रममें छिपे रहकर उन्होंने अपना कार्य सिद्ध किया ॥ ५३ ॥
विष्णुनाश्वशिरः प्राप्य तथादित्यां निवत्स्यता ।
गर्भे वधार्थं दैत्यानामज्ञातेनोषितं चिरम् ॥ १४ ॥
‘ भगवान् विष्णु भी दैत्योंका वध करनेके लिये हयग्रीवस्वरूप धारण करके अज्ञातभावसे अदितिके गर्भमें दीर्घकालतक रहे हैं ॥ १४ ॥
प्राप्य वामनरूपेण प्रच्छन्नं ब्रह्मरूपिणा ।
बलेर्यथा हृतं राज्यं विक्रमैस्तच्च ते श्रुतम् ॥ १५ ॥
‘ उन्होंने ही ब्राह्मणवेषमें वामनरूप धारण करके अपने तीन पगोंद्वारा जिस प्रकार छिपे तौरपर राजा बलिका राज्य हर लिया था, वह सब तो तुमने सुना ही होगा ॥
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हुताशनेन यच्चापः प्रविश्यच्छन्नमासता ।
विबुधानां कृतं कर्म तच्च सर्वं श्रुतं त्वया ॥ १६ ॥
‘ अग्निने जलमें प्रवेश करके वहीं छिपे रहकर देवताओंका कार्य जिस प्रकार सिद्ध किया, वह सब कुछ भी तुम सुन चुके हो ॥ १६ ॥
प्रच्छन्नं चापि धर्मज्ञ हरिणारिविनिग्रहे ।
वज्रं प्रविश्य शक्रस्य यत् कृतं तच्च ते श्रुतम् ॥ १७ ॥
' धर्मज्ञ! भगवान् श्रीहरिने शत्रुओंके विनाशके लिये छिपे तौरपर इन्द्रके वज्रमें प्रवेश करके जो कार्य किया, वह भी तुम्हारे कानोंमें पड़ा होगा ॥ १७ ॥
और्वेण वसता छन्नमूरौ ब्रह्मर्षिणा तदा ।
यत् कृतं तात देवेषु कर्म तत्तेऽनघ श्रुतम् ॥ १८ ॥
‘ तात! निष्पाप नरेश! ब्रह्मर्षि और्वने ( माताके ) ऊरुमें गुप्तरूपसे निवास करते हुए जो देवकार्य सिद्ध किया था, वह भी तुम्हारे सुननेमें आया ही होगा ॥ १८ ॥
एवं विवस्वता तात छन्नेनोत्तमतेजसा ।
निर्दग्धाः शात्रवाः सर्वे वसता भुवि सर्वशः ॥ १ ९ ॥
' तात! इसी प्रकार महातेजस्वी भगवान् सूर्यने भी पृथ्वीपर गुप्तरूपसे निवास करके समस्त शत्रुओंको दग्ध किया है ॥ १ ९ ॥
विष्णुना वसता चापि गृहे दशरथस्य वै ।
दशग्रीवो हतश्छन्नं संयुगे भीमकर्मणा ॥ २० ॥
‘ भयंकर पराक्रमी भगवान् विष्णुने भी श्रीरामरूपसे दशरथके घरमें छिपे रहकर युद्धमें दशमुख रावणका वध किया था ॥ २० ॥
एवमेव महात्मानः प्रच्छन्नास्तत्र तत्र ह ।
अजयञ्छात्रवान् युद्धे तथा त्वमपि जेष्यसि ॥ २१ ॥
' इसी प्रकार कितने ही महामना वीर पुरुषोंने यत्र- तत्र छिपे रहकर युद्धमें शत्रुओंपर विजय पायी है । इसी प्रकार तुम भी विजयी होओगे' ॥ २१ ॥
तथा धौम्येन धर्मज्ञो वाक्यैः सम्परितोषितः ।
शास्त्रबुद्धया स्वबुद्धया च न चचाल युधिष्ठिरः ॥ २२ ॥
महर्षि धौम्यने जब इस प्रकार युक्तियुक्त वचनोंद्वारा धर्मज्ञ युधिष्ठिरको संतोष प्रदान किया, तब वे शास्त्रज्ञान और अपने बुद्धिबलके कारण ( धर्मसे ) विचलित नहीं हुए ॥ २२ ॥
अथाब्रवीन्महाबाहुर्भीमसेनो महाबलः ।
राजानं बलिनां श्रेष्ठो गिरा सम्परिहर्षयन् ॥ २३ ॥
तदनन्तर बलवानोंमें श्रेष्ठ महाबली महाबाहु भीमसेनने अपनी वाणीसे राजा युधिष्ठिरका हर्ष और उत्साह बढ़ाते हुए कहा - ॥ २३ ॥
अवेक्षया महाराज तव गाण्डीवधन्वना ।
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धर्मानुगतया बुद्धया न किञ्चित् साहसं कृतम् ॥ २४ ॥
‘ महाराज! गाण्डीव धनुष धारण करनेवाले अर्जुनने आपके आदेशकी प्रतीक्षा तथा अपनी धर्मानुगामिनी बुद्धिके कारण ही अबतक कोई साहसका कार्य नहीं किया ॥ २४ ॥
सहदेवो मया नित्यं नकुलश्च निवारितौ ।
शक्तौ विध्वंसने तेषां शत्रूणां भीमविक्रमौ ॥ २५ ॥
‘ भयंकर पराक्रमी नकुल और सहदेव उन सब शत्रुओंका विध्वंस करनेमें समर्थ हैं । इन दोनोंको मैं ही सदा रोकता आया हूँ ॥ २५ ॥
न वयं तत् प्रहास्यामो यस्मिन् योक्ष्यति नो भवान् ।
भवान् विधत्तां तत् सर्वं क्षिप्रं जेष्यामहे रिपून् ॥ २६ ॥
‘ आप हमें जिस कार्यमें लगा देंगे, उसे हमलोग पूरा किये बिना नहीं छोड़ेंगे । अतः आप
युद्धकी सारी व्यवस्था कीजिये । हम शत्रुओंपर शीघ्र ही विजय पायेंगे' ॥ २६ ॥
इत्युक्ते भीमसेनेन ब्राह्मणाः परमाशिषा ।
उक्त्वा चापृच्छ्य भरतान्यथास्वान्स्वान्ययुर्गृहान् ॥ २७ ॥
भीमसेनके ऐसा कहनेपर सब ब्राह्मण पाण्डवोंको उत्तम आशीर्वाद देकर और उन भरतवंशियोंसे अनुमति लेकर अपने - अपने घरोंको चले गये ॥ २७ ॥
सर्वे वेदविदो मुख्या यतयो मुनयस्तथा ।
आसेदुस्ते यथान्यायं पुनर्दर्शनकाङ्क्षया ॥ २८ ॥
वेदोंके ज्ञाता समस्त प्रधान-प्रधान संन्यासी तथा मुनिलोग पाण्डवोंसे फिर मिलनेकी इच्छा रखकर न्यायानुसार अपने योग्य स्थानोंमें रहने लगे ॥ २८ ॥
सह धौम्येन विद्वांसस्तथा पञ्च च पाण्डवाः ।
उत्थाय प्रययुर्वीराः कृष्णामादाय धन्विनः ॥ २ ९ ॥
धौम्यसहित विद्वान् एवं वीर पाँचों पाण्डव द्रौपदीको साथ लिये धनुष धारण किये वहाँसे उठकर चल दिये ॥ २ ९ ॥
क्रोशमात्रमुपागम्य तस्माद् देशान्निमित्ततः ।
श्वोभूते मनुजव्याघ्राश्छन्नवासार्थमुद्यताः ॥ ३० ॥
पृथक्छास्त्रविदः सर्वे सर्वे मन्त्रविशारदाः ।
संधिविग्रहकालज्ञा मन्त्राय समुपाविशन् ॥ ३१ ॥
किसी कारणवश उस स्थानसे एक कोस दूर जाकर वे नरश्रेष्ठ ठहर गये और आगामी दूसरे दिनसे अज्ञातवास आरम्भ करनेके लिये उद्यत हो परस्पर सलाह करनेके निमित्त आस - पास बैठ गये । वे सभी पृथक् - पृथक् शास्त्रोंके ज्ञाता, मन्त्रणा करनेमें कुशल तथा संधि - विग्रह आदिके अवसरको जाननेवाले थे ॥ ३०-३१ ॥
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इति श्रीमहाभारते शतसाहस्रयां संहितायां वैयासिक्यां वनपर्वणि आरणेयपर्वणि अज्ञातवासमन्त्रणे पञ्चदशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३१५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत—व्यासनिर्मित शतसाहस्री संहिताके वनपर्वके अन्तर्गत आरणेयपर्वमें अज्ञातवासके लिये मन्त्रणाविषयक तीन सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१५ ॥
वनपर्वकी श्लोक संख्या कुल योग अनुष्टुप् छन्द ( अन्य बड़े छन्द) बड़े छन्दोंका ३२ अक्षरोंके गद्य अनुष्टुप् मानकर गिननेपर उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये श्लोक - १० ९ ३७ (७८५) १०८० /- १७१ ॥ १२१८८ ॥ ।-
दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये श्लोक- ८२ ( ४ ) ५ ॥ ८७ ॥
वनपर्वकी सम्पूर्ण श्लोक संख्या १२२७६ ।
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वनपर्व - श्रवण - महिमा
इदमारण्यकं श्रुत्वा महापापैः प्रमुच्यते ।
अधनो धनमाप्नोति पुत्रपौत्रसमन्वितः ॥ १ ॥
इस वनपर्वको सुनकर मनुष्य बड़े - बड़े पापोंसे मुक्त हो जाता है, निर्धन धन पाता है और पुत्र- पौत्रोंसे सम्पन्न होता है ॥ १ ॥
यं यं प्रार्थयते कामं तं तं प्राप्नोत्यसंशयम् ।
नारी वा पुरुषो वापि शुचिः प्रयतमानसः ॥ २ ॥
आरण्यके श्रुतेऽधीते ब्राह्मणान् पायसादिभिः ।
भोजयेद् वस्त्रगोस्वर्णदानै रत्नैः प्रपूजितान् ॥ ३ ॥
वह जिस - जिस मनोवाञ्छित वस्तुके लिये प्रार्थना करता है, उसे निश्चय ही पा लेता है । स्त्री हो या पुरुष; शुद्ध एवं एकाग्रचित्त होकर इस वनपर्वका श्रवण अथवा पाठ करनेपर वस्त्र, गौ, सुवर्ण तथा रत्नोंके दानसे ब्राह्मणोंका सम्मान करके उन्हें खीर आदिका भोजन करावे ॥ २-३ ॥
ब्राह्मणेषु च तुष्टेषु संतुष्टाः पाण्डुनन्दनाः ।
ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रः शक्रो देवगणास्तथा ॥ ४ ॥
भूतानि मुनयो देव्यस्तथा पितृगणाश्च ये ।
वाचकं पूजयेच्छक्त्या वस्त्रान्नैः स्वर्णभूषणैः ॥ ५ ॥
ब्राह्मणोंके संतुष्ट होनेपर पाण्डव, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, देवगण, भूतगण, मुनिगण, देवियाँ तथा पितृगण— ये सभी संतुष्ट होते हैं। अपनी शक्तिके अनुसार अन्न - वस्त्र और आभूषण देकर वाचककी पूजा करनी चाहिये ॥ ४-५ ॥ विशेषतस्तु कपिला देया तु जयपाठके ।
कांस्यदोहा रौप्यखुरा स्वर्णशृङ्गी सभूषणा ।
पाण्डूनां परितोषार्थं दद्यादन्नं द्विजातये ॥ ६ ॥
महाभारतके वाचकको विशेषतः एक कपिला गौ देनी चाहिये । उसके साथ काँसेका एक दुग्धपात्र होना चाहिये । गायके खुरोंमें चाँदी और सींगोंमें सोना मढ़ा दे । उसे अन्य
आभूषणोंसे भी विभूषित करे। पाण्डवोंके संतोषके लिये ब्राह्मणोंको अन्नदान करे ॥ ६ ॥
आरण्यकाख्यमाख्यानं शृणुयाद् यो नरोत्तमः ।
स सर्वकाममाप्नोति पुनः स्वर्गतिमाप्नुयात् ॥ ७ ॥
जो नरश्रेष्ठ इस वनपर्वकी कथाको सुनता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है एवं शरीरका अन्त होनेपर स्वर्गलोकमें जाता है ॥ ७ ॥