श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 251–260
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 251–260
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तत्र सिद्धिर्गतिः प्रोक्ता कालावस्थाविभागतः ॥ ५ ९ ॥ भारत! लोकको इसी प्रकार कार्यसिद्धि प्राप्त होती है - कार्यसिद्धिकी यही व्यवस्था है । काल और अवस्थाके विभागके अनुसार शत्रुकी दुर्बलताके अन्वेषणका प्रयत्न ही सिद्धिका मूल कारण है ॥ ५ ९ ॥
ब्राह्मणं मे पिता पूर्वं वासयामास पण्डितम् ।
सोऽपि सर्वामिमां प्राह पित्रे मे भरतर्षभ ॥ ६० ॥
नीतिं बृहस्पतिप्रोक्तां भ्रातॄन् मेऽग्राहयत् पुरा ।
तेषां सकाशादश्रौषमहमेतां तदा गृहे ॥ ६१ ॥
भरतश्रेष्ठ! पूर्वकालमें मेरे पिताजीने अपने घरपर एक विद्वान् ब्राह्मणको ठहराया था । उन्होंने ही पिताजीसे बृहस्पतिजीकी बतायी हुई इस सम्पूर्ण नीतिका प्रतिपादन किया था और मेरे भाइयोंको भी इसीकी शिक्षा दी थी । उस समय अपने भाइयोंके निकट रहकर घरमें ही मैंने भी उस नीतिको सुना था ॥ ६०-६१ ॥
स मां राजन् कर्मवतीमागतामाह सान्त्वयन् ।
शुश्रूषमाणामासीनां पितुरङ्के युधिष्ठिर ॥ ६२ ॥
महाराज युधिष्ठिर! मैं उस समय किसी कार्यसे पिताके पास आयी थी और यह सब सुननेकी इच्छासे उनकी गोदमें बैठ गयी थी । तभी उन ब्राह्मण देवताने मुझे सान्त्वना देते हुए इस नीतिका उपदेश किया था ॥ ६२ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि द्रौपदीवाक्ये द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें द्रौपदीवाक्यविषयक बत्तीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ३२ ॥
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त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः भीमसेनका पुरुषार्थकी प्रशंसा करना और युधिष्ठिरको उत्तेजित करते हुए क्षत्रिय धर्मके अनुसार युद्ध छेड़नेका अनुरोध वैशम्पायन उवाच
याज्ञसेन्या वचः श्रुत्वा भीमसेनो ह्यमर्षणः ।
निःश्वसन्नुपसंगम्य क्रुद्धो राजानमब्रवीत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! द्रुपदकुमारीका वचन सुनकर अमर्षमें भरे हुए भीमसेन क्रोधपूर्वक उच्छ्वास लेते हुए राजाके पास आये और इस प्रकार कहने लगे ॥ १ ॥
राज्यस्य पदवीं धर्म्यं व्रज सत्पुरुषोचिताम् ।
धर्मकामार्थहीनानां किं नो वस्तुं तपोवने ॥ २ ॥
'महाराज! श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये उचित और धर्मके अनुकूल जो राज्य - प्राप्तिका मार्ग ( उपाय ) हो, उसका आश्रय लीजिये । धर्म, अर्थ और काम-इन तीनोंसे वंचित होकर इस तपोवनमें निवास करनेपर हमारा कौन - सा प्रयोजन सिद्ध होगा ॥ २ ॥
नैव धर्मेण तद् राज्यं नार्जवेन न चौजसा ।
अक्षकूटमधिष्ठाय हृतं दुर्योधनेन वै ॥ ३ ॥
‘ दुर्योधनने धर्मसे, सरलता से और बलसे भी हमारे राज्यको नहीं लिया है; उसने तो कपटपूर्ण जूएका आश्रय लेकर उसका हरण कर लिया है ॥ ३ ॥
गोमायुनेव सिंहानां दुर्बलेन बलीयसाम् ।
आमिषं विघसाशेन तद्वद् राज्यं हि नो हृतम् ॥ ४ ॥
‘ बचे हुए अन्नको खानेवाले दुर्बल गीदड़ जैसे अत्यन्त बलिष्ठ सिंहोंका भोजन हर लें, उसी प्रकार शत्रुओंने हमारे राज्यका अपहरण किया है ॥ ४ ॥
धर्मलेशप्रतिच्छन्नः प्रभवं धर्मकामयोः ।
अर्थमुत्सृज्य किं राजन् दुःखेषु परितप्यसे ॥ ५ ॥
‘ महाराज! धर्म और कामके उत्पादक राज्य और धनको खोकर लेशमात्र धर्मसे आवृत हुए अब आप क्यों दुःखसे संतप्त हो रहे हैं? ॥ ५ ॥
भवतोऽनवधानेन राज्यं नः पश्यतां हृतम् ।
अहार्यमपि शक्रेण गुप्तं गाण्डीवधन्वना ॥ ६ ॥
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‘ गाण्डीवधारी अर्जुनके द्वारा सुरक्षित हमारे राज्यको इन्द्र भी नहीं छीन सकते थे, परंतु आपकी असावधानीसे वह हमारे देखते - देखते छिन गया ॥ ६ ॥
कुणीनामिव बिल्वानि पङ्गूनामिव धेनवः ।
हृतमैश्वर्यमस्माकं जीवतां भवतः कृते ॥ ७ ॥
‘ जैसे लूलोंके पाससे उनके बेलफल और पंगुओंके निकटसे उनकी गायें छिन जाती हैं और वे जीवित रहकर भी कुछ कर नहीं पाते, उसी प्रकार आपके कारण जीते -जी हमारे राज्यका अपहरण कर लिया गया ॥ ७ ॥
भवतः प्रियमित्येवं महद् व्यसनमीदृशम् ।
धर्मकामे प्रतीतस्य प्रतिपन्नाः स्म भारत ॥ ८ ॥
भारत! आप धर्मकी इच्छा रखनेवाले हैं; इस रूपमें आपकी प्रसिद्धि है । अतः आपकी प्रिय अभिलाषा सिद्ध हो, इसीलिये हमलोग ऐसे महान् संकटमें पड़ गये हैं ॥ ८ ॥
कर्शयामः स्वमित्राणि नन्दयामश्च शात्रवान् ।
आत्मानं भवतां शास्त्रैर्नियम्य भरतर्षभ ॥ ९ ॥
‘ भरतकुलभूषण! आपके शासनसे अपने - आपको नियन्त्रणमें रखकर आज हमलोग अपने मित्रोंको दुःखी और शत्रुओंको सुखी बना रहे हैं ॥ ९ ॥
यद् वयं न तदैवैतान् धार्तराष्ट्रान् निहन्महि ।
भवतः शास्त्रमादाय तन्नस्तपति दुष्कृतम् ॥ १० ॥
‘ आपके शासनको मानकर जो हमलोगोंने उसी समय इन धृतराष्ट्रपुत्रोंको मार नहीं डाला, वह दुष्कर्म हमें आज भी संताप दे रहा है ॥ १० ॥
अथैनामन्ववेक्षस्व मृगचर्यामिवात्मनः ।
दुर्बलाचरितां राजन् न बलस्थैर्निषेविताम् ॥ ११ ॥
‘ राजन्! मृगोंके समान अपनी इस वनचर्यापर ही दृष्टिपात कीजिये । दुर्बल मनुष्य ही इस प्रकार वनमें रहकर समय बिताते हैं । बलवान् मनुष्य वनवासका सेवन नहीं करते ॥ ११ ॥
यां न कृष्णो न बीभत्सुर्नाभिमन्युर्न सृजयाः ।
न चाहमभिनन्दामि न च माद्रीसुतावुभौ ॥ १२ ॥
' श्रीकृष्ण, अर्जुन, अभिमन्यु, संजयवंशी वीर, मैं और ये नकुल सहदेव – कोई भी इस वनचर्याको पसंद नहीं करते ॥ १२ ॥
भवान् धर्मो धर्म इति सततं व्रतकर्शितः ।
कच्चिद् राजन् न निर्वेदादापन्नः क्लीबजीविकाम् ॥ १३ ॥
‘ राजन्! आप ‘ यह धर्म है, यह धर्म है ', ऐसा कहकर सदा व्रतोंका पालन करके कष्ट उठाते रहते हैं । कहीं ऐसा तो नहीं है कि आप वैराग्यके कारण साहसशून्य हो नपुंसकोंका-सा जीवन व्यतीत करने लगे हों? ॥ १३ ॥
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दुर्मनुष्या हि निर्वेदमफलं स्वार्थघातकम् ।
अशक्ताः श्रियमाहर्तुमात्मनः कुर्वते प्रियम् ॥ १४ ॥
' अपनी खोयी हुई राज्यलक्ष्मीका उद्धार करनेमें असमर्थ दुर्बल मनुष्य ही निष्फल और स्वार्थनाशक वैराग्यका आश्रय लेते हैं और उसीको प्रिय मानते हैं ॥ १४ ॥
स भवान् दृष्टिमाञ्छक्तः पश्यन्नस्मासु पौरुषम् ।
आनृशंस्यपरो राजन् नानर्थमवबुध्यसे ॥ १५ ॥
‘ राजन्! आप समझदार, दूरदर्शी और शक्तिशाली हैं, हमारे पुरुषार्थको देख चुके हैं; तो भी इस प्रकार दयाको अपनाकर इससे होनेवाले अनर्थको नहीं समझ रहे हैं ॥ १५ ॥
अस्मानमी धार्तराष्ट्राः क्षममाणानलं सतः ।
अशक्तानिव मन्यन्ते तद् दुःखं नाहवे वधः ॥ १६ ॥
' हम शत्रुओंके अपराधको क्षमा करते जा रहे हैं, इसलिये समर्थ होते हुए भी हमें ये धृतराष्ट्रके पुत्र निर्बल- से मानने लगे हैं, यही हमारे लिये महान् दुःख है; युद्धमें मारा जाना कोई दुःख नहीं है ॥ १६ ॥
तत्र चेद् युध्यमानानामजिह्ममनिवर्तिनाम् ।
सर्वशो हि वधः श्रेयान् प्रेत्य लोकान् लभेमहि ॥ १७ ॥
' ऐसी दशामें यदि हम पीठ न दिखाकर युद्धमें निष्कपटभावसे लड़ते रहें और उसमें हमारा वध भी हो जाय तो वह कल्याणकारक है; क्योंकि युद्धमें मरनेसे हमें उत्तम लोकोंकी प्राप्ति होगी ॥ १७ ॥
अथवा वयमेवैतान् निहत्य भरतर्षभ ।
आददीमहि गां सर्वां तथापि श्रेय एव नः ॥ १८ ॥
‘ अथवा भरतश्रेष्ठ! यदि हम ही इन शत्रुओंको मारकर सारी पृथ्वी ले लें तो वही हमारे लिये कल्याणकर है ॥ १८ ॥
सर्वथा कार्यमेतन्नः स्वधर्ममनुतिष्ठताम् ।
काङ्क्षतां विपुलां कीर्तिं वैरं प्रतिचिकीर्षताम् ॥ १ ९ ॥
' हम अपने क्षत्रिय- धर्मके अनुष्ठानमें संलग्न हो वैरका बदला लेना चाहते हैं और संसारमें महान् यशका विस्तार करनेकी अभिलाषा रखते हैं, अतः हमारे लिये सब प्रकारसे युद्ध करना ही उचित है ॥ १ ९ ॥
आत्मार्थं युध्यमानानां विदिते कृत्यलक्षणे ।
अन्यैरपि हृते राज्ये प्रशंसैव न गर्हणा ॥ २० ॥
‘ शत्रुओंने हमारे राज्यको छीन लिया है, ऐसे अवसरपर यदि हम अपने कर्तव्यको समझकर अपने लाभके लिये ही युद्ध करें तो भी इसके लिये जगत्में हमारी प्रशंसा ही होगी, निन्दा नहीं होगी ॥ २० ॥
कर्शनार्थो हि यो धर्मो मित्राणामात्मनस्तथा ।
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व्यसनं नाम तद् राजन् न धर्मः स कुधर्म तत् ॥ २१ ॥
‘ महाराज! जो धर्म अपने तथा मित्रोंके लिये क्लेश उत्पन्न करनेवाला हो, वह तो संकट ही है । वह धर्म नहीं, कुधर्म है ॥ २१ ॥
सर्वथा धर्मनित्यं तु पुरुषं धर्मदुर्बलम् ।
त्यजतस्तात धर्मार्थौ प्रेतं दुःखसुखे यथा ॥ २२ ॥
‘ तात! जैसे मुर्दोंको दुःख और सुख दोनों नहीं होते, उसी प्रकार जो सर्वथा और सर्वदा धर्ममें ही तत्पर रहकर उसके अनुष्ठानसे दुर्बल हो गया है, उसे धर्म और अर्थ दोनों त्याग देते हैं ॥ २२ ॥
यस्य धर्मो हि धर्मार्थं क्लेशभाङ् न स पण्डितः ।
न स धर्मस्य वेदार्थं सूर्यस्यान्धः प्रभामिव ॥ २३ ॥
जिसका धर्म केवल धर्मके लिये ही होता है, वह धर्मके नामपर केवल क्लेश उठानेवाला मानव बुद्धिमान् नहीं है । जैसे अन्धा सूर्यकी प्रभाको नहीं जानता, उसी प्रकार वह धर्मके अर्थको नहीं समझता है ॥ २३ ॥
यस्य चार्थार्थमेवार्थः स च नार्थस्य कोविदः ।
रक्षेत भृतकोऽरण्ये यथा गास्तादृगेव सः ॥ २४ ॥
‘ जिसका धन केवल धनके ही लिये है, दान आदिके लिये नहीं है, वह धनके तत्त्वको नहीं जानता । जैसे सेवक ( ग्वालिया ) वनमें गौओंकी रक्षा करता है, उसी प्रकार वह भी उस धनका दूसरेके लिये रक्षकमात्र है ॥ २४ ॥
अतिवेलं हि योऽर्थार्थी नेतरावनुतिष्ठति ।
स वध्यः सर्वभूतानां ब्रह्महेव जुगुप्सितः ॥ २५ ॥
' जो केवल अर्थके ही संग्रहकी अत्यन्त इच्छा रखनेवाला है और धर्म एवं कामका अनुष्ठान नहीं करता है, वह ब्रह्महत्यारेके समान घृणाका पात्र है और सभी प्राणियोंके लिये वध्य है ॥ २५ ॥
सततं यश्च कामार्थी नेतरावनुतिष्ठति ।
मित्राणि तस्य नश्यन्ति धर्मार्थाभ्यां च हीयते ॥ २६ ॥
‘ इसी प्रकार जो निरन्तर कामकी ही अभिलाषा रखकर धर्म और अर्थका सम्पादन नहीं करता, उसके मित्र नष्ट हो जाते हैं ( उसको त्यागकर चल देते हैं ) और वह धर्म एवं अर्थ दोनोंसे वंचित ही रह जाता है ॥ २६ ॥
तस्य धर्मार्थहीनस्य कामान्ते निधनं ध्रुवम् ।
कामतो रममाणस्य मीनस्येवाम्भसः क्षये ॥ २७ ॥
‘ जैसे पानी सूख जानेपर उसमें रहनेवाली मछलीकी मृत्यु निश्चित है, उसी प्रकार जो धर्म - अर्थसे हीन होकर केवल काममें ही रमण करता है, उस काम ( भोगसामग्री ) -की समाप्ति होनेपर उसकी भी अवश्य मृत्यु हो जाती है ॥ २७ ॥
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तस्माद् धर्मार्थयोर्नित्यं न प्रमाद्यन्ति पण्डिताः ।
प्रकृतिः सा हि कामस्य पावकस्यारणिर्यथा ॥ २८ ॥
‘ इसलिये विद्वान् पुरुष कभी धर्म और अर्थके सम्पादनमें प्रमाद नहीं करते हैं । धर्म और अर्थ कामकी उत्पत्तिके स्थान हैं ( अर्थात् धर्म और अर्थसे ही कामकी सिद्धि होती है ) जैसे अरणि अग्निका उत्पत्तिस्थान है ॥ २८ ॥
सर्वथा धर्ममूलोऽर्थो धर्मश्चार्थपरिग्रहः ।
इतरेतरयोर्नीतौ विद्धि मेघोदधी यथा ॥ २९ ॥
‘ अर्थका कारण है धर्म और धर्म सिद्ध होता है अर्थसंग्रहसे । जैसे मेघसे समुद्रकी पुष्टि होती है और समुद्रसे मेघकी पूर्ति । इस प्रकार धर्म और अर्थको एक- दूसरेके आश्रित समझना चाहिये ॥ २ ९ ॥
द्रव्यार्थस्पर्शसंयोगे या प्रीतिरुपजायते ।
स कामश्चित्तसंकल्पः शरीरं नास्य दृश्यते ॥ ३० ॥
' स्त्री, माला, चन्दन आदि द्रव्योंके स्पर्श और सुवर्ण आदि धनके लाभसे जो प्रसन्नता होती है, उसके लिये जो चित्तमें संकल्प उठता है, उसीका नाम काम है । उस कामका शरीर नहीं देखा जाता ( इसीलिये वह ' अनंग ' कहलाता है ) ॥ ३० ॥
अर्थार्थी पुरुषो राजन् बृहन्तं धर्ममिच्छति ।
अर्थमिच्छति कामार्थी न कामादन्यमिच्छति ॥ ३१ ॥
‘ राजन्! धनकी इच्छा रखनेवाला पुरुष महान् धर्मकी अभिलाषा रखता है और कामार्थी मनुष्य धन चाहता है । जैसे धर्मसे धनकी और धनसे कामकी इच्छा करता है, उस प्रकार वह कामसे किसी दूसरी वस्तुकी इच्छा नहीं करता है ॥ ३१ ॥
न हि कामेन कामोऽन्यः साध्यते फलमेव तत् ।
उपयोगात् फलस्यैव काष्ठाद् भस्मेव पण्डितैः ॥ ३२ ॥
‘ जैसे फल उपभोगमें आकर कृतार्थ हो जाता है, उससे दूसरा फल नहीं प्राप्त हो सकता तथा जिस प्रकार काष्ठसे भस्म बन सकता है, परंतु उस भस्मसे दूसरा कोई पदार्थ नहीं बन सकता; इसी तरह बुद्धिमान् पुरुष एक कामसे किसी दूसरे कामकी सिद्धि नहीं मानते, क्योंकि वह साधन नहीं, फल ही है ॥ ३२ ॥
इमाञ्छकुनकान् राजन् हन्ति वैतंसिको यथा ।
एतद् रूपमधर्मस्य भूतेषु हि विहिंसता ॥ ३३ ॥
कामाल्लोभाच्च धर्मस्य प्रकृतिं यो न पश्यति ।
स वध्यः सर्वभूतानां प्रेत्य चेह च दुर्मतिः ॥ ३४ ॥
‘ राजन्! जैसे पक्षियोंको मारनेवाला व्याध इन पक्षियोंको मारता है, यह विशेष प्रकारकी हिंसा ही अधर्मका स्वरूप है (अतः वह हिंसक सबके लिये वध्य है ) । वैसे ही जो
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खोटी बुद्धिवाला मनुष्य काम और लोभके वशीभूत होकर धर्मके स्वरूपको नहीं जानता, वह इहलोक और परलोकमें भी सब प्राणियोंका वध्य होता है ॥ ३३-३४ ॥
व्यक्तं ते विदितो राजन्नर्थो द्रव्यपरिग्रहः ।
प्रकृतिं चापि वेत्थास्य विकृतिं चापि भूयसीम् ॥ ३५ ॥
‘ राजन्! आपको यह अच्छी तरह ज्ञात है कि धनसे ही भोग्य सामग्रीका संग्रह होता है । धनका जो कारण है, उससे भी आप परिचित हैं और धनके द्वारा जो बहुत - से कार्य सिद्ध होते हैं, उसे भी आप जानते हैं ॥ ३५ ॥
तस्य नाशे विनाशे वा जरया मरणेन वा ।
अनर्थ इति मन्यन्ते सोऽयमस्मासु वर्तते ॥ ३६ ॥
‘ उस धनका अभाव होनेपर अथवा प्राप्त हुए धनका नाश होनेपर अथवा स्त्री आदि धनके जरा- जीर्ण एवं मृत्युग्रस्त होनेपर मनुष्यकी जो दशा होती है, उसीको सब लोग अनर्थ मानते हैं । वही इस समय हमलोगोंको भी प्राप्त हुआ है ॥ ३६ ॥
इन्द्रियाणां च पञ्चानां मनसो हृदयस्य च ।
विषये वर्तमानानां या प्रीतिरुपजायते ॥ ३७ ॥
स काम इति मे बुद्धिः कर्मणां फलमुत्तमम् । ‘ पाँचों ज्ञानेन्द्रियों, मन और बुद्धिकी अपने विषयोंमें प्रवृत्त होनेके समय जो प्रीति होती
है, वही मेरी समझमें काम है । वह कर्मोंका उत्तम फल है ॥ ३७ ॥
एवमेव पृथग् दृष्ट्वा धर्मार्थौ काममेव च ॥ ३८ ॥
न धर्मपर एव स्यान्न चार्थपरमो नरः ।
न कामपरमो वा स्यात् सर्वान् सेवेत सर्वदा ॥ ३ ९ ॥
धर्मं पूर्वे धनं मध्ये जघन्ये काममाचरेत् ।
अहन्यनुचरेदेवमेष शास्त्रकृतो विधिः ॥ ४० ॥
‘ इस प्रकार धर्म, अर्थ और काम तीनोंको पृथक् - पृथक् समझकर मनुष्य केवल धर्म, केवल अर्थ अथवा केवल कामके ही सेवनमें तत्पर न रहे । उन सबका सदा इस प्रकार सेवन करे, जिससे इनमें विरोध न हो । इस विषयमें शास्त्रोंका यह विधान है कि दिनके पूर्वभागमें धर्मका, दूसरे भागमें अर्थका और अन्तिम भागमें कामका सेवन करे ॥ ३८— ४० ॥
कामं पूर्वे धनं मध्ये जघन्ये धर्ममाचरेत् ।
वयस्यनुचरेदेवमेष शास्त्रकृतो विधिः ॥ ४१ ॥
'इसी प्रकार अवस्था क्रममें शास्त्रका विधान यह है कि आयुके पूर्वभागमें ( युवावस्थामें ) कामका, मध्यभाग ( प्रौढ़ावस्था ) - में धनका तथा अन्तिम भाग ( वृद्धावस्था ) -में धर्मका पालन करे ॥ ४१ ॥
धर्मं चार्थं च कामं च यथावद् वदतां वर ।
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विभज्य काले कालज्ञः सर्वान् सेवेत पण्डितः ॥ ४२ ॥
‘ वक्ताओंमें श्रेष्ठ! उचित कालका ज्ञान रखनेवाला विद्वान् पुरुष धर्म, अर्थ और काम तीनोंका यथावत् विभाग करके उपयुक्त समयपर उन सबका सेवन करे ॥ ४२ ॥
मोक्षो वा परमं श्रेय एष राजन् सुखार्थिनाम् ।
प्राप्तिर्वा बुद्धिमास्थाय सोपायां कुरुनन्दन ॥ ४३ ॥
तद् वाऽऽशु क्रियतां राजन् प्राप्तिर्वाप्यधिगम्यताम् ।
जीवितं ह्यातुरस्येव दुःखमन्तरवर्तिनः ॥ ४४ ॥
‘ कुरुनन्दन! निरतिशय सुखकी इच्छा रखनेवाले मुमुक्षुओंके लिये यह मोक्ष ही परम कल्याणप्रद है । राजन्! इसी प्रकार लौकिक सुखकी इच्छावालोंके लिये धर्म, अर्थ, कामरूप त्रिवर्गकी प्राप्ति ही परम श्रेय है । अतः महाराज! भक्ति और योगसहित ज्ञानका आश्रय लेकर आप शीघ्र ही या तो मोक्षकी प्राप्ति कर लीजिये अथवा धर्म, अर्थ, कामरूप त्रिवर्गकी प्राप्तिके उपायका अवलम्बन कीजिये । जो इन दोनोंके बीचमें रहता है, उसका जीवन तो आर्त मनुष्यके समान दुःखमय ही है ॥ ४३-४४ ॥
विदितश्चैव मे धर्मः सततं चरितश्च ते ।
जानन्तस्त्वयि शंसन्ति सुहृदः कर्मचोदनाम् ॥ ४५ ॥
' मुझे मालूम है कि आपने सदा धर्मका ही आचरण किया है, इस बातको जानते हुए भी आपके हितैषी, सगे- सम्बन्धी आपको ( धर्मयुक्त ) कर्म एवं पुरुषार्थके लिये ही प्रेरित करते हैं ॥ ४५ ॥
दानं यज्ञाः सतां पूजा वेदधारणमार्जवम् ।
एष धर्मः परो राजन् बलवान् प्रेत्य चेह च ॥ ४६ ॥
‘ महाराज! इहलोक और परलोकमें भी दान, यज्ञ, संतोंका आदर, वेदोंका स्वाध्याय और सरलता आदि ही उत्तम एवं प्रबल धर्म माने गये हैं ॥ ४६ ॥
एष नार्थविहीनेन शक्यो राजन् निषेवितुम् ।
अखिलाः पुरुषव्याघ्र गुणाः स्युर्यद्यपीतरे ॥ ४७ ॥
‘ पुरुषसिंह राजन्! यद्यपि मनुष्यमें दूसरे सभी गुण मौजूद हों तो भी यह यज्ञ आदि रूप धर्म धनहीन पुरुषके द्वारा नहीं सम्पादित किया जा सकता ॥ ४७ ॥
धर्ममूलं जगद् राजन् नान्यद् धर्माद् विशिष्यते ।
धर्मश्चार्थेन महता शक्यो राजन् निषेवितुम् ॥ ४८ ॥
‘ महाराज! इस जगत्का मूल कारण धर्म ही है । इस जगत्में धर्मसे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है । उस धर्मका अनुष्ठान भी महान् धनसे ही हो सकता है ॥ ४८ ॥
न चार्थो भैक्ष्यचर्येण नापि क्लैब्येन कर्हिचित् ।
वेत्तुं शक्यः सदा राजन् केवलं धर्मबुद्धिना ॥ ४ ९ ॥
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‘ राजन्! भीख माँगनेसे, कायरता दिखानेसे अथवा केवल धर्ममें ही मन लगाये रहनेसे धनकी प्राप्ति कदापि नहीं हो सकती ॥ ४ ९ ॥
प्रतिषिद्धा हि ते याच्ञा यया सिद्धयति वै द्विजः ।
तेजसैवार्थलिप्सायां यतस्व पुरुषर्षभ ॥ ५० ॥
‘ नरश्रेष्ठ! ब्राह्मण जिस याचनाके द्वारा कार्यसिद्धि कर लेता है वह तो आप कर नहीं सकते, क्योंकि क्षत्रियके लिये उसका निषेध है । अतः आप अपने तेजके द्वारा ही धन पानेका प्रयत्न कीजिये ॥ ५० ॥
भैक्ष्यचर्या न विहिता न च विट्शूद्रजीविका ।
क्षत्रियस्य विशेषेण धर्मस्तु बलमौरसम् ॥ ५१ ॥
' क्षत्रियके लिये न तो भीख माँगनेका विधान है और न वैश्य और शूद्रकी जीविका करनेका ही । उसके लिये तो बल और उत्साह ही विशेष धर्म हैं ॥ ५१ ॥
स्वधर्मं प्रतिपद्यस्व जहि शत्रून् समागतान् ।
धार्तराष्ट्रमवनं पार्थ मया पार्थेन नाशय ॥ ५२ ॥
‘ पार्थ! अपने धर्मका आश्रय लीजिये, प्राप्त हुए शत्रुओंका वध कीजिये । मेरे तथा अर्जुनके द्वारा धृतराष्ट्रपुत्ररूपी जंगलको कटवा डालिये ॥ ५२ ॥
उदारमेव विद्वांसो धर्मं प्राहुर्मनीषिणः ।
उदारं प्रतिपद्यस्व नावरे स्थातुमर्हसि ॥ ५३ ॥
‘ मनीषी विद्वान् दानशीलताको ही धर्म कहते हैं, अतः आप उस दानशीलताको ही प्राप्त कीजिये । आपको इस दयनीय अवस्थामें नहीं रहना चाहिये ॥ ५३ ॥
अनुबुध्यस्व राजेन्द्र वेत्थ धर्मान् सनातनात् ।
क्रूरकर्माभिजातोऽसि यस्मादुद्विजते जनः ॥ ५४ ॥
‘ महाराज! आप सनातनधर्मोंको जानते हैं, आप कठोर कर्म करनेवाले क्षत्रियकुलमें उत्पन्न हुए हैं, जिससे सब लोग भयभीत रहते हैं; अतः अपने स्वरूप और कर्तव्यकी ओर ध्यान दीजिये ॥ ५४ ॥
प्रजापालनसम्भूतं फलं तव न गर्हितम् ।
एष ते विहितो राजन् धात्रा धर्मः सनातनः ॥ ५५ ॥
'जब आप राज्य प्राप्त कर लेंगे, उस समय प्रजापालनरूप धर्मसे आपको जिस पुण्यफलकी प्राप्ति होगी, वह आपके लिये गर्हित नहीं होगा । महाराज! विधाताने आप-जैसे क्षत्रियका यही सनातनधर्म नियत किया है ॥ ५५ ॥
तस्मादपचितः पार्थ लोके हास्यं गमिष्यसि ।
स्वधर्माद्धि मनुष्याणां चलनं न प्रशस्यते ॥ ५६ ॥
‘ पार्थ! उस धर्मसे हीन होनेपर तो संसारमें आप उपहासके पात्र हो जायँगे । मनुष्योंका अपने धर्मसे भ्रष्ट होना कुछ प्रशंसाकी बात नहीं है ॥ ५६ ॥
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स क्षात्रं हृदयं कृत्वा त्यक्त्वेदं शिथिलं मनः ।
वीर्यमास्थाय कौरव्य धुरमुद्वह धुर्यवत् ॥ ५७ ॥
‘ कुरुनन्दन! अपने हृदयको क्षत्रियोचित उत्साहसे भरकर मनकी इस शिथिलताको दूर करके पराक्रमका आश्रय ले आप एक धुरन्धर वीर पुरुषकी भाँति युद्धका भार वहन कीजिये ॥ ५७ ॥
न हि केवलधर्मात्मा पृथिवीं जातु कश्चन ।
पार्थिवो व्यजयद् राजन् न भूतिं न पुनः श्रियम् ॥ ५८ ॥
‘ महाराज! केवल धर्ममें ही लगे रहनेवाले किसी भी नरेशने आजतक न तो कभी पृथ्वीपर विजय पायी है और न ऐश्वर्य तथा लक्ष्मीको ही प्राप्त किया है ॥ ५८ ॥
जिह्वां दत्त्वा बहूनां हि क्षुद्राणां लुब्धचेतसाम् ।
निकृत्या लभते राज्यमाहारमिव शल्यकः ॥ ५ ९ ॥
जैसे बहेलिया लुब्ध हृदयवाले छोटे -छोटे मृगोंको कुछ खानेकी वस्तुओंका लोभ देकर छलसे उन्हें पकड़ लेता है, उसी प्रकार नीतिज्ञ राजा शत्रुओंके प्रति कूटनीतिका प्रयोग करके उनसे राज्यको प्राप्त कर लेता है ॥ ५ ९ ॥
भ्रातरः पूर्वजाताश्च सुसमृद्धाश्च सर्वशः ।
निकृत्या निर्जिता देवैरसुराः पार्थिवर्षभ ॥ ६० ॥
' नृपश्रेष्ठ! आप जानते हैं कि असुरगण देवताओंके बड़े भाई हैं, उनसे पहले उत्पन्न हुए हैं और सब प्रकारसे समृद्धिशाली हैं तो भी देवताओंने छलसे उन्हें जीत लिया ॥ ६० ॥
एवं बलवतः सर्वमिति बुद्ध्वा महीपते ।
जहि शत्रून् महाबाहो परां निकृतिमास्थितः ॥ ६१ ॥
‘ महाराज! महाबाहो! इस प्रकार बलवान्का ही सबपर अधिकार होता है, यह समझकर आप भी कूटनीतिका आश्रय ले अपने शत्रुओंको मार डालिये ॥ ६१ ॥
न ह्यर्जुनसमः कश्चिद् युधि योद्धा धनुर्धरः ।
भविता वा पुमान् कश्चिन्मत्समो वा गदाधरः ॥ ६२ ॥
‘ युद्धमें अर्जुनके समान कोई धनुर्धर अथवा मेरे समान गदाधारी योद्धा न तो है और न आगे होनेकी ही सम्भावना है ॥ ६२ ॥
सत्त्वेन कुरुते युद्धं राजन् सुबलवानपि ।
अप्रमादी महोत्साही सत्त्वस्थो भव पाण्डव ॥ ६३ ॥
‘पाण्डुनन्दन! अत्यन्त बलवान् पुरुष भी आत्मबलसे ही युद्ध करता है, इसलिये आप सावधानीपूर्वक महान् उत्साह और आत्मबलका आश्रय लीजिये ॥ ६३ ॥
सत्त्वं हि मूलमर्थस्य वितथं यदतोऽन्यथा ।
न तु प्रसक्तं भवति वृक्षच्छायेव हैमनी ॥ ६४ ॥